Swami Lokeshanand Jul 18, 2019

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Swami Lokeshanand Jul 18, 2019

तुलसीदासजी ने विचित्र चौपाइयाँ लिखीं। "मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा" और "भवन एक पुनि दीख सुहावा" एक विभीषण के ही घर को घर कहा, रावण सहित शेष राक्षसों के घरों को घर नहीं कहा, मंदिर कह दिया। जब लंका में आग लग गयी, तब- "जारा नगर निमिष एक माहीं। एक विभीषण कर गृह नाहीं॥" वह "घर" तो छूट गया,"मंदिर" सभी जल गए। विचार करें, मंदिर वह है जो प्रीति का केन्द्र हो। घर उपयोग के लिए है, रहने के लिए है, प्रीत लगाने के लिए नहीं है। भवन से प्रीत लगाने वाला ही तो प्रेत बनता है। जिसे भवन से प्रीत है, उसे घर में ही आसक्ति है, गृहासक्ति है, तो घर ही उसके जीवन का लक्ष्य हो गया, मंदिर हो गया। जबकि विभीषण जिस घर में रहता है, उसमें उसे आसक्ति नहीं है। मंदिर तो वहाँ भी है, पर अलग से बना है- "हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा" इसे समझें, मंदिर दो प्रकार के हैं, देव मंदिर और देह मंदिर। विभीषण के मंदिर में देव पूजा होती है, वहाँ श्रीसीतारामजी विराजते हैं, वह तो देव मंदिर है। शेष सबमें देह की पूजा होती थी, वे देह मंदिर हैं। देखो, देह संभालो, पर उसे भी तो देखो जिससे यह जीवित है, उसी से इसकी कीमत है। हिसाब लगाओ! कितने टिन तेल, साबुन, पाउडर, क्रीम इस पर मले, कितना घी, गेहूँ, चावल, दाल, फल, सब्जी, मिठाइयाँ, पापड़, पकोड़े, अचार, चटनी, मुरब्बे इसे खिलाए, इसकी पूजा का कोई अंत है? देव को न जाने, देह को ही पूजे, इसी के सुख के लिए जीवन बिता दे, कमाना खाना और पैखाना ही जिसके जीवन का लक्ष्य है, वही तो असली राक्षस है। तुलसीदासजी का संकेत है कि अ दुनियावालों! इस देह की कितनी ही पूजा कर लो, सज़ा लो, संवार लो, इसे तो जलना ही पड़ेगा, जलना ही पड़ेगा। अब यह विडियो देखें- हनुमानजी ने देह मंदिरों में आग लगा दी- https://youtu.be/_DW_XzDxzQk

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Swami Lokeshanand Jul 18, 2019

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Swami Lokeshanand Jul 18, 2019

यह जगत बड़ा विचित्र है। यहाँ भोग में सिर से पैर तक डूबा भोगवादी रावण भी हैं, भोगों से सावधान अंगद भी हैं, अनुराग और वैराग में रचे हनुमान भी हैं। हमें विचार करना चाहिए कि हम किस तल पर खड़े हैं। दूसरे, इस जगत में सोते तो सब हैं, कुमति का कुंभकर्ण भी सोता है, सुमति का विभीषण भी सोता है। पर एक अंतर है, कुमति को भोगी रावण जगाता है, सुमति को वैरागी हनुमानजी जगाते हैं। यदि हम भोगी हैं तो दुख की जननी कुमति जाग जाती है, वैरागी को शांतिप्रद सुमति जाग जाती है। एक और बड़ी गंभीर बात है। यह रावण पूर्वजन्म में हिरण्यकशिपु था। इसने प्रह्लाद को भक्ति करने से रोका तो जल्दी मरा। पर इस बार विभीषण की वृत्ति देखकर उसे रोका नहीं, बल्कि सब सुविधा दी, मंदिर भी खुद बनवा दिया। बस मन यही खेल खेलता है, थोड़े से सत्कर्म से संतुष्ट होकर पापकर्म करता है। सत्कर्म की आड़ में पाप का कारोबार चलाता है। विभीषण का मंदिर रावण के महल की बगल में ही है, पर रावण ने उसे तोड़ा नहीं। और रावण तो यहाँ उदाहरण मात्र है, दुनियावाले यही कर रहे हैं। ध्यान दें- "रावण जबहिं विभीषण त्यागा। भयऊ विभव बिनु तबहिं अभागा॥" "अस कहि चला विभीषण जबहिं। आयुहीन भए सब तबहिं॥" क्यों? क्योंकि विभीषण का सत्कर्म रावण को ही आयु दे रहा था। जैसे जालंधर की पत्नी का पतिव्रत धर्म जालंधर को ही आयु दे रहा था। धर्म यदि अधर्म का क्वच बने, तो अधर्म की छाती में तीर मारने के लिए, ऐसे मिथ्या धर्म का क्वच तोड़ना ही पड़े। कर्ण धर्मरथ पर है, पर दुर्योधन की ढाल बना है, सूर्य का पुत्र होकर, अंधकार की परंपरा का साथ देने चला। तो जो प्रकाश अंधेरे की सहायता करने चला, उस प्रकाश को नष्ट कर दिया गया। पाप को बढ़ावा दे, तो पुण्य भी पाप ही है। भगवान ने इन्द्रपुत्र बालि को मारा, सूर्यपुत्र सुग्रीव की रक्षा की। सूर्यपुत्र कर्ण को मारा, इन्द्रपुत्र अर्जुन की रक्षा की। भगवान कहते हैं कि हम ये नहीं देखते कि कौन किसका पुत्र है, हम यह देखते हैं कि सत्य धर्म की ओर कौन है? आप अाज, अभी, अपने को इन तीन कसोटियों पर कसें। विडियो देखें-विभीषण रावण समझौता- https://youtu.be/27DL8NmXwUA

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Swami Lokeshanand Jul 17, 2019

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Swami Lokeshanand Jul 16, 2019

हनुमानजी ने रात में लंका में प्रवेश किया, वह भी मच्छर बन कर। भक्ति को पाना है तो छोटे बनकर जाओ, कोई देखे न, इसीलिए रात को, प्रदर्शन मत करो, निराभिमानी होकर रहो। लंकिनी मिली "सो कह चलेसि मोहि निंदरी" मेरी उपेक्षा? यही राक्षसी स्वभाव है, संत कितना ही छोटा बनकर क्यों न चले, वे लोग सरल को मूर्ख, सहज को मजबूर और विनम्र को कायर समझते हैं। लंकिनी बोली, मैं चोरों को खाती हूँ। हनुमानजी ने एक मुक्का मार दिया। लोगों ने पूछा कि वह तो अपना काम ही कर रही थी, आपने बिना बात के उसे मुक्का क्यों मार दिया? देखो, हनुमानजी ने उसे झूठ बोलने का दंड दिया। कि तूं चोरों को नहीं खाती, तूं तो भक्तों को खाना चाहती है। अगर तूं चोरों को खाती, तो रावण जब सीताजी को चुरा कर आ रहा था, तब तूं रावण को क्यों नहीं खा गई? ध्यान दें, अविद्या ही लंकिनी है, यही शरीर रूपी लंका की चौकीदारी करती है। मुक्का बाहर निकलती इन्द्रियों को समेट कर अंतर्मुखी कर लेने का संकेत है। बहिर्मुखी मनुष्य अविद्या का पार नहीं पा सकता। इन्द्रियाँ संयमित हुईं कि अविद्या का प्रभाव समाप्त हुआ, विद्या के क्षेत्र में प्रवेश मिला, आवरण हटा, जो अविद्या रास्ता रोक रही थी, वही विद्या होकर लंका का ग्यान देने लगी। संतसंग हुआ तो सत्संग मिला, सत्संग से लंकिनी को अपवर्ग सुख से भी अधिक सुख मिला। अ-पवर्ग, जिसमें "प फ ब भ म" ना हो, पाप, फंदा, वासना, भ्रम-भय, मोह-ममता-मद-मत्सर न हो, माने मोक्ष के सुख से भी, क्षणभर के सत्संग का सुख अधिक है। जो सुख रामकथा में है वह कैवल्य में भी नहीं है। और भी, संत सजा देकर सज़ा देता है, वह मारता नहीं, सुधारता है। किसी को मिटाना संत का उद्देश्य नहीं, उसके भीतर की बुराई मिटा देना उद्देश्य है। हनुमानजी भी बुरे के नहीं, बुराई के विरोधी हैं। अब विडियो देखें- लंकिनी प्रसंग- https://youtu.be/rngZoXyopLU

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Swami Lokeshanand Jul 16, 2019

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Swami Lokeshanand Jul 16, 2019

भक्ति देवी सीताजी को, संसार के सुख के लिए गिरवी रख छोड़ने की बात से, यदि किन्हीं को दुख हुआ हो, कि सीताजी के लिए "गिरवी रखने" जैसा शब्द प्रयोग किया गया है, तो यह बड़ी क्रांतिकारी बात है, इसमें मुझे हैरानी नहीं है। हैरानी तो उन पर है जिन्हें दुख नहीं हुआ, दुख होना ही चाहिए, क्योंकि सत्य यही है। रामलीला में मंचस्थ सीताजी को, अशोक वाटिका में दुखी बैठी देख, मुट्ठियाँ भींच कर, आँसू बहाने वाले दर्शकों को, अपने जीवन की सीताजी का, अपने प्रेम का, अपने जीवन के रावण से, मोह से, मैं और मेरे से, त्रस्त होना नहीं दिखता, यह बड़ी ही हैरानी की बात है। एक बड़ा सरल तरीका है यह जानने का कि आपका प्रेम जगत में लगा है या जगदीश में? जिसके जीवन में आनन्द है, शांति है, संतुष्टि है, अहोभाव है, उसका प्रेम जगदीश से जुड़ा है, और जिसके जीवन में दुख है, तनाव है, चिंता है, उद्वेग है, अशांति है, उहापोह है, उधेड़बुन है, भविष्य के प्रति आशंका है, काम क्रोध है, उसका प्रेम जगत से जुड़ा है। यह निर्विवाद सत्य है कि "भक्ति" और "सीताजी" पर्यायवाची शब्द हैं, इस कथन में रत्ती भर भी अतिशयोक्ति नहीं है, और वास्तव में ही इस बात को समझने वाले का, कि हमने अपने जीवन में, अपने प्रेम को नहीं, सीताजी को ही दाँव पर लगा रखा है, कलेजा कट जाना चाहिए, नींद उड़ जानी चाहिए, उसे तो ग्लानि से भरकर, तत्पर होकर, तुरंत प्रयास करना चाहिए। कि- "सबकी ममता ताग बटोरी। मम पद मनहिं बांधि बर डोरी॥" तत्क्षण सीताजी को संसार से मुक्त कर भगवान के चरणों में समर्पित करना चाहिए। क्योंकि यही सत्य है, यही सत्य है। मेरे कईं मित्रों के कमेंट्स ने मुझे बहुत प्रेरणा दी है, इस प्रेरणा को "विभीषण को शरणागति" प्रसंग में उपयोग में लाने का प्रयास करूंगा। पुन: उनके लिए मेरा मन प्रफुल्लता पूर्वक अहोभाव से भर गया है, जिनको भी कल की पोस्ट से दुख हुआ। लोकेशानन्द समझता है कि उन पर भगवान की विशेष कृपा हुई है।

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