shubham raghav Apr 4, 2020

भगवान शंकर जिसके आराध्य हों या फिर अगर कोई साधक भगवान शंकर का ध्यान करता हो तो उनके बारे में कई भाव मन में प्रस्फुटित होते हैं। जैसे कि भगवान शंकर त्रिशूल लिए साधना पर बैठे है। उनका तीसरा नेत्र यानी भ्रिकुटी बंद है। उनकी जटाओं से गंगा प्रवाहित हो रही है। उनका शरीर समुद्र मंथन के समय विषपान करने की वजह से नीला दिख रहा है। भगवान शंकर की जटाओं और शरीर के इर्द-गिर्द कई सांप लिपटे हुए है। शिव के मस्तक पर एक ओर चंद्र है तो दूसरी ओर महाविषधर सर्प भी उनके गले का हार है। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है। साधन क्रम में विचार सागर में कई विचारों का आगमन होता है। भगवान शंकर के बारे में कई कथा-कहानियां पुराणों, धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है। उनसे जुड़ी कई कथाएं साधकों को उनसे जोड़े रखती है और साधकों के लिए वह प्रेरणादायी भी है। पौराणिक मान्यताओं में भगवान शंकर और सर्प का जुड़ाव गहरा है तभी तो वह उनके शरीर से लिपटे रहते है। यह बात सिर्फ मान्यताओं तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह इस कलियुग में भी हकीकत में परिलक्षित होती दिखती है। यूं तो भगवान जनता जनार्दन के लिए अपनी कृपा बरसाने में अति दयालु है लेकिन कहते हैं कि अगर आपको भगवान शंकर के दर्शन ना हो और अगर सर्प के दर्शन हो जाएं तो समझिए कि साक्षात भगवान शंकर के ही दर्शन हो गए। हम चल रहे हैं राजस्थान के माउंट आबू में। माउंट आबू राजस्थान का इकलौता हिल स्टेशन है जो अर्धकाशी भी कहलाता है। पौराणिक मान्यताओं और पुराणों के मुताबिक माउंट आबू अर्धकाशी इसलिए कहलाता है क्योंकि यहां भगवान शंकर के 108 छोटे-बड़े मंदिर हैं। दुनिया की इकलौती जगह जहां भगवान शंकर नहीं, उनकी शिवलिंग भी नहीं बल्कि उनके अंगूठे की पूजा होती है। माउंट आबू में ही अचलगढ़ दुनिया की इकलौती ऐसी जगह है जहां भगवान शिव के अंगूठे की पूजा होती है। भगवान शिव के सभी मंदिरों में तो उनके शिवलिंग की पूजा होती है लेकिन यहां भगवान शिव के अंगूठे की पूजा होती है। यहीं पर एक मंदिर है पांडव गुफा के करीब जहां के बारे में कहा जाता है पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान कुछ समय यहां बिताया था। शिव मंदिर में बीते सोमवार को भगवान शंकर को जल और दूध से नहलाने पहुंचे श्रद्धालुओं को लगा जैसे भोले एक विशालकाय नाग के रूप में प्रकट हो गए। मंदिर भोले की जयकारों से गूंज रह था। शिवलिंग पर जल, बिल्व पत्र, भांग, धतूरा, फूल आदि चढ़ाए जाने का क्रम जारी था। तभी एक विशालकाय सर्प न जाने कहां से आकर शिवलिंग से लिपट गया। इस नाग का आकार लगभग 6 फीट का था। इस बीच कुछ लोगों ने डरते-डरते शिवलिंग पर जल भी अर्पित किया लेकिन नागराज कई घंटों तक शिवलिंग से लिपटे रहे। सावन का दूसरा सोमवार और शिवलिंग पर जल चढ़ाने का सिलसिला चलता रहा। इस बीच नाग की अटखेलियां भी जारी रही। वह कभी शिवलिंग के ऊपर बैठता तो कभी शिवलिंग की चारों तरफ लिपटकर बैठ जाता। लोग हैरान थे लेकिन जो लोग वहां थे उनके मुताबिक यह हैरानी उस सांप को नहीं थी। वह शायद निर्भय होकर आनंद की अनुभूति कर रहा था। इतने लोगों के बीच कोई सांप लगभग 6 घंटों तक शिवलिंग से लिपटा रहा। लोग टकटकी लगाए देखते रहे। कुछ लोगों के लिए भोले सर्प के रूप में शिवलिंग से आकर लिपटे थे तो कुछ लोग उस पल को शिद्दत से महसूस करना चाह रहे थे। यही वजह थी कि मंदिर में भीड़ बढ़ने लगी। इलाके में खबर फैलने लगी। अचानक सर्प गायब हो गया। वहां श्रद्धालुओं के चढ़ाए पुष्प और फल तो दिख रहे थे लेकिन सर्प नहीं। सांप इंसानों के लिए खतरनाक होता है लेकिन यह बात भी सच है कि उसे हम इंसानों से ज्यादा डर लगता है। आस्था, विश्वास की परिभाषा आध्यात्म की सीमा रेखा में सब कुछ मानने पर ही निर्भर है। स्थानीय लोगों के मुताबिक माउंट आबू के उन मंदिरों में जो जंगल के बीचों बीच है वहां इस प्रकार की घटनाएं सावन के महीने में सोमवार को या फिर शिवरात्रि के मौके पर जरूर होती है। पिछले वर्ष इन्हीं जंगलों के एक शिव मंदिर में पंचमुखी (पांच मुंह वाला सांप) दिखा था। ये घटनाएं ये सिद्ध करती है कि शिव (शिवलिंग) और सर्प का गहरा नाता है। यह रिश्ता इंसानी समझ से परे है। क्या मानें क्या ना मानें यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है। कुछ लोगों के लिए यह भोले का रूप हो सकता है तो कुछ के लिए कोरा अंधविश्वास। लेकिन यह बात सोचने पर जरूर विवश करती है कि हजारों की भीड़ में एक सांप छह घंटे तक शिवलिंग से कैसे लिपटा रहा। वह भी भोले के जयकारों और मंदिर में बजती घंटियों के बीच।Install Gujarati garba App from: https://play.google.com/store/apps/details?id=com.sampurna.shiv.puran

+1 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर
shubham raghav Mar 31, 2020

भगवान शंकर जिसके आराध्य हों या फिर अगर कोई साधक भगवान शंकर का ध्यान करता हो तो उनके बारे में कई भाव मन में प्रस्फुटित होते हैं। जैसे कि भगवान शंकर त्रिशूल लिए साधना पर बैठे है। उनका तीसरा नेत्र यानी भ्रिकुटी बंद है। उनकी जटाओं से गंगा प्रवाहित हो रही है। उनका शरीर समुद्र मंथन के समय विषपान करने की वजह से नीला दिख रहा है। भगवान शंकर की जटाओं और शरीर के इर्द-गिर्द कई सांप लिपटे हुए है। शिव के मस्तक पर एक ओर चंद्र है तो दूसरी ओर महाविषधर सर्प भी उनके गले का हार है। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है। साधन क्रम में विचार सागर में कई विचारों का आगमन होता है। भगवान शंकर के बारे में कई कथा-कहानियां पुराणों, धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है। उनसे जुड़ी कई कथाएं साधकों को उनसे जोड़े रखती है और साधकों के लिए वह प्रेरणादायी भी है। पौराणिक मान्यताओं में भगवान शंकर और सर्प का जुड़ाव गहरा है तभी तो वह उनके शरीर से लिपटे रहते है। यह बात सिर्फ मान्यताओं तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह इस कलियुग में भी हकीकत में परिलक्षित होती दिखती है। यूं तो भगवान जनता जनार्दन के लिए अपनी कृपा बरसाने में अति दयालु है लेकिन कहते हैं कि अगर आपको भगवान शंकर के दर्शन ना हो और अगर सर्प के दर्शन हो जाएं तो समझिए कि साक्षात भगवान शंकर के ही दर्शन हो गए। हम चल रहे हैं राजस्थान के माउंट आबू में। माउंट आबू राजस्थान का इकलौता हिल स्टेशन है जो अर्धकाशी भी कहलाता है। पौराणिक मान्यताओं और पुराणों के मुताबिक माउंट आबू अर्धकाशी इसलिए कहलाता है क्योंकि यहां भगवान शंकर के 108 छोटे-बड़े मंदिर हैं। दुनिया की इकलौती जगह जहां भगवान शंकर नहीं, उनकी शिवलिंग भी नहीं बल्कि उनके अंगूठे की पूजा होती है। माउंट आबू में ही अचलगढ़ दुनिया की इकलौती ऐसी जगह है जहां भगवान शिव के अंगूठे की पूजा होती है। भगवान शिव के सभी मंदिरों में तो उनके शिवलिंग की पूजा होती है लेकिन यहां भगवान शिव के अंगूठे की पूजा होती है। यहीं पर एक मंदिर है पांडव गुफा के करीब जहां के बारे में कहा जाता है पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान कुछ समय यहां बिताया था। शिव मंदिर में बीते सोमवार को भगवान शंकर को जल और दूध से नहलाने पहुंचे श्रद्धालुओं को लगा जैसे भोले एक विशालकाय नाग के रूप में प्रकट हो गए। मंदिर भोले की जयकारों से गूंज रह था। शिवलिंग पर जल, बिल्व पत्र, भांग, धतूरा, फूल आदि चढ़ाए जाने का क्रम जारी था। तभी एक विशालकाय सर्प न जाने कहां से आकर शिवलिंग से लिपट गया। इस नाग का आकार लगभग 6 फीट का था। इस बीच कुछ लोगों ने डरते-डरते शिवलिंग पर जल भी अर्पित किया लेकिन नागराज कई घंटों तक शिवलिंग से लिपटे रहे। सावन का दूसरा सोमवार और शिवलिंग पर जल चढ़ाने का सिलसिला चलता रहा। इस बीच नाग की अटखेलियां भी जारी रही। वह कभी शिवलिंग के ऊपर बैठता तो कभी शिवलिंग की चारों तरफ लिपटकर बैठ जाता। लोग हैरान थे लेकिन जो लोग वहां थे उनके मुताबिक यह हैरानी उस सांप को नहीं थी। वह शायद निर्भय होकर आनंद की अनुभूति कर रहा था। इतने लोगों के बीच कोई सांप लगभग 6 घंटों तक शिवलिंग से लिपटा रहा। लोग टकटकी लगाए देखते रहे। कुछ लोगों के लिए भोले सर्प के रूप में शिवलिंग से आकर लिपटे थे तो कुछ लोग उस पल को शिद्दत से महसूस करना चाह रहे थे। यही वजह थी कि मंदिर में भीड़ बढ़ने लगी। इलाके में खबर फैलने लगी। अचानक सर्प गायब हो गया। वहां श्रद्धालुओं के चढ़ाए पुष्प और फल तो दिख रहे थे लेकिन सर्प नहीं। सांप इंसानों के लिए खतरनाक होता है लेकिन यह बात भी सच है कि उसे हम इंसानों से ज्यादा डर लगता है। आस्था, विश्वास की परिभाषा आध्यात्म की सीमा रेखा में सब कुछ मानने पर ही निर्भर है। स्थानीय लोगों के मुताबिक माउंट आबू के उन मंदिरों में जो जंगल के बीचों बीच है वहां इस प्रकार की घटनाएं सावन के महीने में सोमवार को या फिर शिवरात्रि के मौके पर जरूर होती है। पिछले वर्ष इन्हीं जंगलों के एक शिव मंदिर में पंचमुखी (पांच मुंह वाला सांप) दिखा था। ये घटनाएं ये सिद्ध करती है कि शिव (शिवलिंग) और सर्प का गहरा नाता है। यह रिश्ता इंसानी समझ से परे है। क्या मानें क्या ना मानें यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है। कुछ लोगों के लिए यह भोले का रूप हो सकता है तो कुछ के लिए कोरा अंधविश्वास। लेकिन यह बात सोचने पर जरूर विवश करती है कि हजारों की भीड़ में एक सांप छह घंटे तक शिवलिंग से कैसे लिपटा रहा। वह भी भोले के जयकारों और मंदिर में बजती घंटियों के बीच।Install Gujarati garba App from: https://play.google.com/store/apps/details?id=com.sampurna.shiv.puran

+4 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 0 शेयर
shubham raghav Mar 30, 2020

महर्षि भृगु ब्रह्माजी के मानस पुत्र थे। उनकी पत्नी का नाम ख्याति था जो दक्ष की पुत्री थी। महर्षि भृगु सप्तर्षिमंडल के एक ऋषि हैं। सावन और भाद्रपद में वे भगवान सूर्य के रथ पर सवार रहते हैं। एक बार की बात है, सरस्वती नदी के तट पर ऋषि-मुनि एकत्रित होकर इस विषय पर चर्चा कर रहे थे कि ब्रह्माजी, शिवजी और श्रीविष्णु में सबसे बड़े और श्रेष्ठ कौन है? इसका कोई निष्कर्ष न निकलता देख उन्होंने त्रिदेवों की परीक्षा लेने का निश्चय किया और ब्रह्माजी के मानस पुत्र महर्षि भृगु को इस कार्य के लिए नियुक्त किया। महर्षि भृगु सर्वप्रथम ब्रह्माजी के पास गए। उन्होंने न तो प्रणाम किया और न ही उनकी स्तुति की। यह देख ब्रह्माजी क्रोधित हो गए। क्रोध की अधिकता से उनका मुख लाल हो गया। आँखों में अंगारे दहकने लगे। लेकिन फिर यह सोचकर कि ये उनके पुत्र हैं, उन्होंने हृदय में उठे क्रोध के आवेग को विवेक-बुद्धि में दबा लिया। वहाँ से महर्षि भृगु कैलाश गए। देवाधिदेव भगवान महादेव ने देखा कि भृगु आ रहे हैं तो वे प्रसन्न होकर अपने आसन से उठे और उनका आलिंगन करने के लिए भुजाएँ फैला दीं। किंतु उनकी परीक्षा लेने के लिए भृगु मुनि उनका आलिंगन अस्वीकार करते हुए बोले-“महादेव! आप सदा वेदों और धर्म की मर्यादा का उल्लंघन करते हैं। दुष्टों और पापियों को आप जो वरदान देते हैं, उनसे सृष्टि पर भयंकर संकट आ जाता है। इसलिए मैं आपका आलिंगन कदापि नहीं करूँगा।” उनकी बात सुनकर भगवान शिव क्रोध से तिलमिला उठे। उन्होंने जैसे ही त्रिशूल उठा कर उन्हें मारना चाहा, वैसे ही भगवती सती ने बहुत अनुनय-विनय कर किसी प्रकार से उनका क्रोध शांत किया। इसके बाद भृगु मुनि वैकुण्ठ लोक गए। उस समय भगवान श्रीविष्णु देवी लक्ष्मी की गोद में सिर रखकर लेटे थे। भृगु ने जाते ही उनके वक्ष पर एक तेज लात मारी। भक्त-वत्सल भगवान विष्णु शीघ्र ही अपने आसन से उठ खड़े हुए और उन्हें प्रणाम करके उनके चरण सहलाते हुए बोले-“भगवन! आपके पैर पर चोट तो नहीं लगी? कृपया इस आसन पर विश्राम कीजिए। भगवन! मुझे आपके शुभ आगमन का ज्ञान न था। इसलिए मैं आपका स्वागत नहीं कर सका। आपके चरणों का स्पर्श तीर्थों को पवित्र करने वाला है। आपके चरणों के स्पर्श से आज मैं धन्य हो गया।” भगवान विष्णु का यह प्रेम-व्यवहार देखकर महर्षि भृगु की आँखों से आँसू बहने लगे। उसके बाद वे ऋषि-मुनियों के पास लौट आए और ब्रह्माजी, शिवजी और श्रीविष्णु के यहाँ के सभी अनुभव विस्तार से कह बताया। उनके अनुभव सुनकर सभी ऋषि-मुनि बड़े हैरान हुए और उनके सभी संदेह दूर हो गए। तभी से वे भगवान विष्णु को सर्वश्रेष्ठ मानकर उनकी पूजा-अर्चना करने लगे। वास्तव में उन ऋषि-मुनियों ने अपने लिए नहीं, बल्कि मनुष्यों के संदेहों को मिटाने के लिए ही ऐसी लीला रची थी।Install Gujarati garba App from: https://play.google.com/store/apps/details?id=com.sampurna.shiv.puran

+32 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 0 शेयर
shubham raghav Mar 29, 2020

महर्षि भृगु ब्रह्माजी के मानस पुत्र थे। उनकी पत्नी का नाम ख्याति था जो दक्ष की पुत्री थी। महर्षि भृगु सप्तर्षिमंडल के एक ऋषि हैं। सावन और भाद्रपद में वे भगवान सूर्य के रथ पर सवार रहते हैं। एक बार की बात है, सरस्वती नदी के तट पर ऋषि-मुनि एकत्रित होकर इस विषय पर चर्चा कर रहे थे कि ब्रह्माजी, शिवजी और श्रीविष्णु में सबसे बड़े और श्रेष्ठ कौन है? इसका कोई निष्कर्ष न निकलता देख उन्होंने त्रिदेवों की परीक्षा लेने का निश्चय किया और ब्रह्माजी के मानस पुत्र महर्षि भृगु को इस कार्य के लिए नियुक्त किया। महर्षि भृगु सर्वप्रथम ब्रह्माजी के पास गए। उन्होंने न तो प्रणाम किया और न ही उनकी स्तुति की। यह देख ब्रह्माजी क्रोधित हो गए। क्रोध की अधिकता से उनका मुख लाल हो गया। आँखों में अंगारे दहकने लगे। लेकिन फिर यह सोचकर कि ये उनके पुत्र हैं, उन्होंने हृदय में उठे क्रोध के आवेग को विवेक-बुद्धि में दबा लिया। वहाँ से महर्षि भृगु कैलाश गए। देवाधिदेव भगवान महादेव ने देखा कि भृगु आ रहे हैं तो वे प्रसन्न होकर अपने आसन से उठे और उनका आलिंगन करने के लिए भुजाएँ फैला दीं। किंतु उनकी परीक्षा लेने के लिए भृगु मुनि उनका आलिंगन अस्वीकार करते हुए बोले-“महादेव! आप सदा वेदों और धर्म की मर्यादा का उल्लंघन करते हैं। दुष्टों और पापियों को आप जो वरदान देते हैं, उनसे सृष्टि पर भयंकर संकट आ जाता है। इसलिए मैं आपका आलिंगन कदापि नहीं करूँगा।” उनकी बात सुनकर भगवान शिव क्रोध से तिलमिला उठे। उन्होंने जैसे ही त्रिशूल उठा कर उन्हें मारना चाहा, वैसे ही भगवती सती ने बहुत अनुनय-विनय कर किसी प्रकार से उनका क्रोध शांत किया। इसके बाद भृगु मुनि वैकुण्ठ लोक गए। उस समय भगवान श्रीविष्णु देवी लक्ष्मी की गोद में सिर रखकर लेटे थे। भृगु ने जाते ही उनके वक्ष पर एक तेज लात मारी। भक्त-वत्सल भगवान विष्णु शीघ्र ही अपने आसन से उठ खड़े हुए और उन्हें प्रणाम करके उनके चरण सहलाते हुए बोले-“भगवन! आपके पैर पर चोट तो नहीं लगी? कृपया इस आसन पर विश्राम कीजिए। भगवन! मुझे आपके शुभ आगमन का ज्ञान न था। इसलिए मैं आपका स्वागत नहीं कर सका। आपके चरणों का स्पर्श तीर्थों को पवित्र करने वाला है। आपके चरणों के स्पर्श से आज मैं धन्य हो गया।” भगवान विष्णु का यह प्रेम-व्यवहार देखकर महर्षि भृगु की आँखों से आँसू बहने लगे। उसके बाद वे ऋषि-मुनियों के पास लौट आए और ब्रह्माजी, शिवजी और श्रीविष्णु के यहाँ के सभी अनुभव विस्तार से कह बताया। उनके अनुभव सुनकर सभी ऋषि-मुनि बड़े हैरान हुए और उनके सभी संदेह दूर हो गए। तभी से वे भगवान विष्णु को सर्वश्रेष्ठ मानकर उनकी पूजा-अर्चना करने लगे। वास्तव में उन ऋषि-मुनियों ने अपने लिए नहीं, बल्कि मनुष्यों के संदेहों को मिटाने के लिए ही ऐसी लीला रची थी।Install Gujarati garba App from: https://play.google.com/store/apps/details?id=com.sampurna.shiv.puran

+13 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर
shubham raghav Mar 28, 2020

चंद्रमा की सुंदरता पर राजा दक्ष की सत्ताइस पुत्रियां मोहित हो गईं. वे सभी चंद्रमा से विवाह करना चाहती थीं. दक्ष ने समझाया सगी बहनों का एक ही पति होने से दांपत्य जीवन में बाधा आएगी लेकिन चंद्रमा के प्रेम में पागल दक्ष पुत्रियां जिद पर अड़ी रहीं. अश्विनी सबसे बड़ी थी. उसने कहा कि पिताजी हम आपस में मेलजोल से मित्रवत रहेंगे. आपको शिकायत नहीं मिलेगी. दक्ष ने सत्ताईस कन्याओं का विवाह चंद्रमा से कर दिया. विवाह से चंद्रमा और उनकी पत्नियां दोनों बहुत प्रसन्न थे लेकिन ये खुशी ज्यादा दिनों तक नहीं रही. जल्द ही चंद्रमा सत्ताइस बहनों में से एक रोहिणी पर ज्यादा मोहित हो गए और अन्य पत्नियों की उपेक्षा करने लगे. यह बात दक्ष को पता चली और उन्होंने चंद्रमा को समझाया. कुछ दिनों तक तो चंद्रमा ठीक रहे लेकिन जल्द ही वापस रोहिणी पर उनकी आसक्ति पहले से भी ज्यादा तेज हो गई. अन्य पुत्रियों के विलाप से दुखी दक्ष ने फिर चंद्रमा से बात की लेकिन उन्होंने इसे अपना निजी मामला बताकर दक्ष का अपमान कर दिया. दक्ष प्रजापति थे. कोई देवता भी उनका अनादर नहीं करता था. क्रोधित होकर उन्होंने चंद्रमा को शाप दिया कि तुम क्षय रोग के मरीज हो जाओ. दक्ष के शाप से चंद्रमा क्षय रोग से ग्रस्त होकर धूमिल हो गए. उनकी चमक समाप्त हो गई. पृथ्वी की गति बिगड़ने लगी. परेशान ऋषि-मुनि और देवता भगवान ब्रह्मा की शरण में गए. ब्रह्मा, दक्ष के पिता थे लेकिन दक्ष के शाप को समाप्त कर पाना उनके वश में नहीं था. उन्होंने देवताओं को शिवजी की शरण में जाने का सुझाव दिया. ब्रह्मा ने कहा- चंद्रदेव भगवान शिव को तप से प्रसन्न करें. दक्ष पर उनके अलावा किसी का वश नहीं चल सकता. ब्रह्मा की सलाह पर चंद्रमा ने शिवलिंग बनाकर घोर तप आरंभ किया. महादेव प्रसन्न हुए और चंद्रमा से वरदान मांगने को कहा. चंद्रमा ने शिवजी से अपने सभी पापों के लिए क्षमा मांगते हुए क्षय रोग से मुक्ति का वरदान मांगा. भगवान शिव ने कहा कि तुम्हें जिसने शाप दिया है वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है. उसके शाप को समाप्त करना संभव नहीं फिर भी मैं तुम्हारे लिए कुछ न कुछ करूंगा जरूर. शिवजी बोले- एक माह में जो दो पक्ष होते हैं, उसमें से एक पक्ष में तुम मेरे वरदान से निखरते जाओगे, लेकिन दक्ष के शाप के प्रभाव से दूसरे पक्ष में क्षीण होते जाओगे. शिव के वरदान से चंद्रमा शुक्लपक्ष में तेजस्वी रहते हैं और कृष्ण पक्ष में धूमिल हो जाते हैं. चंद्रमा की स्तुति से महादेव जिस स्थान पर निराकार से साकार हो गए थे उस स्थान की देवों ने पूजा की और वह स्थान सोमनाथ के नाम से विख्यात हुआ. चंद्रमा की वे सताइस पत्नियां ही सताइस विभिन्न नक्षत्र हैं. (शिवपुराण की कथा)Install Gujarati garba App from: https://play.google.com/store/apps/details?id=com.sampurna.shiv.puran

+7 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 1 शेयर
shubham raghav Mar 27, 2020

एक बार ब्रह्माजी व विष्णुजी में विवाद छिड़ गया कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। ब्रह्माजी सृष्टि के रचयिता होने के कारण श्रेष्ठ होने का दावा कर रहे थे और भगवान विष्णु पूरी सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में स्वयं को श्रेष्ठ कह रहे थे। तभी वहां एक विराट ज्योतिर्मय लिंग प्रकट हुआ। दोनों देवताओं ने सर्वानुमति से यह निश्चय किया गया कि जो इस लिंग के छोर का पहले पता लगाएगा, उसे ही श्रेष्ठ माना जाएगा। अत: दोनों विपरीत दिशा में शिवलिंग का छोर ढूढंने निकले। छोर न मिलने के कारण विष्णुजी लौट आए। ब्रह्माजी भी सफल नहीं हुए, परंतु उन्होंने आकर विष्णुजी से कहा कि वे छोर तक पहुँच गए थे। उन्होंने केतकी के फूल को इस बात का साक्षी बताया। केतकी के पुष्प ने भी ब्रह्माजी के इस झूठ में उनका साथ दिया। ब्रह्माजी के असत्य कहने पर स्वयं भगवान शिव वहां प्रकट हुए और उन्होंने ब्रह्माजी की आलोचना की। दोनों देवताओं ने महादेव की स्तुति की, तब शिवजी बोले कि मैं ही सृष्टि का कारण, उत्पत्तिकर्ता और स्वामी हूँ। मैंने ही तुम दोनों को उत्पन्न किया है। शिव ने केतकी पुष्प को झूठा साक्ष्य देने के लिए दंडित करते हुए कहा कि यह फूल मेरी पूजा में उपयोग नहीं किया जा सकेगा। इसीलिए शिव के पूजन में कभी केतकी का पुष्प नहीं चढ़ाया जाता।Install Gujarati garba App from: https://play.google.com/store/apps/details?id=com.sampurna.shiv.puran

+7 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर
shubham raghav Mar 26, 2020

भगवान शंकर का सातवां अवतार है गृहपति। यह अवतार हमें संदेश देता है कि हम जो भी कार्य करें उसके केंद्र में भगवान को रखें। अर्थात यदि हम सिर्फ भोजन प्राप्ति के लिए भी कोई कार्य कर रहे हैं तो उसका माध्यम पवित्र तथा धर्मानुसार होना चाहिए। इस कार्य में किसी का अहित नहीं होना चाहिए। तभी हमारा कार्य सफल होगा। पुराणों के अनुसार हमारे शरीर में स्थित जठराग्नि(भूख) ही भगवान शंकर का गृहपति अवतार है। भूख लगने पर हम जो अन्न ग्रहण करते हैं उसी से हमारे शरीर का पोषण होता है तथा हमारे शरीर में स्थित सुक्ष्म प्राणों को संतुष्टि प्राप्त होती है। यही इस अवतार का मूल संदेश है कि हम जठराग्नि को शांत करने के लिए जो भी कार्य करें वह धर्म के अनुसार हो। शुचिष्मती-पुत्र के रूप में अवतरण नर्मदा के तट पर धर्मपुर नाम का एक नगर था। वहां विश्वानर नाम के एक मुनि तथा उनकी पत्नी शुचिष्मती रहती थीं। शुचिष्मती ने बहुत काल तक नि:संतान रहने पर एक दिन अपने पति से शिव के समान पुत्र प्राप्ति की इच्छा की। पत्नी की अभिलाषा पूरी करने के लिए मुनि विश्वनार काशी आ गए। यहां उन्होंने घोर तप द्वारा भगवान शिव के वीरेश लिंग की आराधना की। एक दिन मुनि को वीरेश लिंग के मध्य एक बालक दिखाई दिया। मुनि ने बालरूपधारी शिव की पूजा की। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने शुचिष्मति के गर्भ से अवतार लेने का वरदान दिया। कालांतर में शुचिष्मती गर्भवती हुई और भगवान शंकर शुचिष्मती के गर्भ से पुत्ररूप में प्रकट हुए। कहते हैं पितामह ब्रह्मा ने ही उस बालक का नाम गृहपति रखा था।Install Gujarati garba App from: https://play.google.com/store/apps/details?id=com.sampurna.shiv.puran

+18 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 0 शेयर
shubham raghav Mar 25, 2020

भील कुमार कण्णप्प वन में भटकते-भटकते एक मंदिर के समीप पहुंचा। मंदिर में भगवान शंकर की मूर्ति देख उसने सोचा- भगवान इस वन में अकेले हैं। कहीं कोई पशु इन्हें कष्ट न दे। शाम हो गई थी। कण्णप्प धनुष पर बाण चढ़ाकर मंदिर के द्वार पर पहरा देने लगा। सवेरा होने पर उसे भगवान की पूजा करने का विचार आया किंतु वह पूजा करने का तरीका नहीं जानता था। वह वन में गया, पशु मारे और आग में उनका मांस भून लिया। मधुमक्खियों का छत्ता तोड़कर शहद निकाला। एक दोने में शहद और मांस लेकर कुछ पुष्प तोड़कर और नदी का जल मुंह में भरकर मंदिर पहुंचा। मूर्ति पर पड़े फूल-पत्तों को उसने पैर से हटाया। मुंह से ही मूर्ति पर जल चढ़ाया, फूल चढ़ाए और मांस व शहद नैवेद्य के रूप में रख दिया। उस मंदिर में रोज सुबह एक ब्राहमण पूजा करने आता था। मंदिर में नित्य ही मांस के टुकड़े देख ब्राहमण दुखी होता। एक दिन वह छिपकर यह देखने बैठा कि यह करता कौन है? उसने देखा कण्णप्प आया। उस समय मूर्ति के एक नेत्र से रक्त बहता देख उसने पत्तों की औषधि मूर्ति के नेत्र पर लगाई, किंतु रक्त बंद नहीं हुआ। तब कण्णप्प ने अपना नेत्र तीर से निकालकर मूर्ति के नेत्र पर रखा। रक्त बंद हो गया। तभी दूसरे नेत्र से रक्त बहने लगा। कण्णप्प ने दूसरा नेत्र भी अर्पित कर दिया। तभी शंकरजी प्रकट हुए और कण्णप्प को हृदय से लगाते हुए उसकी नेत्रज्योति लौटा दी और ब्राहमण से कहा- मुझे पूजा पद्धति नहीं, श्रद्धापूर्ण भाव ही प्रिय है। वस्तुत: ईश्वर पूर्ण समर्पण के साथ किए स्मरण मात्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं और मंगल आशीषों से भक्त को तार देते हैं।Install Gujarati garba App from: https://play.google.com/store/apps/details?id=com.sampurna.shiv.puran

+17 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 0 शेयर