Suchitra Singh Jan 17, 2020

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Suchitra Singh Jan 16, 2020

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Suchitra Singh Jan 15, 2020

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Suchitra Singh Jan 9, 2020

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Suchitra Singh Jan 9, 2020

।।हिन्दी मुरली सार।। _*“मीठे बच्चे - यह अनादि बना-बनाया ड्रामा है, यह बहुत अच्छा बना हुआ है, इसके पास्ट, प्रेजन्ट और फ्युचर को तुम बच्चे अच्छी तरह जानते हो''*_ _*प्रश्नः-*_ किस कशिश के आधार पर सभी आत्मायें तुम्हारे पास खींचती हुई आयेंगी? _*उत्तर:-*_ पवित्रता और योग की कशिश के आधार पर। इसी से ही तुम्हारी वृद्धि होती जायेगी। आगे चलकर बाप को फट से जान जायेंगे। देखेंगे इतने ढेर सब वर्सा ले रहे हैं तो बहुत आयेंगे। जितनी देरी होगी उतनी तुम्हारे में कशिश होती जायेगी। *_धारणा:-_* योग ही सेफ्टी के लिए ढाल है इसलिए योगबल जमा करना है। देही-अभिमानी बनने की पूरी कोशिश करनी है। _*वरदान:-*_ हर संकल्प, बोल और कर्म को फलदायक बनाने वाले रूहानी प्रभावशाली भव जब भी किसी के सम्पर्क में आते हो तो उनके प्रति मन की भावना स्नेह, सहयोग और कल्याण की प्रभावशाली हो। हर बोल किसी को हिम्मत उल्लास देने के प्रभावशाली हों। साधारण बात-चीत में समय न चला जाए। ऐसे ही हर कर्म फलदायक हो-चाहे स्व के प्रति, चाहे दूसरों के प्रति। आपस में भी हर रूप में प्रभावशाली बनो। सेवा में रूहानी प्रभावशाली बनो तब बाप को प्रत्यक्ष करने के निमित्त बन सकेंगे।

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Suchitra Singh Jan 7, 2020

*🚩धर्म सत्संग:-आध्यात्म 🚩* *🚩आध्यात्म क्या है और कैसे उंसके माध्यम से परमसुख की प्राप्ति हो* *🚩आध्यात्म को पूजा, पाठ, मंदिर आरती आदि कर्मकांडों तक यदि सीमित कर देंगे तो वो हमारी नादानी होगी...क्योंकि विभिन्न कर्मकांड तो मात्र आध्यात्म के अंश हैं...विभिन्न कर्मकांड करने में जो भाव चाहिए, कर्मकांड ही नहीं अपितु हर कर्म के करने में जो भाव चाहिए वो हमें समझना चाहिए* *🚩ईश्वर पे अपने कर्मों पे विश्वास कीजिये और हर कर्म - फल की इच्छा के बिना कीजिये..क्योंकि फल की इच्छा से किया गया कर्म आपको सम्भवतः इच्चित फल तो देगा लेकिन वो फल नश्वर ही हॉगा* *🚩जीवन का ध्येय बनाइये, जीवन को ओर खुदको समझिये, अपने लक्ष्य के लिए संकल्पित होकर धर्म मार्ग पर चलिय आपको उस लक्ष्य की प्राप्ति अवश्य होगी...* *🚩आजकल लोग परेशान हैं कि जीवन मे इतनी पूजा पाठ, इतना ईश्वर का ध्यान किया मगर परेशानियां फिर भी लगी रहती है, तो समझना होगा कि हर समस्या हमारे ही कर्मों का फल होता है...यदि हम धर्म मार्ग पर चलकर आध्यत्मिक दृष्टिकोण के साथ कर्म करेंगे तो कोई अकर्म अथवा कुकर्म हॉगा नहीं ओर फिर दुख/परेशानी आस पास भी नहीं आएंगी*

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Suchitra Singh Jan 6, 2020

शिव सबका अधिष्ठान होने के कारण यह तुरीय तत्त्व 'शिव' नाम से कहा जाता है। उसी शिव तत्त्व से “मैं एक हूँ, बहुत हो जाऊँ' यह संकल्प होने पर सृष्टि की उत्पत्ति होती चली जाती है। यह शिव-तत्त्व कांति पूर्ण है। चित्त को ऐसा अपनी ओर आकृष्ट करता है कि वहाँ से हटने ही नहीं देता, वही सारे रूपों को धारण करनेवाला है। उससे अलग होकर कोई चीज रह नहीं सकती। वह मंगलमय कल्याण स्वरूप होने से शिव है। उसमें सारा द्वैत उपशांत है। जब तक द्वैत है शिव नहीं और जब शिव है तो फिर द्वैत नहीं। अत: अद्वैत है। केवल समझाने के लिए उसे आत्मा का चौथा चरण कहते हैं। आत्मा परम आनंद है, द्वैत ही उसे रोके रखता है, जिसके कारण दु:ख है, अशांति है। जब द्वैत नहीं रहा, तब आनंद पूरी तरह स्फुट हो जाता है। यही शिव का स्वरूप है। ओंकार में समाहित रहनेवाले को कहीं भी भय नहीं रहता, इसमें तृप्ति की, एकता-अखंडता की सुवास है और प्राणों को रूपांतरित करने की अद्भुत शक्ति। जब तक जीवन है, तब तक पदार्थों का सर्वथा अभाव नहीं हो सकता। परंतु जो पदार्थों को शिव रूप से देखता है, वह जीवन मुक्त हो जाता है। यह ज्ञान शिव का तीसरा नेत्र है। आँखों से पदार्थ दिखते हैं, किंतु ज्ञान-नेत्र से उनकी शिव-रूपता स्पष्ट हो जाती है। शिव ही उपादान शक्ति से जगत्‌ रूप बना है और निमित्त शक्ति से जीव बना है। अत: जीव-जगत्‌, शिव और शक्ति से अभिन्न है। ब्रह्म और माया, शिव-शक्ति दो नहीं । संसार की तरफ व्यवहार करनेवाली दृष्टि 'शक्ति' है तो परमात्मा की दृष्टि 'शिव' है। जैसे एक सिक्के के दो पहलू। यह दोनों दृष्टियाँ ओंकार से सिद्ध होती हैं। वेदांत में हम द्वैत और अद्वैत रूप से एक ही तत्त्व को जानते हैं। अज्ञान काल में उसे द्वैत रूप से और ज्ञान काल में अद्वैत रूप से जानते हैं। इस अभेद का अनुभव हमें स्वप्न करा देता है। स्वप्न का जगत्‌ हमारी ही उपादान शक्ति से बनता है एवं स्वप्न के जीव हमारी ही चेतन शक्ति की अभिव्यक्ति है। उसी प्रकार यह विश्व शिव की अभिव्यक्ति है । इस सत्य का स्मरण हमें तुरीय की ओर ले जानेवाला चरण बन जाता है। 'शिव' निर्भय ब्रह्मपद है, अद्वैत है। उसके अंदर और अपने अंदर वास्तविक द्वितीयता दूसरापन नहीं है। अंतकरण में जो चैतन्य का प्रतिबिंब पड़ा, वही तो “मैं” चैतन्य को देख रहा है। जैसे दर्पण में अपना मुख दिखा तो लगता है प्रतिबिंब मेरा मुख देख रहा है। इसी प्रकार विवेक करने पर ज्ञात होता है कि हम कुछ हैं ही नहीं, परमात्मा हमारे अंदर स्वयं को देख रहा है। बिंब ही सच्चा है, प्रतिबिंब कुछ नहीं। अहंकार के चलते इस सत्य को समझ नहीं पाते। अहंकार सारे अज्ञान की जड़ है। राग-द्वेष के कारण 'मैं' पैदा होते ही सारे अनर्थ अपने आप जुड़ते चले जाते हैं। धैर्य-पूर्वक जो जीव व शिव के सत्य को समझ लेता है, फिर उसका अपना कुछ नहीं रहता--जैसे बूँद समुद्र में मिल जाती है, वैसे ही वह परमात्मा में मिल जाता है। वह उपासक परमात्मा के द्वारा परमात्मा में प्रवेश कर जाता है। उसके लिए साधन भी परमात्मा है, साध्य भी परमात्मा है और साधक भी परमात्मा ही है। इसलिए श्रुति कहती है। *शिव: अद्वैत:* ' वही शिव है, वही अद्वैत है । ।

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