आध्यात्मिक दर्शन। भारतीय सभ्यता5 सृष्टि संतुलन के लिए आदान प्रदान का नियम है। प्रकृति से हम कुछ स्वार्थ पूर्ति हेतु लेलेते हैं तो उसके बदले कुछ हमें देना चाहिए। विचारिए हंम इस प्राकृतिक वस्तुओं के बदलें में क्या है जो दे रहे हैं । हमारे वैदिक मंत्रों से हिंदू भाई हवन करते थे परन्तु आज वह निजस्वार्थि लोगों के कारण असंभव सा हो गया है। इस लिए शर्वशक्तिमानका मिल कर यजन करैं। प्रार्थना धाता : - सर्वोत्तम ऊर्जा के स्रोत आप ने ही सबको धारण कर रखा है। जैसे ।। भगवते वासुदेवाय।। भग+वते अर्थात योनि में योनि के समान बसने वाले देवता। हे सर्वशक्तिमान स्वमी जैसे आपने ८४ लाख योनियों को धारण कर रखा है वैसे ही आपके शकाश (ऊर्जा)के अंश मात्र ने अखिल ब्रह्माण्डों को धारण कर रखा है।हे नाथ आप का शकाश ही रैणु मेंं विद्यमान है। जिससे मानव ने अपने अंत का सामन परमाणुबम का अविष्कार किया है।वो अनजान हैं आप की सामर्थ्य से। आप चाहें तो वो स्वभाविक ही निष्क्रिय हो सकते हैं। हे अनन्त आपको जैसे यातुधान हिरण्याक्ष से बाराह रूप धारण करके इस धरा को बचाया था उसी प्रकार आज आपकी बसुन्धरा पर कोरोनावायरस रूप यातुधान का आक्रमण हो चुका है । जिससे पृथ्वी के श्रेष्ठ योद्धाओं के मन में विकार और महामोह (भ्रम) ने स्थान बना लिया है। हे नाथ आप इस महामारी और वैमनस्यता रूपी विषाणुओं का संग्हार किजिए जिससे आने वाली पीढ़ियां विकार रहित हो। हे परमपिता परमेश्वर संसार के समस्त प्राणी आप की शरण में हैं। हंम सब की रक्षा किजिए। हंम सब की रक्षा किजिए। रक्षा किजिए धन्यवाद जी शिवचरण परमार भुलवाना श्रीराधे जय श्री राधे राधे जी श्रीराम जय राम जय जय राम

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आध्यात्मिक दर्शन। भारतीय सभ्यता 4 आज सृष्टि को संतुलन की आवश्यकता है। इसलिए उस परब्रह्म की उपासना करैं। प्रार्थना नियन्ता : - हे परमपिता परमेश्वर आप का जो नियंता स्वरूप है।ये वसुंधरा पर बसने वाले समस्त जड़ जंगम और संसार में जितने भी जीव जंतु हैं।वो सभी आपकी शरण में हैं। हंम सब की रक्षा किजिए।हंम सब की रक्षा किजिए। रक्षा किजिए। क्योंकि जो आपका नियंता स्वरूप है उन्होने प्रत्येक अणु, परमाणु काभी जो सूक्ष्म रूप त्रिषरेणु है। उससे भी सूक्ष्म का नियंत्रण आपने अपने नियंत्रण में लेकर स्थित है।आप की यह धरा मानव के कुकृत्यौं से विकट झंझावातो से घीरी हुई है।हे नाथ आप प्राणीमात्र को इस संकट से उबारिए ।

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आध्यात्मिक दर्शन। विज्ञानीतथ्य समाज सभी जाति और धर्म से बनता है। हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, बहाई, यहुदी और जितने भी संसार में धर्म फल फूल रहे हैं। वैश्विक महामारी के समय में आपसी प्रेम से रह सकते हैं। और सभी एक जुट होकर कोरोनावायरस को परास्त कर सकते हैं। सभी धर्मावलंबि नासिका से श्वास लेते हैं। सभी आक्शिजन श्वास के द्वारा लेते हैं और कार्बन-डाई-ऑक्साइड विशर्जन ( छोड़ते) हैं। सनातनी संस्कृति वालों में एक विशेषता होती है कि ये अपने ईष्ट देवता ( भगवान) पर विश्वास करते हैं। और प्रकृति के स्वभाव ( नीयती) को मानते हैं। इस कारण से ये स्वभाविक ही दयावान और धार्मिक होते हैं। जिन्होंने अपने जीवन को भगवान के अर्पण कर दिया है।वे अपने सामने आई जिम्मेदारी को निर्विघ्न संपन्न करते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ऐसे मनुष्यों की स्वशन प्रक्रिया संतुलित होती है वहीं दूसरे मनुष्य जिनके अन्तकरण में भ्रम ओर द्वेश व्यापक हो जाता है वह लोग बेचैन रहते हैं।कारण कि उनके मन में बैठाया गया द्वेश उन्हें चैन से नहीं रहने देता उनके मन का द्वेश ना तो पूर्णरूपेन श्वास को लेने देता है और न ही कार्बन-डाई-ऑक्साइड को पूरी तरह से निकल ने देता है। जिससे ऐसा मनुष्य अशुंतलित रहता है। ऐसे मनुष्य अपने आप में ही उलझे रहते हैं उन्हें दुसरे जीवों पर दया करने का अवसर ही नहीं मिलता है। और वो अधर्मको ही अपना धर्म मान बैठते हैं।उनको जो जैसे कह देता है वैसे ही करते हैं। ऐं मनुष्यों तुम्हारे पास सोचने समझने ओर विचार करने की सामर्थ्य उस परवरदिगार ने रखी है।उसका ऐसे कठिन वक्त में कुछ तो उपयोग करो। अपने हित और अनहित को पशु पक्षी भी जानते हैं। ओर तू मनुष्य होकर भी अपने आप पर विश्वास नहीं करता है। अर्थात भाई अपने विवेक से जीना सीख जीससे तेरे साथ इस संसार के सभी जीव जंतु भी शकून से जी सकें अपने अविवेकपूर्ण कार्य से दूसरे प्राणियों को दुखी करना छोड़ दें इस में तेरी ओर तेरे साथ साथ सभी की भलाई है । धन्यवाद जी शिवचरण परमार भुलवाना श्रीराधे जय श्री राधे राधे जी श्रीराम जय राम जय जय राम जी

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आज १२/५/२० का वेद मंत्र। यजुर्वेद पू० अध्याय २८ । ऋचा १६ । देवोऊर्जाहुति दुधे सुदुधे पयसेन्द्रमवर्द्धताम् इषमूर्जमन्या वक्षत्सग्धितं शपीतिमन्या नवेनपूर्व दयमाने पुराणेन नवमधावामूर्जाहुती ऊर्जायमाने वसु वार्याणि यजमानाय शिक्षिते वसुवने वसुधेयस्य वीतां यज।।१६।। अनुवाद श्रीरामशर्मा आचार्य जी अन्न और जल सहित श्रेष्ठ आह्वान वाली,दोहन-योग्य, परिपूर्ण दोनों देवियां दुग्ध के द्वारा इन्द्र की वृद्धि करतीं हैं। उनमें से एक अन्न जल का वहन करती है और दूसरी खान पान का वहन करती है। यह दयावती रस वृद्धि करने वालीं, नूतन अन्न वाली यजमान को वरणीय धन देती हैं, अतः धन-प्राप्ति और स्थति के निमित्त घृतपान करें।हे होता! इस लिए तुम भी उनका यजन करो। ऋचा १६ साथियों इन दोनों मन्त्रों में दो देवियों का उल्लेख इन्द्र की वृद्धि और अन्न जल का वहन करने वाली एक देवी है। दुसरी खान पान का वहन करके रस वृद्धि करने वालीं और नूतन अन्न वाली यजमान को वरणीय धन देती है। अर्थात : - इडा और भारती दो देवी है।जो यजमान ( साधक)को वरणीय धन :- धारण करने योग्य है।जो सभी प्रकार का मनोवांक्षित धन देने में सक्षम है। यहां इन्द्र,जो शरीरस्थ हिरण्यगर्भ रूप स्वभाव का वर्धन करती है जिसमें ईश्वर अंश जीव सुख से रहने में सक्षम हो । साथियों यहां पर इड़ा पिंगला नाड़ी है उनके सूक्ष्म ज्ञान को धारण करने से उपरोक्त की प्राप्ति सहज है। धन्यवाद जी शिवचरण परमार भुलवाना श्रीराधे जय श्री राधे राधे जी श्रीराम जय राम जय जय राम जी

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आज ११/५/२० का वेद मंत्र यजुर्वेद पू० अध्याय २८/ ऋचा १५ देवो जोष्ट्री वसुधिति देवमिन्द्रमवर्धातम्। अयाव्यन्याधा द्वेषांस्यान्या वक्षद्वसु वीर्याणि यजमानाय शिक्षिते वसुवने वसुधेयस्य वीतां यज।।१५।। अनुवाद श्रीरामशर्मा आचार्य जी सदा प्रीति वाली, तत्त्व के जानने वाली।धन धारण करने वाली अहोरात्र की अधिष्ठात्री दो देवियां इन्द्र की वृद्धि करती हुई द्वेष और दुर्भाग्य को हटाती हुई वरणीय धन यजमान को देती हैं।वे धन लाभ और धन स्थापन के निमित्त घृतपान करें। हे होता!इसी अभिप्राय से तुम भी यजन करो। साथियों इस ऋचा का अभिप्राय रहस्यमय है।जिसे दुसरी पोस्ट में देते हैं धन्यवाद जी शिवचरण परमार भुलवाना श्रीराधे जय श्री राधे राधे जी श्रीराम जय राम जय जय राम जी

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आज 10/5/20 का वेद मंत्र। यजुर्वेद पू० अध्याय २८ ऋचा १४ देवी उषासानक्तेन्द्र यज्ञे प्रयत्हवे ताम्। दैवीर्विश: प्रायसिष्टां सुप्रीतो सुधिते वसुवने वसुधेयस्य वीतां यज।।१४।। अनुवाद श्रीरामशर्मा आचार्य जी। श्रेष्ठ प्रीति वाले, हितैषी, ऊषा और नक्त देवता यज्ञके अवसर पर इन्द्रको आहुत करें।दिव्य प्रजा वसु रुद्र आदि को प्रवृत्त करें। यजमान को धन लाभ कराने और घर में स्थापित करने के निमित्त घृतपान करो । हे होता तू भी इसी अभिप्राय से यज्ञ कर।। साथियों वेदों में प्रत्येक उस सूक्ष्मातिसूक्ष्म शक्ति की उपासना इन्द्रदेव के साथ युक्त करके करने का विधान है। अर्थात इन सूक्ष्म शक्तियों का नियंता इन्द्र देव ही हैं।

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आज ९/५/२० का वेद मंत्र यजुर्वेद पू० अध्याय २८ ऋचा १३ देवीर्द्धार इन्द्रसड्वीर्यान्नवर्द्धयन्।आ वत्सेन तरुणेन कुमारेण च मीतवतापार्वाण रेणुककाटंनुदन्त वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज ।।१३।। देहली कपाट आदि के समूह रूप दृढ़ साधनो द्वारा देवता ने कर्मों से इन्द्र की वृद्धि की।यह हिंसक, तरुण, कुमार और सामने आने वाले पशु आदि को रोके तथा धूल, उल्कापिंड आदि को भी दूर करे।वे धन,तेज,अन्न देने के निमित्त घृतपान करें।हे हे होता तू भी इसी उद्देश्य से पूजन कर। साथियों यहां पर इन्द्ररुप सूर्य की पूजा करने से अन्न,धन,तेज की प्राप्ति और जो भी प्रतिकूलता है उसे दूर करने के निमित्त पूजा करने का विधान है। धन्यवाद जी शिवचरण परमार भुलवाना श्रीराधे जय श्री राधे राधे जी श्रीराम जय राम जय जय राम

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