sn.vyas Jun 22, 2022

🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩 *की प्रस्तुति* 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘️ *आदिकाल के मनुष्यों ने अपने ज्ञान , वीरता एवं साहस से अनेकों ऐसे कार्य किए हैं जिनका लाभ आज तक मानव समाज ले रहा है | पूर्वकाल के मनुष्यों ने आध्यात्मिक , वैज्ञानिक , भौतिक एवं पारलौकिक ऐसे - ऐसे दिव्य कृत्य किए हैं जिनको आज पढ़ कर या सुनकर बड़ा आश्चर्य होता है परंतु कभी मनुष्य इस पर विचार नहीं करता है कि यदि उन लोगों ने ऐसे कार्यों को संपन्न किये तो उसके पीछे कारण क्या रहा होगा ?? पूर्व काल के मनुष्य वाह्य संपन्नता की अपेक्षा आंतरिक संपन्नता से संपन्न होते थे | धन हो ना हो परंतु मनुष्य निर्धन होते हुए भी अंदर से मजबूत होते थे और उनकी यही मजबूती , उनकी यही संपन्नता उनसे ऐसे ऐसे कार्य करवाती थी जो कि एक उदाहरण बन जाते थे | पूर्वकाल के अनेकों ऐसे चरित्र हमें पढ़ने को मिल जाते हैं जिनके पास कुछ ना होते हुए भी वह समाज में सिर्फ अपनी आंतरिक संपन्नता के बलबूते पर स्थापित हुए , एवं उनके कार्यो ने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है | पहले के मनुष्य भोग के साथ योग के महत्त्व को भी जानते थे | ईशावास्य उपनिषद में एक सूत्र है - "तेन त्यक्तेन भुंजीथा:" अर्थात :- जो त्याग करते हैं वे ही भोग पाते हैं | पूर्वकाल के मनुष्य बाहरी धन , पद , प्रतिष्ठा की अपेक्षा आन्तरिक सम्पन्नता पाने के लिए प्रयास करते रहते थे क्योंकि जब मनुष्य आन्तरिक रूप से सम्पन्न होता था तो सामाजिक , आध्यात्मिक , भौतिक एवं राजनीतिक आदि सम्पन्नता उनकी दासी बनी रहती थी | आचार्य चाणक्य एवं स्वामी विवेकानन्द जी आन्तरिक सम्पन्नता से सम्मपन्न होने के बाद ही इतना समय व्यतीत हो जाने पर भी याद किये जाते हैं |* *आज मनुष्य ने बहुत विकास कर लिये हैं सब कुछ प्राप्त कर लेने के बाद भी मनुष्य व्यर्थ का जीवन व्यतीत कर रहा है | आज मनुष्य तरह - तरह के हथियार लेकर चलता तो है परंतु वह भीतर से उतना ही डरपोक है जितना वह स्वयं को साहसी दर्शाना चाहता है | आज बड़े - बड़े धर्मात्मा एवं मठाधीश तथा राजनीतिक हस्तियाों की बातें यदि लोग नहीं सुन रहे हैं तो उसका एक ही कारण है कि ये सभी आन्तरिक रूप से दरिद्र हैं | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" बताना चाहूँगा कि एक विशाल गेंद को कई खिलाड़ी मिलकर अपने पैरों से इधर से उधर ठोकर मारकर फुटबाल खेलते हैं | विचारणी़य यह है कि गेंद का अस्तित्व तो बड़ा होता है परन्तु वह अन्दर से खोखली होती है , यही आन्तरिक रिक्तता उसकी उपेक्षा का कारण बनती है | उसी प्रकार आज हमारी दशा है कि हमारी जुबान पर तो धर्म - अध्यात्म सदैव रहता परन्तु अन्दर से पूरी तरह खाली हैं | हमारे अन्दर न तो आध्यात्मिकता बच रही है और न ही धर्म | इसी आन्तरिक रिक्तता के कारण मनुष्य सब कुछ होते हुए भी खोखला है | यदि हमारे अन्दर यही धार्मिकता एवं आध्यात्मिकता रूपी आंतरिक रिक्तता न होती तो कोई न तो हमारे ऊपर उंगली उठा सकता था और न ही हमारे तीर्थों व देवी - देवताओं पर | आज मनुष्य चाँद पर तो पहुँच गया , समुद्र की गहराई तो नाप ली परंतु अपने हृदय की गहराई को नहीं नाप पाया |* *वाह्य आडम्बर हो या न हो परन्तु मनुष्य को आन्तरिक स्तर पर मजबूत होना चाहिए | क्योंकि आंतरिक रिक्तता मनुष्य को कुछ भी नहीं करने देती |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳 सभी भगवत्प्रेमियों को ाज दिवस की *"मंगलमय कामना*🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵️ *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟

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sn.vyas Jun 20, 2022

*कितना महान है हमारा सनातन 👍नमन है हमारे ऋषियों मुनियों को 🙏🙏🙏इस फोटो के चारों तरफ तीन घेरे बने हुए हैं जो सबसे पहला घेरा है उसमें 27 नक्षत्रों के नाम हैं और उनकी पोधो के भी नाम साथ में लिखे हुए हैं।* *दूसरे घेरे में 12 राशियों के नाम लिखे हुए हैं साथ में उनके पौधों के नाम भी लिखे हुए हैं।* *तीसरे गहरे में नौ ग्रहों के नाम लिखे हुए हैं और उनसे संबंधित पेड़ पौधों के नाम भी लिखे हुए हैं।* *जहां पर पेड़ पौधे जड़ी बूटियां वृक्ष का नाम लिखा हुआ है तो उन में उन नक्षत्रों का या उन राशियों का या उन ग्रहों का वास होता है यदि हम उन पर पौधों जड़ी बूटियों या वृक्षों की पूजा करते हैं या उनको हम रतन की तरह धारण करते हैं तब भी हमें वह जड़ी बूटियां पेड़ पौधे वृक्ष लाभ प्रदान करते हैं।* जयतु सनातन

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sn.vyas Jun 20, 2022

*जाने क्यों #अंडाकार_है_शिवलिंग, अगर आप है शिवभक्त तो ये जानना न भूले* #ब्रहा #विष्णु और #महेश ये तीनो देवता सृष्टि की सर्वशक्तिमान हैं. इनमें भगवान शंकर सर्वोच्च और सर्वशक्तिमान है. यही वजह है कि सभी देवी देवातओ की पूजा मूर्ति या तस्वीर रूप में की जाती है लेकिन भगवान शंकर की पूजा के लिए शिवलिंग को पूजा जाता है. शिवलिंग भगवान शिव का प्रतीकात्मक रूप हैं. भगवान शिव का कोई स्वरूप नहीं है, उन्हें निराकार माना जाता है. 'लिंग' के रूप में उनके इसी निराकार रूप की आराधना की जाती है। 🔱 #शिवलिंग_का_अर्थ - 'लिंगम' शब्द 'लिया' और 'गम्य' से मिलकर बना है. जिनका अर्थ 'शुरुआत' और 'अंत' होता है। चूंकि यह माना जाता है कि शिव से ही ब्रह्मांड प्रकट हुआ है और यह उन्हीं में मिल जाएगा. अतः शिवलिंग उनके इसी रूप को परिभाषित करता है. 🔱 शिवलिंग में विराजे है तीनों देवता - शिवलिंग में में तीनो देवता का वास माना जाता है. शिवलिंग को तीन भागो में बांटा जा सकता है. सबसे निचला हिस्सा जो नीचे टिका होता है दूसरा बीच का हिस्सा और तीसरा शीर्ष सबसे ऊपर जिसकी पूजा की जाती है. 🔱 इसमें समाए #त्रिदेव - इस लिंगम का निचला हिस्सा ब्रह्मा जी (सृष्टि के रचयिता), मध्य भाग विष्णु (सृष्टि के पालनहार) और ऊपरी भाग शिव जी (सृष्टि के विनाशक) हैं. इसका अर्थ हुआ शिवलिंग के जरिए त्रिदेव की आराधना हो जाती है. 🔱 शिवलिंग में विराजे है शिव और शक्ति एक साथ - एक अलग मान्यता के अनुसार लिंगम का निचला हिस्सा स्त्री व ऊपरी हिस्सा पुरुष का प्रतीक होता है. इसका अर्थ हुआ इसमें शिव और शक्ति साथ में वास करते हैं. 🥚 अंडे की तरह आकार शिवलिंग के अंडाकार के पीछे आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दोनो कारण है. आध्यतामिक कारण आधायात्मिक दृष्टि से देखे तो शिव ब्राहाणम्ड के निर्माण की जड़ है मतलब शिव ही वो बीज है जिससे पूरा संसार बना एसलिए शिवलिंग का आकार अंडे जैसा है. विज्ञान के अनुसार विज्ञान के अनुसार बिग बौग थ्यौरी कहती है कि ब्रहाण्ड का निमार्ण अंडे जैसे छोटे कण से हुआ है. हम शिवलिंग के आकार को इसी अंडे के साथ जोड़कर देख सकते हैं. 🔱 शिव ही क्यों सर्वशक्तिमान - क्या है कहानी स्वर्ग में ब्रह्मा और विष्णु आपस में बात कर रहे थे कि शिव कौन इसी बीच उनके सामने एक स्तंभ आकर खडा हो गया दोनो ही देवता इसकी उत्पत्ति और अंत ढूढने लगे लेकिन नहीं मिला. आखिरकार हारकर दोनो ने स्तंभ के आगे प्रार्थना की वो अपनी पहचान बताए तब भोलेनाथ अपने असली रूप में आए और उन्हें अपनी पहचान बताई. शिव के इस रूप को लिंगोद्भव मूर्ति कहा जाता है. तीन रूपों की पूजा ईश्वर की रूप, अरूप और रुपारूप तीन रूपों की पूजा की जाती हैं. शिवलिंग रुपारूप में आता है, क्योंकि इसका रूप है भी और नहीं भी. 🔱 शिवलिंग पर जल क्यों चढाया जाता है आध्यात्मिक कारण शिवलिंग पर जल चढाने की परंपरा सालो से है और हम सभी शिवलिंग पर जल चढाते है. लेकिन हममे से कम ही लोग जानते है कि इसके पीछे का कारण क्या है. दरअसल समुद्र मंथन के दौरान हलाहल (विष) से भरा पात्र भी निकला था. सभी को बचाने के लिए शिवजी ने इस विष को ग्रहण कर लिया था. इसी वजह से उन्हें नीलकंठ भी कहा जाता है. विष पीने के कुछ देर बाद भोलेनाथ के शरीर में गर्मी बढ़ गई. इसे कम करने के लिए सभी देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया था. यही परंपरा आज भी चली आ रही हैं. वैज्ञानिक कारण शिवलिंग अपने आप में अनंत ऊर्जा का वाहक है जिससे निरंतर असीम ऊर्जा का प्रवाह होता रहता है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार किसी परमाणु रिएक्टर से होता है उसी ऊष्मा और ऊर्जा को शांत करने के लिए शिवलिंग पर निरंतर चल अभिषेक करने की परंपरा चली आ रही है जोकि हमारे वैदिक ऋषि मुनियों द्वारा बनाई गई वैज्ञानिक परंपरा है।

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sn.vyas Jun 20, 2022

*शिवलिंग में लिंग ऊपर क्यों निकला होता है ?* 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ शिवलिंग हिन्दुओं में सर्वाधिक पूजित धार्मिक प्रतीक चिन्ह हैं और इसकी पूजा विश्व के हर धर्म में ,विश्व में हर जगह किसी न किसी रूप में होती जरुर है अतः यह विश्व में सर्वाधिक पूजित किया जाने वाला भी प्रतीक है। हर कोई इसे पूजता जरुर है पर 99 पतिशत लोग इसके न वास्तविक अर्थ को जानते हैं न और न ही इसके रहस्य को समझ पाते हैं। यहाँ तक की जो पुजारी हैं ,धार्मिक व्यक्ति हैं ,विद्वान् और समझदार हैं वह भी इसके वास्तविक रहस्य को नहीं समझ पाते। अधिकतर लोग इसे योनी -लिंग अथवा शिव -पार्वती का प्रतीक समझते हैं और शिव -पार्वती मानकर ही इसकी पूजा करते हैं तो ऐसे लोग यह कैसे समझ सकते हैं की शिवलिंग की पूर्ण आकृति में से लिंग -योनी से बाहर क्यों निकल रहा है ,इसे तो नियमतः योनी के अंदर जाते हुए होना चाहिए। आखिर लिंग मुख बाहर उल्टा उपर की ओर क्यों जा रहा है ,इसका रहस्य क्या है ,यह क्या कह रहा है ? क्या बताता है ? हम आपको इसका वास्तविक अर्थ बताते हैं और इसे जानकर आप भी हतप्रभ रह जायेंगे आप सोचेंगे इतनी गूढ़ बात आपने पहले क्यों नहीं सोची कुछ लोग इस विषय को तो जानते हैं पर वह इस उपर जाते लिंग का रहस्य नहीं समझ पाते जबकि थोडा सोचने पर उन्हें समझ आ जाता।शिवलिंग पर लिपटा सर्प भी बहुत गहरा रहस्य समेटे है और यह आपकी अब तक की धारणा से बिलकुल अलग होगा जब हम आपको अपने अगले लेख या विडिओ में इसका रहस्य बताएँगे ,ऐसा हमारा मानना है। हम आपको पूरे शिवलिंग का भी वास्तविक अर्थ अपने इस लेख में बताएँगे जिसे जानकर आप आश्चर्यचकित रह जायेंगे कि वास्तव में आप किसे पूज रहे हैं। शिव को ,पार्वती को या कुछ और या शिव -पार्वती वास्तव में हैं क्या ? हम अपने आज के विषय शिवलिंग में लिंग का मुख उपर क्यों होता है इस विषय पर पहले प्रकाश डालते हैं जो पूरी तरह हमारे अपने सोच और अनुभव पर आधारित है तथा इसका किसी शास्त्र आदि से कोई लेना देना नहीं है यद्यपि कुछ जानकारियाँ और विवरण कुछ पुस्तकों में हो सकते हैं क्योंकि अनेक हमसे बड़े बड़े विद्वान् और सिद्ध हुए हैं जिन्होंने यह रहस्य उद्घाटित जरुर किया होगा। हम़ारा मानना है की शिवलिंग वास्तव में शिव और पार्वती का लिंग और योनी नहीं है। यह उनके सम्पूर्ण अस्तित्व का मात्र प्रतीक हो सकता है जिसमे यह धन अर्थात पुरुष और ऋण अर्थात नारी द्वारा श्रृष्टि की उत्पत्ति का संकेत दे सकता है ,किन्तु वास्तव में यह श्रृष्टि का ही संकेत नहीं देता ,यह शिवलिंग यह भी बताता है की यह समस्त श्रृष्टि धन और ऋण के संयोग से बनी है। तो क्या मात्र यह बताने वाले प्रतीक को ही विश्व में हर धर्म पूज रहा है। नहीं शिवलिंग मात्र यह नहीं बताता की धन और ऋण से समस्त संसार बना है। इसका असली रहस्य तो इस लिंग के उपर की ओर मुख किये होने में ही है। इसे हर धर्म इसलिए पूज रहा है की यह कोई धार्मिक प्रतीक न होकर समस्त ब्रह्माण्ड की ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है जो हर धर्म की परिभाषा और क्षेत्र से अलग है। पहले हम आपको शिवलिंग का वास्तविक अर्थ समझा देते हैं तब यह बताएँगे की इसमें लिंग मुख उपर क्यों होता है जिससे आपको समझने में आसानी होगी । समस्त संसार में शिवलिंग पाए जाते हैं ,विभिन्न धर्मों तक में इनकी किसी न किसी रूप में प्रतीकाकृति मिलती हैं। हिन्दू धर्म में यह परम पवित्र शिव के प्रतीक माने जाते हैं और इनकी पूजा की जाती है।यह शिवलिंग है क्या ,कभी इस पर सामान्यतया विचार सामान्य लोग नहीं करते जा इसके बारे में बहुत नहीं जानते इसलिए जो जैसी परिभाषा इसकी गढ़ कर सुना देता है सामान्य रूप से मान लिया जाता है और कल्पना कर ली जाती है। कुछ महाबुद्धिमान प्राणियों ने परमपवित्र शिवलिंग को जननांग समझ कर पता नही क्या-क्या और कपोल कल्पितअवधारणाएं फैला रखी हैं परन्तु...वास्तव में. शिवलिंग. वातावरण सहित घूमती धरती तथा सारे अनन्त ब्रह्माण्ड ( क्योंकि, ब्रह्माण्ड गतिमान है ) का प्रतिनिधित्व करता है।इसका अक्ष /धुरी (axis) ही लिंग है। दरअसल इसमें ये गलतफहमी भाषा के रूपांतरण और, मलेच्छों द्वारा हमारे पुरातनधर्म ग्रंथों को नष्ट कर दिए जाने तथा, अंग्रेजों द्वारा इसकी व्याख्या से उत्पन्न हुआ होसकता है। जैसा कि.... हम सभी जानते है कि एक ही शब्द के विभिन्न भाषाओँ में अलग-अलग अर्थ निकलते हैं! उदाहरण के लिए यदि हम हिंदी के एक शब्द ""सूत्र'''को ही ले लें तो सूत्र मतलब. डोरी/धागा, .गणितीय सूत्र ,.कोई भाष्य अथवा लेखन भी हो सकता है जैसे कि नारदीय सूत्र , ब्रह्म सूत्र इत्यादि। उसी प्रकार ""अर्थ"" शब्द का भावार्थ सम्पति भी हो सकता है और मतलब (मीनिंग) भी ठीक बिल्कुल उसी प्रकार शिवलिंग के सन्दर्भ में लिंग शब्द से अभिप्राय चिह्न,निशानी, गुण, व्यवहार या प्रतीक है। ध्यान देने योग्य बात है कि "लिंग"एक संस्कृत का शब्द है जिसके निम्न अर्थ है : त आकाशे न विधन्ते -वै०। अ ० २ । आ ० १ । सू ० ५ अर्थात...रूप, रस, गंध और स्पर्श ये लक्षण आकाश में नही है किन्तु शब्द ही आकाश का गुण है। निष्क्रमणम् प्रवेशनमित्याकशस्य लिंगम् -वै०। अ ० २ । आ ० १ । सू ० २ ० अर्थात...जिसमे प्रवेश करना व् निकलना होता है वह आकाश का लिंग है अर्थात ये आकाश के गुण है। अपरस्मिन्नपरं युगपच्चिरं क्षिप्रमिति काललिङ्गानि । -वै०। अ ० २ । आ ० २ । सू ०६ अर्थात.. जिसमे अपर, पर, (युगपत) एक वर, (चिरम) विलम्ब, क्षिप्रम शीघ्र इत्यादि प्रयोग होते है, इसे काल कहते है, और ये काल के लिंग है । इत इदमिति यतस्यद्दिश्यं लिंगम । -वै०। अ ० २ । आ ० २ । सू ० १ ० अर्थात.. जिसमे पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर व् नीचे का व्यवहार होता है उसीको दिशा कहते है मतलब कि ये सभी दिशा के लिंग है। इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिंगमिति -न्याय० अ ० १ । आ ० १ । सू ०१ ० अर्थात..जिसमे (इच्छा) राग, (द्वेष) वैर, (प्रयत्न) पुरुषार्थ, सुख, दुःख, (ज्ञान) जाननाआदि गुण हो, वो जीवात्मा है और, ये सभी जीवात्मा के लिंग अर्थात कर्म व् गुण है । इसीलिए शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने के कारण इसे लिंग कहा गया है। स्कन्दपुराण में स्पष्ट कहा है की आकाश स्वयं लिंग है एवं , धरती उसका पीठया आधार है और , ब्रह्माण्ड की हर चीज अनन्त शून्य से पैदा होकर अंततः उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है। यही कारण है कि इसे कई अन्यनामो से भी संबोधित किया गया है जैसे कि प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जास्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग (cosmic pillar/lingam) इत्यादि। यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि. इस ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे है : ऊर्जा और प्रदार्थ इसमें से हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है जबकि आत्मा एक ऊर्जा है। ठीक इसी प्रकारशिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते हैं क्योंकि ब्रह्मांडमें उपस्थित समस्त ठोस तथा उर्जा शिवलिंग में निहित है इसीलिए शास्त्रों में शक्ति की विवेचना में कहा जाता है की जब शक्ति काली शिव से निकल जाती है तो शिव भी शव हो जाते हैं ,अर्थात शिव तभी तक शिव हैं जब तक उनके साथ शक्ति हैं वैसे ही पदार्थ में तभी तक जीवन है जबतक उसमे आत्मा है। अगर इसे धार्मिक अथवा आध्यात्म की दृष्टि से बोलने की जगह शुद्ध वैज्ञानिक भाषामें बोला जाए तो हम कह सकते हैं कि शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि हमारे ब्रह्मांड कीआकृति है, उसकी ऊर्जा संरचना की प्रतिकृति है और अगर इसे धार्मिक अथवा आध्यात्म की भाषा में बोला जाए तो शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती)का आदि-अनादि एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतीक है अर्थात शिवलिंग हमें बताता है कि इस संसार में न केवल पुरुष का और न ही केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है बल्कि, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं और दोनों ही समान हैं। एक दुसरे की परिकल्पना अथवा पूर्णता एक दुसरे के बिना संभव नहीं है। हमें ज्ञात है की ब्रहमांड की प्रत्येक संरचना पदार्थ है जो परमाणुओं से मिलकर बनता है। परमाणु सर्वत्र विद्यमान हैं। जल-आकाश-वायु सर्वत्र परमाणु की संरचना में नाभिक में प्रोटान और न्यूट्रान होते हैं और इस नाभिक के चारो और इलेक्ट्रान चक्कर लगता रहता है न्यूट्रान तो उदासीन होता है किन्तु फिर भी नाभिक धनात्मक होता है क्योकि प्रोटान धनात्मक आवेश वाला कण होता है जो पूरे नाभिक को धनात्मक बनाए रखता है ,इस धनात्मक के आकर्षण में बंधकर ऋणात्मक आवेश का कण इलेक्ट्रान उसके चारो और चक्कर लगता रहता है और परमाणु का निर्माण होता है इलेक्ट्रान का चक्कर लगभग गोलाकार होता है जिसकी तुलना हम शिवलिंग के योनी या अर्ध्य से कर सकते हैं धनात्मक नाभिक की तुलना लिंग से कर सकते हैं जो स्थिर रहता है। इसमें स्थित न्यूट्रान परम तत्त्व का प्रतीक है जो उदासीन रहता है। इस विज्ञान को हमारा वैदिक ज्ञान जानता था और उसने शिवलिंग की परिकल्पना की समस्त ब्रह्माण्ड परमाणुओं से बना है ,परमाणु हर कण कण में विद्यमान है अर्थात ईश्वरीय ऊर्जा हर कण कण में है ,तभी तो हम कहते हैं कण कण में भगवान इस परमाणु से ही शरीर की कोशिकाएं बनती हैं और शरीर बनता है ,,इससे ही वनस्पतियों की कोशिकाएं और शारीर बनता है यहा तक की धातु-पत्थर-मिटटी भी इसी से बनते हैं अर्थात शिवलिंग इस परमाणु का प्रतिनिधित्व करता है। धनात्मक-ऋणात्मक ऊर्जा के साथ निर्विकार शिव का प्रतिनिधित्व करता है। अगर पुरुष-स्त्री के परिप्रेक्ष्य में देखें तभी यह शिवलिंग स्थूल रूप से लिंग -योनी का प्रतिनिधित्व करता दीखता है ,परन्तु यह वास्तव में ब्रह्मांडीय ऊर्जा धारा-संरचना का प्रतिनिधित्व करता है। लिंग -योनी में परिभाषित करने का शायद कारण इसके पुरुष और स्त्री अथवा पुरुष और प्रकृति का धनात्मक और ऋणात्मक ऊर्जा रूप है।इस ऊर्जा धरा या संरचना की अनेक परिभाषाएं और विवरण हैं ,पर यह मूल रूप से उर्जा को ,शक्ति को, उसकी क्रियाविधि को व्यक्त करता है। यह तो हुआ मोटे तौर पर वास्तविक शिवलिंग की व्याख्या जिसके आधार पर शिवलिंग किसी भी एक धर्म से न जुड़ा होकर हर धर्म का मूल है और इसीलिए हर धर्म में हर जगह विश्व में पूजित है। अब इसके सबसे बड़े रहस्य पर आते हैं की शिवलिंग में लिंग उपर को क्यों होता है तो हम आपको बताते हैं की शिवलिंग हजारों हजार रहस्य समेटे है इस ब्रह्माण्ड का इनमे से एक रहस्य यह है की उपर की ओर उन्मुख लिंग यह कहता है की जब आप योनी -लिंग की परिभाषा से उपर उठ जाते हैं तो आप परमेश्वर की ओर उन्मुख हो जाते हैं अर्थात जब आप योनी -लिंग द्वारा श्रृष्टि न कर ऊर्जा संरक्षित करते हैं तो आप परमेश्वर की ओर उन्मुख होने लगते हैं। यह उपर को उठा या उपर की ओर निकला लिंग यह बताता है की जो श्रृष्टि की शक्ति आपके जननांगो में है उससे ही आप ईश्वर को भी पा सकते हैं। जब आप अपनी जनन ऊर्जा को रोकते हैं तो यह उर्ध्वमुखी होने लगती है। शिवलिंग का लिंग उर्ध्वमुखी है ,अधोमुखी नहीं जब आप साथी के साथ रति करते हैं तो आपका लिंग अधोमुखी होता है और आपकी ऊर्जा अधोमुखी हो पतित हो जाती है ,किन्तु यहाँ तो लिंग उर्ध्वमुखी है ,फिर यह सामान्य योनी लिंग कहाँ हुआ यह कैसा सम्भोग है ? यह तो उर्ध्वारेत सम्भोग का प्रकटीकरण है। उर्ध्व सम्भोग ही शिव है अन्यथा सबकुछ शव होने लगता है। अधोमुखी लिंग से सम्भोग शव बनाता है और उर्ध्वमुखी सम्भोग शिवत्व प्राप्त कराता है। यह उर्ध्वमुखी लिंग यह कहता है की आप अपने साथी के साथ रति संलग्न होकर भी अपनी ऊर्जा यदि संरक्षित करते हैं तो आपकी उर्जा उर्ध्वमुखी हो जाती है और यह आपको परमेश्वर से मिला सकती है कुंडलिनी जागरण कराकर यह शिवलिंग का उर्ध्वमुखी लिंग ,कुंडलिनी का वह सूत्र है जो हर प्राणी में है। स्त्री हो या पुरुष कुंडलिनी शक्ति सबमे है। दोनों के शरीर में केवल जनन अंगों और पोषण अंगों का अंतर मात्र है अन्य सभी अंग समान है और दोनों में समान रूप से कुंडलिनी शक्ति है। शिवलिंग का लिंग एक प्रतीक है उर्ध्वमुखी हो सकने वाली ऊर्जा का जबकि आप पुरुष या स्त्री के साथ रति संलग्न भी होकर उर्ध्वमुखी कर सकते हैं ,जबकि आप संतति उत्पन्न करते हुए भी उर्ध्वमुखी कर सकते हैं और परमपिता को कुंडलिनी जगाकर पा सकते हैं। शिवलिंग में उर्ध्वरेत सम्भोग का प्रकटीकरण है और इस मुद्रा की सिद्धि व्यक्ति के अर्धनारीश्वर बन जाने पर होती है अर्ध नारीश्वर सिद्ध होने पर व्यक्ति नारी नटेश्वर हो जाता है। आप ध्यान से देखें तो पायेंगे की मूलाधार में केंद्र में एक शिवलिंग होता है जो स्त्री पुरुष दोनों में समान रूप से होता है और प्रत्येक स्त्री में या पुरुष में ,पुरुष या स्त्री के गुण भी होते हैं। जब स्त्री या पुरुष एक निश्चित सीमा के बाद अर्धनारीश्वर की सी स्थिति प्राप्त करने लगता है तो उसके लिए दूसरा पुरुष या स्त्री बेमानी हो जाती है। वह स्वयं में आधा पुरुष और आधा नारी होने लगता है और उसकी यात्रा उपर की ओर होने लगती है अकेले ही यह शिवलिंग ऐसे अनेक रहस्य समेटे है इसीलिए यह शिवलिंग सभी धर्मों में समान रूप से पूजित है। यह उर्ध्वमुखी लिंग ऊर्जा संरक्षण द्वारा परमेश्वर प्राप्ति का संकेत करता है और बताता है की जनन अंगों के उपयोग द्वारा भी कुंडलिनी शक्ति को जगाया जा सकता है जैसा की कुंडलिनी तंत्र या भैरवी साधना में होता है ,जनन अंगों का उपयोग रोककर भी कुंडलिनी शक्ति को जगाया जा सकता है जैसा की योग या कुंडलिनी योग में होता है। यह शिवलिंग का लिंग विरक्ति का भी वैराग्य का भी संकेत करता है की स्त्री से विरक्त होने से ऊर्जा उर्ध्वमुखी हो सकती है।जो इसका जो अर्थ निकाले ,पर यह ऊर्जा उर्ध्वमुखी करने और होने का ही संकेत करता है जिससे परमेश्वर अर्थात परमशक्ति को पाया जा सकता है। संकलित 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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sn.vyas Jun 20, 2022

वानर राज वालि की पत्नी,अंगद की माता एवं पांच कन्यायों में एक तारा !!!!!! तारा हिन्दू महाकाव्य रामायण में वानरराज वालि की पत्नी है। तारा की बुद्धिमता, प्रत्युत्पन्नमतित्वता, साहस तथा अपने पति के प्रति कर्तव्यनिष्ठा को सभी पौराणिक ग्रन्थों में सराहा गया है। तारा को हिन्दू धर्म ने पंचकन्याओं में से एक माना है। पौराणिक ग्रन्थों में पंचकन्याओं के विषय में कहा गया है:- अहिल्या द्रौपदी कुन्ती तारा मन्दोदरी तथा। पंचकन्या स्मरणित्यं महापातक नाशक॥ (अर्थात् अहिल्या, द्रौपदी, कुन्ती, तारा तथा मन्दोदरी, इन पाँच कन्याओं का प्रतिदिन स्मरण करने से सारे पाप धुल जाते हैं) हालांकि तारा को मुख्य भूमिका में वाल्मीकि रामायण में केवल तीन ही जगह दर्शाया गया है, लेकिन उसके चरित्र ने रामायण कथा को समझनेवालों के मन में एक अमिट छाप छोड़ दी है। जिन तीन जगह तारा का चरित्र मुख्य भूमिका में है, वह इस प्रकार हैं:- कुछ ग्रन्थों के अनुसार वह देवताओं के गुरु बृहस्पति की पौत्री थी। एक कथा के अनुसार समुद्र मन्थन के दौरान चौदह मणियों में से एक अप्सराएँ थीं। उन्हीं अप्सराओं में से एक तारा थी। वालि और सुषेण दोनों मन्थन में देवतागण की मदद कर रहे थे। जब उन्होंने तारा को देखा तो दोनों में उसे पत्नी बनाने की होड़ लगी। वालि तारा के दाहिनी तरफ़ तथा सुषेण उसके बायीं तरफ़ खड़े हो गए। तब विष्णु ने फ़ैसला सुनाया कि विवाह के समय कन्या के दाहिनी तरफ़ उसका होने वाला पति तथा बायीं तरफ़ कन्यादान करने वाला पिता होता है। अतः वालि तारा का पति तथा सुषेण उसका पिता घोषित किये गए। राम के यह आश्वासन देने पर कि राम स्वयं वालि का वध करेंगे, सुग्रीव ने वालि को ललकारा। वालि ललकार सुनकर बाहर आया। दोनों में घमासान युद्ध हुआ, परंतु क्योंकि दोनो भाइयों की मुख तथा देह रचना समान थी, इसलिए राम ने असमंजस के कारण अपना बाण नहीं चलाया। अन्ततः वालि ने सुग्रीव को बुरी तरह परास्त करके दूर खदेड़ दिया। सुग्रीव निराश होकर फिर राम के पास आ गया। राम ने इस बार लक्ष्मण से सुग्रीव के गले में माला पहनाने को कहा जिससे वह द्वंद्व के दौरान सुग्रीव को पहचानने में ग़लती नहीं करेंगे और सुग्रीव से वालि को पुन: ललकारने को कहा। डॉ0 विजय शंकर मिश्र: सुग्रीव ने किष्किन्धा जा कर वालि को फिर से द्वंद्व के लिये ललकारा। जब वालि ने दोबारा सुग्रीव की ललकार सुनी तो उसके क्रोध का ठिकाना न रहा। तारा को शायद इस बात का बोध हो गया था कि सुग्रीव को राम का संरक्षण हासिल है क्योंकि अकेले तो सुग्रीव वालि को दोबारा ललकारने की हिम्मत कदापि नहीं करता। अतः किसी अनहोनी के भय से तारा ने वालि को सावधान करने की चेष्टा की। उसने यहाँ तक कहा कि सुग्रीव को किष्किन्धा का राजकुमार घोषित कर वालि उसके साथ संधि कर ले। किन्तु वालि ने इस शक से कि तारा सुग्रीव का अनुचित पक्ष ले रही है, उसे दुत्कार दिया। किन्तु उसने तारा को यह आश्वासन दिया कि वह सुग्रीव का वध नहीं करेगा और सिर्फ़ उसे अच्छा सबक सिखाएगा। ऐसी मान्यता है कि राम ने वालि पर जो तीर चलाया था वह एक साधारण तीर था, अर्थात् राम के तरकश में अनेकानेक अस्त्र थे जिनसे पल भर में जीव तो क्या पूरी की पूरी सभ्यता का विनाश हो सकता था, जैसे ब्रह्मास्त्र इत्यादि। लेकिन मर्यादा पुरुषोत्तम राम — जो कि विष्णु का अवतार थे और सर्वज्ञाता थे — ने एक साधारण सा ही तीर इसलिए चलाया क्योंकि वालि की तुरन्त मृत्यु न हो और मरने से पहले उसे अपने प्रश्नों का उत्तर भली भांति प्राप्त हो जाये ताकि वह शांति से प्राण त्याग सके और मरने से पहले वह स्वजनों से भली भांति मिल सके। वालि के आहत होने का समाचार सुनकर तारा अपने पुत्र अंगद के साथ रणभूमि की तरफ़ भागी। रास्ते में उसे रण से भागते हुए वानर मिले जिन्होंने उसे सलाह दी कि अंगद को लेकर वापस किष्किन्धा जाकर अंगद का राज्याभिषेक कर दे और राम के प्रकोप से बच जाये। लेकिन तारा ने उस वानर समूह को अपने साथ किया और मरणासन्न वालि की ओर प्रस्थान किया। वहाँ जा कर वालि के समक्ष तारा का विलाप अति महत्वपूर्ण है क्योंकि मनुष्य के अलावा कोई और प्राणी अपने स्वजन के मरने पर इतना विलाप नहीं करता है। पहले तो तारा मरते हुए वालि को अंग लगाती है, उसके पश्चात् सुग्रीव तथा राम को वह खरी खोटी सुनाती है। हनुमान मध्यस्थता करते हुए तारा को ढाढ़स बन्धाते हैं और उसे दर्शन शास्त्र समझाते हैं। यह एक अनूठा संदर्भ है कि तारा ने वालि की चिता में अपने भी प्राण त्यागने का संकल्प लिया। इसका अभिप्राय यह है कि सती प्रथा हमारे समाज में प्राचीन काल से चली आ रही है। इस संदर्भ में इतना ही कहना उचित होगा कि विलाप के समय उसने जो वचन कहे वह कोई साधारण नारी नहीं बोल सकती है। उसको राजनीति तथा कूटनीति का अच्छा ज्ञान था और इसी वजह से वानरों के कहने के बावजूद उसने अंगद का राज्याभिषेक न करा कर सुग्रीव को ही राजा मनोनित किया। अपने पुत्र पर कोई आँच न आने पाये, इस कारण उसने सुग्रीव को अपना स्वामी स्वीकार कर लिया। वालि के वध के पश्चात् तारा ने यही उचित समझा कि सुग्रीव को स्वामी स्वीकार करे क्योंकि उसने अंगद के हितों की रक्षा भी तो करनी थी। जब सुग्रीव राजोल्लास में तल्लीन हो गया और राम को सीता का ढूंढने का वचन भूल गया तो राम ने लक्ष्मण को उसे अपना वचन याद कराने को भेजा। लक्ष्मण वैसे भी काफ़ी ग़ुस्सैल थे। उन्होंने किष्किन्धा की राजधानी पम्पापुर में लगभग आक्रमण बोल दिया। सुग्रीव को अपनी ग़लती का अहसास हो गया लेकिन लक्ष्मण का सामना करने की उसकी हिम्मत न हुई। उसने तारा से आग्रह किया कि वह लक्ष्मण को शान्त कर दे। तारा रनिवास से मदोन्मत्त निकली और लक्ष्मण को शान्त किया। उसने महर्षि विश्वामित्र का उदाहरण दिया कि ऐसे महात्मा भी इन्द्रिय विषयक भोगों के आगे लाचार हो गए थे फिर सुग्रीव की तो बिसात ही क्या और यह भी कि वह मनुष्य नहीं वरन् एक वानर है। तारा ने यह भी वर्णन किया कि सुग्रीव ने चारों दिशाओं में सेना एकत्रित करने के लिए दूत भेज दिये हैं। वाल्मीकि रामायण तथा अन्य भाषाओं के रूपांतरणों में यह उल्लेख है कि अधखुले नयनों वाली मदोन्मत्त तारा के तर्कों को सुनकर लक्ष्मण थोड़ी शान्त हो गए और उसके पश्चात् सुग्रीव के आगमन और उससे सीता को खोजने का आश्वासन पाकर वापस चले गए। रामायण के कुछ क्षेत्रीय रूपांतरणों में यह भी दर्शाया गया है कि जिस समय लक्ष्मण ने किष्किन्धा की राजधानी के राजमहल के गर्भागृह में क्रोधित होकर प्रवेष किया था उस समय सुग्रीव के साथ मदिरा-पान करने वाली उसकी प्रथम पत्नी रूमा नहीं अपितु तारा थी और भोग विलास में वह दोनों तल्लीन थे। यहाँ पर यह याद दिलाना उचित होगा कि राम से मैत्री करते समय सुग्रीव ने अपने राज्य के छिन जाने से भी अधिक वालि द्वारा अपनी पत्नी रूमा के छिन जाने का खेद प्रकट किया था। लेकिन तारा जैसी सहभागिनी (क्योंकि इस संदर्भ में पत्नी कहना तो उचित नहीं होगा) पाकर सुग्रीव अपनी प्रीय पत्नी रूमा को भी भूल गया। रामायण के कई रूपांतरणों में यह उल्लेख आया है कि जब मायावी से युद्ध करते समय वालि को काफ़ी समय बीत गया और सुग्रीव ने कन्दरा के मुहाने में एक शिला लगाकर उसका द्वार बन्द कर दिया और किष्किन्धा वापस आकर इस बात की सूचना मंत्रियों को दी कि शायद वालि मायावी के हाथों मारा गया है, तो मंत्रणा करके मंत्रियों ने सुग्रीव को किष्किन्धा का राजा चुना और प्रकट रूप से विधवा हुई तारा अपने पति के छोटे भाई की पत्नी स्वीकृत हुई। इस प्रथा को न तो वाल्मीकि रामायण में और न ही उसके क्षेत्रीय रूपांतरणों में पाप का दर्जा दिया गया है। लेकिन जब वालि मायावी का वध करके वापस किष्किन्धा आता है और क्रोध के कारण सुग्रीव को देश-निकाला देता है और उसकी पत्नी रूमा को हड़प लेता है तो किष्किन्धाकाण्ड में सुग्रीव-राम मिलाप के दौरान राम इसे घोर पाप की संज्ञा देते हैं। वालि के वध के बाद भी तारा पुनः सुग्रीव की पत्नी बन गई। शायद उस काल के समाज में बहु-पत्नी तथा बहु-पति (द्रौपदी) प्रथा का चलन स्वीकार्य रहा हो।

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