sn vyas Nov 26, 2020

*💐..देवप्रबोधनी...ब्याह उत्सव.* *२६-११-२०💐* आज लालनकी होत सगाई।। आवोरी गोपीजन मिलकें, गावो मंगलचार बधाई।।१।। चोटी चुपर गुहुं सुत तेरी, छांडो चंचलताई।। वृषभान गोप टीको दे पठ्यो, सुंदर जान जान कन्हाई।।२।। जो तुमकों या भांत देखहें, करहैं कहा बडाई।। पहर बसन आभूषन सुंदर, उनको देहु दिखाई।।३।। नखसिख अंग सिंगार महरि मणि, मोतीन कि माला पहराई।। बैठे आय रत्नचोकी पर, नर नारिनकी भीर सुहाई।।४।। विप्र प्रवीन तिलक कर मस्तक, अक्षत चांप लियो अपनाई।। बाछत ढोल भेर और महुवर, नौबत ध्वनि धनघोर बजाई।।५।। फूली फिरत जसोदारानी, वार कुंवर पर बसन लूटाई।। परमानंद नंदके आंगन, अमर गण पोहोपन झर लाई ।।६।।

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sn vyas Nov 26, 2020

° *जै जै श्री कुँज बिहारिन लाल ...* *प्रिया प्यारे के विवाहोत्सव की मंगल बधाईः* दिन दुल्हिन दूलहु बलिहारी । अधिक फबीं श्री वन की स्वामिनी , देखीं न सरि की कोऊ वधू वारी ।१। अतलस अंगिया चोली राती , पैने कुच कंचुकी उकारी । सारी सुरंग जरी बुँटे मणिं , जडीं अंचल सब कोर किनारी ।२। भूषण वसन हू शोभा पाई , अद्भुत रूप अंग अंग धारी । मोतिन मौर माथे कछु टेढ़ी , घूँघट अँखिंयाँ चलें कजरारी ।३। दूल्हा रूप अनूप बन्यौ , जामा अचकन मणि जटित किबारी । पेचदार पगिया पर सेहरो , मोहत मन श्यामा सुकुमारी ।४। साजि सँवारि नाहु वधू ललिता , हस्त मिलाप रच्यौ सुखकारी । प्रथम समागम कौ सुख विलसत , कृष्णचन्द्र पिया राधा प्यारी ।५। प्रथम मिलन पिया प्यारी कौ गाऊँ । श्री ललिता कृपा नित जुगल लड़ाऊं ।१। श्री वृंदावन संपत्ति पूंजत सुख , जुगल भाव मन ध्यावै । सुमिरि श्री राधा चरण दासि संग , गौर श्याम हिय आवै ।२। छिन छिन रस विलसत नव दंपति , निरखि सतत सुख पाऊं । आनंद रस न समात उमंगि उर , सोई सखी हरखि सुनाऊं ।३। श्री जमुना नव अम्बुज फूले , अलि अवलि दल छाये । गूंजत तान संगीत मृदु पवन , नव तरु द्रुमि मन भाये ।४। सुंदर खग निरतत मन मोहक , मधुर पिया जस गाये । विविध बरन रँग फूले सुमन दल, रुचि रुचि हार बनाये ।५। घाटन बाटन बीथी बागन , मनहर मधुर निकाई । कुँज महल शुभ मिलन की बेला , हर्षित सखी समुदाई ।६। नव वधू सरस सँवारी श्यामा , नहिं सरि कोऊ वधू वारी । तैसेई सुघड श्याम दूलहु फबे , दंपति छबि अति न्यारी ।७। लाड़ लड़ावत वर वधू रुख लै , सखी सहचरी प्रवीना । सुखद सुरति सम्पति रुचि पूंजत , विलसैं जुगल नवीना ।८। नैंनन नैंन जोरि झपि पलकैं , पुनि पुनि नैंन मिलावें । हाव भाव बिन बैंनन सैंनन , हँसि लजि मुरि बतरावें ।९। रूप माधुरी चुबत अंग अंग, पीबत दृग जिय प्यासे । करसत मन तन भेंट अँकौ भरि, सखीं जिय जानि हुलासे ।१०। पारिजात संग कल्प सुमन गुहि , कौमल सेज सजाई । हस्त मिलाप कराय जुग सखी , प्रेम प्रीति पुंजवाई ।११। गावत विरदनि गीत मिलन सखीं , मदन मोद जुग लीने । नव नव रति रत रसिक शिरोमणि , मिलत हू मिलत नवीने ।१२। नित ही प्रथम समागम कौ सुख , काम केलि नित न्यारी । श्री हरिदासी सखीन संग सुख, विलसत नित्य बिहारी ।१३। आस करत आशीष देत सखीं , उर वन बसौ जुग जिय मन । विलसौ कृष्णचन्द्र श्री राधा , चरणदासि वृंदावन ।१४। *साभार श्री हरिदास कृपा से...* .

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sn vyas Nov 26, 2020

🌵 🌴🐪 🌵 🌴🐪 🌵 🌴🐪 🌵 *🙏सादर वन्दे🙏* *🚩धर्म यात्रा 🚩* *🐪 बीकानेर 🐪* कई एकड़ तक फैली सफेद रेत , शानदार किले और सुंदर हवेलियाँ , कई आकर्षक संग्रहालय इस शहर बीकानेर में हैं। बीकानेर में घूमने के लिए कई जगहें हैं और सबसे मशहूर जगहों में ये शामिल हैं : ------ *श्री लक्ष्मीनाथ मन्दिर :-----* राजस्थान के बीकानेर का श्री लक्ष्मीनाथ मंदिर यहाँ के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। यह मन्दिर भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मीजी को समर्पित हैं। लक्ष्मीनाथ मंदिर बीकानेर का प्रमुख पवित्र स्थल हैं। मन्दिर में स्थापित मूर्तियों को चाँदी की नाजुक और जटिल कलाकृतियों के लिए जाना जाता हैं। लक्ष्मीनाथ मन्दिर के सबसे लोकप्रिय त्यौहार निर्जला एकादशी , जन्माष्टमी , गीता जयंती , दिवाली और रामनवमी हैं। लक्ष्मीनाथ मन्दिर पर्यटकों और तीर्थयात्रियों के लिए बीकानेर में घूमने के लिए सबसे लोकप्रिय जगहों में से एक है जहाँ आप अपना कुछ समय शांत वतावरण के बीच भगवान की भक्ति में व्यतीत कर सकते हैं।श्री लक्ष्मीनाथ मंदिर का निर्माण बीकानेर के महाराजा राव लूणकरन ने 14 वीं शताब्दी में करवाया था। माना जाता है महाराजा राव लूणकरन के ,भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मीजी आराध्य थे इसीलिए उन्होंने भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को समर्पित मंदिर का निर्माण करबाया था। श्री लक्ष्मीनाथ मंदिर का निर्माण लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर का उपयोग करके बनाया गया था और मंदिर में कई खूबसूरत पेंटिंग , मूर्तियाँ और चाँदी की उत्तम कारीगरी भी देखी जा सकती है।लक्ष्मीनाथ मंदिर की यात्रा के समय किसी भी प्रकार की चमड़े की वस्तुओं को साथ लेकर न चले क्योंकि उन्हें मंदिर परिसर के अंदर ले जाने की अनुमति नहीं है। मंदिर में प्रवेश करने से पहले अपने जूते और मोजे बाहर अवश्य उतारे। मंदिर की यात्रा के समय अपने साथ केमरा न ले जायें क्योंकि मंदिर परिसर के अंदर कैमरा ले जाने और फोटोग्राफी की अनुमति नही है। लक्ष्मीनाथ मंदिर में होने वाली अविस्मरणीय आरती में शामिल जरूर हो ।लक्ष्मीनाथ मन्दिर , बीकानेर शहर के मध्य में स्थित है। कुछ समय एकांत और शांति का अनुभव करने के लिए मंदिर परिसर में स्थित पार्क में कुछ समय व्यतीत करें । लक्ष्मीनाथ मंदिर के निर्माण में , 22 साल का समय लगा।मंदिर को बनाने में इस्तेमाल किये गये लाल बलुआ पत्थर जैसलमेर से लाया गया था। और इसके अलावा मंदिर के निर्माण में संगमरमर का भी उपयोग किया गया था।लक्ष्मीनाथ मंदिर में भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी मंदिर के अलावा श्री नीलकंठ महादेव , श्री बद्रीनारायणजी , श्री मगविद्याजी , श्री सूर्यनारायणजी और श्री रूपचतुर्भुजी के अन्य मंदिर भी शामिल हैं।लक्ष्मीनाथ मन्दिर में भगवान के दर्शन सुबह 5.00 बजे से दोपहर 1.00 बजे तक और शाम 5.00 बजे से रात 11.00 बजे तक रहता है और मंदिर की सुखद और आनंदमयी यात्रा के लिए 1-2 घंटे का समय मंदिर में अवश्य व्यतीत करें। लक्ष्मीनाथ मन्दिर बीकानेर , घूमने जाने के लिए सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च का समय होता है , क्योंकि इस समय बीकानेर का मौसम खुशनुमा रहता है , इसीलिए सर्दियों के मौसम में बीकानेर की यात्रा करना काफी अच्छा माना जाता है। लक्ष्मीनाथ मंदिर के आसपास के प्रमुख पर्यटक स्थल :– लक्ष्मीनाथ मंदिर , के अलावा भी अन्य प्रसिद्ध किलो , धार्मिक स्थलों , पार्को व अन्य पर्यटक स्थलों से भरा हुआ है , जिन्हें आप अपनी बीकानेर की यात्रा के दोरान घूम सकते हैं :--- *जूनागढ़ किला : ---* जूनागढ़ किला बीकानेर का एक बड़ा आकर्षण है। इसे महाराजा रायसिंह ने बनवाया था।यह किला पूरी तरह से थार रेगिस्तान के लाल बलुआ पत्थरों से बना है। हालांकि इसके भीतर संगमरमर का काम भी किया गया है। इस किले में देखने लायक कई शानदार चीजे़हैं । यहाँ राजा की समृद्ध विरासत के साथ उनकी कई हवेलियाँ और कई मन्दिर भी हैं।यहाँ के कुछ महलों में गंगामहल , फूल महल , बादल महल आदि शामिल हैं।यह संग्रहालय सैलानियों के लिए राजस्थान के खास आकर्षणों में से एक है। *किला संग्रहालय : ------* जूनागढ़ किले के अंदर बना यह " किला संग्रहालय " बीकानेर और राजस्थान में सैलानियों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण है। इस किला संग्रहालय में कुछ बहुत ही दुर्लभ चित्र , गहने , हथियार , पहले विश्व युद्ध के बाइप्लेन आदि हैैं। *लालगढ़ पैलेस : ---* लालगढ़ पैलेस बीकानेर और राजस्थान में सैलानियों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण है। इसे बीकानेर के महाराजा ने 1902 में बनवाया था। इसकी मुगल , राजपूत और यूरोपीय शैली की वास्तुकला सैलानियों का ध्यान अपनी ओर खींचती है। आज के समय में यहाँ एक संग्रहालय , एक हेरिटेज होटल और एक लक्जरी होटल है।यह एक तीन मंजिला भवन है जो पूरी तरह से लाल बलुआ पत्थरों से बना है , जिससे यह पैलेस और आकर्षक लगता है। इसके शानदार खंबे इसे और भी सुंदर और मनमोहक बनाते हैं। बीकानेर जाने पर लालगढ़ पैलेस देखने से चूकना नहीं चाहिए। *ऊँट प्रजनन फार्म : ----* यहाँ एशिया का , अपने आप में अनूठा ऊँट प्रजनन फार्म है , जिसका प्रबंधन भारत सरकार करती है।बीकानेर शहर से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह फार्म सैलानियों के लिए एक बड़ा आकर्षण है। एशिया में अपने आप में एकमात्र इस फार्म में , दुनिया के सबसे तेज चलने वाले ऊँट पैदा होते हैं। *शिवबाड़ी मंदिर : ---* शिव बाड़ी मंदिर बीकानेर का एक और मशहूर आकर्षण है। यह मन्दिर भगवान शिव को समर्पित है और इसकी दीवारें बहुत ऊँची हैं।पूरी तरह से लाल बलुआ पत्थरों से बने इस मन्दिर की वास्तुकला बहुत भव्य है। । *भंडासर जैन मंदिर :---* भंडासर जैन मंदिर एक अमीर व्यापारी भांडा शाह ने बनवाया था और यह मन्दिर छठें जैन भगवान को समर्पित है। यहाँ का शानदार निर्माण सबसे पहले अपनी ओर ध्यान खींचता है। *यह माना जाता है कि इस मंदिर को गारे के बजाय , घी के 40 बैरल से बनाया गया था ।* यह मंदिर बीकानेर के सबसे पुराने मंदिर लक्ष्मीनारायण मंदिर के पास ही स्थित है। इस मन्दिर को देखना आपके लिए एक दिलचस्प अनुभव होगा। *प्राचीन संग्रहालय : ----* प्राचीन संग्रहालय की स्थापना महाराजा की बेटी ने की थी। कला और शिल्प में रुचि रखने वालों के लिए बीकानेर के प्राचीन संग्रहालय का खास महत्व है। 🌵 🌴🐪 🌵🌴🐪 🌵 🌴🐪 🌵

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sn vyas Nov 26, 2020

🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘️ *यह सृष्टि निरंतर गतिशील है , आज जो समय है कल वह भूत बन जाता है | काल गणना की सुविधा की दृष्टि से समय को तीन भागों में बांटा गया है जिसे भूतकाल वर्तमान काल एवं भविष्य काल कहा गया है | ध्यान देने वाली बात है भूत एवं भविष्य दोनों के लिए एक ही शब्द का प्रयोग किया जाता है जिसे कहा जाता है "कल" | अंतर सिर्फ इतना है कि एक आने वाला कल कहा जाता है तो दूसरा बीता हुआ कल कहा जाता है जबकि दोनों का मूल तत्व एक ही है | मनुष्य को सदैव वर्तमान में जीना चाहिए क्योंकि वर्तमान समय अनमोल है , वर्तमान समय ही यथार्थ है , वर्तमान समय ही कर्म का आधार है , वर्तमान समय ही एकमात्र हमारे साथ हैं क्योंकि यही भविष्य का जन्मदाता है और जो भूतकाल के कारण उपस्थित है इसीलिए वर्तमान समय का बहुत महत्व है | जो भी मनुष्य वर्तमान में रहता है , वर्तमान के क्षणों के महत्व को समझता है वह इसकी अमूल्यता का अनुभव कर लेता है | कुछ लोगों प्राय: यह कहा करते हैं पहले ऐसा होता था | पहले क्या होता था इस पर ध्यान ना दे कर इस समय क्या हो रहा है यह ध्यान देना आवश्यक है | क्योंकि इन तीनों कालों में वर्तमान काल ही मुख्य है , क्योंकि वर्तमान ही भूत एवं भविष्य का जन्मदाता है | जो समय बीत गया है अर्थात बीता हुआ कल भी कभी वर्तमान था और जो आने वाला है वह भी वर्तमान गुजरने के बाद ही एक दिन भूत बन जाएगा , अर्थात वर्तमान ही अतीत अर्थात भूतकाल एवं भविष्य की विभाजन रेखा है जिसके एक तरफ भूतकाल है दूसरी और भविष्य काल | एक-एक क्षण जो व्यतीत हो रहा है वह भूतकाल होता चला जा रहा है | विचार कीजिए हम भूतकाल के इतने निकट होते हुए भी उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकते क्योंकि वह समय हमारे हाथों से निकल चुका है | उस भूतकाल के लिए हम तभी कुछ कर सकते थे जब वर्तमान हमारे हाथों में था | वर्तमान काल में जो हम संचय करते हैं वही भूतकाल अर्थात इतिहास बन जाता है और भविष्य के लिए वह स्रोत बन जाता है , इसलिए प्रत्येक मनुष्य को यह प्रयास करना चाहिए की वर्तमान का प्रत्येक पल सुखद बने क्योंकि प्रत्येक व्यतीत होता हुआ पल तत्काल भूतकाल में परिवर्तित होता रहता है जिसे हम अपनी स्मृति कहते हैं | वह हमारा भूतकाल है जो हमारे मस्तिष्क में अंकित जो कि भविष्य में हमें याद आता रहता है | भूतकाल एवं भविष्य काल की अपेक्षा वर्तमान में सुखद कर्म करते हुए मनुष्य को जीवन यापन करना चाहिए क्योंकि यदि वर्तमान सुंदर होगा तो आपका भूतकाल भी सुंदर होगा और सुंदर भविष्य का निर्माण भी होगा |* *आज मनुष्य की व्यस्तता बढ़ गई है | प्रत्येक मनुष्य सुंदर भविष्य बनाने की योजना में व्यस्त दिखाई पड़ता है | भविष्य तभी सुंदर हो सकता है जब वर्तमान को सुंदर किया जाएगा इसलिए मनोवांछित भविष्य के लिए प्रत्येक मनुष्य को वर्तमान पर लगातार हस्तक्षेप करते रहना चाहिए जिससे कि मनचाहा भविष्य निर्मित हो सके | आज लोग भविष्य तो सुंदर चाहते हैं परंतु वर्तमान पर उतना ध्यान नहीं दे पाते | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" देख रहा हूं कि आज प्रत्येक मनुष्य अपनी संतान के भविष्य को लेकर चिंतित रहते हुए अनेकानेक उपाय करता है कि हमारी संतान का भविष्य सुंदर हो जाय | ऐसे सभी लोगों को मैं बता देना चाहता हूं की जिनकी संतानों के वर्तमान में माता-पिता ने उनको परिश्रम करना सिखा दिया उनका भविष्य स्वयं चमकदार एवं प्रकाशित बन जाता है ` जैसा की विदित है कि मनुष्य का अधिकार सिर्फ कर्म करने पर है उसका फल क्या मिलेगा यह कोई नहीं जानता | विचार कीजिए कि कर्म ना तो भूतकाल में किए जा सकते हैं ना तो भविष्य काल में कर्म तो वर्तमान काल में ही किया जाएगा इसीलिए वर्तमान काल में मनुष्य को ऐसे कर्म करना चाहिए जिससे कि उनका भूतकाल और भविष्य काल दोनों ही स्वर्णिम हो जाय | परंतु आज दुर्भाग्यवश कुछ लोग वर्तमान में जीते हुए अपने भूतकाल की यादों में खो जाते हैं या फिर भविष्य की कल्पना मैं अपने वर्तमान को व्यर्थ में गवा देते हैं | वर्तमान समय का सदुपयोग ना हो पाने से मनुष्य का भविष्य अंधकार में हो जाता है | यदि मनुष्य भूतकाल की यादों और भविष्य काल की कल्पनाओं में अधिक समय ना गंवा करके वर्तमान समय पर ध्यान दें तो निश्चित रूप से वर्तमान ही इच्छित भविष्य की ओर ले जाने में सहायक की भूमिका निभा सकता है |* *मनुष्य के हाथ में सिर्फ वर्तमान ही है इसलिए वर्तमान को अधिक से अधिक सुंदर बनाने का कार्य करना चाहिए ` वर्तमान में अंकित की गई ऊर्जा ही मनुष्य को सुंदर भविष्य के निर्माण में सहयोग करती है |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵️ *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟

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sn vyas Nov 25, 2020

...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!......... ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° *वैद्य हो, गुरु हो चाहे नेता हो या* *समाज सुधारक हो, जो बात वह* *दूसरों के जीवन में देखना चाहता है,* *स्वयं उसने अपने आप पर इसका* *ठीक-ठीक प्रयोग किया हो।* °" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "° गोस्वामीजी से यह पूछा गया कि रामायण की रचना आप किसलिए कर रहे हैं, तो वे कहते हैं मैं अपने अन्तःकरण के सुख के लिए कर रहा हूंँ। *"बहुजन सुखाय"* के स्थान पर *"स्वान्तः सुखाय"* कहते हैं तो इसमें उनकी विनम्रता तथा निरभिमानता तो है ही पर साथ ही साथ सैद्धान्तिक सत्य भी है। इस सैद्धान्तिक सत्य को बड़ी सरलता से समझा जा सकता है। यदि हम सबको सुख देने का दावा करें तो फिर एक आवश्यक प्रश्न उठ खड़ा होगा। मान लीजिए आप कोई दवा किसी को दे रहे हों तो प्रश्न यह है कि सबसे पहले उसका प्रयोग आप किस पर करेंगे ? संस्कृत साहित्य में व्यंग्य के बड़े विलक्षण-विलक्षण श्लोक हैं। एक श्लोक में वैद्यराज पर एक व्यंग्य करते हुए कहा गया -- *"वैद्यराज नमस्तुभ्यं यम ज्येष्ठ सहोदरः"* -- हे वैद्यराज ! आप यमराज के बड़े भाई हैं, हम आपको प्रणाम करते हैं। पूछा गया बड़े भाई क्यों ? बोले :-- *यमस्तु हरते प्राणा त्वं तु प्राणाः धनानि च।।* यमराज तो केवल प्राण लेते हैं पर आप प्राण और धन दोनों ले लेते हैं। इसलिए आप उनके बड़े भाई हैं। व्यंग्य यह है कि वैद्य दवा का प्रयोग अपने ऊपर तो करे नहीं और मनमानी दवा दूसरों को दें। दूसरा मरे या जिए, उन्हें तो फीस मिलनी है। ऐसा यदि कोई वैद्य होगा तो स्वाभाविक रूप से वह अत्यन्त स्वार्थी होगा। एक और भी व्यंग्य किया गया। पूछा गया कि दो शब्द "वैद्य और "वैद्यराज" प्रयोग किए जाते हैं, दोनों में क्या अन्तर है ? तो कहा गया -- "शतहन्ता भयो वैद्यः" सौ को मारने वाला वैद्य है, और "सहस्त्रहन्ता तु वैद्यराज। जो हजार को मार डाले वह वैद्यराज। इसमें व्यंग्य इतना ही है कि आपको दूसरे के प्राण की चिन्ता है कि नहीं ! अगर आप केवल अपने स्वार्थ के लिए सामने वाले पर प्रयोग करके देखें तब तो यह भाव बड़ा अनर्थकारी होगा। सच्चा वैद्य तो वह है कि जिस वस्तु की बात वह कर रहा है उसका प्रयोग करके स्वयं अनुभव करके जिसने देखा हो। आजकल प्रयोग करने की पद्धति है। इसलिए पशुओं आदि पर प्रयोग करके निष्कर्ष निकाला जाता है। इतिहास में ऐसे भी चिकित्सकों का नाम आया है कि जिन्होंने औषधि को दूसरों को देने के पहले, स्वयं उसका सेवन किया। वैद्य शब्द तो शरीर के संदर्भ में है पर जो व्यक्ति समाज को स्वस्थ बनाना चाहते हैं, वे भी वैद्य हैं। उस वैद्य के सम्बन्ध में गोस्वामीजी ने कह दिया गुरु ही वैद्य है। इसका सूत्र यह है कि *वैद्य हो, गुरु हो चाहे नेता हो या समाज सुधारक हो, जो बात वह दूसरों के जीवन में देखना चाहता है, स्वयं उसने अपने आप पर इसका ठीक-ठीक प्रयोग किया हो।* मेरे इस कथन को सुनकर कोई वैद्यराज रुष्ट हो सकते हैं। पर गुरुओं को भी छोड़ा नहीं गया है, स्पष्ट ही कहा गया है -- *हरइ शिष्य धन शोक न हरई।* *सो गुरु घोर नरक महँ परई।।* जो गुरु शिष्य की सम्पत्ति का हरण कर ले पर उसके मानसिक दोषों को दूर न करे वह तो घोर नरक में जाता है। कभी इस व्यंग्य की कड़ी में गुरु-शिष्य दोनों को जोड़ दिया गया। तुलसीदासजी ने कहा कि समस्या यह है कि एक अन्धा है तथा दूसरा बहरा। *गुरु सिख बधिर अंधकरि लेखा।* *एक न सुनइ एक नहिं देखा।।* गुरु जी अन्धे हैं और शिष्य जी बहरे ! वहाँ पर भी सूत्र यही है कि जो अन्धा है उसने किसी वस्तु को देखा नहीं। तो जो बिना देखे कह रहा है, वह तो अन्धे का ही दावा हुआ। किसी ने कबीर से पुछ दिया -- "आपकी वाणी और हमारी वाणी में क्या अन्तर है ?" कबीरदासजी ने कहा-अन्तर यही है कि : -- *तू कहता कागद लेखी।* और : -- *मैं कहता आँखिन देखी।।* "तुम लिखा हुआ कहते हो और मैं देखा हुआ कहता हूँ।” इसका अभिप्राय है कि गुरु ने जो अनुभूति की है उसे अगर शिष्य को उसके कल्याणार्थ देगा तब तो उसकी अनुभूति सार्थक होगी। मान लीजिए गुरु बहुत योग्य हो तो क्या मात्र योग्य होने से ही शिष्य का कल्याण हो जाएगा ? भगवान् शंकर तो त्रिभुवन गुरु हैं और रावण उनका शिष्य था पर रावण का कल्याण नहीं हुआ। क्योंकि गुरु तो महानतम थे पर शिष्य पूरा था अन्धा। 🔱 जय गुरुदेव जय सियाराम 🙏

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sn vyas Nov 25, 2020

*तुलसी शालिग्राम विवाह* 〰〰🌼〰🌼〰〰 भगवान विष्णु के स्वरुप शालिग्राम और माता तुलसी के मिलन का पर्व तुलसी विवाह हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। पद्मपुराण के पौराणिक कथानुसार राजा जालंधर की पत्नी वृंदा के श्राप से भगवान विष्णु पत्थर बन गए, जिस कारणवश प्रभु को शालिग्राम भी कहा जाता है और भक्तगण इस रूप में भी उनकी पूजा करते हैं.इसी श्राप से मुक्ति पाने के लिए भगवान विष्णु को अपने शालिग्राम स्वरुप में तुलसी से विवाह करना पड़ा था और उसी समय से कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की एकादशी को तुलसी विवाह का उत्सव मनाया जाता है। पद्मपुराण के अनुसार कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की नवमी को तुलसी विवाह रचाया जाता है. इस दिन भगवान विष्णु की प्रतिमा बनाकर उनका विवाह तुलसी जी से किया जाता है. विवाह के बाद नवमी, दशमी तथा एकादशी को व्रत रखा जाता है और द्वादशी तिथि को भोजन करने के विषय में लिखा गया है. कई प्राचीन ग्रंथों के अनुसार शुक्ल पक्ष की नवमी को तुलसी की स्थापना की जाती है. कई श्रद्धालु कार्तिक माह की एकादशी को तुलसी विवाह करते हैं और द्वादशी को व्रत अनुष्ठान करते हैं. देवोत्थान एकादशी के दिन मनाया जाने वाला तुलसी विवाह विशुद्ध मांगलिक और आध्यात्मिक प्रसंग है। दरअसल, तुलसी को विष्णु प्रिया भी कहते हैं। देवता जब जागते हैं, तो सबसे पहली प्रार्थना हरिवल्लभा तुलसी की ही सुनते हैं। इसीलिए तुलसी विवाह को देव जागरण के पवित्र मुहूर्त के स्वागत का आयोजन माना जाता है। तुलसी विवाह का सीधा अर्थ है, तुलसी के माध्यम से भगवान का आहावान। कार्तिक, शुक्ल पक्ष, एकादशी को तुलसी पूजन का उत्सव मनाया जाता है। वैसे तो तुलसी विवाह के लिए कार्तिक, शुक्ल पक्ष, नवमी की तिथि ठीक है, परन्तु कुछ लोग एकादशी से पूर्णिमा तक तुलसी पूजन कर पाँचवें दिन तुलसी विवाह करते हैं। आयोजन बिल्कुल वैसा ही होता है, जैसे हिन्दू रीति-रिवाज से सामान्य वर-वधु का विवाह किया जाता है। देवप्रबोधिनी एकादशी के दिन मनाए जानेवाले इस मांगलिक प्रसंग के सुअवसर पर सनातन धर्मावलम्बी घर की साफ़-सफाई करते हैं और रंगोली सजाते हैं. शाम के समय तुलसी चौरा के पास गन्ने का भव्य मंडप बनाकर उसमें साक्षात् नारायण स्वरुप शालिग्राम की मूर्ति रखते हैं और फिर विधि-विधानपूर्वक उनके विवाह को संपन्न कराते हैं. मंडप, वर पूजा, कन्यादान, हवन और फिर प्रीतिभोज, सब कुछ पारम्परिक रीति-रिवाजों के साथ निभाया जाता है। इस विवाह में शालिग्राम वर और तुलसी कन्या की भूमिका में होती है। यह सारा आयोजन यजमान सपत्नीक मिलकर करते हैं। इस दिन तुलसी के पौधे को यानी लड़की को लाल चुनरी-ओढ़नी ओढ़ाई जाती है। तुलसी विवाह में सोलह श्रृंगार के सभी सामान चढ़ावे के लिए रखे जाते हैं। शालिग्राम को दोनों हाथों में लेकर यजमान लड़के के रूप में यानी भगवान विष्णु के रूप में और यजमान की पत्नी तुलसी के पौधे को दोनों हाथों में लेकर अग्नि के फेरे लेते हैं। विवाह के पश्चात प्रीतिभोज का आयोजन किया जाता है। कार्तिक मास में स्नान करने वाले स्त्रियाँ भी कार्तिक शुक्ल एकादशी को शालिग्राम और तुलसी का विवाह रचाती है। समस्त विधि विधान पूर्वक गाजे बाजे के साथ एक सुन्दर मण्डप के नीचे यह कार्य सम्पन्न होता है विवाह के स्त्रियाँ गीत तथा भजन गाती है । कार्तिक माह की देवोत्थान एकादशी से ही विवाह आदि से संबंधित सभी मंगल कार्य आरम्भ हो जाते हैं. इसलिए इस एकादशी के दिन तुलसी विवाह रचाना उचित भी है. कई स्थानों पर विष्णु जी की सोने की प्रतिमा बनाकर उनके साथ तुलसी का विवाह रचाने की बात कही गई है. विवाह से पूर्व तीन दिन तक पूजा करने का विधान है. नवमी,दशमी व एकादशी को व्रत एवं पूजन कर अगले दिन तुलसी का पौधा किसी ब्राह्मण को देना शुभ होता है। लेकिन लोग एकादशी से पूर्णिमा तक तुलसी पूजन करके पांचवे दिन तुलसी का विवाह करते हैं। तुलसी विवाह की यही पद्धति बहुत प्रचलित है। शास्त्रों में कहा गया है कि जिन दंपत्तियों के संतान नहीं होती,वे जीवन में एक बार तुलसी का विवाह करके कन्यादान का पुण्य अवश्य प्राप्त करें।तुलसी विवाह करने से कन्यादान के समान पुण्यफल की प्राप्ति होती है. कार्तिक शुक्ल एकादशी पर तुलसी विवाह का विधिवत पूजन करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।हिन्दुओं के संस्कार अनुसार तुलसी को देवी रुप में हर घर में पूजा जाता है. इसकी नियमित पूजा से व्यक्ति को पापों से मुक्ति तथा पुण्य फल में वृद्धि मिलती है. यह बहुत पवित्र मानी जाती है और सभी पूजाओं में देवी तथा देवताओं को अर्पित की जाती है. सभी कार्यों में तुलसी का पत्ता अनिवार्य माना गया है. प्रतिदिन तुलसी में जल देना तथा उसकी पूजा करना अनिवार्य माना गया है. तुलसी घर-आँगन के वातावरण को सुखमय तथा स्वास्थ्यवर्धक बनाती है.तुलसी के पौधे को पवित्र और पूजनीय माना गया है। तुलसी की नियमित पूजा से हमें सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। तुलसी विवाह के सुअवसर पर व्रत रखने का बड़ा ही महत्व है. आस्थावान भक्तों के अनुसार इस दिन श्रद्धा-भक्ति और विधिपूर्वक व्रत करने से व्रती के इस जन्म के साथ-साथ पूर्वजन्म के भी सारे पाप मिट जाते हैं और उसे पुण्य की प्राप्ति होती है. तुलसी शालिग्राम विवाह कथा 〰〰🌼〰🌼〰🌼〰〰 प्राचीन काल में जालंधर नामक राक्षस ने चारों तरफ़ बड़ा उत्पात मचा रखा था। वह बड़ा वीर तथा पराक्रमी था। उसकी वीरता का रहस्य था, उसकी पत्नी वृंदा का पतिव्रता धर्म। उसी के प्रभाव से वह सर्वजंयी बना हुआ था। जालंधर के उपद्रवों से परेशान देवगण भगवान विष्णु के पास गये तथा रक्षा की गुहार लगाई। उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने वृंदा का पतिव्रता धर्म भंग करने का निश्चय किया। उधर, उसका पति जालंधर, जो देवताओं से युद्ध कर रहा था, वृंदा का सतीत्व नष्ट होते ही मारा गया। जब वृंदा को इस बात का पता लगा तो क्रोधित होकर उसने भगवान विष्णु को शाप दे दिया, 'जिस प्रकार तुमने छल से मुझे पति वियोग दिया है, उसी प्रकार तुम भी अपनी स्त्री का छलपूर्वक हरण होने पर स्त्री वियोग सहने के लिए मृत्यु लोक में जन्म लोगे।' यह कहकर वृंदा अपने पति के साथ सती हो गई। जिस जगह वह सती हुई वहाँ तुलसी का पौधा उत्पन्न हुआ। एक अन्य प्रसंग के अनुसार वृंदा ने विष्णु जी को यह शाप दिया था कि तुमने मेरा सतीत्व भंग किया है। अत: तुम पत्थर के बनोगे। विष्णु बोले, 'हे वृंदा! यह तुम्हारे सतीत्व का ही फल है कि तुम तुलसी बनकर मेरे साथ ही रहोगी। जो मनुष्य तुम्हारे साथ मेरा विवाह करेगा, वह परम धाम को प्राप्त होगा।' बिना तुलसी दल के शालिग्राम या विष्णु जी की पूजा अधूरी मानी जाती है। शालिग्राम और तुलसी का विवाह भगवान विष्णु और महालक्ष्मी के विवाह का प्रतीकात्मक विवाह है। कथा विस्तार 〰〰〰〰 एक लड़की थी जिसका नाम वृंदा था राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था बचपन से ही भगवान विष्णु जी की भक्त थी.बड़े ही प्रेम से भगवान की सेवा,पूजा किया करती थी.जब वे बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया,जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था.वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी. एक बार देवताओ और दानवों में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा - स्वामी आप युद्ध पर जा रहे है आप जब तक युद्ध में रहेगे में पूजा में बैठकर आपकी जीत के लिये अनुष्ठान करुगी,और जब तक आप वापस नहीं आ जाते में अपना संकल्प नही छोडूगी, जलंधर तो युद्ध में चले गये,और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गयी,उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को ना जीत सके सारे देवता जब हारने लगे तो भगवान विष्णु जी के पास गये. सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि वृंदा मेरी परम भक्त है में उसके साथ छल नहीं कर सकता पर देवता बोले - भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते है. भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पँहुच गये जैसे ही वृंदा ने अपने पति को देखा,वे तुरंत पूजा मे से उठ गई और उनके चरणों को छू लिए,जैसे ही उनका संकल्प टूटा,युद्ध में देवताओ ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काटकर अलग कर दिया,उनका सिर वृंदा के महल में गिरा जब वृंदा ने देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पडा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है? उन्होंने पूँछा आप कौन हो जिसका स्पर्श मैने किया,तब भगवान अपने रूप में आ गये पर वे कुछ ना बोल सके,वृंदा सारी बात समझ गई,उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप पत्थर के हो जाओ,भगवान तुंरत पत्थर के हो गये सबी देवता हाहाकार करने लगे लक्ष्मी जी रोने लगे और प्राथना करने लगे यब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे सती हो गयी. उनकी राख से एक पौधा निकला तब भगवान विष्णु जी ने कहा आज से इनका नाम तुलसी है,और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा और में बिना तुलसी जी के भोग स्वीकार नहीं करुगा.तब से तुलसी जी कि पूजा सभी करने लगे.और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में किया जाता है.देवउठनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है| कथा - २ 〰〰〰 ऐसा माना जाता है कि देवप्रबोधिनी एकादशी पर भगवान विष्णु चार माह की नींद के बाद जागते हैं। धार्मिक दृष्टिकोण से प्रचलित है कि जब विष्णु भगवान ने शंखासुर नामक राक्षस को मारा था और उस विशेष परिश्रम के कारण उस दिन सो गए थे, उसके बाद वह कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागे थे, इसलिए इस दिन उनकी पूजा का विशेष विधान है।इस संबंध में एक कथा प्रचलित है कि शंखासुर बहुत पराक्रमी दैत्य था इस वजह से लंबे समय तक भगवान विष्णु का युद्ध उससे चलता रहा। अंतत: घमासन युद्ध के बाद भाद्रपद मास की शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु ने दैत्य शंखासुर को मारा था। इस युद्ध से भगवान विष्णु बहुत अधिक थक गए। तब वे थकावट दूर करने के लिए क्षीरसागर लौटकर सो गए। वे वहां चार महिनों तक सोते रहे और कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को जागे। तब सभी देवी-देवताओं द्वारा भगवान विष्णु का पूजन किया गया। इसी वजह से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की इस एकादशी को देवप्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है। इस दिन व्रत-उपवास करने का विधान है। कथा - ३ 〰〰〰 एक बार भगवान विष्णु से उनकी प्रिया लक्ष्मी जी ने आग्रह के भाव में कहा- हे भगवान, अब आप दिन रात जागते हैं। लेकिन, एक बार सोते हैं,तो फिर लाखों-करोड़ों वर्षों के लिए सो जाते हैं। तथा उस समय समस्त चराचर का नाश भी कर डालते हैं। इसलिए आप नियम से विश्राम किया कीजिए। आपके ऐसा करने से मुझे भी कुछ समय आराम का मिलेगा। लक्ष्मी जी की बात भगवान को उचित लगी। उन्होंने कहा, तुम ठीक कहती हो। मेरे जागने से सभी देवों और खासकर तुम्हें कष्ट होता है। तुम्हें मेरी सेवा से वक्त नहीं मिलता। इसलिए आज से मैं हर वर्ष चार मास वर्षा ऋतु में शयन किया करुंगा। मेरी यह निद्रा अल्पनिद्रा और प्रलयकालीन महानिद्रा कहलाएगी।यह मेरी अल्पनिद्रा मेरे भक्तों के लिए परम मंगलकारी रहेगी। इस दौरान जो भी भक्त मेरे शयन की भावना कर मेरी सेवा करेंगे, मैं उनके घर तुम्हारे समेत निवास करुंगा। तुलसी विवाह व्रत कथा 〰〰〰〰〰〰〰 प्राचीन ग्रंथों में तुलसी विवाह व्रत की अनेक कथाएं दी हुई हैं. उन कथाओं में से एक कथा निम्न है. इस कथा के अनुसार एक कुटुम्ब में ननद तथा भाभी साथ रहती थी. ननद का विवाह अभी नहीं हुआ था. वह तुलसी के पौधे की बहुत सेवा करती थी. लेकिन उसकी भाभी को यह सब बिलकुल भी पसन्द नहीं था. जब कभी उसकी भाभी को अत्यधिक क्रोध आता तब वह उसे ताना देते हुए कहती कि जब तुम्हारा विवाह होगा तो मैं तुलसी ही बारातियों को खाने को दूंगी और तुम्हारे दहेज में भी तुलसी ही दूंगी. कुछ समय बीत जाने पर ननद का विवाह पक्का हुआ. विवाह के दिन भाभी ने अपनी कथनी अनुसार बारातियों के सामने तुलसी का गमला फोड़ दिया और खाने के लिए कहा. तुलसी की कृपा से वह फूटा हुआ गमला अनेकों स्वादिष्ट पकवानों में बदल गया. भाभी ने गहनों के नाम पर तुलसी की मंजरी से बने गहने पहना दिए. वह सब भी सुन्दर सोने - जवाहरात में बदल गए. भाभी ने वस्त्रों के स्थान पर तुलसी का जनेऊ रख दिया. वह रेशमी तथा सुन्दर वस्त्रों में बदल गया. ननद की ससुराल में उसके दहेज की बहुत प्रशंसा की गई. यह बात भाभी के कानों तक भी पहुंची. उसे बहुत आश्चर्य हुआ. उसे अब तुलसी माता की पूजा का महत्व समझ आया. भाभी की एक लड़की थी. वह अपनी लड़की से कहने लगी कि तुम भी तुलसी की सेवा किया करो. तुम्हें भी बुआ की तरह फल मिलेगा. वह जबर्दस्ती अपनी लड़की से सेवा करने को कहती लेकिन लड़की का मन तुलसी सेवा में नहीं लगता था. लड़की के बडी़ होने पर उसके विवाह का समय आता है. तब भाभी सोचती है कि जैसा व्यवहार मैने अपनी ननद के साथ किया था वैसा ही मैं अपनी लड़की के साथ भी करती हूं तो यह भी गहनों से लद जाएगी और बारातियों को खाने में पकवान मिलेंगें. ससुराल में इसे भी बहुत इज्जत मिलेगी. यह सोचकर वह बारातियों के सामने तुलसी का गमला फोड़ देती है. लेकिन इस बार गमले की मिट्टी, मिट्टी ही रहती है. मंजरी तथा पत्ते भी अपने रुप में ही रहते हैं. जनेऊ भी अपना रुप नही बदलता है. सभी लोगों तथा बारातियों द्वारा भाभी की बुराई की जाती है. लड़की के ससुराल वाले भी लड़की की बुराई करते हैं. भाभी कभी ननद को नहीं बुलाती थी. भाई ने सोचा मैं बहन से मिलकर आता हूँ. उसने अपनी पत्नी से कहा और कुछ उपहार बहन के पास ले जाने की बात कही. भाभी ने थैले में ज्वार भरकर कहा कि और कुछ नहीं है तुम यही ले जाओ. वह दुखी मन से बहन के पास चल दिया. वह सोचता रहा कि कोई भाई अपने बहन के घर जुवार कैसे ले जा सकता है. यह सोचकर वह एक गौशला के पास रुका और जुवार का थैला गाय के सामने पलट दिया. तभी गाय पालने वाले ने कहा कि आप गाय के सामने हीरे-मोती तथा सोना क्यों डाल रहे हो. भाई ने सारी बात उसे बताई और धन लेकर खुशी से अपनी बहन के घर की ओर चल दिया. दोनों बहन-भाई एक-दूसरे को देखकर अत्यंत प्रसन्न होते हैं। शुभ मुहुर्त-: शुरुआत 25 नवंबर यानी बुधवार की सुबह 2 बजकर 42 मिनट होगी। जिसका समापन 26 नवंबर की सुबह 5 बजकर 10 मिनट पर होगा। एकादशी के समापन के तुरंत बाद द्वादशी तिथि की शुरुआत हो जाएगी और इसका समापन 27 नवंबर यानी शुक्रवार की सुबह 07 बजकर 46 मिनट पर होगा।

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sn vyas Nov 25, 2020

🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🚩 *"देवोत्थानी एकादशी" पर विशेष* 🚩 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘️ *सनातन धर्म की प्रत्येक मान्यता स्वयं में गौरवशाली है | सृष्टि का संयोजन एवं इसकी गतिशीलता यद्यपि ईश्वर के हाथों में है परंतु मानव मात्र की सहायता के लिए हमारे विद्वानों ने वर्ष , मास एवं दिन , बारह राशियों , २७ नक्षत्रों एवं सूर्य चंद्रमा के आधार पर काल विभाग किया है | समस्त संसार को प्राण एवं ऊर्जा प्रदान करने वाला सूर्य इस सृष्टि के लिए आवश्यक आवश्यकता है | बारह राशियों पर भ्रमण करने वाले सूर्य का प्रत्येक राशि का महत्व भिन्न होता है | इसी प्रकार जब सूर्य आषाढ़ शुक्ल एकादशी को मिथुन राशि पर आता है तब सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार चतुर्मास्य का प्रारंभ होता है | आषाढ़ शुक्ल एकादशी को भगवान श्री हरि विष्णु निद्रा मगन हो जाते हैं और उनकी निद्रा चार महीने तक अनवरत चलती है | यही चार महीने चतुर्मास्य कहे गए हैं | मनुष्य का प्रत्येक कार्य ईश्वर को साक्षी मानकर किया जाता है और जब पारब्रह्म परमेश्वर (ईश्वर) श्री हरि विष्णु निद्रामग्न हो जाते हैं तो कोई भी शुभ कार्य किसे साक्षी मानकर किया जाय ? यही ध्यान में रखते हुए इन चार महीनों में सभी शुभ कार्यों को वर्जित किया जाता है | विवाह , यज्ञोपवीत , दीक्षा ग्रहण , यज्ञ , गृह प्रवेश , गोदान , प्रतिष्ठा एवं अन्य सभी शुभ कार्य इसीलिए वर्जित हो जाते हैं कि जब भगवान श्री हरि निद्रा मगन है तो किसकी साक्षी मानकर कि यह कार्य फलीभूत होंगे | चार महीने की निद्रा के बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को (अर्थात आज) भगवान श्री हरि निद्रा का त्याग करके चैतन्य होते हैं | इसीलिए कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थानी , देवउठनी , हरि प्रबोधिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है | आज के दिन ही भगवान श्री हरि विष्णु निद्रा का त्याग करके जगत के पालनकर्ता के पद पर पुनः आरूढ़ हो जाते हैं और चार महीने से बंद पड़े सारे शुभ कार्य प्रारंभ हो जाते हैं |* *आज समस्त विश्व की भांति हमारा देश भारत भी आधुनिकता की चपेट में है | आधुनिकता का यह हाल है कि आज हम अपनी सांस्कृतिक मान्यताओं को भूलते चले जा रहे हैं | आज का मनुष्य पौराणिक , वैदिक एवं प्राचीन मान्यताओं को रूढ़िवादिता एवं ढकोसला कह कर के उन से पीछा छुड़ाना चाहता है | अपने पूर्वजों के द्वारा बनाई गई मान्यताएं आज के मनुष्य को व्यर्थ लगती हैं | जहां एक और विवाहादि सारे शुभ कार्य चातुर्मास्य में वर्जित माने जाते हैं वही आज इसी चातुर्मास्य में अनेक विवाह होते हुए देखे जा सकते हैं , जिसका परिणाम यह होता है कि वैवाहिक जीवन कलह पूर्ण होते हुए संबंध विच्छेद की स्थिति तक पहुंच जाते है | आज ऐसा होता प्राय: देखा भी जा रहा है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज के लोगों को और उनके द्वारा किए जा रहे मनमाने ढंग के कार्यों को देख कर तनिक भी आश्चर्यचकित नहीं होता हूँ क्योंकि जो लोग अपने पूर्वजों को नहीं मानना चाहते हैं उनके द्वारा पूर्वजों की बनाई गई मान्यताएं कितनी मानी जाएंगी यह स्वयं में विचारणीय है | अपने पूर्वजों की बात को न मानकर आज का मनुष्य अनेकों प्रकार के दुख उठा रहा है परंतु "हम आधुनिक हो गए हैं" कहता हुआ थोथी हंसी हंसने का प्रयास करता है | आज का मनुष्य अपनी मूल संस्कृति को छोड़कर विदेशों की ओर आशा भरी दृष्टि से देखता है वह शायद यह भूल रहा है कि विदेशों ने सारा ज्ञान हमसे ही अर्जित किया है | सनातन की मान्यताएं आज समस्त विश्व मानने को तैयार है परंतु दुखद है कि हमारे ही देशवासी विशेष कर सनातन धर्मीअपनी ही मान्यताओं से किनारा कर रहे हैं | ध्यान देना चाहिए कि आज देव उठनी एकादशी के दिन प्रत्येक मनुष्य को भगवान श्री हरि विष्णु की मूर्ति के सामने या उनके मंदिर में होना चाहिए क्योंकि ऐसी मान्यता है कि जब भगवान निद्रा का त्याग करते हैं तब उनकी दृष्टि जिन भक्तों पर पड़ती है उनका मोक्ष हो जाता है | देव उठनी एकादशी के दिन मनुष्य जो भी दान करता है उसे स्वर्ग में वही वस्तु उपभोग करने के लिए प्राप्त होती है | यह दिव्य मान्यताएं सनातन धर्म में ही देखने को मिल सकती हैं |* *अपने पूर्वजों के द्वारा बनाए गए नियम एवं मान्यताओं को ना मानकर के आज का मनुष्य सुखी तो नहीं है परंतु संसार को दिखाने के लिए खोखली हंसी अवश्य हंस रहा है | अपनी मान्यताओं को ना मानने का ही कारण है आज सनातन धर्मी तेज हीन होता चला जा रहा है |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵️ *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟

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