sarla rana Apr 10, 2021

#टटिया_स्थान_वृंदावन"*🙏🏻🌹 प्रसंग: ब्रज के संत🙏 एक दिन श्रीस्वामी ललितमोहिनी देव जी सन्त-सेवा के पश्चात प्रसाद पाकर विश्राम कर रहे थे, किन्तु उनका मन कुछ उद्विग्न सा था। वे बार-बार आश्रम के प्रवेश द्वार की तरफ देखते, वहाँ जाते और फिर लौट आते। वहाँ रह रहे सन्त ने पूंछा- "स्वामी जी ! किसको देख रहे हैं, आपको किसका इन्तजार है ?" स्वामी जी बोले- एक मुसलमान भक्त है, श्री युगल किशोर जी की मूर्तियाँ लाने वाला है उसका इन्तजार कर रहा हूँ। इतने मे वह मुसलमान भक्त सिर पर एक घड़ा लिए वहाँ आ पहुँचा और दो मूर्तियों को ले आने की बात कही। श्री स्वामी जी के पूछने पर उसने बताया, कि डींग के किले में भूमि कि खुदाई चल रही है, मैं वहाँ एक मजदूर के तौर पर खुदाई का काम कई दिन से कर रहा हूँ। कल खुदाई करते में मुझे यह घड़ा दीखा तो मैंने इसे मोहरों से भरा जान कर फिर दबा दिया ताकि साथ के मजदूर इसे ना देख ले। रात को फिर मै इस कलश को घर ले आया खुदा का लाख-लाख शुक्र अदा करते हुए कि, अब मेरी परिवार के साथ जिंदगी शौक मौज से बसर होगी घर आकर जब कलश में देखा तो इससे ये दो मूर्तियाँ निकली, एक फूटी कौड़ी भी साथ ना थी। स्वामी जी- इन्हें यहाँ लाने के लिए तुम्हे किसने कहा ? मजदूर- जब रात को मुझे स्वप्न में इन प्रतिमाओं ने आदेश दिया कि, हमें सवेरे वृंदावन में टटिया स्थान पर श्री स्वामी जी के पास पहुँचा दो, इसलिए मैं इन्हें लेकर आया हूँ। स्वामी जी ने मूर्तियों को निकाल लिया और उस मुसलमान भक्त को खाली घड़ा लौटते हुए कहा "भईया ! तुम बड़े भाग्यवान हो भगवान तुम्हारे सब कष्ट दूर करेगे।" वह मुसलमान मजदूर खाली घड़ा लेकर घर लौटा, रास्ते में सोच रहा था कि, इतना चमत्कारी महात्मा मुझे खाली हाथ लौटा देगा- मैंने तो स्वप्न में भी ऐसा नहीं सोचा था। आज की मजदूरी भी मारी गई। घर पहुँचा एक कौने में घड़ा धर दिया और उदास होकर एक टूटे मांझे पर आकर सो गया। पत्नी ने पूछा- हो आये वृंदावन ? क्या लाये फकीर से ? भर दिया घड़ा अशर्फिर्यो से ? क्या जवाव देता इस व्यंग का ? उसने आँखे बंद करके करवट बदल ली। पत्नी ने कोने में घड़ा रखा देखा तो लपकी उस तरफ देखती है कि, घड़ा तो अशर्फियों से लबालव भरा है, आनंद से नाचती हुई पति से आकर बोली मियाँ वाह ! इतनी दौलत होते हुए भी क्या आप थोड़े से मुरमुरे ना ला सके बच्चो के लिए ? अशर्फियों का नाम सुनते ही भक्त चौंककर खड़ा हुआ और घड़े को देखकर उसकी आँखों से अश्रु धारा बह निकली, बोला मै किसका शुक्रिया करूँ, खुदा का, या उस फकीर का जिसने मुझे इस कदर संपत्ति बख्शी। फिर इन अशर्फिर्यो के बोझे को सिर पर लाद कर लाने से भी मुझे मुक्त रखा। ऐसे हैं हमारे संतजन🙏🙏 🙏🏻जय श्री राधे कृष्णा🙏

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sarla rana Apr 9, 2021

. संक्षिप्त श्रीस्कन्द-महापुराण पोस्ट - 326 आवन्त्य-खण्ड रेवा-खण्ड अध्याय - 20 इस अध्याय में:- (पुराण लक्षण, कलिकाल का प्रभाव तथा राजर्षि वसुदान के यज्ञ में प्रकट हुई कपिला और नर्मदा के संगम का माहात्म्य) मार्कण्डेयजी कहते हैं- 'राजन्! सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित- ये पुराण के पाँच लक्षण हैं। कलियुग में मनुष्य प्राय: असमर्थ और अल्पजीवी होंगे। बुद्धि हीन तथा दुराचार परायण होंगे। स्वाध्याय, वरषट्कार, तप और यज्ञ आदि कोई भी सत्कर्म उनके द्वारा न होगा वे स्त्रियों की कामना रखने वाले और विषयलोलुप होंगे। ब्राह्मण सकाम भाव से ही कर्म करने वाले और याचक होंगे। सदा दान लेंगे और परिवार के भरण-पोषण में ही आसक्त रहेंगे। स्त्रियों के प्रति आसक्ति होने के कारण वे आत्मा को नहीं जानेंगे। धर्मिष्ठ और तपस्वी भी कुकर्म करेंगे। कलि काल आने पर अधिकांश लोग वाममार्गी और दिगम्बर हो जायँगे। सब प्रजा एक वर्ण की हो जायगी। राजा म्लेच्छ होगा हीनयुग आने पर जब भगवान् विष्णु का बौद्धावतार होगा, तब मनुष्य अल्पायु, अल्पवीर्य तथा अल्प पराक्रमी होंगे। नाना प्रकार के देशव्यापी उपद्रव होते रहेंगे। चाण्डालों के वंश में उत्पन्न ब्राह्मण वेदों को पढ़ावेंगे। दूसरों को वेद का उपदेश करेंगे और अपने वेद बेचेंगे। धन पाने के लोभ से राजाओं के दरबार में जायँगे। अग्निहोत्र और कन्याओं का विक्रय करेंगे। कलियुग के वेदपाठी ब्रह्मचर्यव्रत से रहित होंगे दस-बारह वर्षों की बालिका भी गर्भ धारण करेगी। स्त्री अपने पति का और पुत्र अपने माता-पिता का आदर नहीं करेंगे। बहू सास की और पुत्री माता की बात नहीं मानेगी। ये सब बातें यहाँ संक्षेप से बतायी गयी हैं। युधिष्ठिर ! एक दिव्य कथा श्रवण करो, जो सब पापों का नाश करने वाली है। पूर्वकाल में वसुदान नाम वाले एक चक्रवर्ती राजर्षि थे। उनकी राजधानी अयोध्या थी। उनके राज्य में कोई दीन, दु:खी अथवा दरिद्र नहीं होत था। प्रत्येक गाय स्वयं ही इच्छानुसार दुग्ध देने वाली और पृथ्वी हरी-भरी खेती से सुशोभित थी एक समय राजर्षि वसुदान वेद के पारंगत ब्राह्मण ऋत्विजों के साथ यज्ञ की सब सामग्री का संग्रह करके अमरेश्वरतीर्थ में गये। वहाँ उनका यज्ञ प्रारम्भ हुआ और निर्विघ्न समाप्त भी हो गया अवभृथ के जल से वहाँ की स्वर्ण निर्मित समूची पृथ्वी भीग गयी। उस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु और शिव का एक साथ ही पूजन किया गया और वहाँ होम से दूध और घी की पृथक्-पृथक् धाराएँ बह निकलीं गोमूत्र की भी एक धारा बहने लगी और वेदों के पारंगत विद्वान् ऋषि-मुनियों ने देवताओं को जो स्नान कराया था, उस जल की भी एक धारा बह चली। इन सब धाराओं के आपस में मिल जाने पर ब्रह्मर्षियों और देवताओं ने देखा, एक नदी बह रही है। वह नदी कपिला नाम से प्रसिद्ध हुई। कपिला और नर्मदा का जहाँ संगम है, वहाँ रुद्रावर्ततीर्थ बताया गया है। तदनन्तर दक्षिणाओं द्वारा सब ब्राह्मणों का भलीभाँति सत्कार किया गया। उन्हें नाना प्रकार के वस्त्राभूषणों से विभूषित करके हाथी, घोड़े और रथ पर बिठाया गया। देवताओं को भी ऐसा ही सत्कार प्राप्त हुआ। सब देवता सन्तुष्ट होकर राजर्षि वसुदान से बोले- महाभाग ! इस यज्ञ से हम बहुत प्रसन्न हैं, तुम कोई वर माँगो।' वसुदान बोले- 'देवताओ! नर्मदा और कपिला के संगम में स्नान करके जो मनुष्य महादेवजी की पूजा करते हैं, वे दिव्य विमानों द्वारा स्वर्गलोक में जायँ और जिनकी यहाँ मृत्यु हो, पुन: संसार में जन्म न लेकर मुक्त हो जायँ।' देवताओं ने कहा- राजन्! तुम्हारे सभी अभीष मनोरथ यथेष्ट सफल होंगे।' ऐसा कहकर सब देवता अपने-अपने विमान पर आरूढ़ हो प्रसन्नता पूर्वक स्वर्गलोक को चले गये। राजर्षि वसुदान भी वेदवेत्ता ब्राह्मणों के साथ परम आनन्दसे युक्त हो अयोध्यापुरी में लौट आये। उस तीर्थ के प्रभाव से अन्त:पुर एवं परिवार सहित उन्होंने प्रचुर भोगों का उपभोग किया और अन्त में वे भगवान् शिव के परम धाम में गये। युधिष्ठिर ! इस प्रकार नर्मदा और कपला के संगम का वृत्तान्त बताया गया। इसके श्रवण और कीर्तन से मनुष्य को संसार-बन्धन से छुटकारा मिल जाता है। ~~~०~~~ 'ॐ नमः शिवाय' ******************************************** "श्रीजी की चरण सेवा" की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज से जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें👇 https://www.facebook.com/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%9C%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%9A%E0%A4%B0%E0%A4%A3-%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%BE-724535391217853/

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sarla rana Apr 8, 2021

आज की तस्वीर में जो बुजुर्ग महिला बैठी हुई है। इनके दर्शन करना बड़े सौभाग्य की बात है। क्योंकि यह पिछले 46 सालों से राधा रमन जी के प्रांगण में ही बैठी रहती है। और कभी राधा रमन जी की गलियां और राधा रमन जी का मंदिर छोड़कर इधर उधर वृंदावन में कहीं नहीं गई। इन बुजुर्ग महिला की उमर 81 साल हो चुकी है। जब यह 35 बरस की थी । तब यह जगन्नाथ पुरी से चलकर अकेली वृंदावन के लिए आई थी। वृंदावन पहुंचकर इन्होंने किसी बृजवासी से वृंदावन का रास्ता पूछा ।उस ब्रजवासी ने इनको राधा रमन जी का मंदिर दिखा दिया। आज से 46 साल पहले कल्पना कीजिए वृंदावन कैसा होगा। यह अकेली जवान औरत सब कुछ छोड़ कर केवल भगवान के भरोसे वृंदावन आ गई। और किसी बृजवासी ने जब इनको राधा रमन जी का मंदिर दिखा कर यह कह दिया यही वृंदावन है। तब से लेकर आज तक इनको 46 बरस हो गए यह राधा रमन जी का मंदिर छोड़कर कहीं नहीं गई। यह मंदिर के प्रांगण में बैठकर 46 साल से भजन गाती है। मंगला आरती के दर्शन करती हैं। कभी-कभी गोपी गीत गाती हैं। जब इनको कोई भक्त यह कहता है। माताजी वृंदावन घुम आओ। तो यह कहती है। मैं कैसे जाऊं? लोग बोलते हैं। बस से या ऑटो से चली जाओ। तो यह कहती है जब मुझे किसी बृजवासी ने यह बोल दिया यही वृंदावन है। तो मेरे बिहारी जी तो मुझे यही मिलेंगे। मेरे लिए तो सारा वृंदावन इसी राधा रमन मंदिर में ही है। देखिए प्रेम और समर्पण की कैसी प्रकाष्ठा है। आज के दौर में संत हो या आम जन सब धन -दौलत, रिश्ते- नातों के पीछे भाग रहे है । तो आज भी संसार में ऐसे दुर्लभ भक्त हैं जो केवल और केवल भगवान के पीछे भागते हैं। यह देखने में बहुत निर्धन दिखते हैं। परंतु इनका परम धन इनके भगवान 🙏राधा रमन🙏 जी है। हम संसार के लोग थोड़ी सी भक्ति करते हैं। और अपने आप को भकत समझ बैठते हैं। और थोड़ी सी भी परेशानी आई या तो भगवान को कोसने लगते हैं। या उस भगवान को छोड़कर किसी अन्य देवी- देवता की पूजा करने लग जाते हैं। हमारे अंदर समर्पण तो है ही नहीं। आज संसार के अधिकतर लोग अपनी परेशानियों से परेशान होकर कभी एक बाबा से दूसरे बाबा पर दूसरे बाबा से तीसरे बाबा पर भाग रहे हैं। ओर तो ओर हमारा ना अपने गुरु पर विश्वास है। ना किसी एक देवता को अपना इषट मानते है। अधिकतर लोग भगवान को अगर प्यार भी करते हैं। तो किसी ना किसी भौतिक जरूरत के लिए करते हैं। परंतु इन दुर्लभ संत महिला को को देखिये।जो सब कुछ त्याग कर केवल भगवान के भरोसे 46 साल से राधा रमन जी के प्रांगण में बैठी है ।इन्होंने अपनी जिंदगी के 46 साल राधा रमन जी के नाम अर्पण कर दिए। जब Lock down🔒 लगा सबके लिए राधा रमन जी के और अन्य मंदिरों के दरवाजे बंद हो गए । परंतु अब प्यार निभाने की राधा रमन जी की बारी थी। राधा रमन जी ने कभी इन महिला के लिए दरवाजे बंद नहीं होने दिए। यह Lock down🔒 में भी राधा रमन जी के प्रांगण में आती ।और अपने डेली रूटीन की तरह 2-4 भजन गाकर वहीं आसपास गलियों में चली जाती। इन दुर्लभ दर्शन की फोटोस और कहानी मुझे राजस्थान से एक राधा रमन जी की परम भक्त महिला दीपिका जी ने भेजी है। एक तस्वीर जिसमें यह माताजी राधा रमन जी के प्रांगण में बैठी हुई। और मंगला आरती के दर्शन कर रही है। यह बिल्कुल 1 महीने पहले की तस्वीर है ।जो मुझे दीपिका जी ने भेजी है । दीपिका जी आपका बहुत-बहुत धन्यवाद ऐसे दुर्लभ दर्शन और ऐसी कथा प्रचारित करवाने के लिए। आप लोग भी इस कथा को ज्यादा से ज्यादा शेयर कीजिए। जिससे संसार में और भक्तों को भी प्यार और समर्पण की प्रेरणा मिले। और जब समर्पण और प्रेम का नाम आए तो मीरा जी की तरह इन माता जी का भी संसार में नाम प्रसिद्ध हो यही मेरी अभिलाषा है। ऐसे संतो के चरणों में मेरा कोटि-कोटि प्रणाम🙏🙏🌹 Զเधे कृष्ण जी 🙏🌹🌹🙏 https://www.facebook.com/groups/2018518644959428/?ref=share

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sarla rana Apr 6, 2021

. दिनांक 07.04.2021 दिन बुधवार तदनुसार संवत् २०७७ चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की ग्यारवीं तिथि को आने वाला व्रत :- "पापमोचनी एकादशी" पापमोचनी एकादशी चैत्र मास के कृ्ष्ण पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। पाप का अर्थ है अधर्म या बुरे कार्य और मोचनी का अर्थ है मुक्ति पाना। तो पापमोचनी एकादशी पापों को नष्ट करने वाली एकादशी है। यह व्रत व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्त कर उसके लिये मोक्ष के मार्ग दिखता है। इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु जी का पूजन करने से अतिशुभ फलों की प्राप्ति होती है। कथा भविष्य पुराण की कथा के अनुसार भगवान अर्जुन से कहते हैं, राजा मान्धाता ने एक समय में लोमश ऋषि से जब पूछा। हे प्रभु! यह बताएं कि मनुष्य जो जाने अनजाने में पाप कर्म करता है वह उससे कैसे मुक्त हो सकता है। राजा मान्धाता के इस प्रश्न के जवाब में लोमश ऋषि ने राजा को एक कहानी सुनाई कि चैत्ररथ नामक सुन्दर वन में च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी ऋषि तपस्या पूरे लीन थे। इस वन में एक दिन मंजुघोषा नाम की अप्सरा की नजर ऋषि पर पड़ी तो वह उनपर मोहित हो गयी और उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने हेतु प्रयत्न करने लगी। कामदेव भी उस समय उस वन से गुजर रहे थे। इसी क्रम में उनकी नजर अप्सरा पड़ी। वह उसकी मनोभावना को समझते हुए उसकी सहायता करने लगे। अप्सरा अपने प्रयत्न में सफल हुई और ऋषि वासना के प्रति आकर्षित हो गए। काम के वश में होकर ऋषि शिव की तपस्या का व्रत भूल गए और अप्सरा के साथ रमण-गमन करने लगे। कई वर्षों के बाद जब उनकी चेतना जगी तो उन्हें एहसास हुआ कि वह शिव की तपस्या से विरक्त हो चुके हैं। तब उन्हें उस अप्सरा पर बहुत क्रोध हुआ और तपस्या भंग करने का दोषी जानकर ऋषि ने अप्सरा को श्राप दे दिया कि तुम पिशाचिनी बन जाओ। श्राप से दु:खी होकर वह ऋषि के पैरों पर गिर पड़ी और श्राप से मुक्ति के लिए अनुनय-विनय करने लगी। मेधावी ऋषि ने तब उस अप्सरा को विधि-पूर्वक चैत्र कृष्ण एकादशी का व्रत करने के लिए कहा। भोग में निमग्न रहने के कारण ऋषि का तेज भी लोप हो गया था अत: ऋषि ने भी इस एकादशी का व्रत किया जिससे उनके पाप नष्ट हो गए। उधर अप्सरा भी इस व्रत के प्रभाव से पिशाच योनि से मुक्त हो गयी और उसे सुन्दर रूप प्राप्त हुआ। जिसके बाद वह अप्सरा स्वर्ग के लिए प्रस्थान कर गई। व्रत विधि 01. पापमोचनी एकादशी व्रत में भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप की पूजा की जाती है। 02. व्रत के दिन सूर्योदय काल में उठें, स्नान कर व्रत का संकल्प लें। 03. संकल्प लेने के बाद भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। 04. उनकी प्रतिमा के सामने बैठकर श्रीमद भागवत कथा का पाठ करें। 05. एकादशी व्रत की अवधि 24 घंटों की होती है। 06. एकाद्शी व्रत में दिन के समय में श्री विष्णु जी का स्मरण करना चाहिए। 07. दिन व्रत करने के बाद जागरण करने से कई गुणा फल प्राप्त होता है। 08. इसलिए रात्रि में श्री विष्णु का पाठ करते हुए जागरण करना चाहिए। 09. द्वादशी तिथि के दिन प्रात:काल में स्नान कर, भगवान श्री विष्णु कि पूजा करें। 10. किसी जरूरतमंद या ब्राह्मणों को भोजन व दक्षिणा देकर व्रत का समापन करें। 11. यह सब कार्य करने के बाद ही स्वयं भोजन करना चाहिए। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री हरि" ******************************************** "श्रीजी की चरण सेवा" की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज से जुड़े रहें👇 https://www.facebook.com/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%9C%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%9A%E0%A4%B0%E0%A4%A3-%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%BE-724535391217853/

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sarla rana Apr 4, 2021

शीतलाष्टमी (बसौडा) विशेष 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ व्रत महात्म्य एवं विधि 〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️ यह व्रत चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में अष्टमी या लोकाचार में होली के बाद पड़ने वाले पहले सोमवार अथवा गुरुवार को भी किया जाता है। शुक्रवार को भी इसके पूजन का विधान है, परंतु रविवार, शनिवार अथवा मंगलवार को शीतला का पूजन न करें। इन वारों में यदि अष्टमी तिथि पड़ जाए तो पूजन अवश्य कर लेना चाहिए। इस वर्ष 4 अप्रैल के दिन शीतलाष्टमी पड़ रही है। इस व्रत के प्रभाव से व्रती का परिवार ज्वर, दुर्गंधयुक्त फोड़े-फुंसियों, नेत्रों से संबंधित सभी विकार, शीतला माता की फूंसियों के चिह्न आदि रोगों तथा शीतला जनित दोषों से मुक्त हो जाता है। इस व्रत के करने से शीतला देवी प्रसन्न होकर अपने भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करती हैं। हर गांव, नगर तथा शहर में शीतला जी का मठ होता है। मठ में शीतला का स्वरूप भी अलग-अलग तरह का देखा जाता है। शीतलाष्टकम् में शीतला माता को रासभ (गर्दभ-गधा) के ऊपर सवार दर्शनीय रूप में वर्णित किया गया है। अतः व्रत के दिन शीतलाष्टक का पाठ करें। व्रत की विधि: शीतलाष्टमी व्रत करने वाले व्रती को पूर्व विद्धा अष्टमी तिथि ग्रहण करनी चाहिए। इस दिन सूर्योदय वेला में ठंडे पानी से स्नान कर निम्नलिखित संकल्प करना चाहिए: मम गेहे शीतला रोग जनितोपद्रव प्रशमन पूर्वकायुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्धये शीतलाष्टमीव्रतमहं करिष्ये। इस दिन शीतला माता को भोग लगाने वाले पदार्थ मेवे, मिठाई, पूआ, पूरी, साग, दाल, मीठा भात, फीका भात, मौंठ, मीठा बाजरा, बाजरे की मीठी रोटी, दाल की भरवा पूड़ियां, रस, खीर आदि एक दिन पूर्व ही सायंकाल में बना लिए जाते हैं। रात्रि में ही दही जमा दिया जाता है। इसीलिए इसे बसौड़ा के नाम से भी जाना जाता है। जिस दिन व्रत होता है उस दिन गर्म पदार्थ नहीं खाये जाते। इसी कारण घर में चूल्हा भी नहीं जलता। इस व्रत में पांचों उंगली हथेली सहित घी में डुबोकर रसोईघर की दीवार पर छापा लगाया जाता है। उस पर रोली और अक्षत चढ़ाकर शीतलामाता के गीत गाए जाते हैं। सुगंधित गंध, पुष्पादि और अन्य उपचारों से शीतला माता का पूजन कर शीतलाष्टकम् का पाठ करना चाहिए। शीतला माता की कहानी सुननी चाहिए। रात्रि में दीपक जलाने चाहिए एवं जागरण करना चाहिए। बसौड़ा के दिन प्रातः एक थाली में पूर्व संध्या में तैयार नैवेद्य में से थोड़ा-थोड़ा सामान रखकर, हल्दी, धूपबत्ती, जल का पात्र, दही, चीनी, गुड़ और अन्य पूजनादि सामान सजाकर परिवार के सभी सदस्यों के हाथ से स्पर्श कराके शीतला माता के मंदिर जाकर पूजन करना चाहिए। छोटे-छोटे बालकों को साथ ले जाकर उनसे माता जी को ढोक भी दिलानी चाहिए। होली के दिन बनाई गई गूलरी (बड़कुल्ला) की माला भी शीतला मां को अर्पित करने का विधान है। चैराहे पर जल चढ़ाकर पूजा करने की परंपरा भी है। शीतला मां के पूजनोपरांत गर्दभ का भी पूजन कर मंदिर के बाहर काले श्वान (कुत्ते) के पूजन एवं गर्दभ (गधा) को चने की दाल खिलाने की परंपरा भी है। घर आकर सभी को प्रसाद एवं मोठ-बाजरा का वायना निकालकर उस पर रुपया रखकर अपनी सासूजी के चरण स्पर्श कर देने की प्रथा का भी अवश्य पालन करना चाहिए। इसके बाद किसी वृद्धा मां को भोजन कराकर और वस्त्र दक्षिणादि देकर विदा करना चाहिए। यदि घर-परिवार में शीतला माता के कुण्डारे भरने की प्रथा हो तो कुंभकार के यहां से एक बड़ा कुण्डारा तथा दस छोटे कुण्डारे मंगाकर छोटे कुण्डारों को बासी व्यंजनों से भरकर बड़े कुण्डारे में रख जलती हुई होली को दिखाए गए कच्चे सूत से लपेट कर भीगे बाजरे एवं हल्दी से पूजन करें। इसके बाद परिवार के सभी सदस्य ढोक (नमस्कार) दें। पुनः सभी कुण्डारों को गीत गाते हुए शीतला माता के मंदिर में जाकर चढ़ा दें। वापसी के समय भी गीत गाते हुए आयें। पुत्र जन्म और विवाह के समय जितने कुण्डारे हमेशा भरे जाते हैं उतने और भरकर शीतला मां को चढ़ाने का विधान भी है। पूजन के लिए जाते समय नंगे पैर जाने की परंपरा है। शीतला माता की कथा 〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️ किसी गांव में एक बुढ़िया माई रहती थी। शीतला माता का जब बसौड़ा आता तो वह ठंडे भोजन से उनका कुण्डे भरकर पूजन करती थी और स्वयं ठंडा भोजन ही करती थी। उसके गांव में और कोई भी शीतला माता की पूजा नहीं करता था। एक दिन उस गांव में आग लग गयी, जिसमें उस बुढ़िया मां की झोपड़ी को छोड़कर सभी लोगों की झोपड़ियां जल गईं, जिससे सबको बड़ा दुःख और बुढ़िया की झोपड़ी को देखकर बड़ा ही आश्चर्य हुआ। तब सब लोग उस बुढ़िया के पास आए और इसका कारण पूछा। बुढ़िया ने कहा कि मैं तो बसौडे़ के दिन शीतला माता की पूजा करके ठंडी रोटी खाती हूं, तुम लोग यह काम नहीं करते। इसी कारण मेरी झोपड़ी शीतला मां की कृपा से बच गई और तुम सबकी झोपड़ियां जल गईंं। तभी से शीतलाष्टमी (बसौड़े) के दिन पूरे गांव में शीतला माता की पूजा होने लगी तथा सभी लोग एक दिन पहले के बने हुए बासी पदार्थ (व्यंजन) ही खाने लगे। हे शीतला माता! जैसे आपने उस बुढ़िया की रक्षा की, वैसे ही सबकी रक्षा करना। प्रचलित गीत:👉 मेरी माता को चिनिये चैबारौ, दूध पूत देनी को चिनिये चैबारो। कौन ने मैया ईंट थपायीं, और कौन ने घोरौ है गारौ।। श्रीकृष्ण ने मैया ईंट थपायीं, दाऊजी घोरौ है गारौ। मेरी माता को चिनिये चैबारौ, दूध पूत देनी को चिनिये चैबारौ। कोरी-कोरी कुलिया मसानी दरबार, पूजन री श्री कृष्ण की सौं। कोरी कोरी कुलिया मसानी दरबार।। गीत गाते समय क्रमशः श्रीकृष्ण और श्री दाऊजी की जगह अपने परिवार के सदस्यों के नाम भी बार-बार गावें। बासी भोजन से ही शीतला माता की पूजा वैशाख माह के कृष्ण पक्ष के किसी भी सोमवार या किसी दूसरे शुभवार को भी करने का विधान है। वैशाख मास में इसे बूढ़ा बसौड़ा के नाम से तथा चैत्र कृष्ण पक्ष में बसौड़ा के नाम से जाना जाता है। ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष के दो सोमवारों और सर्दियों के किसी भी माह के दो सोमवारों को भी शीतला माता का पूजन स्त्रियों के द्वारा किया जाता है, परंतु चैत्र कृष्ण पक्ष का बसौड़ा सर्वत्र मनाया जाता है। शीतला माता की अन्य कथा 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ यह कथा बहुत पुरानी है। एक बार शीतला माता ने सोचा कि चलो आज देखु कि धरती पर मेरी पूजा कौन करता है, कौन मुझे मानता है। यही सोचकर शीतला माता धरती पर राजस्थान के डुंगरी गाँव में आई और देखा कि इस गाँव में मेरा मंदिर भी नही है, ना मेरी पुजा है। माता शीतला गाँव कि गलियो में घूम रही थी, तभी एक मकान के ऊपर से किसी ने चावल का उबला पानी (मांड) निचे फेका। वह उबलता पानी शीतला माता के ऊपर गिरा जिससे शीतला माता के शरीर में (छाले) फफोले पड गये। शीतला माता के पुरे शरीर में जलन होने लगी। शीतला माता गाँव में इधर उधर भाग भाग के चिल्लाने लगी अरे में जल गई, मेरा शरीर तप रहा है, जल रहा हे। कोई मेरी मदद करो। लेकिन उस गाँव में किसी ने शीतला माता कि मदद नही करी। वही अपने घर के बहार एक कुम्हारन (महिला) बेठी थी। उस कुम्हारन ने देखा कि अरे यह बूढी माई तो बहुत जल गई है। इसके पुरे शरीर में तपन है। इसके पुरे शरीर में (छाले) फफोले पड़ गये है। यह तपन सहन नही कर पा रही है। तब उस कुम्हारन ने कहा है माँ तू यहाँ आकार बैठ जा, मैं तेरे शरीर के ऊपर ठंडा पानी डालती हूँ। कुम्हारन ने उस बूढी माई पर खुब ठंडा पानी डाला और बोली है माँ मेरे घर में रात कि बनी हुई राबड़ी रखी है थोड़ा दही भी है। तू दही-राबड़ी खा लें। जब बूढी माई ने ठंडी (जुवार) के आटे कि राबड़ी और दही खाया तो उसके शरीर को ठंडक मिली। तब उस कुम्हारन ने कहा आ माँ बेठ जा तेरे सिर के बाल बिखरे हे ला में तेरी चोटी गुथ देती हु और कुम्हारन माई कि चोटी गूथने हेतु (कंगी) कागसी बालो में करती रही। अचानक कुम्हारन कि नजर उस बुडी माई के सिर के पिछे पड़ी तो कुम्हारन ने देखा कि एक आँख वालो के अंदर छुपी हैं। यह देखकर वह कुम्हारन डर के मारे घबराकर भागने लगी तभी उसबूढी माई ने कहा रुक जा बेटी तु डर मत। मैं कोई भुत प्रेत नही हूँ। मैं शीतला देवी हूँ। मैं तो इस घरती पर देखने आई थी कि मुझे कौन मानता है। कौन मेरी पुजा करता है। इतना कह माता चारभुजा वाली हीरे जवाहरात के आभूषण पहने सिर पर स्वर्णमुकुट धारण किये अपने असली रुप में प्रगट हो गई। माता के दर्शन कर कुम्हारन सोचने लगी कि अब में गरीब इस माता को कहा बिठाऊ। तब माता बोली है बेटी तु किस सोच मे पड गई। तब उस कुम्हारन ने हाथ जोड़कर आँखो में आसु बहते हुए कहा- है माँ मेरे घर में तो चारो तरफ दरिद्रता है बिखरी हुई हे में आपको कहा बिठाऊ। मेरे घर में ना तो चौकी है, ना बैठने का आसन। तब शीतला माता प्रसन्न होकर उस कुम्हारन के घर पर खड़े हुए गधे पर बैठ कर एक हाथ में झाड़ू दूसरे हाथ में डलिया लेकर उस कुम्हारन के घर कि दरिद्रता को झाड़कर डलिया में भरकर फेक दिया और उस कुम्हारन से कहा है बेटी में तेरी सच्ची भक्ति से प्रसन्न हु अब तुझे जो भी चाहिये मुझसे वरदान मांग ले। तब कुम्हारन ने हाथ जोड़ कर कहा है माता मेरी इच्छा है अब आप इसी (डुंगरी) गाँव मे स्थापित होकर यही रहो और जिस प्रकार आपने मेरे घर कि दरिद्रता को अपनी झाड़ू से साफ़ कर दूर किया ऐसे ही आपको जो भी होली के बाद कि सप्तमी को भक्ति भाव से पुजा कर अष्टमी के दिन आपको ठंडा जल, दही व बासी ठंडा भोजन चढ़ाये उसके घर कि दरिद्रता को साफ़ करना और आपकी पुजा करने वाली नारि जाति (महिला) का अखंड सुहाग रखना। उसकी गोद हमेशा भरी रखना। साथ ही जो पुरुष शीतला अष्टमी को नाई के यहा बाल ना कटवाये धोबी को पकड़े धुलने ना दे और पुरुष भी आप पर ठंडा जल चढ़ाकर, नरियल फूल चढ़ाकर परिवार सहित ठंडा बासी भोजन करे उसके काम धंधे व्यापार में कभी दरिद्रता ना आये। तब माता बोली तथाअस्तु है बेटी जो तुने वरदान मांगे में सब तुझे देती हु । है बेटी तुझे आर्शिवाद देती हूँ कि मेरी पुजा का मुख्य अधिकार इस धरती पर सिर्फ कुम्हार जाति का ही होगा। तभी उसी दिन से डुंगरी गाँव में शीतला माता स्थापित हो गई और उस गाँव का नाम हो गया शील कि डुंगरी। शील कि डुंगरी भारत का एक मात्र मुख्य मंदिर है। शीतला सप्तमी के दिन यहाँ बहुत विशाल मेला भरता है। || दोहा || जय जय माता शीतला तुमही धरे जो ध्यान। होय बिमल शीतल हृदय विकसे बुद्धी बल ज्ञान ॥ घट घट वासी शीतला शीतल प्रभा तुम्हार। शीतल छैंय्या शीतल मैंय्या पल ना दार ॥ माता शीतला स्तुतिमन्त्र 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत् पिता । शीतले त्वं जगद्धात्री शीतलायै नमो नमः ।। श्री शीतला चालीसा 〰️〰️🌼🌼〰️〰️ || चौपाई || जय जय श्री शीतला भवानी । जय जग जननि सकल गुणधानी ॥ गृह गृह शक्ति तुम्हारी राजती । पूरन शरन चंद्रसा साजती ॥ विस्फोटक सी जलत शरीरा । शीतल करत हरत सब पीड़ा ॥ मात शीतला तव शुभनामा । सबके काहे आवही कामा ॥ शोक हरी शंकरी भवानी । बाल प्राण रक्षी सुखदानी ॥ सूचि बार्जनी कलश कर राजै । मस्तक तेज सूर्य सम साजै ॥ चौसट योगिन संग दे दावै । पीड़ा ताल मृदंग बजावै ॥ नंदिनाथ भय रो चिकरावै । सहस शेष शिर पार ना पावै ॥ धन्य धन्य भात्री महारानी । सुर नर मुनी सब सुयश बधानी ॥ ज्वाला रूप महाबल कारी । दैत्य एक विश्फोटक भारी ॥ हर हर प्रविशत कोई दान क्षत । रोग रूप धरी बालक भक्षक ॥ हाहाकार मचो जग भारी । सत्यो ना जब कोई संकट कारी ॥ तब मैंय्या धरि अद्भुत रूपा । कर गई रिपुसही आंधीनी सूपा ॥ विस्फोटक हि पकड़ी करी लीन्हो । मुसल प्रमाण बहु बिधि कीन्हो ॥ बहु प्रकार बल बीनती कीन्हा । मैय्या नहीं फल कछु मैं कीन्हा ॥ अब नही मातु काहू गृह जै हो । जह अपवित्र वही घर रहि हो ॥ पूजन पाठ मातु जब करी है । भय आनंद सकल दुःख हरी है ॥ अब भगतन शीतल भय जै हे । विस्फोटक भय घोर न सै हे ॥ श्री शीतल ही बचे कल्याना । बचन सत्य भाषे भगवाना ॥ कलश शीतलाका करवावै । वृजसे विधीवत पाठ करावै ॥ विस्फोटक भय गृह गृह भाई । भजे तेरी सह यही उपाई ॥ तुमही शीतला जगकी माता । तुमही पिता जग के सुखदाता ॥ तुमही जगका अतिसुख सेवी । नमो नमामी शीतले देवी ॥ नमो सूर्य करवी दुख हरणी । नमो नमो जग तारिणी धरणी ॥ नमो नमो ग्रहोंके बंदिनी । दुख दारिद्रा निस निखंदिनी ॥ श्री शीतला शेखला बहला । गुणकी गुणकी मातृ मंगला ॥ मात शीतला तुम धनुधारी । शोभित पंचनाम असवारी ॥ राघव खर बैसाख सुनंदन । कर भग दुरवा कंत निकंदन ॥ सुनी रत संग शीतला माई । चाही सकल सुख दूर धुराई ॥ कलका गन गंगा किछु होई । जाकर मंत्र ना औषधी कोई ॥ हेत मातजी का आराधन । और नही है कोई साधन ॥ निश्चय मातु शरण जो आवै । निर्भय ईप्सित सो फल पावै ॥ कोढी निर्मल काया धारे । अंधा कृत नित दृष्टी विहारे ॥ बंधा नारी पुत्रको पावे । जन्म दरिद्र धनी हो जावे ॥ सुंदरदास नाम गुण गावत । लक्ष्य मूलको छंद बनावत ॥ या दे कोई करे यदी शंका । जग दे मैंय्या काही डंका ॥ कहत राम सुंदर प्रभुदासा । तट प्रयागसे पूरब पासा ॥ ग्राम तिवारी पूर मम बासा । प्रगरा ग्राम निकट दुर वासा ॥ अब विलंब भय मोही पुकारत । मातृ कृपाकी बाट निहारत ॥ बड़ा द्वार सब आस लगाई । अब सुधि लेत शीतला माई ॥ यह चालीसा शीतला पाठ करे जो कोय । सपनेउ दुःख व्यापे नही नित सब मंगल होय ॥ बुझे सहस्र विक्रमी शुक्ल भाल भल किंतू । जग जननी का ये चरित रचित भक्ति रस बिंतू ॥ ॥ इति श्री शीतला चालीसा समाप्त॥ ।। श्री शीतलाष्टक स्तोत्र ।। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ श्रीगणेशाय नमः ।। ऊँ अस्य श्रीशीतला स्तोत्रस्य महादेव ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः शीतली देवता लक्ष्मी बीजम् भवानी शक्तिः सर्वविस्फोटक निवृत्तये जपे विनियोगः ।। ।। ईश्वर उवाच।। वन्दे अहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम् ।। मार्जनी कलशोपेतां शूर्पालं कृत मस्तकाम्।१। वन्देअहं शीतलां देवीं सर्व रोग भयापहाम्।। यामासाद्य निवर्तेत विस्फोटक भयं महत् ।२। शीतले शीतले चेति यो ब्रूयाद्दारपीड़ितः।। विस्फोटकभयं घोरं क्षिप्रं तस्य प्रणश्यति।३। यस्त्वामुदक मध्ये तु धृत्वा पूजयते नरः ।।विस्फोटकभयं घोरं गृहे तस्य न जायते ।४। शीतले ज्वर दग्धस्य पूतिगन्धयुतस्य च ।। प्रनष्टचक्षुषः पुसस्त्वामाहुर्जीवनौषधम् ।५। शीतले तनुजां रोगानृणां हरसि दुस्त्यजान् ।। विस्फोटक विदीर्णानां त्वमेका अमृत वर्षिणी।६। गलगंडग्रहा रोगा ये चान्ये दारुणा नृणाम् ।। त्वदनु ध्यान मात्रेण शीतले यान्ति संक्षयम् ।७। न मन्त्रा नौषधं तस्य पापरोगस्य विद्यते ।। त्वामेकां शीतले धात्रीं नान्यां पश्यामि देवताम्।८। मृणालतन्तु सद्दशीं नाभिहृन्मध्य संस्थिताम् ।। यस्त्वां संचिन्तये द्देवि तस्य मृत्युर्न जायते ।९। अष्टकं शीतला देव्या यो नरः प्रपठेत्सदा ।। विस्फोटकभयं घोरं गृहे तस्य न जायते ।१०। श्रोतव्यं पठितव्यं च श्रद्धा भक्ति समन्वितैः ।। उपसर्ग विनाशाय परं स्वस्त्ययनं महत्।११। शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत्पिता।। शीतले त्वं जगद्धात्री शीतलायै नमो नमः।१२। रासभो गर्दभश्चैव खरो वैशाख नन्दनः ।। शीतला वाहनश्चैव दूर्वाकन्दनिकृन्तनः ।१३। एतानि खर नामानि शीतलाग्रे तु यः पठेत् ।। तस्य गेहे शिशूनां च शीतला रूङ् न जायते।१४। शीतला अष्टकमेवेदं न देयं यस्य कस्यचित् ।। दातव्यं च सदा तस्मै श्रद्धा भक्ति युताय वै।१५। ।।श्रीस्कन्दपुराणे शीतलाअष्टक स्तोत्रं ।। माता शीतला जी की आरती 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता आदि ज्योति महारानी सब फल की दाता | जय रतन सिंहासन शोभित, श्वेत छत्र भ्राता, ऋद्धिसिद्धि चंवर डोलावें, जगमग छवि छाता | जय विष्णु सेवत ठाढ़े, सेवें शिव धाता, वेद पुराण बरणत पार नहीं पाता | जय इन्द्र मृदंग बजावत चन्द्र वीणा हाथा, सूरज ताल बजाते नारद मुनि गाता | जय घंटा शंख शहनाई बाजै मन भाता, करै भक्त जन आरति लखि लखि हरहाता | जय ब्रह्म रूप वरदानी तुही तीन काल ज्ञाता, भक्तन को सुख देनौ मातु पिता भ्राता | जय जो भी ध्यान लगावैं प्रेम भक्ति लाता, सकल मनोरथ पावे भवनिधि तर जाता | जय रोगन से जो पीड़ित कोई शरण तेरी आता, कोढ़ी पावे निर्मल काया अन्ध नेत्र पाता | जय बांझ पुत्र को पावे दारिद कट जाता, ताको भजै जो नाहीं सिर धुनि पछिताता | जय शीतल करती जननी तुही है जग त्राता, उत्पत्ति व्याधि विनाशत तू सब की घाता | जय दास विचित्र कर जोड़े सुन मेरी माता, भक्ति आपनी दीजै और न कुछ भाता | जय 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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