Swami Lokeshanand Apr 21, 2019

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Swami Lokeshanand Apr 21, 2019

भरत जी ने सुबह होते ही- "बिप्र जेवाँइ देहिं दिन दाना। सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना॥ मागहिं हृदयँ महेस मनाई। कुसल मातु पितु परिजन भाई॥" दु:स्वप्न आया तो अनिष्ट की आशंका से भरतजी ने कर्मकाण्ड प्रारंभ किया। सकाम अनुष्ठान किया। माँगा क्या? चार की कुशलता माँगी, किनकी? क्रम देखें, सबसे पहले माँ की, फिर पिता, पुनः सुहृदजन और अंत में भाई की, माने रामजी की। फल क्या मिला? जो माँगा था वो नहीं ही मिला। माँ की कुशलता माँगी थी, विधवा हो गई, पिता की कुशलता माँगी थी, पिता मर गए, पुरजनों की कुशलता माँगी, सब पाँच दिनों से बेहाल हैं, किसी के घर चूल्हा तक नहीं जला। और भाई? उनकी कुशल का तो कहना ही क्या? तो इस लीला से क्या संकेत मिल रहा है? "यद्धात्रा निज भाल पट लिखितम्" "कर्म प्रधान विश्व करि राखा" "काहु ना कोउ सुखदुखकर दाता" तो क्या कर्मकाण्ड निष्फल है? नहीं! पर उसका वो फल नहीं जिसकी कामना की गई हो। वह तो कभी कभी प्रारब्धवश संयोग बैठ जाए, और ऐसा लगने लगे, पर क्या अनन्त बार कामना निष्फल होती देखी नहीं जाती? देखें, भरतजी को अनुपम फल मिला। मेरेपन का क्रम उलट गया, नियम यह है कि मन में ममता जिससे अधिक होती है, कामना उसी के लिए पहले की जाती है। पहले जहाँ माँ थी अब वहाँ रामजी आ गए, माँ अंतिम स्थान पर खिसक गईं। दृष्टि परमात्मोन्मुख हो गई, भगवान के चरणों में अनुराग हो गया। यही ममता का केन्द्र बदल जाना ही कर्मकाण्ड का एकमात्र फल है। अब विडियो देखें- कर्मकाण्ड का फल https://youtu.be/bUfx4a2-Uh8

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Swami Lokeshanand Apr 20, 2019

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Swami Lokeshanand Apr 19, 2019

इधर भरतजी ननिहाल में सो रहे हैं, उधर अयोध्या में कोहराम छाया है। गुरुजी ने भरतजी को बुलवाने के लिए दूत रवाना किए। भरतजी ने स्वप्न में देखा कि मैं अयोध्या के नभमंडल में चल रहा हूँ, नीचे देखता हूँ तो धुआँ ही धुआँ है, मानो हजारों चिताएँ एक साथ जल रही हों। अचानक धुएँ को चीरकर पिताजी का सिर विहीन धड़ बाहर निकला। पीछे से भैया राम दौड़ते आए, पर मुझे देखते ही वापिस मुड़ने लगे। मैंने पुकारा तो मेरी और पीठ कर, कहीं विलीन हो गए। "रामजी ने मुंह मोड़ लिया" बस, दुख असह्य हो गया, भरतजी की नींद टूट गई। भरतजी जाग गए॥ जाग गए॥ अब ध्यान दें!! आप कितना ही स्वप्न में खोए हों, दुख सहनशीलता से पार हो जाए तो स्वप्न टूटता ही है। वो अलग बात है कि लाख बार दुख आया, लाख स्वप्न टूटे, जो जागना चाहता ही नहीं, वह स्वप्न का अभ्यासी फिर फिर करवट बदल कर सो जाता और नया स्वप्न देखने लगता है। योंही मोह रूपी रात्रि में सोए, जाग्रत रूपी स्वप्न में खोए, जीव को, जगाने के लिए, करूणामय भगवान के अनुग्रह से, परम सौभाग्य रूप दुखजनक परिस्थिति उत्पन्न होती है। सावधान साधक जाग जाता है, मूढ़ पछाड़ खाकर गिरता है, दहाड़ मार मार कर रोता है, पर जागता नहीं, दस बीस दिन छाती पीटकर, पुनः नई वासना से युक्त हो, पुनः दृश्य जगत में खो जाता है। हाय! हाय! दुख की कौन कहे? वह तो इतना जड़ बुद्धि है कि कितने ही उसकी गोद में दम तोड़ गए, वह स्वयं लाख बार मरा, अग्नि में जलाया गया, कब्रों में दबाया गया, नालियों में गलाया गया, कीड़ों से खाया गया, पर नहीं ही जागा। मूर्ख तो दुख के पीछे ही छिप बैठा है, कहता है "यहाँ इतना दुख है, आपको जागने की पड़ी है? जब तक मैं इस दुख का उपाय न कर लूं, जागूं कैसे? यह दुख ही मुझे जागने नहीं देता। पहले मुझे सुखी कर दो, फिर जागने का प्रयास करूंगा।" आप विचार करें, जो दुख में नहीं जाग रहा, वह सुख में जागेगा? न मालूम इस सोने से उसका मन कब भरेगा? अब विडियो देखें- भरत जी जाग गए https://youtu.be/Prj5W1AsMl0

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