sn.vyas Apr 21, 2021

श्री राम नवमी विशेष ~~~~~~~~~~~~~~ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को प्रतिवर्ष नये विक्रम संवत्सर का प्रारंभ होता है और उसके आठ दिन बाद ही चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी को हिंदुओ का पर्व राम जन्मोत्सव जिसे रामनवमी के नाम से मनाया जाता है, इस वर्ष श्रीराम नवमी के पर्व 21 अप्रैल 2021 आज मनाया जा रहा है। हमारे देश में राम और कृष्ण दो ऐसी महिमाशाली विभूतियाँ रही हैं जिनका अमिट प्रभाव समूचे भारत के जनमानस पर सदियों से अनवरत चला आ रहा है। रामनवमी, भगवान राम की स्‍मृति को समर्पित है। राम सदाचार के प्रतीक हैं, और इन्हें "मर्यादा पुरुषोतम" कहा जाता है। रामनवमी को राम के जन्‍मदिन की स्‍मृति में मनाया जाता है। राम को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है, जो पृथ्वी पर अजेय रावण (मनुष्‍य रूप में असुर राजा) से युद्ध लड़ने के लिए आए। राम राज्‍य (राम का शासन) शांति व समृद्धि की अवधि का पर्यायवाची बन गया है। रामनवमी के दिन, श्रद्धालु बड़ी संख्‍या में उनके जन्‍मोत्‍सव को मनाने के लिए राम जी की मूर्तियों को पालने में झुलाते हैं। इस महान राजा की काव्‍य तुलसी रामायण में राम की कहानी का वर्णन है। मर्यादा पुरुषोत्तम परिचय ~~~~~~~~~~~~~~~~~~ भगवान विष्णु ने राम रूप में असुरों का संहार करने के लिए पृथ्वी पर अवतार लिया और जीवन में मर्यादा का पालन करते हुए मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। आज भी मर्यादा पुरुषोत्तम राम का जन्मोत्सव तो धूमधाम से मनाया जाता है पर उनके आदर्शों को जीवन में नहीं उतारा जाता। अयोध्या के राजकुमार होते हुए भी भगवान राम अपने पिता के वचनों को पूरा करने के लिए संपूर्ण वैभव को त्याग 14 वर्ष के लिए वन चले गए और आज देखें तो वैभव की लालसा में ही पुत्र अपने माता-पिता का काल बन रहा है। श्री राम का जन्म ~~~~~~~~~~~~ पुरुषोतम भगवान राम का जन्म चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को पुनर्वसु नक्षत्र तथा कर्क लग्न में कौशल्या की कोख से हुआ था। यह दिन भारतीय जीवन में पुण्य पर्व माना जाता हैं। इस दिन सरयू नदी में स्नान करके लोग पुण्य लाभ कमाते हैं। अगस्त्यसंहिता के अनुसार मंगल भवन अमंगल हारी, दॄवहुसु दशरथ अजिर बिहारि॥ अगस्त्यसंहिता के अनुसार चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी, के दिन पुनर्वसु नक्षत्र, कर्कलग्‍न में जब सूर्य अन्यान्य पाँच ग्रहों की शुभ दृष्टि के साथ मेष राशि पर विराजमान थे, तभी साक्षात्‌ भगवान् श्रीराम का माता कौशल्या के गर्भ से जन्म हुआ। धार्मिक दृष्टि से चैत्र शुक्ल नवमी का विशेष महत्व है। त्रेता युग में चैत्र शुक्ल नवमी के दिन रघुकुल शिरोमणि महाराज दशरथ एवं महारानी कौशल्या के यहाँ अखिल ब्रह्माण्ड नायक अखिलेश ने पुत्र के रूप में जन्म लिया था। राम का जन्म दिन के बारह बजे हुआ था, जैसे ही सौंदर्य निकेतन, शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण कि‌ए हु‌ए चतुर्भुजधारी श्रीराम प्रकट हु‌ए तो माता कौशल्या उन्हें देखकर विस्मित हो ग‌ईं। राम के सौंदर्य व तेज को देखकर उनके नेत्र तृप्त नहीं हो रहे थे। देवलोक भी अवध के सामने श्रीराम के जन्मोत्सव को देखकर फीका लग रहा था। जन्मोत्सव में देवता, ऋषि, किन्नर, चारण सभी शामिल होकर आनंद उठा रहे थे। हम प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल नवमी को राम जन्मोत्सव मनाते हैं और राममय होकर कीर्तन, भजन, कथा आदि में रम जाते हैं। रामनवमी के दिन ही गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना का श्रीगणेश किया था। रामनवमी की पूजा विधि ~~~~~~~~~~~~~~~~ हिन्दू धर्म में रामनवमी के दिन पूजा की जाती है। रामनवमी की पूजा के लिए आवश्‍यक सामग्री रोली, ऐपन, चावल, जल, फूल, एक घंटी और एक शंख हैं। पूजा के बाद परिवार की सबसे छोटी महिला सदस्‍य परिवार के सभी सदस्‍यों को टीका लगाती है। रामनवमी की पूजा में पहले देवताओं पर जल, रोली और ऐपन चढ़ाया जाता है, इसके बाद मूर्तियों पर मुट्ठी भरके चावल चढ़ाये जाते हैं। पूजा के बाद आ‍रती की जाती है और आरती के बाद गंगाजल अथवा सादा जल एकत्रित हुए सभी जनों पर छिड़का जाता है। श्री रामनवमी व्रत विधि ~~~~~~~~~~~~~~~~ रामनवमी के दिन जो व्यक्ति पूरे दिन उपवास रखकर भगवान श्रीराम की पूजा करता है, तथा अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार दान-पुण्य करता है, वह अनेक जन्मों के पापों को भस्म करने में समर्थ होता है। रामनवमी का व्रत महिलाओं के द्वारा किया जाता है। इस दिन व्रत करने वाली महिला को प्रात: सुबह उठना चाहिए। घर की साफ-सफाई कर घर में गंगाजल छिड़क कर शुद्ध कर लेना चाहिए। इसके पश्चात स्नान करके व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद एक लकड़ी के चौकोर टुकड़े पर सतिया बनाकर एक जल से भरा गिलास रखना चाहिए और अपनी अंगुली से चाँदी का छल्ला निकाल कर रखना चाहिए। इसे प्रतीक रुप से गणेशजी माना जाता है। व्रत कथा सुनते समय हाथ में गेहूँ-बाजरा आदि के दाने लेकर कहानी सुनने का भी महत्व कहा गया है। रामनवमी के व्रत के दिन मंदिर में अथवा मकान पर ध्वजा, पताका, तोरण और बंदनवार आदि से सजाने का विशेष विधि-विधान है। व्रत के दिन कलश स्थापना और राम जी के परिवार की पूजा करनी चाहिए, और भगवान श्री राम का दिनभर भजन, स्मरण, स्तोत्रपाठ, दान, पुण्य, हवन, पितृश्राद्व और उत्सव किया जाना चाहिए। श्री रामनवमी व्रत कथा ~~~~~~~~~~~~~~~ राम, सीता और लक्ष्मण वन में जा रहे थे। सीता जी और लक्ष्मण को थका हुआ देखकर राम जी ने थोड़ा रुककर आराम करने का विचार किया और एक बुढ़िया के घर गए। बुढिया सूत कात रही थी। बुढ़िया ने उनकी आवभगत की और बैठाया, स्नान-ध्यान करवाकर भोजन करवाया। राम जी ने कहा- बुढिया माई, "पहले मेरा हंस मोती चुगाओ, तो में भी करूं।" बुढ़िया बेचारी के पास मोती कहाँ से आवें, सूत कात कर ग़रीब गुज़ारा करती थी। अतिथि को ना कहना भी वह ठीक नहीं समझती थी। दुविधा में पड़ गई। अत: दिल को मज़बूत कर राजा के पास पहुँच गई। और अंजली मोती देने के लिये विनती करने लगी। राजा अचम्भे में पड़ा कि इसके पास खाने को दाने नहीं हैं और मोती उधार मांग रही है। इस स्थिति में बुढ़िया से मोती वापस प्राप्त होने का तो सवाल ही नहीं उठता। आखिर राजा ने अपने नौकरों से कहकर बुढ़िया को मोती दिला दिये। बुढ़िया मोती लेकर घर आई, हंस को मोती चुगाए और मेहमानों की आवभगत की। रात को आराम कर सवेरे राम जी, सीता जी और लक्ष्मण जी जाने लगे। राम जी ने जाते हुए उसके पानी रखने की जगह पर मोतियों का एक पेड़ लगा दिया। दिन बीतते गये और पेड़ बड़ा हुआ, पेड़ बढ़ने लगा, पर बुढ़िया को कु़छ पता नहीं चला। मोती के पेड़ से पास-पड़ौस के लोग चुग-चुगकर मोती ले जाने लगे। एक दिन जब बुढ़िया उसके नीचे बैठी सूत कात रही थी। तो उसकी गोद में एक मोती आकर गिरा। बुढ़िया को तब ज्ञात हुआ। उसने जल्दी से मोती बांधे और अपने कपड़े में बांधकर वह क़िले की ओर ले चली़। उसने मोती की पोटली राजा के सामने रख दी। इतने सारे मोती देख राजा अचम्भे में पड़ गया। उसके पूछने पर बुढ़िया ने राजा को सारी बात बता दी। राजा के मन में लालच आ गया। वह बुढ़िया से मोती का पेड़ मांगने लगा। बुढ़िया ने कहा कि आस-पास के सभी लोग ले जाते हैं। आप भी चाहे तो ले लें। मुझे क्या करना है। राजा ने तुरन्त पेड़ मंगवाया और अपने दरबार में लगवा दिया। पर रामजी की मर्जी, मोतियों की जगह कांटे हो गये और आते-आते लोगों के कपड़े उन कांटों से ख़राब होने लगे। एक दिन रानी की ऐड़ी में एक कांटा चुभ गया और पीड़ा करने लगा। राजा ने पेड़ उठवाकर बुढ़िया के घर वापस भिजवा दिया। पेड़ पर पहले की तरह से मोती लगने लगे। बुढ़िया आराम से रहती और ख़ूब मोती बांटती। श्री राम नवमी व्रत का फल ~~~~~~~~~~~~~~~~~ श्री रामनवमी का व्रत करने से व्यक्ति के ज्ञान में वृ्द्धि होती है। उसकी धैर्य शक्ति का विस्तार होता है। इसके अतिरिक्त उपवासक को विचार शक्ति, बुद्धि, श्रद्धा, भक्ति और पवित्रता की भी वृ्द्धि होती है। इस व्रत के विषय में कहा जाता है, कि जब इस व्रत को निष्काम भाव से किया जाता है। और आजीवन किया जाता है, तो इस व्रत के फल सर्वाधिक प्राप्त होते हैं। रामनवमी और जन्माष्टमी तो उल्लासपूर्वक मनाते हैं पर उनके कर्म व संदेश को नहीं अपनाते। कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया गीता ज्ञान आज सिर्फ एक ग्रंथ बनकर रह गया है। तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में भगवान राम के जीवन का वर्णन करते हुए बताया है कि श्रीराम प्रातः अपने माता-पिता के चरण स्पर्श करते थे जबकि आज चरण स्पर्श तो दूर बच्चे माता-पिता की बात तक नहीं मानते। श्री रामावतार स्तुति ~~~~~~~~~~~~~~ भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी . हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी .. लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी . भूषन वनमाला नयन बिसाला सोभासिन्धु खरारी .. कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता . माया गुन ग्यानातीत अमाना वेद पुरान भनंता .. करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता . सो मम हित लागी जन अनुरागी भयौ प्रकट श्रीकंता .. ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै . मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै .. उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै . कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै .. माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा . कीजे सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा .. सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा . यह चरित जे गावहि हरिपद पावहि ते न परहिं भवकूपा .. – दोहा – विप्र धेनु सुर सन्त हित, लीं मनुज अवतार। निज इच्छा निर्मित कर, श्री माया गुण गोपाल।। श्री राम स्तुति: ~~~~~~~~~~ श्री रामचन्द्र कृपालु भजुमन हरण भवभय दारुणं । नव कंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुणं ॥१॥ कन्दर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरद सुन्दरं । पटपीत मानहुँ तडित रुचि शुचि नोमि जनक सुतावरं ॥२॥ भजु दीनबन्धु दिनेश दानव दैत्य वंश निकन्दनं । रघुनन्द आनन्द कन्द कोशल चन्द दशरथ नन्दनं ॥३॥ शिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अङ्ग विभूषणं । आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जित खरदूषणं ॥४॥ इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनं । मम् हृदय कंज निवास कुरु कामादि खलदल गंजनं ॥५॥ मन जाहि राच्यो मिलहि सो वर सहज सुन्दर सांवरो । करुणा निधान सुजान शील स्नेह जानत रावरो ॥६॥ एहि भांति गौरी असीस सुन सिय सहित हिय हरषित अली। तुलसी भवानिहि पूजी पुनि-पुनि मुदित मन मन्दिर चली ॥७॥ ॥सोरठा॥ जानी गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि । मंजुल मंगल मूल वाम अङ्ग फरकन लगे। आप सभी धर्म प्रेमी सज्जनों को श्री राम जन्मोत्सव की हार्दिक मंगलकामनाये आचार्य डॉ0 विजय शंकर मिश्र ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

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sn.vyas Apr 21, 2021

श्रीरामनवमी नौमी तिथि मधुमास पुनीता, सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता। मध्य दिवस अति सीत न घामा, पावन काल लोक बिश्रामा।। (श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड ) ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतूनां षट समत्ययुः। ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ।।१।। नक्षत्रेदितिदैवत्येस्वोच्चसंस्थेषु पञ्चसु। ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह।।२।। कौशल्याजनयद्रामं दिव्यलक्षणसंयुतम्। लोहिताक्षं महाबाहुं रक्तोष्टं दुन्दुभिस्वनम् ।।३।। (बाल्मीकि रामायण -बालकाण्ड सर्ग ७) भगवान् राम के प्राकट्य के दिन पाँच ग्रह अपने उच्च स्थान में स्थापित थे, नवमी तिथि चैत्र शुक्लपक्ष तथा पुनर्वसु नक्षत्र था, कर्कट लग्न में बृहस्पति तथा चन्द्रमा विराजित थे। भगवान् का अवतार २४वें चतुर्युग के त्रेता में हुआ था ऐसा अनेक पुराणों में है। सब गुन जुक्त समय जब आवा प्रगटे राम सबहि मन भावा चैत मास पाख उजियारा नौमी तिथि अरु दिन शशि वारा नखत पुनर्वसु अभिजित देषा कर्क लग्न ग्रह सात विशेषा राम को जन्म पत्र है जैसा सो मैं कहौं सुनो अब तैसा तब लिखि रिषिन्ह संस्कृत राषा तापर मैं अब करत हौं भाषा त्रेता जाहिं आठ अरु बीसा तब अवतार लेत जगदीसा बावन जुग की बात है लाल अवधि विस्तार तेरह त्रेता होइ गये भए राम अवतार सोरह वर्ष विवाह करि द्वादस घर बिश्राम बनोबास करि चारि दस राज्य करत पुनि राम -मधुमासे सिते पक्षे नवम्यां कर्कटे शुभे पुनर्वस्वरिक्षे सहिते उच्चस्थे गृह पंचके मुखे पूषनि संप्राप्तो पुष्य वृष्टि समाकुले आविरासीज्जगन्नाथ परमात्मा सनातनः जन्म मरण जीवन जरा नाम रूप ग्रह भाग लाल राम को कछु नहीं देह धरे गुण लाग अध्यात्म रामायण में :-- मधुमासे सिते पक्षे नवम्यां कर्कटे शुभे। पुनर्वस्वृक्षसहिते उच्चस्थे ग्रहपञ्चके॥ मेषं पूषणि संप्राप्ते... सर्ग ३, श्लोक १४,१५. --------------------- श्रीरामनवमी नौमी तिथि मधुमास पुनीता, सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता। मध्य दिवस अति सीत न घामा, पावन काल लोक बिश्रामा।। (श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड ) ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतूनां षट समत्ययुः। ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ।।१।। नक्षत्रेदितिदैवत्येस्वोच्चसंस्थेषु पञ्चसु। ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह।।२।। कौशल्याजनयद्रामं दिव्यलक्षणसंयुतम्। लोहिताक्षं महाबाहुं रक्तोष्टं दुन्दुभिस्वनम् ।।३।। (बाल्मीकि रामायण -बालकाण्ड सर्ग ७) भगवान् राम के प्राकट्य के दिन पाँच ग्रह अपने उच्च स्थान में स्थापित थे, नवमी तिथि चैत्र शुक्लपक्ष तथा पुनर्वसु नक्षत्र था, कर्कट लग्न में बृहस्पति तथा चन्द्रमा विराजित थे। भगवान् का अवतार २४वें चतुर्युग के त्रेता में हुआ था ऐसा अनेक पुराणों में है। -------- पद्म पुराण व अगस्त्य संहिता :- उच्चस्थे ग्रहपञ्चके सेन्दौ नवम्यां तिथौ. लग्ने कर्कटके पुनर्वसुयुते मेषं गते पूषणि। निर्दग्धुं पलाशसमिधो मेध्यादयोध्यारणेः। आविर्भूतमभूतपूर्वमपरं यत्किंचिदेकं महः। ॐनमो भगवते वासुदेवाय नमोऽनन्ताय सहस्रशीर्षाय क्षीरोदार्णवशायिने शेषभोगपर्यङ्काय गरुडवाहनाय अजाय अजिताय पीतवाससे वासुदेव सङ्कर्षण प्रद्युम्न अनिरुद्ध हयशिरो वराह नरसिंह वामन त्रिविक्रम राम राम राम नमोऽस्तु ते नमोऽस्तु ते नमोऽस्तु ते ।। ✍🏻अत्रि विक्रमार्क अन्तर्वेदी रामनवमी : राम जी लिहलें अवतार रे चइतवा फागुन रेचक है। वास्तविक मधुउत्सव तो चैत्र में होता है। नौ दिन नवदुर्गा अनुष्ठान, जन जन में रमते राम का नवजन्म नये संवत्सर में। नवान्न दे पुनः प्रवृत्त होती धरा का स्वेद सिंचन, धूप में सँवरायी गोरी का पिया को आह्वान - गहना गढ़ा दो न, बखार तो सोने से भर ही गयी है! चैत में शृंगार का परिपाक होता है। गेहूँ कटता है, रोटी की आस बँधती है, मधुमास भिन्न भिन्न अनुभूतियाँ ला रहा होता है एवं ऐसे में उस राम का जन्म होता है जो आगे चल कर मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाये किंतु उनके जन्मोत्सव में जो भिन्न भिन्न पृष्ठभूमियों के लोकगायकों एवं नर्तकों की हर्षाभिव्यक्ति होती है, उसमें उल्लास स्वर नागर शास्त्रीयता तथा अभिरुचि की मर्यादाओं को तोड़ता दिखता है। इसमें गाये जाने वाले चइता चइती की टेर अरे रामा, हो रामा होती है। चइता पुरुष गान है। पूरी प्रस्तावना के साथ गान होता है। प्रकृति भी आने वाले के स्वागत में है, रसाल फल गए हैं, महुवा मधुवा गए हैं, पवन कभी लहराता है तो कभी सिहराता है। घर में नया अन्न आ गया है, पूजन हो रहा है, मंगल गान है, क्रीड़ा है। मस्ती भरे वातावरण में राम जी जन्म लेते हैं! ढोल की ढमढम के साथ बधाई गीतों की धूम है। सावन से न भादो दूबर, फागुन से ह चइत ऊपर गजबे महीना रंगदार रे चइतवा। ✍🏻गिरिजेश राव श्री राम का सत्य सर्वप्रिय धर्म स्वरूप......... यदि वेदव्यास, आद्य शंकराचार्य, स्वामी दयानन्द आदि वेदज्ञ ऋषि ज्ञान की किसी परोक्ष संस्कृति के किनारे हैं, यदि भगवान श्रीकृष्णचन्द्र अथाह प्रेम और गहन आध्यात्म की किसी अपूर्व धवल जाह्नवी के तट पर हैं, तो श्री रामचन्द्र धर्म, कर्म और करुणा की त्रिवेणी के हृदयंगम प्रयाग-संगम पर खेल रहे हैं। अनन्त ब्रह्माण्डनायक ने संसार नाटक में श्रीराम के रूप में अपूर्व नायक बनकर सारे धर्म को स्वयं में समेट लिया। यदि सूर्य यथासमय उदित-अस्त होने का, चन्द्र प्रतिपक्ष घटने-बढ़ने का, ऋतुएं क्रम से आविर्भूत होने का अपना धर्म निभाती हैं तो वह श्रीराम के चरित्र से ही उन्होंने ग्रहण किया। संसार के इतिहास का सारा का सारा धार्मिक व्याख्यान भगवान श्री राम के जीवन में ही अन्तर्निहित है। धर्म क्या है? उसका स्वरूप क्या है? मनुष्यों से लेकर ऋषि भी इस सम्बन्ध में मोहित रहते हैं, इसलिए भगवान विष्णु ने जब राम रूप में धर्मावतार लिया, तो धर्म के मूल वेदों ने भी वाल्मीकि के माध्यम से रामायण के रूप में अवतार ग्रहण किया --"वेदवेद्ये परे पुंसि......रामायणात्मना।" राम साक्षात् मूर्तिमान धर्म हैं। भगवान राम के अवतार का मुख्य प्रायोजन क्या है, वेदव्यास जी कहते हैं, "मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं..." श्री राम का अवतार मानव जीवन कैसा होना चाहिए, यही बताने के लिए हुआ। हिन्दू संस्कृति में हमेशा यही मान्यता रही है कि, बेटा हो तो राम जैसा, भाई हो तो राम लक्ष्मण जैसे, मित्र हो तो राम जैसे, स्वामी हों तो राम जैसे, पति हों तो राम जैसे, क्योंकि संसार में जितने भी परस्पर धर्म सम्भव हैं उन सबका स्त्रोत श्रीराम का ही चरित है। श्रीराम की प्रतिज्ञा थी कि सीता के अतिरिक्त हर स्त्री मेरे लिए माता कौशल्या के समान है, यज्ञपूर्ति के लिए भी अन्य विवाह न कर सीताजी की स्वर्ण मूर्ति से कर्तव्यपूर्ति की| वहीं सीताजी ने भी राम जी को कह दिया, यदि आप मुझे वन लेकर नहीं चलेंगे तो मेरा मरा मुख देखेंगे| एक बार सीताजी को श्रीराम की याद में विह्वल देखकर उनकी सखी वासन्ती ने कहा, सखी! तुम ऐसे निष्ठुर पति राम के लिए क्यों इतने गहरे और लम्बे श्वास छोड़ रही हो तो तुरंत सीताजी बोलीं, “श्रीराम निष्ठुर नहीं हैं| मैं बहिरंग दृष्टि से ही उनसे दूर हूँ, वस्तुतः उनके हृदय की रानी मैं ही हूँ|” इसलिए रामजानकी का जोड़ा ही भारतीय आदर्श रहा है| जब तक यह जोड़ा भारत का आदर्श रहा, भारत का दाम्पत्य जीवन भी आदर्श और समृद्ध रहा, अब इस जोड़े पर प्रहार हो रहे हैं, सीता को राम से और राम को सीता से अलग दिखाया जा रहा है, उसका नतीजा सबको दिख ही रहा है| श्रीराम गौ और ब्राह्मणों की रक्षा और देश के हित के लिए अपने गुरु की आज्ञा पालन में हमेशा उद्यत रहे, 'गोब्राह्मणहितार्थाय देशस्य च हिताय च...', ‘विप्र धेनु सुर संत हित, लीन्ह मनुज अवतार’| वसिष्ठ जी नेत्रों में अश्रु लाकर कैकेयी से कहने लगे, न हि तद्भविता राष्ट्रं यत्र रामो न भूपतिः। तद्वनं भविता राष्ट्रं यत्र रामो निवत्स्यति।। “जहाँ राम राजा नहीं हैं वह देश राष्ट्र नहीं है और जहाँ राम निवास करेंगे वह वन भी राष्ट्र हो जाएगा।" भारत की भूमि पर राज करने वाले न जाने कितने ही राजा हुए हैं, सब चले गए। धूल में मिल गए। किन्तु भगवान श्री राम, भारतवर्ष के हम सभी हिन्दूओं के हृदय के चिरंजीवी राजा हैं, जिनका राज अटल है। हमारे हृदय के सिंहासन पर अन्य कोई सत्ताधीश नहीं बैठ सकता। श्री राम केवल हमारी स्मृतियो में नहीं है, वह वर्तमान हैं, अमरभाव लीला हैं। इस राष्ट्र के अपान व हमारी संस्कृति के प्राण है श्री राम । श्रीराम का रामराज्य कैसा था इस पर महर्षि कम्ब ने लिखा है, “वहाँ खेतों में हल जोतने पर सोना निकल पड़ता है, भूमि को समतल बनाने पर रत्न बिखर जाते हैं| बड़ी बड़ी नावें विदेशों से अनंत निधियां लाती हैं और धान की कटी बालियों का ढेर आसमान छूता पड़ा हुआ है| वहां कहीं भी कोई पाप-कृत्य नहीं होता, इसलिए किसी की अकाल मृत्यु नहीं होती| लोगों के चित्त विशुद्ध रहते हैं अतः किसी के मन में बैर या द्वेषभाव नहीं रहता| वहाँ के निवासी धर्मकृत्यों को छोड़ अन्य कोई कार्य नहीं करते अतः सदा प्रजा की उन्नति ही होती है| उस देश में दान का महत्व नहीं है क्योंकि वहाँ कोई याचक नहीं है| शूरता का महत्व नहीं है क्योंकि वहाँ युद्ध नहीं होते| सत्य का महत्व नहीं है क्योंकि वहाँ कोई असत्य भाषण करता ही नहीं| और पण्डितों का भी महत्व नहीं क्योंकि वहाँ सभी बहुश्रुत तथा ज्ञानी हैं| वहाँ लोग शीलवान हैं इसलिए उनका सौन्दर्य नित नवीन रहता है| वहाँ वर्षा समय पर होती है क्योंकि स्त्रियों का आचरण अत्यंत ही पवित्र है| वहाँ के निवासियों में चोरों का डर न होने से सम्पत्ति की रक्षा करने वाले रक्षक नहीं हैं| वहाँ कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जो विद्यावान न हो, इसलिए वहाँ पृथक रूप से विद्याओं में पूर्ण पारंगत कहने योग्य व्यक्ति कोई नहीं है और सब विद्याओं में निपुण न होने वाला अपण्डित भी कोई नहीं है| वहाँ सब लोग सब प्रकार के ऐश्वर्यों से सम्पन्न हैं इसलिए पृथक रूप से धनिक कहने योग्य कोई व्यक्ति है ही नहीं, फिर निर्धन का तो प्रश्न ही नहीं...........| ” श्रीराम का जीवन बाल्यकाल से ही विलक्षण रहा, छोटी सी उम्र में उन्होंने ताड़का को मार गिराया, बला और अतिबला जैसी विद्याएँ ग्रहण कीं, वहीं युगों से शिला बनी गौतमपत्नी अहिल्या का उद्धार कर दिया, असंख्य राजा जिस धनुष को हिला न सके, क्षणभर में ही उसे तोड़ डाला, जानकी जी का हृदय पुलकित हो उठा और पैर धोने वाले राजा जनक को रोमांच हो गया, विश्मामित्र जिन्हें गले से लगाकर तृप्त हो गए, परशुराम जी के हृदय से भी जिन्होंने प्रेम का सोता बहा दिया, देवता उन्हें देखने की होड़ करते वहीं लताएं भी उन्हें पति मानतीं, ब्रह्मा केवल आठ ही आँखों से उन्हें देख पाने के कारण पछताते हैं, वहीं इंद्र सहस्रनेत्रों के श्राप से धन्य हो गए, राजतिलक हो या वनवास, एक टेढ़ी रेखा जिनके मस्तक पर नहीं आई, वन की ओर जाते देखने वालों की दृष्टि भी वन में पहुँच गई, पर खींचकर लाने का वे साहस न कर सके, जिनके वन जाने से गायें भी रोयीं, बछड़े भी, उपवन और पक्षी भी, घोड़े और हाथी भी रोने लगे, अपने लक्ष्यभूत परमतत्व को आते देख गंगा के मुनि तपस्या छोडकर भाव विह्वल से हो गए, केवट जिनके पैर धोकर अपनी दो दो नैया पार लगाता है, उसे कुछ दे न सके यह सोचकर राम लज्जित होते हैं, जानकी के पैरों में चुभे कांटे हाथ से निकालकर अश्रुओं से उन्हें धो रहे हैं, अनंत ब्रह्मांडों का पालक पर्णकुटी में ठहरा है, सर्वानन्द परमात्मा अपनी प्रिया के वियोग में पेड़ पौधों को व्यथा कहने लगा, शबरी के बेर खाकर भगवान में बड़ी तृप्ति है और शबरी की इसी में तृप्ति है, वन काननों को लाखों दुष्टों से हीन करने वाले, मुनियों के सामने विनत हैं, हनुमान को जिन्होंने हृदय में स्थान दिया और खुद हनुमान के हृदय में जा बैठे, पक्षी जटायु का भी पिता समान पिंडदान करने वाले, धर्मरक्षा के लिए नीति से बाली को मारने वाले, उद्दंड वानरों को भी धर्म कार्य में उद्दत कर देने वाले, जिनके नाममात्र से पत्थर पानी में कमल के जैसे खिलने लगे, सारे राक्षस समुदाय का हृदय कम्पित है, मारीच की तरह कुम्भकर्ण भी श्रीविष्णु को जानता है, पर उनके हाथों मरने का उत्साह है, जिनके चरणों में आकर विभीषण पार हो गया, रावण का वध कर सारे भूमण्डल का भार जिन्होंने उतार डाला, सियाजी को पाकर जिनका रोम रोम पुलकित है, और भक्तों के आनन्द का पार नहीं है, भरत का भार उतारने तुरंत ही चल पड़े, अवधपुरी में ऐसा आनन्द समाया कि संसार की दीवाली करोड़ों साल में भी खत्म नहीं हुई, ऐसे अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक अशरण शरण अकारण करुण कृपण कृपावत्सल करुणा वरुणालय भगवान परात्पर परब्रह्म श्री रामचन्द्र राघवेन्द्र जानकीवल्लभ परमानन्दकन्द का नाम लेना ही पर्याप्त है, यही श्रुतियों का रहस्य है। भगवान श्री राम जिन्होंने एक पत्नीव्रत का मानवीय आदर्श संसार में चलाया, रावण के अधर्म से संसार का त्राण किया, भारत के आर्यसाम्राज्य को शास्त्र की कल्याणकारिणी आज्ञाओं में कसकर रामराज्य का महान आदर्श बनाया, उन्हीं भारतरक्षक, धर्मोद्धारक, पापसंहारक श्री राम की विभूति के समक्ष समस्त भारत ने सर झुकाया व झुका रहा है। आज श्री राम को अनेक प्रकार से कुछ वास्तविक व कुछ काल्पनिक धारणाओं द्वारा जाना जाता हो, किन्तु रामायणकार ने हमें मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का जो रूप प्रत्यक्ष कराया है, वह सबका ही पूजनीय है, विश्ववंद्य है, परमोज्जवल, पूर्ण सत्य, स्तुत्य और अनुकरणीय है। हमारे सत्य सनातन वैदिक धर्म के प्रखर दीप्त प्रभाकर भगवान श्री राम के प्राकट्यदिवस की सभी प्रभु भक्तों को हार्दिक शुभकामनाएं।

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sn.vyas Apr 21, 2021

...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!......... ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° *भगवान राम की महानता यह है कि* *उन्होंने निडर और डरपोक* *दोनों को ही स्वीकार किया।* °" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "° बालि से सन्त्रस्त होकर ऋष्यमूक पर्वत में छिपकर रह रहे सुग्रीव ने जब भगवान् राम और लक्ष्मण को आते देखा तो सुग्रीव बड़े ही भयभीत होकर हनुमान जी से कहने लगे कि उन दोनों राजकुमारों को देखो। मुझे तो लग रहा है कि बालि ने इन दोनों को मुझे मारने के लिए भेजा है। परन्तु आप वेष बदलकर यह पता लगाइए कि ये कौन हैं ? हनुमानजी से सुग्रीव जी ने कह दिया कि -- *धरि बट रूप देखु तँ जाई।* -- आप जरा ब्राह्मण का रूप बनाकर जाइए और देखकर मुझे वहीं से संकेत कर दीजिएगा कि यह कौन हैं ? हनुमान जी ने पूछा कि अगर बालि के भेजे हुए हैं तो आप क्या करेंगे ? सुग्रीव ने कहा -- बस अपने पास तो एक ही कला है। क्या ? बोले -- *पठए बालि होहिं मन मैला।* *भागौं तुरत तजौं यह सैला।।* -- मैं यहाँ से भाग जाऊँगा । इस प्रसंग में बड़ी अनोखी सी बात यह है कि हनुमानजी कभी न भागने वाले, और सुग्रीव जी बड़े भगोड़े हैं, तो अब दोनों में किसका मार्ग ठीक है ? इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि *भागने का भी सदुपयोग होना चाहिए और न भागने का भी।* इसलिए सुग्रीव यद्यपि बड़े डरपोक हैं और हनुमानजी में डर का लेश भी नहीं है। पर *भगवान राम की महानता यह है कि उन्होंने निडर और डरपोक दोनों को ही स्वीकार किया।* निर्भीक हनुमानजी तो उनके महान सेवक हैं ही, पर भगवान ने सुग्रीव के भय का भी सदुपयोग कर लिया। आगे चलकर वर्णन आता है कि जब चार महीने तक सुग्रीव भगवान् राम से मिलने नहीं आए तब प्रभु ने कहा -- लक्ष्मण! मैंने निश्चय किया है कि सुग्रीव का वध भी मैं कल उसी बाण से कर दूंगा जिससे मैंने बालि का वध किया था। लक्ष्मणजी ने कहा -- महाराज! मुझे आज्ञा दीजिए मैं अभी जाकर यह कार्य पूरा कर देता हूँ। प्रभु ने कहा -- लक्ष्मण ! उसे मारने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि वह तो बड़े डरपोक स्वभाव का था, मैंने डर छुड़ा दिया तो मुझे भी भूल गया। इसलिए तुम जाकर फिर से थोड़ा सा डर पैदा कर दो तो फिर से मेरे पास आ जाएगा -- *तब अनुर्जाह समुझावा रघुपति करुनासींव।* *भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव।।* ४/१८ -- बस यही है डर का सदुपयोग। भगवान राम ने कितनी मनोवैज्ञानिक बात कही ? लक्ष्मणजी ने कहा -- मैं अभी जाकर डराता हूँ। तो तुरंत हाथ पकड़ लिया भगवान ने। प्रभु का तात्पर्य था कि सावधानी से डराना। क्योंकि वह जितना डरने वाला है उतना ही भागने वाला भी है, तो कहीं ऐसा न डराना कि मुझसे दूर भाग जाय। इसलिए -- *भय देखाइ ले आवहु* -- ऐसा डराना कि भाग कर इधर ही आए कहीं उधर न भाग जाए। इसका अभिप्राय है कि अगर कोई पलायन करके भगवान की ओर भागे तो यह पलायन (भागने) का सदुपयोग है। हनुमानजी जब ब्राह्मण बनकर गये तो जाते ही उन्होंने प्रभु को प्रणाम किया। और जब भगवान् श्री राघवेन्द्र का राज्याभिषेक हो गया तो प्रभु ने एक दिन एकान्त में हनुमान जी से पूछा -- हनुमान ! नाटक में तो जो बने उसका पूरी तरह से निर्वाह करना चाहिए। किन्तु तुम जब पहली बार ब्राह्मण बनकर आए और मैं क्षत्रिय के रूप में था तो तुम्हें यह चाहिए था कि तुम यह आशा करते कि क्षत्रिय मुझे प्रणाम करे परन्तु तुमने मुझे प्रणाम क्यों कर दिया ? वस्तुतः प्रभु तो हनुमानजी के भाव की उज्ज्वलता को प्रकट करने के लिए ही ऐसा प्रश्न कर रहे थे। वैसे तो प्रभु सब जानते ही हैं । प्रभु का प्रश्न सुनकर हनुमान जी ने भगवान के चरणों को कसकर पकड़ लिया और कहा -- प्रभु ! यह बताइए कि ब्राह्मण की क्या यही परिभाषा है कि जो किसी को प्रणाम न करे, वह ब्राह्मण है ? जो कभी सिर न झुकावे वह ब्राह्मण है! नहीं - नहीं महाराज ? शास्त्र ब्राह्मण की यह परिभाषा नहीं करता है। अपितु शास्त्र ने तो ब्राह्मणत्व की परिभाषा करते हुए यह कहा कि -- *ब्रह्म जानाति सब्राह्मण* -- जो ब्रह्म को जान ले वही ब्राह्मण है। तो महाराज ! जब मैंने आपको प्रणाम किया तो ब्रह्म समझकर प्रणाम किया था, क्षत्रिय समझकर नहीं। तो वस्तुतः सच्चा ब्राह्मण तो वही है जो ब्रह्म को पहचान ले न कि जो अकड़कर खड़ा हो जाय कि मैं तो ब्राह्मण हूँ। हनुमान जी ने कहा प्रभु ! उस दिन ब्राह्मणत्व का जितना सदुपयोग हुआ उतना तो कभी भी नहीं हुआ। इस प्रकार हनुमान जी अपने ब्राह्मणत्व का भी सदुपयोग करते हैं । अपने ब्राह्मणत्व का सदुपयोग करने के बाद हनुमान जी ने प्रभु से पूछ दिया -- महाराज! आप कौन हैं ? प्रभु ने पूछा-आप बताइए कि आपको क्या लगता है ? हनुमानजी ने कहा कि -- *जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार।* *की तुम्ह अखिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार।।* ४/१ हनुमान जी का वाक्य सुनकर प्रभु हँसे और तब प्रभु ने हनुमान जी को अपना चरित्र सुनाया। 📖 जय गुरुदेव जय सियाराम 🙏 आप सभी देशवासियों को भगवान श्री राम जन्मोत्सव पर हार्दिक शुभकामनाएं जय श्री राम स्वस्थ रहें मस्त रहें व्यस्त रहें

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sn.vyas Apr 21, 2021

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sn.vyas Apr 20, 2021

🖼⚗🖼⚗🖼⚗🖼⚗🖼⚗ *🙏🏻सादर वन्दे🙏🏻* *🚩धर्मयात्रा🚩* *⛩️चौबीस खम्बा ⛩️* *🔱महालया एवं महामाया देवियाँ 🔱* श्री महाकालेश्वर मन्दिर के पास से पटनी बाजार की ओर जाने वाले मार्ग पर यह पुरातन द्वार *‘ चौबीस खम्बा ’* कहलाता है। यह द्वार बहुत प्राचीन है। यहाँ पर 12 वीं शताब्दी का एक शिलालेख लगा हुआ था उसमें लिखा था कि अनहीलपट्टन के राजा ने अवन्ति में व्यापार करने के लिए नागर व चतुर्वेदी व्यापारियों को यहाँ लाकर बसाया था। ऐसा अनुमान होता है , कि द्वार के दोनों पार्श्व भागों में चौबीस खम्बे लगे हैं और इसलिए इसे चौबीस खम्बा दरवाजा कहते हैं। इस दरवाजे को महामाया देवी मानते हैं , यहाँ पर *महालया एवं महामाया दो देवियों* की मूर्तियाँ हैं और शारदीय नवरात्री की महाष्टमी पर कलेक्टर दोनों देवियों को मदिरा पिलाकर शासकीय पूजा करते है।इसके बाद नगर के अन्य देवी व भैरव मंदिर में पूजा होती है । तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध उज्जयिनी के चारों द्वार पर भैरव तथा देवी विराजित है , जो आपदा-विपदा से नगर की रक्षा करते है ,चौबीसखंबा माता उनमे से एक है । कभी यह महाकाल वन का मुख्य प्रवेश द्वार रहा है । अब कालांतर में यह नगर के मध्य विराजित है। मंदिर के समीप पटनी बाज़ार तथा सराफा बाजार जैसे प्रमुख बाज़ार है। जिससे बड़े व छोटे कारोबारी जुड़े हुए है ।चौबीसखंबा माता मंदिर पुरात्तव विभाग के अधीन संरक्षित स्मारक है । यह मंदिर करीब १००० साल पुराना होकर परमारकालीन स्थापत्य कला तथा द्वार परंपरा का उत्कृष्ट उदारहण है । 🖼⚗🖼⚗🖼⚗🖼⚗🖼⚗🖼⚗

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sn.vyas Apr 20, 2021

...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!......... ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° *दृष्टि दोष-दर्शन पर नहीं,* *बल्कि गुण-दर्शन पर हो।* °" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "° अहल्या को महर्षि गौतम ने शाप दिया और कबन्ध को दुर्वासा ने शाप दिया। पर दोनों की दृष्टि में आपको भिन्नता दिखाई देगी। अहल्या जब भगवान के चरणों के स्पर्श से चेतन हुई तो कह सकती थी कि महाराज! आप बड़े सज्जन हैं, मेरे पति तो बड़े क्रोधी हैं। क्योंकि एक छोटे से अपराध पर उन्होंने मुझे इतना बड़ा शाप दे दिया। अगर ऐसी बात अहल्या कहती तो गौतम के व्यवहार की दृष्टि से कोई अटपटी बात नहीं होती। लेकिन अहल्या की दृष्टि कितनी सुन्दर है ! अहल्या को उस समय महर्षि गौतम की याद आई और तुरत उसने भगवान राम के चरणों में प्रणाम करके कहा -- प्रभु ! मैं आपकी कृतज्ञ तो हूँ ही लेकिन अपने पतिदेव की और भी अधिक कृतज्ञ हूँ। क्योंकि -- *मुनि साप जो दीन्हा अति भल कीन्हा* *परम अनुग्रह मैं माना।* *देखेउँ भरि लोचन हरि भव मोचन* *इहइ लाभ संकर जाना।।* १/२११ -- महाराज ! वरदान का लक्ष्य अन्त में भगवान की प्राप्ति ही तो है। तो *जो ईश्वर, वरदान से मिलता है अगर शाप से मिल जाय, तब तो वरदान की अपेक्षा शाप ही अच्छा है।* मेरे पतिदेव ने बड़ी कृपा की जो मुझे शाप दे दिया। और जब भगवान राम अहल्या को इस प्रकार की वाणी को सुनते हैं तो समझ लेते हैं कि इसकी दृष्टि दोष-दर्शन पर नहीं है बल्कि गुण-दर्शन पर है। ☯️ जय गुरुदेव जय सियाराम 🙏

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sn.vyas Apr 20, 2021

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sn.vyas Apr 20, 2021

🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩 *की प्रस्तुति* 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘️ *नवरात्र के पावन अवसर पर चल रही नारीगाथा पर आज एक विषय पर सोंचने को विवश हो गया कि नारियों पर हो रहे अत्याचारों के लिए दोषी किसे माना जाय ??? पुरुषवर्ग को या स्वयं नारी को ??? परिणाम यह निकला कि कहीं न कहीं से नारी की दुर्दशा के लिए नारी ही अधिकतर जिम्मेदार है | जब अपने साथ कम दहेज लेकर कोई नववधू ससुराल पहुँचती है तो उसे ताने देने वाली उसरी सास व ननद भी नारी ही होती हैं | जल्दी से जल्दी पौत्र के दर्शन की लालसा रखकर कन्या पैदा होने पर बहू को तिरस्कृत करने वाली सास भी नारी ही है | लगातार कई कन्याओं के जन्म पर बहू का वित्छेदन कराने वाली व कोख में कन्या की बलि देने वाली भी एक नारी ही होती है | ऐसा क्यों है ???? इस पर विचार करने पर परिणाम मिला कि यह सब संस्कारों का प्रभाव है | क्योंकि एक नारी हमेशा कोमलांगी , सहनशील , संस्कारवान, संस्कृति की धरोहर को अपने अंदर समेटे हुए विशाल हृदया, विनयी, लज्जाशील रही है | किन्तु जहां ही इन गुणों का परित्याग हुआ है वहाँ नारी का अपमान होते देर नहीं लगी है | नारी को ही संस्कारों की धात्री क्यों कहा जाता है? क्यों पुरुष को ये गौरव नहीं मिला ????? नारी का हर रूप मनभावन होता है जब वह छोटी सी नन्ही परी के रूप मे जन्म लेती है अपनी मन मोहक कलाओं से सबके दिलों पर छा जाती है |* *आज के पाश्चात्य संस्कृति से ओतप्रोत नारी का केवल बाहरी सौंदर्य देखने वाले विक्षिप्तों ने तो इसकी परिभाषा ही बदल दी है | अपनी अवस्थिति के लिए नारी स्वयं भी कई बार दोषी होती है | शायद कुछ आजाद विचारों वाली महिलाएं मेरे कथन से सहमत न हों , किन्तु सत्य तो सत्य है | उत्तम संस्कारों वाली महिलाएं अपनी संतानों को ही नहीं बल्कि कई पीढ़ियों को शुद्ध कर देती है | इसलिए नारी का संस्कारी होना उतना ही जरूरी है जितना हम सब जीवों और पेड़ पौधों को जीवित रहने के लिए पानी | उसे विभिन्न रूपों मे अपने दायित्वों का भली भांति निर्वहन करना होता है और हमेशा वह ही स्त्री खरी उतर पाती है जो इन गुणों से परिपूर्ण होती है | मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि क्षमा, प्रेम, उदारता, निरभिमानता , विनय , समता ,शांति , धीरता , वीरता , सेवा , सत्य, पर दुःख कातरता , शील , सद्भाव , सद्गुण इन सभी सौंदर्य से युक्त नारी गरिमामयी बन पाती है | लज्जा नारी का भूषण है और यह शील युक्त आँखों मे रहता है | समानता का गुण भी महिलाओं को ही प्राप्त है किन्तु आज की नारी असमान रहने को ही अपनी विजय मानती है | जबकि वह चाहे तो समान दृष्टि रख कर परिवारों को टूटने से बचा सकती है | सिर्फ अपना अपना करने चाहत ने आज परिवारों को तोड़ दिया है जबकि ये गुण संस्कारी महिलाओं का नहीं है | उसे तो समानता का गुण मिला है | उसे अपने निज गुण का ही अनुसरण करना चाहिए | दुःख कष्ट और प्रतिकूलता सहन करने का स्वाभाविक गुण महिलाओं को ही प्राप्त है | नारी पुरुष की अपेक्षा अधिक सहन शील होती है | कुशल प्रबंधन का स्वाभाविक गुण भी महिलाओं का है वे बहुत अच्छी तरह एवं श्रेणी बद्ध तरीके से हर काम को अंजाम देती है, घर हो या बाहर दोनों जगहों पर नारी ने स्वयं को सिद्ध किया है |* *इतने सारे गुण होने पर भी यदि नारी में संस्कार नहीं होते हैं तो ये गुण अवगुण में परिवर्तित हो जाते हैं और नारी ही नारी की दुशमन बन जाती है |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵️ *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟

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