SUNIL KUMAR SHARMA Sep 1, 2019

बहुत साल पहले की बात है। एक आलसी लेकिन भोलाभाला युवक था आनंद। दिन भर कोई काम नहीं करता बस खाता ही रहता और सोए रहता। घर वालों ने कहा चलो जाओ निकलो घर से, कोई काम धाम करते नहीं हो बस पड़े रहते हो। वह घर से निकल कर यूं ही भटकते हुए एक आश्रम पहुंचा। वहां उसने देखा कि एक गुरुजी हैं उनके शिष्य कोई काम नहीं करते बस मंदिर की पूजा करते हैं। उसने मन में सोचा यह बढिया है कोई काम धाम नहीं बस पूजा ही तो करना है। गुरुजी के पास जाकर पूछा, क्या मैं यहां रह सकता हूं, गुरुजी बोले हां, हां क्यों नहीं?  लेकिन मैं कोई काम नहीं कर सकता हूं  गुरुजी : कोई काम नहीं करना है बस पूजा करना होगी  आनंद : ठीक है वह तो मैं कर लूंगा ...  अब आनंद महाराज आश्रम में रहने लगे। ना कोई काम ना कोई धाम बस सारा दिन खाते रहो और प्रभु मक्ति में भजन गाते रहो।  महीना भर हो गया फिर एक दिन आई एकादशी। उसने रसोई में जाकर देखा खाने की कोई तैयारी नहीं। उसने गुरुजी से पूछा आज खाना नहीं बनेगा क्या  गुरुजी ने कहा नहीं आज तो एकादशी है तुम्हारा भी उपवास है ।  उसने कहा नहीं अगर हमने उपवास कर लिया तो कल का दिन ही नहीं देख पाएंगे हम तो .... हम नहीं कर सकते उपवास... हमें तो भूख लगती है आपने पहले क्यों नहीं बताया?  गुरुजी ने कहा ठीक है तुम ना करो उपवास, पर खाना भी तुम्हारे लिए कोई और नहीं बनाएगा तुम खुद बना लो।  मरता क्या न करता  गया रसोई में, गुरुजी फिर आए ''देखो अगर तुम खाना बना लो तो राम जी को भोग जरूर लगा लेना और नदी के उस पार जाकर बना लो रसोई।   ठीक है, लकड़ी, आटा, तेल, घी, सब्जी लेकर आंनद महाराज चले गए, जैसा तैसा खाना भी बनाया, खाने लगा तो याद आया गुरुजी ने कहा था कि राम जी को भोग लगाना है।   लगा भजन गाने  आओ मेरे राम जी , भोग लगाओ जी  प्रभु राम आइए, श्रीराम आइए मेरे भोजन का भोग लगाइए.....  कोई ना आया, तो बैचैन हो गया कि यहां तो भूख लग रही है और राम जी आ ही नहीं रहे। भोला मानस जानता नहीं था कि प्रभु साक्षात तो आएंगे नहीं । पर गुरुजी की बात मानना जरूरी है। फिर उसने कहा , देखो प्रभु राम जी, मैं समझ गया कि आप क्यों नहीं आ रहे हैं। मैंने रूखा सूखा बनाया है और आपको तर माल खाने की आदत है इसलिए नहीं आ रहे हैं.... तो सुनो प्रभु ... आज वहां भी कुछ नहीं बना है, सबको एकादशी है, खाना हो तो यह भोग ही खालो... श्रीराम अपने भक्त की सरलता पर बड़े मुस्कुराए और माता सीता के साथ प्रकट हो गए। भक्त असमंजस में। गुरुजी ने तो कहा था कि राम जी आएंगे पर यहां तो माता सीता भी आईं है और मैंने तो भोजन बस दो लोगों का बनाया हैं। चलो कोई बात नहीं आज इन्हें ही खिला देते हैं।  बोला प्रभु मैं भूखा रह गया लेकिन मुझे आप दोनों को देखकर बड़ा अच्छा लग रहा है लेकिन अगली एकादशी पर ऐसा न करना पहले बता देना कि कितने जन आ रहे हो, और हां थोड़ा जल्दी आ जाना। राम जी उसकी बात पर बड़े मुदित हुए। प्रसाद ग्रहण कर के चले गए। अगली एकादशी तक यह भोला मानस सब भूल गया। उसे लगा प्रभु ऐसे ही आते होंगे और प्रसाद ग्रहण करते होंगे।  फिर एकादशी आई। गुरुजी से कहा, मैं चला अपना खाना बनाने पर गुरुजी थोड़ा ज्यादा अनाज लगेगा, वहां दो लोग आते हैं। गुरुजी मुस्कुराए, भूख के मारे बावला है। ठीक है ले जा और अनाज लेजा।  अबकी बार उसने तीन लोगों का खाना बनाया। फिर गुहार लगाई  प्रभु राम आइए, सीताराम आइए, मेरे भोजन का भोग लगाइए...  प्रभु की महिमा भी निराली है। भक्त के साथ कौतुक करने में उन्हें भी बड़ा मजा आता है। इस बार वे अपने भाई लक्ष्मण, भरत शत्रुघ्न और हनुमान जी को लेकर आ गए। भक्त को चक्कर आ गए। यह क्या हुआ। एक का भोजन बनाया तो दो आए आज दो का खाना ज्यादा बनाया तो पूरा खानदान आ गया। लगता है आज भी भूखा ही रहना पड़ेगा। सबको भोजन लगाया और बैठे-बैठे देखता रहा। अनजाने ही उसकी भी एकादशी हो गई।  फिर अगली एकादशी आने से पहले गुरुजी से कहा, गुरुजी, ये आपके प्रभु राम जी, अकेले क्यों नहीं आते हर बार कितने सारे लोग ले आते हैं? इस बार अनाज ज्यादा देना। गुरुजी को लगा, कहीं यह अनाज बेचता तो नहीं है देखना पड़ेगा जाकर। भंडार में कहा इसे जितना अनाज चाहिए देदो और छुपकर उसे देखने चल पड़े।  इस बार आनंद ने सोचा, खाना पहले नहीं बनाऊंगा, पता नहीं कितने लोग आ जाएं। पहले बुला लेता हूं फिर बनाता हूं।   फिर टेर लगाई प्रभु राम आइए , श्री राम आइए, मेरे भोजन का भोग लगाइए...  सारा राम दरबार मौजूद... इस बार तो हनुमान जी भी साथ आए लेकिन यह क्या प्रसाद तो तैयार ही नहीं है। भक्त ठहरा भोला भाला, बोला प्रभु इस बार मैंने खाना नहीं बनाया, प्रभु ने पूछा क्यों? बोला, मुझे मिलेगा तो है नहीं फिर क्या फायदा बनाने का, आप ही बना लो और खुद ही खा लो....  राम जी मुस्कुराए, सीता माता भी गदगद हो गई उसके मासूम जवाब से... लक्ष्मण जी बोले क्या करें प्रभु...  प्रभु बोले भक्त की इच्छा है पूरी तो करनी पड़ेगी। चलो लग जाओ काम से। लक्ष्मण जी ने लकड़ी उठाई, माता सीता आटा सानने लगीं। भक्त एक तरफ बैठकर देखता रहा। माता सीता रसोई बना रही थी तो कई ऋषि-मुनि, यक्ष, गंधर्व प्रसाद लेने आने लगे। इधर गुरुजी ने देखा खाना तो बना नहीं भक्त एक कोने में बैठा है। पूछा बेटा क्या बात है खाना क्यों नहीं बनाया?  बोला, अच्छा किया गुरुजी आप आ गए देखिए कितने लोग आते हैं प्रभु के साथ.....   गुरुजी बोले, मुझे तो कुछ नहीं दिख रहा तुम्हारे और अनाज के सिवा भक्त ने माथा पकड़ लिया, एक तो इतनी मेहनत करवाते हैं प्रभु, भूखा भी रखते हैं और ऊपर से गुरुजी को दिख भी नहीं रहे यह और बड़ी मुसीबत है।  प्रभु से कहा, आप गुरुजी को क्यों नहीं दिख रहे हैं?  प्रभु बोले : मैं उन्हें नहीं दिख सकता।  बोला : क्यों , वे तो बड़े पंडित हैं, ज्ञानी हैं विद्वान हैं उन्हें तो बहुत कुछ आता है उनको क्यों नहीं दिखते आप?  प्रभु बोले , माना कि उनको सब आता है पर वे सरल नहीं हैं तुम्हारी तरह। इसलिए उनको नहीं दिख सकता....   आनंद ने गुरुजी से कहा, गुरुजी प्रभु कह रहे हैं आप सरल नहीं है इसलिए आपको नहीं दिखेंगे, गुरुजी रोने लगे वाकई मैंने सबकुछ पाया पर सरलता नहीं पा सका तुम्हारी तरह, और प्रभु तो मन की सरलता से ही मिलते हैं।    प्रभु प्रकट हो गए और गुरुजी को भी दर्शन दिए। इस तरह एक भक्त के कहने पर प्रभु ने रसोई भी बनाई।  जय जय श्री राम 👏👏👏

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SUNIL KUMAR SHARMA Aug 26, 2019

एक लड़की थी जो कृष्ण जी की अनन्य भक्त थी। बचपन से ही कृष्ण भगवान का भजन करती थी। भक्ति करती थी, भक्ति करते-करते बड़ी हो गई, भगवान की कृपा से उसका विवाह भी श्री धाम वृंदावन में किसी अच्छे घर में हो गया। विवाह होकर पहली बार वृंदावन गई, पर नई दुल्हन होने से कहीं  जा न सकी, और मायके चली गई। और वह दिन भी आया जब उसका पति उसे लेने उसके मायके आया, अपने पति के साथ फिर वृंदावन पहुंच गई।  पहुंचते पहुंचते उसे शाम हो गई, पति वृंदावन में यमुना किनारे रूककर कहने लगा देखो! शाम का समय है मैं  यमुना जी में स्नान करके अभी आता हूं। तुम इस पेड़ के नीचे बैठ जाओ और सामान की देखरेख करना मैं  थोड़े ही समय में आ जाऊंगा यही सामने ही हूं, कुछ लगे तो मुझे आवाज दे देना, इतना कहकर पति चला गया और वह लडकी बैठ गई। अब एक हाथ लंबा घूंघट निकाल रखा है, क्योकि गांव है,ससुराल है और वहीं बैठ गई, मन ही मन विचार करने लगी। कि देखो! ठाकुर जी की कितनी कृपा है उन्हें मैंने बचपन से भजा और उनकी कृपा से मेरा विवाह भी श्री धाम वृंदावन में हो गया। मैं इतने वर्षों से ठाकुर जी को मानती हूं परन्तु अब तक उनसे कोई रिश्ता नहीं जोड़ा? फिर सोचती है ठाकुर जी की उम्र क्या होगी? लगभग 16 वर्ष के होंगे, मेरे पति 20 वर्ष के हैं उनसे थोड़े से छोटे हैं, इसलिए मेरे पति के छोटे भाई की तरह हुए, और मेरे देवर की तरह, तो आज से ठाकुर जी मेरे देवर हुए, अब तो ठाकुर जी से नया सम्बन्ध जोड़कर बड़ी प्रसन्न हुई और मन ही मन ठाकुर जी से कहने लगी। देखो ठाकुर जी ! आज से मै तुम्हारी भाभी और तुम मेरे देवर हो गए, अब वो समय आएगा जब तुम मुझे भाभी-भाभी कहकर पुकारोगे। इतना सोच ही रही थी तभी एक 10-15 वर्ष का बालक आया और उस लडकी से बोला - भाभी-भाभी ! लडकी अचानक अपने भाव से बाहर आई और सोचने लगी वृंदावन में तो मै नई हूं ये भाभी कहकर कौन बुला रहा है।  नई थी इसलिए घूंघट उठकर नहीं देखा कि गांव के किसी बड़े-बूढ़े ने देख लिया तो बड़ी बदनामी होगी। अब वह बालक बार-बार कहता पर वह उत्तर न देती बालक पास आया और बोला। भाभी! तनिक अपना चेहरा तो दिखाय दे। अब वह सोचने लगी अरे ये बालक तो बड़ी जिद कर रहा है इसलिए कस के घूंघट पकड़कर बैठ गई कि कही घूंघट उठकर देखन ले, लेकिन उस बालक ने जबरजस्ती घूंघट उठकर चेहरा देखा और भाग गया। थोड़ी देर में उसका पति आ गया, उसने सारी बात अपने पति से कही।  पति ने कहा - तुमने मुझे आवाज क्यों नहीं दी ? लड़की बोली - वह तो इतने में भाग ही गया था। पति बोला - चिंता मत करो, वृंदावन बहुत बड़ा थोड़े ही है। कभी किसी गली में खेलता मिल गया तो हड्डी पसली एक कर दूंगा फिर कभी ऐसा नहीं कर सकेगा। तुम्हे जहां भी दिखे, मुझे जरुर बताना। फिर दोनों घर गए, कुछ दिन बाद उसकी सास ने अपने बेटे से कहा- बेटा! देख तेरा विवाह हो गया, बहू मायके से भी आ गई। पर तुम दोनों अभी तक बांके बिहारी जी के दर्शन के लिए नहीं गए कल जाकर बहू को दर्शन कराकर लाना। अब अगले दिन दोनों पति पत्नी ठाकुर जी के दर्शन के लिए मंदिर जाते है मंदिर में बहुत भीड़ थी। लड़का कहने लगा - देखो! तुम स्त्रियों के साथ आगे जाकर दर्शन करो, में भी आता हूं अब वह आगे गई पर घूंघट नहीं उठाती उसे डर लगता कोई बड़ा बुढा देखेगा तो कहेगा नई बहू घूंघट के बिना घूम रही है। बहूत देर हो गई पीछे से पति ने आकर कहा - अरी बाबली ! बिहारी जी सामने है, घूं घट काहे नाय खोले,घूंघट नाय खोलेगी तो दर्शन कैसे करेगी। अब उसने अपना घूंघट उठाया और जो बांके बिहारी जी की ओर देखा तो बांके बिहारी जी कि जगह वही बालक मुस्कुराता हुआ दिखा तो एकदम से चिल्लाने लगी - सुनिये जल्दी आओ! जल्दी आओ ! पति पीछे से भागा-भागा आया बोला क्या हुआ? लड़की बोली - उस दिन जो मुझे भाभी-भाभी कहकर भागा था वह बालक मिल गया।  पति ने कहा - कहां है ,अभी उसे देखता हूं? तो ठाकुर जी की ओर इशारा करके बोली- ये रहा, आपके सामने ही तो है। उसके पति ने जो देखा तो अवाक्   रह गया और बोला तुम धन्य हो वास्तव में तुम्हारे ह्रदय में सच्चा भाव ठाकुर जी के प्रति है। मै इतने वर्षों से वृंदावन मै हूं मुझे आज तक उनके दर्शन नहीं हुए और तेरा भाव इतना उच्च है कि बिहारी जी के तुझे दर्शन हुए!! जय श्री राधे कृष्णा 👏👏👏👏

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SUNIL KUMAR SHARMA Aug 24, 2019

🙏 भगवान कृष्ण के 108 नाम 🙏 1 अचला : भगवान। 2 अच्युत : अचूक प्रभु, या जिसने कभी भूल ना की हो। 3 अद्भुतह : अद्भुत प्रभु। 4 आदिदेव : देवताओं के स्वामी। 5 अदित्या : देवी अदिति के पुत्र। 6 अजंमा : जिनकी शक्ति असीम और अनंत हो। 7 अजया : जीवन और मृत्यु के विजेता। 8 अक्षरा : अविनाशी प्रभु। 9 अम्रुत : अमृत जैसा स्वरूप वाले। 10 अनादिह : सर्वप्रथम हैं जो। 11 आनंद सागर : कृपा करने वाले 12 अनंता : अंतहीन देव 13 अनंतजित : हमेशा विजयी होने वाले। 14 अनया : जिनका कोई स्वामी न हो। 15 अनिरुध्दा : जिनका अवरोध न किया जा सके। 16 अपराजीत : जिन्हें हराया न जा सके। 17 अव्युक्ता : माणभ की तरह स्पष्ट। 18 बालगोपाल : भगवान कृष्ण का बाल रूप। 19 बलि : सर्व शक्तिमान। 20 चतुर्भुज : चार भुजाओं वाले प्रभु। 21 दानवेंद्रो : वरदान देने वाले। 22 दयालु : करुणा के भंडार। 23 दयानिधि : सब पर दया करने वाले। 24 देवाधिदेव : देवों के देव 25 देवकीनंदन : देवकी के लाल (पुत्र)। 26 देवेश : ईश्वरों के भी ईश्वर 27 धर्माध्यक्ष : धर्म के स्वामी 28 द्वारकाधीश : द्वारका के अधिपति। 29 गोपाल : ग्वालों के साथ खेलने वाले। 30 गोपालप्रिया : ग्वालों के प्रिय 31 गोविंदा : गाय, प्रकृति, भूमि को चाहने वाले। 32 ज्ञानेश्वर : ज्ञान के भगवान 33 हरि : प्रकृति के देवता। 34 हिरंयगर्भा : सबसे शक्तिशाली प्रजापति। 35 ऋषिकेश : सभी इंद्रियों के दाता। 36 जगद्गुरु : ब्रह्मांड के गुरु 37 जगदिशा : सभी के रक्षक 38 जगन्नाथ : ब्रह्मांड के ईश्वर। 39 जनार्धना : सभी को वरदान देने वाले। 40 जयंतह : सभी दुश्मनों को पराजित करने वाले। 41 ज्योतिरादित्या : जिनमें सूर्य की चमक है। 42 कमलनाथ : देवी लक्ष्मी की प्रभु 43 कमलनयन : जिनके कमल के समान नेत्र हैं। 44 कामसांतक : कंस का वध करने वाले। 45 कंजलोचन : जिनके कमल के समान नेत्र हैं। 46 केशव : 47 कृष्ण : सांवले रंग वाले। 48 लक्ष्मीकांत : देवी लक्ष्मी की प्रभु। 49 लोकाध्यक्ष : तीनों लोक के स्वामी। 50 मदन : प्रेम के प्रतीक। 51 माधव : ज्ञान के भंडार। 52 मधुसूदन : मधु- दानवों का वध करने वाले। 53 महेंद्र : इन्द्र के स्वामी। 54 मनमोहन : सबका मन मोह लेने वाले। 55 मनोहर : बहुत ही सुंदर रूप रंग वाले प्रभु। 56 मयूर : मुकुट पर मोर- पंख धारण करने वाले भगवान। 57 मोहन : सभी को आकर्षित करने वाले। 58 मुरली : बांसुरी बजाने वाले प्रभु। 59 मुरलीधर : मुरली धारण करने वाले। 60 मुरलीमनोहर : मुरली बजाकर मोहने वाले। 61 नंद्गोपाल : नंद बाबा के पुत्र। 62 नारायन : सबको शरण में लेने वाले। 63 निरंजन : सर्वोत्तम। 64 निर्गुण : जिनमें कोई अवगुण नहीं। 65 पद्महस्ता : जिनके कमल की तरह हाथ हैं। 66 पद्मनाभ : जिनकी कमल के आकार की नाभि हो। 67 परब्रह्मन : परम सत्य। 68 परमात्मा : सभी प्राणियों के प्रभु। 69 परमपुरुष : श्रेष्ठ व्यक्तित्व वाले। 70 पार्थसार्थी : अर्जुन के सारथी। 71 प्रजापती : सभी प्राणियों के नाथ। 72 पुंण्य : निर्मल व्यक्तित्व। 73 पुर्शोत्तम : उत्तम पुरुष। 74 रविलोचन : सूर्य जिनका नेत्र है। 75 सहस्राकाश : हजार आंख वाले प्रभु। 76 सहस्रजित : हजारों को जीतने वाले। 77 सहस्रपात : जिनके हजारों पैर हों। 78 साक्षी : समस्त देवों के गवाह। 79 सनातन : जिनका कभी अंत न हो। 80 सर्वजन : सब- कुछ जानने वाले। 81 सर्वपालक : सभी का पालन करने वाले। 82 सर्वेश्वर : समस्त देवों से ऊंचे। 83 सत्यवचन : सत्य कहने वाले। 84 सत्यव्त : श्रेष्ठ व्यक्तित्व वाले देव। 85 शंतह : शांत भाव वाले। 86 श्रेष्ट : महान। 87 श्रीकांत : अद्भुत सौंदर्य के स्वामी। 88 श्याम : जिनका रंग सांवला हो। 89 श्यामसुंदर : सांवले रंग में भी सुंदर दिखने वाले। 90 सुदर्शन : रूपवान। 91 सुमेध : सर्वज्ञानी। 92 सुरेशम : सभी जीव- जंतुओं के देव। 93 स्वर्गपति : स्वर्ग के राजा। 94 त्रिविक्रमा : तीनों लोकों के विजेता 95 उपेंद्र : इन्द्र के भाई। 96 वैकुंठनाथ : स्वर्ग के रहने वाले। 97 वर्धमानह : जिनका कोई आकार न हो। 98 वासुदेव : सभी जगह विद्यमान रहने वाले। 99 विष्णु : भगवान विष्णु के स्वरूप। 100 विश्वदक्शिनह : निपुण और कुशल। 101 विश्वकर्मा : ब्रह्मांड के निर्माता 102 विश्वमूर्ति : पूरे ब्रह्मांड का रूप। 103 विश्वरुपा : ब्रह्मांड- हित के लिए रूप धारण करने वाले। 104 विश्वात्मा : ब्रह्मांड की आत्मा। 105 वृषपर्व : धर्म के भगवान। 106 यदवेंद्रा : यादव वंश के मुखिया। 107 योगि : प्रमुख गुरु। 108 योगिनाम्पति : योगियों के स्वामी। 🙏सभी को जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं🙏🙏 🙏🌺🌺जय जय श्री कृष्णा🌺🌺🙏

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