Swami Lokeshanand Oct 22, 2019

मुझसे कितने ही साधक मिलते हैं, लगभग सभी ही यह जरूर कहते हैं कि स्वामीजी बस अमुक एक ईच्छा पूरी हो जाए, फिर मैं खूब साधन करूंगा। पर वे मन की चालबाज़ी नहीं समझते। देखो एक बड़े राज की बात है कि मन का भोजन है विचार। मन को जीवित रहने के लिए विचार चाहिए ही। निर्विचार मन नाम की कोई चीज होती ही नहीं। निर्विचार की स्थिति में मन होता ही नहीं। और विचार दो में से एक का ही होता है, या तो अतीत की स्मृति, या भविष्य की कामना। कामना के लिए भविष्य चाहिए ही, यों हर ईच्छा मन को भविष्य में ले जाती है। इससे मन को और जीने का आश्वासन हो जाता है। मन कहता है, कर लेंगे, अभी क्या जल्दी है, बस यह एक ईच्छा पूरी हो जाए, फिर मैं शांत हो जाऊंगा। पर उसका तो काम ही झूठ बोलना है, असली बात तो यह है कि ईच्छा की पूर्ति से ईच्छा की निवृत्ति कभी होती ही नहीं, वरन्- "तृष्णा अधिक अधिक अधिकाई" ईच्छाएँ बढ़तीं ही हैं। जितनी जितनी आप मन की इच्छा पूरी करते जाएँगे, मन उतना ही और और इच्छाएँ करता चलेगा, इसे अ-मन करना और और कठिन हो जायेगा। पहला ही कदम गलत उठा कि वापस लौटना और कठिन हुआ। और पहली ही इच्छा पर मन की चालबाज़ी को पहचान कर, मन को डाँट कर रोक देने वाले को, मन सरलता से काबू हो जाता है। क्या आप नहीं जानते कि रोग, अवगुण, आदत और साँप से छोटे होते हुए ही, छुटकारा पा लेना चाहिए। उपेक्षा कर देने वाले को, फिर इनके बढ़ जाने पर, इनसे छुटकारा कैसे मिलेगा? लोकेशानन्द कहता है कि देरी मत करें, कह दें अपने मन से कि अ मन! अब मैं तेरी चाल में नहीं आने वाला, और कुछ मिले न मिले, भले ही पास का भी चला जाए, मैं तो आज, अभी, इसी समय, जैसा हूँ, वैसा ही साधन में लगता हूँ। तूने रहना है तो रह, जाना है तो जा, आज से मैं तेरी गुलामी छोड़ कर उन मनमोहन का संग करूँगा।

+10 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 15 शेयर
Swami Lokeshanand Oct 22, 2019

+4 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर
Swami Lokeshanand Oct 22, 2019

दुख किसे कहा जाता है? जब, जो, जिस परिस्थिति में होता है, तब, वह, उस परिस्थिति को स्वीकार न करे, बस इसी का नाम दुख है। तो सुख हो गया परिस्थिति को जैसी है वैसी ही स्वीकार कर लेना। अब दो बात हो गईं, परिस्थिति और मनःस्थिति। परिस्थिति प्रारब्ध का फल होने से बस से बाहर है, केवल मनःस्थिति ही पुरूषार्थ के अधीन है। जो बाहर कुछ बदलना चाहता है, जो अस्वीकार में पड़ा, वह दुख में पड़ता है। जो बाहर के अनुसार भीतर से बदल गया, जिसने सर्व स्वीकार कर लिया, उसे कैसा दुख? जो दशा बदलने में लगा, वह फंसा, जिसने मन की दिशा ही बदल ली, वह मुक्त हुआ। जो सृष्टि पलटने दौड़ा, वह मरा, जो बैठकर दृष्टि पलट गया, वह सदा सदा के लिए मृत्यु पर विजय पा गया। कौन मूर्ख है जो यह जानकर भी बाहर ही माथा पटकता फिरे? विवेकवान जानता है कि पूरी पृथ्वी पर बिछे काँटों का उपाय पृथ्वी को चमड़े से मंढना नहीं, जूते पहनना मात्र है। तो परिस्थिति नहीं, मनःस्थिति बदलो, दशा नहीं दिशा बदलो, सृष्टि नहीं, दृष्टि बदलो। दृष्टि बदल जाए तो सृष्टि अपनेआप बदल जाती है। अब विडियो देखें- असली उपाय https://youtu.be/jAH5uWKbQaw

+17 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 32 शेयर
Swami Lokeshanand Oct 22, 2019

+8 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर
Swami Lokeshanand Oct 21, 2019

तुम मन की वृत्ति पर चढ़कर आँख के रास्ते दृश्य जगत के विषयों में घूमा करते हो। संकट यह है कि मन जिन जिन विषयों को देखता है, उन उन विषयों में सुख दुख की कल्पना करने लगता है। ध्यान दें कि सुख की कल्पना लोभ पैदा करके राग और दुख की कल्पना भय पैदा करके द्वेष उत्पन्न कर देती है। राग से प्राप्ति की चेष्टा और द्वेष से दूर हटने की चेष्टा होती है। बस एकमात्र यही सटने या हटने की चेष्टा, तुम्हें क्रिया में उतार कर कर्मफल के बंधन में डालने वाली और जन्म मृत्यु के चक्र में फंसाने वाली है। तो क्या करें कि बचना हो जाए। बड़ा सरल सूत्र है। दिन में कईं कईं बार आँख का रास्ता बंद करने लगो। करना वरना कुछ नहीं है, बल्कि करना ही बंद करना है। बस आँख बंद हो जाए। अब भीतर के एकांत का अनुभव करने लगो। एकांत का अनुभव बड़ा विश्राम देता है। मालूम है! गहरी निद्रा (सुषुप्ति) में जो विश्राम है, वह और कुछ नहीं एकांत का ही फल है। जहाँ तुम्हें कोई याद नहीं रहती, अपनी अनुभूति तक वहाँ नहीं होती। बस इसी एकांत का अनुभव जागते हुए ही, बार बार लेना है। तो थोड़ी थोड़ी देर के लिए अकेले होने लगो। बार बार विश्राम का लाभ लेने लगो। एक बार अभ्यास से रस लग जाए, बस फिर शांति टिकने लगती है, मन मुड़ने लगता है, सुख भीतर ही मिलने लगता है। और वह सुख किसी बाहरी विषय पर आधारित नहीं है। लोकेशानन्द की बात मान लो, युंही थोड़ा थोड़ा अभ्यास करते करते, एकदिन तुम्हारी प्रसन्नता अखण्ड हो जाती है, फिर संसार की कोई ताकत उसे तुमसे नहीं छीन सकती, मृत्यु भी नहीं।

+4 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 25 शेयर
Swami Lokeshanand Oct 21, 2019

+4 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर
Swami Lokeshanand Oct 20, 2019

एक परमात्मा के संदर्भ में ५ बातें- १- यह निर्विवाद सत्य है कि परमात्मा एक है, और दृष्टि में आता है कि जीव अनेक हैं। तो जैसी जिसकी रति हो, जो जिसको अनुकूल पड़ जाए, कोई उस एक परमात्मा को किसी नाम से पुकारेगा, कोई किसी नाम से। तुम्हें मैं भाई कहता हूँ, कोई पुत्र कहेगा, कोई पिता, कोई पति, कोई राजु, मुन्ना, चिंटू। पर तुम तो एक ही रहोगे। भिन्न भिन्न नामों से पुकारे जाने पर भी तुम्हारे एक होने में कोई अड़चन नहीं आती। तब उस एक अखंड अद्वै ज्ञानस्वरूप आत्मचेतन परमात्मा को कितने ही, कितने ही नामों से पुकारे, वह एक ही रहता है। २- कुछ भी किसीको अर्पण करो, जाएगा उसी एक के पास, तो घूम घूम कर सबको क्या देना? किसी एक को सारा का सारा एकबार में ही क्यों न दे दो, पहुँचेगा उसी एक के पास। तब पत्ता पत्ता सींचने से क्या लाभ? उठाओ अपना श्रद्धा जल से भरा पात्र और मूल परमात्मा के चरणों में ही डाल दो। ३- जैसे मान लो किसी ने कहीं सुंदरकाण्ड का पाठ रखा है, तो "ॐसर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः" कहते हैं। पर हनुमानजी की पूजा विशेष होगी। जैसे घर में जितने लोग हैं सबका आदर है पर मैं जिनसे हूँ वो एक मेरा पिता है। चाचा कौन-पिता का भाई, दादा कौन-पिता के पिता। बाकी सब हैं तो पर पिता के संबंध से हैं, पिता विशेष है। योंही यहाँ भी समझना है। ४- परमात्मा तो अनाम है। किन्तु उसका कोई नाम भले न हो, क्योंकि वह सब में है, अतः किसी को भी पुकारो, वही पुकारा जाता है। अनाम होते हुए भी, सब नाम उसके हैं। वही एक मुझमें, तुममें, सबमें अंदर बाहर छाया है। उसके सिवा कोई है ही नहीं। अब हमें उस तक की यात्रा करनी है, तो अनेक से मैं कैसे जाऊँ? जाना तो एक से ही पड़ेगा। इसीलिए किसी एक को पकड़ लो। ५- असली नकली के चक्कर में नहीं पड़ना। श्रद्धा हो तो नकली भी असली हो जाता है, न हो तो असली भी कुछ काम नहीं आता। इसमें दूसरे से उलझना नहीं, दूसरे की आलोचना करनी नहीं, कौन क्या करता है, क्या कहता है, उसकी और झाँकना नहीं। दृष्टि अपने पर रखकर चल पड़ना है, यही साधक की रहनी है। अब विडियो देखें- अनन्यता- परमात्मा प्राप्ति की विधि https://youtu.be/S48p-qsD53M

+8 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 14 शेयर
Swami Lokeshanand Oct 20, 2019

+7 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 0 शेयर