Neeru Miglani May 31, 2020

*कर्मो की दौलत* ✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡ एक राजा था जिसने अपने राज्य में क्रूरता से बहुत सी दौलत इकट्ठा करके(एकतरह शाही खजाना)आबादी से बाहर जंगल में एक सुनसान स्थान पर बनाए तहखाने मे सारे खजाने को खुफिया तौर पर छुपा दिया था। खजाने की सिर्फ दो चाबियां थीं। एक चाबी राजा के पास और एक उसके एक खास मंत्री के पास थी। इन दोनों के अलावा किसी को भी उस खुफिया खजाने का राज मालूम ना था। एक रोज़ किसी को बताए बगैर राजा अकेले अपने खजाने को देखने निकला। तहखाने का दरवाजा खोल कर अंदर दाखिल हो गया और अपने खजाने को देख-देख कर खुश हो रहा था और खजाने की चमक से सुकून पा रहा था। उसी वक्त मंत्री भी उस इलाके से निकला और उसने देखा कि खजाने का दरवाजा खुला है वो हैरान हो गया और ख्याल किया कि कहीं कल रात जब मैं खजाना देखने आया तब शायद खजाने का दरवाजा खुला रह गया होगा। उसने जल्दी-जल्दी खजाने का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया और वहां से चला गया। उधर खजाने को निहारने के बाद राजा जब संतुष्ट हुआ और दरवाजे के पास आया तो ये क्या! दरवाजा तो बाहर से बंद हो गया था। उसने जोर-जोर से दरवाजा पीटना शुरू किया पर वहां उनकी आवाज सुनने वाला उस जंगल में कोई ना था। राजा चिल्लाता रहा पर अफसोस कोई ना आया। वो थक हार कर खजाने को देखता रहा। अब राजा भूख और पानी की प्यास से बेहाल हो रहा था। पागलों सा हो गया। वो रेंगता-रेंगता हीरो के संदूक के पास गया और बोला, ए दुनिया के नायाब हीरो मुझे एक गिलास पानी दे दो फिर मोती सोने चांदी के पास गया और बोला, ए मोती चांदी सोने के खजाने! मुझे एक वक़्त का खाना दे दो। राजा को ऐसा लगा कग हीरे मोती उसे बोल रहे हों कि तेरे सारी ज़िन्दगी की कमाई तुझे एक गिलास पानी और एक समय का खाना नही दे सकती। राजा भूख से बेहोश हो कर गिर गया। जब राजा को होश आया तो सारे मोती हीरे बिखेर कर दीवार के पास अपना बिस्तर बनाया और उस पर लेट गया। वो दुनिया को एक संदेश देना चाहता था लेकिन उसके पास कागज़ और कलम नही था। राजा ने पत्थर से अपनी उंगली फोड़ी और बहते हुए खून से दीवार पर कुछ लिख दिया। उधर मंत्री और पूरी सेना लापता राजा को ढूंढते रहे पर बहुत दिनों तक राजा ना मिला तो मंत्री राजा के खजाने को देखने आया। उसने देखा कि राजा हीरे जवाहरात के बिस्तर पर मरा पड़ा है और उसकी लाश को कीड़े मकौड़े खा रहे थे। राजा ने दीवार पर खून से लिखा हुआ था - ये सारी दौलत एक घूंट पानी ओर एक निवाला नही दे सकी। *यही अंतिम सत्य है - अंतिम समय आपके साथ आपके कर्मो की दौलत जाएगी। चाहे आप कितनी बेईमानी से हीरे, पैसा, सोना-चांदी इकट्ठा कर लो, सब यही रह जाएगा इसीलिए जो जीवन आपको प्रभु ने उपहार स्वरूप दिया है उसमें अच्छे कर्म, लोगों की भलाई के काम कीजिए बिना किसी स्वार्थ के और अर्जित कीजिए। अच्छे कर्मो की अनमोल दौलत जो आपके सदैव काम आएगी।* 💠💠💠💠💠💠💠💠💠💠💠💠💠💠💠 🌷जय श्री राधे राधे। 🙏🙏

+84 प्रतिक्रिया 10 कॉमेंट्स • 28 शेयर
Neeru Miglani May 14, 2020

*🔹🔹🦜अंतर्यात्रा !🦜🔹🔹* _🌸जापान में एक झेन फकीर को कुछ मित्रों ने भोजन पर बुलाया था। सातवीं मंजिल के मकान पर भोजन कर रहे हैं, अचानक भूकंप आ गया। सारा मकान कांपने लगा। भागे लोग। कोई पच्चीस-तीस मित्र थे। सीढ़ियों पर भीड़ हो गयी। जो मेजबान था वह भी भागा । लेकिन भीड़ के कारण अटक गया दरवाजे पर। तभी उसे ख्याल आया कि मेहमान का क्या हुआ ? लौटकर देखा, वह झेन फकीर आंख बंद किये अपनी जगह पर बैठा है_ _🌸जैसे कुछ हो ही नहीं रहा! मकान कंप रहा है, अब गिरा तब गिरा। लेकिन उस फकीर का उस शांत मुद्रा में बैठा होना, कुछ ऐसा उसके मन को आकर्षित किया, कि उसने कहा,अब जो कुछ उस फकीर का होगा वही मेरा होगा। रुक गया। कंपता था, घबड़ाता था, लेकिन रुक गया। भूकंप आया, गया। कोई भूकंप सदा तो रहते नहीं। फकीर ने आंख खोली, जहां से बात टूट गयी थी भूकंप के आने से, वहीं से बात शुरू की। लेकिन मेजबान ने कहा : मुझे क्षमा करें, मुझे अब याद ही नहीं कि हम क्या बात करते थे। बीच में इतनी बड़ी घटना घट गयी है कि सब अस्तव्यस्त हो गया। अब तो मुझे एक नया प्रश्न पूछना है। हम सब भागे, आप क्यों नहीं भागे?_ _🌸उस फकीर ने कहा : तुम गलत कहते हो। तुम भागे, मैं भी भागा। तुम बाहर की तरफ भागे, मैं भीतर की तरफ भागा। तुम्हारा भागना दिखाई पड़ता है, क्योंकि तुम बाहर की तरफ भागे। मेरा भागना दिखाई नहीं पड़ा तुम्हें लेकिन अगर गौर से तुमने मेरा चेहरा देखा था, तो तुम समझ गये होओगे कि मैं भी भाग गया था। मैं भी यहां था नहीं, मैं अपने भीतर था। और मैं तुमसे कहता हूं के मैं ही ठीक भागा।, तुम गलत भागे। यहां भी भूकंप था और जहां तुम भाग रहे थे वहां भी भूकंप था। बाहर भागोगे तो भूकंप ही भूकंप है। मैं ऐसी जगह अपने भीतर भागा। जहां कोई भूकंप कभी नहीं पहुंचता है। मैं वहां निश्चित था। मैं बैठ गया अपने भीतर जाकर।_ _*🐾अब बाहर जो होना हो हो। मैं अपने अमृत -गृह मैं बैठ गया, जहां मृत्यु घटती ही नहीं। मैं उस निष्कंप दशा में पहुंच गया, जहां भूकंपों की कोई बिसात नहीं। अगर तुम्हें बाहर का जोखिम दिखाई पड़ जाये तो तुम्हारे जीवन में अंतर्यात्रा शुरू हो सकती है।*_ _*🐾संसार में जीने के दो तरीके हैं । एक - भौतिक वस्तुओं का सुख भोगते हुए जीना। दूसरा तरीका है -अध्यात्मिक सुख भोगते हुए जीना। ' जो व्यक्ति आंख नाक कान इत्यादि इंद्रियों से रूप गंध शब्द आदि विषयों का सुख लेता है , तो इसका अर्थ है कि वह भौतिक सुख भोग रहा है।*_ _*🐾जो व्यक्ति सेवा परोपकार दान दया यज्ञ ईश्वरोपासना स्वाध्याय सत्संग वैदिक शास्त्रों का अध्ययन इत्यादि शुभ कर्म करके जीवन जीता है , उसे अंदर से ईश्वर सुख देता है । वह अध्यात्मिक सुख भोग रहा है ।*_ *🔹🔹✨जय श्री कृष्ण ✨🔹🔹*

+93 प्रतिक्रिया 18 कॉमेंट्स • 40 शेयर
Neeru Miglani May 12, 2020

*जैसा भाव तैसा फल.......!! ************************************** तुलसीदास जी जब “रामचरितमानस” लिख रहे थे, तो उन्होंने एक चौपाई लिखी: 💝सिय राम मय सब जग जानी, करहु प्रणाम जोरी जुग पानी ।।💝 अर्थात – पूरे संसार में श्री राम का निवास है, सबमें भगवान हैं और हमें उनको हाथ जोड़कर प्रणाम कर लेना चाहिए। चौपाई लिखने के बाद तुलसीदास जी विश्राम करने अपने घर की ओर चल दिए। रास्ते में जाते हुए उन्हें एक लड़का मिला और बोला – अरे महात्मा जी, इस रास्ते से मत जाइये आगे एक बैल गुस्से में लोगों को मारता हुआ घूम रहा है। और आपने तो लाल वस्त्र भी पहन रखे हैं तो आप इस रास्ते से बिल्कुल मत जाइये। तुलसीदास जी ने सोचा – ये कल का बालक मुझे चला रहा है। मुझे पता है – सबमें राम का वास है। मैं उस बैल के हाथ जोड़ लूँगा और शान्ति से चला जाऊंगा। लेकिन तुलसीदास जी जैसे ही आगे बढे तभी बिगड़े बैल ने उन्हें जोरदार टक्कर मारी और वो बुरी तरह गिर पड़े। अब तुलसीदास जी घर जाने की बजाय सीधे उस जगह पहुंचे जहाँ वो रामचरित मानस लिख रहे थे। और उस चौपाई को फाड़ने लगे, तभी वहां हनुमान जी प्रकट हुए और बोले – श्रीमान ये आप क्या कर रहे हैं? तुलसीदास जी उस समय बहुत गुस्से में थे, वो बोले – ये चौपाई बिल्कुल गलत है। ऐसा कहते हुए उन्होंने हनुमान जी को सारी बात बताई। हनुमान जी मुस्कुराकर तुलसीदास जी से बोले – श्रीमान, ये चौपाई तो शत प्रतिशत सही है। आपने उस बैल में तो श्री राम को देखा लेकिन उस बच्चे में राम को नहीं देखा जो आपको बचाने आये थे। भगवान तो बालक के रूप में आपके पास पहले ही आये थे लेकिन आपने देखा ही नहीं। ऐसा सुनते ही तुलसीदास जी ने हनुमान जी को गले से लगा लिया || *गंगा बड़ी, न गोदावरी, न तीर्थ बड़े प्रयाग। सकल तीर्थ का पुण्य वहीं, जहाँ हदय राम का वास।। !!🚩 बोल सियापति रामचन्द्र की जय 🚩!!

+210 प्रतिक्रिया 30 कॉमेंट्स • 218 शेयर
Neeru Miglani May 6, 2020

केशवधृत नरहरि रूप श्रीनृसिंहजी के प्रागट्योत्सव “नृसिंह चतुर्दशी”की सभी वैष्णववृदं को मंगल बधाई……🙇🙇 *🌺“नृसिंह चतुर्दशी”🌺* *दिन में मरूँ नाय मैं,मरूँ ना प्रभु रात में,* *देऔ वरदान ऐसौ आपकौ सहारौ है।* *मानव न मारै मोय मार सकै दानव हू,* *ऐसौ अभिमान कर दुष्ट नै उचारौ है।* *घोर अत्याचार जब किए हिरणकश्यप नै,* *आर्तनाद कर प्रहलाद नै पुकारौ है।* *प्रकट भये हैं खम्भ फारिकै नृसिंह देव,* *देहरी पै डार ताकौ पेट फार डारौ है।* नृसिंह चतुर्दशी के दिन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण ने अर्ध सिंह, अर्ध मनुष्य के रूप में अवतार लिया था। *नृसिंह अवतार हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु के दस अवतारों में से चतुर्थ अवतार हैं* जो वैशाख में शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को अवतरित हुए। पृथ्वी के उद्धार के समय भगवान ने वाराह अवतार धारण करके हिरण्याक्ष का वध किया। उसका बड़ा भाई हिरण्यकशिपु बड़ा रुष्ट हुआ। उसने अजेय होने का संकल्प किया। सहस्त्रों वर्ष बिना जल के वह सर्वथा स्थिर तप करता रहा। ब्रह्मा जी सन्तुष्ट हुए। दैत्य को वरदान मिला। उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। लोकपालों को मार भगा दिया। स्वत सम्पूर्ण लोकों का अधिपति हो गया। देवता निरूपाय थे। असुर को किसी प्रकार वे पराजित नहीं कर सकते थे। हिरण्यकशिपु के चार पुत्र थें । एक दिन सहज ही अपने चारों पुत्रों में सबसे छोटे प्रह्लाद से पूछा -बेटा, तुझे क्या अच्छा लगता है ? प्रह्लाद ने कहा - इन मिथ्या भोगों को छोड़कर वन में श्री हरि का भजन करना ये सुनकर हिरण्यकशिपु बहुत क्रोधित हो गया , उसने कहा - इसे मार डालो। यह मेरे शत्रु का पक्षपाती है। असुरों ने आघात किया। भल्ल-फलक मुड़ गये, खडग टूट गया, त्रिशूल टेढ़े हो गये पर वह कोमल शिशु अक्षत रहा। दैत्य चौंका। प्रह्लाद को विष दिया गया पर वह जैसे अमृत हो। सर्प छोड़े गये उनके पास और वे फण उठाकर झूमने लगे। मत्त गजराज ने उठाकर उन्हें मस्तक पर रख लिया। पर्वत से नीचे फेंकने पर वे ऐसे उठ खड़े हुए, जैसे शय्या से उठे हों। समुद्र में पाषाण बाँधकर डुबाने पर दो क्षण पश्चात ऊपर आ गये। घोर चिता में उनको लपटें शीतल प्रतीत हुई। गुरु पुत्रों ने मन्त्रबल से कृत्या (राक्षसी) उन्हें मारने के लिये उत्पन्न की तो वह गुरु पुत्रों को ही प्राणहीन कर गयी। प्रह्लाद ने प्रभु की प्रार्थना करके उन्हें जीवित किया। अन्त में हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को बाँध दिया और स्वयं खड्ग उठाया। और कहा - तू किस के बल से मेरे अनादर पर तुला है , कहाँ है वह ? प्रह्लाद ने कहा - सर्वत्र? इस स्तम्भ में भी . प्रह्लाद के वाक्य के साथ दैत्य ने खंभे पर घूसा मारा। वह और समस्त लोक चौंक गये। स्तम्भ से बड़ी भयंकर गर्जना का शब्द हुआ। एक ही क्षण पश्चात दैत्य ने देखा- समस्त शरीर मनुष्य का और मुख सिंह का, बड़े-बड़े नख एवं दाँत, प्रज्वलित नेत्र, स्वर्णिम सटाएँ, बड़ी भीषण आकृति खंभे से प्रकट हुई। दैत्य के अनुचर झपटे और मारे गये अथवा भाग गये। हिरण्यकशिपु को भगवान नृसिंह ने पकड़ लिया। मुझे ब्रह्माजी ने वरदान दिया है! छटपटाते हुए दैत्य चिल्लाया। दिन में या रात में न मरूँगा, कोई देव, दैत्य, मानव, पशु मुझे न मार सकेगा। भवन में या बाहर मेरी मृत्यु न होगी। समस्त शस्त्र मुझ पर व्यर्थ सिद्ध होंगे। भुमि, जल, गगन-सर्वत्र मैं अवध्य हूँ। नृसिंह बोले- देख यह सन्ध्या काल है। मुझे देख कि मैं कौन हूँ। यह द्वार की देहली, ये मेरे नख और यह मेरी जंघा पर पड़ा तू। अट्टहास करके भगवान ने नखों से उसके वक्ष को विदीर्ण कर डाला। वह उग्ररूप देखकर देवता डर गये, ब्रह्मा जी अवसन्न हो गये, महालक्ष्मी दूर से लौट आयीं, पर प्रह्लाद-वे तो प्रभु के वर प्राप्त पुत्र थे। उन्होंने स्तुति की। भगवान नृसिंह ने गोद में उठा कर उन्हें बैठा लिया और स्नेह करने लगे. नरसिंह भगवान और प्रह्लाद के बीच ज्ञान की बात!!!!!!! भगवान नरसिंह ने हिरण्यकशिपु को मारा, लेकिन उसके उपरांत भी भगवान क्रोध में थे। अब हिरण्यकशिपु का वध करने के बाद सब देवता लोग आ गए, ब्रह्मा, शंकर भी आये। तब नारद मुनि सब ने कहा कि "भाई भगवान नरसिंह अवतार लिए है उनकी स्तुति करे, अभिनंदन करें, उनका धन्यवाद करना चाहिए, उन्होंने इतना बड़ा काम किया, इस लिए आप सब जाये उनके पास। " देवताओं ने पहले ही मना कर दिया। देवताओं ने कहा कि "अभी तो भगवान नरसिंह बड़े क्रोध में है, हमसे उनका यह स्वरूप देखा नहीं जा रहा है। हम सब देवता उनके इस स्वरूप से भयभीत है। अतएव हम नहीं जाएगे।" तो कौन जाएगा? यह प्रश्न हुआ। तो सबने शंकर जी को कहा की महाराज आप जाइये, आप तो प्रलय करने वाले है। तब शंकर जी ने कहा "नहीं-नहीं मेरी हिम्मत नहीं है, मैं नहीं जा सकता" तब ब्रह्मा से कहा गया, "आप तो सृष्टि करता है, आपकी दुनिया हैं, आपके लिए ही तो आए हैं।" ब्रह्मा जी कहते हैं "वह सब तो ठीक है। लेकिन मैं तो नहीं जाऊंगा।" तो फिर सब ने परामर्श किया की अब लक्ष्मी जी को बुलाया जाए और उनको बोला जाए। क्योंकि नरसिंह भगवान विष्णु जी के अवतार है और विष्णु जी की अर्धांगिनी लक्ष्मी जी है, इनको देख करके हो सकता है नरसिंह भगवान का क्रोध उतर जाए, जो विराट रूप इनका है वह विराट रूप शांत हो जाएगा और मुस्कुराहट वाला रूप आ जाएगा। इसलिए लक्ष्मी जी से कहा गया जानेको। तो लक्ष्मी जी ने कहा "मैं इस समय कोई अर्धांगिनी नहीं बनना चाहती हूँ। मैं अभी आप लोगों की बात नहीं मान सकती। मेरी हिम्मत नहीं है जाने की। नरसिंह भगवान का वह स्वरूप देखा नहीं जा रहा मुझसे, वो अनंत कोटि सूर्य के समान प्रकाश है व क्रोध भी है।" फिर सब लोग हार गए कोई भी तैयार नहीं हुआ जानेको। तब नारद जी ने तरकीब (सुझाव) दिया और उन्होंने कहा कि "देखो भाई! यह घपड़-सपड़ करना ठीक नहीं है। बड़ी बदनामी की बात है की मृत्यु लोक में इतना बड़ा काम किया भगवान ने और कोई उनकी स्तुति ना करे! अभिनंदन ना करें। " इसलिए नारद जी ने कहा कि "प्रह्लाद को भेजो!" प्रह्लाद के पास सब लोग गए और कहा कि "बेटा तुम्हारे पिता को मार कर के नरसिंह भगवान खड़े हैं। उनके पास जाओ ना!" प्रह्लाद जी को डर नहीं लगा, वो आराम से लेफ्ट राइट करते हुए पहुंच गए नरसिंह भगवान के पास। उस वक्त प्रह्लाद जी ५-६ वर्ष के थे ही। जब वह गए नरसिंह भगवान के पास तो भगवान का जो विराट स्वरूप, आंतों की माला पहने हुए, खून से लतपत नाख़ून था। तो प्रह्लाद को देख कर मुस्कुराने लगे। फिर समस्त देवी-देवता, ब्रह्मा, शंकर आदि नरसिंह भगवान के पास जाकर उनकी स्तुति व अभिनंदन करने लगे। तब नरसिंह भगवान ने प्रह्लाद से कहा,भागवत ७.९.५२ "वरं वृणीष्वाभिमतं कामपूरोऽस्म्यहं नृणाम्" भावार्थ - बेटा वर मांगों। जो कुछ मांगोंगे वह सब मैं देने को तैयार हूँ। सब मांगते हैं तुम भी मांगों बेटा। तब प्रह्लाद ने मन ही मन कहा अच्छा! बेवकूफ बनाना शुरु हो गया, कहते हैं वर मांगो! तब प्रह्लाद ने कहा भागवत ७.१०.४ "यस्त आशिष आशास्ते न स भृत्यः स वै वणिक्" भावार्थ - हे प्रभु! जो दास कुछ भी कामना लेकर जाता है स्वामी के पास। तो वह दास नहीं है, वह तो बनिया (व्यापारी) है। ऐसा व्यापार तो हमारे संसार में रोज होता है। हमने ₹10 दिया तो उसने ₹10 की मिठाई दे दिया। यह तो व्यापार है। दास तो केवल दासता करता है। यदि दास्यसि मे कामान्वरांस्त्वं वरदर्षभ। कामानां हृद्यसंरोहं भवतस्तु वृणे वरम्॥ भावार्थ - प्रह्लाद जी कहते हैं कि अगर प्रभु आप देना ही चाहते हैं और अगर आपकी आज्ञा है कि मेरी आज्ञा है मानना ही पड़ेगा। तो ऐसा कोई आपका आदेश हो, तो प्रभु! यह वर दीजिए कि मैं आपसे कुछ न मांगू, ऐसा मेरा अंतःकरण कर दीजिए की कभी मांगने की बुद्धि पैदा ही ना हो, वर्तमान में तो नहीं है प्रभु! लेकिन आगे भी ना हो ऐसा वर दे दीजिए। क्योंकि मैं तो अकाम हूँ। मैं तो सेवा चाहता हुँ। मैं कुछ मांगने नहीं आया हुँ और वास्तविकता यह है कि आपको भी हमसे कुछ नहीं चाहिए। फिर आप मुझसे क्यों कहते हैं कि वर मांग? भागवत ७.१०.८ इन्द्रियाणि मनः प्राण आत्मा धर्मो धृतिर्मतिः। ह्रीः श्रीस्तेजः स्मृतिः सत्यं यस्य नश्यन्ति जन्मना॥ भावार्थ - प्रभु! यह कामना ऐसी बुरी चीज है की अगर कामना पैदा हो गई, तो इंद्रियां, मन, प्राण, आत्मा, धर्म, धैर्य, लज्जा, श्री, तेज, सत्य, सब नष्ट हो जाते हैं। यह कामना की बीमारी मुझको नहीं है इसलिए आप देना ही चाहते है तो मुझे ऐसा वर दीजिए कि कामना कभी पैदा ही ना हो। नरसिंह भगवान मुस्कुराने लगे उन्होंने कहा कि ठीक है, जैसा तू कहता है वैसा ही होगा। अब मेरी आज्ञा सुन,,,,भागवत ७.१०.११ "तथापि मन्वन्तरमेतदत्र दैत्येश्वराणामनुभुङ्क्ष्व भोगान्" भावार्थ - एक मन्वन्तर राज्य करो। (४३२०००० मानव वर्ष का चार युग, ७१ बार चार युग बीत जाये तो १ मन्वन्तर होता है जो ३०६७२०००० मानव वर्ष के बराबर है।) लगभग ३० करोड़ वर्ष तक राज्य करो, यह आज्ञा नरसिंह भगवान ने प्रह्लाद को दिया। ऐसा कह कर भगवान अंतर्ध्यान हो गए और सब लोगों ने कहा कि बोलिए नरसिंह भगवान की जय। *यह व्रत माधो प्रथम लियो,* *जो मेरे भक्तन सो बैर करत है,* *तीनको नखन फाडु हियो...।* *जो भक्तन सों बैर करत है, परमेश्वर सों बैर करे* *जो जीव प्रभु के प्रिय भक्तो का द्वेष , निंदा, ईर्षा या फीर बैर करता है वह जीव प्रभु को अप्रिय है !!* *जय जय श्रीनृसिंह हरि।* *जय जगदीश भक्त भय मोचन,* *खंम फारि प्रकटे करूणा करि।।१।।* *हिरण्यकशिपुने कों नखन बिदायों,* *तिलक दियो प्रल्हाद अभय शिर।* *परमानंद दासको ठाकुर,* *नाम लेत सब पाप जात जर।।२।।* *केशवधृत नरहरि रूप श्रीनृसिंहजी के प्रागट्योत्सव *“नृसिंह चतुर्दशी”* *की सभी वैष्णववृदं को बधाई……* ✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡ 🙏||जय श्री विष्णु हरि ||🙏

+91 प्रतिक्रिया 8 कॉमेंट्स • 8 शेयर
Neeru Miglani May 5, 2020

राधे- राधे - आज का भगवद चिन्तन 🛕 पुरुषार्थ को इसलिए मानो कि ताकि तुम केवल भाग्य के भरोसे बैठकर अकर्मण्य बनकर जीवन प्रगति का अवसर न खो बैठें और भाग्य को इसलिए मानो ताकि पुरुषार्थ करने के बावजूद भी मनोवांछित फल की प्राप्ति न होने पर भी आप उद्धिग्नता से ऊपर उठकर संतोष में जी सकें। 🛕 जो लोग केवल पुरुषार्थ पर विश्वास रखते हैं प्रायः उनमे परिणाम के प्रति असंतोष सा बना रहता है और जो लोग केवल भाग्य पर विश्वास रखते हैं उनके अकर्मण्य होने की सम्भावना भी बनी रहती है। 🛕 अतः केवल एक को आधार बनाकर जिया गया जीवन अपनी वास्तविकता और सहजता खो बैठता है। सत्य तो यही है कि पुरुषार्थ ही भाग्य का निर्माण करता है और भाग्य पुरुषार्थ के अवसरों को जन्म देता है।🙏🙏 ✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡ 🙇||जय श्री कृष्णा ||🙇

+79 प्रतिक्रिया 5 कॉमेंट्स • 29 शेयर
Neeru Miglani May 4, 2020

*आज का भगवद् चिंतन*🙏🙇 ✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡✡ *मेरी दुकान, मेरा फार्महाउस, मेरा बंगला, मेरी फैक्ट्री, मेरी मिल, मेरी गाड़ी, मेरा प्लाट, मेरा अपार्टमेंट, मेरी जायदाद, ये मेरा, ओ भी मेरा... *मेरा ,मेरा और मेरा सब कुछ देखते-देखते ही लावारिस सा हो गया | आज चाह कर भी कोई अपनी इन चीजों को देखने भी नही जा सकता है, ना ही जाना चाहता है ! उस... *कोरोना का डर जो है | आज अचानक जिन्दगी अनमोल हो गई है ! सुना तो था कि आदमी मरने के बाद सब कुछ यहीं छोड़ कर जाता है| पर यहाँ तो *जीते जी ही छूट* गया है। *इंसान की औकात एक कीटाणु से लड़ने की नहीं* *फिर इतना घमंड किस बात का करता है तू...??* 📿📿📿 केवल हरिनाम ही एकमात्र साधन है। आओ इस समय के सदुपयोग कर ज्यादा से ज्यादा भगवन्नाम का जप करें। 💠💠💠💠💠💠💠💠💠💠💠💠💠💠 *हरे कृष्ण हरे कृष्ण ,कृष्ण कृष्ण हरे हरे | *हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे |

+104 प्रतिक्रिया 13 कॉमेंट्स • 9 शेयर
Neeru Miglani May 3, 2020

+85 प्रतिक्रिया 10 कॉमेंट्स • 25 शेयर
Neeru Miglani Apr 14, 2020

*🌹🌹 जय श्री श्याम 🌹🌹* राधे - राधे -आज का भगवद् चिंतन :-- 🏚काकभुशुंडि जी गरूड़ जी को समझाते हुए कहते हैं, कि हे गरूड़ जी जगत के अन्य समस्त साधन भी उस फल को प्राप्त नहीं करा पाते जिस फल को प्रभु की भक्ति प्रदान करा देती है। राम भगति मनि उर बस जाकें। दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें ।। 🏚प्रभु की भक्ति ही वो रामबाण महौषधि है, जो हमारी उस दृष्टि को बदल देती है, जो हमें अभाव तो अभाव, प्रभाव में भी दुखी कर देती है। दुखों का जो मुख्य कारण है वो है हमारि अतृप्ति, हमारी नित नवीन आकांक्षाएं अथवा तो हमारी अनगिन इच्छाएं। और हृदय में भक्ति प्रकट होने पर- खल कामादि निकट नहिं जाहीं। बसइ भगति जाके उर माहीं।। 🏚केवल काम ही नहीं अपितु काम के जो भी सहायक हैं अथवा तो जो - जो हमारे आंतरिक विकार हैं, काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और अहंकार, भक्ति उन सभी को निर्मूल करके जीवन को एक नवीन दृष्टि प्रदान करती है, जो हमें अभाव में भी आनंद प्रदान करती है। निज अनुभव अब कहउँ खगेसा । बिनु हरि भजन न जाहिं कलेसा ।। 🏚भजन के बिना अथवा तो प्रभु भक्ति के बिना जीवन में क्लेशों का अंत नहीं हो सकता। अभाव में भी मुस्कुराने की कला सीखनी है, तो भक्ति की शरण लेनी ही पड़ेगी। 💢💢💢💢💢💢💢💢💢💢💢💢💢💢💢💢 🙏||जय श्री कृष्णा ||🙏

+200 प्रतिक्रिया 40 कॉमेंट्स • 200 शेयर