sn vyas May 14, 2021

🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩 *की प्रस्तुति* 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 *🌹 "अक्षय तृतीया" पर विशेष 🌹* 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘️ *सनातन धर्म इतना दिव्य एवं अलौकिक है कि इसका प्रत्येक दिन विशेष है | यहां प्रतिदिन कोई न कोई पर्व एवं त्योहार मनाया जाता रहता है , परंतु कुछ विशेष तिथियां होती हैं जो स्वयं में महत्वपूर्ण होती है | इन्हीं महत्वपूर्ण तिथियों में एक है वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया | वैसे तो प्रत्येक माह की शुक्ल पक्षीय तृतीया विशेष होती है परंतु बैशाख शक्लपक्ष की तृतीया अति विशिष्ट है जिसे "अक्षय तृतीया" के नाम से जाना जाता है | अक्षय तृतीया के दिन ही इस सृष्टि का प्रादुर्भाव हुआ एवं सतयुग प्रारंभ हुआ था , त्रेता युग का प्रारंभ भी अक्षय तृतीया से ही हुआ था | यह तिथि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अक्षय तृतीया के दिन ही भगवान विष्णु ने नरनारायण , हयग्रीव एवं परशुराम का अवतार धारण किया था | आज के ही दिन प्रसिद्ध तीर्थ बद्रीनारायण के कपाट खोले जाते हैं तथा वृंदावन में स्थित श्री बांके बिहारी जी के मंदिर में आज ही के दिन स्थापित विग्रह के चरण दर्शन होते हैं अन्यथा पूरे वर्ष बांके बिहारी के चरण वस्त्रों से ढंके रहते हैं | जहां सतयुग एवं त्रेतायुग का प्रारंभ अक्षय तृतीया को हुआ था वही द्वापर युग का समापन अक्षय तृतीया को ही हुआ | पुराणों में इस तिथि का विशेष महत्त्व है | अक्षय का अर्थ होता है जो कभी छय ना हो अर्थात जिसका कभी विनाश ना हो | आज के दिन किए गए कर्म , दान पुण्य अक्षय हो जाते हैं | हमारे शास्त्रों में लिखा है कि :- "अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुतं न दत्तं। तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया ! उद्दिष्य दैवतपितृन्क्रियते मनुष्यैः! तत् च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव !! अर्थात आज के दिन क्या हुआ दान - पुण्य एवं सत्कर्म जन्म जन्मांतर के लिए अक्षय हो जाता है इसलिए आज के दिन समस्त मानव समाज को सत्कर्म करते हुए अपने कर्मों को अक्षय बनाने का प्रयास करना चाहिए |* *आज समस्त भारत देश में अक्षय तृतीया एवं भगवान परशुराम की जयंती बड़े धूमधाम से मनाई जा रही है | इस विशेष तिथि के विषय में हमारे पुराणों में बृहद वर्णन प्राप्त होता है | आज के दिन भगवान विष्णु का पूजन विशेष महत्व रखता है | आज के दिन जो वस्तुएं दान की जाती है वे समस्त वस्तुएं अगले जन्म में मनुष्य को प्राप्त होती हैं ऐसी हमारी मान्यता है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" बताना चाहूंगा कि जैसी मान्यता है कि भगवान विष्णु को अक्षत नहीं अर्पित करना चाहिए परंतु आज का दिन ऐसा विशेष है कि आज के दिन भगवान विष्णु को अक्षत समर्पित करने से उन्हें विशेष प्रसन्नता होती है और ऐसा करने वाले की संतति एवं ऐश्वर्य अक्षय हो जाता है | मत्स्य पुराण में वेदव्यास जी भगवान ने लिखा है :- अक्ष्या संततिस्तस्य तस्यां सुकृतमक्षयम् ! अक्थतै: पूज्यते विष्णुस्तेन् साक्षया स्मृता !! इसलिए आज के दिन भगवान विष्णु को अक्षत अर्पित करना अक्षय पुण्यदायक होता है | आज हम अपने सनातन धर्म की मान्यताओं को भूलते चले जा रहे हैं इसलिए यह तिथियां अपना महत्व खो रही हैं | सनातन संस्कृति को यदि आज नहीं माना जा रहा है तो उसका कारण हम स्वयं हैं | हमने अपनी विशेष तिथियों की विषय में जानने का प्रयास ही नहीं किया | प्रत्येक सनातन धर्मी को अपने विशेष पर्व एवं तिथियों के विषय में ज्ञान अवश्य होना चाहिए अन्यथा आने वाली पीढ़ी इनके विषय में जान ही नहीं पाएंगी |* *अक्षय तृतीय के दिन सुबह स्नान - ध्यान करके , भगवान विष्णु की पूजा करके अपने जन्म जन्मांतर को सुधारने के लिए दान - पुण्य अवश्य करना चाहिए क्योंकि वैसे भी कहा गया कि दान करने से धन कभी नहीं घटता परंतु अक्षय तृतीया के दिन किया गया दान अक्षय हो जाता है |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵️ *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟

+5 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 3 शेयर
sn vyas May 14, 2021

*‼️भगवत्कृपा हि केवलम‼️* *📕 श्रीमद्भगवद्गीता 📕* 🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹 *क्षत्रिय धर्म और युद्ध करने की आवश्यकता का वर्णन ---* ***************************** *स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।* *धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥* भावार्थ : तथा अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है अर्थात्‌ तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है॥31॥ *यदृच्छया चोपपन्नां स्वर्गद्वारमपावृतम्‌ ।* *सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्‌ ॥* भावार्थ : हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं॥32॥ *अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्‍ग्रामं न करिष्यसि ।* *ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥* भावार्थ : किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा ॥33॥ *अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्‌ ।* *सम्भावितस्य चाकीर्ति- र्मरणादतिरिच्यते ॥* भावार्थ : तथा सब लोग तेरी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति का भी कथन करेंगे और माननीय पुरुष के लिए अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर है॥34॥ *भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।* *येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्‌ ॥* भावार्थ : इऔर जिनकी दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब लघुता को प्राप्त होगा, वे महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे॥35॥ *अवाच्यवादांश्च बहून्‌ वदिष्यन्ति तवाहिताः ।* *निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्‌ ॥* भावार्थ : तेरे वैरी लोग तेरे सामर्थ्य की निंदा करते हुए तुझे बहुत से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे, उससे अधिक दुःख और क्या होगा?॥36॥ *हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌ ।* *तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥* भावार्थ : या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इस कारण हे अर्जुन! तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा॥37॥ *सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।* *ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥* भावार्थ : जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुख को समान समझकर, उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जा, इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप को नहीं प्राप्त होगा॥38॥ ___________________________

+3 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 2 शेयर
sn vyas May 14, 2021

...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!......... ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° *वेदों के द्वारा सतोगुण, रजोगुज* *तथा तमोगुण का सदुपयोग करें* *और इसके पश्चात् इन तीनों से* *ऊपर उठने की चेष्टा हो।* °" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "° कोई व्यक्ति कितना भी बड़ा व्याख्याता क्यों न हो, लेकिन तात्त्विक दृष्टि से उसमें कुछ-न-कुछ कमी होना, और कमी निकालना भी स्वाभाविक है। परन्तु वेदों को सबसे अधिक महत्त्व इसलिए दिया गया क्योंकि इनकी वाणी में व्यक्ति का स्वयं अपना प्रयत्न नहीं है। *वेद अपौरुषेय हैं। इसलिए व्यक्ति और अन्यान्य ग्रन्थों की तुलना में वेद परम प्रमाण हैं।* इस सन्दर्भ में गीता तथा रामायण दोनों में बड़ा सुन्दर संकेत आता है। भगवान् कृष्ण भी शास्त्र को प्रमाण मानते हुए कहते हैं -- *तस्मच्छात्रं प्रमाणन्ते*-- और भगवान् कृष्ण ने जो बात कही, भगवान् राम के रूप में इन्होंने चरितार्थ करके दिखाया। क्योंकि भगवान् श्री राघवेन्द्र वनगमन पर महर्षि भारद्वाज द्वारा मार्गदर्शक के रुप में भेजे जब चारों विद्यार्थियों को आगे करके चले तो हम यह कह सकते हैं कि विद्यार्थियों के रूप में चारों वेद ही भगवान के आगे चल रहे हैं। वेदों के लिए एक वाक्य कहा गया है कि *यस्य निश्वसितं वेदाः* -- ये वेद जो हैं वे भगवान के निश्वास हैं। और भई ! जब हम और आप चलते हैं तो साँस हमारे आगे-आगे चलती है। और *अगर यह प्रश्न किया जाय कि, भगवान के आगे कौन चलेगा ? तो इसका उत्तर यही दिया जाएगा कि वेद चलेंगे।* इसलिए ये चारों विद्यार्थी आगे चलते हैं और भगवान उनके पीछे चलते हैं। पर इन चारों विद्यार्थियों को भगवान् राम ने यमुना के किनारे से ही लौटा दिया। *बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाइ मन काम।* *उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम।।* -- और केवल विद्यार्थियों को ही नहीं लौटाया अपितु सांकेतिक भाषा यह भी आती है कि भगवान् श्री राघवेन्द्र ने निषादराज को भी यहीं से लौटा दिया। यद्यपि निषादराज ने भी दावा किया था कि मैं मार्ग दिखाऊँगा। परन्तु भगवान् राम ने सारे मार्ग-दर्शक यहीं से लौटा दिये। लेकिन क्यों लौटा दिये ? आइए जरा इस पर भी विचार करें। *भगवान् कृष्ण गीता में कहते हैं कि अर्जुन ! वेदों की अतुलित गरिमा होते हुए भी तुम्हें वेदों से ऊपर उठना है। क्योंकि वेद सत्त्व, रज तथा तम गुणों से व्याप्त हैं।*-- *त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रगुण्यो भवार्जुन।* *निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ।।* गीता २/४५ -- भगवान ने कहा कि अन्त में वेद-ज्ञान की भी एक सीमा है इसलिए व्यक्ति को उस वेद-ज्ञान से ऊपर उठना चाहिए। इससे वेद की सीमा का कोई हनन नहीं होता। क्योंकि जैसे कोई सीढ़ी लगी हुई है, तो यद्यपि सीढ़ी की बड़ी महिमा है, क्योंकि अगर सीढ़ी न हो तो व्यक्ति ऊपर नहीं उठेगा, लेकिन प्रश्न यह है कि व्यक्ति छत पर पहुँचने के पश्चात् सीढ़ी का परित्याग कर देगा कि सीढ़ी पर ही खड़ा रहेगा ? इसका सीधा सा अर्थ है कि *सीढ़ी चाहे कितनी ही बढ़िया क्यों न हो, किन्तु छत पर पहुँच जाने पर आपको सीढ़ी को छोड़ना ही पड़ेगा।* भगवान का अभिप्राय है कि वेदों के द्वारा तुम सतोगुण, रजोगुज तथा तमोगुण का सदुपयोग करो और इसके पश्चात् इन तीनों से ऊपर उठने की चेष्टा करो। और दूसरे श्लोक में भी भगवान संकेत करते हैं कि -- *यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके ।* *तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ।।* गीता २/४६ -- जैसे किसी व्यक्ति को जल की आवश्यकता है तो उसे जल का सेवन करना अनिवार्य है। क्योंकि जल के बिना प्यास नहीं बुझेगी, तृप्ति नहीं होगी। लेकिन जैसे तृप्ति का अनुभव कर लेने के बाद तत्काल उसे जल की अपेक्षा नहीं रह जाती है, ठीक उसी प्रकार से वेद व्यक्ति को क्रमशः ऊपर उठाते हैं। *वेद और शास्त्र बताते हैं कि व्यक्ति कैसे तमोगुण से उठकर रजोगुण में जाय, और रजोगुण से सतोगुण में जाय। इसका विस्तृत वर्णन हमारे धर्म-ग्रन्थों में किया गया है। लेकिन उसके बाद इन तीनों से ऊपर उठकर इनके भी परे हो जाने की आवश्यकता है।* इसी का संकेत-सूत्र रामचरितमानस में प्राप्त होता है । भगवान् राम ने महर्षि भरद्वाज से प्रार्थना की कि मुझे मार्ग दिखाने वाला दीजिए। तो इसका सीधा-सा तात्पर्य है कि *जब हम जीवन-पथ का चुनाव करें तो अपनी ही बुद्धि से न करें। क्योंकि अपनी बुद्धि और अपने अहंकार से यदि करेंगे तो पता नहीं जो मार्ग चुनेंगे वह उच्छृंखलता और पतन की ओर हमें ले जायेगा कि उत्थान की ओर, इसकी चिन्ता बनी रहेगी। इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम वेदानुगामी जीवन व्यतीत करें। अपने जीवन को वेद और शास्त्रों के अनुरूप चलाने की चेष्टा करें।* पर भगवान कहते हैं कि इनकी भी एक सीमा है। और सीमा भगवती यमुना हैं। इसलिए यमुना के इस पार से महर्षि भारद्वाज के आश्रम के विद्यार्थियों को बिदा कर देते हैं। भगवान कहते हैं कि शास्त्र और वेद की मर्यादा के अनुकूल कर्म कीजिए, कर्म-मार्ग पर चलिए, पर चलने के पश्चात् मार्ग में यदि कहीं तापस जी मिल जायँ, प्रेम मिल जाय, श्री भरतजी अथवा निषादराज मिल जायँ, या सुतीक्ष्ण जी मिल जायँ - इन पात्रों के समान प्रेम की दिव्य उन्मत्तता की अवस्था आ जाय, तो फिर उसके पश्चात् किसी मार्गदर्शक की आवश्यकता नहीं है। फिर तो वह व्यक्ति बिना किसी मार्ग-दर्शक के भी चित्रकूट की दिव्य प्रेम-भूमि में पहुँच कर भगवान् राम से दिव्य मिलन का उसी प्रकार आनन्द प्राप्त करता है जैसा कि श्री भरत इस प्रेम-पथ से चलकर प्राप्त करते हैं। भगवान की यात्रा कर्म-पथ से प्रारम्भ हुई। यमुना कर्म की नदी है -- *करम कथा रविनंदिनि बरनी।* -- यमुना के किनारे प्रभु ने वेदों को लौटा दिया। इसका अभिप्राय है कि जहाँ तक कर्म की सीमा है, वहाँ तक तो वेद के मार्ग निर्देशन की आवश्यकता है। पर जब कर्म की सीमा समाप्त होकर प्रेम का दिव्य राज्य प्रारम्भ हो गया, जब परम प्रेम का उदय हो गया तब किसी से यह पुछने की आवश्यकता नहीं है कि यह मार्ग ठीक है या नहीं ! भगवान् श्री राघवेन्द्र महर्षि वाल्मीकि से मिलते हैं और अन्त में प्रभु चित्रकूट में निवास करते हैं। चित्रकूट का मार्ग विशुद्ध प्रेम का मार्ग है। 👏 🌳 जय गुरुदेव जय सियाराम 🙏

+10 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 9 शेयर