shubham Tiwari May 15, 2020

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shubham Tiwari May 12, 2020

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shubham Tiwari May 10, 2020

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shubham Tiwari May 9, 2020

*हिंदू धर्म में हजारों सालों से संक्रमण से बचने के लिए कुछ सूत्र जो अब पूरी दुनिया अपना रही है-* *घ्राणास्ये वाससाच्छाद्य मलमूत्रं त्यजेत् बुध:।*(वाधूलस्मृति 9) *नियम्य प्रयतो वाचं संवीताङ्गोऽवगुण्ठित:।*(मनुस्मृति 4/49)) नाक, मुंह तथा सिर को ढ़ककर, मौन रहकर मल मूत्र का त्याग करना चाहिए। *तथा न अन्यधृतं धार्यम्* (महाभारत अनु.104/86) दुसरों के पहने कपड़े नहीं पहनने चाहिए। *स्नानाचारविहीनस्य सर्वा:स्यु: निष्फला: क्रिया:*(वाधूलस्मृति 69) स्नान और शुद्ध आचार के बिना सभी कार्य निष्फल हो जाते हैं, अतः: सभी कार्य स्नान करके शुद्ध होकर करने चाहिए। *लवणं व्यञ्जनं चैव घृतं तैलं तथैव च। लेह्यं पेयं च विविधं हस्तदत्तं न भक्षयेत्।*(धर्मसिंधु 3 पू.आह्निक) नमक, घी, तैल, कोई भी व्यंजन, चाटने योग्य एवं पेय पदार्थ यदि हाथ से परोसे गए हों तो न खायें, चम्मच आदि से परोसने पर ही ग्राह्य हैं। *न अप्रक्षालितं पूर्वधृतं वसनं बिभृयात्।*(विष्णुस्मृति 64) पहने हुए वस्त्र को बिना धोए पुनः न पहनें। पहना हुआ वस्त्र धोकर ही पुनः पहनें। *न चैव आर्द्राणि वासांसि नित्यं सेवेत मानव:।*(महाभारत अनु.104/52) *न आर्द्रं परिदधीत*(गोभिलगृह्यसूत्र 3/5/24) गीले कपड़े नहीं पहनने चाहिए। ABC *चिताधूमसेवने सर्वे वर्णा: स्नानम् आचरेयु:। वमने श्मश्रुकर्मणि कृते च*(विष्णुस्मृति 22) श्मशान में जाने पर, वमन होने/करने पर, हजामत बनवाने पर स्नान करके शुद्ध होना चाहिए। *हस्तपादे मुखे चैव पञ्चार्द्रो भोजनं चरेत्।*(पद्मपुराण सृष्टि 51/88) *नाप्रक्षालित पाणिपादौ भुञ्जीत।*(सु.चि.24/98) हाथ, पैर और मुंह धोकर भोजन करना चाहिए। *अपमृज्यान्न च स्नातो गात्राण्यम्बरपाणिभि:।*(मार्कण्डेय पुराण 34/52) स्नान करने के बाद अपने हाथों से या स्नान के समय पहने भीगे कपड़ों से शरीर को नहीं पोंछना चाहिए, अर्थात् किसी सूखे कपड़े (तौलिए) से ही पोंछना चाहिए। *न वार्यञ्जलिना पिबेत्।*( मनुस्मृति 4/63) *नाञ्जलिपुटेनाप: पिबेत्।*(सु.चि.24/98) अंजलि से जल नहीं पीना चाहिए, किसी पात्र(गिलास) से जल पीयें। *न धारयेत् परस्यैवं स्नानवस्त्रं कदाचन।*(पद्मपुराण सृष्टि 51/86) दुसरों के स्नान के वस्त्र (तौलिए इत्यादि) प्रयोग में न लें। *अब देख लीजिएआधुनिक अस्पताल और मेडिकल साइंस धराशाई हो चुके हैं और समस्त विश्व हजारों साल पुराने बचाव के उपाय अपना रहा है।*

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