Vitthal Pacholi Jun 1, 2020

❤🌹श्री राधे🌹❤ सेवाराम और मोतीलाल दो घनिष्ठ मित्र थे । . दोनों ही गली-गली जाकर पीठ पर पोटली लादकर कपड़े बेचने का काम करते थे । . सर्दियों के दिन थे वह गांव-गांव जाकर कपड़े बेच रहे थे तभी एक झोपड़ी के बाहर एक बुढ़िया जो कि ठंड से कांप रही थी तो.. . सेवाराम ने अपनी पोटली से एक कंबल निकालकर उस माई को दिया और कहां माई तुम ठंड से कांप रही हो यह कंबल ओढ़ लो... . बूढ़ी माई कंबल लेकर बहुत खुश हुई और जल्दी जल्दी से उसने कंबल से अपने आप को ढक लिया और सेवाराम को खूब सारा आशीर्वाद दिया। . तभी उसने सेवाराम को कहा मेरे पास पैसे तो नहीं है लेकिन रुको मैं तुम्हें कुछ देती हूं। . वह अपनी झोपड़ी के अंदर गई तभी उसके हाथ में एक बहुत ही सुंदर छोटी सी ठाकुर जी की प्रतिमा थी। . वह सेवाराम को देते हुए बोली कि मेरे पास देने के लिए पैसे तो नहीं है लेकिन यह ठाकुर जी है। . इसको तुम अपनी दुकान पर लगा कर खूब सेवा करना देखना तुम्हारी कितनी तरक्की होती है। यह मेरा आशीर्वाद है। . मोतीराम बुढ़िया के पास आकर बोला, अरे ओ माता जी क्यों बहाने बना रही हो.. . अगर पैसे नहीं है तो कोई बात नहीं लेकिन हमें झूठी तसल्ली मत दो हमारे पास तो कोई दुकान नहीं है। . हम इसको कहां लगाएंगे। इनको तुम अपने पास ही रखो। . लेकिन सेवाराम जो कि बहुत ही नेक दिल था और ठाकुर जी को मानने वाला था वह बोला.. . नहीं-नहीं माताजी अगर आप इतने प्यार से कह रही हैं तो यह आप मुझे दे दो। पैसों की आप चिंता मत करो.. . सेवाराम ने जल्दी से अपने गले में पढ़े हुए परने में ठाकुर जी को लपेट लिया और उनको लेकर चल पड़ा। . बुढ़िया दूर तक उनको आशीर्वाद दे रही थी.. हरी तुम्हारा ध्यान रखेंगे ठाकुर जी तुम्हारा ध्यान रखेंगे। . वह तब तक आशीर्वाद देती रही जब तक कि वह दोनों उनकी आंखों से ओझल ना हो गए। . ठाकुर जी का ऐसा ही चमत्कार हुआ अब धीरे-धीरे दोनों की कमाई ज्यादा होने लगी.. . अब उन्होंने एक साइकिल खरीद ली.. अब साइकिल पर ठाकुरजी को आगे टोकरी में रखकर और पीछे पोटली रखकर गांव गांव कपड़े बेचने लगे। . अब फिर उनको और ज्यादा कमाई होने लगी तो उन्होंने एक दुकान किराए पर ले ले और वहां पर ठाकुर जी को बहुत ही सुंदर आसन पर विराजमान करके दुकान का मुहूर्त किया। . धीरे-धीरे दुकान इतनी चल पड़ी कि अब सेवाराम और मोती लाल के पास शहर में बहुत ही बड़ी बड़ी कपड़े की दुकाने और कपड़े की मिलें हो गई। . एक दिन मोतीलाल सेवाराम को कहता कि देखो आज हमारे पास सब कुछ है यह हम दोनों की मेहनत का नतीजा है.. . लेकिन सेवाराम बोला नहीं नहीं हम दोनों की मेहनत के साथ-साथ यह हमारे ठाकुर जी हमारे हरि की कृपा है। . मोतीलाल बात को अनसुनी करके वापस अपने काम में लग गया। . एक दिन सेवाराम की सेहत थोड़ी ढीली थी इसलिए वह दुकान पर थोड़ी देरी से आया.. . मोतीलाल बोला.. अरे दोस्त आज तुम देरी से आए हो तुम्हारे बिना तो मेरा एक पल का गुजारा नहीं तुम मेरा साथ कभी ना छोड़ना। . सेवाराम हंसकर बोला अरे मोतीलाल चिंता क्यों करते हो मैं नहीं आऊंगा तो हमारे ठाकुर जी तो है ना। . यह कहकर सेवा राम अपने काम में लग गया। पहले दोनों का घर दुकान के पास ही होता था लेकिन अब दोनों ने अपना घर दुकान से काफी दूर ले लिया। . अब दोनों ही महल नुमा घर में रहने लगे। दोनों ने अपने बच्चों को खूब पढ़ाया लिखाया। . सेवाराम के दो लड़के थे दोनों की शादी कर दी थी और मोती लाल के एक लड़का और एक लड़की थी। . मोतीलाल ने अभी एक लड़के की शादी की थी अभी उसने अपनी लड़की की शादी करनी थी। . सेहत ढीली होने के कारण सेवाराम अब दुकान पर थोड़े विलंब से आने लगा तो एक दिन वह मोतीलाल से बोला.. . अब मेरी सेहत ठीक नहीं रहती क्या मैं थोड़ी विलम्ब से आ सकता हूं.. . मोतीलाल ने कहा हां भैया तुम विलम्ब से आ जाओ लेकिन आया जरूर करो मेरा तुम्हारे बिना दिल नहीं लगता। . फिर अचानक एक दिन सेवाराम 12:00 बजे के करीब दुकान पर आया.. . लेकिन आज उसके चेहरे पर अजीब सी चमक थी चाल में एक अजीब सी मस्ती थी चेहरे पर अजीब सी मुस्कान थी । . वह आकर गद्दी पर बैठ गया... मोतीलाल ने कहा भैया आज तो तुम्हारी सेहत ठीक लग रही है.. . सेवाराम ने कहा भैया ठीक तो नहीं हूं लेकिन आज से मैं बस केवल 12:00 बजे आया करूंगा और 5:00 बजे चला जाया करूंगा। मैं तो केवल इतना ही दुकान पर बैठ सकता हूं। . मोतीलाल ने कहा कोई बात नहीं जैसी तुम्हारी इच्छा.. . अब तो सेवाराम रोज 12:00 बजे आता और 5:00 बजे चला जाता लेकिन उसकी शक्ल देखकर ऐसा नहीं लगता था कि वह कभी बीमार भी है। . लेकिन मोतीलाल को अपने दोस्त पर पूरा विश्वास था कि वह झूठ नहीं बोल सकता और मेहनत करने से वह कभी पीछे नहीं हट सकता। . एक दिन मोतीलाल की बेटी की शादी तय हुई तो वह शादी का निमंत्रण देने के लिए सेवाराम के घर गया। . घर जाकर उसको उसके बेटा बहू सेवाराम की पत्नी सब नजर आ रहे थे.. लेकिन सेवाराम नजर नहीं आ रहा था.. . उसने सेवाराम की पत्नी से कहा भाभी जी सेवाराम कहीं नजर नहीं आ रहा.. . उसकी पत्नी एकदम से हैरान होती हुई बोली यह आप क्या कह रहे हैं ? . तभी वहां उसके बेटे भी आ गए और कहने लगी काका जी आप कैसी बातें कर रहे हो.. हमारे साथ कैसा मजाक कर रहे हो.. . मोतीलाल बोला कि मैंने ऐसा क्या पूछ लिया मैं तो अपने प्रिय दोस्त के बारे में पूछ रहा हूं.. . क्या उसकी तबीयत आज भी ठीक नही है..? क्या वह अंदर आराम कर रहा है..? . मै खुद अंदर जाकर उसको मिल आता हूं... . मोतीलाल उसके कमरे में चला गया लेकिन सेवाराम उसको वहां भी नजर नहीं आया.. . तभी अचानक उसकी नजर उसके कमरे में सेवाराम के तस्वीर पर पड़ी.. . वह एकदम से हैरान होकर सेवा राम की पत्नी की तरफ देखता हुआ बोला... . अरे भाभी जी यह क्या आपने सेवाराम की तस्वीर पर हार क्यों चढ़ाया हुआ है.. . सेवा राम की पत्नी आंखों में आंसू भर कर बोली..!! मुझे आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी भैया कि आप ऐसा मजाक करेंगे..!! . मोतीलाल को कुछ समझ नहीं आ रहा था.. . तभी सेवाराम का बेटा बोला क्या आपको नहीं पता कि पिताजी को गुजरे तो 6 महीने हो चुके हैं.!! . मोतीलाल को तो ऐसा लगा कि जैसे उसके सिर पर बिजली गिर पड़ी हो। . वह एकदम से थोड़ा लड़खडाता हुआ पीछे की तरफ हटा और बोला ऐसा कैसे हो सकता है.. वह तो हर रोज दुकान पर आते हैं। . बीमार होने के कारण थोड़ा विलंब से आता है.. . वह 12:00 बजे आता है और 5:00 बजे चला जाता है.. . उसकी पत्नी बोली ऐसा कैसे हो सकता है कि आपको पता ना हो.. . आप ही तो हर महीने उनके हिस्से का मुनाफे के पैसे हमारे घर देने आते हो.. . 6 महीनों से तो आप हमें दुगना मुनाफा दे कर जा रहे हो.. . मोतीलाल का तो अब सर चकरा गया उसने कहा मैं तो कभी आया ही नहीं..!! . 6 महीने हो गए यह क्या मामला है.. . तभी उसको सेवाराम की कही बात आई मैं नहीं रहूंगा तो मेरे हरी है ना मेरे ठाकुर जी है ना वह आएंगे... . मोतीलाल को जब यह बातें याद आई तो वह जोर जोर से रोने लगा और कहने लगा हे ठाकुर जी... हे हरि आप अपने भक्तों के शब्दों का कितना मान रखते हो.. . जोकि अपने विश्राम के समय.. मंदिर के पट 12:00 बजे बंद होते हैं और 5:00 बजे खुलते हैं.. . और आप अपने भक्तों के शब्दों का मान रखने के लिए कि मेरे हरी आएंगे मेरे ठाकुर जी आएंगे तो आप अपने आराम के समय मेरी दुकान पर आकर अपने भक्तों का काम करते थे.. . इतना कहकर वह फूट-फूट कर रोने लगा और कहने लगा ठाकुर जी आप की लीला अपरंपार है.. . मैं ही सारी जिंदगी नोट गिनने में लगा रहा असली भक्त तो सेवाराम था जो आपका प्रिय था.. . आपने उसको अपने पास बुला लिया और उसके शब्दों का मान रखने के लिए आप उसका काम खुद स्वयं कर रहे थे... . और उसके हिस्से का मुनाफा भी उसके घर मेरे रूप में पहुँचा रहे थे.. . इतना कहकर वह भागा भागा दुकान की तरफ गया और वहां जाकर जहां पर ठाकुर जी जिस गद्दी पर आकर बैठते थे.. . जहां पर अपने चरण रखते थे वहां पर जाकर गद्दी को अपने आंखों से मुंह से चुमता हुआ चरणों में लौटता हुआ जार जार रोने लगा.. . और ठाकुर जी की जय जयकार करने लगा। . ठाकुर जी तो हमारे ऐसे हैं.. सेवाराम को उन पर विश्वास था कि मैं ना रहूंगा तो मेरे ठाकुर जी मेरा सारा काम संभालेंगे। 💥 *कथासार* 💥 विश्वास से तो बेड़ा पार है इसलिए हमें हर काम उस पर विश्वास रख कर अपनी डोरी उस पर छोड़ देनी चाहिए। जिनको उन पर पूर्ण विश्वास है वह उनकी डोरी कभी भी नहीं अपने हाथ से छूटने देंते। जय हो ठाकुर जी आपकी । राधे राधे.... विश्वासम फलदायकम।।

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Vitthal Pacholi Jun 1, 2020

राधे - राधे ॥आज का भगवद् चिंतन॥ 01-06-2020 ☘गंगा दशहरा का पावन पर्व मानव जीवन को तीन महत्वपूर्ण सूत्र प्रदान करता है।प्रयास, परीक्षा, तितिक्षा और उसके पश्चात सफलता। ☘राजा भागीरथ द्वारा जिन कठिन प्रयासों से माँ गंगा को धरती पर लाया गया वो संपूर्ण घटनाक्रम मानव जीवन के लिए एक बहुत बड़ी सीख और प्रेरणा प्रदान करता है। ☘प्रयास जीवन में लक्ष्य प्राप्ति की प्रथम शर्त है। जितना बड़ा लक्ष्य होगा प्रयास भी उसी अनुपात में होना चाहिए। इसलिए बड़े लक्ष्य को पाना हो तो आपका प्रयास भी बड़ा ही होना चाहिए। ☘लक्ष्य की दिशा में बढ़ते हुए परीक्षा दूसरा सोपान है। सफलता का कोई बाईपास नहीं होता, वो तो सीढ़ी दर सीढ़ी ही चढ़कर ही प्राप्त करनी होती है। लक्ष्य प्राप्ति में आने वाली विघ्न - बाधाएं ही आपकी परीक्षा है। ☘तितिक्षा अर्थात धैर्य आपके लक्ष्य की दिशा में बढ़ते हुए तीसरा प्रमुख सोपान है। प्रयास और परीक्षा के बाद यदि धैर्य का दामन नहीं थामा गया तो सागर के बहुत करीब पहुँचने के बाद भी आपको प्यासा लौटना पड़ेगा। धैर्य ही तो वो ऊर्जा है जो अनेक कठिनाइयों के बावजूद भी किसी व्यक्ति को उसके लक्ष्य की ओर निरंतर गतिमान रखता है। तितिक्षा ही तो जीवन की परीक्षा में डटे रहने का सामर्थ्य प्रदान करती है। ☘श्रेष्ठ के लिए सदा प्रयत्नशील रहें, कठिन से कठिन चुनौतियों का सामना करने के लिए सदा ऊर्जावान रहें और प्रत्येक विषम से विषम परिस्थितियों में भी धैर्यवान बने रहें, यकीन मानिएगा एक दिन लक्ष्य आपकी मुट्ठी में होगा। निश्चित ही माँ गंगा भी धरती पर उतरेंगी, आप श्रेष्ठ संकल्प के साथ जीना तो सीखिए! ☘माँ गंगा के धरा धाम पर अवतरण दिवस गंगा दशहरा के पावन पर्व की आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं एवं बधाइयाँ! ☘☘☘☘☘☘☘☘ राधे राधे,........

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Vitthal Pacholi Jun 1, 2020

🌺☘🎋 *हक हलाल की कमाई*🎋☘🌺 बासमती चावल बेचने वाले एक सेठ की स्टेशन मास्टर से अछी साँठ-गाँठ हो गयी थी। स्टेशन मास्टर से सेठ को आधी कीमत पर बासमती चावल मिलने लगे थे। सेठ ने सोचा कि इतना पाप हो रहा है, तो कुछ धर्म-कर्म भी करना चाहिए। एक दिन उस ने बासमती चावल की खीर बनवायी और किसी साधु बाबा को आमंत्रित कर भोजन प्रसाद लेने के लिए प्रार्थना की। साधु बाबा ने बासमती चावल की खीर खायी।दोपहर का समय था। सेठ ने साधु से कहाः "महाराज! अभी आप आराम कीजिए। थोड़ी धूप कम हो जाय फिर चले जाईएगा। साधु बाबा ने बात स्वीकार कर ली। सेठ ने 100-100 रूपये वाली 10 लाख रकम की गड्डियाँ उसी कमरे में चादर से ढँककर रखी थी। साधु बाबा आराम करने लगे । खीर थोड़ी हजम हुई थी कि साधु बाबा के मन में खयाल आया कि इतनी सारी रूपय की गड्डियाँ पड़ी हैं। एक-दो रूपय की गड्डियाँ उठाकर झोले में रख लूँ तो किसको पता चलेगा? साधु बाबा ने एक गड्डी उठाकर अपने झोले मै रख ली। शाम को साधु सेठ को आशीर्वाद देकर चल पड़े। जब सेठ दूसरे दिन रूपये गिनने बैठा, तो एक रूपयो की गड्डी कम निकली। सेठ ने सोचा कि महात्मा तो भगवत पुरुष थे, वे क्यों लेंगे मेरे रूपय? इस बात के लिए सेठ ने नौकरों की धुलाई-पिटाई चालू कर दी। ऐसा करते-करते दोपहर हो गयी । इतने में साधु बाबा आ पहुँचे, तथा अपने झोले में से एक गड्डी रूपयो की निकाल कर सेठ को देते हुए बोलेः "नौकरों को मत पीटना, गड्डी मैं ले गया था।" सेठ ने कहाः "महाराज! आप क्यों लेंगे? जब यहाँ नौकरों से पूछताछ शुरु हुई तब कोई भय के मारे आप को दे गया होगा। और आप उस नौकर को बचाने के उद्देश्य से ही वापस करने आये हैं। क्योंकि साधु तो दयालु होते है।" साधुः बोला "यह दयालुता नहीं है। मैं सचमुच में तुम्हारी गड्डी चुराकर ले गया था। *साधु ने कहा सेठ ...तुम मुझे सच बताओ कि तुम ने कल खीर किसे और किस लिए बनायी थी?" सेठ ने सारी बात बता दी कि स्टेशन मास्टर से चोरी के चावल खरीदता हूँ, उसी चावल की खीर थी। साधु बाबाः "चोरी के चावल की खीर थी, इस लिए उसने मेरे मन में भी चोरी का भाव उत्पन्न कर दिया। सुबह जब पेट खाली हुआ, तेरी खिलाई खीर का सफाया हो गया। तब मेरी बुद्धि शुद्ध हुई कि 'हे राम.... यह क्या हो गया?* मेरे कारण बेचारे नौकरों पर न जाने क्या बीत रही होगी । इसलिए तेरे पैसे लौटाने आ गया। इस कहानी से हमें यही सीख मिलती है। *कि हमें भी अपनी नेक कमाई कमानी चाहिए और उसी के ऊपर गुजारा करना चाहिए। ताकि हमारा मन शुद्ध रहे, जितना मन शुद्ध रहेगा, उतनी ही जल्दी परमात्मा का निवास मन में कर पाएगे। तभी हमारा भजन सिमरन बन पायेगा, अगर हम हक हलाल की कमाई नही कमाते हैं। तो हमारा मन भी वैसे ही गंदगी से भरा रहेगा और मैले बर्तन में मालिक कोई भी चीज नहीं डालते। इस लिये जब तक हम हक हलाल की कमाई नही करते, तव तक उस मालिक का हमारे हृदय मै निवास होना असंभव है। इस लिए हक हलाल की कमाई करीये, "इसी लिए कहते हैं कि.... *जैसा खाओ अन्न ... वैसा होवे मन। जैसा पीओ पानी .... वैसी होवे वाणी।।* 🌳🌸🌻🙏🌹🙏🌹🙏🌻🌸🌳

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Vitthal Pacholi May 31, 2020

*मृत्यु* जब कोई इंसान इस दुनिया से विदा हो जाता है तो उसके कपड़े, उसका बिस्तर, उसके द्वारा इस्तेमाल किया हुआ सभी सामान उसी के साथ तुरन्त घर से निकाल दिये जाते है। पर कभी कोई उसके द्वारा कमाया गया धन-दौलत. प्रोपर्टी, उसका घर, उसका पैसा, उसके जवाहरात आदि, इन सबको क्यों नही छोड़ते? बल्कि उन चीजों को तो ढूंढते है, मरे हुए के हाथ, पैर, गले से खोज-खोजकर, खींच-खींचकर निकालकर चुपके से जेब मे डाल लेते है, वसीयत की तो मरने वाले से ज्यादा चिंता करते है। इससे पता चलता है कि आखिर रिश्ता किन चीजों से था। इसलिए पुण्य परोपकार ओर नाम की कमाई करो। इसे कोई ले नही सकता, चुरा नही सकता। ये कमाई तो ऐसी है, जो जाने वाले के साथ ही जाती है। हाड़ जले ज्यूँ लाकड़ी, केस जले ज्यूँ घास। कंचन जैसी काया जल गई, कोई न आयो पास ( एक मित्र से प्राप्त ) जय हो🙏

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Vitthal Pacholi May 31, 2020

" दक्षिण का एक ग्रन्थ " क्या ऐसा संभव है कि जब आप किताब को सीधा पढ़े तो रामायण की कथा पढ़ी जाए और जब उसी किताब में लिखे शब्दों को उल्टा करके पढ़े तो कृष्ण भागवत की कथा सुनाई दे। जी हां, कांचीपुरम के 17वीं शदी के कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ "राघवयादवीयम्" ऐसा ही एक अद्भुत ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ को ‘अनुलोम-विलोम काव्य’ भी कहा जाता है। पूरे ग्रन्थ में केवल 30 श्लोक हैं। इन श्लोकों को सीधे-सीधे पढ़ते जाएँ, तो रामकथा बनती है और विपरीत (उल्टा) क्रम में पढ़ने पर कृष्णकथा। इस प्रकार हैं तो केवल 30 श्लोक, लेकिन कृष्णकथा के भी 30 श्लोक जोड़ लिए जाएँ तो बनते हैं 60 श्लोक। पुस्तक के नाम से भी यह प्रदर्शित होता है, राघव (राम) + यादव (कृष्ण) के चरित को बताने वाली गाथा है ~ "राघवयादवीयम।" उदाहरण के तौर पर पुस्तक का पहला श्लोक हैः वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः । रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥ अर्थातः मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं, जो जिनके ह्रदय में सीताजी रहती है तथा जिन्होंने अपनी पत्नी सीता के लिए सहयाद्री की पहाड़ियों से होते हुए लंका जाकर रावण का वध किया तथा वनवास पूरा कर अयोध्या वापिस लौटे। विलोमम्: सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः । यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥ अर्थातः मैं रूक्मिणी तथा गोपियों के पूज्य भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में प्रणाम करता हूं, जो सदा ही मां लक्ष्मी के साथ विराजमान है तथा जिनकी शोभा समस्त जवाहरातों की शोभा हर लेती है। " राघवयादवीयम" के ये 60 संस्कृत श्लोक इस प्रकार हैं:- राघवयादवीयम् रामस्तोत्राणि वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः । रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥ विलोमम्: सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः । यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥ साकेताख्या ज्यायामासीद्याविप्रादीप्तार्याधारा । पूराजीतादेवाद्याविश्वासाग्र्यासावाशारावा ॥ २॥ विलोमम्: वाराशावासाग्र्या साश्वाविद्यावादेताजीरापूः । राधार्यप्ता दीप्राविद्यासीमायाज्याख्याताकेसा ॥ २॥ कामभारस्स्थलसारश्रीसौधासौघनवापिका । सारसारवपीनासरागाकारसुभूरुभूः ॥ ३॥ विलोमम्: भूरिभूसुरकागारासनापीवरसारसा । कापिवानघसौधासौ श्रीरसालस्थभामका ॥ ३॥ रामधामसमानेनमागोरोधनमासताम् । नामहामक्षररसं ताराभास्तु न वेद या ॥ ४॥ विलोमम्: यादवेनस्तुभारातासंररक्षमहामनाः । तां समानधरोगोमाननेमासमधामराः ॥ ४॥ यन् गाधेयो योगी रागी वैताने सौम्ये सौख्येसौ । तं ख्यातं शीतं स्फीतं भीमानामाश्रीहाता त्रातम् ॥ ५॥ विलोमम्: तं त्राताहाश्रीमानामाभीतं स्फीत्तं शीतं ख्यातं । सौख्ये सौम्येसौ नेता वै गीरागीयो योधेगायन् ॥ ५॥ मारमं सुकुमाराभं रसाजापनृताश्रितं । काविरामदलापागोसमावामतरानते ॥ ६॥ विलोमम्: तेन रातमवामास गोपालादमराविका । तं श्रितानृपजासारंभ रामाकुसुमं रमा ॥ ६॥ रामनामा सदा खेदभावे दया-वानतापीनतेजारिपावनते । कादिमोदासहातास्वभासारसा-मेसुगोरेणुकागात्रजे भूरुमे ॥ ७॥ विलोमम्: मेरुभूजेत्रगाकाणुरेगोसुमे-सारसा भास्वताहासदामोदिका । तेन वा पारिजातेन पीता नवायादवे भादखेदासमानामरा ॥ ७॥ सारसासमधाताक्षिभूम्नाधामसु सीतया । साध्वसाविहरेमेक्षेम्यरमासुरसारहा ॥ ८॥ विलोमम्: हारसारसुमारम्यक्षेमेरेहविसाध्वसा । यातसीसुमधाम्नाभूक्षिताधामससारसा ॥ ८॥ सागसाभरतायेभमाभातामन्युमत्तया । सात्रमध्यमयातापेपोतायाधिगतारसा ॥ ९॥ विलोमम्: सारतागधियातापोपेतायामध्यमत्रसा । यात्तमन्युमताभामा भयेतारभसागसा ॥ ९॥ तानवादपकोमाभारामेकाननदाससा । यालतावृद्धसेवाकाकैकेयीमहदाहह ॥ १०॥ विलोमम्: हहदाहमयीकेकैकावासेद्ध्वृतालया । सासदाननकामेराभामाकोपदवानता ॥ १०॥ वरमानदसत्यासह्रीतपित्रादरादहो । भास्वरस्थिरधीरोपहारोरावनगाम्यसौ ॥ ११॥ विलोमम्: सौम्यगानवरारोहापरोधीरस्स्थिरस्वभाः । होदरादत्रापितह्रीसत्यासदनमारवा ॥ ११॥ यानयानघधीतादा रसायास्तनयादवे । सागताहिवियाताह्रीसतापानकिलोनभा ॥ १२॥ विलोमम्: भानलोकिनपातासह्रीतायाविहितागसा । वेदयानस्तयासारदाताधीघनयानया ॥ १२॥ रागिराधुतिगर्वादारदाहोमहसाहह । यानगातभरद्वाजमायासीदमगाहिनः ॥ १३॥ विलोमम्: नोहिगामदसीयामाजद्वारभतगानया । हह साहमहोदारदार्वागतिधुरागिरा ॥ १३॥ यातुराजिदभाभारं द्यां वमारुतगन्धगम् । सोगमारपदं यक्षतुंगाभोनघयात्रया ॥ १४॥ विलोमम्: यात्रयाघनभोगातुं क्षयदं परमागसः । गन्धगंतरुमावद्यं रंभाभादजिरा तु या ॥ १४॥ दण्डकां प्रदमोराजाल्याहतामयकारिहा । ससमानवतानेनोभोग्याभोनतदासन ॥ १५॥ विलोमम्: नसदातनभोग्याभो नोनेतावनमास सः । हारिकायमताहल्याजारामोदप्रकाण्डदम् ॥ १५॥ सोरमारदनज्ञानोवेदेराकण्ठकुंभजम् । तं द्रुसारपटोनागानानादोषविराधहा ॥ १६॥ विलोमम्: हाधराविषदोनानागानाटोपरसाद्रुतम् । जम्भकुण्ठकरादेवेनोज्ञानदरमारसः ॥ १६॥ सागमाकरपाताहाकंकेनावनतोहिसः । न समानर्दमारामालंकाराजस्वसा रतम् ॥ १७ विलोमम्: तं रसास्वजराकालंमारामार्दनमासन । सहितोनवनाकेकं हातापारकमागसा ॥ १७॥ तां स गोरमदोश्रीदो विग्रामसदरोतत । वैरमासपलाहारा विनासा रविवंशके ॥ १८॥ विलोमम्: केशवं विरसानाविराहालापसमारवैः । ततरोदसमग्राविदोश्रीदोमरगोसताम् ॥ १८॥ गोद्युगोमस्वमायोभूदश्रीगखरसेनया । सहसाहवधारोविकलोराजदरातिहा ॥ १९॥ विलोमम्: हातिरादजरालोकविरोधावहसाहस । यानसेरखगश्रीद भूयोमास्वमगोद्युगः ॥ १९॥ हतपापचयेहेयो लंकेशोयमसारधीः । राजिराविरतेरापोहाहाहंग्रहमारघः ॥ २०॥ विलोमम्: घोरमाहग्रहंहाहापोरातेरविराजिराः । धीरसामयशोकेलं यो हेये च पपात ह ॥ २०॥ ताटकेयलवादेनोहारीहारिगिरासमः । हासहायजनासीतानाप्तेनादमनाभुवि ॥ २१॥ विलोमम्: विभुनामदनाप्तेनातासीनाजयहासहा । ससरागिरिहारीहानोदेवालयकेटता ॥ २१॥ भारमाकुदशाकेनाशराधीकुहकेनहा । चारुधीवनपालोक्या वैदेहीमहिताहृता ॥ २२॥ विलोमम्: ताहृताहिमहीदेव्यैक्यालोपानवधीरुचा । हानकेहकुधीराशानाकेशादकुमारभाः ॥ २२॥ हारितोयदभोरामावियोगेनघवायुजः । तंरुमामहितोपेतामोदोसारज्ञरामयः ॥ २३॥ विलोमम्: योमराज्ञरसादोमोतापेतोहिममारुतम् । जोयुवाघनगेयोविमाराभोदयतोरिहा ॥ २३॥ भानुभानुतभावामासदामोदपरोहतं । तंहतामरसाभक्षोतिराताकृतवासविम् ॥ २४॥ विलोमम्: विंसवातकृतारातिक्षोभासारमताहतं । तं हरोपदमोदासमावाभातनुभानुभाः ॥ २४॥ हंसजारुद्धबलजापरोदारसुभाजिनि । राजिरावणरक्षोरविघातायरमारयम् ॥ २५॥ विलोमम्: यं रमारयताघाविरक्षोरणवराजिरा । निजभासुरदारोपजालबद्धरुजासहम् ॥ २५॥ सागरातिगमाभातिनाकेशोसुरमासहः । तंसमारुतजंगोप्ताभादासाद्यगतोगजम् ॥ २६॥ विलोमम्: जंगतोगद्यसादाभाप्तागोजंतरुमासतं । हस्समारसुशोकेनातिभामागतिरागसा ॥ २६॥ वीरवानरसेनस्य त्राताभादवता हि सः । तोयधावरिगोयादस्ययतोनवसेतुना ॥ २७॥ विलोमम् नातुसेवनतोयस्यदयागोरिवधायतः । सहितावदभातात्रास्यनसेरनवारवी ॥ २७॥ हारिसाहसलंकेनासुभेदीमहितोहिसः । चारुभूतनुजोरामोरमाराधयदार्तिहा ॥ २८॥ विलोमम् हार्तिदायधरामारमोराजोनुतभूरुचा । सहितोहिमदीभेसुनाकेलंसहसारिहा ॥ २८॥ नालिकेरसुभाकारागारासौसुरसापिका । रावणारिक्षमेरापूराभेजे हि ननामुना ॥ २९॥ विलोमम्: नामुनानहिजेभेरापूरामेक्षरिणावरा । कापिसारसुसौरागाराकाभासुरकेलिना ॥ २९॥ साग्र्यतामरसागारामक्षामाघनभारगौः ॥ निजदेपरजित्यास श्रीरामे सुगराजभा ॥ ३०॥ विलोमम्: भाजरागसुमेराश्रीसत्याजिरपदेजनि । सगौरभानघमाक्षामरागासारमताग्र्यसा ॥ ३०॥ ॥ इति श्रीवेङ्कटाध्वरि कृतं श्री ।। कृपया अपना थोड़ा सा कीमती वक्त निकाले और उपरोक्त श्लोको को गौर से अवलोकन करें की दुनिया में कहीं भी ऐसा नही पाया गया ग्रंथ है।

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Vitthal Pacholi May 31, 2020

राधे-राधे ॥आज का भगवद् चिंतन॥ 31-05-2020 धन और धर्म दोनों का मनुष्य जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। मनुष्य की चाल केवल धन से ही नहीं बदलती अपितु धर्म से भी बदल जाती है। जब धन होता है तो अकड़ कर चलता है और जब धर्म होता है तो विनम्र होकर चलने लगता है। जीवन में धन अथवा संपत्ति आती है तो अहंकार भी अपने आप आ जाता है और जीवन में धर्म अथवा सन्मति आती है तो विनम्रता भी अपने आप आ जाती है। जीवन में संपत्ति आती है तो मनुष्य कौरवों की तरह अभिमानी हो जाता है और जीवन में सन्मति आती है तो मनुष्य पाण्डवों की तरह विनम्र भी बन जाता है। जब धर्म किसी व्यक्ति के जीवन में आता है तो वह अपने साथ विनम्रता जैसे अनेक सद्गुणों को लेकर आता है। विनम्रता धर्म की अनिवार्यता नहीं अपितु धर्म का स्वभाव है। धर्म के साध विनम्रता ऐसे ही सहज चले आती है, जैसे फूलों के साथ खुशबु और दीये के साथ प्रकाश। संपत्ति आने के बावजूद भी जो उस लक्ष्मी को नारायण की चरणदासी समझकर उसका सदुपयोग करते हुए अपने जीवन को विनम्र भाव से जीते हैं, सचमुच इस कलिकाल में उनसे श्रेष्ठ कोई साधक नहीं हो सकता। 🙏 *जय श्री राधे कृष्ण* 🙏

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Vitthal Pacholi May 29, 2020

राधे - राधे ॥आज का भगवद् चिंतन॥ 29-05-2020 💢जीवन में सब कुछ एक निवेश की तरह ही होता है। प्रेम,समय, साथ, खुशी, सम्मान और अपमान, जितना - जितना हम दूसरों को देते जायेंगे, समय आने पर एक दिन वह व्याज सहित हमें अवश्य वापस मिलने वाला है। 💢कभी दुख के क्षणों में अपने को अलग - थलग पाओ तो एक बार आत्मनिरीक्षण अवश्य कर लेना कि क्या जब मेरे अपनों को अथवा समाज को मेरी जरूरत थी तो मैं उन्हें अपना समय दे पाया था..? क्या किसी के दुख में मैं कभी सहभागी बन पाया था..? आपको अपने प्रति दूसरों के उदासीन व्यवहार का कारण स्वयं स्पष्ट हो जायेगा। 💢कभी जीवन में अकेलापन महसूस होने लगे और आपको अपने आसपास कोई दिखाई न दे जिससे मन की दो चार बात करके मन को हल्का किया जा सके तो आपको एक बार पुनः आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता है। क्या आपकी उपस्थिति कभी किसी के अकेलेपन को दूर करने का कारण बन पाई थी अथवा नहीं...? आपको अपने एकाकी जीवन का कारण स्वयं समझ आ जायेगा। 💢कथा आती है कि देवी द्रौपदी ने वासुदेव श्रीकृष्ण को एक बार एक छोटे से चीर का दान किया था और समय आने व आवश्यकता पड़ने पर विधि द्वारा वही चीर देवी द्रौपदी को साड़ियों के भंडार के रूप में लौटाया गया। 💢अच्छा - बुरा, मान - अपमान, समय - साथ, और सुख - दुख जो कुछ भी आपके द्वारा बाँटा जायेगा, देर से सही मगर एक दिन आपको दोगुना होकर मिलेगा जरूर, ये तय है। 💢💢💢💢💢💢💢💢 राधे राधे..........

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