Acharya Umesh Badola Jun 27, 2019

।। घंटानाद ।। मंदिर में प्रवेश करने वाला प्रत्येक भक्त पहले घंटानाद करता है और मंदिर में प्रवेश करता है। क्या कारण है इसके पीछे? इसका एक वैज्ञानिक कारण है.. जब हम बृहद घंटे के नीचे खड़े होकर सर ऊँचा करके हाथ उठाकर घंटा बजाते हैं, तब प्रचंड घंटानाद होता है। यह ध्वनि 330 मीटर प्रति सेकंड के वेग से अपने उद्गम स्थान से दूर जाती है, ध्वनि की यही शक्ति कंपन के माध्यम से प्रवास करती है। आप उस वक्त घंटे के नीचे खडे़ होते हैं। अतः ध्वनि का नाद आपके सहस्रारचक्र (सिर के ठीक ऊपर) में प्रवेश कर शरीरमार्ग से भूमि में प्रवेश करता है।यह ध्वनि प्रवास करते समय आपके मन में (मस्तिष्क में) चलने वाले असंख्य विचार, चिंता, तनाव, उदासी, मनोविकार.. इन समस्त नकारात्मक विचारों को अपने साथ ले जाती हैं, और आप निर्विकार अवस्था में परमेश्वर के सामने जाते हैं। तब आपके भाव शुद्धतापूर्वक परमेश्वर को समर्पित होते हैं। व घंटे के नाद की तरंगों के अत्यंत तीव्र के आघात से आस-पास के वातावरण के व हमारे शरीर के सूक्ष्म कीटाणुओं का नाश होता है, जिससे वातावरण मे शुद्धता रहती है, हमें स्वास्थ्य लाभ होता है। इसीलिए मंदिर मे प्रवेश करते समय घंटानाद अवश्य करें, और थोड़ा समय घंटे के नीचे खडे़ रह कर घंटानाद का आनंद अवश्य लें।आप चिंतामुक्त व शुचिर्भूत बनेगें। आप का मस्तिष्क ईश्वर की दिव्य ऊर्जा ग्रहण करने हेतु तैयार होगा। ईश्वर की दिव्य ऊर्जा व मंदिर गर्भ की दिव्य ऊर्जाशक्ति आपका मस्तिष्क ग्रहण करेगा। आप प्रसन्न होंगे और शांति मिलेगी,🔔🔔🙏🙏🔔🔔

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Acharya Umesh Badola Jun 24, 2019

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Acharya Umesh Badola Jun 23, 2019

श्रीराधा विजयते नमः || महामंत्र || हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे| हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे||१| अनुवाद: यह महामंत्र है| प्रकाशिका वृत्ति नामक टीका:--- श्रील जीव गोस्वामीपाद के अनुसार महामंत्र की व्याख्या इस प्रकार है– ‘हरे’ का अर्थ है– सर्वचेतोहर: कृष्णनस्तस्य चित्तं हरत्यसौ– सर्वाकर्षक भगवान् कृष्ण के भी चित्त को हरने वाली उनकी आह्लादिनी शक्तिरूपा ‘हरा’ अर्थात– श्री राधिका जी । ‘कृष्ण’ का अर्थ है– स्वीय लावण्यमुरलीकलनि:स्वनै:– अपने रूप-लावण्य एवं मुरली की मधुर ध्वनि से सभी के मन को बरबस आकर्षित लेने वाले मुरलीधर ही ‘कृष्ण’ हैं| ‘राम’ का अर्थ है– रमयत्यच्युतं प्रेम्णा निकुन्ज-वन-मंदिरे– निकुन्ज-वन के श्रीमंदिर में श्री राधिका जी के साथ माधुर्य लीला में रमण करते करने वाले राधारमण ही ‘राम’ हैं| प्रमाण: --हरेकृष्ण महामंत्र कीर्तन की महिमा वेदों तथा पुराणों में सर्वत्र दिखती है| कलिकाल में केवल इसी मन्त्र के कीर्तन से उद्धार संभव है| अथर्ववेद की अनंत संहिता में आता है– षोडषैतानि नामानि द्वत्रिन्षद्वर्णकानि हि| कलौयुगे महामंत्र: सम्मतो जीव तारिणे|| सोलह नामों तथा बत्तीस वर्णों से युक्त महामंत्र का कीर्तन ही कलियुग में जीवों के उद्धार का एकमात्र उपाय है| अथर्ववेद के चैतन्योपनिषद में आता है– स: ऐव मूलमन्त्रं जपति हरेर इति कृष्ण इति राम इति| भगवन गौरचन्द्र सदैव महामंत्र का जप करते हैं जिसमे पहले ‘हरे’ नाम, उसके बाद ‘कृष्ण’ नाम तथा उसके बाद ‘राम’ नाम आता है| ऊपर वर्णित क्रम के अनुसार महामंत्र का सही क्रम यही है की यह मंत्र ‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण...’ से शुरू होता है, न की ‘हरे राम हरे राम....’ से| जयपुर के संग्रहालय में अभी भी प्राचीनतम पांडु-लिपियों में महामंत्र का क्रम इसी अनुसार देख सकते है| यजुर्वेद के कलि संतारण उपनिषद् में आता है– इति षोडषकं नाम्नाम् कलि कल्मष नाशनं| नात: परतरोपाय: सर्व वेदेषु दृश्यते|| सोलह नामों वाले महामंत्र का कीर्तन ही कलियुग में कल्मष का नाश करने में सक्षम है| इस मन्त्र को छोड़ कर कलियुग में उद्धार का अन्य कोई भी उपाय चारों वेदों में कहीं भी नहीं है| पद्मपुराण में वर्णन आता है– द्वत्रिन्षदक्षरं मन्त्रं नाम षोडषकान्वितं| प्रजपन् वैष्णवो नित्यं राधाकृष्ण स्थलं लभेत्|| जो वैष्णव नित्य बत्तीस वर्ण वाले तथा सोलह नामों वाले महामंत्र का जप तथा कीर्तन करते हैं– उन्हें श्रीराधाकृष्ण के दिव्य धाम गोलोक की प्राप्ति होती है| नित्य भजिये:-- "हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ! हरे राम हरे राम ,राम राम हरे हरे !!

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Acharya Umesh Badola Jun 17, 2019

विवाह :- सातवाँ भाव विवाह, पत्नी या पति और वैवाहिक सुख को दर्शाता है। यदि सातवाँ भाव मंगल के प्रभाव में हो (दृष्टि या स्थिति द्वारा), तो यह मंगल दोष की स्थिति पैदा करता है। जब मंगल लग्न से पहले, दूसरे, चौथे, आठवें या बारहवें घर में हो, तो जातक मांगलिक कहलाता है। हालाँकि कुछ ज्योतिषी इस स्थिति को चन्द्रमा या चन्द्र-लग्न और शुक्र के आधार मानते हैं। न सिर्फ़ मंगल की नकारात्मक स्थिति सातवें भाव को ख़राब करती है, बल्कि कई दूसरी चीज़ें जैसे कि शनि, राहु-केतु और सूर्य आदि अन्य ग्रहों की स्थिति भी इसपर ख़ासा प्रभाव डालती हैं। सातवें भाव के स्वामी की स्थिति का भी शादीशुदा ज़िन्दगी पर बहुत असर होता है। अगर सातवें भाव का स्वामी दुःस्थान में है अर्थात ६, ८ या १२ में बैठा है, तो वैवाहिक जीवन पर इसका बुरा असर होता है। पुरुषों के लिए सातवें भाव का कारक शुक्र है और स्त्रियों के लिए गुरू। अगर किसी भाव का कारक ख़ुद उसी भाव में बैठा हो तो वह उस भाव के प्रभावों को नष्ट कर देता है। कुछ ऐसे सामान्य योग जो विवाह में विलम्ब करते हैं, निम्नांकित हैं - १. यदि शनि लग्न या चन्द्रमा से पहले, तीसरे, पाँचवें, सातवें, दसवें स्थान पर हो और वह किसी शुभ भाव में न हो। २. सातवें भाव में शनि आदि किसी अशुभ ग्रह या वहाँ मंगल का अपनी ही राशि में होना शादी में देरी की वजह बनते हैं। ३. अगर मंगल और शुक्र पाँचवें, सातवें या नौवें घर में साथ बैठे हों और उनपर गुरू की अशुभ दृष्टि हो। ४. यदि सातवें भाव के स्वामी और बृहस्पति को शनि देख रहा हो। ५. सातवें भाव के किसी भी ओर अशुभ ग्रहों का होना भी विवाह में देरी का कारण बनता है। ऐसे में सातवाँ घर पापकर्तरी योग के अन्तर्गत आ जाता है। ६. अगर लग्न, सूर्य और चन्द्रमा पर अशुभ दृष्टियाँ हों। ७. जब सातवें भाव का स्वामी सातवें भाव से छठे, दूसरे या बारहवें घर में स्थित हो, तो लड़की की शादी में विलम्ब होता है। यह विवाह में देरी का प्रबल योग है और अशुभ ग्रहों के सातवें भाव के स्वामी के साथ बैठने या स्वयं सातवें भाव में बैठने से और भी शक्तिशाली हो जाता है। ८. राहु और शुक्र लग्न में हों या सातवें भाव में हों अथवा मंगल और सूर्य अन्य नकारात्मक कारकों के साथ सातवें भाव में हों, तो विवाह में देरी तय है। ९. जब सूर्य, चन्द्र और पाँचवें भाव का स्वामी शनि के साथ युति कर रहे हों या उनपर शनि की दृष्टि हो। १०. यदि सातवें का स्वामी, लग्न और शुक्र मिथुन, सिंह, कन्या या धनु राशि में हो। ११. शुक्र और चन्द्रमा की युति पर मंगल और शनि की दृष्टि हो और सातवाँ भाव गुरू द्वारा न देखा जा रहा हो या पहले, सातवें और बारहवें भाव में अशुभ ग्रह स्थित हों। १२. शनि दूसरे, राहु नौवें, सातवें का स्वामी और अशुभ ग्रह तीसरे भाव में हों। विवाह में विलम्ब को दूर करने के उपाय क) वे लड़कियाँ जिनकी शादी में देरी हो रही हो, उन्हें ‘गौरी पूजा’ करनी चाहिए और माँ दुर्गा की प्रतिमा या चित्र के सामने ज़्यादा-से-ज़्यादा बार स्तोत्र-पाठ करना चाहिए। ख) अगर सातवें भाव पर नकारात्मक असर डालने वाले किसी ग्रह विशेष की दशा चल रही हो, तो उस ग्रह के अधिष्ठाता देवता की उपासना करनी चाहिए। ग) जिन कन्याओं का विवाह मांगलिक दोष के चलते टल रहा हो, उन्हें शीघ्र विवाह के लिए देवी की आराधना करनी चाहिए। घ) वे लड़के जिनकी शादी नहीं हो पा रही है, उन्हें माँ लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि वे शुक्र की अधिष्ठात्री देवी हैं और शुक्र विवाह का कारक है।

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Acharya Umesh Badola Jun 15, 2019

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