Swami Lokeshanand Jun 13, 2019

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Swami Lokeshanand Jun 12, 2019

श्रीमद्भगवद्गीता में जिसे गोरक्षा कहा गया है, उसी को यहाँ नवधा भक्ति के छठे सोपान में कहा है। गो माने इन्द्रियाँ। गोरक्षा माने इन्द्रियों की रक्षा, माने दम-शील। विषय की हवा चली, इन्द्रियों की खिड़कियाँ खुली थीं, बस अन्त:करण में कामना आई, अब दुख तो पीछे चला ही आएगा। लक्ष्य से मन भटकाकर, बंधन प्रगाढ़ करेगा। सावधान साधक अनावश्यक खिड़कियाँ खोलता ही नहीं, जब देखना हो तभी देखता है, जो देखना है वही देखता है, ऐसे ही सब खिड़कियाें का उपयोग विचारपूर्वक करता है। जब जरूरत नहीं तो खोलकर करना भी क्या? तरीका भी बताया है, "विरत बहु कर्मा" बेकार के कामों में मत उलझो। कि चलो बाजार घूम आएँ, कुछ लेना नहीं, देना नहीं, यूंही। कि आपको अमुक समिति का अध्यक्ष बना दें। क्यों भाई? हम यहाँ परमात्मा पाने आए हैं, या दो कौड़ी का पद पाने? संसार की वस्तुओं और व्यक्तियों को "ना" कहना सीखो। जिस गाँव जाना नहीं, उसका रास्ता क्या देखना? जितना बेहद जरूरी है, उतना ही व्यवहार करो, बढ़िया से करो, पर व्यवहार में ही मत लगे रहो, समय बचाओ। भक्तों के चरित्र पढ़ो, और वही वही करो जो उन्होंने किया, उन्हीं के मार्ग का अनुसरण करो, जो नहीं ही करना, वो क्यों करना? "छठ दम शील विरत बहु कर्मा। निरत निरंतर सज्जन धर्मा॥" अब विडियो- https://youtu.be/7UyRJsG1IE8

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Swami Lokeshanand Jun 12, 2019

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Swami Lokeshanand Jun 11, 2019

"मंत्र जाप मम दृढ़ विश्वासा। पंचम भजन सो वेद प्रकासा॥" पाँचवाँ सोपान नवधा भक्ति का। बीच में आ गए, चार पार हो गए, चार आएँगे, यह निर्णायक क्षण है। आज का दिन धन्य है, यह समय धन्य है, आप धन्य हैं, मैं धन्य हूँ, समस्त प्रकृति धन्य है। संत के संग से, कथा में रति से, गुरूसेवा से और भगवान के गुणानुवाद से, क्या इतनी श्रद्धा नहीं बुद्धि में बैठ गई कि सीधे सीधे आदेश का पालन किया जा सके? क्या अभी भी शंका शेष है? क्या अभी और धक्का देना रह गया? क्या बुद्धि ने निश्चय नहीं किया कि बस अब रुकना नहीं? अगर उपदेश में संशय बना है तो फिर कभी अवसर आएगा, आज तो उनका दिन है जिनकी बुद्धि का समर्पण हो गया। अपनी लाखों जन्मों की यात्रा में, कितने शास्त्र पढ़े, कितने महापुरुषों के दर्शन किए, कितने उपदेश सुने, अगर आज भी निर्णय नहीं हुआ तो कब? बस निश्चय करो कि माया मुझे अब और नहीं नचा पाएगी, अब तो पार जाना ही है। देखो संतों के चित्रों से बाजार अटा पड़ा है, ध्यान दो कि किसी के गले में माला, किसी के हाथ में माला, क्यों? क्या यह कोई लोकाचार है? क्या माला के बिना चित्र की शोभा नहीं बनती? नहीं! यह तो मार्ग का परिचय है, कि हम इससे चल कर पहुँच गए, तुम भी इसीके सहारे पहुँच जाओगे। वह माला निमंत्रण है, इस निमंत्रण को स्वीकार करो। अपनी क्षमता पर संदेह हो तो हो, शास्त्र पर तो संदेह मत करो, संत पर, भगवान की कृपा पर तो संदेह मत करो। छोड़ो संशय, पकड़ो माला, मनका मनका रगड़ डालो, देह कल की छूटती आज छूट जाए, और सम्पत्ति मिले ना मिले, चाहे पास की भी चली जाए, नामजप रूपी महान साधन न छूटने पाए। बस मंजिल आने को ही है॥ मंत्र और नाम में अंतर जानने के लिए विडियो- https://youtu.be/TADcieWQoVU

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