Suresh Pandey May 31, 2020

।।भक्ता श्रीवारमुखीजी।। एक वेश्या भक्ता थी। उसका घर धन-सम्पति से भरा था परन्तु वह किसी काम का न था, क्योंकि भक्त भगवान की सेवा में नहीं आ रहा था। एक दिन एक विशाल सन्त मंडली रास्ते-रास्ते जा रही थी। सायंकाल हो रहा था, विश्राम योग्य स्थान की आवश्यकता थी। वेश्या के घर के सामने छाया युक्त, स्वच्छ सुन्दर स्थान देखकर संतों के मनको अच्छा लगा। सभी ने यत्र-तत्र अपने ठाकुर पधरा दिये, आसन लगा लिये। अच्छी ठौर देखकर ठहर गए, उनके मन में धन का लोभ कदापि न था। इतने में ही वह वेश्या आभूषणों से लदी हुई बाहर द्वार पर आई। हंसों के समान स्वच्छ चित्त वाले दर्शनीय सन्तों को देखकर वह मन में विचारने लगी- आज मेरे कौनसे भाग्य उदय हो गए ? जो यह सन्त गण मेरे द्वार पर विराज गये। निश्चय ही इन्हें मेरे नाम या जाति का पता नहीं है। इस प्रकार वह सोच विचार कर घर में गई और एक थाल में मुहरें भरकर ले आई। उसे महंतजी के आगे रखकर बोली- 'प्रभो ! इस धन से आप अपने भगवान का भोग लगाइये।' प्रेमवश उसकी आँखों में आँसू आ गये। मुहरें भेंट करती देख कर श्रीमहन्तजी ने पूछा- 'तुम कौन हो, तुम्हारा जन्म किस कुल में हुआ है ?' इस प्रश्न को सुनकर वह वेश्या चुप हो गई। उसके चित्त में बड़ी भारी चिंता व्याप्त हो गई। उसे चिन्तित देख कर श्रीमहन्तजी ने कहा कि तुम नि:शंक हो कर सच्ची बात खोल कर कह दो, मन में किसी भी प्रकार की शंका न करो। तब वह बोली 'मैं वेश्या हूँ', ऐसा कहकर वह महन्तजी के चरणों में गिर पड़ी। फिर सँभलकर प्रार्थना की- 'प्रभो ! धन से भण्डार भरा हुआ है। आप कृपा कर इसे स्वीकार कीजिये। यदि आप मेरी जाति का विचार करेंगे और धन को नहीं लेंगे, तब तो मुझे मरी हुई समझिये, मैं जीवित नहीं रह सकूँगी।' तब श्रीमहन्तजी ने कहा- 'इस धन को भगवान की सेवा में लगाने का बस यही उपाय मेरे हाथ में है और वह यह कि- इस धन के द्वारा श्रीरंगनाथजी का मुकुट बनवाकर उन्हें अर्पण कर दो। इसमें जाति बुद्धि दूर हो जायगी। श्रीरंगनाथ जी इसे स्वीकार करेंगे।' वेश्या बोली- 'भगवन् ! जिसके धन को ब्राह्मण छूते तक नहीं हैं, उसके द्वारा अर्पित मुकुट को श्रीरंगनाथजी कैसे स्वीकार करेंगे ?' महन्तजी ने कहा- 'हम तुम्हें विश्वास दिलाते हैं कि वे अवश्य ही तुम्हारी सेवा स्वीकार करेंगे। इस कार्य के लिए हम तब तक यहीं रहेंगे, तुम मुकुट बनवाओ।' वेश्या ने अपने घर का सब धन लगाकर सुन्दर मुकुट बनवाया। अपना श्रृंगार करके थाल में मुकुट को रखकर वह चली। सन्तों की आज्ञा पाकर वह वेश्या नि:संकोच श्रीरंगनाथजी के मन्दिर में गई, पर अचानक ही सशंकित हो कर लौट पड़ी, अपने को धिक्कारने लगी क्योंकि उसे संयोगवश मासिक-धर्म हो गया था वह अपवित्र हो गई थी। सन्तों ने संकोच का कारण पूछा। उसने बताया कि- 'मैं अब जाने योग्य नहीं हूँ।' तब भक्तवत्सल श्रीरंगनाथजी ने वेश्या की दैन्यता एवं प्रेम को देख कर अपने पुजारियों को आज्ञा दी- 'इसे ले आओ और यह अपने हाथ से हमें मुकुट पहनावे।' ऐसा ही किया गया, जैसे ही उसने हाथ में मुकुट लेकर पहनाना चाहा, वैसे ही श्रीरंगनाथजी ने अपना सिर झुका दिया और मुकुट को धारण कर लिया। इस चरित्र से भक्त-भगवान की मति रीझ गई। पतित-पावनता देख कर लोग भक्त-भगवान की जय-जयकार करने लगे। भक्तवत्सल भगवान की जय हो। ।।इति।।

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Suresh Pandey May 31, 2020

।। महर्षि कश्यप महर्षि मरीचि पुत्र सृष्टि सृजनकर्ता ।। कश्यप गोत्र के ब्राह्मण बंधु महर्षि कश्यप के संतान हैं। महर्षि कश्यप द्वारा संपूर्ण सृष्टि के सृजन में दिए गए महायोगदान की यशोगाथा हमारे वेदों, पुराणों, स्मृतियों, उपनिषदों एवं अन्य अनेक धार्मिक साहित्यों में भरी पड़ी है, जिसके कारण उन्हें ‘सृष्टि के सर्जक’ उपाधि से विभूषित किया जाता है। महर्षि कश्यप पिघले हुए सोने के समान तेजवान थे। उनकी जटाएं अग्नि-ज्वालाएं जैसी थीं। महर्षि कश्यप ऋषि-मुनियों में श्रेष्ठ माने जाते थे। सुर-असुरों के मूल पुरूष मुनिराज कश्यप का आश्रम मेरू पर्वत के शिखर पर था, जहां वे पर-ब्रह्म परमात्मा के ध्यान में मग्न रहते थे। मुनिराज कश्यप नीतिप्रिय थे और वे स्वयं भी धर्म-नीति के अनुसार चलते थे और दूसरों को भी इसी नीति का पालन करने का उपदेश देते थे। महर्षि कश्यप ने अधर्म का पक्ष कभी नहीं लिया, चाहे इसमें उनके पुत्र ही क्यों न शामिल हों। महर्षि कश्यप राग-द्वेष रहित, परोपकारी, चरित्रवान और प्रजापालक थे। वे निर्भीक एवं निर्लोभी थे। कश्यप मुनि निरन्तर धर्मोपदेश करते थे, जिनके कारण उन्हें ‘महर्षि’ जैसी श्रेष्ठतम उपाधि हासिल हुई। समस्त देव, दानव एवं मानव उनकी आज्ञा का अक्षरशः पालन करते थे। उन्हीं की कृपा से ही राजा नरवाहनदत्त चक्रवर्ती राजा की श्रेष्ठ पदवी प्राप्त कर सका। श्रीनरसिंह पुराण के अनुसार मरीचि ऋषि ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे। मरीचि ऋषि की पत्नी थीं सम्भूति। इन्हीं सम्भूति की कोख से महर्षि कश्यप का जन्म हुआ। महर्षि कश्यप अपने श्रेष्ठ गुणों, प्रताप एवं तप के बल पर श्रेष्ठतम महाविभूतियों में गिने जाते थे। महर्षि कश्यप सप्तऋषियों में प्रमुख माने गए। सप्तऋषियों की पुष्टि श्री विष्णु पुराण में इस प्रकार होती है- वसिष्ठ कश्यपोऽत्रिर्जमदग्निवशिष्ठश्चगौतमः।, विश्वामित्रभरद्वाजौ सप्त सप्तर्षयोऽभवन।। (अर्थात् सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार हैं, वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज।) महर्षि कश्यप ने समाज को एक नई दिशा देने के लिए ‘स्मृति-ग्रन्थ’ जैसे महान् ग्रन्थ की रचना की। इसके अलावा महर्षि कश्यप ने ‘कश्यप-संहिता’ की रचना करके तीनों लोकों में अमरता हासिल की। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार ‘कस्पियन सागर’ एवं भारत के शीर्ष प्रदेश कश्मीर का नामकरण भी महर्षि कश्यप जी के नाम पर ही हुआ। श्रीनरसिंह पुराण के पांचवें अध्याय के अनुसार दक्ष प्रजापति ने ब्रह्मा जी के आदेश (तुम प्रजा की सृष्टि करो) पर अपनी पत्नी अश्विनी के गर्भ से 60 कन्याएं पैदा कीं। उन्होंने इन 60 कन्याओं में से- 10 कन्याओं का विवाह धर्म के साथ, 13 कन्याओं का विवाह महर्षि कश्यप के साथ, 27 कन्याओं का विवाह चन्द्रमा के साथ, 4 कन्याओं का विवाह अरिष्टनेमि के साथ, 2 कन्याओं का विवाह अंगिरा के साथ, 2 कन्याओं का विवाह ब्रह्मपुत्र के साथ और 2 कन्याओं का विवाह विद्वान कृशाश्व के साथ किया। महर्षि कश्यप की पत्नियां बनने वाली 13 दक्ष कन्याएं इस प्रकार थीं- 1. अदिति, 2. दिति, 3. दनु, 4. अरिष्टा, 5. सुरसा, 6. खसा, 7. सुरभि, 8. विनता, 9. ताम्रा, 10. क्रोधवशा, 11. इरा, 12. कद्रू और 13. मुनि। मुख्यतः इन्हीं से ही सृष्टि का सृजन हुआ और जिसके परिणामस्वरूप महर्षि कश्यप जी ‘सृष्टि के सृजनकर्ता’ कहलाए। महर्षि कश्यप ने अपनी पत्नी अदिति के गर्भ से 12 आदित्य पैदा किए, जिनमें सर्वव्यापक देवाधिदेव नारायण का वामन अवतार भी शामिल था। श्री विष्णु पुराण के अनुसार मन्वन्तरेऽत्र सम्प्राप्ते तथा वैवस्वतेद्विज। वामनरू कश्यपाद्विष्णुरदित्यां सम्बभुव ह।। त्रिवि क्रमैरिमाँल्लोकान्जित्वा येन महात्मना। पुन्दराय त्रैलोक्यं दत्रं निहत्कण्टकम।। (अर्थात्-वैवस्वत मन्वन्तर के प्राप्त होने पर भगवान् विष्णु कश्यप जी द्वारा अदिति के गर्भ से वामन रूप में प्रकट हुए। उन महात्मा वामन जी ने अपनी तीन डगों से सम्पूर्ण लोकों को जीतकर यह निष्कण्टक त्रिलोकी इन्द्र को दे दी।) पौराणिक सन्दर्भों के अनुसार चाक्षुष मन्वन्तर में तुषित नामक बारह श्रेष्ठगणों ने बारह आदित्यों के रूप में महर्षि कश्यप की पत्नी अदिति के गर्भ से जन्म लिया, जो अग्रि के समान कांतिमान एवं तेजस्वी थे। ये इस प्रकार थे - 1विवस्वान, 2अर्यमा, 3पूषा, 4त्वष्टा, 5सविता, 6भग, 7धाता, 8विधाता, 9वरूण, 10मित्र, 11इन्द्र और 12त्रिविक्रम (भगवान वामन)। ये बारह आदित्य तपते और वर्षा करते हैं। महर्षि कश्यप के पुत्र विवस्वान् से सातवें (वर्तमान) मन्वंतर के वैवश्वत मनु का जन्म हुआ। इन्हें श्राद्धदेव व सत्यव्रत नामों से भी जाना जाता है। महाराज वैवश्वत मनु को इक्ष्वाकु, नृग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, प्रान्शु, नाभाग, दिष्ट, करूष और पृषध्र नामक दस श्रेष्ठ पुत्रों की प्राप्ति हुई। श्रीनरसिंह पुराण के छठे अध्याय के अनुसार अदिति के मध्यम पुत्र लोकपाल’ कहलाए। इनकी स्थिति वरूण-दिशा (पश्चिम) में बतलायी जाती है। ये पश्चिम दिशा में पश्चिम समुद्र के तटपर सुशोभित होते हैं। यहां एक सुन्दर सुवर्णमय पर्वत है। उसके शिखर सब रत्नमय हैं। इनसे युक्त और नाना प्रकार के रत्नों से परिपूर्ण वह सुन्दर पर्वत बड़ी शोभा पाता है। महर्षि कश्यप ने दिति के गर्भ से परम दुर्जय हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्र एवं सिंहिका नामक एक पुत्री पैदा की। हिरण्यकश्यप भगवान नरसिंह और हिरण्याक्ष भगवान वराह (विष्णु अवतारों) के हाथों परलोक पधारे थे। श्रीमद्भागवत् के अनुसार महर्षि कश्यप के तीन संतानों के अलावा अदिति के गर्भ से कश्यप के 49 अन्य पुत्रों का जन्म भी हुआ, जोकि मरूद्गण कहलाए। कश्यप के ये पुत्र निःसंतान रहे। देवराज इन्द्र ने इन्हें अपने समान ही देवता बना लिया। जबकि हिरण्यकश्यप को चार पुत्रों अनुह्लाद, ह्लाद, परम भक्त प्रह्लाद, संह्लाद आदि की प्राप्ति हुई। महर्षि कश्यप को उनकी पत्नी दनु के गर्भ से द्विमुर्धा, शम्बर, अरिष्ट, हयग्रीव, विभावसु, अरूण, अनुतापन, धुम्रकेश, विरूपाक्ष, दुर्जय, अयोमुख, शंकुशिरा, कपिल, शंकर, एकचक्र, महाबाहु, तारक, महाबल, स्वर्भानु, वृषपर्वा, महाबली पुलोमा और विप्रचिति आदि 61 महान् पुत्रों की प्राप्ति हुई। पत्नी अरिष्टा से गन्धर्व गण पैदा हुए। सुरसा नामक रानी की कोख से अनेक विद्याधरगण उत्पन्न हुए। पत्नी खसा ने यक्ष और राक्षसों को जन्म दिया। रानी सुरभि से गौ, भैंस तथा दो खुर वाले पशुओं का जन्म हुआ। रानी विनता के गर्भ से दो विख्यात पुत्र हुए। गरूड़ जी प्रेमवश अमित-तेजस्वी देवदेव भगवान विष्णु के वाहन हो गये और अरूण सूर्य के सारथि बने। ताम्रा ने बाज, गिद्ध आदि शिकारी पक्षियों को अपनी संतान के रूप में जन्म दिया। रानी क्रोधवशा ने बाघ आदि हिंसक जीवों को पैदा किया। इरा से वृक्ष, लता आदि पृथ्वी में उत्पन्न होने वाली वनस्पतियों का जन्म हुआ। पत्नी कद्रू की कोख से ‘दंदशूक’ नामक महासर्प उत्पन्न हुए। रानी मुनि से अप्सराओं की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा जी की आज्ञा से महर्षि कश्यप ने वैश्वानर की दो पुत्रियों पुलोमा और कालका के साथ भी विवाह किया। उनसे पौलोम और कालकेय नाम के साठ हजार रणवीर दानवों का जन्म हुआ जोकि कालान्तर में निवातकवच के नाम से विख्यात हुए। कश्यप ऋषि से सम्पूर्ण जाति की उत्पत्ति :- महर्षि कश्यप ब्रह्मा के मानस पुत्र मरीचि के पुत्र थे. इस प्रकार वे ब्रह्मा के पोते हुए. महर्षि कश्यप ने ब्रह्मा के पुत्र प्रजापति दक्ष की १७ कन्याओं से विवाह किया. संसार की सारी जातियां महर्षि कश्यप की इन्ही १७ पत्नियों की संतानें मानी जाति हैं. इसी कारण महर्षि कश्यप की पत्नियों को लोकमाता भी कहा जाता है. उनकी पत्नियों और उनसे उत्पन्न संतानों का वर्णन नीचे है. अदिति: आदित्य (देवता). ये १२ कहलाते हैं. ये हैं अंश, अर्यमा, भग, मित्र, वरुण, पूषा, त्वष्टा, विष्णु, विवस्वत, सावित्र, इन्द्र और धात्र या त्रिविक्रम (भगवान वामन). दिति: दैत्य और मरुत्.दिति के पहले दो पुत्र हुए: हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप. इनसे सिंहिका नमक एक पुत्री भी हुई. इन दोनों का संहार भगवन विष्णु ने क्रमशः वराह और नरसिंह अवतार लेकर कर दिया. इनकी मृत्यु के पश्चात् दिति ने फिर से आग्रह कर महर्षि कश्यप द्वारा गर्भ धारण किया. इन्द्र ने इनके गर्भ के सात टुकड़े कर दिए जिससे सात मरुतों का जन्म हुआ. इनमे से ४ इन्द्र के साथ, एक ब्रह्मलोक, एक इन्द्रलोक और एक वायु के रूप में विचरते हैं. दनु: दानव जाति. ये कुल ६१ थे पर प्रमुख चालीस माने जाते हैं. वे हैं विप्रचित्त, शंबर, नमुचि, पुलोमा, असिलोमा, केशी, दुर्जय, अयःशिरी, अश्वशिरा, अश्वशंकु, गगनमूर्धा, स्वर्भानु, अश्व, अश्वपति, घूपवर्वा, अजक, अश्वीग्रीव, सूक्ष्म, तुहुंड़, एकपद, एकचक्र, विरूपाक्ष, महोदर, निचंद्र, निकुंभ, कुजट, कपट, शरभ, शलभ, सूर्य, चंद्र, एकाक्ष, अमृतप, प्रलब, नरक, वातापी, शठ, गविष्ठ, वनायु और दीर्घजिह्व. इनमें जो चंद्र और सूर्य नाम आए हैं वै देवता चंद्र और सूर्य से भिन्न हैं. काष्ठा: अश्व और अन्य खुर वाले पशु. अनिष्टा, गन्धर्व या यक्ष जाति. ये उपदेवता माने जाते हैं जिनका स्थान राक्षसों से ऊपर होता है. ये संगीत के अधिष्ठाता भी माने जाते हैं. गन्धर्व काफी मुक्त स्वाभाव के माने जाते हैं और इस जाति में विवाह से पहले संतान उत्पत्ति आम मानी जाती थी. गन्धर्व विवाह बहुत ही प्रसिद्ध विवाह पद्धति थी जो राक्षसों और यक्षों में बहुत आम थी जिसके लिए कोई कर्मकांड की आवश्यकता नहीं होती थी. प्रसिद्ध गन्धर्वों या यक्षों में कुबेर और चित्रसेन के नाम बहुत प्रसिद्ध है. सुरसा, राक्षस जाति.ये जाति विधान और मैत्री में विश्वास नहीं रखती और चीजों को हड़प करने वाली मानी जाति है. कई लोगों का कहना है की राक्षस जाति की शुरुआत रावण द्वारा की गयी. दैत्य, दानव और राक्षस जातियां एक सी लगती जरुर हैं लेकिन उनमे अंतर था. दैत्य जाति अत्यंत बर्बर और निरंकुश थी. दानव लोग लूटपाट और हत्याएं कर अपना जीवन चलाते थे।। ।।इति।।

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Suresh Pandey May 31, 2020

।।आज ही क्यों नहीं ?।। एक बार की बात है कि एक शिष्य अपने गुरु का बहुत आदर-सम्मान किया करता था |गुरु भी अपने इस शिष्य से बहुत स्नेह करते थे लेकिन वह शिष्य अपने अध्ययन के प्रति आलसी और स्वभाव से दीर्घसूत्री था | सदा स्वाध्याय से दूर भागने की कोशिश करता तथा आज के काम को कल के लिए छोड़ दिया करता था | अब गुरूजी कुछ चिंतित रहने लगे कि कहीं उनका यह शिष्य जीवन-संग्राम में पराजित न हो जाये| आलस्य में व्यक्ति को अकर्मण्य बनाने की पूरी सामर्थ्य होती है | ऐसा व्यक्ति बिना परिश्रम के ही फलोपभोग की कामना करता है| वह शीघ्र निर्णय नहीं ले सकता और यदि ले भी लेता है, तो उसे कार्यान्वित नहीं कर पाता| यहाँ तक कि अपने पर्यावरण के प्रति भी सजग नहीं रहता है और न भाग्य द्वारा प्रदत्त सुअवसरों का लाभ उठाने की कला में ही प्रवीण हो पता है | उन्होंने मन ही मन अपने शिष्य के कल्याण के लिए एक योजना बना ली | एक दिन एक काले पत्थर का एक टुकड़ा उसके हाथ में देते हुए गुरु जी ने कहा –‘मैं तुम्हें यह जादुई पत्थर का टुकड़ा, दो दिन के लिए दे कर, कहीं दूसरे गाँव जा रहा हूँ| जिस भी लोहे की वस्तु को तुम इससे स्पर्श करोगे| वह स्वर्ण में परिवर्तित हो जायेगी| पर याद रहे कि दूसरे दिन सूर्यास्त के पश्चात् मैं इसे तुमसे वापस ले लूँगा|’ शिष्य इस सुअवसर को पाकर बड़ा प्रसन्न हुआ लेकिन आलसी होने के कारण उसने अपना पहला दिन यह कल्पना करते-करते बिता दिया कि जब उसके पास बहुत सारा स्वर्ण होगा तब वह कितना प्रसन्न, सुखी,समृद्ध और संतुष्ट रहेगा| इतने नौकर-चाकर होंगे कि उसे पानी पीने के लिए भी नहीं उठाना पड़ेगा | फिर दूसरे दिन जब वह प्रातःकाल जागा, उसे अच्छी तरह से स्मरण था कि आज स्वर्ण पाने का दूसरा और अंतिम दिन है | उसने मन में पक्का विचार किया कि आज वह गुरूजी द्वारा दिए गये काले पत्थर का लाभ ज़रूर उठाएगा | उसने निश्चय किया कि वो बाज़ार से लोहे के बड़े-बड़े सामान खरीद कर लायेगा और उन्हें स्वर्ण में परिवर्तित कर देगा| दिन बीतता गया, पर वह इसी सोच में बैठा रहा की अभी तो बहुत समय है, कभी भी बाज़ार जाकर सामान लेता आएगा| उसने सोचा कि अब तो दोपहर का भोजन करने के पश्चात् ही सामान लेने निकलूंगा. पर भोजन करने के बाद उसे विश्राम करने की आदत थी , और उसने बजाये उठ के मेहनत करने के थोड़ी देर आराम करना उचित समझा, पर आलस्य से परिपूर्ण उसका शरीर नीद की गहराइयों में खो गया, और जब वो उठा तो सूर्यास्त होने को था| अब वह जल्दी-जल्दी बाज़ार की तरफ भागने लगा, पर रास्ते में ही उसे गुरूजी मिल गए उनको देखते ही वह उनके चरणों पर गिरकर, उस जादुई पत्थर को एक दिन और अपने पास रखने के लिए याचना करने लगा लेकिन गुरूजी नहीं माने और उस शिष्य का धनी होने का सपना चूर-चूर हो गया | पर इस घटना की वजह से शिष्य को एक बहुत बड़ी सीख मिल गयी| उसे अपने आलस्य पर पछतावा होने लगा, वह समझ गया कि आलस्य उसके जीवन के लिए एक अभिशाप है और उसने प्रण किया कि अब वो कभी भी काम से जी नहीं चुराएगा और एक कर्मठ, सजग और सक्रिय व्यक्ति बन कर दिखायेगा| जीवन में हर किसी को एक से बढ़कर एक अवसर मिलते हैं , पर कई लोग इन्हें बस अपने आलस्य के कारण गवां देते हैं| इसलिए मैं यही कहना चाहता हूँ कि यदि आप सफल, सुखी, भाग्यशाली, धनी अथवा महान बनना चाहते हैं तो आलस्य और दीर्घसूत्रता को त्यागकर, अपने अंदर विवेक, कष्टसाध्य श्रम,और सतत् जागरूकता जैसे गुणों को विकसित कीजिये और जब कभी आपके मन में किसी आवश्यक काम को टालने का विचार आये तो स्वयं से एक प्रश्न कीजिये – आज ही क्यों नहीं ? ।।इति।।

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Suresh Pandey May 31, 2020

।।अन्धे बाबा।। आज से लगभग 70 वर्ष पूर्व वृन्दावन में मदनमोहन जी मंदिर के निकट किसी कुटिया में अन्धे बाबा रहते थे ! उनका नाम कोई नहीं जनता था , सब लोग उन्हें मदन टेर के अन्धेबाबा के नाम से पुकारते थे , क्योंकि वे मदन टेर पर ही अधिक रहते थे ! दिनभर राधा कृष्ण की लीलाओं का स्मरण कर हुए आँसू बहाते ! संध्या समय गोविन्द देव जी के मन्दिर में जाकर रो-रो कर उनसे कुछ निवेदन करते हुए चले आते , लोटते समय 2-4 घरो से मधुकरी मांग लेते और खाकर सो जाते ! पर आते-जाते , खाते-पीते हर समय उनके आँसू बहते रहते !!!!! आँसू बहने के कारण वे अपनी दृष्टि खो बेठे थे.... पर इस कारण वे तनिक भी घबराये नहीं , घबराना तो तब होता जब वे इस जगत से कोई सरोकार रखते , जिसका नेत्रों को दर्शन को करते थे... उनके नेत्रों की सार्थकता थी केवल प्रभु दर्शन में. ...जो नेत्र प्रभु का दर्शन नहीं करा सके थे ,उनका ना रहना ही अच्छा था उनके लिए!!!!! पर अब दिन-रात रोते-रोते 40 साल बीत चुके थे..जीवन की संध्या आ पहुँची थी !!!!! अब उनसे रहा ना जाता... विरह वेदना असह्य हो चली थी.. वे कभी-कभी उस वेदना के कारण मूर्छित हो घंटो मदन टेर की झाड़ियो के बीच अचेत पड़े रहते थे!!! उनसे सहानुभूति करने वाला वहाँ कोई न था , केवल वहां के पक्षी मोर , कोकिल आदि अपने कलरव से उनकी चेतना जगाने की चेष्टा किया करते.... एक दिन जब वे मदन टेर पर बेठे रो रहे थे , तो राधा कृष्ण टहलते हुए उधर आ निकले.... बाबा को रोते देख राधा जी ने श्री कृष्ण को कहा..... " प्यारे या बाबा बड़ो रोये है जाकर हँसा दो.... "श्री कृष्ण ने बाबा के पास जाकर कहा.... "बाबा क्यों रो रहे हो.. आप को किसने मारा है.....कोई आपसे कुछ छीन के ले गया है....? " बाबा ने कहा.... " ना , तू जा यहाँ से "श्री कृष्ण ने कहा.. " बाबा आप के लिए कुछ ला दूँ ,रोटी ला दूँ और कुछ कहे सो ला दूँ , तू पर रो मत" बाबा ने कहा... " तू जा ना जाके अपनी गईया चरा , तुझे काह मतलब मुझसे " कृष्ण ने राधाजी से जा कर कहा.... " बाबा तो नहीं मान रहे मुझसे , और बहुत रो रहे है....... "राधे ने कहा......." प्यारे तुम नहीं हँसा सके उनको....अब मैं हँसाती हूँ उनको..... "श्री राधे ने बाबा के पास जाकर कहा.... "बाबा तू क्यों रो रहा है ? तेरा कोई मर गया है क्या.... ? " बाबा हँस दिए और बोले... " लाली मेरा कोई नहीं है...... "तो राधे बोली..... " अच्छा तो , जब तेरा कोई नहीं है तो तू क्यों रो रहा है.... ? "बाबा बोले...... " लाली मैं इसलिए रो रहा हूँ ,क्योंकि जो मेरा है वो मुझे भूल गया है.. "श्री राधे बोली..... "कौन है तेरा बाबा....? " बाबा बोले.... " तू ना जाने ब्रज के छलिया के भजन करते- करते मैं बूढा हो गया और उसने एक झलक भी नही दिखाई....और लाली क्या कहूँ.... . उसके संग से लाली....... राधे भी निष्ठुर हो गयी है... "राधे चौंक पड़ी और बोली....... " मैं-मैं निष्ठुर.... "दूसरे ही पल अपने को छिपाते बोली... "मेरो नाम भी राधे है , तू बता तू का चाहे... "बाबा बोले.. " भोरी तो तू है..... जिस समय वे अपने कर-कमलों से स्पर्श करेंगे...... आँख में ज्योति ना आ जाएगी...... "भोरी लाली से और रहा ना गया..... उसने अपने कर-कमलों से बाबा की एक आँख स्पर्श कर दी.......... उसी समय कान्हा ने भी बाबा की दूसरी आँख स्पर्श कर दी.. स्पर्श करते ही बाबा की आँखों की में ज्योति आ गयी. सामने खड़े राधा कृष्ण के दर्शन कर वे आनंद के कारण मुर्छित हो गए. मुर्छित अवस्था में वे सारी रात वही पड़े रहे..प्रातः काल वृन्दावन परिक्रमा में निकले कुछ लोगो ने उन्हें पहचान लिया. वे उन्हें उसी अवस्था में मदनमोहन जी के मंदिर ले गए...मंदिर के गोस्वामी समझ गए की उनके ऊपर मदनमोहन जी की विशेष कृपा हुई है. उन्होंने उन्हें घेर कर सब के साथ कीर्तन किया.......कीर्तन की ध्वनि कान में पड़ते ही उन्हें धीरे-धीरे चेतना हो आई.. तब गोस्वामी जी उन्हें एकांत में लेकर गए..उनकी सेवा के बाद जब उन्होंने उनसे मूर्छा का कारण पूछा तो..उन्होंने रो-रो कर सारी घटना बता दी..बाबा ने जिस वस्तु की कामना की थी..... वह उन्हें मिल गयी..... फिर भी उनका रोना बंद नहीं हुआ...रोना तो पहले से और भी ज्यादा हो गया... राधा कृष्ण से मिल कर बिछुड़ जाने का दुख उनके ना मिलने से भी कही ज्यादा तकलीफ वाला था..इस दुःख में रोते-रोते वे कुछ दिन के बाद जड़ देह त्याग कर सिद्ध देह से उनसे जा मिले.. !!!! ।।इति।।

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Suresh Pandey May 31, 2020

।। सन्त समर्थ गुरु रामदास।। परम सिद्ध सन्त रामदास जी जब प्रार्थना करते थे तो कभी उनके होंठ नही हिलते थे ! शिष्यों ने पूछा - हम प्रार्थना करते हैं, तो होंठ हिलते हैं। आपके होंठ नहीं हिलते ? आप पत्थर की मूर्ति की तरह खडे़ हो जाते हैं। आप कहते क्या है अन्दर से ? क्योंकि अगर आप अन्दर से भी कुछ कहेंगे, तो होंठो पर थोड़ा कंपन आ ही जाता है। चहेरे पर बोलने का भाव आ जाता है।लेकिन वह भाव भी नहीं आता ! सन्त रामदास जी ने कहा - मैं एक बार राजधानी से गुजरा और राजमहल के सामने द्वार पर मैंने सम्राट को खडे़ देखा, और एक भिखारी को भी खडे़ देखा ! वह भिखारी बस खड़ा था। फटे--चीथडे़ थे शरीर पर। जीर्ण - जर्जर देह थी, जैसे बहुत दिनो से भोजन न मिला हो ! शरीर सूख कर कांटा हो गया। बस आंखें ही दीयों की तरह जगमगा रही थी। बाकी जीवन जैसे सब तरफ से विलीन हो गया हो ! वह कैसे खड़ा था यह भी आश्चर्य था। लगता था अब गिरा -तब गिरा ! सम्राट उससे बोला - बोलो क्या चाहते हो ? उस भिखारी ने कहा - अगर मेरे आपके द्वार पर खडे़ होने से, मेरी मांग का पता नहीं चलता, तो कहने की कोई जरूरत नहीं ! क्या कहना है और ? मै द्वार पर खड़ा हूं, मुझे देख लो। मेरा होना ही मेरी प्रार्थना है। " सन्त रामदास जी ने कहा -उसी दिन से मैंने प्रार्थना बंद कर दी। मैं परमात्मा के द्वार पर खड़ा हूं। वह देख लेगें । मैं क्या कहूं ? अगर मेरी स्थिति कुछ नहीं कह सकती, तो मेरे शब्द क्या कह सकेंगे ? अगर वह मेरी स्थिति नहीं समझ सकते, तो मेरे शब्दों को क्या समझेंगे? अतः भाव व दृढ विश्वास ही सच्ची परमात्मा की याद के लक्षण है यहाँ कुछ मांगना शेष नही रहता ! आपका प्रार्थना में होना ही पर्याप्त है !! ।।इति।।

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Suresh Pandey May 31, 2020

।।जो खोता है, वही तो पाता है।। (भक्ति गाथा) मिलन भक्तों का हो तो भक्ति की सुवास-सुगंध स्वाभाविक ही फैलने लगती है। अपने आप ही भावों में भक्ति का ज्वार उठता है। अनुभवों की एक सर्वथा अनूठी इंद्रधनुषी आभा प्रकट होती है। हिमालय के आँगन में इस समय कुछ ऐसा ही हो रहा था। हिमालय की महिमा से अकेला भारत देश और विश्व वसुंधरा ही नहीं, समूची सृष्टि परिचित और प्रभावित है। समूची सृष्टि के महातपस्वियों एवं रहस्यदर्शियों को हिमालय सहज ही आकर्षित करता है। अब तो पर्वतराज हिमालय का यह आकर्षण और उनकी अतुलनीय महिमा और भी अधिक बढ़ गई थी। भक्तों के इस सम्मिलन और भक्ति के इस सम्मेलन की सुगंध सुदूर लोकों में फैल रही थी। सभी इसमें भागीदार होना चाहते थे। मनुष्य, देवता, उपदेवताओं की कौन कहे, असुरों में लालसा जागने लगी थी कि वे भी भक्ति की इस देवापगा में स्नान करें। हालाँकि यह सब उनकी प्रकति के विपरीत था: क्योंकि असुर तो सदा से शक्ति प्राप्ति के अभिलाषी रहे हैं। इसके लिए उन्होंने बड़े ही कठिन एवं लोमहर्षक पुरुषार्थ किए हैं, लेकिन भक्ति की इस सुगंध ने इनमें से कइयों को असाधारण रूप से परिवर्तित व रूपांतरित कर दिया। ये भी सोचने लगे कि शक्ति में सामर्थ्य है, प्रभाव है, प्रतिष्ठा है, किंतु साथ ही उद्विग्नता है, आवेग है, मानसिक विकलता है। परंतु भक्ति में तो सर्वथा और सर्वदा आह्लाद है, प्रसन्नता है, शांति है, स्थिरता है और अखंड आनंद है। आज अपनी इसी सोच से प्रेरित होकर असुरराज वृषपर्वा इस सम्मेलन में पधारे। वृषपर्वा से सभी परिचित थे। प्रायः सभी को मालूम था कि असुरराज ने दुष्कर तप करके बार-बार भगवान सदाशिव एवं भगवती अंबा से अनेक अमोघ वरदान प्राप्त किए हैं। अपने प्रचंड पराक्रम से उन्होंने अनेक बार देवताओं को परास्त और पराजित किया है। ऐसे महापराक्रमी का अचानक आगमन देखकर वहाँ अनेकों के मन में संदेह उठा। जिस समय वह वहाँ पर पहुँचे, ठीक उसी समय महर्षि अंभृण कह रहे थे- "भक्ति तो खोने की यात्रा है, पर इसकी राह बड़ी मधुपूर्ण है। इसमें फूल ही फूल खिले हैं। क्योंकि भक्ति के मार्ग पर कोई मरुस्थल नहीं है। तुम पैर भर रखो, पहला कदम ही आखिरी कदम बन जाता है। तुम पैर भर बढ़ाओ कि सौंदर्य अपने अनंत रूपों को खोलने लगता है।" यह सुनकर असुरराज वृषपर्वा बरबस कह उठे-"सचमुच ही भक्त बड़भागी है और मैं भी धन्य हो गया इतने सारे भक्तों का दर्शन करके।" अब तो महर्षि अंभृण के साथ सभी महर्षियों की दृष्टि उन पर जा टिकी। उन्होंने भी सभी को सिर नवाकर प्रणाम किया। महर्षियों ने भी उन्हें आशीष दिया, साथ ही उन्हें अपने साथ ही महामंच पर आसीन होने के लिए आमंत्रण दिया। असुरराज ने इस आमंत्रण के लिए उन्हें आभार देते हुए विनम्र भाव से कहा-"मैं आप सभी का आभारी हूँ, जो आपने मुझे स्वीकार किया। आपके संग-सान्निध्य के कुछ पल मुझे धन्य कर देंगे।" असुरराज में यह परिवर्तन सभी को चकित कर रहा था। सभी इसके रहस्य को जानने के लिए उत्सुक हो उठे, पर साथ ही सब को देवर्षि के अगले सूत्र की प्रतीक्षा भी थी। देवर्षि ने सभी की इन भावनाओं को स्वीकार करते हुए कहा- *सुखदुःखेच्छालाभादित्यक्ते काले प्रतीक्ष्यमाणे क्षणार्द्धमपि व्यर्थं न नेयम्॥७७॥ सुखदुःख, इच्छा, लाभ आदि का (पूर्ण) त्याग हो जाए ऐसे काल की बाट देखते हुए आधा क्षण (भजन बिना) व्यर्थ नहीं बिताना चाहिए। देवर्षि के इस सूत्र ने सभी के साथ वृषपर्वा को आनंदित कर दिया। वह विभोर होकर अपनी किन्हीं स्मृतियों में डूब गए। प्रचंड पराक्रमी वृषपर्वा के इस तरह विभोर होने से सभी चकित थे, परंतु उनसे पूछने की पहल महर्षि अंभृण एवं देवर्षि नारद ने एक साथ की। उन्होंने कहा-"राजन्! हम सब आपको अपने साथ इस तरह देखकर कृतार्थ हैं, परंतु साथ ही आपके साथ हुए इस परिवर्तन का कारण जानने के लिए उत्सुक भी हैं।" इसके उत्तर में वृषपर्वा ने कहा-"भगवन्! मुझमें इस तरह परिवर्तन एक भीलकन्या जीवंती के कारण आ सका। आपने अपने इस सूत्र में जिस सत्य की चर्चा की है, वह उसका प्रत्यक्ष स्वरूप थी। वह एक भील कन्या थी। उसके पिता कबीले के सरदार थे। उस भील कन्या में न तो शिक्षा थी और न कोई संस्कार। बस, भावों में भगवान महादेव के प्रति भक्ति थी। किसी समय जब मैं उसके क्षेत्र से अपनी संपूर्ण सेना के साथ गुजर रहा था, तो वहाँ के सभी लोग इतना विशाल सैन्य बल देखकर आतंकित हो उठे। स्वभावतः वह भील कबीला सरदार भी आतंकित हुआ।" "अपने भय व डर से घबराकर वह भील सरदार मेरे पास पहुँचा और बड़े ही अनुनय के स्वरों में बोला-'राजन्! आप समर्थ हैं। आप हम सब पर कृपा करके मेरे कबीले का विनाश न करें। इस उपकार के बदले मैं आपको अपने कबीले का अनूठा रत्न दूंगा।' भील सरदार के इस कथन पर मुझे हँसी आ गई। हँसते हए मैंने कहा-'ऐसा तेरे पास क्या है भील, जो तू मुझे देगा।' उसने कहा-'भगवन्! मेरे पास मेरी पुत्री है, जो सब तरह से आपकी सेवा करेगी।' इस पर मैंने उससे यों ही कह दिया-'अच्छा जा ले आ अपनी पुत्री को।' मेरे इस कथन पर वह अपनी पुत्री को ले आया। सामान्य क्रम में भील कन्याएँ सुंदर नहीं होती, परंतु यह भील कन्या असाधारण सुंदरी थी। अपने कबीले की रक्षा के लिए उसने सहर्ष ही स्वयं को समर्पित कर दिया।" "इस घटना के बाद वह हर तरह से मेरी सेवा करने लगी। सभी तरह की सेवा के बदले उसे किसी तरह की चाह नहीं थी। ऐसी अनूठी सेवा, ऐसा शांत स्वभाव, मन में किसी तरह की कोई इच्छा नहीं। उसके इस विचित्र स्वभाव में मुझे एक अटपटापन लगता। एक रात्रि जब मैं किसी कारणवश जागा तो देखा मेरे पास के कक्ष में प्रकाश है। उत्सुकतावश मैंने वहाँ झाँककर देखा। इस दृश्य ने मुझे सर्वथा और सर्वदा के लिए परिवर्तित कर दिया। मैंने देखा भीलकन्या जीवंती उस कक्ष में एक प्रस्तर के शिवलिंग के सामने बैठी प्रार्थना कर रही है-'हे भोलेनाथ! तुमने जिस स्थिति में मुझे जहाँ रखा है, मैं रह रही हूँ। हे प्रभो! मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है।मुझे यदि किसी से कोई शिकायत है तो बस अपने से। हे प्रभो! शरीर की थकान और मन के प्रमाद से मेरे जीवन के कुछ क्षण आपके स्मरण के बिना बीत जाते हैं। हे सदाशिव! मुझे अपने कष्टों की परवाह नहीं है। सुख-दुःख, इच्छा, लाभ और हानि का मेरे लिए कोई औचित्य और अस्तित्व नहीं है। बस, पीड़ा तब होती है. जब आपका स्मरण नहीं होता।' हे ऋषिगण! उस भीलकन्या की इस प्रार्थना ने मुझे झकझोर दिया। मुझे अपने सुख बोझ लगने लगे, साथ ही इस बात की बेहद पीडा हुई कि मैंने शिवभक्त होते हुए भगवान सदाशिव के इस अनन्य भक्त को पीड़ा पहुँचाई। मैंने उसी क्षण जीवंती से क्षमा माँगी। उसको दासत्व से मुक्त किया। साथ ही उस भीलकन्या से यह ज्ञान पाया कि भक्ति से श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं है। भक्ति का वही आनंद पाने के लिए मैं आप सबकी शरण में आया हूँ।" ।।इति।।

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Suresh Pandey May 31, 2020

।।कालिदास एवं भगवती सरस्वती।। कालिदास बोले :- माते पानी पिला दीजिए बङा पुण्य होगा. स्त्री बोली :- बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं. अपना परिचय दो। मैं अवश्य पानी पिला दूंगी। कालीदास ने कहा :- मैं पथिक हूँ, कृपया पानी पिला दें। स्त्री बोली :- तुम पथिक कैसे हो सकते हो, पथिक तो केवल दो ही हैं सूर्य व चन्द्रमा, जो कभी रुकते नहीं हमेशा चलते रहते। तुम इनमें से कौन हो सत्य बताओ। कालिदास ने कहा :- मैं मेहमान हूँ, कृपया पानी पिला दें। स्त्री बोली :- तुम मेहमान कैसे हो सकते हो ? संसार में दो ही मेहमान हैं। पहला धन और दूसरा यौवन। इन्हें जाने में समय नहीं लगता। सत्य बताओ कौन हो तुम ? (अब तक के सारे तर्क से पराजित हताश तो हो ही चुके थे) कालिदास बोले :- मैं सहनशील हूं। अब आप पानी पिला दें। स्त्री ने कहा :- नहीं, सहनशील तो दो ही हैं। पहली, धरती जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है। उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है, दूसरे पेड़ जिनको पत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं। तुम सहनशील नहीं। सच बताओ तुम कौन हो ? (कालिदास लगभग मूर्च्छा की स्थिति में आ गए और तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले) कालिदास बोले :- मैं हठी हूँ । स्त्री बोली :- फिर असत्य. हठी तो दो ही हैं- पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं। सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप ? (पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके थे) कालिदास ने कहा :- फिर तो मैं मूर्ख ही हूँ । स्त्री ने कहा :- नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो। मूर्ख दो ही हैं। पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है, और दूसरा दरबारी जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है। (कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे) वृद्धा ने कहा :- उठो वत्स ! (आवाज़ सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां खड़ी थी, कालिदास पुनः नतमस्तक हो गए) माता ने कहा :- शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार । तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग करना पड़ा। कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े। शिक्षा :- विद्वत्ता पर कभी घमण्ड न करें, यही घमण्ड विद्वत्ता को नष्ट कर देता है। दो चीजों को कभी व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए..... अन्न के कण को "और" आनंद के क्षण को। ।।इति।।

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