Swami Lokeshanand Aug 31, 2019

एक बड़े अनुभव की बात है, ऐसी की जिस साधक के अंतःकरण में उतर जाए, उसका आधा मार्ग अभी तय करा दे। उसे अभी चिंताओं से मुक्ति मिल जाए। विधाता माथे पर जो लेख लिख देता है, माने एकबार जैसा प्रारब्ध बन बैठता है, उसे बड़े बड़े बुद्धिमान पंडित भी अपनी बुद्धि से मेट नहीं सकते। निर्विवाद सत्य है कि जो नहीं होना होता, वह नहीं होता। जो होना है, वह होकर ही रहता है। होना हो तो कल्पनातीत पदार्थ की भी प्राप्ति हो जाती है। न होना हो तो हाथ का पदार्थ भी नष्ट हो जाता है। जिससे, जब, जैसा, जो, जितना, जहाँ शुभ अशुभ कर्म हुआ रहता है, उससे, तब, तैसा, सो, उतना, वहाँ ही काल की प्रेरणा से फल प्राप्त होता है। दैव भी इसका उल्लंघन नहीं कर सकता। देखो, छाया और धूप की तरह, कर्म और कर्ता साथ रहते हैं। कर्म सोते के साथ सोता, चलतों के साथ चलता, सदा कर्ता के साथ ही रहता है। जैसे लाखों गायों के झुण्ड में भी, बछड़े अपनी अपनी माँ को ढूंढ ही लेते हैं, कर्ता लाख दरवाजे के पीछे छिपा हो, कर्म जब फल देने के लिए खड़ा होता है, उसे खोज ही लेता है। तब सुख से सटना और दुख से हटना, दोनों ही प्रयास निष्फल रहते हैं। सुख चाहने वाला और दुख से भागने वाला, दोनों ही दुख को ही प्राप्त होते हैं। सुख की आशा से जो धनादि में आसक्त रहते हैं, वे मूर्ख मानो गर्मी से तप्त होकर, ठंडक पाने के लिए, अग्नि का सेवन करते हैं। जबकि गजब रहस्य यह है कि सुख चाहा ही न जाए तो दुख होता नहीं, और दुख को स्वीकार कर लिया जाए, तो वह दुख दुख रहता नहीं। इसी कारण न मैं सोच करता, न ही मुझे विस्मय या भय ही होता। "यद्धात्रा निज भालपट्ट लिखितम्, स्तोकं वा महत् धनम्। कूपे पश्ये पयो निधोआ, घटम् ग्रहणात् तुल्यम् जलम्॥" अब विडियो देखें- ममता ही दुख है https://youtu.be/Q3UZ4eT2rfs

+5 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 8 शेयर
Swami Lokeshanand Aug 31, 2019

+3 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर
Swami Lokeshanand Aug 31, 2019

+8 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर
Swami Lokeshanand Aug 31, 2019

बहुत ध्यान से यह पहली पंक्ति पढ़ें- कोई गड़ा खजाना पाने के लिए जैसे भूमि खोदने के सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं है, परमतत्व की प्राप्ति के लिए आत्मचिंतन के अलावा कोई मार्ग है ही नहीं। विचार करें, आप थे अजन्मा, अविनाशी, शाश्वत, एक, अखण्ड, अद्वै, आनन्द स्वरूप, आत्मा। यह देह है जन्मने मरने वाली, विनाशशील, दुखरूप। पर जब से आपने अपने को देह मान लिया, देह के जन्मने मरने को अपना जन्मना मरना मान लिया, देह के सुख दुःख मान अपमान हानि लाभ को अपना सुख दुःख मान अपमान हानि लाभ मान लिया, देह के संबंधियों को अपना संबंधी मान लिया, आपकी दुख की यात्रा प्रारम्भ हो गई। आप मुक्त होकर भी, अपने को बंधनग्रस्त मानकर, बंधनग्रस्त ही हो गए। जो आप थे, वह विस्मृत हो गया, तब ही तो जो आप नहीं थे, वह अपने को मानने लगे। तो अब जो आप हो ही, वही कैसे हुआ जाए? बस स्मृति हो आए। भूल लगी थी, भूल न रहे, तो आपको अपनी मुक्ति के लिए और कौन सा प्रयास करना शेष रह जाएगा? जैसे दस जगह दस दस फुट भूमि खोदने से भूमिगत जल की प्राप्ति नहीं होती, आँगन और मिट्टी की पहाड़ियों से भर जाता है। दुख यह कि जल तो मिला नहीं, चलना फिरना भी दूभर हो गया, धन, पुरुषार्थ और समय जो नष्ट हुआ सो अलग। ऐसे ही दस मार्गों पर दस दस कदम चलने से परमतत्व की प्राप्ति नहीं ही होती। जैसे एक ही जगह खोदते चले जाने वाले को आज नहीं तो कल, जल की प्राप्ति होती देखी ही जाती है, प्रयासपूर्वक आत्मचिंतन करने वाला, परमतत्व पा ही जाता है। इसीलिए अभी से अपनी बुद्धि रूपी कुदाल के सहारे से, देह रूपी पत्थर को हटा कर, मन रूपी भूमि को बार बार खोद कर, उस आनन्दस्वरूप चैतन्य को जो तुम्हारा अपना आपा है, जो तुम हो, पा लो। अब विडियो देखें- आत्मविस्मृति ही मृत्यु है- https://youtu.be/vNjscOb18H4

+7 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 10 शेयर