Sn Vyas Oct 18, 2019

💜💫💦®💖♏💦💫💜 *卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐* *[email protected]* *ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ* 💎🏮💎🏮💎🏮💎🏮💎🏮 *"┈┉┅━❀꧁꧂❀━┅┉┈"* *꧁🙇🏻"ॐ श्री मात्रे नमः"🙇🏻꧂* *"┈┉┅━❀꧁꧂❀━┅┉┈"* *एक अनोखा मंद‍िर: जहां न ट‍िक पाती है छत, न ही टिक पाती कभी बर्फ़"* देवभूमि हिमाचल के कई मंदिर आज भी कई रहस्यों से भरे पड़े है। इन मंदिरों से जुड़ी रोचक बातें हर किसी को हैरान कर देती हैं। ऐसे ही मंदिरों में एक है शिकारी देवी का मंदिर। जिला मंडी के करसोग के समीप ऊंचे पहाड़ों पर स्थित यह मंदिर कई रहस्यों से भरा हुआ है। यहां आने वाले हर श्रद्धालु की मुराद पूरी होती है। 2850 मीटर की ऊंचाई पर एक पहाड़ी पर स्थित शिकारी देवी मंदिर के उपर आज तक कोई भी छत नहीं बना सका है। यहां अगर छत लगा भी दी जाए, तो वह टिक नहीं पाती। यही नहीं इस पहाड़ी पर हर वर्ष बर्फ तो खूब गिरती है। लेकिन माता की मूर्तियों पर कभी भी बर्फ नहीं टिक पाती। इसके अलावा मंदिर के ऊपर से न तो पक्षी उड़ पाते है और न ही कोई हेलीकाप्टर या हवाई जहाज यहां से गुजर पाता है। जो आज भी रहस्य बना हुआ है। कहा जाता है कि मार्कंडेय ऋषि ने यहां सालों तक तपस्या की थी। उन्हीं की तपस्या से खुश होकर यहां मां दुर्गा शक्ति रूप में स्थापित हुई। बाद में पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान मंदिर का निर्माण किया। पांडवों ने यहां तपस्या कर मां दुर्गा को प्रसन्न किया और पांडवों को कौरवों के खिलाफ युद्ध में जीत का आशीर्वाद दिया।# *"┈┉┅━❀꧁꧂❀━┅┉┈"* *꧁🙇🏻"ॐ श्री मात्रे नमः"🙇🏻꧂* *"┈┉┅━❀꧁꧂❀━┅┉┈"* *🍁✒🍁✒🍁✒🍁✒🍁..✒* ☘🌹☘🌹☘🌹☘🌹☘🌹

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Sn Vyas Oct 18, 2019

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Sn Vyas Oct 17, 2019

🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🌕 *"करवा चौथ" पर विशेष* 🌕 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻 *सनातन धर्म एक दिव्य एवं अलौकिक परंपरा को प्रस्तुत करता है , समय-समय पर सनातन धर्म में प्रत्येक प्राणी के लिए व्रत एवं पर्वों का महत्व रहा है | परिवार के जितने भी सदस्य होते हैं उनके लिए अलग अलग व्रतविशेष का विधान सनातन धर्म में ही प्राप्त होता है | सृष्टि का आधार नारी को माना गया है | एक नारी के द्वारा समय-समय पर अपने पति , पुत्र एवं भाई के लिए व्रत रखकर उनकी आयु , सुख एवं ऐश्वर्य में वृद्धि के लिए की जाने वाली प्रार्थना ही नारी को महान बनाती है | भाई के लिए रक्षाबंधन , भैया दूज , पुत्र के लिए षष्ठी का व्रत करने वाली नारी अपने पति के लिए वैसे तो अनेकों व्रत करती है परंतु कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को किया जाने वाला दुष्कर "करवा चौथ" का व्रत नारियां अपने पति की दीर्घायु प्राप्ति के लिए करती हैं | प्रात: चार बजे से प्रारंभ करके रात में चंद्रोदय तक निर्जल रहकर यह व्रत नारियां मात्र इसलिए करती हैं कि उनके पति की आयु में वृद्धि हो एवं सनातन की मान्यता के अनुसार उन्हें सात जन्मो तक इसी पति का प्रेम मिलता रहे | यह व्रत करने का अधिकार मात्र सौभाग्यवती स्त्रियों को है | इसमें आयु , जाति , वर्ण , संप्रदाय की कोई बाध्यता नहीं है , सभी सौभाग्यवती स्त्रियां इस व्रत को कर सकती हैं | वैसे तो यह व्रत जीवन भर किया जाता है परंतु कहीं-कहीं लोकमान्यता है सौभाग्यवती स्त्री इस व्रत को सोलह वर्ष तक करने के उपरांत उद्यापन कर दे | उद्यापन करने के बाद पुनः वह इस व्रत का प्रारंभ कर सकती है | हमारे शास्त्रों के अनुसार यह व्रत सौभाग्यदायक एवं पति की दीर्घायु के उद्देश्य से किये जाने वाले किसी भी व्रत से सर्वोत्तम है | अतः सभी सौभाग्यवती स्त्रियों को करवाचौथ का व्रत नियम पूर्वक रहना ही चाहिए |* *आज जिस प्रकार आधुनिकता ने समस्त मानव समाज को अपने रंग में रंग लिया है उससे अछूता यह व्रत भी नहीं रह गया है | आज भले ही यह व्रत भी आधुनिकता के रंग में रंग गया है परंतु जिस प्रकार विदेशों में पति पत्नी के रिश्तो के कोई मायने नहीं रह गए हैं वही हमारे देश भारत की महानता है कि सभी सौभाग्यवती स्त्रियां इस व्रत का पालन करके सात जन्मो तक उसी पति को प्राप्त करने की कामना करती हैं | आज पुरुष समाज को विचार करना चाहिए जो नारी दिन भर बिना अन्न जल के कठिन तपस्या करके उनके लिए पूरा दिन व्यतीत करके भालचंद्र गणेश के पूजन के बाद छलनी के माध्यम से अपने पति का प्रथम दर्शन करके उन्हीं के द्वारा पिलाए गए जल से अपने व्रत का समापन करती हैं , उनके लिए पुरुष समाज क्या कर रहा है ?? मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज समाज में देख रहा हूं कि कुछ परिवारों में स्त्री तो अपने पति के लिए दिनभर निर्जल रहकर के करवा चौथ का कठिन व्रत करती है परंतु सायंकाल को जब पूजन का समय आता है तो पति देवता मदिरापान करके घर पहुंच कर तांडव तो मचाते ही हैं साथ ही अपनी पत्नी के साथ मारपीट भी करने लगते हैं | परंतु सब कुछ सहन करके भी एक महान नारी अपने पति के लिए करवा चौथ का व्रत करती है | क्या ऐसे पुरुषों का अपनी पत्नी के लिए कोई कर्तव्य नहीं है ?? जिसने मात्र पति के लिए अपने माता - पिता , भाई - बंधु को छोड़ दिया और ससुराल आ गई उसी पति के द्वारा यदि वह प्रताड़ित होती है तो इसे क्या माना जाए ?? क्या ऐसे प्राणी सभ्य समाज में रहने योग्य कहे जा सकते हैं ?? जो भी पुरुष अपने घर की मान मर्यादा अर्थात अपनी पत्नी का सम्मान नहीं कर सकता वह समाज में किसी और का सम्मान क्या करेगा ?? ऐसे पुरुष सम्मान के योग्य भी नहीं होते | एक ज्वलंत प्रश्न यह भी उठता है जहां नारियां पुरुषों के लिए जीवन भर कोई न कोई कठिन व्रत करती रहती है वही क्या पुरुष समाज भी इन नालियों के लिए किसी व्रत का पालन करता है ?? शायद ऐसा बहुत कम ही देखने को मिलता है | सच्चाई तो यह है की नारियां सदैव त्याग की मूर्ति रही हैं और इनका जीवन अपने लिए होता ही नहीं है | बाल्यकाल में भाई के लिए , विवाहोपरांत पति के लिए एवं माता बनने के बाद पुत्र के लिए सदैव व्रत करने वाली नारियां त्याग की मूर्ति होती है अतः इनका सम्मान सदैव होते रहना चाहिए |* *नारी सदैव से अपना जीवन दूसरों को ही समर्पित करती रही है यह बात पुरुष समाज को समझना चाहिए | जिस प्रकार आज मां की कोख से लेकर के इस संसार में आने के बाद तक नारी जाति पर अनाचार अत्याचार बढ़ रहा है आने वाले भविष्य के लिए सुखद संकेत नहीं कहा जा सकता | इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻ *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀

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Sn Vyas Oct 17, 2019

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Sn Vyas Oct 16, 2019

🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🔴 *आज का सांध्य संदेश* 🔴 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻 *सृष्टि के आदिकाल से परमात्मा के द्वारा रचित पंचतत्व (पृथ्वी , आकाश , जल , अग्नि एवं वायु ) यथावत विद्यमान हैं , परंतु आदि क्रम से आज तक इस पृथ्वी का उपयोग पता नहीं कितने जीवो ने किया इसकी गिनती कर पाना असंभव है | इस संसार में सब कुछ नाशवान है यहां तक कि महाप्रलय में ईश्वर के द्वारा रचित सारी सृष्टि का विलय महाप्रलय में हो जाता है | जबसे पृथ्वी की उत्पत्ति हुई और पृथ्वी पर जीवो का सृजन हुआ तब से अनेकों जीव इस पृथ्वी पर आए और अपना समय पूरा करके चले गए | अनेकों मनुष्य अपने जीवन में सर्वोच्च शिखर को प्राप्त करके एक दिन इसी पृथ्वी में समा गए , उनके द्वारा अर्जित की गई संपत्ति भी उनके साथ इस संसार से नहीं गई | "धरा का धरा पर ही धरा रह जाएगा" शायद इसीलिए हमारे मनीषियों ने कहा है | इस पृथ्वी पर जन्म लेने वाला कोई भी यदि विचार करें कि हमको चिरकाल तक यहां रहना है तो यह संभव है क्योंकि यह आवागमन का क्षेत्र है यहां जो भी आया है उसको जाना ही पड़ेगा | जिस प्रकार रेलगाड़ी में यात्रा करने के समय यात्री एक सीट को आरक्षित करवा लेता है परंतु उस यात्री के बैठने के पहले वह सीट किसी और के नाम आरक्षित होती है और उसका गंतव्य आ जाने पर वही सीट किसी दूसरे के नाम पुनः आरक्षित हो जाएगी , ठीक उसी प्रकार यह संसार है जिस मकान में हम रह रहे हैं हम से पहले इसका मालिक कोई दूसरा था और हमारे जाने के बाद इसका मालिक पुनः कोई दूसरा हो जाएगा | कहने का तात्पर्य यही है कि मकान तो वहीं रह जाएगा परंतु जीवन यात्रा पूरी हो जाने के बाद जीव इस संसार को छोड़कर चला जाता है | यहां से कोई रत्ती भर भी कुछ लेकर नहीं जा सकता है | आश्चर्य की बात तो यह है कि मनुष्य यह जानते हुए भी अपने हृदय में संतोष नहीं कर पाता है और पूरे जीवन और अधिक प्राप्त करने की लालसा में ही लगा रहता है |* *आज हम आधुनिक युग में जीवन यापन कर रहे हैं विज्ञान ने अनेक रहस्यों को उजागर किया है एवं आम जनमानस के पहुंच के बाहर की वस्तुओं को भी उपलब्ध कराने का प्रयास किया है | इतना आधुनिक हो जाने के बाद भी मनुष्य परमात्मा के द्वारा बनाए गए जीवन एवं मृत्यु के नियम को ना तो जान ही पाया है और ना ही इस पर विजय प्राप्त कर पाया है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" विचार करता हूं कि थोड़े से जमीन के टुकड़े के लिए आज जिस प्रकार भाई - भाई में युद्ध हो रहा है , पुत्र के द्वारा पिता की हत्या हो रही है , यह दुखद स्थिति है ऐसा करते समय मनुष्य यह नहीं विचार कर पाता है कि जिस जमीन के टुकड़े के लिए हम लड़ाई कर रहे हैं क्या वह हमारा है ?? क्या इसके पहले हमारा था ? या हमारे बाद भी यह हमारा ही रह जाएगा ?? शायद यही कारण है कि आज चारों ओर मार काट एवं हाहाकार मचा हुआ है | जिस दिन मनुष्य के हृदय में यह विचार प्रकट हो जाता है कि यह संसार नाशवान है , यहां से कोई कुछ नहीं ले जाएगा उस दिन उसकी सारी कामना शांत हो जाती है , परंतु माया की इस बाजार में ऐसे गिने-चुने महापुरुष ही देखने को मिलते हैं | आज चारों ओर जमीन - जायदाद एवं धन की अपेक्षा सभी रिश्तो का महत्व समाप्त होता चला जा रहा है | मनुष्य की मानसिकता इतनी विकृत होती जा रही है जिसका वर्णन कर पाना असंभव है , जबकि यह सभी जानते हैं कि जिसके लिए हम अपनों से बैर कर रहे हैं वह मेरे किसी काम का नहीं हो सकता है | अंततोगत्वा मनुष्य को साढ़े तीन हाथ जमीन ही मिलनी है | इतना जानने के बाद भी मनुष्य मानना नहीं चाहता यही भगवान की माया की प्रबलता है |* *ना कोई कुछ लेकर आया है और ना ही कुछ लेकर जाएगा यही संसार का सत्य है , इसको समझ कर सदैव आपस में प्रेम एवं स्नेह का वितरण करते रहना चाहिए |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥 सभी भगवत्प्रेमियों को *"शुभ संध्या वन्दन"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻ *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀

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Sn Vyas Oct 16, 2019

🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻 *इस धराधाम पर आदिकाल से मानव जीवन बहुत ही दिव्य एवं विस्तृत रहा है | मनुष्य अपने जीवन काल में अनेक प्रकार के क्रियाकलापों से हो करके जीवन यात्रा पूरी करता है | यहाँ मनुष्य के कर्मों के द्वारा समाज में उसकी श्रेणी निर्धारित हो जाती है | यह निर्धारण समाज में तभी हो पाता है जब मनुष्य के कर्म समाज के अनुकूल एवं सदाचरण वाले हों | परमात्मा ने मनुष्य को इस धरा धाम पर अनेक प्रकार के फल , शाक एवं अन्न उदर भरण के लिए प्रकट कर दिए हैं , अनेकों प्रकार के मनुष्य ऐसे भी जो इन प्राकृतिक आहारों के विपरीत जाकर के आहार स्वयं के लिए चुनते हैं | ऐसे व्यक्तियों को समाज घृणित दृष्टि से देखता था और उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता था | पूर्वकाल की सामाजिक व्यवस्था थी कि समाज के विपरीत होने पर दंड स्वरूप उस व्यक्ति को सामाजिक क्रियाकलाप से बहिष्कृत करके दंड दिया जाता था | विद्वानों की विशिष्ट पहचान होती थी | वे संयम एवं अपने सारे क्रियाकलाप वैदिक एवं सामाजिक रीत के अनुसार किया करते थे जिससे समाज को उचित मार्गदर्शन तो मिलता ही था साथ ही उनका स्वास्थ्य चिरकाल तक उनका साथ देता था | मनुष्य सत्य बोलने के साथ ही सदाचरण भी करते थे , ऐसा करके वे समाज में सम्मानित एवं पूज्य माने जाते थे | हमारे देश में सनातन धर्म को मानने वाले चाहे वह उच्च पद पर रहे हो या फिर निम्न स्तरीय जीवन यापन करने वाले परंतु उनकी मान्यताएं दिव्य रही है | यही कारण रहा है कि अनेक भ्रांतियां होने के बाद भी सनातन धर्म सर्वोच्चता को प्राप्त कर पाया | जहां सकारात्मकता होती है वही नकारात्मकता भी होती है इसी प्रकार सनातन धर्म में भी कुछ इस प्रकार के मनुष्य हुए जिन्होंने अपने क्रियाकलापों के द्वारा सनातन के सिद्धांतों के विपरीत जाकर के आचरण किये और समाज द्वारा अपमानित भी किये गये |* *आज जहां चारों ओर से सनातन धर्म पर ही कुठाराघात करने का प्रयास किया जा रहा है वहीं इसको मानने वाले भी अपने कर्म इसके विपरीत करने से स्वयं को नहीं रोक पा रहे हैं | समाज में उच्च पदों पर आसीन ऐसी कई महान हस्तियां है जिनको सनातन धर्म का पुरोधा माना जाता है परंतु उनके क्रियाकलाप सनातन के बिल्कुल विपरीत देखे जा सकते हैं | सनातन धर्म को एक नई दिशा देने वाले आदिगुरु शंकराचार्य जी एवं अपनी कालचयी रचना के द्वारा घर घर में राम नाम की अलख जगाने वाले गोस्वामी तुलसीदास जी पर भी उंगली उठाई जाने लगी है | और आश्चर्य एवं क्षोभ की बात यह है कि आज ऐसा करने वाला कोई दूसरा नहीं बल्कि सनातन धर्म के अग्रगण्य कहे जाने वाले लोग ही हैं | आज जो कुछ भी हो रहा है इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि इसका वर्णन तो पूर्वकाल में ही परमपूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास जी ने कर दिया था | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" बाबा जी के उस प्रसंग पर ध्यानाकर्षण कराना चाहूंगा जहां उन्होंने स्पष्ट लिख दिया था कि :- कलियुग में जो बड़ी-बड़ी डींग मारने वाला होगा वहीं पंडित कहा जाएगा | दूसरे का धन हरण करने वाले बुद्धिमान और झूठ बोलने वाला ही गुणवान कहा जाएगा | सनातन धर्म के उच्च पदों पर आसीन होकर के आज भक्ष्य - अभक्ष्य सब कुछ खा लेने वाले ही सिद्ध कहे जाएंगे | यह वर्णन गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने मानस में किया है | आज वही देखने को मिल रहा है | स्वयं को गुरु , जगद्गुरु , आचार्य , राजर्षि , महर्षि एवं ब्रह्मर्षि तक कहलवाने वाले लोग आज अपने पद के विपरीत क्रियाकलाप कर रहे हैं | इसे कलियुग का प्रभाव बना जाय या फिर सनातन का पराभव | आज यदि चारों ओर से सनातन धर्म पर कुठाराघात हो रहा है इसका कारण कोई दूसरा नहीं बल्कि सनातन धर्म के अनुयायी ही कहे जा सकते हैं , क्योंकि उनके आचरण उनके क्रियाकलाप सनातन धर्म के अनुसार न हो कर के उसके विपरीत जा रहे हैं |* *सनातन धर्म आदिकाल से दिव्य रहा है और दिव्य रहेगा | कुछ तथाकथित लोगों के कारण इसकी दिव्यता को कहीं से भी कोई क्षति नहीं हो सकती , क्योंकि सनातन सत्य है और सत्य कभी पराजित नहीं होता |* 🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺 🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥🌳🔥 सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना"*----🙏🏻🙏🏻🌹 ♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻🏵♻ *सनातन धर्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा (सतसंग) करने के लिए हमारे व्हाट्सऐप समूह----* *‼ भगवत्कृपा हि केवलम् ‼ से जुड़ें या सम्पर्क करें---* आचार्य अर्जुन तिवारी प्रवक्ता श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा संरक्षक संकटमोचन हनुमानमंदिर बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी (उत्तर-प्रदेश) 9935328830 🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀🌟🍀

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Sn Vyas Oct 15, 2019

#सनातन_धर्म ॐ सनातन धर्म का प्रतीक चिह्न ही नहीं बल्कि सनातन परम्परा का सबसे पवित्र शब्द है। सनातन धर्म: (हिन्दू धर्म, वैदिक धर्म) अपने मूल रूप हिन्दू धर्म के वैकल्पिक नाम से जाना जाता है।वैदिक काल में भारतीय उपमहाद्वीप के धर्म के लिये 'सनातन धर्म' नाम मिलता है। 'सनातन' का अर्थ है - शाश्वत या 'हमेशा बना रहने वाला', अर्थात् जिसका न आदि है न अन्त।सनातन धर्म मूलत: भारतीय धर्म है, जो किसी ज़माने में पूरे वृहत्तर भारत (भारतीय उपमहाद्वीप) तक व्याप्त रहा है। विभिन्न कारणों से हुए भारी धर्मान्तरण के बाद भी विश्व के इस क्षेत्र की बहुसंख्यक आबादी इसी धर्म में आस्था रखती है। सिन्धु नदी के पार के वासियो को ईरानवासी हिन्दू कहते, जो 'स' का उच्चारण 'ह' करते थे। उनकी देखा-देखी अरब हमलावर भी तत्कालीन भारतवासियों को हिन्दू और उनके धर्म को हिन्दू धर्म कहने लगे। भारत के अपने साहित्य में हिन्दू शब्द कोई १००० वर्ष पूर्व ही मिलता है, उसके पहले नहीं। हिन्दुत्व सनातन धर्म के रूप में सभी धर्मों का मूलाधार है क्योंकि सभी धर्म-सिद्धान्तों के सार्वभौम आध्यात्मिक सत्य के विभिन्न पहलुओं का इसमें पहले से ही समावेश कर लिया गया था। #इतिहास “ यह पथ सनातन है। समस्त देवता और मनुष्य इसी मार्ग से पैदा हुए हैं तथा प्रगति की है। हे मनुष्यों आप अपने उत्पन्न होने की आधाररूपा अपनी माता को विनष्ट न करें। ” —ऋग्वेद-3-18-1 सनातन धर्म जिसे हिन्दू धर्म अथवा वैदिक धर्म भी कहा जाता है, का १९६०८५३११० साल का इतिहास हैं। भारत (और आधुनिक पाकिस्तानी क्षेत्र) की सिन्धु घाटी सभ्यता में हिन्दू धर्म के कई चिह्न मिलते हैं। इनमें एक अज्ञात मातृदेवी की मूर्तियाँ, शिव पशुपति जैसे देवता की मुद्राएँ, लिंग, पीपल की पूजा, इत्यादि प्रमुख हैं। इतिहासकारों के एक दृष्टिकोण के अनुसार इस सभ्यता के अन्त के दौरान मध्य एशिया से एक अन्य जाति का आगमन हुआ, जो स्वयं को आर्य कहते थे और संस्कृत नाम की एक हिन्द यूरोपीय भाषा बोलते थे। एक अन्य दृष्टिकोण के अनुसार सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग स्वयं ही आर्य थे और उनका मूलस्थान भारत ही था। प्राचीन काल में भारतीय सनातन धर्म में गाणपत्य, शैवदेव:कोटी वैष्णव,शाक्त और सौर नाम के पाँच सम्प्रदाय होते थे।गाणपत्य गणेशकी, वैष्णव विष्णु की, शैवदेव:कोटी शिव की, शाक्त शक्ति की और सौर सूर्य की पूजा आराधना किया करते थे। पर यह मान्यता थी कि सब एक ही सत्य की व्याख्या हैं। यह न केवल ऋग्वेद परन्तु रामायण और महाभारत जैसे लोकप्रिय ग्रन्थों में भी स्पष्ट रूप से कहा गया है। प्रत्येक सम्प्रदाय के समर्थक अपने देवता को दूसरे सम्प्रदायों के देवता से बड़ा समझते थे और इस कारण से उनमें वैमनस्य बना रहता था। एकता बनाए रखने के उद्देश्य से धर्मगुरुओं ने लोगों को यह शिक्षा देना आरम्भ किया कि सभी देवता समान हैं, विष्णु, शिव और शक्ति आदि देवी-देवता परस्पर एक दूसरे के भी भक्त हैं। उनकी इन शिक्षाओं से तीनों सम्प्रदायों में मेल हुआ और सनातन धर्म की उत्पत्ति हुई। सनातन धर्म में विष्णु, शिव और शक्ति को समान माना गया और तीनों ही सम्प्रदाय के समर्थक इस धर्म को मानने लगे। सनातन धर्म का सारा साहित्य वेद, पुराण, श्रुति, स्मृतियाँ,उपनिषद्, रामायण, महाभारत, गीता आदि संस्कृत भाषा में रचा गया है। कालान्तर में भारतवर्ष में मुसलमान शासन हो जाने के कारण देवभाषा संस्कृत का ह्रास हो गया तथा सनातन धर्म की अवनति होने लगी। इस स्थिति को सुधारने के लिये विद्वान संत तुलसीदास ने प्रचलित भाषा में धार्मिक साहित्य की रचना करके सनातन धर्म की रक्षा की। जब औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन को ईसाई, मुस्लिम आदि धर्मों के मानने वालों का तुलनात्मक अध्ययन करने के लिये जनगणना करने की आवश्यकता पड़ी तो सनातन शब्द से अपरिचित होने के कारण उन्होंने यहाँ के धर्म का नाम सनातन धर्म के स्थान पर हिंदू धर्म रख दिया। 'सनातन धर्म', हिन्दू धर्म का वास्तविक नाम है। #स्वरूप सत्य दो धातुओं से मिलकर बना है सत् और तत्। सत का अर्थ यह और तत का अर्थ वह। दोनों ही सत्य है। अहं ब्रह्मास्मी और तत्वमसि। अर्थात मैं ही ब्रह्म हूँ और तुम ही ब्रह्म हो। यह संपूर्ण जगत ब्रह्ममय है। ब्रह्म पूर्ण है। यह जगत् भी पूर्ण है। पूर्ण जगत् की उत्पत्ति पूर्ण ब्रह्म से हुई है। पूर्ण ब्रह्म से पूर्ण जगत् की उत्पत्ति होने पर भी ब्रह्म की पूर्णता में कोई न्यूनता नहीं आती। वह शेष रूप में भी पूर्ण ही रहता है। यही सनातन सत्य है। सनातन में आधुनिक और समसामयिक चुनौतियों का सामना करने के लिए इसमें समय समय पर बदलाव होते रहे हैं, जैसे कि राजा राम मोहन राय, स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद आदि ने सती प्रथा, बाल विवाह, अस्पृश्यता जैसे असुविधाजनक परंपरागत कुरीतियों से असहज महसूस करते रहे। इन कुरीतियों की जड़ो (धर्मशास्त्रो) में मौजूद उन श्लोको -मंत्रो को "क्षेपक" कहा या फिर इनके अर्थो को बदला और इन्हें त्याज्य घोषित किया तो कई पुरानी परम्पराओं का पुनरुद्धार किया जैसे विधवा विवाह, स्त्री शिक्षा आदि। यद्यपि आज सनातन का पर्याय हिन्दू है पर बौद्ध, जैन धर्मावलम्बी भी अपने आप को सनातनी कहते हैं, क्योंकि बुद्ध भी अपने को सनातनी कहते हैं।यहाँ तक कि नास्तिक जोकि चार्वाक दर्शन को मानते हैं वह भी सनातनी हैं। सनातन धर्मी के लिए किसी विशिष्ट पद्धति, कर्मकांड, वेशभूषा को मानना जरुरी नहीं। बस वह सनातनधर्मी परिवार में जन्मा हो, वेदांत, मीमांसा, चार्वाक, जैन, बौद्ध, आदि किसी भी दर्शन को मानता हो बस उसके सनातनी होने के लिए पर्याप्त है। सनातन धर्म की गुत्थियों को देखते हुए कई बार इसे कठिन और समझने में मुश्किल धर्म समझा जाता है। हालांकि, सच्चाई तो ऐसी नहीं है, फिर भी इसके इतने आयाम, इतने पहलू हैं कि लोगबाग कई बार इसे लेकर भ्रमित हो जाते हैं। सबसे बड़ा कारण इसका यह कि सनातन धर्म किसी एक दार्शनिक, मनीषा या ऋषि के विचारों की उपज नहीं है, न ही यह किसी ख़ास समय पैदा हुआ। यह तो अनादि काल से प्रवाहमान और विकासमान रहा। साथ ही यह केवल एक दृष्टा, सिद्धांत या तर्क को भी वरीयता नहीं देता। #मार्ग विज्ञान जब प्रत्येक वस्तु, विचार और तत्व का मूल्यांकन करता है तो इस प्रक्रिया में धर्म के अनेक विश्वास और सिद्धांत धराशायी हो जाते हैं। विज्ञान भी सनातन सत्य को पकड़ने में अभी तक कामयाब नहीं हुआ है किंतु वेदांत में उल्लेखित जिस सनातन सत्य की महिमा का वर्णन किया गया है विज्ञान धीरे-धीरे उससे सहमत होता नजर आ रहा है। हमारे ऋषि-मुनियों ने ध्यान और मोक्ष की गहरी अवस्था में ब्रह्म, ब्रह्मांड और आत्मा के रहस्य को जानकर उसे स्पष्ट तौर पर व्यक्त किया था। वेदों में ही सर्वप्रथम ब्रह्म और ब्रह्मांड के रहस्य पर से पर्दा हटाकर 'मोक्ष' की धारणा को प्रतिपादित कर उसके महत्व को समझाया गया था। मोक्ष के बगैर आत्मा की कोई गति नहीं इसीलिए ऋषियों ने मोक्ष के मार्ग को ही सनातन मार्ग माना है।

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