Neeru Miglani Sep 22, 2019

➿➿➿➿➿➿➿➿➿ *दान की महत्वत्ता....* **********{}{}{}************ एक निर्धन व्यक्ति था, वह सरसो के तेल का एक दीपक जलाकर नित्य गली में रख देता था, क्योंकि गली अँधेरी थी इसलिए वहाँ से गुजरने वाले राहगीरों को ईसका बहुत लाभ मिलता था । निकट रहने वाला एक धनवान व्यक्ति प्रतिदिन भगवान के मंदिर में एक घी का दीपक जलाया करता था, मृत्यु होने पर जब दोनो यमलोक पहुँचे तो धनपति को निम्न श्रेणी और निर्धन को उच्च श्रेणी की सुविधा प्रदान की गयी, धनपति को यमराज का यह न्याय ठीक नहीं लगा और उन्होंने यमराज से इस संदर्भ में प्रश्न किया तो यमराज बोले- *"पुण्य की महत्ता धन से नहीं कार्य के उपयोगिता सन्निहित भावना के आधार पर होती है,* मंदिर तो पहले से ही प्रकाशित था, और उस व्यक्ति ने ऐसे स्थान पर प्रकाश फैलाया, जिससे हजारों अभावग्रस्त (जरूरतमंदों) तक प्रकाश पहुँचा, इसी कारण से वह ज्यादा पुण्य का अधिकारी बना । दान ऐसे व्यक्ति को दो जो उसे उपयोगी साबित हो, और दान स्वीकाराने वाला भी हृदयसे खुश होकर स्वीकार करें, बिन उपयोगी और अनमन से दिया या लिया सब व्यर्थ है । ➿➿➿➿➿➿➿➿➿ 🙏💖जय श्री कृष्णा 💖🙏 ⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉⛳🕉

+245 प्रतिक्रिया 29 कॉमेंट्स • 131 शेयर
Neeru Miglani Sep 19, 2019

🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸 स्नान कब और कैसे करें घर की समृद्धि बढ़ाना हमारे हाथ में है.......!! सुबह के स्नान को धर्म शास्त्र में चार उपनाम दिए हैं। ➿➿➿➿➿➿➿➿➿➿➿ *1* *मुनि स्नान।* जो सुबह 4 से 5 के बीच किया जाता है। *2* *देव स्नान।* जो सुबह 5 से 6 के बीच किया जाता है। *3* *मानव स्नान।* जो सुबह 6 से 8 के बीच किया जाता है। *4* *राक्षसी स्नान।* जो सुबह 8 के बाद किया जाता है। 🔵🔴🔵🔴🔵🔴🔵🔴🔵🔴🔵 ▶मुनि स्नान सर्वोत्तम है। ▶देव स्नान उत्तम है। ▶मानव स्नान सामान्य है। ▶राक्षसी स्नान धर्म में निषेध है। 🔶🔷🔶🔷🔶🔷🔶🔷🔶🔷🔶 *मुनि स्नान .......* 👉🏻घर में सुख ,शांति ,समृद्धि, विद्या , बल , आरोग्य , चेतना , प्रदान करता है। *देव स्नान ......* 👉🏻 आप के जीवन में यश , कीर्ती , धन, वैभव, सुख ,शान्ति, संतोष , प्रदान करता है। *मानव स्नान.....* 👉🏻काम में सफलता ,भाग्य, अच्छे कर्मों की सूझ, परिवार में एकता, मंगलमय , प्रदान करता है। *राक्षसी स्नान.....* 👉🏻 दरिद्रता , हानि , क्लेश ,धन हानि, परेशानी, प्रदान करता है । किसी भी मनुष्य को 8 के बाद स्नान नहीं करना चाहिए। . पुराने जमाने में इसी लिए सभी सूरज निकलने से पहले स्नान कर लेते थे। ⛳||ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नम: ||⛳

+360 प्रतिक्रिया 80 कॉमेंट्स • 275 शेयर
Neeru Miglani Sep 17, 2019

राधे राधे ॥ आज का भगवद चिन्तन ॥ यूँ तो अधिकांश लोग जिन्दगी से शिकायत किया करते हैं। मगर बहुत थोड़े ही लोग हुआ करते हैं जो शिकायतों में भी हँसकर जिया करते हैं। जिन्दगी से हमारी शिकायतों का कारण अभाव नहीं अपितु हमारा स्वभाव है। हम सिर्फ खोने का दुःख मनाना जानते हैं पाने की ख़ुशी नही। ख़ुशी के लिए काम करोगे तो ख़ुशी ही मिले यह निश्चित नहीं मगर खुश होकर काम करोगे तो ख़ुशी अवश्य मिलेगी। जिन्दगी से शिकायत करने की अपेक्षा जो प्राप्त है, उसका आनंद लेना सीखो। यही जीवन की वास्तविक उपलब्धि है। तकदीर के लिखे पर कभी शिकवा न कर , तू अभी इतना समझदार नहीं कि ईश्वर के इरादे समझ सके। 🙏🌹||जय श्री कृष्णा||🌹🙏

+264 प्रतिक्रिया 36 कॉमेंट्स • 145 शेयर
Neeru Miglani Sep 11, 2019

🔸️🔹️🔸️🔹️🔸️🔹️🔸️🔹️🔸️🔹️ *सबसे बड़ा गरीब......!! ***********■《》■*********** एक महात्मा भ्रमण करते हुए नगर में से जा रहे थे। मार्ग में उन्हें एक रुपया मिला। महात्मा तो विरक्त और संतोषी व्यक्ति थे। वे भला उसका क्या करते? अतः उन्होंने किसी दरिद्र को यह रुपया देने का विचार किया। कई दिन तक वे तलाश करते रहे, लेकिन उन्हें कोई दरिद्र नहीं मिला। एक दिन उन्होंने देखा कि एक राजा अपनी सेना सहित दूसरे राज्य पर चढ़ाई करने जा रहा है। साधु ने वह रुपया राजा के ऊपर फेंक दिया। इस पर राजा को नाराजगी भी हुई और आश्चर्य भी। क्योंकि, रुपया एक साधु ने फेंका था इसलिए उसने साधु से ऐसा करने का कारण पूछा। साधु ने धैर्य के साथ कहा- ‘राजन्! मैंने एक रुपया पाया, उसे किसी दरिद्र को देने का निश्चय किया। लेकिन मुझे तुम्हारे बराबर कोई दरिद्र व्यक्ति नहीं मिला, क्योंकि जो इतने बड़े राज्य का अधिपति होकर भी दूसरे राज्य पर चढ़ाई करने जा रहा हो और इसके लिए युद्ध में अपार संहार करने को उद्यत हो रहा हो, उससे ज्यादा दरिद्र कौन होगा?’ राजा का क्रोध शान्त हुआ और अपनी भूल पर पश्चात्ताप करते हुए उसने वापिस अपने देश को प्रस्थान किया। प्रेरणा ---- हमें सदैव संतोषी वृत्ति रखनी चाहिए। संतोषी व्यक्ति को अपने पास जो साधन होते हैं, वे ही पर्याप्त लगते हैं। उसे और अधिक की भूख नहीं सताती। ⛳॥जय श्री कृष्णा॥⛳

+264 प्रतिक्रिया 66 कॉमेंट्स • 156 शेयर
Neeru Miglani Sep 10, 2019

🔶️🔷️मर्यादा पुरुषोत्तम राम 🔷️🔶️ ●○●○●○‌‍ॐ○●○●○● एकटक देर तक उस सुपुरुष को निहारते रहने के बाद बुजुर्ग भीलनी के मुंह से बोल फूटे: "कहो राम! सबरी की डीह ढूंढ़ने में अधिक कष्ट तो नहीं हुआ?" राम मुस्कुराए: "यहां तो आना ही था मां, कष्ट का क्या मूल्य...?" *"जानते हो राम! तुम्हारी प्रतीक्षा तब से कर रही हूँ जब तुम जन्में भी नहीं थे।* यह भी नहीं जानती थी कि तुम कौन हो? कैसे दिखते हो? क्यों आओगे मेरे पास..? *बस इतना ज्ञात था कि कोई पुरुषोत्तम आएगा जो मेरी प्रतीक्षा का अंत करेगा..."* राम ने कहा: *"तभी तो मेरे जन्म के पूर्व ही तय हो चुका था कि राम को सबरी के आश्रम में जाना है।"* "एक बात बताऊँ प्रभु! *भक्ति के दो भाव होते हैं। पहला मर्कट भाव, और दूसरा मार्जार भाव। बन्दर का बच्चा अपनी पूरी शक्ति लगाकर अपनी माँ का पेट पकड़े रहता है ताकि गिरे न... उसे सबसे अधिक भरोसा माँ पर ही होता है और वह उसे पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। यही भक्ति का भी एक भाव है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर को पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। दिन रात उसकी आराधना करता है........* ".....पर मैंने यह भाव नहीं अपनाया। *मैं तो उस बिल्ली के बच्चे की भाँति थी जो अपनी माँ को पकड़ता ही नहीं, बल्कि निश्चिन्त बैठा रहता है कि माँ है न, वह स्वयं ही मेरी रक्षा करेगी, और माँ सचमुच उसे अपने मुँह में टांग कर घूमती है... मैं भी निश्चिन्त थी कि तुम आओगे ही, तुम्हे क्या पकड़ना...।"* राम मुस्कुरा कर रह गए। भीलनी ने पुनः कहा: "सोच रही हूँ बुराई में भी तनिक अच्छाई छिपी होती है न... कहाँ सुदूर उत्तर के तुम, कहाँ घोर दक्षिण में मैं। तुम प्रतिष्ठित रघुकुल के भविष्य, मैं वन की भीलनी... यदि रावण का अंत नहीं करना होता तो तुम कहाँ से आते?" राम गम्भीर हुए। कहा: *"भ्रम में न पड़ो मां! राम क्या रावण का वध करने आया है?* ......... *अरे रावण का वध तो लक्ष्मण अपने पैर से बाण चला कर कर सकता है।* ......... *राम हजारों कोस चल कर इस गहन वन में आया है तो केवल तुमसे मिलने आया है मां, ताकि हजारों वर्षों बाद जब कोई भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करे तो इतिहास चिल्ला कर उत्तर दे कि इस राष्ट्र को क्षत्रिय राम और उसकी भीलनी माँ ने मिल कर गढ़ा था।* ............ *जब कोई भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो काल उसका गला पकड़ कर कहे कि नहीं! यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ...... एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक दरिद्र वनवासिनी से भेंट करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करता है।* .......... *राम वन में बस इसलिए आया है ताकि जब युगों का इतिहास लिखा जाय तो उसमें अंकित हो कि सत्ता जब पैदल चल कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे तभी वह रामराज्य है।* ............ *राम वन में इसलिए आया है ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतीक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं। राम रावण को मारने भर के लिए नहीं आया मां...!"* सबरी एकटक राम को निहारती रहीं। राम ने फिर कहा: *"राम की वन यात्रा रावण युद्ध के लिए नहीं है माता! राम की यात्रा प्रारंभ हुई है भविष्य के लिए आदर्श की स्थापना के लिए।* ........... *राम निकला है ताकि विश्व को बता सके कि माँ की अवांछनीय इच्छओं को भी पूरा करना ही 'राम' होना है।* .............. *राम निकला है कि ताकि भारत को सीख दे सके कि किसी सीता के अपमान का दण्ड असभ्य रावण के पूरे साम्राज्य के विध्वंस से पूरा होता है।* .............. *राम आया है ताकि भारत को बता सके कि अन्याय का अंत करना ही धर्म है,* ............ *राम आया है ताकि युगों को सीख दे सके कि विदेश में बैठे शत्रु की समाप्ति के लिए आवश्यक है कि पहले देश में बैठी उसकी समर्थक सूर्पणखाओं की नाक काटी जाय, और खर-दूषणों का घमंड तोड़ा जाय।* ......और, .............. *राम आया है ताकि युगों को बता सके कि रावणों से युद्ध केवल राम की शक्ति से नहीं बल्कि वन में बैठी सबरी के आशीर्वाद से जीते जाते हैं।"* सबरी की आँखों में जल भर आया था। उसने बात बदलकर कहा: "बेर खाओगे राम? राम मुस्कुराए, "बिना खाये जाऊंगा भी नहीं मां..." सबरी अपनी कुटिया से झपोली में बेर ले कर आई और राम के समक्ष रख दिया। राम और लक्ष्मण खाने लगे तो कहा: "मीठे हैं न प्रभु?" *"यहाँ आ कर मीठे और खट्टे का भेद भूल गया हूँ मां! बस इतना समझ रहा हूँ कि यही अमृत है...।"* सबरी मुस्कुराईं, बोलीं: *"सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो, राम!"* 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 🚩||जय श्री राम ||🚩

+375 प्रतिक्रिया 78 कॉमेंट्स • 68 शेयर