Shweta Sharma Mar 30, 2021

🛕🚩🚩 ....... ३० लाख बार वृक्ष योनि में जन्म होता है । इस योनि में सर्वाधिक कष्ट होता है ।धूप ताप,आँधी, वर्षा आदि में बहुत शाखा तक टूट जाती हैं ।शीतकाल में पतझड में सारे पत्ता पत्ता तक झड़ जाता हैl रस, रूप,स्पर्श ,गंध होता है पर वाक नही होती, स्थावर है जंगम नहीं। उसके बाद जलचर प्राणियों के रूप में ९ लाख बार जन्म होता है । हाथ और पैरों से रहित देह और मस्तक। सड़ा गला मांस ही खाने को मिलता है । एक दूसरे का मास खाकर जीवन रक्षा करते हैं ।रस, रूप,स्पर्श,गंध होता है,वाक नहीं होती। स्थावर से जंगम हो जाते हैं। उसके बाद कृमि योनि में १० लाख बार जन्म होता है । और फिर ११ लाख बार पक्षी योनि में जन्म होता है। वृक्ष ही आश्रय स्थान होते हैं ।जोंक, कीड़-मकोड़े, सड़ा गला जो कुछ भी मिल जाय, वही खाकर उदरपूर्ति करना।स्वयं भूखे रह कर संतान को खिलाते हैं और जब संतान उडना सीख जाती है तब पीछे मुडकर भी नहीं देखती । काक और शकुनि का जन्म दीर्घायु होता है ।रस, रूप,स्पर्श,गंध होता है। वाक नहीं प्राप्त होती ,खेचर हो जाते हैं। उसके बाद २० लाख बार पशु योनि,वहाँ भी अनेक प्रकार के कष्ट मिलते हैं ।अपने से बडे हिंसक और बलवान् पशु सदा ही पीडा पहुँचाते रहते हैं ।भय के कारण पर्वत कन्दराओं में छुपकर रहना। एक दूसरे को मारकर खा जाना । कोई केवल घास खाकर ही जीते हैं । किन्ही को हल खीचना, गाडी खीचना आदि कष्ट साध्य कार्य करने पडते हैं । रोग शोक आदि होने पर कुछ बता भी नहीं सकते।सदा मल मूत्रादि में ही रहना पडता है । गौ का शरीर समस्त पशु योनियों में श्रेष्ठ एवं अंतिम माना गया है । उसके बाद वैदिक धर्मशून्य अधम कुल में ,पाप कर्म करना एवं मदिरा आदि निकृष्ट और निषिद्ध वस्तुओं का सेवन ही सर्वोपरि । उसके बाद शूद्र कुल में जन्म होता है । उसके बाद वैश्य कुल में । फिर क्षत्रिय और अंत में ब्राह्मणकुल में जन्म मिलता है । और सबसे अंत में ब्राह्मणकुल में जन्म मिलता है ।यह जन्म एक ही बार मिलता है ।जो ब्रह्मज्ञान सम्पन्न है वही ब्राह्मण है।अपने उद्धार के लिए वह आत्मज्ञान से परिपूर्ण हो जाता है ।यदि इस दुर्लभ जन्म में भी ज्ञान नहीं प्राप्त कर लेता तो पुनः चौरासी लाख योनियों में घूमता रहता है ।शास्त्र शरणागति के अतिरिक्त कोई और उपाय नहीं है। Share.... 👏

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Shweta Sharma Mar 28, 2021

🛕🚩🚩 ....... ३० लाख बार वृक्ष योनि में जन्म होता है । इस योनि में सर्वाधिक कष्ट होता है ।धूप ताप,आँधी, वर्षा आदि में बहुत शाखा तक टूट जाती हैं ।शीतकाल में पतझड में सारे पत्ता पत्ता तक झड़ जाता हैl रस, रूप,स्पर्श ,गंध होता है पर वाक नही होती, स्थावर है जंगम नहीं। उसके बाद जलचर प्राणियों के रूप में ९ लाख बार जन्म होता है । हाथ और पैरों से रहित देह और मस्तक। सड़ा गला मांस ही खाने को मिलता है । एक दूसरे का मास खाकर जीवन रक्षा करते हैं ।रस, रूप,स्पर्श,गंध होता है,वाक नहीं होती। स्थावर से जंगम हो जाते हैं। उसके बाद कृमि योनि में १० लाख बार जन्म होता है । और फिर ११ लाख बार पक्षी योनि में जन्म होता है। वृक्ष ही आश्रय स्थान होते हैं ।जोंक, कीड़-मकोड़े, सड़ा गला जो कुछ भी मिल जाय, वही खाकर उदरपूर्ति करना।स्वयं भूखे रह कर संतान को खिलाते हैं और जब संतान उडना सीख जाती है तब पीछे मुडकर भी नहीं देखती । काक और शकुनि का जन्म दीर्घायु होता है ।रस, रूप,स्पर्श,गंध होता है। वाक नहीं प्राप्त होती ,खेचर हो जाते हैं। उसके बाद २० लाख बार पशु योनि,वहाँ भी अनेक प्रकार के कष्ट मिलते हैं ।अपने से बडे हिंसक और बलवान् पशु सदा ही पीडा पहुँचाते रहते हैं ।भय के कारण पर्वत कन्दराओं में छुपकर रहना। एक दूसरे को मारकर खा जाना । कोई केवल घास खाकर ही जीते हैं । किन्ही को हल खीचना, गाडी खीचना आदि कष्ट साध्य कार्य करने पडते हैं । रोग शोक आदि होने पर कुछ बता भी नहीं सकते।सदा मल मूत्रादि में ही रहना पडता है । गौ का शरीर समस्त पशु योनियों में श्रेष्ठ एवं अंतिम माना गया है । उसके बाद वैदिक धर्मशून्य अधम कुल में ,पाप कर्म करना एवं मदिरा आदि निकृष्ट और निषिद्ध वस्तुओं का सेवन ही सर्वोपरि । उसके बाद शूद्र कुल में जन्म होता है । उसके बाद वैश्य कुल में । फिर क्षत्रिय और अंत में ब्राह्मणकुल में जन्म मिलता है । और सबसे अंत में ब्राह्मणकुल में जन्म मिलता है ।यह जन्म एक ही बार मिलता है ।जो ब्रह्मज्ञान सम्पन्न है वही ब्राह्मण है।अपने उद्धार के लिए वह आत्मज्ञान से परिपूर्ण हो जाता है ।यदि इस दुर्लभ जन्म में भी ज्ञान नहीं प्राप्त कर लेता तो पुनः चौरासी लाख योनियों में घूमता रहता है ।शास्त्र शरणागति के अतिरिक्त कोई और उपाय नहीं है। Share.... 👏

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Shweta Sharma Mar 27, 2021

. 🌹 *महामृत्युंजय मंत्र की रचना कैसे हुई*🌹 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️ *किसने की महामृत्युंजय मंत्र की रचना और जाने इसकी शक्ति*... शिवजी के अनन्य भक्त मृकण्ड ऋषि संतानहीन होने के कारण दुखी थे, विधाता ने उन्हें संतान योग नहीं दिया था। . ✴️✴️✴️✴️✴️ मृकण्ड ने सोचा कि महादेव संसार के सारे विधान बदल सकते हैं. इसलिए क्यों न भोलेनाथ को प्रसन्नकर यह विधान बदलवाया जाए। मृकण्ड ने घोर तप किया, भोलेनाथ मृकण्ड के तप का कारण जानते थे इसलिए उन्होंने शीघ्र दर्शन न दिया लेकिन भक्त की भक्ति के आगे भोले झुक ही जाते हैं। महादेव प्रसन्न हुए, उन्होंने ऋषि को कहा कि मैं विधान को बदलकर तुम्हें पुत्र का वरदान दे रहा हूं लेकिन इस वरदान के साथ हर्ष के साथ विषाद भी होगा..। भोलेनाथ के वरदान से मृकण्ड को पुत्र हुआ जिसका नाम मार्कण्डेय पड़ा. ज्योतिषियों ने मृकण्ड को बताया कि यह विलक्ष्ण बालक अल्पायु है, इसकी उम्र केवल 12 वर्ष है। ऋषि का हर्ष विषाद में बदल गया. मृकण्ड ने अपनी पत्नी को आश्वत किया- जिस ईश्वर की कृपा से संतान हुई है वही भोले इसकी रक्षा करेंगे. भाग्य को बदल देना उनके लिए सरल कार्य है। मार्कण्डेय बड़े होने लगे तो पिता ने उन्हें शिवमंत्र की दीक्षा दी. मार्कण्डेय की माता बालक के उम्र बढ़ने से चिंतित रहती थी. उन्होंने मार्कण्डेय को अल्पायु होने की बात बता दी। मार्कण्डेय ने निश्चय किया कि माता-पिता के सुख के लिए उसी सदाशिव भगवान से दीर्घायु होने का वरदान लेंगे जिन्होंने जीवन दिया है. बारह वर्ष पूरे होने को आए थे। मार्कण्डेय ने शिवजी की आराधना के लिए महामृत्युंजय मंत्र की रचना की और शिव मंदिर में बैठकर इसका अखंड जाप करने लगे। *ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्*। *उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्*॥ समय पूरा होने पर यमदूत उन्हें लेने आए. यमदूतों ने देखा कि बालक महाकाल की आराधना कर रहा है तो उन्होंने थोड़ी देर प्रतीक्षा की. मार्केण्डेय ने अखंड जप का संकल्प लिया था। यमदूतों का मार्केण्डेय को छूने का साहस न हुआ और लौट गए. उन्होंने यमराज को बताया कि वे बालक तक पहुंचने का साहस नहीं कर पाए। इस पर यमराज ने कहा कि मृकण्ड के पुत्र को मैं स्वयं लेकर आऊंगा. यमराज मार्कण्डेय के पास पहुंच गए। बालक मार्कण्डेय ने यमराज को देखा तो जोर-जोर से महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हुए शिवलिंग से लिपट गया यमराज ने बालक को शिवलिंग से खींचकर ले जाने की चेष्टा की तभी जोरदार हुंकार से मंदिर कांपने लगा. एक प्रचण्ड प्रकाश से यमराज की आंखें चुंधिया गईं। शिवलिंग से स्वयं महाकाल प्रकट हो गए. उन्होंने हाथों में त्रिशूल लेकर यमराज को सावधान किया और पूछा तुमने मेरी साधना में लीन भक्त को खींचने का साहस कैसे किया? यमराज महाकाल के प्रचंड रूप से कांपने लगे. उन्होंने कहा- प्रभु मैं आप का सेवक हूं. आपने ही जीवों से प्राण हरने का निष्ठुर कार्य मुझे सौंपा है। भगवान चंद्रशेखर का क्रोध कुछ शांत हुआ तो बोले- मैं अपने भक्त की स्तुति से प्रसन्न हूं और मैंने इसे दीर्घायु होने का वरदान दिया है. तुम इसे नहीं ले जा सकते। यम ने कहा- प्रभु आपकी आज्ञा सर्वोपरि है. मैं आपके भक्त मार्कण्डेय द्वारा रचित महामृत्युंजय का पाठ करने वाले को त्रास नहीं दूंगा। महाकाल की कृपा से मार्केण्डेय दीर्घायु हो गए. उवके द्वारा रचित *महामृत्युंजय मंत्र* ,काल को भी परास्त करता है। ........... *आप सभी का दिन शुभ हो* 🙏🏻 *जय मृत्युंजय महाकाल* 🙏🏻

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Shweta Sharma Mar 25, 2021

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