Neha Sharma Sep 16, 2019

ओम् नमः शिवाय 🌿🌹🙏 हर हर महादेव 🌿🌹🙏 *जानिए अपने आराध्य भगवान शिव शंकर के बारे में*..... *कौन हैं शिव*.... *शिव संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है, कल्याणकारी या शुभकारी। यजुर्वेद में शिव को शांतिदाता बताया गया है। 'शि' का अर्थ है, पापों का नाश करने वाला, जबकि 'व' का अर्थ देने वाला यानी दाता।* *क्या है शिवलिंग*..... *शिव की दो काया है। एक वह, जो स्थूल रूप से व्यक्त किया जाए, दूसरी वह, जो सूक्ष्म रूपी अव्यक्त लिंग के रूप में जानी जाती है। शिव की सबसे ज्यादा पूजा लिंग रूपी पत्थर के रूप में ही की जाती है। लिंग शब्द को लेकर बहुत भ्रम होता है। संस्कृत में लिंग का अर्थ है चिह्न। इसी अर्थ में यह शिवलिंग के लिए इस्तेमाल होता है। शिवलिंग का अर्थ है- शिव यानी परमपुरुष का प्रकृति के साथ समन्वित-चिह्न।* *शिव, शंकर, महादेव का अर्थ भी जानें*..... *शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है। लोग कहते हैं - शिव शंकर भोलेनाथ। इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं। असल में, दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं। शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है। शिव ने सृष्टि की स्थापना, पालन और विनाश के लिए क्रमश: ब्रह्मा, विष्णु और महेश (महेश भी शंकर का ही नाम है) नामक तीन सूक्ष्म देवताओं की रचना की है। इस तरह शिव ब्रह्मांड के रचयिता हुए और शंकर उनकी एक रचना। भगवान शिव को इसीलिए महादेव भी कहा जाता है। इसके अलावा शिव को 108 दूसरे नामों से भी जाना और पूजा जाता है।* *भगवान शिव को अर्द्धनारीश्वर क्यों कहा जाता है*..... *शिव को अर्द्धनारीश्वर भी कहा गया है, इसका अर्थ यह नहीं है कि शिव आधे पुरुष ही हैं या उनमें संपूर्णता नहीं। दरअसल, यह शिव ही हैं, जो आधे होते हुए भी पूरे हैं। इस सृष्टि के आधार और रचयिता यानी स्त्री-पुरुष शिव और शक्ति के ही स्वरूप हैं। इनके मिलन और सृजन से यह संसार संचालित और संतुलित है। दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। नारी प्रकृति है और नर पुरुष। प्रकृति के बिना पुरुष बेकार है और पुरुष के बिना प्रकृति। दोनों का अन्योन्याश्रय संबंध है। अर्धनारीश्वर शिव इसी पारस्परिकता के प्रतीक हैं। आधुनिक समय में स्त्री-पुरुष की बराबरी पर जो इतना जोर है, उसे शिव के इस स्वरूप में बखूबी देखा-समझा जा सकता है। यह बताता है कि शिव जब शक्ति युक्त होता है तभी समर्थ होता है। शक्ति के अभाव में शिव 'शिव' न होकर 'शव' रह जाता है।* *देवाधिदेव को नीलकंठ क्यों कहा जाता है*.....  *अमृत पाने की इच्छा से जब देव-दानव बड़े जोश और वेग से मंथन कर रहे थे, तभी समुद से कालकूट नामक भयंकर विष निकला। उस विष की अग्नि से दसों दिशाएं जलने लगीं। समस्त प्राणियों में हाहाकार मच गया। देवताओं और दैत्यों सहित ऋषि, मुनि, मनुष्य, गंधर्व और यक्ष आदि उस विष की गरमी से जलने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर, भगवान शिव विषपान के लिए तैयार हो गए। उन्होंने भयंकर विष को हथेलियों में भरा और भगवान विष्णु का स्मरण कर उसे पी गए। भगवान विष्णु अपने भक्तों के संकट हर लेते हैं। उन्होंने उस विष को शिवजी के कंठ (गले) में ही रोक कर उसका प्रभाव खत्म कर दिया। विष के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया और वे संसार में नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हुए।* *भोले बाबा*..... *शिव पुराण में एक शिकारी की कथा है। एक बार उसे जंगल में देर हो गई। तब उसने एक बेल वृक्ष पर रात बिताने का निश्चय किया। जगे रहने के लिए उसने एक तरकीब सोची। वह सारी रात एक-एक पत्ता तोड़कर नीचे फेंकता रहा। कथानुसार, बेल के पत्ते शिव को बहुत प्रिय हैं। बेल वृक्ष के ठीक नीचे एक शिवलिंग था। शिवलिंग पर प्रिय पत्तों का अर्पण होते देख शिव प्रसन्न हो उठे, जबकि शिकारी को अपने शुभ काम का अहसास न था। उन्होंने शिकारी को दर्शन देकर उसकी मनोकामना पूरी होने का वरदान दिया। कथा से यह साफ है कि शिव कितनी आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं। शिव महिमा की ऐसी कथाओं और बखानों से पुराण भरे पड़े हैं।* *शिव के स्वरूप*..... *भगवान शिव का रूप-स्वरूप जितना विचित्र है, उतना ही आकर्षक भी। शिव जो धारण करते हैं, उनके भी बड़े व्यापक अर्थ हैं।* *जटाएं*.... *शिव की जटाएं अंतरिक्ष का प्रतीक हैं।* *चंद्र*..... *चंद्रमा मन का प्रतीक है। शिव का मन चांद की तरह भोला, निर्मल, उज्ज्वल और जाग्रत है।* *त्रिनेत्र*..... *शिव की तीन आंखें हैं। इसीलिए इन्हें त्रिलोचन भी कहते हैं। शिव की ये आंखें सत्व, रज, तम (तीन गुणों), भूत, वर्तमान, भविष्य (तीन कालों), स्वर्ग, मृत्यु पाताल (तीनों लोकों) का प्रतीक हैं।* *सर्पहार*..... *सर्प जैसा हिंसक जीव शिव के अधीन है। सर्प तमोगुणी व संहारक जीव है, जिसे शिव ने अपने वश में कर रखा है।* *त्रिशूल*..... *शिव के हाथ में एक मारक शस्त्र है। त्रिशूल भौतिक, दैविक, आध्यात्मिक इन तीनों तापों को नष्ट करता है।* *डमरू*.....  *शिव के एक हाथ में डमरू है, जिसे वह तांडव नृत्य करते समय बजाते हैं। डमरू का नाद ही ब्रह्मा रूप है।* *मुंडमाला *..... *शिव के गले में मुंडमाला है, जो इस बात का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को वश में किया हुआ है।* *छाल*.....  *शिव ने शरीर पर व्याघ्र चर्म यानी बाघ की खाल पहनी हुई है। व्याघ्र हिंसा और अहंकार का प्रतीक माना जाता है। इसका अर्थ है कि शिव ने हिंसा और अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबा लिया है।* *भस्म*..... *शिव के शरीर पर भस्म लगी होती है। शिवलिंग का अभिषेक भी भस्म से किया जाता है। भस्म का लेप बताता है कि यह संसार नश्वर है।* *वृषभ*..... *शिव का वाहन वृषभ यानी बैल है। वह हमेशा शिव के साथ रहता है। वृषभ धर्म का प्रतीक है। महादेव इस चार पैर वाले जानवर की सवारी करते हैं, जो बताता है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष उनकी कृपा से ही मिलते हैं। इस तरह शिव-स्वरूप हमें बताता है कि उनका रूप विराट और अनंत है, महिमा अपरंपार है। उनमें ही सारी सृष्टि समाई हुई है।* *महामृत्युंजय मंत्र की महिमा*..... *शिव के साधक को न तो मृत्यु का भय रहता है, न रोग का, न शोक का। शिव तत्व उनके मन को भक्ति और शक्ति का सामर्थ्य देता है। शिव तत्व का ध्यान महामृत्युंजय मंत्र के जरिए किया जाता है। इस मंत्र के जाप से भगवान शिव की कृपा मिलती है। शास्त्रों में इस मंत्र को कई कष्टों का निवारक बताया गया है।* *यह मंत्र यों हैं : ओम् त्र्यम्बकं यजामहे, सुगंधिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनात्, मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।* *भावार्थ : हम भगवान शिव की पूजा करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो हर श्वांस में जीवन शक्ति का संचार करते हैं और पूरे जगत का पालन-पोषण करते हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि वे हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर दें, ताकि मोक्ष की प्राप्ति हो जाए, उसी उसी तरह से जैसे एक खर बूजा अपनी बेल में पक जाने के बाद उस बेल रूपी संसार के बंधन से मुक्त हो जाता है।*

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Neha Sharma Sep 16, 2019

*ओम् नमः शिवाय*🌹🌹🙏 *शुभ प्रभात*🌹🌹🙏 *भगवान शिव जन्म-मृत्यु से परे हैं। वे स्वयं ही जन्म-मृत्यु के निर्माता हैं। कालचक्र भी गतिशील होने के लिए उनके आदेश की प्रतीक्षा करता है। सृष्टि का निर्माण और विलय शिव सबसे बड़ा रहस्य है जिसे भगवान शिव ही जानते हैं।* *एक बार मां पार्वती ने शिवजी से सृष्टि के निर्माण और भगवान की अमरता का रहस्य पूछा। मां पार्वती की जिज्ञासा देखकर भगवान भोलेनाथ उन्हें यह रहस्य बताना चाहते थे।* *शास्त्राें में इसे अमर कथा कहा जाता है। शिवजी अमर कथा के लिए एक ऐसे स्थान की तलाश करने लगे जो पूर्णतः गुप्त हो और वहां कोई इसे सुन न सके, क्योंकि जो भी व्यक्ति इस कथा को सुन लेता वह अमर हो सकता था।* *तब भोलेनाथ ने एक गुफा में पार्वती को अमर कथा सुनाई। इसमें सृष्टि का आदि और अंत सबकुछ बताया। यह सृष्टि का सबसे बड़ा रहस्य था।* *कहते हैं कि बीच में मां पार्वती को निद्रा आ गई परंतु शिवजी कथा सुनाते रहे। उस समय गुफा में दो सफेद कबूतर भी थे। वे भगवान भोलेनाथ से यह कथा सुनते रहे। कबूतर बीच-बीच में अपनी ध्वनि से यह जता रहे थे कि कोई उनकी कथा सुन रहा है। इस प्रकार उन्होंने शिवजी से संपूर्ण कथा सुन ली।* *कथा समाप्ति के बाद जब शिवजी ने देखा कि पार्वतीजी तो सो रही हैं.. फिर कथा कौन सुन रहा था? तब उन्हें दोनों कबूतर दिखाई दिए। शिवजी उनका वध करना चाहते थे क्योंकि उनके अमर हो जाने से सृष्टि का संतुलन बिगड़ सकता था।* *इस पर कबूतरों ने उनसे कहा, हे भोलेनाथ, जीवन-मृत्यु के दाता तो आप ही हैं परंतु अगर आप हमें मार देंगे तो आपकी अमर कथा का महत्व समाप्त हो जाएगा। वह असत्य सिद्ध हो जाएगी।* *यह सुनकर शिवजी ने उन्हें प्राणदान दे दिया। कहते हैं कि वे कबूतर आज भी अमर हैं और शिव की कृपा से सदैव अमर रहेंगे। कई श्रद्धालुओं ने उन्हें देखने का भी दावा किया है।* *कितनी पुरानी है गुफा*..... *श्रीनगर से करीब 141 किमी की दूरी पर स्थित अमरनाथ गुफा हजारों वर्ष पुरानी है। ऐतिहासिक प्रमाण बताते हैं कि यह महाभारत काल से भी ज्यादा प्राचीन है। यह प्राकृतिक गुफा है और इसमें स्वतः बर्फ का शिवलिंग बनता है जो विश्व में अपनी तरह का अनूठा शिवलिंग है।* *यहां आसपास के इलाके में बर्फ गिरती है लेकिन वह भुरभरी होती है जबकि निर्धारित स्थान पर हर साल बनने वाला शिवलिंग बिल्कुल ठोस बर्फ से बनता है। कश्मीर में बहुत प्राचीन काल से ही इस शिवलिंग के प्रति लोगों में गहरी श्रद्धा रही है। कल्हण के ग्रंथ राजतरंगिनी द्वितीय में इसका वर्णन किया गया है। इसके अलावा यहां के राजा भी शिवजी के भक्त रहे हैं।*

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Neha Sharma Sep 16, 2019

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