इक्यावन शक्ति पीठों में से एक चामुंडा देवी की कथा!!!!!!!!! हिमाचल प्रदेश को देव भूमि भी कहा जाता है। इसे देवताओं के घर के रूप में भी जाना जाता है। पूरे हिमाचल प्रदेश में 2000 से भी ज्यादा मंदिर है और इनमें से ज्यादातर प्रमुख आकर्षक का केन्द्र बने हुए है। इन मंदिरो में से एक प्रमुख मंदिर चामुण्डा देवी का मंदिर है जो कि जिला कांगड़ा हिमाचल प्रदेश राज्य में स्थित है। चामुण्डा देवी मंदिर शक्ति के 51 शक्ति पीठो में से एक है। यहां पर आकर श्रद्धालु अपने भावना के पुष्प मां चामुण्डा देवी के चरणों मे अर्पित करते है। मान्यता है कि यहां पर आने वाले श्रद्धालुओं की सभी मनोकामना पूर्ण होती है। देश के कोने-कोने से भक्त यहां पर आकर माता का आशीर्वाद प्राप्त करते है। चामुण्डा देवी का मंदिर समुद्र तल से 1000 मी. की ऊंचाई पर स्थित है। यह धर्मशाला से 15 कि॰मी॰ की दूरी पर है। यहां प्रकृति ने अपनी सुंदरता भरपूर मात्रा में प्रदान कि है। चामुण्डा देवी मंदिर बंकर नदी के किनारे पर बसा हुआ है। पर्यटको के लिए यह एक पिकनिक स्पॉट भी है। यहां कि प्राकृतिक सौंदर्य लोगो को अपनी और आकर्षित करता है। चामुण्डा देवी मंदिर मुख्यता माता काली को समर्पित है। माता काली शक्ति और संहार की देवी है। जब-जब धरती पर कोई संकट आया है तब-तब माता ने दानवो का संहार किया है। असुर चण्ड-मुण्ड के संहार के कारण माता का नाम चामुण्डा पड़ गया। दूर्गा सप्तशती और देवी महात्यमय के अनुसार देवताओं और असुरों के बीच में सौ वर्षों तक युद्ध चला था। इस युद्ध में असुरो की विजय हुई। असुरो का राजा महिषासुर स्वर्ग का राजा बन गया और देवता सामान्य मनुष्यों कि भांति धरती पर विचलन करने लगे। देवताओं के ऊपर असुरों ने काफी अत्याचार किया। देवताओं ने विचार किया और वह भगवान विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने उन्हें देवी कि अराधना करने को कहा। देवताओं ने पूछा वो देवी कौन है जो कि हमार कष्टो का निवारण करेगी। इसी योजना के फलस्वरूप त्रिदेवों ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों के अंदर से एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ जो देखते ही देखते एक स्त्री के रूप में पर्वितित हो गया। इस देवी को सभी देवी-देवताओं ने कुछ न कुछ भेट स्वरूप प्रदान किया। भगवान शंकर ने सिंह, भगवान विष्णु ने कमल, इंद्र ने घंटा तथा समुद्र ने कभी न मैली होने वाली माला प्रदान की। तभी सभी देवताओं ने देवी की आराधना की ताकि देवी प्रसन्न हो और उनके कष्टो का निवारण हो सके। और हुआ भी ऐसा ही। देवी ने प्रसन्न होकर देवताओं को वरदान दे दिया और कहा मै तुम्हारी रक्षा अवश्य करूंगी। इसी के फलस्वरूप देवी ने महिषासुर के साथ युद्ध प्रारंभ कर दिया। जिसमें देवी कि विजय हुई और तभी से देवी का नाम महिषासुर मर्दनी पड़ गया। चामुण्‍डा देवी मंदिर शक्ति पीठ मंदिरों मे से एक है। पूरे भारतवर्ष मे कुल 51 शक्तिपीठ है। जिन सभी की उत्पत्ति कथा एक ही है। यह सभी मंदिर शिव और शक्ति से जुड़े हुऐ है। धार्मिक ग्रंधो के अनुसार इन सभी स्थलो पर देवी के अंग गिरे थे। शिव के ससुर राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया जिसमे उन्होंने शिव और सती को आमंत्रित नही किया क्योंकि वह शिव को अपने बराबर का नही समझते थे। यह बात सती को काफी बुरी लगी और वह बिना बुलाए यज्ञ में पहुंच गयी। यज्ञ स्‍थल पर शिव का काफी अपमान किया गया जिसे सती सहन न कर सकी और वह हवन कुण्ड में कुद गयीं। जब भगवान शंकर को यह बात पता चली तो वह आये और सती के शरीर को हवन कुण्ड से निकाल कर तांडव करने लगे। जिस कारण सारे ब्रह्माण्ड में हाहाकार मच गया। पूरे ब्रह्माण्ड को इस संकट से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने सती के शरीर को अपने सुदर्शन चक्र से 51 भागो में बांट दिया जो अंग जहां पर गिरा वह शक्ति पीठ बन गया। मान्यता है कि चामुण्डा देवी मंदिर मे माता सती के चरण गिरे थे। माता का नाम चामुण्ड़ा पडने के पीछे एक कथा प्रचलित है। दूर्गा सप्तशती में माता के नाम की उत्पत्ति कथा वर्णित है। हजारों वर्ष पूर्व धरती पर शुम्भ और निशुम्भ नामक दो दैत्यो का राज था। उनके द्वारा धरती व स्वर्ग पर काफी अत्याचार किया गया। जिसके फलस्वरूप देवताओं व मनुष्यो ने देवी दूर्गा कि आराधना की और देवी दूर्गा ने उन सभी को वरदान दिया कि वह अवश्य ही इन दोनों दैत्यो से उनकी रक्षा करेंगी। इसके पश्चात देवी दूर्गा ने कोशिकी नाम से अवतार ग्रहण किया। माता कोशिकी को शुम्भ और निशुम्भ के दूतो ने देख लिया और उन दोनो से कहा महाराज आप तीनों लोको के राजा है। आपके यहां पर सभी अमूल्य रत्‍न सुशोभित है। इन्द्र का एरावत हाथी भी आप ही के पास है। इस कारण आपके पास ऐसी दिव्य और आकर्षक नारी भी होनी चाहिए जो कि तीनों लोकों में सर्वसुन्दर है। यह वचन सुन कर शुम्भ और निशुम्भ ने अपना एक दूत देवी कोशिकी के पास भेजा और उस दूत से कहा कि तुम उस सुन्दरी से जाकर कहना कि शुम्भ और निशुम्भ तीनो लोके के राजा है और वो दोनो तुम्हें अपनी रानी बनाना चाहते है। यह सुन दूत माता कोशिकी के पास गया और दोनो दैत्यो द्वारा कहे गये वचन माता को सुना दिये। माता ने कहा मैं मानती हूं कि शुम्भ और निशुम्भ दोनों ही महान बलशली है। परन्तु मैं एक प्रण ले चूंकि हूं कि जो व्यक्ति मुझे युद्ध में हरा देगा मैं उसी से विवाह करूंगी। यह सारी बाते दूत ने शुम्भ और निशुम्भ को बताई। तो वह दोनो कोशिकी के वचन सुन कर उस पर क्रोधित हो गये और कहा उस नारी का यह दूस्‍साहस कि वह हमें युद्ध के लिए ललकारे। तभी उन्होंने चण्ड और मुण्ड नामक दो असुरो को भेजा और कहा कि उसके केश पकड़कर हमारे पास ले आओ। चण्ड और मुण्ड देवी कोशिकी के पास गये और उसे अपने साथ चलने के लिए कहा। देवी के मना करने पर उन्होंने देवी पर प्रहार किया। तब देवी ने अपना काली रूप धारण कर लिया और असुरो को यमलोक पहुंचा दिया। उन दोनो असुरो को मारने के कारण माता का नाम चामुण्डा पड गया।

+6 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 0 शेयर

नेपाल में पशुपतिनाथ का अदभुत पंचमुखी ज्योतिर्लिंग की कथा,,, द्वादश ज्योतिर्लिंग के महान् प्रतीक श्री पशपुति नाथ नेपाल में नागमती के किनारे स्थित कांतिपुर में पशुपतिनाथ विराजमान हैं। पशुपति नाथ का मंदिर धर्म, कला, संस्कृति की दृष्टि से अद्वितीय है। काशी के कण-कण जैसै शिव माने जाते हैैं ,,वैसे ही नेेपाल में पग-पग पर मंदिर हैैं, जहां कला बिखरी पड़ी है..इस कला के पीछे धर्म और संस्कृति की जीवंतता छिपी हुई है। नेपाल का सुरम्य नगर काठमांडू अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहां का मौसम प्रकृति को हर माह हरा-भरा रखने के लिए अनुकूल है। चारों तरफ बागमती, इंदुमती और विष्णुमती अनेक कल-कल करती नदियां, जो कभी वर्षा के पानी से उछलती-चलती हैं, तो कभी पहाड़ों से निकलने वाले बारहमासी जल स्रोतों का निर्मल जल ले कर मंद-मंद मुस्कुराती, बल खाती चलती हैं, वे देखने में अत्यंत मोहक और लुभावनी लगती हैं। प्रायः हर मौसम में यहां फूलों की बहार रहती है, जो देखने में अत्यंत मोहक है। इस अनुपम प्राकृतिक छटा और भगवान पशुपति के दर्शनार्थ हजारों पर्यटक विश्व के कोने-कोने से यहां के सौंदर्य की अमिट छाप ले कर लौटते हैं और कुछ दिन यहां रुकने पर एक अलौकिक शांति अनुभव करते हैं। जो नर-नारी यहां तपस्या, जप, भगवान आशुतोष की श्रद्धा-भक्तिपूर्वक पूजा-अर्चना करते हैं, उनकी सभी कामनाएं पूरी होती हैं। पशुपति के देदीप्यमान चतुर्मुखी लिंग को कुछ विद्वान ज्योतिर्लिंग मानते हैं और कुछ विद्वान इसे ज्योतिर्लिंग नहीं मानते। सर्वस्वीकृत शिव पुराण के अनुसार तो ज्योतिर्लिंग बारह ही हैं, परंतु शिव पुराण के 351 वें श्लोक में श्री पशुपति लिंग का उल्लेख ज्योतिर्लिंग के समान ही किया गया है। भगवान् आशुतोष, ऐसी सुंदर तपोभूमि के प्रति आकर्षित हो कर, एक बार कैलाश छोड़ कर यहीं आ कर रम गये। इस क्षेत्र में यह 3 सींग वाले मृग बन कर, विचरण करने लगे। अतः इस क्षेत्र को पशुपति क्षेत्र, या मृगस्थली कहते हैं। शिव को इस प्रकार अनुपस्थित देख कर ब्रह्नाा, विष्णु को चिंता हुई और दोनों देवता शिव की खोज में निकले। इस सुंदर क्षेत्र में उन्होंने एक देदीप्यमान, मोहक 3 सींग वाले मृग को चरते देखा। उन्हें मृग रूप में शिव होने की आशंका हुई। ब्रह्नाा ने योग विद्या से तुरंत पहचान लिया कि यह मृग नहीं, बल्कि शिव ही हैं। तत्काल ही उछल कर उन्होंने मृग का सींग पकड़ने का प्रयास किया। इससे सींग के 3 टुकड़े हो गये। उसी सींग का एक टुकड़ा इस पवित्र क्षेत्र में गिरा और यहां पर महारुद्र उत्पन्न हुए, जो श्री पशुपति नाथ के नाम से प्रसिद्ध हुए। शिव की इच्छानुसार भगवान् विष्णु ने नागमती के ऊंचे टीले पर, शिव को मुक्ति दिला कर, लिंग के रूप में स्थापना की, जो पशुपति के रूप में विखयात हुआ। नेपाल माहात्म्य में तथा सुनी जाने वाली जनश्रुति के अनुसार नित्यानंद नाम के किसी ब्राह्मण की गाय नित्य एक ऊंचे टीले पर जा कर स्वयं दूध बहा देती थी। नित्यानंद को भगवान् ने स्वप्न में दर्शन दिया। तब उस स्थान की खुदाई की गयी और यह भव्य लिंग प्राप्त हुआ। भगवान् पशुपति नेपाल के शासकों और जनता-जनार्दन के परम आराध्य देवता हैं। इस शिव लिंग की ऊंचाई लगभग 1 मीटर है। यह काले रंग का पत्थर है, जो अवश्य ही कुछ विशेष धातुओं से युक्त है। इसकी चमक, आभा और शोभा अद्धितीय हैं। नेपालवासियों का ऐसा विश्वास है कि इस लिंग में पारस पत्थर का गुण विद्यमान है, जिससे लोहे को स्पर्श करने से वह सोना बन जाता है। जो भी हो, इस भव्य पंचमुखी लिंग में चमत्कार अवश्य है, जो समस्त नेपाल के जनता-जनार्दन एवं भारतवासियों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करता है। नेपालवासी अपने हर शुभ कार्य के प्रारंभ में भगवान पशुपति का आशीर्वाद प्राप्त करना अनिवार्य मानते हैं। कुछ लोगों का विश्वास है कि यह मंदिर पहली शताब्दी का है। इतिहासकार इसे तीसरी शताब्दी का बताते हैं। मंदिर अति प्राचीन है। समय-समय पर इसमें मरम्मत होती रहती है एवं इसका रखरखाव होता रहा है। नेपाल शासकों के अधिष्ठाता देव होने के कारण शासन की ओर से इसकी पूरी देखभाल सदैव होती रही है। इस मंदिर में केवल हिंदू ही प्रवेश कर सकते हैं। मुखय द्वार पर नेपाल सरकार का संगीनधारी पहरेदार हर समय रहता है। चमड़े की वस्तुएं मंदिर में ले जाना वर्जित है। अंदर फोटो लेना भी मना है। मंदिर की शोभा मंदिर के पूर्व भाग से, बागमती के पूर्वी तट से भी देखी जा सकती है। विदेशी पर्यटकों के लिए यह मंदिर आकर्षण का केंद्र माना जाता है। हर मौसम में प्रायः हजारों विदेशी पर्यटक बागमती के पूर्वी तट से फोटो लेते देखे जाते हैं। बागमती के पवित्र जल से भगवान पशुपति का अभिषेक किया जाता है। बागमती के दाहिनी तट पर ही भगवान् पशुपति ज्योतिर्लिंग के गर्भ गृह के सामने ही, मरणोपरांत, हिंदुओं के शव को अग्नि में प्रज्ज्वलित किया जाता है। नेपालवासी मरने से पूर्व अपने परिजनों को, अंतिम सांस से कुछ समय पहले, यहां ले आते हैं, जिससे पवित्र नदी के स्नान और गोदान के बाद ही मृत्यु प्राप्त हो, ताकि मोक्ष प्राप्त हो सके। मृत व्यक्ति के पैर बागमती में लटका देते हैं। कभी-कभी कोई मृतक इस प्रक्रिया से पुनर्जीवित भी हो जाता है, जैसा की लोगों में विश्वास है। आम तौर पर ब्राह्मण ही शव को स्नान कराते हैं और मस्तक पर पशुपति का चंदन लगाते हैं। तत्पश्चात् कफ़न में लपेट कर दाह कर्म संपादित कराते हैं। भारत-नेपाल के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान की परंपरा, जो आदि काल से थी, वह आज भी विराजमान है। आज भी हर धर्मपरायण नेपाली नर-नारी श्री काशी विश्वनाथ के दर्शन और गंगा स्नान तथा चारों धाम यात्रा को जीवन की परम सार्थकता मानते हैं, तो भारत के तीर्थ स्थलों – बद्रीनाथ, केदारनाथ, रामेश्वरम, द्वारिकाधीश, जगन्नाथपुरी, गंगा सागर आदि यात्रा करने वाले भारतीय बिना पशुपति दर्शन के अपने आपको पूर्ण नहीं मानते। भारत के बिहार, उत्तरप्रदेश आदि राज्यों से सड़क मार्ग, गोरखपुर तथा रक्सोल आदि से बस द्वारा नेपाल की राजधानी काडमांडू पहुंच सकते हैं। भारत के दिल्ली, लखनऊ, कोलकाता, पटना, मुंबई आदि स्थानों से वायु मार्ग से भी जाने की व्यवस्था है। काठमांडू में यात्रियों के ठहरने के लिए साधारण से महंगे होटल उपलब्ध हैं। भारतीय मुद्रा में लगभग 25 रु. से 1000 रु. तक के होटल यहां उलबल्ध हैं। फाल्गुनी कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को, शिव-पर्वती के विवाहोत्सव के उपलक्ष्य में, शिव रात्रि को पूजा-अर्चना का विशेष महत्व है। इस अवसर पर यहां भारत और अन्य राष्ट्र के लोग दर्शन-पूजन के लिए आते हैं। शिव रात्रि के उपलक्ष्य में यहां विराट मेला लगता है। यहां मंदिर में दर्शन करने वाले दर्शनार्थियों का तांता त्रयोदशी की अर्द्ध रात्रि से ही प्रारंभ हो जाता है। यह समय पशुपति दर्शन के लिए उपयुक्त है। यहां के लोगों का विश्वास है कि पशुपति ही नेपाल की रक्षा करते हैं। पशुपति नाथ के दर्शन से आरोग्य, सुख, समृद्धि, शांति, संतोष प्राप्त होते हैं तथा मनुष्य का अगला जन्म पशु योनि में नहीं होता, ऐसा लोगों का विश्वास है।

+20 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 10 शेयर

मित्रों आज शुक्रवार है, माता रानी का दिन है, आज हम आपको इक्यावन शकिपीठों के बारे में विस्तार से बतायेगें!!!!!!!! शक्तिपीठ, देवीपीठ या सिद्धपीठ से उन स्थानों का ज्ञान होता है, जहां शक्तिरूपा देवी का अधिष्ठान (निवास) है।ऐसा माना जाता है कि ये शक्तिपीठ मनुष्य को समस्त सौभाग्य देने वाले हैं। मनुष्यों के कल्याण के लिए जिस प्रकार भगवान शंकर विभिन्न तीर्थों में पाषाणलिंग रूप में आविर्भूत हुए, उसी प्रकार करुणामयी देवी भी भक्तों पर कृपा करने के लिए विभिन्न तीर्थों में पाषाणरूप से शक्तिपीठों के रूप में विराजमान हैं। दक्षप्रजापति ने सहस्त्रों वर्षों तक तपस्या करके पराम्बा जगदम्बिका को प्रसन्न किया और उनसे अपने यहां पुत्रीरूप में जन्म लेने का वरदान मांगा। पराशक्ति के वरदान से दक्षप्रजापति के घर में दाक्षायणी का जन्म हुआ और उस कन्या का नाम 'सती' पड़ा। उनका विवाह भगवान शिव के साथ हुआ। एक बार ऋषि दुर्वासा ने पराशक्ति जगदम्बा की आराधना की। देवी ने वरदान के रूप में अपनी दिव्यमाला ऋषि को प्रदान की। उस माला की असाधारण सुगन्ध से मोहित होकर दक्षप्रजापति ने वह हार ऋषि से मांग लिया। दक्षप्रजापति ने वह दिव्यमाला अपने पर्यंक (पलंग) पर रख दी और रात्रि में वहां पत्नी के साथ शयन किया। फलत: दिव्यमाला के तिरस्कार के कारण दक्ष के मन में शिव के प्रति दुर्भाव जागा। इसी कारण दक्षप्रजापति ने अपने यज्ञ में सब देवों को तो निमन्त्रित किया, किन्तु शिव को आमन्त्रित नहीं किया। सती इस मानसिक पीड़ा के कारण पिता को उचित सलाह देना चाहती थीं, किन्तु निमन्त्रण न मिलने के कारण शिव उन्हें पिता के घर जाने की आज्ञा नहीं दे रहे थे। किसी तरह पति को मनाकर सती यज्ञस्थल पहुंचीं और पिता को समझाने लगीं। पर दक्ष ने दो टूक कहा-'शिव अमंगलस्वरूप हैं। उनके सांनिध्य में तुम भी अमंगला हो गयी हो।' मया कृतो देवयाग: प्रेतयागो न चैव हि। देवानां गमनं यत्र तत्र प्रेतविवर्जित:।। (शिवपुराण) अर्थात्-मैंने देवयज्ञ किया है, प्रेतयज्ञ नहीं। जहां देवताओं का आवागमन हो वहां प्रेत नहीं जा सकते। तुम्हारे पति भूत, प्रेत, पिशाचों के स्वामी हैं, अत: मैंने उन्हें नहीं बुलाया है।' महामाया सती ने पिता द्वारा पति का अपमान होने पर उस पिता से सम्बद्ध शरीर को त्याग देना ही उचित समझा। प्राणी की तपस्या एवं आराधना से ही उसे शक्ति को जन्म देने का सौभाग्य प्राप्त होता है किन्तु यदि बीच में अहंकार और प्रमाद उत्पन्न हो जाए तो शक्ति उससे सम्बन्ध तोड़ लेती है। फिर उसकी वही स्थिति होती है जो दक्षप्रजापति की हुई। पिता के तिरस्कार से क्रोध में सती ने अपने ही समान रूप वाली छायासती को प्रादुर्भूत (प्रकट) किया और अपने चिन्मयस्वरूप को यज्ञ की प्रखर ज्वाला में दग्ध कर दिया। शिवगणों व नारदजी के द्वारा सती के यज्ञाग्नि में प्रवेश के समाचार को जानकर भगवान शंकर कुपित हो गए। उन्होंने अपने सिर से एक जटा उखाड़ी और पर्वत पर दे मारी जिससे उसके दो टुकड़े हो गए। एक भाग से भद्रकाली और दूसरे से वीरभद्र प्रकट हुए। उनके द्वारा यज्ञ का विध्वंस कर दिया गया। सभी देवताओं ने शिव के पास जाकर स्तुति की। आशुतोष शिव स्वयं यज्ञस्थल (कनखल-हरिद्वार) पहुंचे। सारे अमंगलों को दूर कर शिव ने यज्ञ को तो सम्पन्न करा दिया, किन्तु सती के पार्थिव शरीर को देखकर वे उसके मोह में पड़ गए। सती का शरीर यद्यपि मृत हो गया था, किन्तु वह महाशक्ति का निवासस्थान था। अर्धनारीश्वर भगवान शंकर उसी के द्वारा उस महाशक्ति में रत थे। अत: मोहित होने के कारण उस शवशरीर को छोड़ न सके। भगवान शंकर छायासती के शवशरीर को कभी सिर पर, कभी दांये हाथ में, कभी बांये हाथ में तो कभी कन्धे पर और कभी प्रेम से हृदय से लगाकर अपने चरणों के प्रहार से पृथ्वी को कम्पित करते हुए नृत्य करने लगे-'ननर्त चरणाघातै: कम्पयन् धरणीतलम्।' भगवान शंकर उन्मत्त होकर नृत्य कर रहे थे। शिव के चरणप्रहारों से पीड़ित होकर कच्छप और शेषनाग धरती छोड़ने लगे। शिव के नृत्य करने से प्रचण्ड वायु बहने लगी जिससे वृक्ष व पर्वत कांपने लगे। सर्वत्र प्रलय-सा हाहाकार मच गया। ब्रह्माजी की आज्ञा से ऋषिगण स्वस्तिवाचन करने लगे। देवताओं को चिन्ता हुई कि यह कैसी विपत्ति आ गयी। ये जगत्संहारक रुद्र कैसे शान्त होंगे? संसार का चक्का जाम जानकर देवताओं और भगवान विष्णु ने महाशक्ति सती के देह को शिव से वियुक्त करना चाहा। भगवान विष्णु ने शिव के मोह की शान्ति एवं अनन्त शक्तियों के निवासस्थान सती के देह के अंगों से लोक का कल्याण हो-यह सोचकर सुदर्शन चक्र द्वारा छायासती के शरीर के खण्ड-खण्ड कर दिए। भगवान शंकर ने विष्णुजी को शाप देते हुए कहा-'त्रेतायुग में विष्णु को पृथ्वी पर सूर्यवंश में जन्म लेना पड़ेगा। जिस प्रकार मुझे छायापत्नी का वियोगी बनना पड़ा, उसी प्रकार राक्षसराज रावण विष्णु की छायापत्नी का हरण करके उन्हें भी वियोगी बनायेगा। विष्णु मेरी ही भांति शोक से व्याकुल होंगे।' सती के मृत शरीर के विभिन्न अंग और उनमें पहने आभूषण ५१ स्थलों पर गिरे जिससे वे स्थल शक्तिपीठों के रूप में जाने जाते हैं। सती के शरीर के हृदय से ऊपर के भाग के अंग जहां गिरे वहां वैदिक एवं दक्षिणमार्ग की और हृदय से नीचे भाग के अंगों के पतनस्थलों में वाममार्ग की सिद्धि होती है। 'देवीभागवत' में १०८ शक्तिपीठों का वर्णन है। 'तन्त्रचूडामणि' में शक्तिपीठों की संख्या ५२ बतायी गयी है। परन्तु ज्यादातर पुराणों में उनके ५१ शक्तिपीठों की ही मान्यता है। श्रीललितासहस्त्रनाम में उनका एक नाम 'पंचाशत्पीठरूपिणी' है। इससे स्पष्ट है कि पराम्बा जगदम्बा के ५१ शक्तिपीठ ही हैं। इन ५१ शक्तिपीठों में से भारत विभाजन के पश्चात् ५ और कम हो गए। इन ५१ शक्तिपीठों में से १ पीठ पाकिस्तान में, ४ बंगलादेश में, १ श्रीलंका में, १ तिब्बत में और २ नेपाल में है। वर्तमान में भारत में ४२ शक्तिपीठ हैं। इक्वावन शक्तिपीठों के नाम, अंगनाम, उनकी शक्ति और भैरव का परिचय!!!!!! इन शक्तिपीठों का स्थान, वहां की अधिष्ठात्री शक्ति एवं भैरव (शिव) का नाम तथा सती के किस अंग और आभूषण का कहां पतन हुआ और कौन-कौन-से पीठ बने, इसका विवरण इस प्रकार है- १. किरीट-यहां सती के सिर का आभूषण 'किरीट' गिरा था। यहां कि शक्ति 'विमला, भुवनेशी' कहलाती है और भैरव (शिव) 'संवर्त' नाम से जाने जाते हैं। (प. बंगाल) २. वृन्दावन-यहां सती के 'केश' गिरे थे। यहां सती 'उमा' और शंकर 'भूतेश' नाम से जाने जाते हैं। (उत्तर प्रदेश, वृन्दावन) ३. करवीर-यहां सती के 'त्रिनेत्र' गिरे थे। यहां सती 'महिषमर्दिनी' और शिव 'क्रोधीश' कहे जाते हैं। (महाराष्ट्र, कोल्हापुर स्थित महालक्ष्मी मन्दिर) ४. श्रीपर्वत-यहां सती की 'दक्षिण कनपटी' गिरी थी। सती यहां 'श्रीसुन्दरी' तथा शिव 'सुन्दरानन्द' कहलाते हैं। (लद्दाख, कश्मीर) ५. वाराणसी-यहां सती की 'कान की मणि' गिरी थी। यहां सती 'विशालाक्षी' तथा शिव 'कालभैरव' कहलाते हैं। (वाराणसी में मीरघाट पर विशालाक्षी मन्दिर) ६. गोदावरीतट-यहां सती का 'वामगण्ड (बायां गाल)' गिरा था। यहां सती को 'विश्वेशी, रुक्मिणी' तथा शिव को 'दण्डपाणि, वत्सनाभ' कहते हैं। (आन्ध्रप्रदेश) ७. शुचि-यहां सती के 'ऊपर के दांत' गिरे थे। यहां सती को 'नारायणी' और शंकर को 'संहार' कहते हैं। (तमिलनाडु, शुचीन्द्रम्) ८. पंचसागर--यहां सती के 'नीचे के दांत' गिरे थे। यहां सती 'वाराही' और शंकर 'महारुद्र' नाम से जाने जाते हैं। इस पीठ के स्थान के बारे में निश्चित पता नहीं है। ९. ज्वालामुखी-यहां सती की 'जिह्वा' गिरी थी। यहां सती 'सिद्धिदा' और शिव 'उन्मत्त' रूप में विराजित हैं। (हिमाचल प्रदेश, कांगड़ा स्थित ज्वालामुखी मन्दिर) १०. भैरवपर्वत-यहां सती का 'ऊपर का होंठ' गिरा था। यहां सती 'अवन्ती' और शिव 'लम्बकर्ण' कहलाते हैं। (मध्यप्रदेश) ११. अट्टहास-यहां सती का 'नीचे का होंठ' गिरा था। यहां सती 'फुल्लरादेवी' और शिव 'विश्वेश' कहलाते हैं। (बर्दवान, प. बंगाल) १२. जनस्थान-यहां सती की 'ठुड्डी' गिरी थी। यहां सती 'भ्रामरी' और शिव 'विकृताक्ष' कहलाते हैं। (महाराष्ट्र, नासिक के पास पंचवटी में भद्रकाली मन्दिर) १३. कश्मीर- यहां सती का 'कण्ठ' गिरा था। यहां सती 'महामाया' तथा शिव 'त्रिसंध्येश्वर' कहलाते हैं। (कश्मीर में अमरनाथ गुफा के भीतर 'हिम' शक्तिपीठ है।) १४. नन्दीपुर-यहां सती का 'कण्ठहार' गिरा था। यहां सती 'नन्दिनी' और शिव 'नन्दिकेश्वर' कहलाते हैं। (प. बंगाल) १५. श्रीशैल-यहां सती की 'ग्रीवा' गिरी थी। यहां सती को 'महालक्ष्मी' तथा शिव को 'संवरानन्द', 'ईश्वरानन्द' कहते हैं। (आन्ध्रप्रदेश के मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के प्रांगण में यह शक्तिपीठ है।) १६. नलहटी-यहां सती की 'उदरनली' गिरी थी। यहां सती 'कालिका' और शिव 'योगीश' कहे जाते हैं। (प. बंगाल) १७. मिथिला-यहां सती का 'वाम स्कन्ध' गिरा था। यहां शक्ति 'उमा' व 'महादेवी' और शिव 'महोदर' कहलाते हैं। (मिथिला, जनकपुर (नेपाल) और समस्तीपुर तीनों ही स्थानों पर यह शक्तिपीठ माना जाता है। इस सम्बन्ध में एकमत नहीं है।) १८. रत्नावली-यहां सती का 'दक्षिण स्कन्ध' गिरा था। यहा शक्ति 'कुमारी' तथा भगवान शंकर 'शिव' कहलाते हैं। (मद्रास) १९. प्रभास-यहां सती का 'उदर' गिरा था। यहां सती 'चन्द्रभागा' और शिव 'वक्रतुण्ड' के नाम से जाने जाते हैं। (गुजरात में गिरनार पर्वत पर अम्बाजी का मन्दिर) २०. जालन्धर-यहां सती का 'बायां स्तन' गिरा था। यहां सती 'त्रिपुरमालिनी' और शिव 'भीषण' नाम से जाने जाते है। (जालन्धर, पंजाब) २१. रामगिरि-यहां सती का 'दायां स्तन' गिरा था। यहां सती 'शिवानी' और शिव का रूप 'चण्ड' है। (कुछ विद्वान चित्रकूट के शारदा मन्दिर को और कुछ मैहर के शारदा मन्दिर को यह शक्तिपीठ मानते हैं) २२. वैद्यनाथ-यहां सती का 'हृदय' गिरा था। इसलिए इसे 'हृदयपीठ' या 'हार्दपीठ' भी कहते हैं। पद्मपुराण में कहा गया है-हृदयपीठ के समान शक्तिपीठ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है। यहां सती का नाम 'जयदुर्गा' और शिव का 'वैद्यनाथ' है। (बिहार, वैद्यनाथधाम) २३. वक्त्रेश्वर-यहां सती का 'मन' गिरा था। यहां सती को 'महिषमर्दिनी' और शिव को 'वक्त्रनाथ' कहा जाता है। (प. बंगाल) २४. कन्यकाश्रम-यहां सती की 'पीठ' गिरी थी। सती को यहां 'शर्वाणी' तथा शिव को 'निमिष' कहा जाता है। (तमिलनाडु में तीन सागरों के संगम-स्थल पर कन्याकुमारी मन्दिर स्थित भद्रकाली मन्दिर ही यह शक्तिपीठ है।) २५. बहुला-यहां सती का 'बायां हाथ' गिरा था। यहां सती को 'बहुला' तथा शिव को 'भीरुक' कहा जाता है। (प. बंगाल) २६. उज्जयिनी-यहां सती की 'कुहनी' गिरी थी। यहां सती का नाम 'मंगलचण्डिका' और शिव का 'मांगल्यकपिलाम्बर' है। (मध्य प्रदेश, उज्जैन, हरसिद्धि मन्दिर) २७. मणिवेदिक-यहां सती की 'दोनों कलाइयां' गिरी थी। यहां पर शक्ति 'गायत्री' एवं शिव 'सर्वानन्द' कहलाते हैं। (राजस्थान, पुष्कर के पास गायत्री मन्दिर) २८. प्रयाग-यहां सती के 'हाथ की अंगुली' गिरी थी। यहां सती को 'ललितादेवी' एवं शिव को 'भव' कहा जाता है। (तीर्थराज प्रयाग में अक्षयवट के निकट ललितादेवी का मन्दिर तो कुछ विद्वान अलोपी माता के मन्दिर को शक्तिपीठ कहते हैं।) २९. उत्कल-यहां सती की 'नाभि' गिरी थी। यहां शक्ति 'विमला' और शिव का 'जगत', जगन्नाथ' रूप है। (कुछ विद्वान उड़ीसा में जगन्नाथपुरी मन्दिर में विमलादेवी मन्दिर को और दूसरी मान्यता के अनुसार उड़ीसा में ही याजपुर में विरजादेवी मन्दिर को शक्तिपीठ माना जाता है।) ३०. कांची-यहां सती का 'कंकाल' गिरा था। सती यहां 'देवगर्भा' और शिव का 'रुरु' रूप है। (तमिलनाडु, कांची स्थित काली मन्दिर) ३१. कालमाधव-यहां सती का 'बायां नितम्ब' गिरा था। यहां सती को 'काली' तथा शिव को 'असितांग' कहा जाता है। इस शक्तिपीठ के स्थान के बारे में कुछ उल्लेख नहीं है। ३२. शोण-यहां सती का 'दक्षिण नितम्ब' गिरा था। यहां देवी 'नर्मदा' और 'शोणाक्षी' कहलाती है तथा शिव 'भद्रसेन' कहे जाते हैं। (कुछ विद्वान बिहार के सासाराम में और कुछ अमरकण्टक के नर्मदा मन्दिर को शोण शक्तिपीठ कहते हैं।) ३३. कामगिरि-यहां सती की 'योनि' गिरी थी। यहां सती 'कामाख्या' और शिव 'उमानाथ या उमानन्द' कहलाते हैं। देवीपुराण में सिद्धपीठों में कामरूप को सर्वोत्तम कहा गया है। (असम, कामरूप में नीलाचल पर्वत पर।) ३४. जयन्ती-यहां सती की 'बांयी जंघा' गिरी थी। यहां सती 'जयन्ती' और शिव 'क्रमदीश्वर' कहे जाते हैं। (मेघालय, जयन्तिया पर्वत) ३५. मगध-यहां सती की 'दक्षिण जंघा' गिरी थी। यहां शक्ति 'सर्वानन्दकरी' और शिव 'व्योमकेश' कहलाते हैं। (बिहार, पटना स्थित बड़ी पटनेश्वरी देवी मन्दिर) ३६. त्रिस्रोता-यहां सती का 'बायां पैर' गिरा था। यहां सती का नाम 'भ्रामरी' एवं शिव का नाम 'ईश्वर' है। (प. बंगाल) ३७. त्रिपुरा-यहां सती का 'दायां पैर' गिरा था। यहां देवी 'त्रिपुरसुन्दरी' और शिव 'त्रिपुरेश' कहे जाते हैं। (त्रिपुरा) ३८. विभाष-यहां सती का 'बायां टखना' गिरा था। सती यहां 'कपालिनी और भीमरूपा' और शिव 'सर्वानन्द और कपाली' कहे जाते हैं। (प. बंगाल) ३९. कुरुक्षेत्र-यहां सती का 'दायां टखना' गिरा था। यहां सती 'सावित्री और शिव 'स्थाणु' कहलाते हैं। (हरियाणा) ४०. युगाद्या-यहां सती के 'दांये पैर का अंगूठा' गिरा था। देवी यहां 'भूतधात्री' और शिव 'क्षीरकण्टक, युगाद्य' कहलाते हैं। (प. बंगाल) ४१. विराट-यहां सती के 'दांये पांव की अंगुलियां' गिरी थीं। यहां सती को 'अम्बिका' तथा शिव को 'अमृत' कहा जाता है। (राजस्थान) ४२. कालीपीठ-सती की 'शेष ऊंगलियां' यहां गिरी थी। सती यहां 'कालिका' और शिव 'नकुलीश' कहे जाते हैं। (कलकत्ता, कालीपीठ) ये ४२ शक्तिपीठ भारत में हैं। इन शक्तिपीठों के अतिरिक्त एक और शक्तिपीठ कर्नाटक में माना जाता है। यहां सती के 'दोनों कर्ण' गिरे थे। यहां सती को 'जयदुर्गा' और शिव को 'अभीरु' कहा जाता है। विदेशों में शक्तिपीठ ४३. मानस-यहां सती की 'दायीं हथेली' गिरी थी। यहां सती 'दाक्षायणी' और शिव 'अमर' कहलाते हैं। (तिब्बत, मानसरोवर के तट पर) ४४. लंका-यहां सती का 'नूपुर' गिरा था। सती यहां 'इन्द्राक्षी' और शिव 'राक्षसेश्वर' कहलाते हैं। (श्रीलंका) ४५. गण्डकी-यहां सती का 'दाहिना गाल' गिरा था। यहां सती 'गण्डकी' तथा शिव 'चक्रपाणि' कहलाते हैं। (नेपाल) ४६. नेपाल-यहां सती के 'दोनों घुटने' गिरे थे। यहां सती को 'महामाया' तथा शिव को 'कपाल' कहा जाता है। (नेपाल, गुह्येश्वरीदेवी मन्दिर) ४७. हिंगुला-यहां सती का 'ब्रह्मरन्ध्र' गिरा था। यहां सती 'भैरवी, 'कोट्टरी'' और शिव 'भीमलोचन' कहे जाते हैं। (पाकिस्तान, बलूचिस्तान के हिंगलाज में) ४८. सुगन्धा-यहां सती की 'नासिका' गिरी थी। यहां देवी 'सुनन्दा' तथा शंकर 'त्र्यम्बक' कहलाते हैं। (बंगलादेश) ४९. करतोयातट-यहां सती का 'वाम तल्प' गिरा था। सती यहां 'अपर्णा' तथा शिव 'वामन' रूप हैं। (बंगलादेश) ५०. चट्टल-यहां सती की 'दायीं भुजा' गिरी थी। यहां सती को 'भवानी' और शिव को 'चन्द्रशेखर' कहते हैं। (बंगलादेश) ५१. यशोर-यहां सती की 'बांयी हथेली' गिरी थी। यहां सती को 'यशोरेश्वरी' तथा शिव को 'चन्द्र' कहते हैं। (बंगलादेश) शक्तितत्त्व के द्वारा ही यह समूचा ब्रह्माण्ड संचालित होता है। शक्ति के अभाव में शिव में भी स्पन्दन सम्भव नहीं; क्योंकि शिव का रूप ही अर्धनारीश्वर है। कोई यह नहीं कहता कि वह ब्रह्महीन है या विष्णुहीन है या शिवहीन है अपितु यही कहा जाता है कि शक्तिहीन है। अत: सभी का अस्तित्व सर्वाराध्या, सर्वमंगलकारिणी एवं अविनाशिनी शक्ति के कारण ही है। या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:

+39 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 16 शेयर

किस कामना के लिए करें कौन से पुष्प से शिव पूजा???????? भगवान शिव पर फूल चढ़ाने का विशेष महत्व है । बिल्व पत्र और धतूरा भगवान शिव को विशेष प्रिय हैं । बिल्व पत्र समर्पित करते ही शिव पूजा पूरी और सफल हो जाती है । शिवजी के प्रिय पुष्प हैं—अगस्त्य, गुलाब (पाटला), मौलसिरी, कुशपुष्प, शंखपुष्पी, नागचम्पा, नागकेसर, जयन्ती, बेला, जपाकुसुम (अड़हुल), बंधूक, कनेर, निर्गुण्डी, हारसिंगार, आक, मन्दार, द्रोणपुष्प (गूमा), नीलकमल, कमल, शमी का फूल आदि । जो-जो पुष्प भगवान विष्णु को पसन्द है, उनमें केवल केतकी व केवड़े को छोड़कर सब शंकरजी पर भी चढ़ाए जाते हैं । भगवान शिव की पूजा में केतकी और केवड़े के पुष्पों का निषेध है। चम्पा के पुष्पों से शिव पूजन केवल भाद्रपदमास में किया जाता है । शिव सहस्त्रनाम या शिव अष्टोत्तरशतनाम के एक-एक नाम को बोलते हुए शिवजी पर पुष्प या बेल पत्र चढ़ाये जाते हैं । शिव पुराण में मनोकामना सिद्धि के लिए एक लाख पुष्पों द्वारा शिव पूजा का विधान है किन्तु आज के युग में इतने पुष्प एक साथ न मिलने से १००८ या १०८ पुष्पों द्वारा शिव पूजन किया जा सकता है । कमल, बिल्वपत्र, शंखपुष्पों से शिवजी का पूजन करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। यदि एक लाख पुष्पों से शिवजी का पूजन किया जाए तो सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । इतने पुष्प न हों तो एक सौ आठ पुष्प से भी पूजन किया जा सकता है । भगवान शिव को कमल कितने प्रिय हैं इससे सम्बन्धित एक कथा पुराणों में मिलती है । देवताओं के कष्ट दूर करने के लिए भगवान विष्णु प्रतिदिन शिव सहस्त्रनाम के पाठ से शिवजी को एक सहस्त्र कमल चढ़ाते थे । एक दिन भगवान शिव ने उनकी भक्ति की परीक्षा करने के लिए एक कमल छुपा दिया । एक कमल कम होने पर भगवान विष्णु ने अपना एक कमल-नेत्र शिवजी के चरणों में अर्पित कर दिया । यह देखकर भगवान विष्णु अत्यन्त प्रसन्न हुए और दैत्यों के विनाश के लिए उन्हें सुदर्शन चक्र प्रदान किया । भाद्रपदमास में कदम्ब और चम्पा से शिवपूजा करने से सभी इच्छाएं पूरी होती हैं । भगवान शिव पर बेला के फूल चढ़ाने से सुन्दर व सुशील पत्नी प्राप्त होती है । मुक्ति की कामना करने वाले मनुष्य को कुशा से शिवजी का पूजन करना चाहिए । पुत्र की इच्छा रखने वाले मनुष्य को लाल डंठल वाले धतूरे से शिवजी का पूजन करना चाहिए । यश प्राप्ति के लिए अगस्त्य के फूलों से शिव पूजन करना चाहिए !!!!!!! तुलसीपत्र और मंजरियों से शिवजी की अर्चना करने से भोग और मोक्ष दोनों ही प्राप्त होते हैं । लाल और सफेद आक, अपामार्ग और श्वेत कमल के फूलों से शिवपूजन से मनुष्य भोग और मोक्ष प्राप्त करता है । काम-क्रोधादि के नाश के लिए मनुष्य को भगवान शिव की जपाकुसुम (अड़हुल) के पुष्पों से पूजा करनी चाहिए । रोग नाश और उच्चाटन आदि के लिए कनेर के फूलों से शिव पूजन करना चाहिए । बन्धूक (दुपहरिया) के पुष्पों से पूजा करने पर मनुष्य को आभूषणों की प्राप्ति होती है । चमेली के पुष्पों से शिव पूजन से वाहन की प्राप्ति होती है । अलसी के फूलों से महादेवजी का पूजन करने वाला मनुष्य भगवान विष्णु को प्रिय होता है । शमी पत्रों से पूजन अनेक प्रकार के सुख व मोक्ष देने वाला है । जूही के फूलों से पूजा की जाए तो घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती । सुन्दर नए वस्त्र व सम्पत्ति की कामना पूर्ति के लिए कर्णिकार (कनेर) के फूलों से भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए । निर्गुण्डी के पुष्पों से शिव पूजन करने से मन पवित्र व निर्मल हो जाता है । बिल्व पत्रों के पूजन करने से भगवान शिव समस्त मनोकामना पूर्ण करते हैं । हरसिंगार के पुष्पों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति की वृद्धि होती है । ऋतु अनुसार पुष्पों से शिवपूजन करने से संसार के आवागमन से मनुष्य मुक्त हो जाता है । राई के फूलों से शिवजी की पूजा से शत्रुओं का नाश होता है । आयु की इच्छावाला पुरुष एक लाख दूर्वाओं से शिवजी का पूजन करे । भगवान शिव का पुष्पार्चन करते समय यह ध्यान रखें कि पुष्प स्वयं के पैसे से खरीदे गए हों, दूसरों के बगीचे से बगैर पूछे तोड़े गए पुष्पों से शिव पूजा सफल नहीं होती है । स्वयं भगवान शिव ने पुष्पदंत गंधर्व से कहा–’अपने आराध्य की स्तुति अपने श्रम से प्राप्त पदार्थ से करनी चाहिए । चोरी के पुष्पों से की गयी मेरी अर्चना मुझे पसन्द नहीं आती है।

+8 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 4 शेयर

केदारनाथ जहां आज भी इन्द्र नित्य शिवपूजन के लिए आते हैं!!!!!!!! चारों तरफ भीषण प्राकृतिक आपदा, अलकनन्दा की सुनामी में तीन ओर से ताश के पत्तों की तरह बहते पर्वत और भवन; लेकिन बीच में अडिग खड़े केदारेश्वर जिनके निवास का एक पत्थर भी न हिला सका ये जलजला । क्या है इसका राज, जानते हैं इस पोस्ट में । देवता, असुर और मनुष्य—सभी भगवान शिव की पूजा करते हैं । अत: सारी त्रिलोकी शिव से व्याप्त है । यद्यपि पृथ्वी पर असंख्य शिवलिंग हैं तथापि उनमें प्रधान बारह ज्योतिर्लिंग हैं । उनमें से एक पर्वतराज हिमालय के केदार नामक चोटी पर स्थित ‘केदारनाथ’ या ‘केदारेश्वर’ है । भगवान शिव सम्पूर्ण संसार के कल्याण की कामना से युग-युग में हिमालय के केदार क्षेत्र में केदारनाथ के रूप में पृथ्वी पर अवस्थित हैं । यहां भगवान शिव का नित्य सांनिध्य माना जाता है । भगवान विष्णु के अवतार नर-नारायण ने बदरिकाश्रम में तप किया । वे नित्य पार्थिव शिवलिंग की पूजा करते थे और भगवान शिव नित्य ही उस लिंग में आते थे । एक दिन भगवान शिव ने प्रकट होकर उनसे वर मांगने को कहा । नर-नारायण ने कहा—‘भगवन् ! यदि आप प्रसन्न हैं तो आप अपने स्वरूप से यहीं प्रतिष्ठित हो जाएं और भक्तों के दु:खों को दूर करते रहें । तब से भगवान शंकर ज्योतिर्लिंग के रूप में वहां प्रतिष्ठित हो गये । सत्ययुग में उपमन्युजी ने यहीं भगवान शंकर की आराधना की थी । द्वापर में पाण्डवों ने यहां तपस्या कर दु:खों से मुक्ति पाई । पाडवों के प्रार्थना करने पर भगवान शिव नीचे की ओर मुख कर वहां स्थित हो गये । केदारनाथ में कोई मूर्ति नहीं है । पांच मुखों से युक्त बहुत बड़ा तिकोना पर्वत खण्ड (शिला) है। स्कन्दपुराण के अनुसार प्राचीनकाल में स्वायम्भुव मन्वन्तर में हिरण्याक्ष नाम का एक महाबली और महातेजस्वी दैत्य था । उसने अपने तप के बल से इन्द्र को स्वर्ग से निकाल दिया और त्रिलोकी पर अपना अधिकार जमा लिया । देवताओं के साथ इन्द्र गंगाद्वार (गंगोत्री) में आकर तप करने लगे । एक दिन इन्द्र के तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव महिष (भैंसे) का रूप धारण कर इन्द्र के पास आये और कहा—‘के दारयामि ?’ अर्थात्—‘मैं इस रूप (महिष रूप) में सभी दैत्यों में से किस-किस को जल में विदीर्ण कर डालूं ?’ इन्द्र ने कहा—‘प्रभो ! आप हिरण्याक्ष, सुबाहु, वक्त्रकन्धर, त्रिश्रृंग और लोहिताक्ष—इन पांच दैत्यों का वध कर दीजिए क्योंकि इनके मरने पर और दैत्य अपने-आप मरे के समान हो जायेंगे ।’ तब भगवान शिव उस स्थान पर गये जहां हिरण्याक्ष आदि दैत्य थे । उस भयानक भैंसे को देखकर सभी दैत्य उसे पत्थरों और डण्डों से पीटने लगे । भगवान शिव ने महिष रूप में अपने सींगों के वार से एक ही बार में हिरण्याक्ष सहित पांचों दैत्यों का वध कर दिया । इसके बाद भगवान शिव ने इन्द्र के पास आकर कहा—‘मैंने पांचों दैत्यों का वध कर दिया है, अब तुम पुन: त्रिलोकी का राज्य करो और मुझसे कोई दूसरा वर मांगना चाहो तो मांग लो ।’ इन्द्र ने कहा—‘भगवन् ! आप त्रिलोकी की रक्षा, कल्याण और धर्म-स्थापना के लिए इसी रूप में यहां निवास कीजिये ।’ भगवान केदारेश्वर के दर्शन और वहां का जल पीने से नहीं होता है पुनर्जन्म,भगवान शिव ने कहा—‘यह रूप तो मैंने दैत्यों के वध के लिए रखा था लेकिन तुम्हारी इच्छा के अनुसार अब मैं इसी रूप में यहां निवास करुंगा ।’ ऐसा कहकर भगवान शिव ने एक सुन्दर कुण्ड प्रकट किया जो दूध के समान स्वच्छ जल से भरा हुआ था । भगवान शिव बोले—‘जो कोई भी मेरा दर्शन करके इस कुण्ड का दर्शन करेगा तथा दायें-बायें दोनों हाथों की अंजलि से तीन बार इस कुण्ड का जल पीयेगा, वह तीन कुल के पितरों को तार देगा । बायें हाथ से जल पीकर मातृ पक्ष का, दायें हाथ से जल ग्रहण करने पर पिता-पितामह आदि का तथा दोनों हाथों से जल पीकर अपने-आप का उद्धार करेगा ।’ महिषरूपधारी भगवान शंकर के विभिन्न अंग पांच स्थानों में प्रतिष्ठित हुए जो ‘पंच केदार’ माने जाते हैं । इन्द्र ने कहा—‘भगवन् ! मैं प्रतिदिन स्वर्ग से यहां आकर आपकी पूजा करुंगा और इस कुण्ड का जल भी पीऊंगा । आपने महिष के रूप में यहां आकर ‘के दारयामि’ कहा है, इसलिए आप केदार नाम से प्रसिद्ध होंगे ।’ भगवान शिव बोले—‘यदि तुम ऐसा करोगे तो तुम्हें दैत्यों का भय नहीं रहेगा और तुम्हारा शरीर अत्यन्त तेजयुक्त हो जायेगा ।’ केदारनाथ जहां आज भी इन्द्र नित्य शिवपूजन के लिए आते हैं!!!!!!! इन्द्र ने भगवान केदारेश्वर के लिए एक सुन्दर मन्दिर का निर्माण कराया और स्वर्गलोक चले गये । तब से प्रतिदिन नियमपूर्वक आकर वे भगवान शिव की पूजा करते हैं और उस कुण्ड का तीन बार जल ग्रहण कर स्वर्ग लोक लौट जाते हैं । एक दिन जब इन्द्र पूजा के लिए आये तो देखते हैं कि सारा गिरिशिखर, भगवान का विग्रह, मन्दिर, कुण्ड—सब बर्फ से ढक गया है । तब वे अत्यन्त दु:खी होकर भगवान के विग्रह की दिशा को नमस्कार कर इन्द्रलोक लौट गये । इस प्रकार चार महीने तक वे प्रतिदिन आते और शिवजी को न देखकर उस दिशा को प्रणाम करके लौट जाते । जब गर्मी का मौसम आया तब उन्हें भगवान केदारेश्वर के विग्रह का दर्शन हुआ । उन्होंने बड़े समारोहपूर्वक गाजे-बाजे के साथ पूजा की । भगवान शिव ने फिर प्रसन्न होकर इन्द्र से वर मांगने को कहा । इन्द्र ने कहा—‘भगवन् ! यह पर्वत चैत्र मास से लेकर आठ मास तक बड़ा मनोरम रहता है, फिर वृश्चिक की संक्रान्ति से लेकर कुम्भ की संक्रान्ति तक यह मेरे लिए भी अगम्य हो जाता है, तब साधारण मनुष्य की तो बात ही क्या है । अत: इन चार महीनों में आप इसी रूप में मृत्युलोक में कहीं और निवास करें जिससे मेरे नित्यपूजन की प्रतिज्ञा में कोई बाधा न हो ।’ भगवान शिव ने कहा—‘आनर्तदेश में हमारा हाटकेश्वर क्षेत्र है, वहां मैं वृश्चिक की संक्रान्ति से लेकर कुम्भ में सूर्य रहते हुए सदा निवास किया करुंगा । अत: वहां मेरा मन्दिर बनवा कर उसमें मेरे स्वरूप की प्रतिष्ठा करके मेरी पूजा करते रहना । तुम्हारे लिए मैं अपना तेज उस शिवलिंग में स्थापित कर दूंगा ।’ भगवान शिव के वचनानुसार इन्द्र ने हाटकेश्वर में मन्दिर बनवा कर शिवजी के केदार स्वरूप को स्थापित किया । साथ ही एक कुण्ड का निर्माण करा कर उस जल से स्नान कर तीन बार जल भी पीया । इन्द्र की आराधना से संतुष्ट होकर भगवान केदार क्षेत्र में पधारे । जब तक गर्मी और वर्षा रहती है, तब तक तो भगवान शिव हिमालय के केदार क्षेत्र में रहते हैं किन्तु शीत काल में हाटकेश्वर क्षेत्र में चले आते हैं । (जाड़ों में केदारनाथजी की चल मूर्ति ऊषीमठ आ जाती है । यहीं शीत काल भर उनकी पूजा होती है ।) जो मनुष्य भगवान केदारेश्वर की आराधना करता है और वहां का जल पीता है, फिर उसका पुनर्जन्म नहीं होता है । जो भक्त केदारनाथ की यात्रा करते हुए रास्ते में मृत्यु को प्राप्त होते हैं, वे भी मुक्त हो जाते हैं । केदारेश्वर की पूजा करने वाले को स्वप्न में भी किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता है । उनके पुत्र-पौत्र की वृद्धि होती है । भगवान केदारनाथ की इस कथा को पढ़ने-सुनने से मनुष्य के सारे पापों का नाश हो जाता है।

+20 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 8 शेयर

रामचरितमानस सबसे पहले किसने सुनी?रामचरित मानस का प्रथम श्रोता कौन था? रचि महेश जिन मानस राखा। पाइ सुसमय सिवा सन भाषा।। ताते रामचरितमानस वर।धरेउ नाम हियॅ हेरि हरषि हर। उपरोक्त चौपाई के अर्थ से यह ज्ञात होता है कि भगवान शिव ने मानस की रचना करने के पश्चात् उसे सर्व प्रथम माता पार्वती जी को सुनाया। परंतु सुनु शुभ कथा भवानि, रामचरितमानस विमल। कहा भुसुण्डि बखानि, सुना बिहग नायक गरूड। इस सोरठे के भाव से यह सिद्व होता है कि शिव जी के द्वारा माता पार्वती को यह कथा सुनाने के पूर्व ही इस राम कथा को श्री कागभुसुण्डी जी महाराज ने कहा, जिसे पक्षीराज गरूण जी महाराज ने सुना था। फिर उपर की चैपाई में माता पार्वती जी के श्रवण की बात क्यों लिखी गयी। उत्तर- _सचमुच यह प्रश्न बड़ा गंभीर है कि श्रीरामचरितमानस का सर्वप्रथम श्रोता किसे ठहराया जाय। मानस के रचयिता शिवजी हैं यह बात तो बिल्कुल निर्विवाद है, परन्तु उन्होंने मानस की रचना करने के बाद सर्व प्रथम उसे कागभुसुण्डी जी को प्रदान किया अथवा माता पार्वती जी को सुनाया, इसी विषय का विचार करना है। इस बात का निर्णय करने के लिए जब हम सम्पूर्ण मानस ग्रन्थ की छान-बीन करते हैं तो यही पता चलता है कि शिवजी ने जिस समय यह कथा माता पार्वती जी को सुनायी थी, उसके प्रथम ही वे स्वयं श्री नीलाचल (काकभुसुण्डि जी के आश्रम ) पर जाकर हंस रूप से उस कथा को सुन आये थे, और भुसुण्डी जी, जिन्होंने हंसरूप भगवान शिवजी को यह कथा सुनायी थी, श्री गरूण जी के प्रति यह कथन किया है कि उन्हे यह कथा रामचरितमानस आज से सत्ताइस कल्प पहले भगवान शिवजी की कृपा से महर्षि लोमश ऋषि के द्वारा प्राप्त हुई थी। इन सभी बातों का प्रमाण श्रीरामचरितमानसमें ही मौजूद है। उन्हें क्रमशः देखिये -- सुन शुभ कथा भवानि, रामचरितमानस विमल। कहा भुसुण्ड बखानि सुना बिहग नायक गरूड। सो संवाद उदार जेहिं भा आगे कहब। सुनहु राम अवतार चरित परम सुन्दर अनघ। उत्तरकाण्ड में पुनः शिवजी का वचन माता पार्वती के प्रति, जिसमें उनके हंस रूप होकर काग भुसुण्डी जी से कथा सुनने का प्रमाण है। तब कछु काल मराल तनु धरि तहॅ कीन्ह निवास। सादर सुनि रघुपति गुन पुनि आयउॅ कैलाश। उत्तरकाण्ड में श्री कागभुसुण्डी जी का कथन, जिसमें सत्ताइस कल्प पहले श्रीरामकथा प्राप्त होने की बात है। इहाॅ बसत मोहि सुनु खग ईसा। बीते कलप सात अरू बीसा। उत्तरकाण्ड में ही दोहा क्रमांक 112 व 113 के बीच में श्री लोमश जी का वचन श्रीकागभुसुण्डीजी के प्रति- रामचरित सर गुप्त सुहावा। शंभू प्रसाद तात मैं पावा। तोहि निज भगत राम कर जानी। ताते मै सब कहेउॅ बखानी। अब इन सब के पूर्व माता पार्वती जी को कथा श्रवण कराने में जो वाक्य प्रमाण हैं वे इस प्रकार हैं- रचि महेश निज मानस राखा। पाइ सुसमय शिवा सन भाषा। शंभु कीन्ह यह चरित सुहावा। बहुरि कृपा करि उमहिं सुनावा। सोई सिव कागभुसुण्डुहिं दीन्हा। राम भगत अधिकारी चीन्हा। तेहिं सन जगबालिग पुनि पावा। तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा।। इन चैपाइयों में शिवा सन भाषा और उमहिं सुनावा के पश्चात सोई शिव कागभुसुण्डहिं दीन्हा। पढ़ने पर यह अनुमान होने लगता है कि पहले पहल माता पार्वती जी को ही यह श्रीराम कथा रूपी महाप्रसादी प्राप्त हुई थी, इसलिए इस विरोधाभास का निराकरण करने के लिए दो बातों का आधार दिखलाते हुए निर्णय लिया जा रहा है। वे दोनो बातें निम्नलिखित हैं- पहली बात तो यह है कि इस श्रीरामचरितमानस की रचना जब शिव जी ने की, तब वह भुसुण्डि आश्रम का निर्माण होने के सत्ताइस कल्प पहले किस कल्प में हुए अवतार चरित्र के आधार पर रचा गया था। जब हम इस प्रश्न का उत्तर तलाशते हैं, तो पता चलता है कि जिस कल्प में श्री नारद जी को मोह और उनके शाप के द्वारा भगवान विष्णु का श्रीराम रूप में अवतार हुआ था , उसी कल्प में श्रीरामचरित मानस की रचना हुई थी। इसका प्रमाण उत्तरकाण्ड की चैपाइयां है जो मानस के मुख्य हृदय में हैं , एवं जिनमें काग भुसुण्डि द्वारा श्री गरूड जी को पूरा श्रीरामचरितमानस सुनाने की बात वर्णित है। प्रथमहिं अति अनुराग भवानी। रामचरित सर कहेसि बखानी। पुनि नारद कर मोह अपारा। कहेसि बहुरि रावन अवतारा। प्रभु अवतार कथा पुनि गाई। तब शिशु चरित कहेसि मन लाई। इसका तात्पर्य यह कि जिस श्रीरामचरितमानस को भगवान शिव ने लोमश ऋषि द्वारा काग भुसुण्डी को प्रदान किया था, उसमे रामावतार हेतु केवल नारद मोह ही था। उस चरित में नारद के शाप से ही दो शिव गण रावण और कुम्भकरण हुए थे, और जब शिवजी ने मातापार्वती जी को उस चरित्र को सुनाया है, तब अवतार हेतु कथन में नारद मोह के साथ ही साथ तीन कल्पों के तीन और हेतुओं को भी शामिल कर दिया गया। वे कारण इस प्रकार हैं- जय और विजय का रावण व कुम्भकरण होना, दूसरा जालन्धर राक्षस का रावण होना और तीसरा राजा भानुप्रताप और उनके भाई अरिमर्दन का रावण और कुम्भकरण होना। बालकाण्ड में चार कल्पों के चारों हेतुओं का प्रमाण मौजूद है। अतः निष्कर्ष यह निकलता है कि भगवान शिव ने श्री रामचरितमानस को नारद मोह के हेतु से हुए अवतार काल में ही रचकर निज मानस में रख लिया था। यथा रचि महेश निज मानस राखा, और उनके अनेक कल्प बाद प्रताप भानु वाले कल्प में जिस कल्प में मनु और सतरूपा दशरथ और कौशल्या हुए थे। जब सती जी को मोह हुआ और अपने पिता दक्ष के यहां शरीर त्यागकर उन्होंने पार्वती जी के स्वरूप में दूसरा जन्म ग्रहण किया। तब श्री शिवजी जी ने अवसर पाकर उनसे उस मोह की निवृत्ति के लिए उन्हें इस रामचरितमानस को सुनाया। उस समय भगवान शिव जी ने स्वरचित चरित्र के हेतु- प्रकरण सुनाना उचित समझा, जिसमें सती जी को मोह हुुआ था। साथ ही साथ उन्होंने जय-विजय और जालन्धर के हेतुओं को भी इसलिए ले लिया कि उन कल्पों में भगवान विष्णु का अवतार हुआ था, जिसके कारण सती को शंका हुई थी। बिष्णु जो सुर हित नर तन धारी। सोउ सर्वग्य जथा त्रिपुरारी।। अतः श्री शिव जी को उनकी वह शंका भी निवृत्त करनी थी।अब यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि यह कथा श्री कागभुसुण्डी जी को माता पार्वती जी के श्रवण काल के सत्ताइस कल्प पहले ही लोमश ऋषि के द्वारा प्राप्त हो चुकी थी। उसी कथा को श्री कागभुसुण्डी जी महाराज नीलगिरि पर्वत पर, जिसके एक योजन तक चारो ओर माया नहीं व्यापती थी, सदैव कथन किया करते थे और गरूणजी शिवजी के उपदेश से उनके पास जाकर वही कथा श्रवण की थी। सतीजी के शरीर त्याग के कारण उनसे वियोग हो जाने के काल में एक बार शिव जी ने भी नीलगिरि पर्वत पर जाकर अपने द्वारा प्रदान की गयी श्रीरामकथा को बड़े प्रेम से सुना था, और वे उसी का हवाला माता पार्वती जी को दे रहे है। सुन शुभ कथा भवानि, रामचरितमानस विमल। कहा भुसुण्ड बखानि सुना बिहग नायक गरूड। दूसरी बात यह है कि-यद्यपि सिवा सन भाषा और उमहिं सुनावा वाली दोनों चौपाइयां पहले पड़ी हैं, परन्तु काव्य कुशल कवि प्रातः स्मरणीय गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने अपनी अद्भूत एवं अनुपम बुद्विमत्ता से दोनों में दो शब्द ऐसे रख दिये हैं, जो कथन क्रम को स्पष्टतया विलग कर देते हैं। पहली चैपाई में ‘पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा’ के द्वारा यह सूचित किया है कि जब सुसमय आया तो उन्होंने अवसर के अनुकूल प्रयोजनार्थ सिवा से कथन किया। यानि कहा।इसी प्रकार दूसरी चैपाई में बहुरि शब्द देकर ‘बहुरि कृपा करि उमहिं सुनावा’। इसमें यह संकेत किया गया है कि बहुरि अर्थात पुनः सर्वप्रथम नहीं कृपा करके मोह निवृत्ति के लिए माता पार्वती जी को समयानुसार कथा सुनाया। अतः वाक्यो का समन्वय होकर यह सिद्व हुआ कि भगवान शिव जी ने निज रचित श्रीरामचरितमानस श्रीकागभुसुण्डीजी महाराज को महर्षि लोमश जी के द्वारा बहुत पहले ही प्रदान कर दिया गया था और पार्वती जी को उन्होंने पीछे अवसर पाकर सुनाया।

+3 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 4 शेयर

मित्रो आज मंगलवार है, आज हम सब मिलकर रामभक्त पवनकुमार हनुमानजी महाराज की भक्ति करेंगे, आज हम आपको बतायेगें कि हनुमानजी अजर अमर यानी चिरंजीवि कैसे हुए????? आठ महामानवों को पृथ्वी पर चिरंजीवि माना जाता है- अश्वत्थामा, बलि, व्यासजी, हनुमानजी, विभीषण, परशुरामजी, कृपाचार्य और महामृत्युंजय मंत्र के रचयिता मार्कंडेय जी। हनुमानजी के चिरंजीवि होने की कथा संक्षेप में सुनाता हूं। आप यदि इस रहस्य को समझना चाहते हैं तो पूरे भाव से और पूरे धैर्य से पढ़ें- कथा को कभी रामचरितमानस की चौपाइयों और रामायण के उद्धरणों के साथ विस्तार से भी सुनाऊंगा उसमें आपको ज्यादा आनंद आएगा। हनुमानजी सीताजी को खोजते-खोजते अशोक वाटिका पहुंच गए। विभीषणजी से उन्हें लंका के बारे में संक्षिप्त परिचय प्राप्त हो ही चुका था। पवनसुत ने भगवान श्रीराम द्वारा दी हुई मुद्रिका चुपके से गिराई। रामचरित मानस को देखें तो हनुमानजी के अशोक वाटिका में पहुंचने के प्रसंग से ठीक पहले का प्रसंग है रावण के वहां अपनी रानियों और सेविकाओं के साथ आने का। वह माता सीता को तरह-तरह का प्रलोभन देता है उन्हें पटरानी बनाने की बात कहता है और समस्त रानियों को उनकी सेवा में तैनात कर देने की बात कहता है। परंतु सीताजी प्रभावित नहीं होतीं तो वह उन्हें डराने का दुस्साहस करता है. चंद्रमा के समान तेज प्रकाशवान चंद्रहास खड़ग निकालकर माता को डराता है और उन्हें एक मास का समय देता है विचार का, उसके बाद वह या तो उनके साथ बलपूर्वक विवाह करेगा अन्यथा वध कर देगा। माता सीता सशंकित है कुछ भयभीत भी. संकट के समय में भयभीत होना सहज स्वभाव है. तभी हनुमानजी वहां पहुंचे हैं. वृक्ष पर छुपकर बैठे हैं और उचित समय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। हनुमानजी के साथ तीन उलझनें हैं- पहला तो माता सीता बहुत भयभीत हैं इसलिए यदि वह अचानक वहां पहुंच जाएं तो उन्हें देखकर माता और भयाक्रांत हो जाएंगी। हनुमानजी तो स्वयं को सेवक के भाव से देखते थे। सेवक अपने स्वामी के आदेश से आया है वह भी उसकी प्राणप्रिया की सुध लेने। जिसकी सुध लेने आया है उसे भयभीत कैसे कर दें। दूसरी उलझन, हनुमानजी के समक्ष एक उलझन है कि माता के समक्ष प्रथम बार जा रहा हूं. वानरकुल को ऐसे ही अशिष्ट माना जाता है. कहीं माता मेरे किसी आचरण को अशिष्टता या उदंडता न समझ लें. अगर आज के तौर-तरीके में कहूं तो उनके समक्ष भी वही उलझन है जो हमारे समक्ष होती है- तो क्या सर्वथा उचित व्यवहार, संबोधन आदि होगा. यह सब सोच रहे हैं। तीसरी उलझन, मैं किस भाषा का प्रयोग करूं अपनी बात कहने के लिए. रावण को उन्होंने उत्तम संस्कृत भाषा का प्रयोग करते सुना है. तो यदि वह भी संस्कृत भाषा बोलते हैं तो कहीं उन्हें भी रावण का भेजा हुआ कोई मायावी समझकर माता क्रोध में चिल्लाने लगें और रक्षकों की नींद खुल जाए. किष्किंधा की बोली का प्रयोग करूं तो माता के लिए यह अपिरिचत लगेगा. बहुत विचार करने पर वह अयोध्या की भाषा का प्रयोग करते हैं। संवाद बहुत काम करता है. जब ऋष्यमूक पर उनकी भेंट श्रीराम-लक्ष्मणजी से हुई थी तो वह एक ब्राह्मण का वेष धरकर पहुंचे थे और उत्तम संस्कृत भाषा का प्रयोग कर रहे थे तब श्रीराम ने कहा था कि इनकी वाणी में जितनी मिठास है उतनी ही सुंदर शैली, उतना ही उच्चकोटि का व्याकरण प्रयोग. ऐसे व्यक्ति यदि जिस राजा के मंत्री हों वह राजा कभी दुखी हो ही नहीं सकता। तो हनुमानजी ने मुद्रिका गिराई और माता की प्रतिक्रिया को बड़े गहराई से देखा. * तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर।। चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥ तब उन्होंने राम-नाम से अंकित अत्यंत सुंदर एवं मनोहर श्रीरामजी की अँगूठी देखी. अँगूठी को पहचानकर सीताजी आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगीं और हर्ष तथा विषाद से हृदय में अकुला उठीं. माता विभोर हैं, चकित हैं कि ये कहां से आई। यदि रामनाम के रस में डूबते हैं या रामनाम रसधारा की महिमा का आनंद लेना है तो इन तीन चौपाइयों के लिए आप तुलसीबाबा को उनकी भक्ति को देखते हुए श्रीहनुमानजी के समकक्ष रामभक्त मान लेंगे। जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥ सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥ सीताजी विचारने लगीं- श्री रघुनाथजी तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें कौन जीत सकता है? और माया से ऐसी अँंगूठी बनाई ही नहीं जा सकती. सीताजी मन में अनेक प्रकार के विचार कर रही थीं. इसी समय हनुमान्‌जी मधुर वचन बोले- रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥ लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई॥ वे श्री रामचंद्रजी के गुणों का वर्णन करने लगे, (जिनके) सुनते ही सीताजी का दुःख भाग गया. वे कान और मन लगाकर उन्हें सुनने लगीं. हनुमान्‌जी ने आदि से लेकर अब तक की सारी कथा कह सुनाई। हनुमानजी को इसीलिए तो मैं कम्युनिकेशन का मास्टर कहता हूं. कम्युनिकेशन में सिर्फ यही मायने नहीं रखता कि कैसे अपनी बात रखकर किसी को प्रभावित किया जाए बल्कि किस स्थिति में किसके साथ किस प्रकार का आचरण करें. सीताजी पीड़ी में हैं, आत्मनाश तक के भाव से ग्रसिंत हो रही हैं उसी समय हनुमानजी उन्हें आनंदित करते हैं, उनके मुख पर मुस्कान ला देते हैं. आप ही निर्णय़ करें क्या हनुमानजी से बेहतर कम्युनिकेशन का कोई उदाहरण मिलता है। श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कही सो प्रगट होति किन भाई॥ तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ ।। (सीताजी बोलीं-) जिसने कानों के लिए अमृत रूप यह सुंदर कथा कही, वह हे भाई! प्रकट क्यों नहीं होता? तब हनुमान्‌जी पास चले गए. उन्हें देखकर सीताजी फिरकर (मुख फेरकर) बैठ गईं? उनके मन में आश्चर्य हुआ। अब देखिए अपने चातुर्य, अपनी बुद्धि का कैसा सुंदर परिचय हनुमानजी देते हैं. इस दोहे को पढ़ते तो मेरे रोंगटे हर्ष से खड़े हो जाते हैं। रामदूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥ यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥ (हनुमान्‌जी ने कहा-) हे माता जानकी मैं श्री रामजी का दूत हूँ. करुणानिधान के सत्यशपथ के साथ कहता हूँ- हे माता! यह अँगूठी मैं ही लाया हूँ. श्री रामजी ने मुझे आपके लिए यह सहिदानी (निशानी या पहिचान) दी है। कह माता सीता ने उसे तत्काल पहचान लिया. वैसे तो सुग्रीव ने हर दिशा में दूत भेजे थे पर प्रभु श्रीराम जानते थे कि उनकी प्राणप्रिया के पास पहुंचेंगे तो बस हनुमानजी. सीताजी उस समय क्या सोचेंगी वह भी प्रभु जानते थे. इसलिए उन्होंने हनुमानजी को पति-पत्नी के बीच का Code भी बता दिया था. दो अतिशय प्रिय व्यक्तियों के बीच एक कोड होता है, विश्वास का कोड ताकि कभी कहीं कोई मायावी अपनी माया फैलाए तो उससे परख सकें. मैंने सुना है पति-पत्नी के बीच भी कोड होता है। तो वह कोड क्या है जिसके कारण सीताजी को एक सेकेंड नहीं लगा यह निर्णय करने में कि यह वानर मायाजीव नहीं रामदूत हैं। हनुमानजी ने कहा- अतिशय प्रिय करूणानिधान की. करूणानिधान संसार में सिर्फ माता सीता ही श्रीराम को एकांत में कहती थीं. उसके अलावा और कोई नहीं. माता ने जब यह सुना तो उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया कि यह कोई मायावी वानर नहीं श्रीराम का सेवक ही है। माता ने अपने नाथ का कुशलक्षेम पूछा. हनुमानजी ने उनकी विरह वेदना बताई कि हे माता आपके विरह में प्रभु इतने दुर्बल हो गए हैं कि जो मुद्रिका मैं लेकर आया हूं वह अब उनकी उंगलियों में नहीं आते बल्कि कंकण यानी कंगन की तरह पहनने योग्य हो गए हैं। इस प्रसंग को संक्षेप में छोड़ रहा हूं क्योंकि यह इतना सरस है कि इस पर ही लिखूं तो एक पोस्ट कम पड़ जाए. पोस्ट लंबी हो जाए तो प्रेमीजन पढ़ते नहीं तो इसे अभी विराम देता हूं। फिर कभी लिखा जाएगा कि कैसे प्रभु की अंगूठी भगवान के लिए कलाई में धारण करने योग्य कंगन जैसी हो गई है। हनुमानजी ने प्रभु का संदेश माता को दिया। माता का कुशलक्षेम पूछा. माता से आज्ञा लेकर वाटिका के फल खाए. हनुमानजी ने फल इसलिए खाए क्योंकि माता को आशंका थी कि हनुमानजी जैसे वानरों के सहयोग से क्या प्रभु रावण को जीत सकेंगे। माता पूछती हैं कि क्या सारे वानर तुम्हारे ही जैसे हैं. तो हनुमानजी कहते हैं कुछ मेरे से छोटे भी हैं. तो माता को शंका होती है कि फिर कैसे होगा? हनुमानजी ज्ञानियों के बीच अग्रगण्य हैं यानी ज्ञानीजनों में भी श्रेष्ठ हैं और कम्युनिकेशन के मास्टर तो हैं ही.लका पार करके वह अपने सामर्थ्य शक्ति का परिचय दे चुके हैं. अपनी बातों से माता को प्रभावितकर वाकशक्ति को सिद्ध कर चुके हैं अब उन्हें अपने मित्रों-साथियों की शक्ति का भीतो परिचय देना है। इसके साथ-साथ रामदूत हनुमानजी को शत्रु के मन में श्रीराम की शक्ति का प्रदर्शन कर एक चेतावनी भी देनी थी. राक्षसों के मन में प्रभु का भय न पैदा करें, ऐसा कैसे संभव था? हनुमानजी ने फल खाने के बहाने वाटिका में इतना उत्पात मचाया कि रावण ने अपने परमवीर पुत्र अक्षय कुमार को हनुमानजी को पकड़ने भेजा। रावण का अजेय पुत्र अक्षय कुमार बजरंग बली के हाथों मारा गया. अक्षय जैसे वीर का वध एक वानर ने कर दिया, यह सोचकर रावण घबरा गया। उसने इंद्रजीत को हनुमानजी को पकड़ने भेजा. इंद्रजीत को भी हनुमानजी ने नाकों चने चबवा दिए. हारकर उसने पवनसुत पर ब्रह्मास्त्र चलाया. ब्रह्मास्त्र का मान रखने को हनुमानजी अल्प मूर्च्छा में आए तो नागपाश में इंद्रजीत ने उन्हें बांध लिया। हनुमानजी को रावण के दरबार में लाया गया. एक झटके में ही उन्होंने खुद को मुक्त कर लिया। रावण ने इंद्रजीत को हनुमानजी का वध करने को कहा लेकिन विभीषण ने समझाया कि दूत का वध करना पाप है. बौखलाए रावण ने अंगभंग की सजा सुनाई. हनुमानजी की पूंछ में आग लगाने की सजा मिली। राक्षसों ने बजरंग बली की पूंछ में कपड़ा और तेल लपेटकर पूरी लंका में घुमाया. इस प्रकार हनुमानजी ने पूरी लंका देख ली. सीताजी को भी सूचना मिली कि रावण हनुमानजी की पूंछ में आग लगाने वाला है. इससे वह बहुत व्यथित हुईं। माता ने अग्निदेव की प्रार्थना की. अग्निदेव प्रकट हुए तो माता ने कहा- अग्निदेव यदि मैं सच्ची पतिव्रता हूं तो आप मेरे पुत्र हनुमान को अपने तेज से पीड़ित मत कीजिएगा। अग्निदेव ने कहा- ऐसा ही होगा माता. आप चिंता न करें. आपने जिसे पुत्र माना है वह श्रीराम का कार्य करने आए हैं. उनके कार्य में बाधा हो ही नहीं सकती। हनुमानजी ने पूरी लंका का निरीक्षण कर लिया उसके बाद घूम-घूमकर पूरी लंका जला दी. माता की कृपा से पूंछ में आग लगने के बावजूद हनुमानजी की पूंछ नहीं जली. हनुमानजी ने लंका में दो घर छोड़ दिए। एक घर विभीषण का, क्योंकि वह रामभक्त थे. दूसरा कुंभकर्ण का. जब वह कुंभकर्ण के महल पहुंचे तो कुंभकर्ण गहरी नींद में सो रहा था। उसकी पत्नी ने हनुमानजी से विनती की कि उसके पति गहरी निद्रा में सो रहे हैं. वह इस अपराध में सम्मिलित ही नहीं हैं. श्रीराम तो न्यायप्रिय हैं. किसी को अकारण दंड नहीं देते। उसने कहा कि सीताहरण में उसके पति की सहमति ही नहीं हैं क्योंकि वह तो सो रहे हैं. उन्हें कुछ भी ज्ञात नहीं. हनुमानजी ने उसका महल भी नहीं जलाया। पवनसुत तसल्ली से पूरी लंका जला फिर भी अग्नि अभी शेष थी. पूंछ की आग बुझाने के लिए पवनसुत समुद्र में गए. आग बुझाते समय उन्हें अचानक बड़ा पछतावा हुआ. उन्हें लगा कि मैंने पूरी लंका जला दी कहीं अनर्थ तो नहीं हो गया। उन्हें आशंका हुई कि सारी लंका तो जला डाली, कहीं ऐसा तो नहीं कि उससे आग वन में चली गई हो और माता सीता भी कहीं जल गई हों। बजरंग बली के मन में भय हुआ कि जिसकी सूचना लेने आए थे, कहीं उसका अनिष्ट तो नहीं कर दिया। उन्हें इस बात ध्यान ही न रहा कि जिसकी आज्ञा से अग्नि ने उनकी पूंछ न जलाई, वह भला स्वयं सीताजी को क्या जलाएंगे! भोले-भाले मन वाले बजरंग बली फिर तुरंत भागे लंका माता की सुधि लेने. हालांकि उनके मन में यह ख्याल यह भी आ रहा है कि सीताजी पर अग्नि का भला क्या प्रभाव होगा परंतु माता ने उन्हें पुत्र कहकर संबोधित किया था। इसलिए उस समय उनके मन में पुत्ररूप वाला भाव आ रहा था. संकटकाल में मन के कोमल भाव सबसे ज्यादा पुष्ट हो जाते हैं. परिजनों के लिए पीडा उभरती है इससे हनुमानजी भी मोहित हो गए हैं। बजरंग बली धर्मसंकट में हैं कि माता के सम्मुख जाएं भी तो जाएं कैसे? आखिर क्या बहाना बनाया जाए। वह यह कैसे कहेंगे कि मैं यह देखने आया हूं कि आप तो लंका की आग में भस्म नहीं हुई. अग्नि श्रीराम से बैर मोलने की हिम्मत कर नहीं सकते। इस धुन में खोए पवनसुत फिर से अशोक वाटिका पहुंचे और कहा कि आपसे आज्ञा लेने आया हूं। माता तो अंतर्यामी ठहरीं. हनुमानजी को सकुशल देखकर वह बड़ी प्रसन्न हुईं, सब समझ गईं. सर्वप्रथम उन्होंने अग्निदेव का आभार व्यक्त किया। अब हनुमानजी पुत्र के भाव से आए हैं और माता ने पढ़ लिया है तो वह भी अब देवी नहीं एक माता की भांति सोच रही हैं. हर माता अपने पुत्र को चिरंजीवि और अमर ही कर देना चाहती है. माता सीता भी उसी भाव में हैं। हनुमानजी को कुशल देखकर इतनी प्रसन्न हुईं कि उन्होंने बजरंग बली को अमर होने का वरदान दे दिया. माता के इसी वरदान से हनुमानजी अमर हो गए थे. इंद्र ने पहले ही उन्हें बाल्यकाल में इच्छानुसार जीवनत्याग का वरदान दिया ही था परंतु माता ने तो अशोक वाटिका में अमर ही कर दिया। हनुमान वापस क्यों आए हैं माता यह बात समझ गईं थी पर रामदूत उनके सहारे बने थे, इसलिए पुत्र को झेंप हों यह भी उचित नहीं. इसलिए माता ने कहा- पुत्र हनुमान तुमने मेरे मन की बात समझ ली. मेरी इच्छा थी कि लंका से विदा होने से पहले तुम मेरे पास एक बार और आकर मिलो। हनुमानजी गदगद हो गए. उन्होंने कहा- आपसे मुझे मेरी अपनी जननी माता अंजना जैसा प्रेम मिला है. माता पुत्र होने के नाते तो मेरा कर्तव्य है कि माता के संकट को तत्काल दूर करना. मैं तो अभी आपको अपने साथ लेकर चल सकता हूं लेकिन जिसने प्रभु को पीड़ा दी है, उसे दंड भी प्रभु ही देंगे। इसलिए मैं प्रभु श्रीराम के साथ आउंगा और अत्याचारी का अंत कर आपको कौशलपुरी लेकर जाउंगा। हनुमानजी ने आशीर्वाद लिया और उन्हें वचन दिया कि एक माह के भीतर वह प्रभु के साथ आकर रावण का नाशकर उन्हें ले जाएंगे. इस प्रकार हनुमानजी अमर हुए।

+12 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 1 शेयर