उज्जैन. शुक्राचार्य ने अपनी एक नीति में उन 6 चीजों के बारे में बताया है जिनको काबू में रखने की कोशिशें बेकार हैं, क्योंकि उनका स्वभाव ही हमेशा चलने का है। इन चीजों को काबू में करने की बजाय धर्म के मार्ग पर चलते हुए उनका उपभोग करना ज्यादा बेहतर है। शुक्र नीति में ऐसी ही 6 वस्तुओं के बारे में बताया गया हैं, जिन्हें हमेशा अपने पास बनाए रखना किसी के लिए भी संभव नहीं है। श्लोक यौवनं जीवितं चित्तं छाया लक्ष्मीश्र्च स्वामिता। चंचलानि षडेतानि ज्ञात्वा धर्मरतो भवेत्।। अर्थ – यौवन, जीवन, मन, छाया, लक्ष्मी और सत्ता ये छह चीजें बहुत चंचल होती हैं, इसे समझ लेना चाहिए और धर्म के कार्यों में रत रहना चाहिए। 1. जवानी हर कोई चाहता है कि उसका रूप-रंग हमेशा ऐसे ही बना रहे, वो कभी बूढ़ा न हो, लेकिन ऐसा होना किसी के लिए भी संभव नहीं होता है। यह प्रकृति का नियम है कि एक समय के बाद हर किसी की युवावस्था उसका साथ छोड़ती ही है। अब हमेशा युवा बने रहने के लिए मनुष्य चाहे कितनी ही कोशिशें कर ले, लेकिन ऐसा नहीं कर पाता। 2. जीवन जन्म और मृत्यु मनुष्य जीवन के अभिन्न अंग है। जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित ही है। कोई भी मनुष्य चाहे कितने ही पूजा-पाठ कर ले या दवाइयों का सहारा ले, लेकिन एक समय के बाद उसकी मृत्यु होगी ही। 3. मन मन बहुत ही चंचल होता है। कई लोग कोशिश करते हैं कि उनका मन उनके वश में रहे। लेकिन कभी न कभी वो उनके अनियंत्रित हो ही जाता है और वे ऐसे काम कर जाता है, जो नहीं करना चाहिए। 4. परछाई मनुष्य की परछाई उसका साथ सिर्फ तब तक देती है, जब तक वह धूप में चलता है। अंधकार आते ही मनुष्य की छाया भी उसका साथ छोड़ देती है। 5. लक्ष्मी मन की तरह ही धन का भी स्वभाव बड़ा ही चंचल होता है। वह हर समय किसी एक जगह पर या किसी एक के पास नहीं टिकता। इसलिए धन से मोह बांधना ठीक नहीं होता। 6. सत्ता या अधिकार कई लोगों को पॉवर यानि सत्ता या अधिकार पाने का शौक होता है। वे लोग चाहते हैं कि उन्हें मिला पद या अधिकार पूरे जीवन उन्हीं के साथ रहें, लेकिन ऐसा होना संभव नहीं है। जय श्री महाकाली माता की जय शिवशंकर ॐ नमः शिवाय हर हर महादेव जय महाकाल जी नमस्कार शुभ प्रभात शुभ शनिवार जय जय रघुवीर समर्थ 🌅👣🚩👏⛅🌹🍃🌷👪

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महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित शिंगनापुर को शनि शिंगणापुर के नाम से जाना जाता है। यह गांव अपने चमत्कारी शनि मंदिर की वजह से बहुत ही प्रसिद्ध है। आपको शायद यह जानकर हैरानी होगी कि शनि शिंगणापुर गांव के किसी भी घर या फिर दुकान में दरवाजे नहीं हैं। यह इसकी एक बड़ी खासियत है, जिसने इसे दुनियाभर में पहचान दिलाई है। यहां शनि भगवान का चमत्कारी मंदिर स्थित है और इसकी बड़ी महिमा है। यहां हम आपको शनि शिंगणापुर गांव में स्थित इसी शनि भगवान के मंदिर की कहानी बता रहे हैं, जिसकी वजह से यह गांव दुनियाभर में मशहूर हो गया है। मिला चमत्कारी पत्थर कहते हैं कि एक बार इस गांव में भयानक बाढ़ आ गई थी। पूरा गांव इस बाढ़ में डूब गया था। बताया जाता है कि जब इस गांव में बाढ़ का पानी बह रहा था तो इस बाढ़ के पानी में कोई दैवीय ताकत भी रही थी। जब बाढ़ खत्म हुआ और पानी का स्तर नीचे चला गया तो यहां एक झाड़ी में बड़ा सा पत्थर फंसा हुआ एक आदमी को दिखा। वह इस पत्थर को देखकर हैरान रह गया। उसने इस पत्थर को नीचे उतारा। इसके बाद जैसे ही उसने किसी नुकीली चीज को रखकर उस पर हथोड़ा मारा इसे तोड़ने के लिए, वैसे ही इससे खून बहना शुरू हो गया। यह देखकर वह व्यक्ति बुरी तरह से डर गया। वह तुरंत गांव की ओर दौड़ा और वहां पहुंचकर सभी को इस घटना की जानकारी दी। स्वप्न में आये शनिदेव उस व्यक्ति की बातें सुनकर गांव वाले भी हैरान रह गए। वे उसके साथ उस जगह पर पहुंच गए, जहां पत्थर को उसने छोड़ा था। वहां पहुंचने के बाद जब उन्होंने इस पत्थर को देखा तो उन्हें भी अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ। गांव वाले इस बात को लेकर असमंजस में थे कि आखिर इस पत्थर का क्या किया जाए? शाम हो गई, लेकिन वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सके। आखिरकार उन्होंने दोबारा अगले दिन वहां आने का फैसला किया और उस दिन वहां से लौट गए। ऐसा बताया जाता है कि इसी रात को इस गांव के एक व्यक्ति के सपने में भगवान शनिदेव आए। उन्होंने उस व्यक्ति से बताया कि वे शनिदेव हैं। वहां जो पत्थर उसने देखा है, उसे वह अपने गांव में ले जाए और इसे वहां स्थापित कर दे। टस से मस नहीं हुआ पत्थर सुबह होते ही इस व्यक्ति ने गांव वालों को अपने सपने के बारे में बताया। इसके बाद सभी गांव वाले वहां पहुंच गए। उस पत्थर को उठाकर अपने गांव में लाने के लिए सब ने लाख कोशिश की, लेकिन पत्थर अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ। गांव वाले बेहद परेशान हो गए। फिर उन्होंने फैसला किया कि अब वे गांव को लौट चलते हैं। अगले दिन वे पत्थर को वहां से उठाने के नए तरीके के बारे में सोच कर फिर आएंगे। मामा-भांजा के लिए विशेष ऐसी मान्यता है कि उस रात को शनिदेव एक बार फिर से उसी व्यक्ति के सपने में आए। उन्होंने उसे बताया कि उस पत्थर को वहां से किस तरह से उठाया जा सकता है। मान्यता के मुताबिक इस व्यक्ति को शनिदेव ने कहा कि यदि कोई सगा मामा-भांजा मिलकर उस पत्थर को वहां से उठाने की कोशिश करता है, तो पत्थर उठ जाएगा। इसके बाद गांव वालों ने वैसा ही किया। वहां से पत्थर को उठा लिया गया और गांव में लाकर एक खुले मैदान में सूर्य की रोशनी के बीच उसे वहां स्थापित कर दिया गया। इसके बाद से यह माना जाने लगा कि यदि मामा-भांजा यहां दर्शन करने के लिए और पूजा करने के लिए साथ में पहुंचें तो उन्हें अधिक लाभ प्राप्त होता है। कोई पुजारी नहीं आप जब वर्तमान में शिंगणापुर मंदिर जाएंगे तो आपको यहां एक खुला मैदान नजर आएगा। इस खुले मैदान के बीचों-बीच भगवान शनिदेव स्थापित हैं। भक्त यहां अपनी आस्था अनुसार दर्शन के लिए केसरी रंग का वस्त्र पहनकर जाते हैं। मंदिर के बारे में ऐसा भी कहा जाता है कि इस मंदिर में कोई पुजारी नहीं है। भक्त दर्शन करने के लिए खुद अंदर जाते हैं और भगवान शनिदेव का दर्शन करके वहां से निकल जाते हैं। ॐ शं शनैश्वराय नमः ॐ नमो हनुमते नमः जय श्री राम शुभ प्रभात वंदन 🌅👣👏🚩💐🌹⛅सभी मित्रों नमस्कार राम राम 👏

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आपल्या घरातील देव-पूजा आपण करतोच तरी शास्त्रोक्त पूजा कशी करायची हे जाणून घेऊ या. पूजा करणे याबाबत एक गोष्ट लक्षात ठेवण्यासारखी आहे ती म्हणजे पूजा करून टाकली, पूजा उरकून टाकली, असं कधीही म्हणू नये. कारण पूजेत काहीच टाकायचे नसतं. तर घ्यायचं असतं. पूजा सुरु करण्यापूर्वी पूर्वीचं निर्माल्य काढून घ्यावं.  देवाची पूजा करण्यापूर्वी देव्हार्यातील समई किंवा तेलाचा दिवा लावावा. देव ताम्हणात घेऊन त्यांना पाणी- पंचामृत- शुद्ध पाणी घालून स्नान घालावे. देव धुवून पुसून जागेवर ठेवावे.  त्यांना गंध, फुल, अक्षदा वाहाव्यात.  मग धूप, दीप, निरांजन लावावे.  देवाला नैवेद्य दाखवावा. मग आरती मंत्रपुष्पांजली म्हणावी.  प्रदक्षिणा घालून नमस्कार करावा. प्रार्थना करावी.  स्नानानंतर घरातील मुलांनी देवासमोर बसून बुद्धिदात्या श्री गणेश आणि विद्यादात्री देवी सरस्वतीची प्रार्थना करावी.  दररोज ही प्रार्थना करावी- गणपती साठी  वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ ! निर्विघ्न कुरु मे देव सर्व कार्येषु सर्वदा !! गणनाथ सरस्वती रवी शुक्र बृहस्पतीं ! पंचेतांनी स्मरे नित्यं वेदवाणी प्रवृतये !! सरस्वतीसाठी  या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता ! या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।! या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता !  सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा !! ह्याच बरोबर दररोज प्रज्ञावर्धन स्रोत म्हणावे. ज्याने मुलांची बुद्धी तल्लख होते. स्मरणशक्तीत वाढ होते  तसेच गजानन मंत्र म्हणून किमान 5 तरी दुर्वा हळदी कुंकू लावून गणपतीला अर्पण कराव्या आणि म्हणावे-  ॐ गं गणपतये नमः !  ॐ एकदंताय विध्म्हे वक्रतुंडाय धीमहि  तन्नो दंती : प्रचोदयात ! ॐ गं गणपतये नमः ॐ नमः शिवाय हर हर महादेव जय महाकाल जी जय श्री महाकाली माता की जय शिवशंकर नमस्कार शुभ प्रभात वंदन 🌅👣👏🌹🚩🍃👪💐🌷नमस्कार शुभ गणेश जय श्री गुरुदेव दत्त राम राम 🌹👏🚩👈

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पूर आला आनंदाचा । लाटा उसळती प्रेमाच्या ।। बांधू विठ्ठल सांगडी । पोहूनि जाऊ पैल थडी ।। अवघे जन गडी । घाला उडी भाईंनो ।। हे तो नाही सर्वकाळ । अमूप आनंदाचे जळ ।। तुका म्हणे थोरा पुण्यें । ओघ आला पंथे येणे ।। संत तुकाराम महाराज म्हणतात की, हरीच्या नामसंकीर्तनाने, त्याच्या सततच्या नामघोषाने आमच्या जीवनात आनंदाचा पूर आला आहे, त्यातून प्रेमाच्या लाटा उसळत आहेत आणि त्यामुळे असे वाटत आहे की ह्या आनंदाच्या भरी ह्या भवसिंधुतून पार करून जाण्यास विठ्ठलालाच, म्हणजे त्याच्या नामालाच आपल्या कमरेला सांगड म्हणून बांधून आताच याचक्षणी पैलतीर गाठू. ते इतर लोकांना उद्देशून म्हणतात की बांधवानो, मित्रांनो तुम्ही देखील आता तातडी करा आणि विठ्ठल सांगडी बांधून हा भवसागर पार करण्यासाठी त्यात उडी घ्या कारण हा अमूप आनंदाचा क्षण आपल्याला सर्वकाळ लाभणार नाही किंबहुना सर्वकाळ टिकून देखील राहणार नाही कारण हे सुख ज्या साधनामुळे आपल्याला मिळते तो हा नरदेह नाशिवंत असून तो सर्वकाळ आपल्याकडे राहणार नाही म्हणून हे पुण्य जो पर्यंत आपले गाठीशी आहे तोपर्यंत तुम्ही हे कार्य साधून घ्या. तुकोबाराय शेवटी म्हणतात की, किंबहुना हा नरदेहाचा लाभच आपल्या पूर्वजांच्या पूर्वपुण्याईमुळे आपल्याला लाभला आहे आणि असा हा परमार्थाला जायचा मार्गच त्यांच्याच संचितामुळे आपल्या वाट्याला आला आहे. जय श्री राम जय श्री कृष्ण जय श्री राधे राधे नमस्कार शुभ प्रभात वंदन शुभ मंगलवार सबका मंगल हो 👣🌅👏🍃🌱💐👪🌷🙏🚩🌹

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‘पौष अमावास्या, शुक्रवार, २४.१.२०२० या दिवशी सकाळी ९ वाजून ५३ मिनिटांनी शनि मकर राशीत प्रवेश करणार आहे. २४.१.२०२० या दिवसापासून कुंभ राशीला साडेसाती चालू होत आहे. धनु आणि मकर या राशींना साडेसाती आहे. या दिवशी वृश्‍चिक राशीची साडेसाती संपते. १. शनि ग्रह पालटाचे ज्योतिषशास्त्रानुसार महत्त्व १ अ. शनि ग्रह पालटानंतर लगेचच त्याची चांगली अथवा वाईट फळे मिळत नसून शेवटच्या ६ मासांत त्याचे अनुभव प्रकर्षाने जाणवत असणे : ‘पौष अमावास्या, शुक्रवार (२४.१.२०२०) या दिवशी सकाळी ९ वाजून ५३ मिनिटांनी शनि मकर राशीत प्रवेश करतो. त्याचा पुण्यकाल शुक्रवारी सकाळी ६.५९ वाजल्यापासून दुपारी १२.४७ वाजेपर्यंत आहे. या पुण्यकालात जप, दान, पूजा करणे, हे पुण्यकारक आणि पीडापरिहारक आहे. शनि ग्रह एका राशीतून दुसर्‍या राशीत प्रवेश करण्याचा हा संधीकाल आहे. संधीकाळात केलेल्या साधनेचे फळ अनेक पटींनी अधिक मिळते. शनी ग्रहाला ‘मंद ग्रह’ म्हणतात; कारण शनि एका राशीत अडीच वर्षे असतो. यामुळे शनि ग्रह पालटानंतर लगेचच त्याची चांगली अथवा वाईट फळे मिळत नाहीत, तर शेवटच्या सहा मासांत त्याचे अनुभव प्रकर्षाने जाणवतात. १ आ. शनि ग्रहामुळे चिंतन योग्य प्रकारे होण्यास साहाय्य होणे : मकर ही शनीची स्वरास असल्याने मकर राशीत शनीचे आगमन शुभ असणार आहे. शनि हा ग्रह कर्माचा अधिपती असून तो अहंकार नाहीसा करतो. शनि हा संवेदनेचा कारक ग्रह आहे. शनि हा चिंतनशील ग्रह असल्याने स्वभावदोष आणि अहं यांच्या निर्मूलनासाठी प्रयत्नरत असणार्‍या साधकांना साधनेच्या प्रयत्नांत यश देतो. शनि ग्रहामुळे चिंतन योग्य प्रकारे होण्यास साहाय्य होते. २. शनि ग्रहाचे ज्योतिषशास्त्रदृष्ट्या महत्त्व २ अ. शनि ग्रह पूर्वसुकृत दर्शवणारा आणि मोक्षाची वाट दाखवणारा ग्रह असणे : हिंदुु धर्मात ग्रहांना देवता मानले जाते. शनि हा पाप ग्रह (अशुभ ग्रह) असून सर्व ग्रहांमध्ये या ग्रहाला लौकिकदृष्ट्या अनन्य साधारण महत्त्व आहे. मकर आणि कुंभ या शनि ग्रहाच्या राशी आहेत. शनि तुळ राशीत उच्चीचा होतो. ज्योतिषशास्त्रात ग्रहांच्या उच्च आणि नीच राशी ठरवून दिलेल्या आहेत. ‘ग्रह जेव्हा उच्च राशीत असतो, तेव्हा तो ज्या गोष्टींचा कारक आहे आणि कुंडलीतील ज्या स्थानांचा स्वामी आहे, त्यांसंबंधी शुभ फलदायी ठरतो’, असा नियम आहे. हा ग्रह वायू तत्त्वाचा असून मनुष्याला आसक्तीकडून विरक्तीकडे नेतो. मानवी जीवनातील मान, अपमान, अवहेलना यातून हा ग्रह परमार्थाकडे वळवतो. हा ग्रह पूर्वसुकृत दर्शवणारा आणि मोक्षाची वाट दाखवणारा ग्रह आहे. २ आ. शनि हा अनुभवातून शिक्षण देणारा शिक्षक असून अविचारांनी केलेल्या कर्मांची फळे साडेसातीत मिळतांना दिसणे : ज्योतिष शास्त्रानुसार प्रत्येक ग्रहाच्या शुभ (गुण) आणि अशुभ (दोष) अशा दोन बाजू असतात. कोणताही ग्रह केवळ अशुभच अथवा केवळ शुभच असतो, असे नसते. या नियमाप्रमाणे शनि ग्रहाच्याही दोन बाजू आहेत; पण शनि ग्रहाची केवळ एकच बाजू विचारात घेतली जाते; म्हणूनच लोकांच्या मनात शनि ग्रहाविषयी भीती निर्माण होते. शनि ग्रह गर्व, अहंकार, पूर्वग्रह यांना दूर करून माणसाला माणुसकी शिकवतो आणि अंतरंगातील उच्च गुणांची ओळख करून देतो. शनि हा अनुभवातून शिक्षण देणारा शिक्षक आहे. जे शिस्तबद्ध, विनयशील आणि नम्र आहेत, त्यांना शनि उच्च पदाला घेऊन जातो, तर जे अहंकारी, गर्विष्ठ आणि स्वार्थी आहेत, त्यांना शनि त्रास देतो. अशा वाईट काळातच माणसाची योग्य पारख होते. या काळात व्यक्तीला स्वकीय-परकीय यांची जाणीव होते. स्वत:चे गुण-दोष लक्षात येतात, गर्वहरण होते, अहंकार गळून पडतो. माणुसकीची जाणीव होते. एक माणूस म्हणून कसे जगावे, याचे ज्ञान होते. अविचारांनी केलेल्या कर्मांची फळे साडेसातीत मिळतांना दिसतात. ३. राशीपरत्वे शनीची स्थाने मकर राशीत प्रवेश करणारा शनि मकर राशीस पहिला, धनु राशीस दुसरा, वृश्‍चिक राशीस तिसरा, तुळ राशीस चौथा, कन्या राशीस पाचवा, सिंह राशीस सहावा, कर्क राशीस सातवा, मिथुन राशीस आठवा, वृषभ राशीस नववा, मेष राशीस दहावा, मीन राशीस अकरावा आणि कुंभ राशीस बारावा आहे. ४. शनि पालट झाल्यावर शनि प्रत्येक राशीत कोणत्या पादाने प्रवेश करतो आणि त्याचे फल ५. अशुभ स्थाने स्वजन्मराशीपासून १, २, ४, ५, ७, ८, ९, १२ या स्थानी असलेला शनि ग्रह पीडाकारक आहे. पीडापरिहारार्थ पुण्यकालात जप, दान आणि पूजा करणे पुण्यकारक आणि पीडापरिहारक आहे. ६. शनि ग्रह पालटाच्या कालावधीत करावयाची साधना ६ अ. शनीची पीडापरिहारक दाने : सुवर्ण, लोखंड, नीलमणी, उडीद, म्हैस, तेल, काळे घोंगडे, काळी किंवा निळी फुले. ६ आ. जपसंख्या : तेवीस सहस्र ६ इ. पूजेसाठी शनीची लोखंडाची प्रतिमा वापरावी. ६ ई. शनीचा पौराण (पौराणिक) मंत्र नीलाञ्जनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् । छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्‍चरम् ॥ – नवग्रहस्तोत्र, श्‍लोक ७ अर्थ : शनिदेव निळ्या अंजनाप्रमाणे भासतात. ते भगवान सूर्यनारायणाचे पुत्र असून साक्षात् यमदेवाचे ज्येष्ठ बंधू आहेत. देवी छाया आणि भगवान सूर्य यांपासून उत्पन्न शनिदेवांना मी नमस्कार करतो. ६ उ. शनीच्या लोखंडाच्या प्रतिमेचे पूजन आणि दान यांचा संकल्प : ‘मम जन्मराशे: सकाशात् अनिष्टस्थानस्थितशने: पीडापरिहारार्थम् एकादशस्थानवत् शुभफलप्राप्त्यर्थं लोहप्रतिमायां शनैश्‍चरपूजनं तत्प्रीतिकरं (अमुक) (टीप) दानं च करिष्ये। अर्थ : मी माझ्या जन्मपत्रिकेत अनिष्ट स्थानी असलेल्या शनीची पीडा दूर व्हावी आणि तो अकराव्या स्थानात असल्याप्रमाणे शुभ फल देणारा व्हावा, यासाठी लोखंडाच्या शनिमूर्तीची पूजा अन् शनिदेव प्रसन्न व्हावा, यासाठी ‘अमुक’ वस्तूचे दान करतो. टीप – ‘अमुक’ या शब्दाच्या ठिकाणी ज्या वस्तूचे दान करायचे असेल, त्या वस्तूचे नाव घ्यावे. ध्यान अहो सौराष्ट्रसञ्जात छायापुत्र चतुर्भुज । कृष्णवर्णार्कगोत्रीय बाणहस्त धनुर्धर ॥ त्रिशूलिश्‍च समागच्छ वरदो गृध्रवाहन । प्रजापते तु संपूज्य: सरोजे पश्‍चिमे दले ॥ अर्थ : शनिदेवाने सौराष्ट्रदेशी अवतार घेतला. तो सूर्य आणि छायादेवी यांचा पुत्र होय. त्याला चार हात आहेत. तो रंगाने काळा आहे. त्याच्या एका हातात धनुष्य, एका हातात बाण आणि एका हातात त्रिशूळ आहे. चौथा हात वर देणारा आहे. ‘गिधाड’ हे त्याचे वाहन आहे. तो सर्व प्रजेचा पालनकर्ता आहे. नवग्रहांच्या कमळामध्ये त्याची स्थापना मागच्या पाकळीच्या ठिकाणी केली जाते. अशा या शनिदेवाची आराधना करावी. ६ ऊ. दानाचा श्‍लोक शनैश्‍चरप्रीतिकरं दानं पीडानिवारकम् । सर्वापत्तिविनाशाय द्विजाग्र्याय ददाम्यहम् ॥ अर्थ : शनिदेवाला प्रिय असे दान दिल्यावर पिडांचे, तसेच सर्व आपत्तींचे निवारण होते. असे हे दान मी श्रेष्ठ अशा ब्राह्मणाला देत आहे. ६ ए. शनिस्तोत्र कोणस्थ: पिङ्गलो बभ्रु: कृष्णो रौद्रोऽन्तको यमः । सौरिः शनैश्‍चरो मन्दः पिप्पलादेन संस्तुतः ॥ एतानि दश नामानि प्रातरुत्थाय य: पठेत् । शनैश्‍वरकृता पीडा न कदाचित् भविष्यति ॥ पिप्पलाद उवाच । नमस्ते कोणसंस्थाय पिङ्गलाय नमोऽस्तुते । नमस्ते बभ्रुरूपाय कृष्णाय च नमोऽस्तुते ॥ १ ॥ नमस्ते रौद्रदेहाय नमस्ते चान्तकाय च । नमस्ते यमसंज्ञाय नमस्ते सौरये विभो ॥ २ ॥ नमस्ते मन्दसंज्ञाय शनैश्‍चर नमोऽस्तुते । प्रसादं कुरु देवेश दीनस्य प्रणतस्य च ॥ ३ ॥ अर्थ : कोणस्थ, पिंगल, बभ्रु, कृष्ण, रौद्र, अंतक, यम, सौरि, शनैश्‍चर आणि मंद या दहा नावांनी पिप्पलादऋषींनी शनिदेवाची स्तुती केली. ही दहा नावे सकाळी उठल्यावर जो म्हणील, त्याला कधीही शनिग्रहाची बाधा होणार नाही. पिप्पलादऋषि म्हणतात, ‘‘हे कोनात राहणार्‍या कोणस्था, हे पिंगला, हे बभ्रु, हे कृष्णा, हे रौद्रदेहा, हे अंतका, हे यमा, हे सौरी, हे विभो, हे मंदा, हे शनिदेवा, मी तुला नमस्कार करतो. मी दीन तुला शरण आलो आहे. तू माझ्यावर प्रसन्न हो.’’ हे स्तोत्र नित्य प्रात:काळी पठण करावे. ७. साडेसाती असलेल्यांनी करावयाचे उपाय अ. ज्यांना साडेसाती आहे, त्यांनी शनिस्तोत्र प्रतिदिन म्हणावे. आ. शनीच्या साडेसातीप्रित्यर्थ जप, दान आणि पूजा अवश्य करावी. इ. पीडापरिहारार्थ शनिवारी अभ्यंग स्नान करून नित्य शनिस्तोत्र पठण करावे. ई. शनिवारी शनीचे दर्शन घेऊन उडीद आणि मीठ शनीस अर्पण करावे. तेलाभिषेक करावा. काळी फुले वाहिल्याने पिडेचा परिहार (उपाय) होईल. ती न मिळाल्यास निळ्या रंगाची, उदा. गोकर्ण, कृष्णकमळ, अस्टर इत्यादी फुले वाहावीत. उ. शक्य असल्यास शनिवारी सायंकाळपर्यंत उपोषण करावे. निदान एकभुक्त असावे. ऊ. नीलमण्याची अंगठी धारण करावी.’ (संदर्भ : दाते पंचांग) – सौ. प्राजक्ता जोशी (ज्योतिष फलित विशारद), महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय, ज्योतिष विभाग, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (२८.१२.२०१९)नमस्कार शुभ रात्री वंदन जय माता की जय शिवशंकर ॐ नमः शिवाय हर हर महादेव जय महाकाल जी जय श्री राम जय श्री कृष्ण जय श्री हरी विठ्ठल नमस्कार शुभ षटतिला एकादशी जय श्री राम जय श्री हनुमान जी जय श्री शनि देव महाराज नमस्कार 👣👣🚩👏🍃🌱🌻🙏🌷👪💐🌹

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षटतिला एकादशी का व्रत माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन किया जाता है। वही इस दिन भगवान विष्णु को तिल और तिलों से बनी चीजें अर्पित करने का विधान है। वही इस दिन व्रत करने वाले व्यक्ति को कन्यादान, स्वर्णदान और हजारों वर्ष की तपस्या का फल प्राप्त होता है। इसके साथ षटतिला एकादशी 20 जनवरी को है। पुराणों में षटतिला एकादशी का बहुत अधिक महत्व बताया गया है। जो व्यक्ति षटतिला एकादशी का व्रत करता है। उसे कन्यादान और स्वर्णदान का फल प्राप्त होता है। इतना इस मात्र एक व्रत का फल हजारों वर्ष तक की तपस्या के बराबर बताया गया है। यह व्रत मनुष्य को न केवल जीवन के सभी सुखों की प्राप्ति कराता है। बल्कि इस व्रत के करने से मृत्यु के बाद बैकुंठ धाम में स्थान भी प्राप्त होता है। इसके अलावा षटतिला एकादशी में छह प्रकार के तिलों के प्रयोग के बारे में बताया जाता है। पहला तिल मिलाकर जल से स्नान करना, दूसरा तिल के तेल से मालिश करना, तीसरा तिल के तेल से हवन करना, चौथा तिल के पानी को ग्रहण करना, पांचवा तिल का दान करना और छठा तिल से बनी चीजों का सेवन करना। षटतिला एकादशी तिथि 20 जनवरी सोमवार से शुरू होगी और 21 जनवरी तड़के दो बजे समाप्त होगी। व्रत का कारण मंगलवार सुबह 8 बजे से 9.21 तक किया जा सकता है। षटतिला एकादशी की पूजा विधिः षटतिला एकादशी दशमी तिथि से ही शुरु हो जाता है। इसलिए एकादशी के नियमों का पालन दशमी तिथि से ही करें। इस दिन सूर्योदय से पहले उठें। इसके बाद साफ वस्त्र धारण करना चाहिए । परन्तु काले और नीले रंग के वस्त्र बिल्कुल भी धारण न करें। इसके बाद एक साफ चौकी पर गंगाजल के छिंटे मारकर उस पर पीला कपड़ा बिछाएं और भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद उस प्रतिमा या तस्वीर को पंचामृत से स्नान कराएं जिसमें तुलसी दल अवश्य हो। इसके बाद दोबारा भगवान विष्णु को गंगाजल से स्नान कराएं। इसके बाद भगवान विष्णु को पीले रंग के फूलों की माला पहनाएं और उन्हें पीले वस्त्र, पीले रंग के फूल, पीले रंग के फल , काले और सफेद तिल, नैवेद्य आदि अर्पित करें। इसके बाद भगवान विष्णु के मंत्र ऊं नमों भगवते वासुदेवाय नम: या ऊं नमों नारायणाय मंत्र का जाप करें और विष्णु सहस्त्रनाम का भी पाठ करें। वही मंत्र जाप करने के बाद तिलों से हवन अवश्य करें। इसके बाद भगवान विष्णु को तिलों से बनी चीजों का भोग लगाएं। भोग लगाने के बाद भगवान विष्णु की धूप व दीप से आरती उतारें। आरती उतारने के बाद भगवान के बाद किसी ब्राह्मण या निर्धन व्यक्ति को भोजन अवश्य करना चाहिए । भोजन कराने के बाद उस ब्राह्मण या निर्धन व्यक्ति को तिलों का दान दक्षिणा सहित अवश्य करें।क्योंकि इस दिन तिलों के दान को ज्यादा महत्व दिया जाता है। षटतिला एकादशी की कथाः पौराणिक कथा के मुताबिक एक नगर में एक महिला रहती थी वह भगवान विष्णु की बहुत बड़ी भक्त थी। वह भगवान विष्णु की बहुत अधिक पूजा पाठ किया करती थी। एक दिन भगवान विष्णु उस महिला से प्रसन्न हो गए और एक भिखारी का वेश बनाकर उस महिला के घर पर दान मांगने के लिए आ गए। उस महिला ने क्रोध में आकर भगवान के पात्र में एक पत्थर डाल दिया। उस महिला को ऐसा करने से जीवन के सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति तो हो गई। लेकिन उसे खाने के लिए कुछ भी न मिला। वह सोचने लगी की ऐसी सुख सुविधा का क्या लाभ जिससे वह खाने की कोई वस्तु तक नहीं खरीद सकती है । इसके बाद उसने फिर भगवान से प्रार्थना की और अपनी गलती का कारण पूछा जाता है । तब भगवान ने उसे दर्शन देकर बताया कि जब तक कठोर तप के बाद कुछ दान किया जाता। तब तक तप का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। विशेषकर षटतिला एकादशी के दिन तो दान अवश्य करना चाहिए। इस दिन तिल और तिल से बनी वस्तुओं का दान करना सबसे ज्यादा शुभ होता है। भगवान की बात सुनकर उस महिला षटतिला एकादशी के दिन तिल से बनी मिठाई का दान किया जाता है । इसके बाद भगवान विष्णु की कृपा से उस महिला के पास न केवल ऐशों आराम की सभी वस्तुएं थी। बल्कि उसके अन्न के भंडार में भी कोई कमीं नही थी। ॐ भास्कराय नम :ॐ नमः शिवाय हर हर महादेव जय महाकाल जी जय श्री महाकाली माता की जय शिवशंकर ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॐ नमो नारायण जय श्री कृष्ण जय श्री राधे राधे जय श्री राम जय श्री हरी विठ्ठल नमस्कार शुभ प्रभात वंदन शुभ सोमवार शुभ षटतिला एकादशी नमस्कार सभी मित्रों को षटतिला एकादशी की हार्दिक शुभकामना ये जय श्री भोलेनाथ 🌹👣🚩👏🍃🌱👪🌅🌷🙏🌸🌻👈

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षटतिला एकादशी व्रत में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। इस दिन तिल का प्रयोग 6 तरीकों से किया जाता है। तिल स्नान, तिल का उबटन, तिल का हवन, तिल का तर्पण, तिल का भोग और तिल का दान। पूजा के लिए इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में जागकर स्नान कर लें। उसके बाद भगवान विष्णु की पूजा प्रारंभ करें। पूरे दिन निराहार व्रत रखें। फलों का सेवन किया जा सकता है। शाम के समय भगवान विष्णु का पूजन कर उन्हें तिल का भोग लगाएं और षटतिला एकादशी की व्रत कथा भी जरूर पढ़ें। भगवान विष्णु की प्रिय तुसली के समीप दीपक जलाएं। अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत का पारण करें। षटतिला एकादशी की व्रत कथा इस प्रकार है, पुलस्‍त्‍य ऋषि ने यह कथा दालभ्य ऋषि से कही थी जो इस प्रकार है, एक समय नारदजी ने भगवान श्रीविष्णु से लोक कल्‍याण के लिए प्रश्‍न किया जिसके उत्‍तर में श्री भगवान ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य नारदजी से कहा। भगवान ने नारदजी से कहा कि- हे नारद! मैं तुमसे सत्य घटना कहता हूं। ध्यानपूर्वक सुनो। प्राचीन काल में मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह सदैव व्रत करती, एक बार उसने एक माह तक व्रत किया जिसके कारण उसकी काया अत्‍यंत क्षीण व दुर्बल हो गई। बुद्धिमान होने के बावजूद उसने कभी देवताओं या ब्राह्मणों के लिए अन्न या धन का दान नहीं किया था। इससे मैंने सोचा कि ब्राह्मणी ने व्रत आदि से अपना शरीर शुद्ध कर लिया है, अब इसे विष्णुलोक तो मिल ही जाएगा परंतु इसने कभी अन्न का दान नहीं किया, इससे इसकी तृप्ति होना कठिन है। भगवान ने आगे कहा- ऐसा सोचकर मैं भिखारी के वेश में मृत्युलोक में उस ब्राह्मणी के पास गया और उससे भिक्षा माँगी। वह ब्राह्मणी बोली- महाराज किसलिए आए हो? मैंने कहा- मुझे भिक्षा चाहिए। इस पर उसने एक मिट्टी का ढेला मेरे भिक्षापात्र में डाल दिया। मैं उसे लेकर स्वर्ग में लौट आया। कुछ समय बाद ब्राह्मणी भी शरीर त्याग कर स्वर्ग में आ गई। उस ब्राह्मणी को मिट्टी का दान करने से स्वर्ग में सुंदर महल मिला, परंतु उसने अपने घर को अन्नादि सब सामग्रियों से शून्य पाया। घबराकर वह मेरे पास आई और कहने लगी कि भगवन् मैंने अनेक व्रत आदि से आपकी पूजा की परंतु फिर भी मेरा घर अन्नादि सब वस्तुओं से शून्य है। इसका क्या कारण है? इस पर मैंने कहा- पहले तुम अपने घर जाओ। देवस्त्रियाँ आएँगी तुम्हें देखने के लिए। पहले उनसे षटतिला एकादशी का पुण्य और विधि सुन लो, तब द्वार खोलना। मेरे ऐसे वचन सुनकर वह अपने घर गई। जब देवस्त्रियाँ आईं और द्वार खोलने को कहा तो ब्राह्मणी बोली- आप मुझे देखने आई हैं तो षटतिला एकादशी का माहात्म्य मुझसे कहो। उनमें से एक देवस्त्री कहने लगी कि मैं कहती हूँ। जब ब्राह्मणी ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य सुना तब द्वार खोल दिया। देवांगनाओं ने उसको देखा कि न तो वह गांधर्वी है और न आसुरी है वरन पहले जैसी मानुषी है। उस ब्राह्मणी ने उनके कथनानुसार षटतिला एकादशी का व्रत किया। इसके प्रभाव से वह सुंदर और रूपवती हो गई तथा उसका घर अन्नादि समस्त सामग्रियों से युक्त हो गया। अत: मनुष्यों को मूर्खता त्यागकर षटतिला एकादशी का व्रत और लोभ न करके तिलादि का दान करना चाहिए। इससे दुर्भाग्य, दरिद्रता तथा अनेक प्रकार के कष्ट दूर होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है। ॐ नमो नारायण ॐ नमो भगवते वासुदेवाय जय श्री कृष्ण जय श्री राधे राधे नमस्कार शुभ रात्री वंदन 👣👏🌹🚩

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