Swami Lokeshanand Apr 21, 2021

साधन से मन कैसे निर्मल होता है? इसे रामसेतु प्रसंग से समझेंगे। देखें, संसार ही सागर है। मन में चलनेवाले अनगिनत, देह विषयक, अस्थिर, दुखदायी संकल्प विकल्प ही, असंख्य, माँसाहारी, कभी न टिकने वाले, भंयकर समुद्री जीव हैं। ये ही दुख और बंधन के मूल कारण हैं। एक एक श्वास ही पत्थर है। यह श्वास ही बाह्य संकल्पों को भीतर उतार कर, जगत में डुबाने वाली है। भगवान के नाम का जप ही नल है। नाम जपने का नियम ही नील है। सद्गुण ही वानर भालू हैं। वानर रूपी सद्गुणों के सहयोग से, एक एक श्वास रूपी पत्थर पर, नामजप रूपी नल द्वारा, रामनाम लिखने लगना, बस इतना ही कुल साधन है। श्वास पर नाम जपने से, बाह्य संकल्प भीतर नहीं आ पाते। तब यही श्वास डुबाने वाली नहीं, तैराने वाली हो जाती है, यही पत्थरों का सागर पर तैरना है। लेकिन इन पत्थरों को नील यदि आपस में बाँधता न जाए, तो सागर के जल की प्रचंड लहरें उन पत्थरों को छिन्नभिन्न कर देगीं और पुल कभी न बनेगा। योंही यदि नामजप नियम से न किया जाए तो संसार की विषय-वासनाओं के थपेड़े उस किए गए जप को नष्ट-भ्रष्ट कर देते हैं, और जप सफल नहीं हो पाता। एक बार कस के नियमपूर्वक जप कर डालें, तो जैसे वहाँ पाँच ही दिनों में पुल बन गया और भगवान उस पर खड़े होने का स्थान पा गए, यहाँ कस के नामजप करने से भगवान मन में उतर आते हैं। तब सभी समुद्री जीवों की ही तरह, सभी मानसिक वृत्तियाँ भगवानोन्मुख होकर, समस्त राग-द्वेष भुलाकर, चंचलता त्यागकर, न केवल स्थिर हो जाती हैं, टस से मस नहीं होतीं, और विषय रूपी जल दिखना भी बंद हो जाता है। यही भगवान की कृपा का पुल बन जाना है। तब ये वृत्तियाँ बाधा डालनेवाली नहीं रहतीं, सहायक हो जाती हैं। बस यही मन का निर्मल हो जाना है। और- "निर्मल मन जन सो मोहि पावा" यों साधक कृतकृत्य हो जाता है, धन्य हो जाता है। लोकेशानन्द का स्पष्ट अनुभव है कि ऐसे साधक के पार होने में कोई संशय नहीं रह जाता। http://shashwatatripti.wordpress.com #ramrajyamission

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Swami Lokeshanand Apr 19, 2021

कथा है कि एक छोटे से मत्स्य ने मनु से अपनी रक्षा कि गुहार की। मनु ने उसे एक घट में रख लिया। कुछ समय में वह मत्स्य घटाकार हो गया। घट छोटा पड़ गया तो मनु ने उसे तालाब में, तालाब छोटा पड़ा तो गंगा में, और जब वह मत्स्य पूरी गंगा के आकार का हो गया तो उसे सागर में रख दिया। महाप्रलय का समय आने पर वह मत्स्य मनु से बोला कि आप मेरे सींग से एक नाव बाँधकर, उस पर सप्तॠषियों और कल्याणकारी बीजों को लेकर बैठ जाएँ। मनु ने ऐसा ही किया। वह मत्सय हजारों वर्षों तक मनु को परमार्थ का उपदेश देता चलता रहा और अंततः उस नाव को हिमालय के शिखर पर बाँधकर अदृश्य हो गया। अब अर्थ- मन ही मनु है। "अस्य मतं स मत्स्य" परमात्मोन्मुखी वृत्ति ही मत्स्य है। प्रारंभ में, जब यह वृत्ति उदय हुई ही है, साधक को ही इसकी रक्षा करनी पड़ती है। कालांतर में पुष्ट होने पर तो यही साधक की महाप्रलय से रक्षा करने लगेगी। इसे घट रूपी हृदय में रखने पर, यह वृत्ति पुष्ट होकर समस्त हृदय में व्याप्त हो जाती है। कालांतर में, त्याग रूपी तालाब और फिर भक्ति रूपी गंगा से ओतप्रोत होने पर, यह वृत्ति परमात्मानन्द के सागर में गोते लगाने लगती है। यही उस मत्स्य का सागर के आकार का हो जाना है। यों धैर्यपूर्वक साधन करते करते, परमात्मोन्मुखी वृत्ति की रक्षा करते करते, अंतःकरण भगवदाकार हो जाता है। यही मत्स्यावतार है। तब महाप्रलय का, जन्म मरण के बंधन का सदा सदा के लिए विलीन होने का समय आता है। यहाँ भगवान का पतित पावन नाम ही नाव है, स्वरूप स्मरण ही मत्स्य से बंधी रस्सी है, संतोपदेश ही कल्याणकारी बीज हैं। तब हजारों सांसारिक प्रवृत्तियों का अंत हो जाता है, और आत्मविचार स्थिर हो जाता है, यही हिमालय के शिखर से बंध जाना है। तब "ब्रह्म जानेति ब्रह्मैव भवति" वह ब्रह्म हो जाता है। लोकेशानन्द का आश्वासन है कि आपके साथ भी ऐसा ही हो सकता है, बस आप एक इष्ट चुनकर, उनका एक नाम और एक रूप निश्चित कर, नामजप और रूपध्यान करते हुए, उस परमात्मोन्मुखी वृत्ति की रक्षा में संलग्न हो जाएँ। http://shashwatatripti.wordpress.com #ramrajyamission

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Swami Lokeshanand Apr 18, 2021

देवासुर संग्राम एक निरंतर चल रही प्रक्रिया है। यह सबके अंत:करण में सतत चलता है। हमें मालूम हो या न हो, यह झगड़ा रुकता नहीं। कोई विरला, जब अपने मन को, एक भगवान में लगा देता है, तब कछुए के अंगों की तरह, उसके अंतःकरण का अंतर्मुखी होकर भगवदाकार हो जाना ही कच्छप अवतार है। वे भगवान भीतर से सहारा देते हैं, आधार बनते हैं, तब जाकर यह निरंतर चल रहा युद्ध, एक व्यवस्थित मंथन में परिवर्तित होकर ब्रह्मपीयूष की प्राप्ति कराता है। देखें, संसार ही सागर है। सद्गुण ही सुर हैं, दुर्गुण ही असुर हैं। सद्गुण राम की ओर, तो दुर्गुण काम की ओर खींचते हैं। इन दोनों का मन को अपनी अपनी ओर खींचना ही मंथन है। नामजप रूपी महान साधन के फलस्वरूप मन जब चंचलता का त्याग कर अचल हो जाता है, तब यही मन मंदराचल पर्वत कहा जाता है। श्वास ही वासुकि है। भीतर बाहर आती जाती श्वास पर भगवान का नाम जपना ही अचल मन रूपी मंदराचल पर्वत को मथानी बना लेना है। इस मंथन के फलस्वरूप शंख, हय, मणि, आदि तेरह सोपानों के बाद अमृत की प्राप्ति होती है। क्रमशः देखें- "मैं सत्य के मार्ग का पथिक हूँ" ऐसी उद्घोषणा ही शंख है। मन रूपी घोड़े पर विवेक सवार हो जाना हय है। ध्यान ही धनुष और विवेक ही बाण है। आत्मिक संपत्ति की प्राप्ति से मानस रोगों का शांत होने लगना, धन्वंतरि है। हृदय का कायाकल्प होना कल्पवृक्ष है। इच्छा की सर्वथा निवृत्ति ही कामधेनु है। भगवान का नाम मणि है, नाम का टिकना मणि मिलना है। यों इन सात सोपानों के बाद परीक्षा का क्रम उतरता है- "छोरत ग्रंथि देखि खगराया। विघ्न अनेक करई तब माया॥" परीक्षा क्रम में, चमत्कारी विभूतियाँ श्री हैं। काम जगाने वाली वृत्तियाँ ही रम्भा नामक अप्सरा है। कर्तृत्वाभिमान गज है। मोह ही मदिरा है, वारुणी है। विषय ही विष है। जो साधक इन परीक्षात्मक पाँच सोपानों को भी बिना भटके पार कर जाता है, उसका मन आकाशवत् हो जाता है, यही शून्य मन, तेरहवाँ सोपान शशि है। तब वह अमरत्व उतर आता है। यही अंतिम प्राप्ति है, अमृत पा लेना है, आत्मतत्व का साक्षात्कार है। अब आप बड़े प्रेम से, भगवान के स्वरूप का ध्यान करते हुए, नामजप में लगें, यही लोकेशानन्द का एकमात्र साधन है। http://shashwatatripti.wordpress.com #ramrajyamission

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Swami Lokeshanand Apr 17, 2021

जन्मों जन्मों से अनन्त दुख भोग रहे जीव को, अपने समस्त सत्कर्मों के फल स्वरूप, किन्हीं आत्मज्ञानी महापुरुष का संग प्राप्त हो जाए, तब कहीं जाकर उसे अपने जीवन का लक्ष्य स्पष्ट होता है। उन संत के मार्गदर्शन से, वह सही मार्ग को पहचान कर साधन की दौड़ में लगता है। कभी दौड़ते, कभी गिरते, तो कभी पुनः उठकर, उत्साह से चलते चलते, कितनी ही कठिनाइयों को सहन कर, वह कर्म की धारा में, साधन में, आकंठ डूब पाता है। पर उसके दुख की निवृत्ति नहीं हो पाती। क्योंकि संकट यह है कि जितने समय वह साधन में डूबा रहता है, अज्ञान का आवरण हटा रहता है, पर पुनः व्यवहार में आते ही, फिर से वही आवरण पड़ जाता है। यों वर्षों तक, बार बार आवरण भंग और फिर फिर आवरण पड़ते रहने से, उसे जीवन बोझ लगने लगता है। ऐसी अवस्था में जब तड़प असह्य हो जाती है, जीभ पर छाले और आँखों में जाले पड़ जाते हैं, कि और कब? कब? आखिर कब? तब जिसका भगवान के सिवा दूसरा कोई बचा ही नहीं, यदि भगवान स्वयं ही कृपा करके, अपने हाथों से उस अज्ञान के आवरण को न हटा लें तो और कौन उसका सहारा बने? यही गोपी चीर हरण प्रसंग का रहस्य है। कन्हैया छोटे से थे, या गोपियाँ तो उनकी अपनी थीं, या पूर्वजन्म की कोल भील थीं, या ये था कि वो था, इन बकवास तर्कों से क्या होगा? इस लीला का अर्थ न जानने से ही, संतों की तो जीभ सूख गई पर उत्तर देते न बना, और असंतों ने भले कुल की कन्याओं को बरगला कर खूब खेल खेले। विचार करें कि गोपी कौन है? "गो" माने इन्द्रियाँ, "पी" माने सुखा डालना। जिसने अपनी इन्द्रियों में बह रहे वासना रस को सुखा डाला। लाख विषय आँख के सामने से गुजरते हों, पर अंत:करण में वासना की एक रेखा तक न खिंचती हो, ऐसा साधक गोपी है। और यमुना? "कर्म कथा रविनंदिनी बरनि।" साधन की, कर्म की धारा ही यमुना है। तो कर्म की धारा यमुना में आकंठ डूबे जिस साधक का साधन पूर्ण हो गया, उसे तो फल मिलने का समय आ गया। तब क्यों न भगवान कृपा कर दें? क्यों न उसके स्वरूप पर पड़ा अज्ञान का आवरण उठा लें? बस यही हुआ, पर्दा हट गया, अज्ञान मिट गया, आत्मस्वरूप साक्षात हो गया, उपलब्धि हो गई, मंजिल मिल गई, बात बन गई। इसमें संशय कहाँ रहा? जो अभी गोपी नहीं हुआ, वह लोकेशानन्द की बात मानकर खूब साधन किया करे। और जो गोपी हो गया, वह दिनरात तड़पा करे, कि भगवान कृपा तो तूने खूब की, बस यह अंतिम कृपा कब होगी? मेरा वस्त्र कब चुराया जाएगा? http://shashwatatripti.wordpress.com #ramrajyamission

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Swami Lokeshanand Apr 16, 2021

द्रौपदी विवाह योग्य हुई तो बड़ा विचित्र स्वयंवर रखा गया। गगनचुंबी महल की छत के भीतर, गुंबद के नीचे, एक तीर में एक मछली इस प्रकार लगाई गई है कि मछली की एक आँख नीचे की ओर है, और दूसरी आँख ऊपर की ओर। वह तीर न मालूम किस यंत्र से, इतनी तेजी से गोलाकार घूम रहा है कि मछली की आँख तो दूर, मछली तक दिखाई नहीं दे रही। बस कुछ घूम रहा मालूम पड़ता है। क्या घूम रहा है मालूम नहीं पड़ता। शर्त यह है कि मछली की नीचे की ओर वाली आँख में तीर मारना है। पर ऐसे कि तीर आँख में लगते ही रुक जाए, ऊपर वाली आँख न फूटने पाए। तरकीब यह है कि उस गुंबद के एकदम नीचे, एक स्वर्ण पात्र, शुद्ध घी से भरकर रखा गया है। जब उस पात्र में देखा जाता है तब वह घूमती मछली और उसकी आँख स्पष्ट दिखाई देती है। देखना नीचे है, मारना ऊपर है। प्रयास बहुतों ने किया, पर कोई मछली की आँख न भेद पाया। अंत में अर्जुन आया और उसने एक ही तीर में, उस आँख को भेद दिया। द्रौपदी अर्जुन की हो गई। बात क्या है? मन ही मछली है। वह तीर उसी मछली में नहीं लगा, हर मन में तीर लगा है, कामना का तीर। और यह मन इतनी तेजी से घूमता है, कि देखने में नहीं आता। जो इसे देख पाए वह तो द्रष्टाभाव को ही उपलब्ध हो जाए। मन की दो दृष्टि हैं, अधोमुखी-वासनामुखी-संसारोन्मुखी और ऊर्ध्वमुखी-उपासनामुखी-परमात्मोन्मुखी। अधोमुखी दृष्टि फूट जाए, ऊर्ध्वमुखी रह जाए, यही मोक्ष है। और घी से भरा स्वर्ण पात्र क्या है? संस्कृत में घी को स्नेह भी कहा जाता है। स्नेह माने प्रेम। विधि पूर्वक चलते हुए, अपने अंत:करण को परमात्म प्रेम से भरकर, सुपात्र बना लेना ही, घी से भरा स्वर्ण पात्र है। जब ऐसे सुपात्र निर्मल मन पर दृष्टि टिकाकर, अपने ध्यान रूपी धनुष पर, गुरोपदेश रूपी बाण चढ़ा लेने वाला अर्जुन रूपी अनुरागी साधक, अपने मन रूपी मछली की अधोमुखी वासनामुखी दृष्टि को फोड़ डालता है, तब द्रौपदी, ध्रुवपदी, माने वह ध्रुवपद, आत्मपद, कभी न मिटने वाला पद, साधक का वरण कर लेता है। आप भी ऐसा ही करें, अपने मन को भगवद्प्रेम से भरकर, नामजप और रूपध्यान की विधि से, उसी अमरपद की प्राप्ति करें। अब विडियो देखें- द्रौपदी स्वयंवर https://youtu.be/MrngdX3RRhY और ध्रुवपद- द्रौपदी की प्राप्ति https://youtu.be/PPqqvumlxE4

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Swami Lokeshanand Apr 15, 2021

गणेश जी के जन्म की कथा बड़ी विचित्र है। आज इसी पर थोड़ी चर्चा करेंगे। पहले, शंकर जी कौन हैं? "वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकर रूपिणम्" आपके सद्गुरूदेव भगवान ही शिवतत्वनिष्ठ, शिव पद पर आसीन, शंकर हैं। कैलाश, ज्ञान के शिखर का नाम है, नंदी बैल आनन्ददायक धर्म का प्रतीक है। संसार सागर से पार जाने की इच्छा वाले साधक का नाम पार्वती है। पार्वती जी स्नान करने गईं। तन को स्वच्छ करने की क्रिया का नाम स्नान है, और मन को स्वच्छ करने की प्रक्रिया का नाम ध्यान है। नया साधक ध्यान में बैठता है तो "मैं ध्यान कर रहा हूँ" ऐसा अहं खड़ा होता ही है। यह अहं ही मन का मैल है। यही पार्वती जी का मैल से एक बालक खड़ा कर देना है। नियम यह है कि आप किसी भी साधन में क्यों न लगे हों, गुरूजी आ जाएँ तो तुरंत आसन त्याग कर प्रणाम करना चाहिए। पर अहं बाधा बनता है, "मैं ध्यान कर रहा हूँ, गुरूजी भी तो देखें"। यही उस बालक द्वारा शंकर जी का रास्ता रोकना है। अब गुरूजी ही अंह का सिर न काटें तो अहं मिटे कैसे? अहं ही तो बंधन का मूल कारण है। अहं कट जाए, इसीलिए तो गुरूजी हैं। तो शंकर जी ने सिर काट दिया। अब सावधान होकर पढ़ें। अहं दो प्रकार का है, "देहगत अहं" और "स्वरूपभूत अहं"। देहगत अहं ही मिटाना है, स्वरूपभूत अहं तो "अहं ब्रह्मास्मि" की उद्घोषणा है। इसीलिए शंकर जी को शुद्ध अहं कहा गया- "अहंकार शिव बुद्धि अज मन शशि चित्त महान" इधर गज भी स्वरूपभूत अहं का प्रतीक है, अतः उस बालक के धड़ पर गजशीश लगाया, ऐसा दिखाया गया है। हाथी का सिर लगे गणेश जी शुद्ध अहं रहितता ही हैं। पुनः अहंकार रहित हो जाना ही सर्वप्रथम और सर्वश्रेष्ठ दैवीय गुण है। यही सब सद्गुणों का राजा है। सद्गुण ही सुरगण हैं, देवता हैं, इसीलिए लोकेशानन्द भी कहता है कि गणेश जी सर्वप्रथम पूजनीय देव हैं। http://shashwatatripti.wordpress.com #ramrajyamission

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Swami Lokeshanand Apr 14, 2021

आज चर्चा व्यास जी की रहस्यमयी कथा पर। वेदों का विभाग करने वाले, महाभारत, श्रीमद्भागवत, श्रीमद्भगवदगीता और पुराणों के रचयिता को व्यास नाम से कहा जाता है। व्यास, ॠषि पराशर और सत्यवती के पुत्र कहे गए हैं। परतत्व परमात्मा के आश्रय में रहने वाले का नाम पराशर है। एक अखण्ड अद्वै आत्मतत्व का नाम पराशर है। सत्य में लगी बुद्धि सत्यवती है। यह सत्यवती यमुना नदी में नाव चलाती है। "विधि निषेध मय कलिमल हरनि। करम कथा रविनंदिनी बरनि॥" कर्म की धारा, साधन मार्ग ही यमुना नदी है। भगवान का पतित पावन नाम ही नाव है। इस नाम का जप ही यमुना नदी में नाव चलाना है। मन रूपी मछली की, वासना रूपी दुर्गंध से युक्त होने के कारण अभी इस सत्यवती का नाम मत्स्यगंधा है। पर यही जब आत्मदेव पराशर की कृपा पाकर परमात्मा में लग जाती है, भगवदाकार हो जाती है, तब वहाँ वासना की दुर्गंध रहती ही नहीं। यही मत्स्यगंधा का सुगंधा हो जाना है। इसी सुगंधा सत्यबुद्धि से व्यास जी का जन्म है। किसी भी वृत की परिधि के एक छोर से, उसके केन्द्र से होते हुए, दूसरे छोर तक की सीधी दूरी को ज्यामिति में व्यास कहा जाता है, और इस वर्तुलाकार प्रकृति चक्र के जीवन वृत के जगत रूपी छोर से, अपने आत्मकेन्द्र को जो छू ले, और परमात्मा रूपी अंतिम छोर तक जा पहुँचे, उसे अध्यात्म जगत में व्यास कहा जाता है। जिसने यह दूरी तय की, जो जगत के बंधन से छूट गया, जिसकी समस्त वासनाएँ निवृत्त हो गईं, जो बेआस हो गया, वह व्यास हो गया। ऐसे ही आत्मज्ञानी महापुरुषों से शास्त्रों का उद्गम है। शास्त्र कोई कहानी की किताब नहीं, भवबंधन काट देने वाले महापुरुष का अनुभव है। अंतःकरण में चलने वाला दैवी और आसुरी सम्पद् का युद्ध, हृदयस्थ परमात्मा के निर्देशन में कैसे लड़ा जाता है और कैसे धर्म का राज्य स्थापित होता है, यही महाभारत की कथा है। लोकेशानन्द की बात पर ध्यान दें! यही दैवी और आसुरी सम्पद् का युद्ध, पांडव कौरव युद्ध है, यही वानर राक्षस युद्ध है और यही देवासुर संग्राम है। http://shashwatatripti.wordpress.com #ramrajyamission

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Swami Lokeshanand Apr 13, 2021

बड़ी विचित्र कथा है, कश्यप जी ॠषि थे, दिति ने काम की छाया में गर्भ धारण किया तो पुत्र राक्षस पैदा हुए। हिरण्यकशिपु राक्षस था, कयाधु ने नामजप की छाया में गर्भ धारण किया तो प्रह्लाद जैसा पुत्र पैदा हुआ। हिरण्य माने जगत, कशिपु माने शैय्या, जो भोगी है वह हिरण्यकशिपु। इसी को हिरण्यांकुश भी कहा, जिस पर प्रकृति का अंकुश हो। देह को मैं मानने वाला प्रत्येक मनुष्य हिरण्यकशिपु है। प्रेम ही प्रह्लाद है। अंतःकरण में भगवद् प्रेम की वृत्ति उत्पन्न हो जाना ही प्रह्लाद का जन्म हो जाना है। यों तो हर समय, लाखों प्रह्लाद मारे ही जाते हैं। अनेक बार संतोपदेश श्रवण से अंतःकरण में भगवान को पाने की कामना पैदा होती है, पर हम स्वयं हिरण्यकशिपु बनकर, इस प्रह्लाद को जगत के छोटे छोटे कार्यों रूपी पहाड़ से गिरा कर मार डालते हैं- "गृह कारज नाना जंजाला। ते अति दुर्गम शैल विशाला॥" कभी सागर में, माने वासना के जल में डुबा डालते हैं। तो कभी मद रूपी हाथी के पैरों तले कुचलवा देते हैं। कोई विरला मनुष्य, जिसे नारद रूपी नादरंध्र की प्राप्ति वाले महापुरुष मिल जाते हैं, माने किन्हीं सद्गुरुदेव का सशरीर सानिध्य और मार्गदर्शन प्राप्त होता है, अपनी भगवद् प्रेम की डोरी न टूटने देते हुए, इन समस्त विघ्नों को पार कर पाता है। प्राप्ति काल में माया अपना आखिरी फंदा डालती है, अविद्या रूपी होलिका, प्रेम रूपी प्रह्लाद को, विषय रूपी अग्नि में, विषयाग्नि में, जलाकर मारने की प्रयास करती है, पर स्वयं ही जल मरती है। अंत में स्थिर श्वास, स्थिर विचार, स्थिर साधन रूपी खम्बे से वह आत्मस्वरूप प्रकट होता है और जीव अपने सत्य स्वरूप को पा कर, मरणधर्मा नर से, भयरहित सिंह हो जाता है। यही नरसिंह अवतार का आध्यात्मिक रहस्य है। तब भीतर बाहर, ऊपर नीचे, दिन रात, पशु मनुष्य का भेद नहीं रहता, द्वैत की सर्वथा अवज्ञा हो जाती है, अद्वैत उतर आता है, हिरण्यकशिपु मारा जाता है। लोकेशानन्द का मत है कि जगत काँटों से भरा है, इसे चमड़े से नहीं मढ़ा जा सकता। त्रिगुणात्मिका प्रकृति सदा से ऐसी ही है, पर श्रद्धापूर्वक साधन से, अपने पैरों पर चमड़ा मढ़ा जा सकता है। अब विडियो देखें- दिति अदिति- https://youtu.be/2FBfEtxgTYE और  जय विजय- संत का अपमान- https://youtu.be/71VmnRB5chc

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