Swami Lokeshanand May 19, 2019

माया के बाद वैराग्य का वर्णन। माया समझ ली, तो राग कैसा? फिर तो स्वाभाविक वैराग्य है। जब जगत ही मिथ्या है, तब सब मैं और मेरा मिथ्या है, तो कौन, कैसे, क्यों और किसकी कामना करे? मालूम पड़ गया कि रेत ही रेत है, जल है ही नहीं, तब क्यों दौड़ में पड़ें? जान लिया कि सीप है, चाँदी है ही नहीं, तो क्यों माथा पटकना? समस्त दृश्य जगत जिसे स्वप्नवत् हो गया, वह क्योंकर झूठी वस्तु, झूठे सुख के लिए मारा मारा फिरे? अब वैराग्य, त्याग व राग का भेद- जो छोड़ा जाए वो त्याग है, जो छूट जाए वो वैराग्य। केवल तन से छूटा तो त्याग है, मन से छूटा तो वैराग्य। वस्तु में सार मालूम पड़े पर भोग न करें तो त्याग है, वस्तु असार-व्यर्थ मालूम पड़े तो वैराग्य। रागी और वैरागी में दशा का अंतर है, रागी और त्यागी में दिशा का। रागी विचार करता है मैंने इतना जोड़ा, त्यागी विचार करता है मैंने इतना छोड़ा। वस्तु का मूल्य दोनों के मन में है। एक मुंह करके खड़ा है, दूसरा पीठ करके, हैं एक ही सिक्के के दो पहलू। एक वस्तु से सटना चाहता है, दूसरा हटना, एक उसकी ओर दौड़ रहा है, दूसरा उससे दूर दौड़ रहा है, दौड़ दोनों की जारी है। एक कहता है छोड़ेंगे नहीं, दूसरा कहता है छूएँगे नहीं। वैराग्य तो भाव दशा है । रामजी कहते हैं, वैरागी बाहर से नहीं पहचाना जाएगा, उसे तो भीतर से पहचाना जाएगा। पहचान क्या है? जो तीन गुणों से और सिद्धियों से पार हो गया। जो तटस्थ रहे, जिसे राग न रहे, वस्तु छूट जाए, त्याग किया ऐसा विचार तक न रहे। मन के विचारों विकारों से तद् रूप न हो, उन्हें गुण से उत्पन्न जानता हो, असत्य जानता हो। जो असंग हो, वो वैराग्यवान है। अब विडियो देखें-पंचवटी निरूपण https://youtu.be/GkRWILO0rww

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Swami Lokeshanand May 19, 2019

लक्षमणजी ने चार के बारे में पूछा- माया, ज्ञान, वैराग्य और भक्ति। रामजी ने सत्संग प्रारंभ किया, बोले लक्षमण मति, मन और चित लगाकर सुनना। देखो, सत्संग में मति लग जाए तो अज्ञान न रहे, ज्ञान आ जाए, मन लग जाए तो कामना न रहे वैराग्य आ जाए, और चित लग जाए तो संसार की स्मृति न रहे भक्ति की प्राप्ति हो जाए। अब माया। "मैं और मेरा" बस यही माया है। "मैं" दो हैं, सच्चा और झूठा, सच्चा मैं ब्रह्म है, झूठा मैं माया है। जैसे जब आप स्वप्न देखते हैं, तब आप ही स्वप्न देखते भी हैं, आप ही स्वप्न में दिखते भी हैं। कैसा भी स्वप्न क्यों न हो, आपके स्वप्न में आप तो होते ही हैं, आप आपको ही देखते हैं, आप अपने को स्वप्न में न देखो तो स्वप्न हो सकता ही नहीं। तो इन दो "मैं" में, जो देखने वाला "मैं" है वह ब्रह्म है, जो "मैं" दिखता है वह माया है। दूसरे शब्दों में देहाध्यास मुक्त "मैं" ब्रह्म है, देहाध्यास युक्त "मैं" माया है। जाननेवाला, द्रष्टा "मैं" ब्रह्म है। सूक्ष्म का अभिमानी, जाना जानेवाला "मैं" माया है। और जब यह देह वाला "मैं" ही माया है, तब "मेरा" भी माया ही है। माया माने जो दिखता है, पर है नहीं। जैसे मैं के दो भेद हैं, माया के भी दो भेद हैं, विद्या और अविद्या माया। अविद्या भगवान से विमुख करती है, विद्या सम्मुख कर देती है। हैं दोनों माया, पर जब तक अविद्या है, तब तक विद्या की आवश्यकता है। जब तक रोग सत्य मालूम पड़ता है, तब तक औषधि सत्य है। विद्या माया ने जगत बनाया, अविद्या ने मेरा-तेरा बना दिया। सब व्यवहार करते हुए, भीतर से जानते रहना, कि सब भगवान का है, "मेरा" नहीं है, मेरा तो बस काम चलाने भर को, मानने भर को है। जैसे पाँव में लगे काँटे को, दूसरे काँटे से निकाल दिया, तो दोनों ही फैंक दिए जाते हैं। योंही सब भगवान का है, ऐसा भगवान में रम जाने वाले को, मैं और मेरा दोनों ही नहीं रहते, उसे दोनों माया से छुटकारा मिल जाता है, माया बचती ही नहीं। फंदा कट गया। अब विडियो देखें- अरण्यकांड निरूपण- https://youtu.be/z4BPRbhLtkE

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Swami Lokeshanand May 18, 2019

आज पुनः हिन्दू शब्द की चर्चा चल रही है। स्वामी विवेकानन्द जी कहते थे- "गर्व से कहो कि हम हिन्दू हैं।" आप सुधि पाठकगण स्वयं विचार करें, कि क्या यह शब्द गर्व का विषय नहीं? ध्यान दें- "हृद इन्दू स हिन्दू।" माने जिसका हृदय चन्द्रमा हो जाए, माने जैसे चन्द्रमा का अपना प्रकाश नहीं होता, वह सूर्य के ही प्रकाश से प्रकाशित रहता है, ऐसे ही जिसका अंतःकरण आत्मप्रकाश से प्रकाशित रहे, वो हिन्दू है। और भी देखें- "हीनं च दूष्यत्येव हिन्दुरित्युच्चते प्रिये" -शैव ग्रन्थ, मेरू तन्त्र। "हीनं दूष्यति इति हिन्दू" -कल्पद्रुम। माने जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे, माने जगत के प्रति सत्य बुद्धि का त्याग करे, माने जो देहाध्यास त्याग दे, वो हिन्दू है। "ओंकारमंत्रमूलाढ्य पुनर्जन्म दृढाशयः। गोभक्तो भारतगुरूर्हिन्दूर्हिंसनदूषकः॥" -माधव दिग्विजय। माने जो ओंकार मंत्र के आश्रय से, अपने मूल को जानकर, पुनर्जन्म से छूट जाए, अपनी इन्द्रियों को भक्ति में लगाने वाला, परमात्म् भाव में रत, हिंसा आदि आसुरी सम्पद् से दूर रहे, वो हिन्दू है। "हिनस्ति तपसा पापां दैहिकां दुष्टं। हेतिभिः शत्रुवर्गं च स हिन्दूरभिधियते॥" -पारिजात हरण। माने जो तप पूर्वक, दुष्ट दैहिक पापों को, अंतःकरण के समस्त शत्रुओं को मार डाले वह हिन्दू है। और यह श्लोक तो आपने सुना ही होगा- "हिमालयं समारभ्य सावत इन्दूसरोवरं। तं देवनिर्मितं देशं हिन्दूस्थानं प्रचक्षते॥" -बृहस्पति अग्यम्, ॠगवेद। माने हिमालय से इन्दु सरोवर तक, देव निर्मित देश को हिन्दुस्थान कहते हैं। क्या इतना पर्याप्त नहीं है? और जानकारी के लिए यह लिंक देखें- http://troindia.blogspot.com/2013/10/blog-post_5362.html?m=1

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Swami Lokeshanand May 18, 2019

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