singhvijaykumar May 21, 2019

ऊँ हनुमते नमः ।शुभ मंगलवार ।जय श्रीराम जय हनुमान 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 🕭हनुमान जी ने भीम को क्‍यों दिए थे अपने 3 केश🕭 हनुमान जी और भीम के संबंधों का उल्‍लेख कई कथाओं में मिलता है। यहां हम एक ऐसी ही कथा बता रहे हैं जिसमें हनुमान जी ने अपने 3 केश यानी बाल भीम को दिए थे।  अपने पिता की इच्‍छा को पूरा करने के लिए एक बार पांडवों ने राजसूय यज्ञ करने की योजना बनाई। आयोजन को भव्य बनाने के लिए युधिष्ठर ने यज्ञ में भगवान शिव के परम भक्त ऋषि पुरुष मृगा को आमंत्रित करने का फैसला किया। ऋषि पुरुष मृगा का आधा शरीर पुरुष का था और पैर मृग के समान थे। उन्हें ढूंढने और बुलाने का जिम्मा भीम को सौंपा गया। जब भीम निकलने लगे तो श्री कृष्ण ने उनको बताया क‍ि पुरुषमृगा की गति अति तेज है और उनका मुकाबला न कर पाने की स्‍थ‍ित‍ि में वह भीम को मार डालेंगे।  हनुमान आए भीम की मदद को भीम को इस बात से थोड़ी चिंता हुई लेकिन ज्‍येष्‍ठ भाई की बात मान वह पुरुषमृगा की खोज में हिमालय की ओर चल दिए। रास्‍ते में वह हनुमान जी मिले और उनके पूछने पर भीम ने उन्‍हें पूरी बात बता दी। हनुमान ने कहा यह सच है कि पुरुषमृगा की गति बहुत तेज है। लेकिन उनकी गति धीमी करने का एक उपाय है। वह शिवजी के परम भक्त हैं इसलिए उनके रास्ते में शिवलिंग आए तो वह पूजा करने के लिए जरूर रुकेंगे।  हनुमान ने दिए अपने 3 केश   हनुमान ने भीम को अपने 3 केश देकर कहा कि जब भी पुरुषमृगा तुम्हें पकड़ने लगे तब एक बाल गिरा देना। यह एक बाल 1000 शिवलिंगों में परिवर्तित हो जाएगा। पुरुषमृगा अपने स्वाभाव अनुसार हर शिवलिंग की पूजा करेंगे और तुम आगे निकल जाना। उसके बाद भीम आज्ञा लेकर आगे बढ़े। कुछ दूर जाकर ही भीम को पुरुष मृगा मिल गए जो को भगवान महादेव की स्तुति कर रहे थे। भीम ने उन्हें प्रणाम किया और अपने आने का कारण बताया, इस पर ऋषि ने सशर्त जाने के लिए हां कर दी। पुरुषमृगा ने रखी थी ये शर्त  पुरुषमृगा की शर्त थी क‍ि भीम को उनसे पहले हस्तिनापुर पहुंचाना था और ऐसा न कर पाने पर वह भीम को खा जाएंगे। भीम ने भाई की इच्छा को ध्यान में रखते हुए हां कर दी और हस्तिनापुर की तरफ दौड़ पड़े। जैसे ही पुरुषमृगा ने उनको पकड़ने की कोश‍िश की, तभी भीम ने हनुमान का एक बाल गिरा द‍िया और यह वास्‍तव में 1000 शिवलिंगों में बदल गया। लेकिन भीम आ गए पकड़ में  शिव के परमभक्त होने के नाते पुरुषुमृगा हर शिवलिंग को प्रणाम करने लगे और भीम भागते रहे। जब वो हस्तिनापुर के द्वार में घुसने ही वाले थे, तो पुरुषमृगा की पकड़ में उनके पैर आ गए।  लेकिन जैसे ही पुरुषमृगा ने भीम को खाना चाहा, तभी श्री कृष्ण और युधिष्ठर वहां पहुंच गए। तब युधिष्ठर से न्याय करने को कहा गया। और उन्‍होंने कहा कि चूंकि भीम के पांव द्वार के बाहर रह गए थे इसलिए पुरुषमृगा सिर्फ भीम के पैर ही खाने के हकदार हैं। युधिष्ठर के न्याय से पुरुषमृगा प्रसन्न हुए और उन्‍होंने न सिर्फ भीम को छोड़ द‍िया बल्‍क‍ि उन्होंने राजसूय यज्ञ में भी भाग लिया।  🚩 जय हनुमान 🚩 🌐

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singhvijaykumar May 20, 2019

ऊँ नमःशिवाय।शुभ सोमवार ।जय श्रीराम जय हनुमान 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 🔔अमरनाथ की कथा 🔔(जो भी इस अमर कथा को सुन लेता वह अमर हो जाता है ) पुराणों में संस्मरण है कि एक बार मां पार्वती ने बड़ी उत्सुकता के साथ बाबा श्री विश्र्वनाथ देवाधिदेव महादेव से यह प्रश्न किया कि ऐसा क्यूं होता है कि आप अजर अमर हैं और मुझे हर जन्म के बाद नए स्वरूप में आकर फिर से वर्षो की कठोर तपस्या के बाद आपको प्राप्त करना होता है। जब मुझे आपको ही प्राप्त करना है तो फिर मेरी यह तपस्या क्यूं? मेरी इतनी कठोर परीक्षा क्यूं? और आपके कंठ में पड़ी यह परमुण्ड माता तथा आपके अमर होने का कारण व रहस्य क्या है? महाकाल ने पहले तो माता को यह गूढ़ रहस्य बताना उचित नहीं समझा परन्तु माता की स्त्री हठ के आगे उनकी एक न चली। तब अन्त्वोगत्व्या महादेव शिव को मां पार्वती को अपनी साधना की अमर कथा, जिसे हम अमरत्व की कथा के रूप में जानते हैं, इसी परम पावन अमरनाथ की गुफा में कही। भगवान शंकर ने मां पार्वती जी से एकान्त व गुप्त स्थान पर अमर कथा सुनने को कहा, जिससे कि अमर कथा को कोई भी जीव, व्यक्ति और यहां तक कोई पशु-पक्षी न सुन लें, क्योंकि जो कोई भी इस अमर कथा को सुन लेता, वह अमर हो जाता। इस कारण शिव जी मां पार्वती को लेकर किसी गुप्त स्थान की ओर चल पड़े। सबसे पहले भगवान भोले ने अपनी सवारी नंदी को पहलगाम पर छोड़ दिया, इसलिए बाबा अमरनाथ की यात्रा पहलगाम से शुरू करने का तात्पर्य या बोध होता है। आगे चलने पर शिव जी ने अपनी जटाओं में चन्द्रमा को चंदनवाड़ी में अलग कर दिया और गंगा जी को पंचतरणी में और कंठाभूषण सर्पो को शेषनाग पर छोड़ दिया। इस प्रकार इस पड़ाव का नाम शेषनाग पड़ा। आगे की यात्रा में अगला पड़ाव गणेश टाप पड़ता है, इस स्थान पर बाबा ने अपने पुत्र गणेश को भी छोड़ दिया था, जिसको महागुणा का पर्वत भी कहा जाता है। पिस्सू घाटी में पिस्सू नामक कीड़े को भी त्याग दिया। इस प्रकार महादेव ने अपने पीछे जीवनदायिनी पांचों तत्वों को भी अपने से अलग कर दिया। इसके साथ मां पार्वती संग एक गुप्त गुफा में प्रवेश कर गए। कोई व्यक्ति, पशु या पक्षी गुफा के अंदर प्रवेश कर अमर कथा को न सुने, इसलिए शिव जी ने अपने चमत्कार से गुफा के चारों ओर आग प्रज्वलित कर दी। फिर शिव जी ने जीवन की अमर कथा मां पार्वती को सुनाना शुरू किया। कथा सुनते-सुनते देवी पार्वती को नींद आ गई और वह सो गई, जिसका शिव जी को पता नहीं चला। भगवान शिव अमर होने की कथा सुनाते रहे। इस समय दो सफेद कबूतर श्री शिव जी से कथा सुन रहे थे और बीच-बीच में गूं-गूं की आवाज निकाल रहे थे, शिव जी को लग रहा था कि मां पार्वती कथा सुन रही है और बीच-बीच में हुंकार भर रही हैं। इस तरह दोनों कबूतरों ने अमर होने की पूरी कथा सुन ली। कथा समाप्त होने पर शिव का ध्यान पार्वती मां की ओर गया जो सो रही थी। शिव जी ने सोचा कि अगर पार्वती सो रही है, तब इसे सुन कौन रहा था। तब महादेव की दृष्टि कबूतरों पर पड़ी। महादेव शिव कबूतरों पर क्रोधित हुए और उन्हें मारने के लिए तत्पर हुए। इस पर कबूतरों ने शिव जी से कहा कि हे प्रभु हमने आपसे अमर होने की कथा सुनी है, यदि आप हमें मार देंगे तो अमर होने की यह कथा झूठी हो जाएगी। इस पर शिव जी ने कबूतरों को जीवित छोड़ दिया और उन्हें आर्शीवाद दिया कि तुम सदैव इस स्थान पर शिव पार्वती के प्रतीक चिन्ह के रूप में निवास करोगे। अत: यह कबूतर का जोड़ा अजय अमर हो गया। माना जाता है कि आज भी इन दोनों कबूतरों का दर्शन भक्तों को यहां प्राप्त होता है। इस तरह से यह गुफा अमर कथा की साक्षी हो गई व इसका नाम अमरनाथ गुफा पड़ा। जहां गुफा के अंदर भगवान शंकर बर्फ के निर्मित शिवलिंग के रूप में विराजमान है। पवित्र गुफा में मां पार्वती के अलावा गणेश के भी अलग से बर्फ से निर्मित प्रतिरूपों के दर्शन किए जा सकते हैं। इस पवित्र गुफा की खोज के बारे में पुराणों में भी एक कथा प्रचलित है कि एक बार एक गड़रिये को एक साधू मिला, जिसने उस गड़रिये को कोयले से भरी एक बोरी दी जिसे गड़रिया अपने कंधे पर लाद कर अपने घर को चल दिया। घर आकर उसने बोरी खोली तो वह आश्चर्यचकित हुआ क्योंकि कोयले की बोरी अब सोने के सिक्कों की हो चुकी थी। इसके बाद वह गड़रिया साधू से मिलने व धन्यवाद देने के लिए उसी स्थान पर गया जहां पर साधू से मिला था। परन्तु वहां उसे साधू नहीं मिला बल्कि उसे ठीक उसी जगह एक गुफा दिखाई दी। गड़रिया जैसे ही उस गुफा के अंदर गया तो उसने वहां पर देखा कि भगवान भोले शंकर बर्फ के बने शिवलिंग के आकार में स्थापित थे। उसने वापस आकर सबको यह कहानी बताई और इस तरह भोले बाबा की पवित्र अमरनाथ गुफा की खोज हुई। धीरे-धीरे करते दूर-दूर से भी लोग पवित्र गुफा एवं बाबा के दर्शन के लिए पहुंचने लगे, जो आज एक प्रतिवर्ष यात्रा के रूप में जारी है। 🌐

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singhvijaykumar May 19, 2019

ऊँ सूर्याय नमः।शुभ रविवार ।जय श्रीराम जय हनुमान 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 🕭सूर्यदेव की कृपा🔔 किसी ने भी भगवान को नहीं देखा है, लेकिन सूर्य और चंद्रमा को हर व्यक्ति ने देखा है. ज्योतिष में सूर्य और चंद्रमा दोनों ही ग्रह माने गए हैं, जबकि विज्ञान कहता है कि चंद्रमा पृथ्वी का उपग्रह है. विज्ञान भी मानता है कि सूर्य के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है. वेदों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है. सूर्य से ही धरती पर जीवन संभव है और इसीलिए वैदिक काल से ही भारत में सूर्य की उपासना का चलन रहा है. शास्त्रों में सूर्य को सभी ग्रहों का अधिपति माना गया है. सभी ग्रहों को प्रसन्न करने के बजाय यदि केवल सूर्य की ही आराधना की जाए और नियमित रूप से सूर्य देव को जल चढ़ाया जाए, तो आपका भाग्योदय होने से कोई नहीं रोक सकता है. अगर आप नियमित रूप से सूर्यदेव को जल अर्पित नहीं कर पाते हैं, तो रविवार के दिन सूर्यदेव को जल चढ़ा सकते हैं. सूर्य की कृपा की पौराणिक कथा एक बुढ़िया थी, उसके जीवन का नियम था कि प्रत्येक रविवार के दिन प्रातः स्नान कर, घर को गोबर से लीप कर शुद्ध करती थी. इसके बाद वह भोजन तैयार करती और भगवान सूर्य को भोग लगा कर उसके बाद भोजन करती थी. यह क्रिया वह लम्बे समय से करती चली आ रही थी. ऐसा करने से उसका घर धन-धान्य से परिपूर्ण था. वह बुढ़िया अपने घर को शुद्ध करने के लिए पड़ोस में रहने वाली एक अन्य बुढ़िया की गाय का गोबर लाया करती थी. जिस घर से वह बुढ़िया गोबर लाती थी, वह विचार करने लगी कि यह मेरे गाय का ही गोबर क्यों लेने आती है. इसलिए वह अपनी गाय को घर के भीतर बांधने लगी. गोबर न मिलने से बुढ़िया रविवार के दिन अपने घर को गोबर से लीप कर शुद्ध न कर सकी. इसके कारण न तो उसने भोजन बनाया और भोग भी नहीं लगाया. रात्रि होने पर वह भूखी ही सो गई. रात्रि में भगवान सूर्यदेव ने उसे सपने में आकर इसका कारण पूछा. बुढ़िया ने जो कारण था, वह बता दिया. तब भगवान ने कहा कि माता तुम्हें सर्वकामना पूरक गाय देते हैं, भगवान ने उसे वरदान में गाय, धन और पुत्र दिया. इस प्रकार मोक्ष का वरदान देकर सूर्यदेव अन्तर्ध्यान हो गए. प्रातः बुढ़िया की आंख खुलने पर उसने आंगन में अति सुंदर गाय और बछड़ा पाया. बुढ़िया बहुत प्रसन्न हो हुई. जब उसकी पड़ोसन ने घर के बाहर गाय और बछड़े को बंधा देखा तो द्वेष से जल उठी. साथ ही देखा कि गाय ने सोने का गोबर किया है. उसने वह गोबर अपनी गाय के गोबर से बदल दिया. रोज ही ऐसा करने से बुढ़िया को इसकी खबर भी न लगी. भगवान ने देखा कि चालाक पड़ोसन बुढ़िया को ठग रही है तो उन्होंने जोर की आंधी चला दी. इससे बुढ़िया ने गाय को घर के अंदर बांध लिया. सुबह होने पर उसने गाय के सोने के गोबर को देखा, तो उसके आश्चर्य की कोई सीमा न रही. अब वह गाय को भीतर ही बांधने लगी. उधर पड़ोसन ने ईर्ष्या से राजा को शिकायत कर दी कि बुढ़िया के पास राजाओं के योग्य गाय है, जो सोना देती है. राजा ने यह सुन अपने दूतों से गाय मंगवा ली. बुढ़िया ने वियोग में अखंड व्रत रखे रखा. उधर राजा का सारा महल गाय के गोबर से भर गया. सूर्य देव ने राजा को सपने में गाय लौटाने को कहा. प्रातः होते ही राजा ने ऐसा ही किया साथ ही पड़ोसन को उचित दण्ड दिया. राजा ने सभी नगर वासियों को व्रत रखने का निर्देश दिया. तब से सभी नगरवासी यह व्रत रखने लगे और उन्हें खुशियां प्राप्त हुई. जय सूर्य भगवान 🌐

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singhvijaykumar May 18, 2019

ऊँ शनैश्चराय नमः।शुभ शनिवार ।जय श्रीराम जय हनुमान 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 🔔शनि देव की अदभूत कहानी🔔 हमारे जीवन में तेजपुंज तथा शक्तिशाली शनि का अदभुत महत्व है | वैसे शनि सौर जगत के नौ ग्रहों में से सातवांं ग्रह है; जिसे फलित ज्योतिष में अशुभ माना जाता है | आधुनिक खगोल शास्त्र के अनुसार शनि की धरती से दुरी लगभग नौ करोड मील है | इसका व्यास एक अरब बयालीस करोड साठ लाख किलोमीटर है तथा इसकी गुरुत्व शक्ति धरती से पंचानवे गुना अधिक है | शनि को सूरज की परिक्रमा करने पर उन्नीस वर्ष लगते है | अंतरिक्ष में शनि सधन नील आभा से खूबसूरत , बलवान , प्रभावी , दृष्टिगोचर है, जिसे 22 उपग्रह है | शनि का गुरुत्वाकर्षण बल पृथ्वी से अधिकतम है | अत: जब हम कोई भी विचार मन में लाते है , योजना बनाते है, तो वह प्रत्सावित अच्छी - बुरी योजना चुंबकीय आकर्षन से शनि तक पहुँचती है और अच्छे का परिणाम अच्छा जब की बुरे का बुरा परिणाम जल्द दे देती है | बुरे प्रभाव को फलज्योतिष में अशुभ माना गया है | लेकिन अच्छे का परिणाम अच्छा होता है अत: हम शनि को शत्रु नहीं मित्र समझे और बुरे कर्मो के लिए वह साडेसाती है, आफत है ; शत्रु है | श्री शनैश्वर देवस्थान के अनुुसार शनिदेव की जन्म गाथा या उत्पति के संदर्भ में अलग - अलग कथा है | सबसे अधिक प्रचलित शनि उत्पति की गाथा स्कंध पुराण के काशीखण्ड में इस प्रकार प्रस्तुत सूर्यदेवता का ब्याह दक्ष कन्या संज्ञा के साथ हुआ | संज्ञा सूर्यदेवता का अत्याधिक तेज सह नहीं पाती थी | उन्हें लगता था की मुझे तपस्या करके अपने तेज को बढ़ाना होगा या तपोबल से सूर्य की अग्नि को कम करना होगा; लेकिन सूर्य के लिए वो पतिव्रता नारी थी | सूर्य के द्वारा संज्ञा के गर्भ से तीन संतानों का जन्म हुआ - . वैवस्वत मनु . यमराज . यमुना. संज्ञा बच्चों से बहुत प्यार करती थी; मगर सूर्य की तेजस्विता के कारण बहुत परेशान रहती थी | एक दिन संज्ञा ने सोचा कि सूर्य से अलग होकर मै अपने मायके जाकर घोर तपस्या करूंगी; और यदि विरोध हुआ तो कही दूर एकान्त में जाकर तप करना उचित रहेगा | संज्ञा ने तपोबल से अपने ही जैसी दिखने वाली छाया को जन्म दिया, जिसका नाम ' सुवर्णा ' रखा अत: संज्ञा की छाया सुवर्णा | छाया को अपने बच्चोँ की जिम्मेदारी सौंपते हुए कहा कि आज से तुम नारी धर्म मेरे स्थान पर निभाओगी और बच्चों कि परवरिश भी करोगी | अगर कोई आपत्ति आ जाये तो मुझे बुला लेना मै दौडी चली आऊँगी, मगर एक बात याद रखना कि तुम छाया हो संज्ञा नहीं यह भेद कभी किसी को पता नहीं चलना चाहिए | संज्ञा छाया को अपनी जिम्मेदारी सौपकर अपने पीहर - मायके चली गयी | घर पहुँचकर पिताश्री को बताया कि मै सूर्य का तेज सहन नहीं कर सकती, अत: तप करने अपने पति से बिना कुछ कहे मायके आयी हूँ | सुनकर पिताने संज्ञा को बहुत डाटा कहा कि , ' बिन बुलाये बेटी यदि मायके में आए तो पिता व पुत्री को दोष लगता है | बेटी तुम जल्द अपने ससुराल सूर्य के पास लौट जाओ ' ,तब संज्ञा सोचने लगी कि यदि मै वापस लौटकर गई तो छाया को मैंने जो कार्यभार सौंपा है उसका क्या होगा ? छाया कहाँ जायेगी ? सोचकर संज्ञा ने भीषण , घनघोर जंगल में , ( जो उत्तर कुरुक्षेत्र में था ) शरण ले ली | अपनी खुबसूरती तथा यौवन को लेकर उसे जंगल में डर था अत: उसने बडवा - घोडी का रूप बना लिया कि कोई उसे पहचान न सके और तप करने लगी | धर सूर्य और छाया के मिलन से तीन बच्चों का जन्म हुआ | सूर्य छाया दोनों एक दूसरे पर संतुष्ट थे, सूर्य को कभी संदेह नहीं हुआ | छाया ने जिन तीन बच्चों को जन्म दिया वे है - . मनु .शनिदेव . पुत्री भद्रा ( तपती ) दूसरी कथा के अनुसार शनिदेव कि उत्पति महर्षि कश्यप के अभिभावकत्व में कश्यप यज्ञ से हुई | जब शनिदेव छाया के गर्भ में थे तो शिव भक्तिनी छाया ने शिव कि इतनी तपस्या की कि उन्हें अपने खाने - पीने तक का ख्याल नहीं रहता था | अपने को इतना तपाया की गर्भ के बच्चे पर भी तप का परिणाम हुआ , और छाया के भूखे प्यासे धुप-गर्मी में तपन से गर्भ में ही शनि का रंग काला हो गया | जब शनि का जन्म हुआ तो सूर्यदेव शनि को काले रंग का देखकर हैरान हो गए | उन्हें छाया पर शक हुआ | उन्होंने छाया का अपमान कर डाला , कहा कि 'यह मेरा बेटा नहीं है |' श्री शनिदेव के अन्दर जन्म से माँ कि तपस्या शक्ति का बल था; उन्होंने देखा कि मेरे पिता , माँ का अपमान कर रहे है | उन्होने क्रूर दृष्टी से अपने पिता को देखा , तो पिता कि पूरी देह का रंग कालासा हो गया | घोडों की चाल रुक गयी | रथ आगे नहीं चल सका | सूर्यदेव परेशान होकर शिवजी को पुकारने लगे | शिवजी ने सूर्यदेव को सलाह बताई और कथन किया की आपके द्वारा नारी व पुत्र दोनों की बेज्जती हुई है इसलिए यह दोष लगा है | सूर्यदेव ने अपनी गलती की क्षमा मांगी और पुनश्च सुन्दर रूप एवं घोडों की गति प्राप्त की | तब से श्री शनिदेव पिता के विद्रोही और शिवाजी के भक्त तथा माता के प्रिय हो गए | हमारे जीवन में जन्म से लेकर , मृत्यु तक शनिदेव का प्रभुत्व है | जन्मते ही जातक के परिवार वालों की अभिलाषा होती है की हमारी राशि में या जन्म लेने वाले बच्चे की राशि में शनि कैसा है ? कौन से पाये पर बच्चे का जन्म हुआ है | प्रस्तुत पाये की पहचान की शनि के अच्छे - बुरे होने की पहचान जन्म से बतलाता है | अपने शरीर में लौह तत्व है , उस आयरन तत्व का स्वामी शनि है | शनि के कमजोर होने से , शनि के प्रकोप , शनि पीड़ा से वह आयरन तत्व शरीर में कम हो जाता है | 🌐

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