सनातन संस्कार 🔸🔸🔹🔸🔸 यह ज्ञान अपनों बच्चों को जरूर बतायें सभी को अवश्य शेयर करे! 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 10 कर्तव्य👉 1.संध्यावंदन, 2.व्रत, 3.तीर्थ, 4.उत्सव, 5.दान, 6.सेवा 7.संस्कार, 8.यज्ञ, 9.वेदपाठ, 10.धर्म प्रचार।...क्या आप इन सभी के बारे में विस्तार से जानते हैं और क्या आप इन सभी का अच्छे से पालन करते हैं? 10 सिद्धांत👉 1.एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति (एक ही ईश्‍वर है दूसरा नहीं), 2.आत्मा अमर है, 3.पुनर्जन्म होता है, 4.मोक्ष ही जीवन का लक्ष्य है, 5.कर्म का प्रभाव होता है, जिसमें से ‍कुछ प्रारब्ध रूप में होते हैं इसीलिए कर्म ही भाग्य है, 6.संस्कारबद्ध जीवन ही जीवन है, 7.ब्रह्मांड अनित्य और परिवर्तनशील है, 8.संध्यावंदन-ध्यान ही सत्य है, 9.वेदपाठ और यज्ञकर्म ही धर्म है, 10.दान ही पुण्य है। महत्वपूर्ण 10 कार्य👉 1.प्रायश्चित करना, 2.उपनयन, दीक्षा देना-लेना, 3.श्राद्धकर्म, 4.बिना सिले सफेद वस्त्र पहनकर परिक्रमा करना, 5.शौच और शुद्धि, 6.जप-माला फेरना, 7.व्रत रखना, 8.दान-पुण्य करना, 9.धूप, दीप या गुग्गल जलाना, 10.कुलदेवता की पूजा। 10 उत्सव👉 नवसंवत्सर, मकर संक्रांति, वसंत पंचमी, पोंगल-ओणम, होली, दीपावली, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्‍टमी, महाशिवरात्री और नवरात्रि। इनके बारे में विस्तार से जानकारी हासिल करें। 10 पूजा👉 गंगा दशहरा, आंवला नवमी पूजा, वट सावित्री, दशामाता पूजा, शीतलाष्टमी, गोवर्धन पूजा, हरतालिका तिज, दुर्गा पूजा, भैरव पूजा और छठ पूजा। ये कुछ महत्वपूर्ण पूजाएं है जो हिन्दू करता है। हालांकि इनके पिछे का इतिहास जानना भी जरूरी है। 10 पवित्र पेय👉 1.चरणामृत, 2.पंचामृत, 3.पंचगव्य, 4.सोमरस, 5.अमृत, 6.तुलसी रस, 7.खीर, 9.आंवला रस और 10.नीम रस। आप इनमें से कितने रस का समय समय पर सेवन करते हैं? ये सभी रस अमृत समान ही है। 10 पूजा के फूल👉 1.आंकड़ा, 2.गेंदा, 3.पारिजात, 4.चंपा, 5.कमल, 6.गुलाब, 7.चमेली, 8.गुड़हल, 9.कनेर, और 10.रजनीगंधा। प्रत्येक देवी या देवता को अलग अलग फूल चढ़ाए जाते हैं लेकिन आजकल लोग सभी देवी-देवता को गेंदे या गुलाम के फूल चढ़ाकर ही इतिश्री कर लेते हैं जो कि गलत है। 10 धार्मिक स्थल👉 12 ज्योतिर्लिंग, 51 शक्तिपीठ, 4 धाम, 7 पुरी, 7 नगरी, 4 मठ, आश्रम, 10 समाधि स्थल, 5 सरोवर, 10 पर्वत और 10 गुफाएं हैं। क्या आप इन सभी के बारे में विस्तार से जानने हैं? नहीं जानते हैं तो जानना का प्रयास करना चाहिए। 10 महाविद्या👉 1.काली, 2.तारा, 3.त्रिपुरसुंदरी, 4. भुवनेश्‍वरी, 5.छिन्नमस्ता, 6.त्रिपुरभैरवी, 7.धूमावती, 8.बगलामुखी, 9.मातंगी और 10.कमला। बहुत कम लोग जानते हैं कि ये 10 देवियां कौन हैं। नवदुर्गा के अलावा इन 10 देवियों के बारे में विस्तार से जानने के बाद ही इनकी पूजा या प्रार्थना करना चाहिए। बहुत से हिन्दू सभी को शिव की पत्नीं मानकरपूजते हैं जोकि अनुचित है। 10 धार्मिक सुगंध👉 गुग्गुल, चंदन, गुलाब, केसर, कर्पूर, अष्टगंथ, गुढ़-घी, समिधा, मेहंदी, चमेली। समय समय पर इनका इस्तेमाल करना बहुत शुभ, शांतिदायक और समृद्धिदायक होता है। 10 यम-नियम👉 1.अहिंसा, 2.सत्य, 3.अस्तेय 4.ब्रह्मचर्य और 5.अपरिग्रह। 6.शौच 7.संतोष, 8.तप, 9.स्वाध्याय और 10.ईश्वर-प्रणिधान। ये 10 ऐसे यम और नियम है जिनके बारे में प्रत्येक हिन्दू को जानना चाहिए यह सिर्फ योग के नियम ही नहीं है ये वेद और पुराणों के यम-नियम हैं। क्यों जरूरी है? क्योंकि इनके बारे में आप विस्तार से जानकर अच्छे से जीवन यापन कर सकेंगे। इनको जानने मात्र से ही आधे संताप मिट जाते हैं 10 बाल पुस्तकें👉 1.पंचतंत्र, 2.हितोपदेश, 3.जातक कथाएं, 4.उपनिषद कथाएं, 5.वेताल पच्चिसी, 6.कथासरित्सागर, 7.सिंहासन बत्तीसी, 8.तेनालीराम, 9.शुकसप्तति, 10.बाल कहानी संग्रह। अपने बच्चों को ये पुस्तकें जरूर पढ़ाए। इनको पढ़कर उनमें समझदारी का विकास होगा और उन्हें जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी। 10 ध्वनियां 👉 1.घंटी, 2.शंख, 3.बांसुरी, 4.वीणा, 5. मंजीरा, 6.करतल, 7.बीन (पुंगी), 8.ढोल, 9.नगाड़ा और 10.मृदंग। घंटी बजाने से जिस प्रकार घर और मंदिर में एक आध्यात्मि वातावरण निर्मित होता है उसी प्रकार सभी ध्वनियों का अलग अलग महत्व है। 10 दिशाएं 👉 दिशाएं 10 होती हैं जिनके नाम और क्रम इस प्रकार हैं- उर्ध्व, ईशान, पूर्व, आग्नेय, दक्षिण, नैऋत्य, पश्चिम, वायव्य, उत्तर और अधो। एक मध्य दिशा भी होती है। इस तरह कुल मिलाकर 11 दिशाएं हुईं। इन दिशाओं के प्रभाव और महत्व को जानकरी ही घर का वास्तु निर्मित किया जाता है। इन सभी दिशाओं के एक एक द्वारपाल भी होते हैं जिन्हें दिग्पाल कहते हैं। 10 दिग्पाल 👉 10 दिशाओं के 10 दिग्पाल अर्थात द्वारपाल होते हैं या देवता होते हैं। उर्ध्व के ब्रह्मा, ईशान के शिव व ईश, पूर्व के इंद्र, आग्नेय के अग्नि या वह्रि, दक्षिण के यम, नैऋत्य के नऋति, पश्चिम के वरुण, वायव्य के वायु और मारुत, उत्तर के कुबेर और अधो के अनंत। 10 देवीय आत्मा👉 1.कामधेनु गाय, 2.गरुढ़, 3.संपाति-जटायु, 4.उच्चै:श्रवा अश्व, 5.ऐरावत हाथी, 6.शेषनाग-वासुकि, 7.रीझ मानव, 8.वानर मानव, 9.येति, 10.मकर। इन सभी के बारे में विस्तार से जानना चाहिए। 10 देवीय वस्तुएं 👉 1.कल्पवृक्ष, 2.अक्षयपात्र, 3.कर्ण के कवच कुंडल, 4.दिव्य धनुष और तरकश, 5.पारस मणि, 6.अश्वत्थामा की मणि, 7.स्यंमतक मणि, 8.पांचजन्य शंख, 9.कौस्तुभ मणि और 10.संजीवनी बूटी। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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🚩आरती के बाद क्यों बोलते हैं🚩 'कर्पूरगौरं' मन्त्र : किसी भी मन्दिर में या हमारे घर में जब भी पूजन कर्म होते हैं तो वहां कुछ मन्त्रों का जप अनिवार्य रूप से किया जाता हैl सभी देवी-देवताओं के मन्त्र अलग-अलग हैं, लेकिन जब भी आरती पूर्ण होती है तो यह मन्त्र विशेष रूप से बोला जाता है: कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदा बसन्तं हृदयारबिन्दे भवं भवानीसहितं नमामि।। इस मन्त्र का अर्थ : इस मन्त्र से शिवजी की स्तुति की जाती है #कर्पूरगौरं- कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले। #करुणावतारं- करुणा के जो साक्षात् अवतार हैं। #संसारसारं- समस्त सृष्टि के जो सार हैं। #भुजगेन्द्रहारम्- इस शब्द का अर्थ है जो सांप को हार के रूप में धारण करते हैं। #सदा वसतं हृदयाविन्दे भवंभावनी सहितं नमामि- इसका अर्थ है कि जो शिव, पार्वती के साथ सदैव मेरे हृदय में निवास करते हैं, उनको मेरा नमन है। मन्त्र का पूरा अर्थ :- जो कर्पूर जैसे गौर वर्ण वाले हैं , करुणा के अवतार हैं , संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, वे भगवान शिव माता भवानी सहित मेरे ह्रदय में सदैव निवास करें और उन्हें मेरा नमन है। यही मन्त्र क्यों…. किसी भी देवी-देवता की आरती के बाद कर्पूरगौरम् करुणावतारं….मन्त्र ही क्यों बोला जाता है, इसके पीछे बहुत गहरे अर्थ छिपे हुए हैं। भगवान शिव की ये स्तुति शिव-पार्वती विवाह के समय विष्णु द्वारा गाई हुई मानी गई है। अमूमन ये माना जाता है कि शिव श्मशान वासी हैं, उनका स्वरुप बहुत भयंकर और अघोरी वाला है। लेकिन, ये स्तुति बताती है कि उनका स्वरुप बहुत दिव्य है। शिव को सृष्टि का अधिपति माना गया है, वे मृत्युलोक के देवता हैं, उन्हें पशुपतिनाथ भी कहा जाता है, पशुपति का अर्थ है संसार के जितने भी जीव हैं (मनुष्य सहित) उन सब का अधिपति। ये स्तुति इसी कारण से गाई जाती है कि जो इस समस्त संसार का अधिपति है ,वो हमारे मन में वास करे। शिव श्मशान वासी हैं, जो मृत्यु के भय को दूर करते हैं। हमारे मन में शिव वास करें, मृत्यु का भय दूर हो। 🙏 🚩हर हर महादेव 🚩 🙏🌹🙏🌹🙏🌹

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शिवलिंग रेडियोएक्टिव होते हैं! भारत का रेडियो एक्टिविटी मैप उठा लें, हैरान हो जायेंगे! भारत सरकार के न्युक्लियर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योतिर्लिंगों के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है। ▪️ शिवलिंग भी एक प्रकार के न्युक्लियर रिएक्टर्स ही तो हैं, तभी तो उन पर जल चढ़ाया जाता है, ताकि वो शांत रहें। ▪️ महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे कि बिल्व पत्र, आकमद, धतूरा, गुड़हल आदि सभी न्युक्लिअर एनर्जी सोखने वाले हैं। ▪️ क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है इसीलिए तो जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता। ▪️ भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिवलिंग की तरह ही है। ▪️ शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल नदी के बहते हुए जल के साथ मिलकर औषधि का रूप ले लेता है। ▪️ तभी तो हमारे पूर्वज हम लोगों से कहते थे कि महादेव शिवशंकर अगर नाराज हो जाएंगे तो प्रलय आ जाएगी। महाकाल उज्जैन से शेष ज्योतिर्लिंगों के बीच का सम्बन्ध (दूरी) देखिये - ▪️ उज्जैन से सोमनाथ- 777 किमी ▪️ उज्जैन से ओंकारेश्वर- 111 किमी ▪️ उज्जैन से भीमाशंकर- 666 किमी ▪️ उज्जैन से काशी विश्वनाथ- 999 किमी ▪️ उज्जैन से मल्लिकार्जुन- 999 किमी ▪️ उज्जैन से केदारनाथ- 888 किमी ▪️ उज्जैन से त्रयंबकेश्वर- 555 किमी ▪️ उज्जैन से बैजनाथ- 999 किमी ▪️ उज्जैन से रामेश्वरम्- 1999 किमी ▪️ उज्जैन से घृष्णेश्वर - 555 किमी हिन्दू धर्म में कुछ भी बिना कारण के नहीं होता था। उज्जैन पृथ्वी का केंद्र माना जाता है, जो सनातन धर्म में हजारों सालों से मानते आ रहे हैं। इसलिए उज्जैन में सूर्य की गणना और ज्योतिष गणना के लिए मानव निर्मित यंत्र भी बनाये गये हैं करीब 2050 वर्ष पहले। और जब करीब 100 साल पहले पृथ्वी पर काल्पनिक रेखा (कर्क) अंग्रेज वैज्ञानिक द्वारा बनायी गयी तो उनका मध्य भाग उज्जैन ही निकला। आज भी वैज्ञानिक उज्जैन ही आते हैं सूर्य और अन्तरिक्ष की जानकारी के लिये। सनातन विज्ञानं है 🙏हर हर महादेव 🙏

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भगवान विष्णु के १६ नामों का एक छोटा श्लोक प्रस्तुत कर रहा हूं । इसमें मनुष्य को किस किस अवस्थाओं में भगवान विष्णु को किस किस नाम से स्मरण करना चाहिए, इसका उल्लेख किया गया है :- *औषधे चिंतयते विष्णुं ,* *भोजन च जनार्दनम |* *शयने पद्मनाभं च* *विवाहे च प्रजापतिं ||* *युद्धे चक्रधरं देवं* *प्रवासे च त्रिविक्रमं |* *नारायणं तनु त्यागे* *श्रीधरं प्रिय संगमे ||* *दु:स्वप्ने स्मर गोविन्दं* *संकटे मधुसूदनम् |* *कानने नारसिंहं च* *पावके जलशायिनाम ||* *जल मध्ये वराहं च* *पर्वते रघुनन्दनम् |* *गमने वामनं चैव* *सर्व कार्येषु माधवम् |* *षोडश एतानि नामानि* *प्रातरुत्थाय य: पठेत ।* *सर्व पाप विनिर्मुक्ते,* *विष्णुलोके महियते ।।* (१) औषधि लेते समय - विष्णु ; (२) भोजन के समय - जनार्दन ; (३) शयन करते समय - पद्मनाभ : (४) विवाह के समय - प्रजापति ; (५) युद्ध के समय - चक्रधर ; (६) यात्रा के समय - त्रिविक्रम ; (७) शरीर त्यागते समय - नारायण; (८) पत्नी के साथ - श्रीधर ; (९) नींद में बुरे स्वप्न आते समय - गोविंद ; (१०) संकट के समय - मधुसूदन ; (११) जंगल में संकट के समय - नृसिंह ; (१२) अग्नि के संकट के समय - जलाशयी ; (१३) जल में संकट के समय - वाराह ; (१४) पहाड़ पर संकट के समय - रघुनंदन; (१५) गमन करते समय - वामन; (१६) अन्य सभी शेष कार्य करते समय - माधव *हरे राम् हरे राम् राम् राम् हरे हरे* *हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे* 🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿

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#जामुन_की_लकड़ी_का_महत्त्व . अगर जामुन की मोटी लकड़ी का टुकडा पानी की टंकी में रख दे तो टंकी में शैवाल या हरी काई नहीं जमती और पानी सड़ता नहीं । टंकी को लम्बे समय तक साफ़ नहीं करना पड़ता । जामुन की एक खासियत है कि इसकी लकड़ी पानी में काफी समय तक सड़ता नही है।जामुन की इस खुबी के कारण इसका इस्तेमाल नाव बनाने में बड़ा पैमाने पर होता है।नाव का निचला सतह जो हमेशा पानी में रहता है वह जामून की लकड़ी होती है। गांव देहात में जब कुंए की खुदाई होती तो उसके तलहटी में जामून की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है जिसे जमोट कहते है। आजकल लोग जामुन का उपयोग घर बनाने में भी करने लगे है। जामून के छाल का उपयोग श्वसन गलादर्द रक्तशुद्धि और अल्सर में किया जाता है। दिल्ली के महरौली स्थित निजामुद्दीन बावड़ी का हाल ही में जीर्णोद्धार हुआ है । 700 सालों के बाद भी गाद या अन्य अवरोधों की वजह से यहाँ पानी के सोते बंद नहीं हुए हैं। भारतीय पुरातत्व विभाग के प्रमुख के.एन. श्रीवास्तव के अनुसार इस बावड़ी की अनोखी बात यह है कि आज भी यहाँ लकड़ी की वो तख्ती साबुत है जिसके ऊपर यह बावड़ी बनी थी। श्रीवास्तव जी के अनुसार उत्तर भारत के अधिकतर कुँओं व बावड़ियों की तली में जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल आधार के रूप में किया जाता था। इस बावड़ी में भी जामुन की लकड़ी इस्तेमाल की गई थी जो 700 साल बाद भी नहीं गली है। बावड़ी की सफाई करते समय बारीक से बारीक बातों का भी खयाल रखा गया। यहाँ तक कि सफाई के लिए पानी निकालते समय इस बात का खास खयाल रखा गया कि इसकी एक भी मछली न मरे। इस बावड़ी में 10 किलो से अधिक वजनी मछलियाँ भी मौजूद हैं। इन सोतों का पानी अब भी काफी मीठा और शुद्ध है। इतना कि इसके संरक्षण के कार्य से जुड़े रतीश नंदा का कहना है कि इन सोतों का पानी आज भी इतना शुद्ध है कि इसे आप सीधे पी सकते हैं। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि पेट के कई रोगों में यह पानी फायदा करता है। पर्वतीय क्षेत्र में आटा पीसने की पनचक्की का उपयोग अत्यन्त प्राचीन है। पानी से चलने के कारण इसे "घट' या "घराट' कहते हैं।घराट की गूलों से सिंचाई का कार्य भी होता है। यह एक प्रदूषण से रहित परम्परागत प्रौद्यौगिकी है। इसे जल संसाधन का एक प्राचीन एवं समुन्नत उपयोग कहा जा सकता है। आजकल बिजली या डीजल से चलने वाली चक्कियों के कारण कई घराट बंद हो गए हैं और कुछ बंद होने के कगार पर हैं। पनचक्कियाँ प्राय: हमेशा बहते रहने वाली नदियों के तट पर बनाई जाती हैं। गूल द्वारा नदी से पानी लेकर उसे लकड़ी के पनाले में प्रवाहित किया जाता है जिससे पानी में तेज प्रवाह उत्पन्न हो जाता है। इस प्रवाह के नीचे पंखेदार चक्र (फितौड़ा) रखकर उसके ऊपर चक्की के दो पाट रखे जाते हैं। निचला चक्का भारी एवं स्थिर होता है। पंखे के चक्र का बीच का ऊपर उठा नुकीला भाग (बी) ऊपरी चक्के के खांचे में निहित लोहे की खपच्ची (क्वेलार) में फँसाया जाता है। पानी के वेग से ज्यों ही पंखेदार चक्र घूमने लगता है, चक्की का ऊपरी चक्का घूमने लगता है।पनाले में प्रायः जामुन की लकड़ी का भी इस्तेमाल होता है |फितौडा भी जामुन की लकड़ी से बनाया जाता है । जामुन की लकड़ी एक अच्छी दातुन है। जलसुंघा ( ऐसे विशिष्ट प्रतिभा संपन्न व्यक्ति जो भूमिगत जल के स्त्रोत का पता लगाते है ) भी पानी सूंघने के लिए जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल करते । साभार : जय श्री राम,...,

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राणा सांगा के समाधी स्थल की दुर्दशा राणा सांगा (राणा संग्राम सिंह) (राज 1509-1528) उदयपुर के राजा थे तथा राणा रायमल के सबसे छोटे पुत्र थे | राणा सांगा का पूरा नाम महाराणा संग्रामसिंह था। राणा सांगा ने मेवाड़ में 1509 से 1528 तक शासन किया, जो आज भारत के राजस्थान प्रदेश के रेगिस्थान में स्थित है। राणा सांगा ने विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध सभी राजपूतों को एकजुट किया। राणा सांगा सही मायनों में एक बहादुर योद्धा व शासक थे जो अपनी वीरता और उदारता के लिये प्रसिद्ध हुये। राणा रायमल के बाद सन 1509 में कर्मचन्द पंवार की सहायता से राणा सांगा मेवाड़ के उत्तराधिकारी बने। इन्होंने दिल्ली, गुजरात, व मालवा मुगल बादशाहों के आक्रमणों से अपने राज्य की बहादुरी से ऱक्षा की। उस समय के वह सबसे शक्तिशाली हिन्दू राजा थे। एक विश्वासघाती के कारण वह बाबर से युद्ध हारे लेकिन उन्होंने अपने शौर्य से दूसरों को प्रेरित किया। राव गांगा ने राणा सांगा के कहने पर पाती-पेरवन परम्परा के तहत् अपनी एक विशाल सेना मुगलों के विरुद्ध खानवा के मैदान में भेजी, मारवाड़ की एक विशाल सेना का नेतृत्व राव गांगा के पुत्र राव मालदेव ने किया | खानवा के मैदान में ही राणा सांगा जब घायल हो गए, तब उन्हें दौसा के निकट बसवा लाया गया यहाँ से राणा सांगा को कुछ असंतुष्ट सरदारों के कारण मेवाड़ के एक सुरक्षित स्थान कालपी पहुचाया गया, लेकिन असंतुष्ट सरदारों ने इसी स्थान राणा सांगा को जहर दे दिया | ऐसी अवस्था में राणा सांगा पुनः बसवा आए जहाँ सांगा की 30 जनवरी,1528 को मृत्यु हो गयी, लेकिन राणा सांगा का विधि विधान से अन्तिम संस्कार माण्डलगढ ( भीलवाड़ा ) में हुआ वहा आज भी हम राणा सांगा का समाधि स्थल देखते हैं| इनके शासनकाल में मेवाड़ अपनी समृद्धि की सर्वोच्च ऊँचाई पर था। एक आदर्श राजा की तरह इन्होंने अपने राज्य की ‍रक्षा तथा उन्नति की। राणा सांगा अदम्य साहसी (indomitable spirit) थे। एक भुजा, एक आँख खोने व अनगिनत ज़ख्मों के बावजूद उन्होंने अपना महान पराक्रम नहीं खोया, सुलतान मोहम्मद शासक माण्डु को युद्ध में हराने व बन्दी बनाने के बाद उन्हें उनका राज्य पुनः उदारता के साथ सौंप दिया, यह उनकी बहादुरी को दर्शाता है। मन में एक ही ख्याल कि जिस्म पर 80 घाव, एक हाथ, एक पैर और एक आंख का अभाव। अंदर से कितना मजबूत रहें होंगे सांगा। यह माटी के प्रति उनका प्रेम और समर्पण ही होगा जो उनकी रगों में साहस का संचार करता होगा। उनकी वीरता को नमन करता हूं। लेकिन यहां उनके समाधि स्थल की बदहाली देखकर मन व्यथित भी है। एक ओर मुगलों ने आगरा में अपने घोड़ों तक की इतनी भव्य समाधि बना दीं, दूसरी ओर आजादी के बाद भी राणा सांगा की ऐसी अनदेखी…। धिक्कार है छदम सेक्युलर नेताओं और इतिहासकारों को….

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आज आपको हनुमान जी एक लोक कथा के बारे में बताने जा रहा हूँ, *जिसका विवरण संसार के किसी भी पुस्तक में आपको शायद ही मिलेगा.. जय श्री राम, *कथा का आरंभ तब का है ,,* जब बाली को ब्रम्हा जी से ये वरदान प्राप्त हुआ,, की जो भी उससे युद्ध करने उसके सामने आएगा,, उसकी आधी ताक़त बाली के शरीर मे चली जायेगी,, और इससे बाली हर युद्ध मे अजेय रहेगा,, सुग्रीव, बाली दोनों ब्रम्हा के औरस ( वरदान द्वारा प्राप्त ) पुत्र हैं,, और ब्रम्हा जी की कृपा बाली पर सदैव बनी रहती है,, बाली को अपने बल पर बड़ा घमंड था,, उसका घमंड तब ओर भी बढ़ गया,, जब उसने करीब करीब तीनों लोकों पर विजय पाए हुए रावण से युद्ध किया और रावण को अपनी पूँछ से बांध कर छह महीने तक पूरी दुनिया घूमी,, रावण जैसे योद्धा को इस प्रकार हरा कर बाली के घमंड का कोई सीमा न रहा,, अब वो अपने आपको संसार का सबसे बड़ा योद्धा समझने लगा था,, और यही उसकी सबसे बड़ी भूल हुई,, अपने ताकत के मद में चूर एक दिन एक जंगल मे पेड़ पौधों को तिनके के समान उखाड़ फेंक रहा था,, हरे भरे वृक्षों को तहस नहस कर दे रहा था,, अमृत समान जल के सरोवरों को मिट्टी से मिला कर कीचड़ कर दे रहा था,, एक तरह से अपने ताक़त के नशे में बाली पूरे जंगल को उजाड़ कर रख देना चाहता था,, और बार बार अपने से युद्ध करने की चेतावनी दे रहा था- है कोई जो बाली से युद्ध करने की हिम्मत रखता हो,, है कोई जो अपने माँ का दूध पिया हो,, जो बाली से युद्ध करके बाली को हरा दे,, इस तरह की गर्जना करते हुए बाली उस जंगल को तहस नहस कर रहा था,, संयोग वश उसी जंगल के बीच मे हनुमान जी,, राम नाम का जाप करते हुए तपस्या में बैठे थे,, बाली की इस हरकत से हनुमान जी को राम नाम का जप करने में विघ्न लगा,, और हनुमान जी बाली के सामने जाकर बोले- हे वीरों के वीर,, हे ब्रम्ह अंश,, हे राजकुमार बाली,, ( तब बाली किष्किंधा के युवराज थे) क्यों इस शांत जंगल को अपने बल की बलि दे रहे हो,, हरे भरे पेड़ों को उखाड़ फेंक रहे हो, फलों से लदे वृक्षों को मसल दे रहे हो,, अमृत समान सरोवरों को दूषित मलिन मिट्टी से मिला कर उन्हें नष्ट कर रहे हो,, इससे तुम्हे क्या मिलेगा,, तुम्हारे औरस पिता ब्रम्हा के वरदान स्वरूप कोई तुहे युद्ध मे नही हरा सकता,, क्योंकि जो कोई तुमसे युद्ध करने आएगा,, उसकी आधी शक्ति तुममे समाहित हो जाएगी,, इसलिए हे कपि राजकुमार अपने बल के घमंड को शांत कर,, और राम नाम का जाप कर,, इससे तेरे मन में अपने बल का भान नही होगा,, और राम नाम का जाप करने से ये लोक और परलोक दोनों ही सुधर जाएंगे,, इतना सुनते ही बाली अपने बल के मद चूर हनुमान जी से बोला- ए तुच्छ वानर,, तू हमें शिक्षा दे रहा है, राजकुमार बाली को,, जिसने विश्व के सभी योद्धाओं को धूल चटाई है,, और जिसके एक हुंकार से बड़े से बड़ा पर्वत भी खंड खंड हो जाता है,, जा तुच्छ वानर, जा और तू ही भक्ति कर अपने राम वाम के,, और जिस राम की तू बात कर रहा है, वो है कौन, और केवल तू ही जानता है राम के बारे में, मैंने आजतक किसी के मुँह से ये नाम नही सुना, और तू मुझे राम नाम जपने की शिक्षा दे रहा है,, हनुमान जी ने कहा- प्रभु श्री राम, तीनो लोकों के स्वामी है,, उनकी महिमा अपरंपार है, ये वो सागर है जिसकी एक बूंद भी जिसे मिले वो भवसागर को पार कर जाए,, बाली- इतना ही महान है राम तो बुला ज़रा,, मैं भी तो देखूं कितना बल है उसकी भुजाओं में,, बाली को भगवान राम के विरुद्ध ऐसे कटु वचन हनुमान जो को क्रोध दिलाने के लिए पर्याप्त थे,, हनुमान- ए बल के मद में चूर बाली,, तू क्या प्रभु राम को युद्ध मे हराएगा,, पहले उनके इस तुच्छ सेवक को युद्ध में हरा कर दिखा,, बाली- तब ठीक है कल के कल नगर के बीचों बीच तेरा और मेरा युद्ध होगा,, हनुमान जी ने बाली की बात मान ली,, बाली ने नगर में जाकर घोषणा करवा दिया कि कल नगर के बीच हनुमान और बाली का युद्ध होगा,, अगले दिन तय समय पर जब हनुमान जी बाली से युद्ध करने अपने घर से निकलने वाले थे,, तभी उनके सामने ब्रम्हा जी प्रकट हुए,, हनुमान जी ने ब्रम्हा जी को प्रणाम किया और बोले- हे जगत पिता आज मुझ जैसे एक वानर के घर आपका पधारने का कारण अवश्य ही कुछ विशेष होगा,, ब्रम्हा जी बोले- हे अंजनीसुत, हे शिवांश, हे पवनपुत्र, हे राम भक्त हनुमान,, मेरे पुत्र बाली को उसकी उद्दंडता के लिए क्षमा कर दो,, और युद्ध के लिए न जाओ, हनुमान जी ने कहा- हे प्रभु,, बाली ने मेरे बारे में कहा होता तो मैं उसे क्षमा कर देता,, परन्तु उसने मेरे आराध्य श्री राम के बारे में कहा है जिसे मैं सहन नही कर सकता,, और मुझे युद्ध के लिए चुनौती दिया है,, जिसे मुझे स्वीकार करना ही होगा,, अन्यथा सारी विश्व मे ये बात कही जाएगी कि हनुमान कायर है जो ललकारने पर युद्ध करने इसलिए नही जाता है क्योंकि एक बलवान योद्धा उसे ललकार रहा है,, तब कुछ सोंच कर ब्रम्हा जी ने कहा- ठीक है हनुमान जी,, पर आप अपने साथ अपनी समस्त सक्तियों को साथ न लेकर जाएं,, केवल दसवां भाग का बल लेकर जाएं,, बाकी बल को योग द्वारा अपने आराध्य के चरणों में रख दे,, युद्ध से आने के उपरांत फिर से उन्हें ग्रहण कर लें,, हनुमान जी ने ब्रम्हा जी का मान रखते हुए वैसे ही किया और बाली से युद्ध करने घर से निकले,, उधर बाली नगर के बीच मे एक जगह को अखाड़े में बदल दिया था,, और हनुमान जी से युद्ध करने को व्याकुल होकर बार बार हनुमान जी को ललकार रहा था,, पूरा नगर इस अदभुत और दो महायोद्धाओं के युद्ध को देखने के लिए जमा था,, हनुमान जी जैसे ही युद्ध स्थल पर पहुँचे,, बाली ने हनुमान को अखाड़े में आने के लिए ललकारा,, ललकार सुन कर जैसे ही हनुमान जी ने एक पावँ अखाड़े में रखा,, उनकी आधी शक्ति बाली में चली गई,, बाली में जैसे ही हनुमान जी की आधी शक्ति समाई,, बाली के शरीर मे बदलाव आने लगे, उसके शरीर मे ताकत का सैलाब आ गया, बाली का शरीर बल के प्रभाव में फूलने लगा,, उसके शरीर फट कर खून निकलने लगा,, बाली को कुछ समझ नही आ रहा था,, तभी ब्रम्हा जी बाली के पास प्रकट हुए और बाली को कहा- पुत्र जितना जल्दी हो सके यहां से दूर अति दूर चले जाओ, बाली को इस समय कुछ समझ नही आ रहा रहा,, वो सिर्फ ब्रम्हा जी की बात को सुना और सरपट दौड़ लगा दिया,, सौ मील से ज्यादा दौड़ने के बाद बाली थक कर गिर गया,, कुछ देर बाद जब होश आया तो अपने सामने ब्रम्हा जी को देख कर बोला- ये सब क्या है, हनुमान से युद्ध करने से पहले मेरा शरीर का फटने की हद तक फूलना,, फिर आपका वहां अचानक आना और ये कहना कि वहां से जितना दूर हो सके चले जाओ, मुझे कुछ समझ नही आया,, ब्रम्हा जी बोले-, पुत्र जब तुम्हारे सामने हनुमान जी आये, तो उनका आधा बल तममे समा गया, तब तुम्हे कैसा लगा,, बाली- मुझे ऐसा लग जैसे मेरे शरीर में शक्ति की सागर लहरें ले रही है,, ऐसे लगा जैसे इस समस्त संसार मे मेरे तेज़ का सामना कोई नही कर सकता,, पर साथ ही साथ ऐसा लग रहा था जैसे मेरा शरीर अभी फट पड़ेगा,,, ब्रम्हा जो बोले- हे बाली, मैंने हनुमान जी को उनके बल का केवल दसवां भाग ही लेकर तुमसे युद्ध करने को कहा,, पर तुम तो उनके दसवें भाग के आधे बल को भी नही संभाल सके,, सोचो, यदि हनुमान जी अपने समस्त बल के साथ तुमसे युद्ध करने आते तो उनके आधे बल से तुम उसी समय फट जाते जब वो तुमसे युद्ध करने को घर से निकलते,, इतना सुन कर बाली पसीना पसीना हो गया,, और कुछ देर सोच कर बोला- प्रभु, यदि हनुमान जी के पास इतनी शक्तियां है तो वो इसका उपयोग कहाँ करेंगे,, ब्रम्हा- हनुमान जी कभी भी अपने पूरे बल का प्रयोग नही कर पाएंगे,, क्योंकि ये पूरी सृष्टि भी उनके बल के दसवें भाग को नही सह सकती,, ये सुन कर बाली ने वही हनुमान जी को दंडवत प्रणाम किया और बोला,, जो हनुमान जी जिनके पास अथाह बल होते हुए भी शांत और रामभजन गाते रहते है और एक मैं हूँ जो उनके एक बाल के बराबर भी नही हूँ और उनको ललकार रहा था,, मुझे क्षमा करें,, और आत्मग्लानि से भर कर बाली ने राम भगवान का तप किया और अपने मोक्ष का मार्ग उन्ही से प्राप्त किया,, तो बोलो, *पवनपुत्र हनुमान की जय,* *जय श्री राम जय श्री राम,,* कृपया ये कथा जन जन तक पहुचाएं,और पुण्य के भागी बने,,जय श्री राम जय हनुमान🙏🙏 *🙏राम राम जी🙏*

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*उज्जैन स्वर्ग है क्यौ है जानते हैं ?* एक मात्र स्थान जहाँ शक्तिपीठ भी है, ज्योतिर्लिंग भी है, कुम्भ महापर्व का भी आयोजन किया जाता है । *यहाँ साढ़े तीन काल विराजमान है* "महाँकाल,कालभैरव, गढ़कालिका और अर्धकाल भैरव।" *यहाँ तीन गणेश विराजमान है।* "चिंतामन,मंछामन, इच्छामन" *यहाँ 84 महादेव है,यही सात सागर है।।* "ये भगवान कृष्ण की शिक्षा स्थली है।।" *ये मंगल ग्रह की उत्पत्ति का स्थान है।।* "यही वो स्थान है जिसने महाकवी कालिदास दिए।" *उज्जैन विश्व का एक मात्र स्थान है जहाँ अष्ट चरिंजवियो का मंदिर है,यह वह ८ देवता है जिन्हें अमरता का वरदान है (बाबा गुमानदेव हनुमान अष्ट चरिंजीवि मंदिर)* "राजा विक्रमादित्य ने इस धरा का मान बढ़ाया।।" *विश्व की एक मात्र उत्तर प्रवाह मान क्षिप्रा नदी!!* "इसके शमशान को भी तीर्थ का स्थान प्राप्त है *चक्र तीर्थ* । यहां नो नारायण और सात सागर है भारत को सोने की चिड़िया का दर्जा यहां के राजा विक्रमादित्य ने ही दिया था इनके राज्य में सोने के सिक्के चलते थे सम्राट राजा विक्रमादित्य के नाम से ही विक्रम संवत का आरंभ हुआ जो हर साल चैत्र माह के प्रति प्रदा के दिन मनाया जाता है उज्जैन से ही ग्रह नक्षत्र की गणना होती है कर्क रेखा उज्जैन से होकर गुजरती है और तो और पूरी दुनिया का *केंद्र बिंदु* _(Central Point)_ है महाकाल जी का मंदिर _*महाभारत की एक कथानुसार उज्जैन स्वर्ग है।।* _यदि आप भी *अवंतिका* एवं *कालों के काल महाकाल* के प्रेमी व पुजारी हैं तो इस संदेश सभी शिव भक्तों तक पहुंचाए।_ *हर हर महादेव* *जय श्री महाकाल*🙏🙏

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