viresh Jun 15, 2019

*एक पुरातन कथा* एक गृहस्थ भक्त अपनी जीविका का आधा भाग घर में दो दिन के खर्च के लिए पत्नी को देकर अपने गुरुदेव के पास गया । दो दिन बाद उसने अपने गुरुदेव को निवेदन किया के अभी मुझे घर जाना है। मैं धर्मपत्नी को दो ही दिन का घर खर्च दे पाया हूं । घर खर्च खत्म होने पर मेरी पत्नी व बच्चे कहाँ से खायेंगे । गुरुदेव के बहुत समझाने पर भी वो नहीं रुका। तो उन्होंने उसे एक चिट्ठी लिख कर दी। और कहा कि रास्ते में मेरे एक भक्त को देते जाना। वह चिट्ठी लेकर भक्त के पास गया। उस चिट्ठी में लिखा था कि जैसे ही मेरा यह भक्त तुम्हें ये खत दे तुम इसको 6 महीने के लिए मौन साधना की सुविधा वाली जगह में बंद कर देना। उस गुरु भक्त ने वैसे ही किया। वह गृहस्थी शिष्य 6 महीने तक अन्दर गुरु पद्धत्ति नियम, साधना करता रहा परंतु कभी कभी इस सोच में भी पड़ जाता कि मेरी पत्नी का क्या हुआ, बच्चों का क्या हुआ होगा ?? उधर उसकी पत्नी समझ गयी कि शायद पतिदेव वापस नहीं लौटेंगे।तो उसने किसी के यहाँ खेती बाड़ी का काम शुरू कर दिया। खेती करते करते उसे हीरे जवाहरात का एक मटका मिला। उसने ईमानदारी से वह मटका खेत के मालिक को दे दिया। उसकी ईमानदारी से खुश होकर खेत के मालिक ने उसके लिए एक अच्छा मकान बनवा दिया व आजीविका हेतु ज़मीन जायदात भी दे दी । अब वह अपनी ज़मीन पर खेती कर के खुशहाल जीवन व्यतीत करने लगी। जब वह शिष्य 6 महिने बाद घर लौटा तो देखकर हैरान हो गया और मन ही मन गुरुदेव के करुणा कृपा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने लगा कि सद्गुरु ने मुझे यहाँ अहंकार मुक्त कर दिया । मै समझता था कि मैं नहीं कमाकर दूंगा तो मेरी पत्नी और बच्चों का क्या होगा ?? करनेवाला तो सब परमात्मा है। लेकिन झूठे अहंकार के कारण मनुष्य समझता है कि मैं करनेवाला हूं। वह अपने गुरूदेव के पास पहुंचा और उनके चरणों में पड़ गया। गुरुदेव ने उसे समझाते हुए कहा बेटा हर जीव का अपना अपना प्रारब्ध होता है और उसके अनुसार उसका जीवन यापन होता है। मैं भगवान के भजन में लग जाऊंगा तो मेरे घरवालों का क्या होगा ?? मैं सब का पालन पोषण करता हूँ मेरे बाद उनका क्या होगा यह अहंकार मात्र है। वास्तव में जिस परमात्मा ने यह शरीर दिया है उसका भरण पोषण भी वही परमात्मा करता है। *प्रारब्ध पहले रच्यो पीछे भयो शरीर* *तुलसी चिंता क्या करे भज ले श्री रघुवीर*

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viresh Jun 15, 2019

*एक पुरातन कथा* एक गृहस्थ भक्त अपनी जीविका का आधा भाग घर में दो दिन के खर्च के लिए पत्नी को देकर अपने गुरुदेव के पास गया । दो दिन बाद उसने अपने गुरुदेव को निवेदन किया के अभी मुझे घर जाना है। मैं धर्मपत्नी को दो ही दिन का घर खर्च दे पाया हूं । घर खर्च खत्म होने पर मेरी पत्नी व बच्चे कहाँ से खायेंगे । गुरुदेव के बहुत समझाने पर भी वो नहीं रुका। तो उन्होंने उसे एक चिट्ठी लिख कर दी। और कहा कि रास्ते में मेरे एक भक्त को देते जाना। वह चिट्ठी लेकर भक्त के पास गया। उस चिट्ठी में लिखा था कि जैसे ही मेरा यह भक्त तुम्हें ये खत दे तुम इसको 6 महीने के लिए मौन साधना की सुविधा वाली जगह में बंद कर देना। उस गुरु भक्त ने वैसे ही किया। वह गृहस्थी शिष्य 6 महीने तक अन्दर गुरु पद्धत्ति नियम, साधना करता रहा परंतु कभी कभी इस सोच में भी पड़ जाता कि मेरी पत्नी का क्या हुआ, बच्चों का क्या हुआ होगा ?? उधर उसकी पत्नी समझ गयी कि शायद पतिदेव वापस नहीं लौटेंगे।तो उसने किसी के यहाँ खेती बाड़ी का काम शुरू कर दिया। खेती करते करते उसे हीरे जवाहरात का एक मटका मिला। उसने ईमानदारी से वह मटका खेत के मालिक को दे दिया। उसकी ईमानदारी से खुश होकर खेत के मालिक ने उसके लिए एक अच्छा मकान बनवा दिया व आजीविका हेतु ज़मीन जायदात भी दे दी । अब वह अपनी ज़मीन पर खेती कर के खुशहाल जीवन व्यतीत करने लगी। जब वह शिष्य 6 महिने बाद घर लौटा तो देखकर हैरान हो गया और मन ही मन गुरुदेव के करुणा कृपा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने लगा कि सद्गुरु ने मुझे यहाँ अहंकार मुक्त कर दिया । मै समझता था कि मैं नहीं कमाकर दूंगा तो मेरी पत्नी और बच्चों का क्या होगा ?? करनेवाला तो सब परमात्मा है। लेकिन झूठे अहंकार के कारण मनुष्य समझता है कि मैं करनेवाला हूं। वह अपने गुरूदेव के पास पहुंचा और उनके चरणों में पड़ गया। गुरुदेव ने उसे समझाते हुए कहा बेटा हर जीव का अपना अपना प्रारब्ध होता है और उसके अनुसार उसका जीवन यापन होता है। मैं भगवान के भजन में लग जाऊंगा तो मेरे घरवालों का क्या होगा ?? मैं सब का पालन पोषण करता हूँ मेरे बाद उनका क्या होगा यह अहंकार मात्र है। वास्तव में जिस परमात्मा ने यह शरीर दिया है उसका भरण पोषण भी वही परमात्मा करता है। *प्रारब्ध पहले रच्यो पीछे भयो शरीर* *तुलसी चिंता क्या करे भज ले श्री रघुवीर*

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viresh May 19, 2019

हम सब हनुमान चालीसा पढते हैं, सब रटा रटाया। क्या हमे चालीसा पढते समय पता भी होता है कि हम हनुमानजी से क्या कह रहे हैं या क्या मांग रहे हैं? बस रटा रटाया बोलते जाते हैं। आनंद और फल शायद तभी मिलेगा जब हमें इसका मतलब भी पता हो। तो लीजिए पेश है श्री हनुमान चालीसा अर्थ सहित!! ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि। बरनऊँ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि। 📯《अर्थ》→ गुरु महाराज के चरण.कमलों की धूलि से अपने मन रुपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला हे।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन कुमार। बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार।★ 📯《अर्थ》→ हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन.करता हूँ। आप तो जानते ही हैं, कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सदबुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुःखों व दोषों का नाश कर दीजिए।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥1॥★ 📯《अर्थ 》→ श्री हनुमान जी! आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अथाह है। हे कपीश्वर! आपकी जय हो! तीनों लोकों,स्वर्ग लोक, भूलोक और पाताल लोक में आपकी कीर्ति है।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• राम दूत अतुलित बलधामा, अंजनी पुत्र पवन सुत नामा॥2॥★ 📯《अर्थ》→ हे पवनसुत अंजनी नंदन! आपके समान दूसरा बलवान नही है।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी॥3॥★ 📯《अर्थ》→ हे महावीर बजरंग बली! आप विशेष पराक्रम वाले है। आप खराब बुद्धि को दूर करते है, और अच्छी बुद्धि वालो के साथी, सहायक है।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• कंचन बरन बिराज सुबेसा, कानन कुण्डल कुंचित केसा॥4॥★ 📯《अर्थ》→ आप सुनहले रंग, सुन्दर वस्त्रों, कानों में कुण्डल और घुंघराले बालों से सुशोभित हैं।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• हाथ ब्रज और ध्वजा विराजे, काँधे मूँज जनेऊ साजै॥5॥★ 📯《अर्थ》→ आपके हाथ मे बज्र और ध्वजा है और कन्धे पर मूंज के जनेऊ की शोभा है।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• शंकर सुवन केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जग वंदन॥6॥★ 📯《अर्थ 》→ हे शंकर के अवतार! हे केसरी नंदन! आपके पराक्रम और महान यश की संसार भर मे वन्दना होती है।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• विद्यावान गुणी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर॥7॥★ 📯《अर्थ 》→ आप प्रकान्ड विद्या निधान है, गुणवान और अत्यन्त कार्य कुशल होकर श्री राम काज करने के लिए आतुर रहते है।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया॥8॥★ 📯《अर्थ 》→ आप श्री राम चरित सुनने मे आनन्द रस लेते है। श्री राम, सीता और लखन आपके हृदय मे बसे रहते है।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रुप धरि लंक जरावा॥9॥★ 📯《अर्थ》→ आपने अपना बहुत छोटा रुप धारण करके सीता जी को दिखलाया और भयंकर रूप करके.लंका को जलाया।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• भीम रुप धरि असुर संहारे, रामचन्द्र के काज संवारे॥10॥★ 📯《अर्थ 》→ आपने विकराल रुप धारण करके.राक्षसों को मारा और श्री रामचन्द्र जी के उदेश्यों को सफल कराया।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• लाय सजीवन लखन जियाये, श्री रघुवीर हरषि उर लाये॥11॥★ 📯《अर्थ 》→ आपने संजीवनी बुटी लाकर लक्ष्मणजी को जिलाया जिससे श्री रघुवीर ने हर्षित होकर आपको हृदय से लगा लिया।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई, तुम मम प्रिय भरत सम भाई॥12॥★ 📯《अर्थ 》→ श्री रामचन्द्र ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा की तुम मेरे भरत जैसे प्यारे भाई हो।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• सहस बदन तुम्हरो जस गावैं, अस कहि श्री पति कंठ लगावैं॥13॥★ 📯《अर्थ 》→ श्री राम ने आपको यह कहकर हृदय से.लगा लिया की तुम्हारा यश हजार मुख से सराहनीय है।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, नारद,सारद सहित अहीसा॥14॥★ 📯《अर्थ》→श्री सनक, श्री सनातन, श्री सनन्दन, श्री सनत्कुमार आदि मुनि ब्रह्मा आदि देवता नारद जी, सरस्वती जी, शेषनाग जी सब आपका गुण गान करते है।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते, कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥15॥★ 📯《अर्थ 》→ यमराज,कुबेर आदि सब दिशाओं के रक्षक, कवि विद्वान, पंडित या कोई भी आपके यश का पूर्णतः वर्णन नहीं कर सकते।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा, राम मिलाय राजपद दीन्हा॥16॥★ 📯《अर्थ 》→ आपनें सुग्रीव जी को श्रीराम से मिलाकर उपकार किया, जिसके कारण वे राजा बने।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• तुम्हरो मंत्र विभीषण माना, लंकेस्वर भए सब जग जाना ॥17॥★ 📯《अर्थ 》→ आपके उपदेश का विभिषण जी ने पालन किया जिससे वे लंका के राजा बने, इसको सब संसार जानता है।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• जुग सहस्त्र जोजन पर भानू, लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥18॥★ 📯《अर्थ 》→ जो सूर्य इतने योजन दूरी पर है की उस पर पहुँचने के लिए हजार युग लगे। दो हजार योजन की दूरी पर स्थित सूर्य को आपने एक मीठा फल समझ कर निगल लिया।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहि, जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥19॥★ 📯《अर्थ 》→ आपने श्री रामचन्द्र जी की अंगूठी मुँह मे रखकर समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई आश्चर्य नही है।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥20॥★ 📯《अर्थ 》→ संसार मे जितने भी कठिन से कठिन काम हो, वो आपकी कृपा से सहज हो जाते है।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥21॥★ 📯《अर्थ 》→ श्री रामचन्द्र जी के द्वार के आप.रखवाले है, जिसमे आपकी आज्ञा बिना किसी को प्रवेश नही मिलता अर्थात आपकी प्रसन्नता के बिना राम कृपा दुर्लभ है।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू.को डरना॥22॥★ 📯《अर्थ 》→ जो भी आपकी शरण मे आते है, उस सभी को आन्नद प्राप्त होता है, और जब आप रक्षक. है, तो फिर किसी का डर नही रहता।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हाँक ते काँपै॥23॥★ 📯《अर्थ. 》→ आपके सिवाय आपके वेग को कोई नही रोक सकता, आपकी गर्जना से तीनों लोक काँप जाते है।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावै॥24॥★ 📯《अर्थ 》→ जहाँ महावीर हनुमान जी का नाम सुनाया जाता है, वहाँ भूत, पिशाच पास भी नही फटक सकते।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा॥25॥★ 📯《अर्थ 》→ वीर हनुमान जी! आपका निरंतर जप करने से सब रोग चले जाते है,और सब पीड़ा मिट जाती है।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥26॥★ 📯《अर्थ 》→ हे हनुमान जी! विचार करने मे, कर्म करने मे और बोलने मे, जिनका ध्यान आपमे रहता है, उनको सब संकटो से आप छुड़ाते है।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज सकल तुम साजा॥ 27॥★ 📯《अर्थ 》→ तपस्वी राजा श्री रामचन्द्र जी सबसे श्रेष्ठ है, उनके सब कार्यो को आपने सहज मे कर दिया।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• और मनोरथ जो कोइ लावै, सोई अमित जीवन फल पावै॥28॥★ 📯《अर्थ 》→ जिस पर आपकी कृपा हो, वह कोई भी अभिलाषा करे तो उसे ऐसा फल मिलता है जिसकी जीवन मे कोई सीमा नही होती।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥29॥★ 📯《अर्थ 》→ चारो युगों सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग मे आपका यश फैला हुआ है, जगत मे आपकी कीर्ति सर्वत्र प्रकाशमान है।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• साधु सन्त के तुम रखवारे, असुर निकंदन राम दुलारे॥30॥★ 📯《अर्थ 》→ हे श्री राम के दुलारे ! आप.सज्जनों की रक्षा करते है और दुष्टों का नाश करते है।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता॥३१॥★ 📯《अर्थ 》→ आपको माता श्री जानकी से ऐसा वरदान मिला हुआ है, जिससे आप किसी को भी आठों सिद्धियां और नौ निधियां दे सकते है।★ 1.) अणिमा → जिससे साधक किसी को दिखाई नही पड़ता और कठिन से कठिन पदार्थ मे प्रवेश कर.जाता है।★ 2.) महिमा → जिसमे योगी अपने को बहुत बड़ा बना देता है।★ 3.) गरिमा → जिससे साधक अपने को चाहे जितना भारी बना लेता है।★ 4.) लघिमा → जिससे जितना चाहे उतना हल्का बन जाता है।★ 5.) प्राप्ति → जिससे इच्छित पदार्थ की प्राप्ति होती है।★ 6.) प्राकाम्य → जिससे इच्छा करने पर वह पृथ्वी मे समा सकता है, आकाश मे उड़ सकता है।★ 7.) ईशित्व → जिससे सब पर शासन का सामर्थय हो जाता है।★ 8.)वशित्व → जिससे दूसरो को वश मे किया जाता है।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा॥32॥★ 📯《अर्थ 》→ आप निरंतर श्री रघुनाथ जी की शरण मे रहते है, जिससे आपके पास बुढ़ापा और असाध्य रोगों के नाश के लिए राम नाम औषधि है।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• तुम्हरे भजन राम को पावै, जनम जनम के दुख बिसरावै॥33॥★ 📯《अर्थ 》→ आपका भजन करने से श्री राम.जी प्राप्त होते है, और जन्म जन्मांतर के दुःख दूर होते है।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• अन्त काल रघुबर पुर जाई, जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥34॥★ 📯《अर्थ 》→ अंत समय श्री रघुनाथ जी के धाम को जाते है और यदि फिर भी जन्म लेंगे तो भक्ति करेंगे और श्री राम भक्त कहलायेंगे।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• और देवता चित न धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई॥35॥★ 📯《अर्थ 》→ हे हनुमान जी! आपकी सेवा करने से सब प्रकार के सुख मिलते है, फिर अन्य किसी देवता की आवश्यकता नही रहती।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥36॥★ 📯《अर्थ 》→ हे वीर हनुमान जी! जो आपका सुमिरन करता रहता है, उसके सब संकट कट जाते है और सब पीड़ा मिट जाती है।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• जय जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करहु गुरु देव की नाई॥37॥★ 📯《अर्थ 》→ हे स्वामी हनुमान जी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मुझपर कृपालु श्री गुरु जी के समान कृपा कीजिए।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• जो सत बार पाठ कर कोई, छुटहि बँदि महा सुख होई॥38॥★ 📯《अर्थ 》→ जो कोई इस हनुमान चालीसा का सौ बार पाठ करेगा वह सब बन्धनों से छुट जायेगा और उसे परमानन्द मिलेगा।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा॥39॥★ 📯《अर्थ 》→ भगवान शंकर ने यह हनुमान चालीसा लिखवाया, इसलिए वे साक्षी है कि जो इसे पढ़ेगा उसे निश्चय ही सफलता प्राप्त होगी।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजै नाथ हृदय मँह डेरा॥40॥★ 📯《अर्थ 》→ हे नाथ हनुमान जी! तुलसीदास सदा ही श्री राम का दास है।इसलिए आप उसके हृदय मे निवास कीजिए।★ ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रुप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥★ 📯《अर्थ 》→ हे संकट मोचन पवन कुमार! आप आनन्द मंगलो के स्वरुप है। हे देवराज! आप श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण सहित मेरे हृदय मे निवास कीजिए।★ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ 🌹सीता राम दुत हनुमान जी को समर्पित🌹 🍒💠🍒💠🍒💠🍒💠🍒 🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏 कृपया आगे भी औरौं को भेजें🙏

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viresh May 19, 2019

*मूर्ख हैं हम।* एक बार एक अजनबी किसी के घर गया । वह अंदर गया और मेहमान कक्ष में बैठ गया । वह खाली हाथ आया था तो उसने सोचा कि कुछ उपहार देना अच्छा रहेगा । उसने वहाँ टंगी एक पेन्टिंग उतारी और जब घर का मालिक आया ।उसने पेन्टिंग देते हुए कहा, यह मै आपके लिए लाया हूँ । घर का मालिक, जिसे पता था कि यह मेरी चीज मुझे ही भेंट दे रहा है, सन्न रह गया । अब आप ही बताएँ कि क्या वह भेंट पा कर, जो कि पहले से ही उसका है, उस आदमी को खुश होना चाहिए ? मेरे ख्याल से नहीं । लेकिन यही चीज हम भगवान के साथ भी करते हैं । हम उन्हें रूपया, पैसा चढाते हैं और हर चीज जो उनकी ही बनाई है, उन्हें भेंट करते हैं । लेकिन मन में भाव रखते है की यह चीज मै भगवान को दे रहा हूँ और सोचते हैं कि ईश्वर खुश हो जाएगें । *मूर्ख हैं हम।* हम यह नहीं समझते कि उनको इन सब चीज़ों की कोई जरुरत नहीं । अगर आप सच में उन्हें कुछ देना चाहते हैं तो अपनी श्रद्धा दीजिए, उन्हें अपने हर एक श्वांस में याद कीजिये और विश्वास कीजिए, प्रभु जरुर खुश होगें । अजब हैरान हूँ भगवन्, तुझे कैसे रिझाऊं मैं । कोई वस्तु नहीं ऐसी, जिसे तुझ पर चढाऊं मैं । भगवान ने जवाब दिया : संसार की हर वस्तु तुझे मैनें दी है । तेरे पास अपनी चीज़ सिर्फ़ तेरा अहंकार है, जो मैनें नहीं दिया। उसी को तू मेरे अरपण कर दे । तेरा जीवन सफल हो जायेगा । 🙏Radhey Radhey 🙏 *🌸🌺🙏🌺🌸*

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viresh May 19, 2019

*परमात्मा की लाठी* बहुत सुंदर भाव अवश्य पढे....📖 एक साधु वर्षा के जल में प्रेम और मस्ती से भरा चला जा रहा था, कि उसने एक मिठाई की दुकान को देखा जहां एक कढ़ाई में गरम दूध उबाला जा रहा था तो मौसम के हिसाब से दूसरी कढ़ाई में गरमा गरम जलेबियां तैयार हो रही थीं। साधु कुछ क्षणों के लिए वहाँ रुक गया, शायद भूख का एहसास हो रहा था या मौसम का असर था। साधु हलवाई की भट्ठी को बड़े गौर से देखने लगा साधु कुछ खाना चाहता था लेकिन साधु की जेब ही नहीं थी तो पैसे भला कहां से होते, साधु कुछ पल भट्ठी से हाथ सेंकनें के बाद चला ही जाना चाहता था कि नेक दिल हलवाई से रहा न गया और एक प्याला गरम दूध और कुछ जलेबियां साधु को दे दीं। मलंग ने गरम जलेबियां गरम दूध के साथ खाई और फिर हाथों को ऊपर की ओर उठाकर हलवाई के लिए प्रार्थना की, फिर आगे चल दिया। साधु बाबा का पेट भर चुका था दुनिया के दु:खों से बेपरवाह, वो फिर एक नए जोश से बारिश के गंदले पानी के छींटे उड़ाता चला जा रहा था। वह इस बात से बेखबर था कि एक युवा नव विवाहिता जोड़ा भी वर्षा के जल से बचता बचाता उसके पीछे चला आ रहा है। एक बार इस मस्त साधु ने बारिश के गंदले पानी में जोर से लात मारी। बारिश का पानी उड़ता हुआ सीधा पीछे आने वाली युवती के कपड़ों को भिगो गया उस औरत के कीमती कपड़े कीचड़ से लथपथ हो गये। उसके युवा पति से यह बात बर्दाश्त नहीं हुई। इसलिए वह आस्तीन चढ़ाकर आगे बढ़ा और साधु के कपड़ो को पकड़ कर खींच कर कहने लगा -"अंधा है?तुमको नज़र नहीं आता तेरी हरकत की वजह से मेरी पत्नी के कपड़े गीले हो गऐ हैं और कीचड़ से भर गऐ हैं?" साधु हक्का-बक्का सा खड़ा था जबकि इस युवा को साधु का चुप रहना नाखुशगवार गुज़र रहा था। महिला ने आगे बढ़कर युवा के हाथों से साधु को छुड़ाना भी चाहा, लेकिन युवा की आंखों से निकलती नफरत की चिंगारी देख वह भी फिर पीछे खिसकने पर मजबूर हो गई। राह चलते राहगीर भी उदासीनता से यह सब दृश्य देख रहे थे लेकिन युवा के गुस्से को देखकर किसी में इतनी हिम्मत नहीं हुई कि उसे रोक पाते और आख़िर जवानी के नशे मे चूर इस युवक ने, एक जोरदार थप्पड़ साधु के चेहरे पर जड़ दिया। बूढ़ा मलंग थप्पड़ की ताब ना झेलता हुआ लड़खड़ाता हुआ कीचड़ में जा गिरा। युवक ने जब साधु को नीचे गिरता देखा तो मुस्कुराते हुए वहां से चल दिया। बूढ़े साधु ने आकाश की ओर देखा और उसके होठों से निकला वाह मेरे भगवान कभी गरम दूध जलेबियां और कभी गरम थप्पड़!!! लेकिन जो तू चाहे मुझे भी वही पसंद है। यह कहता हुआ वह एक बार फिर अपने रास्ते पर चल दिया। दूसरी ओर वह युवा जोड़ा अपनी मस्ती को समर्पित अपनी मंजिल की ओर अग्रसर हो गया। थोड़ी ही दूर चलने के बाद वे एक मकान के सामने पहुंचकर रुका। वह अपने घर पहुंच गए थे। वो युवा अपनी जेब से चाबी निकाल कर अपनी पत्नी से हंसी मजाक करते हुए ऊपर घर की सीढ़ियों तय कर रहा था। बारिश के कारण सीढ़ियों पर फिसलन हो गई थी। अचानक युवा का पैर फिसल गया और वह सीढ़ियों से नीचे गिरने लगा। महिला ने बहुत जोर से शोर मचा कर लोगों का ध्यान अपने पति की ओर आकर्षित करने लगी जिसकी वजह से काफी लोग तुरंत सहायता के लिये युवा की ओर लपक, लेकिन देर हो चुकी थी। युवक का सिर फट गया था और कुछ ही देर में ज्यादा खून बह जाने के कारण इस नौजवान युवक की मौत हो चुकी थी। कुछ लोगों ने दूर से आते साधु बाबा को देखा तो आपस में कानाफूसी होने लगी कि निश्चित रूप से इस साधु बाबा ने थप्पड़ खाकर युवा को श्राप दिया है अन्यथा ऐसे नौजवान युवक का केवल सीढ़ियों से गिर कर मर जाना बड़े अचम्भे की बात लगती है। कुछ मनचले युवकों ने यह बात सुनकर साधु बाबा को घेर लिया। एक युवा कहने लगा कि - "आप कैसे भगवान के भक्त हैं जो केवल एक थप्पड़ के कारण युवा को श्राप दे बैठे। भगवान के भक्त में रोष व गुस्सा हरगिज़ नहीं होता। आप तो जरा सी असुविधा पर भी धैर्य न कर सकें।" साधु बाबा कहने लगा -"भगवान की क़सम! मैंने इस युवा को श्राप नहीं दिया।" -"अगर आप ने श्राप नहीं दिया तो ऐसा नौजवान युवा सीढ़ियों से गिरकर कैसे मर गया?" तब साधु बाबा ने दर्शकों से एक अनोखा सवाल किया कि -"आप में से कोई इस सब घटना का चश्मदीद गवाह मौजूद है?" एक युवक ने आगे बढ़कर कहा -"हाँ! मैं इस सब घटना का चश्मदीद गवाह हूँ।" साधु ने अगला सवाल किया-"मेरे क़दमों से जो कीचड़ उछला था क्या उसने युवा के कपड़ों को दागी किया था?" युवा बोला- "नहीं। लेकिन महिला के कपड़े जरूर खराब हुए थे।" मलंग ने युवक की बाँहों को थामते हुए पूछा- "फिर युवक ने मुझे क्यों मारा?" युवा कहने लगा - "क्योंकि वह युवा इस महिला का प्रेमी था और यह बर्दाश्त नहीं कर सका कि कोई उसके प्रेमी के कपड़ों को गंदा करे। इसलिए उस युवक ने आपको मारा।" युवा की बात सुनकर साधु बाबा ने एक जोरदार ठहाका बुलंद किया और यह कहता हुआ वहाँ से विदा हो गया..... *तो! भगवान की क़सम! मैंने श्राप कभी किसी को नहीं दिया लेकिन कोई है जो मुझसे प्रेम रखता है।अगर उसका यार सहन नहीं कर सका तो मेरे यार को कैसे बर्दाश्त होगा कि कोई मुझे मारे? और वो मेरा यार इतना शक्तिशाली है कि दुनिया का बड़े से बड़ा राजा भी उसकी लाठी से डरता है।* सच है। उस परमात्मा की लाठी दीख़ती नहीं और आवाज भी नहीं करती लेकिन पड़ती है तो बहुत दर्द देती है। हमारे कर्म ही हमें उसकी लाठी से बचाते हैं, बस कर्म अच्छे होने चाहियें। 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 *ना जाने कितनी अनकही बातें साथ ले जाएंगे.. .* *लोग झूठ कहते हैं कीं., खाली हाथ आए थे., खाली हाथ जाएंगे.. . ..l*

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viresh Apr 12, 2019

*महादेव का वरदान* 🙏🏻🚩🌹 👁❗👁 🌹🚩🙏🏻 गज और असुर के संयोग से एक असुर का जन्म हुआ. उसका मुख गज जैसा होने के कारण उसे गजासुर कहा जाने लगा. गजासुर शिवजी का बड़ा भक्त था और शिवजी के बिना अपनी कल्पना ही नहीं करता था. उसकी भक्ति से भोले भंडारी गजासुर पर प्रसन्न हो गए वरदान मांगने को कहा. गजासुर ने कहा- प्रभु आपकी आराधना में कीट-पक्षियों द्वारा होने वाले विघ्न से मुक्ति चाहिए. इसलिए मेरे शरीर से हमेशा तेज अग्नि निकलती रहे जिससे कोई पास न आए और मैं निर्विघ्न आपकी अराधना करता रहूं. महादेव ने गजासुरो को उसका मनचाहा वरदान दे दिया. गजासुर फिर से शिवजी की साधना में लीन हो गया. हजारो साल के घोर तप से शिवजी फिर प्रकट हुए और कहा- तुम्हारे तप से प्रसन्न होकर मैंने मनचाहा वरदान दिया था. मैं फिर से प्रसन्न हूं बोलो अब क्या मांगते हो ? गजासुर कुछ इच्छा लेकर तो तप कर नहीं रहा था. उसे तो शिव आराधना के सिवा और कोई काम पसंद नहीं था. लेकिन प्रभु ने कहा कि वरदान मांगो तो वह सोचने लगा. गजासुर ने कहा- वैसे तो मैंने कुछ इच्छा रख कर तप नहीं किया लेकिन आप कुछ देना चाहते हैं तो आप कैलाश छोड़कर मेरे उदर (पेट) में ही निवास करें. भोले भंडारी गजासुर के पेट में समा गए. माता पार्वती ने उन्हें खोजना शुरू किया लेकिन वह कहीं मिले ही नहीं. उन्होंने विष्णुजी का स्मरण कर शिवजी का पता लगाने को कहा. श्रीहरि ने कहा- बहन आप दुखी न हों. भोले भंडारी से कोई कुछ भी मांग ले, दे देते हैं. वरदान स्वरूप वह गजासुर के उदर में वास कर रहे हैं. श्रीहरि ने एक लीला की. उन्होंने नंदी बैल को नृत्य का प्रशिक्षण दिया और फिर उसे खूब सजाने के बाद गजासुर के सामने जाकर नाचने को कहा. श्रीहरि स्वयं एक ग्वाले के रूप में आए औऱ बांसुरी बजाने लगे. बांसुरी की धुन पर नंदी ने ऐसा सुंदर नृत्य किया कि गजासुर बहुत प्रसन्न हो गया. उसने ग्वाला वेशधारी श्रीहरि से कहा- मैं तुम पर प्रसन्न हूं. इतने साल की साधना से मुझमें वैराग्य आ गया था. तुम दोनों ने मेरा मनोरंजन किया है. कोई वरदान मांग लो. श्रीहरि ने कहा- आप तो परम शिवभक्त हैं. शिवजी की कृपा से ऐसी कोई चीज नहीं जो आप हमें न दे सकें. किंतु मांगते हुए संकोच होता है कि कहीं आप मना न कर दें. श्रीहरि की तारीफ से गजासुर स्वयं को ईश्वर तुल्य ही समझने लगा था. उसने कहा- तुम मुझे साक्षात शिव समझ सकते हो. मेरे लिए संसार में कुछ भी असंभव नहीं. तुम्हें मनचाहा वरदान देने का वचन देता हूं. श्रीहरि ने फिर कहा- आप अपने वचन से पीछे तो न हटेंगे. गजासुर ने धर्म को साक्षी रखकर हामी भरी तो श्रीहरि ने उससे शिवजी को अपने उदर से मुक्त करने का वरदान मांगा. गजासुर वचनबद्ध था. वह समझ गया कि उसके पेट में बसे शिवजी का रहस्य जानने वाला यह रहस्य यह कोई साधारण ग्वाला नहीं हैं, जरूर स्वयं भगवान विष्णु आए हैं. उसने शिवजी को मुक्त किया और शिवजी से एक आखिरी वरदान मांगा. उसने कहा- प्रभु आपको उदर में लेने के पीछे किसी का अहित करने की मंशा नहीं थी. मैं तो बस इतना चाहता था कि आपके साथ मुझे भी स्मरण किया जाए. शरीर से आपका त्याग करने के बाद जीवन का कोई मोल नहीं रहा. इसलिए प्रभु मुझे वरदान दीजिए कि मेरे शरीर का कोई अंश हमेशा आपके साथ पूजित हो. शिवजी ने उसे वह वरदान दे दिया. श्रीहरि ने कहा- गजासुर तुम्हारी शिव भक्ति अद्भुत है. शिव आराधना में लगे रहो. समय आने पर तुम्हें ऐसा सम्मान मिलेगा जिसकी तुमने कल्पना भी नहीं की होगी. जब गणेशजी का शीश धड़ से अलग हुआ तो गजासुर के शीश को ही श्रीहरि काट लाए और गणपति के धड़ से जोड़कर जीवित किया था. इस तरह वह शिवजी के प्रिय पुत्र के रूप में प्रथम आराध्य हो गया। 🌹🙏🏻🚩 *जय सियाराम* 🚩🙏🏻🌹 🚩🙏🏻 *जय श्री महाकाल* 🙏🏻🚩 🌹🙏🏻 *जय श्री पेड़ा हनुमान* 🙏🏻🌹 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

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viresh Apr 9, 2019

*🌹🌸 शुभ सन्ध्या वंदन🌹🌸* जय श्री जय श्री राम जय श्री राम जय हनुमान🌹🌸💐🌹🌸💐🌷🌹🌸 ✨रामजी की चिड़िया.....🐥* ✨एक बार संत तुकाराम जी ने किसी की साझेदारी में खेत रखा था। फसल बोकर वे खेत की रखवाली कर रहे थे,तब उन्हें निश्चिंतता से बैठे देखकर किसी ने कहा :"आपके खेत के सारे दाने तो पक्षी चुग रहे हैं ?" यह सुनकर तुकारामजी ने कहा : *"रामजी की चिड़िया रामजी का खेत*" ✨जिस व्यक्ति की साझेदारी में खेत था उस व्यक्ति को इस बात का पता चलते ही वह चिढ़ गया और सोचने लगा कि इस प्रकार पक्षी को खिला देने से 32 मन तो क्या,मनभर दाने भी हमारे हिस्से में नहीं आएंगे। अतः वह सरपंच के पास गया और बोला :"आप तुकाराम जी को दूसरा खेत दिलवा दीजिए और उसके पास से मेरा खेत मुझे वापस दिलवा दीजिए क्योंकि वह तो सारा दिन "विट्ठल... विट्ठल.. ही जपता रहता है और खेत में तनिक भी ध्यान नहीं देता। सरपंच :" लेकिन तुकाराम ने खेत में फसल बो दिया है इसीलिए उसके साथ में ऐसा व्यवहार नहीं कर सकता । फिर भी मैं जाकर उसे समझाता हूँ कि वह खेत की देख-रेख अच्छी तरह से करे।" ✨ बाद में सरपंच ने जाकर तुकाराम से कहा :" तुम सारा दिन "रामजी की चिड़िया रामजी का खेत" करके सब दाने पक्षियों को खिला देते हो तो फिर तुम्हारे दूसरे साझीदार को क्या दोगे ?" तुकारामजी :"मैं कम दाने लेकर उन्हें ज्यादा हिस्सा दूँगा।" सरपंच :"लेकिन पक्षी सब दाने चुग जाएंगे तो फसल कैसे होगी और बिना अनाज पके तुम क्या दे सकोगे ?" तुकारामजी :"दूसरे हिस्सेदार जितने दाने देते हैं उतने ही दाने मैं भी दूँगा।" तब सरपंच ने किसान से पूछा :"दूसरे साझीदार तुम्हें कितने दाने देते थे?" किसान : "32 मन" तुकारामजी :"मैं इन्हें 33 मन दाने दूँगा।" सरपंच :"ऐसा कैसे हो सकता है ?" तुकारामजी :"वह तो मेरा राम ही जाने जो पूरे ब्रह्मांड को सत्ता दे रहा है।" ✨जब फसल के बँटवारे का समय आया तब 32 की जगह 33 मन दाने तुकारामजी ने उस किसान को दे दिए फिर उनके अपने हिस्से में 35 मन दाने और बच गए क्योंकि तुकाराम जी ने सच्चे हृदय से भगवान की भक्ति की थी। रामजी चाहें वही तो होना है ********************* सकल कला करि कोटि बिधि *हारेउ* सेन समेत। चली न अचल समाधि सिव कोपेउ हृदयनिकेत।। देखि रसाल बिटप बर साखा। तेहि पर चढ़ेउ मदन मन माखा।। सुमन चाप निज सर संधाने। अति रिस कोपि श्रवन लगि ताने।। छाड़े बिषम बिसिख उर लागे। *छूटि समाधि संभु तब जागे*।। यहां गोस्वामी जी पहले तो कहते हैं कि सभी के हृदय में निवास करने वाले कामदेव हार गए, शिव जी के समाधि भंग नहीं कर सके... सकल कला करि कोटि बिधि *हारेउ* सेन समेत। और आगे कहते हैं कि कामदेव के प्रहार से शंभु जाग गए, उनके मन में क्षोभ हुआ तो क्या ये कामदेव की जीत नहीं है? और जब पहले सारी सेनाओं के साथ हार गए तो फिर उन्होंने अकेले ही समाधि भंग कैसे कर दिए?? इसी रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए गोस्वामी जी शिव जी के समाधि छूटने पर उनके लिए शंभु शब्द का प्रयोग करते हैं... छूटि समाधि *संभु* तब जागे। शिव जी के हृदय में श्रीराम जी निवास करते हैं इसलिए जहां राम हैं वहां काम की नहीं चली...चलि न अचल समाधि *सिव*...। परन्तु शिव जी के हृदयस्थ श्रीराम जी ने विचार किया कि यदि इनकी समाधि भंग नहीं हुई, ये जागृत नहीं हुए तो देवताओं का कल्याण कैसे होगा? इसलिए शिव को अब शंभु की ओर ले जाना आवश्यक है, केवल कल्याण स्वरूप रहने से स्वयं के हित हो सकता है पर संसार के हित के लिए, परहित के लिए शंभु अर्थात् जिससे संसार का कल्याण होगा वही करना आवश्यक है। अतः....... छूटि समाधि *संभु* तब जागे। अर्थात् शिव जी के समाधि छूटने में काम की नहीं बल्कि राम की भूमिका है। राम जी चाहते हैं कि उनकी समाधि भंग हो, राम जी चाहते हैं कि वे पार्वती जी से विवाह करें, राम जी चाहते हैं कि तारकासुर का संहार हो और देवताओं सहित संसार का कल्याण हो। और.... *रामजी चाहें वही तो होना है* और चाहे शिव जी हों या हम सभी, *आदमी खिलौना है* जय श्री राम जय हनुमान🌹🌸💐🌹🌸💐🌷🌹🌹 सीताराम जय सीताराम......... सीताराम जय सीताराम

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viresh Mar 23, 2019

🙏🙏 *यूं तो शिव के मंदिर भारत में उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिम तक हैं लेकिन ब्रजमण्डल के शिव मंदिरों की कुछ खास ही बात है। कई मंदिर यहां ऐसे हैं जिनके बारे में जनश्रुति है कि भगवान शिव यहां पदार्पित हुए थे।*  *कहते हैं कि द्वापर युग में भगवान शिव कई बार ब्रज आए थे। यहां तीन ऐसे मंदिर हैं जो पांच हजार साल से भी ज्यादा पुराने बताये जाते हैं। मथुरा का रंगेश्वर महादेव, वृंदावन का गोपेश्वर महादेव और नंदगांव का आश्वेश्वर महादेव मंदिर भोले भंडारी से सीधे जुड़े हुए माने जाते हैं।* 🎄 *नंदगांव के आश्वेश्वर मंदिर के बारे में कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण को जब वसुदेव नंद के यहां छोड़ गए तो भगवान शिव उनके दर्शन करने यहां पधारे थे। योगी के वेश में आए भोलेनाथ को माता यशोदा पहचान नहीं सकीं और उन्होंने बालक कृष्ण के दर्शन कराने से मना कर दिया। कहते हैं कि इस पर नाराज होकर भगवान शिव उसी जगह धूनी रमाकर बैठ गए थे और अंतत: यशोदा को अपने लाल को उन्हें दिखाना पड़ा था।* 🎄 *इसी तरह मथुरा के रंगेश्वर मंदिर के बारे में कथा प्रचलित है कि जब भगवान श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया तो उसका श्रेय लेने के लिए उनका भाई बलराम से झगड़ा हो गया। मंदिर के महंत दामोदर नाथ गोस्वामी कहते हैं कि प्राचीन कथाओं के अनुसार तब महादेव यहां पाताल से प्रकट हुये और ''रंग है, रंग है, रंग है'' कहते हुये फैसला सुनाते हुए कहा कि श्रीकृष्ण ने कंस को छल और बलराम ने बल से मारा है। जनश्रुति है कि जिस जगह भगवान शिव प्रकट हुये थे वहीं रंगेश्वर महादेव मंदिर स्थापित है। यहां मुख्य विग्रह धरातल से आठ फुट नीचे है और इसके दर्शन और पूजन से सभी तरह के कष्ट दूर होने की बात कही जाती है।* 🎄 *रंगेश्वर महादेव मंदिर में खप्पर एवं जेहर पूजा का विशेष महत्व है*। 🔔🙏 *खप्पर पूजा महाशिवरात्रि के बाद अमावस्या को होती है। वहीं, जेहर पूजा महाशिवरात्रि के दिन नवविवाहिता महिलायें पुत्र की प्राप्ति के लिए करती हैं। नवविवाहिताएं इस दिन गाजे-बाजे के साथ रंगेश्वर मंदिर जाती हैं और तांबे या पीतल के पात्र में जल भरकर भगवान शिव की पंच वस्त्र से पूजा करती हैं।* 🎄 *ब्रज के एक और मंदिर का महादेव से पुराना नाता बताया जाता है। वृंदावन के गोपेश्वर महादेव मंदिर के कहना है कि प्राचीन कथानकों के अनुसार राधा और श्रीकृष्ण यहां महारास कर रहे थे। उन्होंने गोपियों को आदेश दे रखा था कि कोई पुरुष यहां नहीं आना चाहिये। उसी वक्त भगवान शिव उनसे मिलने वहां पहुंच गये। गोपियों ने आदेश का पालन करते हुये महादेव को वहां रोक लिया और कहा कि स्त्री वेश में ही वह अंदर जा सकते हैं। इसके बाद महादेव ने गोपी का रूप धरकर प्रवेश किया लेकिन श्रीकृष्ण उन्हें पहचान गये। भगवान शिव के गोपी का रूप लेने की वजह से ही इस मंदिर का नाम गोपेश्वर महादेव मंदिर है।* 🌱🚩 *Har Har Mahadev*🍭💧🎈🌺🌞

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