Seemma Valluvar Jan 20, 2022

गौ के नाम पर है श्रीकृष्णलोक का नाम गौलोक धाम!!!!!! गौमाता मनुष्यों के लिए गोलोक से उतरा हुआ परमात्मा श्रीकृष्ण का एक आशीर्वाद है या यह कहिए कि साक्षात् स्वर्ग ही गाय के रूप में पृथ्वी पर उतर आया है । गौ के बिना जीवन नहीं, गौ के बिना कृष्ण नहीं और कृष्णभक्ति भी नहीं है । गौ-गोप-गोपियां और गोपाल से विभूषित है गोलोक!!!!!! गोलोक ब्रह्माण्ड से बाहर और सबसे ऊपर है । उससे ऊपर दूसरा कोई लोक नहीं है । वहीं तक सृष्टि की अंतिम सीमा है, उसके ऊपर सब शून्य है । श्रीगर्ग-संहिता के अनुसार गोलोक में वृन्दावन नाम का ‘निज निकुंज’ है, जो गोष्ठों (गौशाला) और गौओं के समूह से भरा हुआ है। रत्नमय अलंकारों से सजी करोड़ों गोपियां श्रीराधा की आज्ञा से उस वन की रक्षा करती हैं । वहां करोड़ों पीली पूंछ वाली सवत्सा गौएं हैं जिनके सींगों पर सोना मढ़ा है व दिव्य आभूषणों, घण्टों व मंजीरों से विभूषित हैं । नाना रंगों वाली गायों में कोई उजली, कोई काली, कोई पीली, कोई लाल, कोई तांबई तो कोई चितकबरे रंग की हैं । अथाह दूध देने वाली उन गायों के शरीर पर गोपियों की हथेलियों के चिह्न (छापे) लगे हैं । वहां गायों के साथ उनके छोटे-छोटे बछड़े और धर्मरूप सांड भी मस्ती में इधर-उधर घूमते रहते हैं । श्रीकृष्ण के समान श्यामवर्ण वाले सुन्दर वस्त्र व आभूषणों से सजे-धजे गोप हाथ में बेंत व बांसुरी लिए हुए गौओं की रक्षा करते हैं और अत्यन्त मधुर स्वर में भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का गान करते रहते हैं ।परमात्मा श्रीकृष्ण अपने सर्वोच्च लोक गोलोक में गोपाल रूप में ही रहते हैं और गौ उनके परिकरों (परिवार का अंग) के रूप में प्रतिष्ठित हैं। अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक भगवान श्रीकृष्ण की पूज्या व इष्ट है गौ!!!!!! परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण के चिन्मय जीवन और लीला-अवतारी जीवन का मुख्य सम्बन्ध गौ से है । इसीलिए वे सदैव गौ-गोप और गोपियों से घिरे हुए चित्रित किए जाते हैं । श्रीकृष्णरूप में अवतार ग्रहण करने की प्रार्थना करने के लिए भूदेवी गौ का रूप धारण करके ही भगवान श्रीहरि के पास गयीं थीं । साक्षात् ब्रह्म श्रीकृष्ण गोलोक का परित्याग कर भारतभूमि पर गोकुल (गोधन) का बाहुल्य देखकर अत्यन्त लावण्यमय ‘गोपाल’ का रूप धरकर गौ, देवता, ब्राह्मण और वेदों के कल्याण के लिए अवतीर्ण हुए— नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च । जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नम: ।। भगवान श्रीकृष्ण ने ‘गोपाल’ बनकर गायों की सेवा (चराना, नहलाना, गोष्ठ की सफाई, दुहना, खेलना) की और उनकी रक्षा की । उनके सखा सहचर सब के सब गोपबालक ही हैं । उनकी हृदयवल्लभाएं (प्रियाएं) भी घोषवासिनी अर्थात् ग्वालों की बहन-बेटियां हैं । वह लीलापुरुषोत्तम श्रीकृष्ण सुबह से संध्या तक नंगे पैर तपती धूप में गाय-बछड़ों के झुण्ड को लिए हुए अपनी जादूभरी बंशी में मधुर नाद छेड़ते हुए बड़े प्यार से उन्हें चराते है, इस कुंज से उस कुंज तक विचरते रहते है । गायों के खुरों की रज उड़-उड़कर जब उनके श्रीअंगों पर लगती है तो वे ‘पाण्डुरंग’ कहलाते हैं और उस रज के धारण करने से अपने को धन्य मानते हैं । यशोदाजी द्वारा जूते धारण करने का आग्रह भी उन्होंने इसलिए अस्वीकार कर दिया क्योंकि उनकी प्रिय गायें भी वनों में नंगे पैर विचरण करती हैं । श्रीमद्भागवत में श्रीशुकदेवजी कहते है कि भगवान गोविन्द स्वयं अपनी समृद्धि, रूप-लावण्य एवं ज्ञान-वैभव को देखकर चकित हो जाते थे (३।२।१२) । श्रीकृष्ण को भी आश्चर्य होता था कि सभी प्रकार के ऐश्वर्य, ज्ञान, बल, ऋषि-मुनि, भक्त, राजागण व देवी-देवताओं का सर्वस्व समर्पण–ये सब मेरे पास एक ही साथ कैसे आ गए? शायद ये मेरी गोसेवा का ही परिणाम है । समस्त विश्व का पेट भरने वाले परब्रह्म श्रीकृष्ण की क्षुधा गोमाता के माखन से ही मिटती है— ‘जाको ध्यान न पावे जोगी। सो व्रज में माखन को भोगी ।। जो गोपाल बनकर आया है, उसकी रक्षा गायें ही करेंगी–भगवान पर संकट आने पर उनकी रक्षा का भार भी गोमाता पर आता है । माता यशोदा ने सोचा कि पूतना राक्षसी के स्पर्श से लाला को नजर लगी होगी। गाय की पूंछ से नजर उतारने की प्रेरणा गोपियों को भगवान ने ही दी अत: गोष्ठ में ले जाकर गोपियों ने बालकृष्ण की बाधा उनके मस्तक पर गोपुच्छ फिराकर, गोमूत्र से स्नान कराकर, अंगों में गोरज और गोबर लगाकर उतारी । श्रीकृष्ण ने गौओं को इन्द्र से भी अधिक मान दिया फलस्वरूप गौओं ने श्रीकृष्ण का अपने दूध से अभिषेक करके ‘गायों का इन्द्र गोविन्द’ बनाया । श्रीकृष्ण का सर्वश्रेष्ठ मन्त्र है—‘गोविन्दाय गोपीजनवल्लाभ स्वाहा ।’ भगवान श्रीकृष्ण ने अपने लोक को गायों के नाम पर गोलोक का नाम दिया। गौएं देवताओं के लोकों से भी ऊपर गोलोक में क्यों निवास करती हैं ? महाभारत (८३।१७-२२) के अनुसार—देवराज इन्द्र के पूछने पर कि गौएं देवताओं के लोकों से भी ऊपर गोलोक में क्यों निवास करती हैं ? ब्रह्माजी ने कहा—‘गौएं साक्षात् यज्ञस्वरूपा हैं—इनके बिना किसी भी प्रकार का यज्ञ नहीं हो सकता है । गौ के घी से देवताओं को हवि प्रदान की जाती है । गौ की संतान बैलों से भूमि को जोतकर यज्ञ के लिए गेहूं, चावल, जौ, तिल आदि हविष्य उत्पन्न किया जाता है । यज्ञभूमि को गोमूत्र से शुद्ध करते हैं व गोबर के कण्डों से यज्ञाग्नि प्रज्वलित की जाती है । यज्ञ से पूर्व शरीर की शुद्धि के लिए पंचगव्य लिया जाता है जो दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोमय से बनाया जाता है । ब्राह्मण में मन्त्र का निवास है और गौ में हविष्य स्थित है । इन दोनों से ही मिलकर यज्ञ सम्पन्न होता है । गौएं मानव जीवन का आधार हैं—समस्त प्राणियों को धारण करने के लिए पृथ्वी गोरूप ही धारण करती है । गौ, विप्र, वेद, सती, सत्यवादी, निर्लोभी और दानी—इन सात महाशक्तियों के बल पर ही पृथ्वी टिकी है पर इनमें गौ का ही प्रथम स्थान है। गाय मानव की दूसरी मां है, जन्म देने वाली मां के बाद गौ का ही स्थान है । जगत के पालन-पोषण के लिए गौएं ही मनुष्य को अन्न और दुहने पर अमृतरूपी दूध देती हैं। इनके पुत्र बैल खेती के काम में आते हैं और अनेक प्रकार के बीज और अन्न पैदा करते हैं । बैल भूख-प्यास का कष्ट सहकर बोझ ढोते रहते हैं । इस प्रकार गौएं अपने कर्म से मनुष्यों, देवताओं और ऋषि-मुनियों का पोषण करती हैं । गाय के रोम-रोम से सात्विक विकिरण गाय का स्वभाव सात्विक, शांत, धीर एवं गंभीर है । इनके व्यवहार में शठता, कपटता नहीं होती है । सात्विक मन और बुद्धि से ही परमात्मा की प्राप्ति होती है । गौएं बड़ी ही पवित्र होती हैं । गौओं से उत्पन्न दूध, दही, घी, गोबर, मूत्र और रोचना (गोषडंग)—ये छ: चीजें अत्यन्त पवित्र हैं । —गौओं के गोबर से लक्ष्मी का निवासस्थान बिल्ववृक्ष उत्पन्न हुआ है । —नीलकमल और रक्तकमल के बीज भी गोबर से ही उत्पन्न हुए हैं । —गौओं के मस्तक से उत्पन्न ‘गोरोचना’ देवताओं को अर्पण करने से सभी कामनाओं को पूरा करता है । —गौ के मूत्र से उत्पन्न गुग्गुल सभी देवताओं का आहार है । —सभी देवताओं और वेदों का गौओं में ही निवास है। गौएं सदैव अपने कर्म में लगी रहती हैं इसीलिए देवलोकों से ऊपर गोलोक में निवास करती हैं । गौ के सम्बन्ध में शतपथ ब्राह्मण (७।५।२।३४) में कहा गया है–’गौ वह झरना है, जो अनन्त, असीम है, जो सैंकड़ों धाराओं वाला है।’ एक समय आता है जब पृथ्वी पर बहने वाले झरने सूख जाते हैं । इन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर भी नहीं ले जा सकते हैं किन्तु गाय रूपी झरना इतना विलक्षण है कि इसकी धारा कभी सूखती नहीं । अपनी संतति (संतानों) के द्वारा सदा बनी रहती है । साथ ही इस झरने को एक-स्थान से दूसरे स्थान पर ले भी जा सकते हैं। ऐसी संसार की श्रेष्ठतम पवित्र सर्वदेवमयी, सर्वतीर्थमयी, यज्ञस्वरूपा गौ का स्थान गोलोक के सिवाय और कहां हो सकता है? जय गौ माता 🙏🌺🌺🌺🌺🚩

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Seemma Valluvar Jan 19, 2022

*"मैने सीखा है पतंगो से"* मैने सीखा है पतंगो से जमीन से आसमां की ओर बढना कभी नीचे तो कभी ऊपर गिरना और गिरकर संभलना मैने सीखा है पतंगो से झुकना और विनम्र भाव अपनाना तेज हवा के झोंको से कभी ना घबराना मैने सीखा है पतंगो से मुस्कुराना और खिलखिलाना जिंदगी के उतार चढ़ाव के बीच परिस्थितियों संग ढल जाना मैने सीखा है पतंगो से डोर के संग साथ निभाना मरते दम तक अपनेपन का मन मे भाव रखना और जगाना मैने सीखा है पतंगो से रंगो का भेद मिटाना सबको मान देना और अच्छाईयों पर कभी ना इतराना मैने सीखा है पतंगो से प्रेम, त्याग और संयम अपनाना जीवन मे समर्पण का भाव रख अपनो के लिए मर मिट जाना मैने सीखा है पतंगो से गिरना, उठना और उड़ना जीवन के हर पल को आनंद से बिताना जीवन के हर पल को आनंद से बिताना मैने सीखा है पतंगो से.........

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Seemma Valluvar Jan 17, 2022

क्यों कहा जाता है, सारे तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार जाने क्यों? गंगासागर भारत के तीर्थों में एक महातीर्थ है। गंगाजी इसी स्थान पर आकर सागर में मिलती हैं। इसी स्थान पर राजा सगर के 60 हजार पुत्रों को मोक्ष प्राप्त हुआ था। यहां मकर संक्रान्ति पर बहुत बड़ा मेला लगता है जहां लाखों श्रद्धालु गंगा स्नान के लिए आते हैं। कहते हैं यहां संक्रान्ति पर स्नान करने पर सौ अश्वमेध यज्ञ और एक हजार गऊएं दान करने का फल मिलता है। गंगा सागर को तीर्थों का पिता कहा जाता है, कहने का तात्पर्य है कि गंगा सागर का अन्य तीर्थों की अपेक्षा अत्यधिक महत्व है। शायद यही कारण है कि जन साधारण में यह कहावत बहुत प्रचलित है कि - ''सब तीरथ बार-बार, गंगा सागर एक बार।' गंगा जिस स्थान पर समुद्र में मिलती है, उसे गंगा सागर कहा गया है। गंगा सागर एक बहुत सुंदर वन द्वीप समूह है जो बंगाल की दक्षिण सीमा में बंगाल की खाड़ी पर स्थित है। प्राचीन समय में इसे पाताल लोक के नाम से भी जाना जाता था। कलकत्ते से यात्री प्रायः जहाज में गंगा सागर जाते हैं। यहां मेले के दिनों में काफी भीड़-भाड़ व रौनक रहती है लेकिन बाकी दिनों में शांति एवं एकाकीपन छाया रहता है। तीर्थ स्थान-सागर द्वीप में केवल थोड़े से साधु ही रहते हैं। यह अब वन से ढका और प्रायः जनहीन है। इस सागर द्वीप में जहां गंगा सागर मेला होता है, वहां से एक मील उत्तर में वामनखल स्थान पर एक प्राचीन मंदिर है। इस समय जहां गंगा सागर पर मेला लगता है, पहले यहीं गंगाजी समुद्र में मिलती थी, किंतु अब गंगा का मुहाना पीछे हट गया है। अब गंगा सागर के पास गंगाजी की एक छोटी धारा समुद्र से मिलती है। आज यहां सपाट मैदान है और जहां तक नजर जाती है वहां केवल घना जंगल। मेले के दिनों में गंगा के किनारे पर मेले के लिए स्थान बनाने के लिए इन जंगलों को कई मीलों तक काट दिया जाता है। गंगा सागर का मेला मकर संक्रांति को लगता है। खाने-पीने के लिए होटल, पूजा-पाठ की सामग्री व अन्य सामानों की भी बहुत-सी दुकानें खुल जाती हैं। सारे तीर्थों का फल अकेले गंगा सागर में मिल जाता है। संक्रांति के दिन गंगा सागर में स्नान का महात्म्य सबसे बड़ा माना गया है। प्रातः और दोपहर स्नान और मुण्डन-कर्म होता है। यहां पर लोग श्राद्ध व पिण्डदान भी करते हैं। कपिल मुनि के मंदिर में जाकर दर्शन करते हैं, इसके बाद लोग लौटते हैं ओर पांचवें दिन मेला समाप्त हो जाता है। गंगा सागर से कुछ दूरी पर कपिल ऋषि का सन् 1973 में बनाया गया नया मंदिर है जिसके बीच में कपिल ऋषि की मूर्ति है। उस मूर्ति के एक ओर राजा भगीरथ को गोद में लिए हुए गंगाजी की मूर्ति है तथा दूसरी ओर राजा सगर तथा हनुमान जी की मूर्ति है। इसके अलावा यहां सांख्य योग के आचार्य कपिलानंद जी का आश्रम, महादेव मंदिर, योगेंद्र मठ, शिव शक्ति-महानिर्वाण आश्रम और भारत सेवाश्रम संघ का विशाल मंदिर भी हैं। रामायण में एक कथा मिलती है जिसके अनुसार कपिल मुनि किसी अन्य स्थान पर तपस्या कर रहे थे। ऐसे ही समय में अयोध्या के सूर्यवंशी राजा सगर एक अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करने लगे। उनके अश्वमेध यज्ञ से डरकर इंद्र ने राक्षस रूप धारण कर यज्ञ के अश्व को चुरा लिया और पाताल लोक में ले जाकर कपिल के आश्रम में बांध दिया। राजा सगर की दो पत्नियां थीं - केशिनी और सुमति। केशिनी के गर्भ से असमंजस पैदा हुआ और सुमति के गर्भ से साठ हजार पुत्र। असमंजस बड़ा ही उद्धत प्रकृति का था। वह प्रजा को बहुत पीड़ा देता था। अतः सगर ने उसे अपने राज्य से निकाल दिया था। अश्वमेध का घोड़ा चुरा लिये जाने के कारण सगर बड़ी चिंता में पड़ गये। उन्होंने अपने साठ हजार पुत्रों को अश्व ढूंढने के लिए कहा। साठों हजार पुत्र अश्व ढूंढते ढूंढते-ढूंढते पाताल लोक में पहुंच गये। वहां उन लोगों ने कपिल मुनि के आश्रम में यज्ञीय अश्व को बंधा देखा। उन लोगों ने मुनि कपिल को ही चोर समझकर उनका काफी अपमान कर दिया। अपमानित होकर ऋषि कपिल ने सभी को शाप दिया - 'तुम लोग भस्म हो जाओ।' शाप मिलते ही सभी भस्म हो गये। पुत्रों के आने में विलंब देखकर राजा सगर ने अपने पौत्र अंशुमान, जो असमंजस का पुत्र था, को पता लगाने के लिए भेजा। अंशुमान खोजते-खोजते पाताल लोक पहुंचा। वहां अपने सभी चाचाओं को भस्म रूप में परिणित देखा तो सारी स्स्थिति समझ गया। उन्होंने कपिल मुनि की स्तुति कर प्रसन्न किया। कपिल मुनि ने उसे घोड़ा ले जाने की अनुमति दे दी और यह भी कहा कि यदि राजा सगर का कोई वंशज गंगा को वहां तक ले आये तो सभी का उद्धार हो जाएगा। अंशुमान घोड़ा लेकर अयोध्या लौट आया। यज्ञ समाप्त करने के बाद राजा सगर ने 30 हजार वर्षों तक राज्य किया और अंत में अंशुमान को राजगद्दी देकर स्वर्ग सिधार गये। अंशुमान ने गंगा को पृथ्वी पर लाने का काफी प्रयत्न किया लेकिन सफल नहीं हो पाया। अंशुमान के पुत्र दिलीप ने दीर्घकाल तक तपस्या की लेकिन वह भी सफल नहीं हो पाया। दिलीप के पुत्र भगीरथ ने घोर तपस्या की। गंगा ने आश्वासन दिया कि मैं अवश्य पृथ्वी पर आऊंगी लेकिन जिस समय मैं स्वर्गलोक से पृथ्वी पर आऊंगी, उस समय मेरे प्रवाह को रोकने के लिए कोई उपस्थित होना चाहिए। भगीरथ ने इसके लिए भगवान शिव को प्रसन्न किया। भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटा में धारण कर लिया। भगीरथ ने उन्हें पुनः प्रसन्न किया तो शिवजी ने गंगा को छोड़ दिया। गंगा शिवजी के मस्तक से सात स्रोतों में भूमि पर उतरी। ह्रानिदी, पावनी और नलिनी नामक तीन प्रवाह पूर्व की ओर चल गये, वड.क्ष, सीता तथा सिंधु नामक तीन प्रवाह पश्चिम की ओर चले गये और अंतिम एक प्रवाह भगीरथ के बताए हुए मार्ग से चलने लगा। भगीरथ पैदल गंगा के साथ नहीं चल सकते थे अतः उन्हें एक रथ दिया गया। भगीरथ गंगा को लेकर उसी जगह आये जहां उनके प्रपितामह आदि भस्म हुए थे। गंगा सबका उद्धार करती हुई सागर में मिल गयी। भगीरथ द्वारा लाये जाने के कारण गंगा का एक नाम भागीरथी भी पड़ा। जहां भगीरथ के पितरों का उद्धार हुआ, वही स्थान सागर द्वीप या गंगासागर कहलाता है। गंगा सागर से कुछ दूरी पर कपिल ऋषि का सन् 1973 में बनाया गया नया मंदिर है जिसमें बीच में कपिल ऋषि की मूर्ति है। उस मूर्ति के एक तरफ राजा भागीरथ को गोद में लिए हुए गंगाजी की मूर्ति है तथा दूसरी ओर राजा सगर तथा हनुमान जी की मूर्ति है !! 🌺हर हर गंगे।🌺🙏

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Seemma Valluvar Jan 16, 2022

🌈 *तुम जैसे हो वैसे ही बनो। मान सम्मान की ज्यादा आकांक्षा अपमान देती है।*🌈 एक कौवा भागा जा रहा था। एक कोयल ने पूछा कि चाचा, कहां भागे जा रहे हो, बड़ी तेजी में हो! उस कौवे ने कहा कि मैं पूरब की तरफ जा रहा हूं। यहां के लोग बेहूदे हैं, नासमझ हैं, शास्त्रीय संगीत समझते ही नहीं। मैं जब भी शास्त्रीय संगीत छेड़ता हूं, बस लोग भगाते हैं, ताली बजाने लगते हैं कि हटो, भागो! मैं पूरब की तरफ जा रहा हूं। मैंने सुना है कि पूरब के लोग शास्त्रीय संगीत के बड़े पारखी हैं। मैं तो अब पूरब में ही जाकर अपना गीत गाऊंगा। कोयल ने कहा: चाचा, जैसी तुम्हारी मर्जी। जहां जाना हो जाओ, मगर खयाल रखो, लोग सब जगह एक जैसे हैं और तुम्हारा शास्त्रीय संगीत कहीं भी पसंद नहीं किया जायेगा। अच्छा तो यही हो कि तुम इसे संगीत समझना छोड़ो। अच्छा तो यही हो कि तुम जैसे हो वैसा अपने को स्वीकार करो। और ध्यान रखना, तुम जैसे हो जरूरी नहीं कि दूसरे तुम्हें वैसा स्वीकार करें। इसलिए जो सबसे बड़ा प्रश्न है साधक के लिये यही है कि जब दूसरे स्वीकार न करें तो क्या करें? क्योंकि हमारी आम आकांक्षा तो यही होती है कि सब हमें स्वीकार करें। उसी आम आकांक्षा के कारण तो हम झूठे हो जाते हैं। क्योंकि लोग जिसको स्वीकार करते हैं हम वैसा ही अपने को दिखलाने लगते हैं। क्योंकि हमारे मन में बड़ी गहरी आकांक्षा है कि दूसरे सम्मान दें, सत्कार दें। साक्षी वही है, जो कहता है: न मुझे सत्कार चाहिये न सम्मान चाहिये, न मुझे अपमान की चिंता है। मैं तो जैसा हूं, वैसा ही जीऊंगा। तुम सम्मान दो तो ठीक, तुम अपमान दो तो ठीक; वह तुम्हारा प्रश्न है, तुम्हारी समस्या है, मेरा उससे कुछ लेना-देना नहीं। न मैं तुम्हारे सम्मान से प्रसन्न होऊंगा और न तुम्हारे अपमान से अप्रसन्न होऊंगा। मैं तुम्हारे सम्मान-असम्मान के सिक्कों को कोई मूल्य ही नहीं देता। तुम मुझे चालित न कर सकोगे। और तुम मेरे मालिक न हो सकोगे। यही तो सिक्के हैं, जिनके आधार पर दूसरे हमारे मालिक हो जाते हैं। लोग कहते हैं: हम सम्मान देंगे, अगर हमारी बात मानकर चलो। स्वभावतः आखिर सम्मान लेना चाहते हो तो कुछ चुकाना भी पड़ेगा। और जब तुम उनकी बात मानकर चलोगे, झूठे हो जाओगे। जिसे सहज होना है उसे इस बात को समझ ही लेना होगा कि न अब मुझे दूसरों से सम्मान चाहिये, न अपमान का भय होगा। अब तो मैं जैसा हूं, हूं; इसकी ही घोषणा करूंगा। इस सहज भाव से चित्त शुद्ध होता है। जय जय श्री राधे 🙏🌺🌺🌺🌺🚩

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Seemma Valluvar Jan 15, 2022

मन का राजा राजा है, बाकी सब गुलाम. इस नजरिए से एक बार खुद को तौलके देखिये वैसे यह कथा तो है छोटी सी, रोचकता है इसलिए पढ़ने में अच्छी भी लगेगी लेकिन इसकी विशेषता इसकी रोचकता नहीं है, बल्कि इसमें हमारे जीवन के बहुत से झंझटों का समाधान भी है अगर हम इसे बड़े नजरिए से देख सकें तो. पहले कथा पढ़िए, अंत में नजरिए पर भी बात होगी. राजा भोज एक बार जंगल में शिकार करने गए लेकिन घूमते हुए वह अपने सैनिकों से बिछुड़ गए. वह एक वृक्ष के नीचे बैठकर सुस्ताने लगे. तभी उनके सामने से एक लकड़हारा सिर पर लकड़ियों का गठ्ठर उठाए वहां से गुजरा. लकड़हारा अपनी धुन में चला जा रहा था. उसकी नजर राजा भोज पर पड़ी. एक पल के लिए रुका. उसने राजा को गौर से देखा फिर अपने रास्ते पर बढ़ गया. राजा को लकड़हारे के व्यवहार पर बड़ा आश्चर्य हुआ. लकड़हारे ने न उन्हें प्रणाम किया, न ही उनकी सेवा में आया. उन्होंने लकड़हारे को रोककर पूछा, ‘तुम कौन हो?’ लकड़हारे ने जवाब दिया, ‘मैं अपने मन का राजा हूं.’ राजा ने पूछा, ‘अगर तुम राजा हो तो तुम्हारी आमदनी भी बहुत होगी. कितना कमाते हो?’ लकड़हारे ने जवाब दिया, ‘मैं छह स्वर्ण मुद्राएं रोज कमाता हूं.’ भोज की दिलचस्पी बढ़ रही थी. उन्होंने पूछा, ‘तुम इन मुद्राओं को खर्च कैसे करते हो?’ लकड़हारा बोला, ‘मैं रोज एक मुद्रा अपने ऋणदाता यानी मेरे माता-पिता को देता हूं. उन्होंने मुझे पाला-पोसा है, मेरे लिए हर कष्ट सहा है. दूसरी मुद्रा अपने ग्राहक आसामी यानी अपने बच्चों को देता हूं. मैं उन्हें यह ऋण इसलिए दे रहा हूं ताकि मेरे बूढ़े हो जाने पर वे मुझे यह ऋण वापस लौटाएं.’ तीसरी मुद्रा मैं अपने मंत्री को देता हूं, वह है मेरी पत्नी. अच्छा मंत्री वह होता है जो राजा को उचित सलाह दे, हर सुख-दुख में उसका साथ दे. पत्नी से अच्छा साथी मंत्री कौन हो सकता है! चौथी मुद्रा मैं राज्य के खजाने में देता हूं. पांचवीं मुद्रा का उपयोग मैं अपने खाने-पीने पर खर्च करता हूं क्योंकि मैं कड़ी मेहनत करता हूं. छठी मुद्रा मैं अतिथि सत्कार के लिए सुरक्षित रखता हूं क्योंकि अतिथि कभी भी किसी भी समय आ सकता है. अतिथि सत्कार हमारा परम धर्म है.’ एक लकड़हारे से ज्ञान की ऐसी बातें सुनकर राजा हक्के-बक्के रह गए. राजा भोज सोचने लगे, ‘मेरे पास तो लाखों मुद्राएं है पर मैं जीवन के आनंद से वंचित हूं. छह मुद्राएं कमाने वाला लकड़हारा जीवन की शिक्षा का पालन करता अपना वर्तमान और भविष्य दोनों सुखद बना रहा है.’ राजा इसी उधेड़बुन में थे. लकड़हारा जाने लगा. वह लौटकर आया. उसने राजा भोज को प्रणाम किया और बोला, ‘मैं आपको पहचान गया था कि आप राजा भोज हैं. पर मुझे उससे क्या लेना-देना? अपने जीवन से मैं पूरी तरह संतुष्ट हूं इसलिए अपना राजा तो मैं स्वयं हूं.’ जाते-जाते उसने भोज को कई और सबक दे दिए थे. नजरियाः हमारे जीवन का एक बड़ा भाग सोने में निकल जाता है. उसके बाद का सबसे बड़ा भाग आजीविका जुटाने में. आज की दृष्टि इसी बात पर कि आजीविका आखिर है क्या? एक तरफ राजा भोज हैं जिनके पास अनंत स्वर्ण मुद्राएं हैं. जिन्हें राज्य की चिंता, अपने परिजनों की चिंता करनी है लेकिन उलझनों में फंसे है. राजा हैं तो राजा होने का अभिमान भी है. सभी के द्वारा उनकी वंदना हो इसकी भी इच्छा रखते हैं. कैसे सब पर नियंत्रण बनाए रखा जाए, इसकी चिंता अलग. दूसरी तरफ वह लकड़हारा जो अपनी मेहनत से रोज की छह स्वर्ण मुद्राएं कमाता है. उसमें से कहां और कितना खर्चना है, यह तय कर रखा है. किसी मारामारी में नहीं है. जीवन सुकून से चल रहा है. सिर्फ सुकून ही क्यों वह अपनी, अपने परिवार की और अपने देश तक की चिंता करता हुआ सुखी है. इच्छाओं का कहीं अंत है क्या? एक के बाद दूसरी पैदा होगी. एक आत्मअनुशासन रखिए. अपने बच्चों के सामने कभी बड़ी-बड़ी इच्छाओं और उसे पूरी करने के लिए कर रहे प्रपंचों की चर्चा न होने दें. एक असंतुष्ट मन विवेकपूर्ण निर्णय नहीं कर पाता. अपनी जरूरतों की हमें एक रेखा खींच लेनी चाहिए. जीवन सुखमय होगा यदि हम राजा भोज की बजाय लकड़हारे बनने का प्रयास करेंगे. मन का राजा होता है. मन के राजा के सामने सभी गुलाम होते हैं. कबीरदास जी ने कितनी सुंदर बात लिखी है- चाह मिटी चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह ! उनको कुछ नहीं चाहिए, जो शाहन के शाह !! ॐ शं शनैश्चराय नमः 🙏🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🚩

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Seemma Valluvar Jan 14, 2022

. (((( तारणहारा 'हरि का नाम' )))) . एक संत जो एक शहर के बस स्टैंड के पास एक वृक्ष की छाया में बैठकर माला फेर रहा था। . एक अंग्रेज बस से उतरा और बाबा के पास जाकर बोला ये आपके हाथ में क्या है? . बाबा ने अंग्रेज के कंधे पर बन्दुक देखी और पूछा: ये क्या है? . अंग्रेज ने कहा ये मेरा हथियार है। . बाबा बोले ये मेरा हथियार है। . अंग्रेज बोला ये आपको किसने दिया? . बाबा बोले यह बन्दुक किसने दी आपको? . अंग्रेज बोला मेरी सरकार ने दी है। . बाबा ने कहा यह माला मेरी युगल सरकार ने मुझे दी है। . अंग्रेज बोला ये क्या काम करती है? . बाबा बोले तेरा हथियार क्या काम करता है? . अंग्रेज ने ऊपर पेड़ पर बैठे पक्षी को गोली मारी और वह पक्षी तड़पता हुआ नीचे गिर गया और बोला... . ये काम करता है मेरा हथियार! . बाबा ने उस पक्षी को अपनी माला से छूआ और कहा: "राम" वो पक्षी उड़ कर अपने स्थान पर बैठ गया..! . बाबा बोले मेरा हथियार ये काम करता है। . उस अंग्रेज ने भी श्री हरिनाम की दीक्षा ली और हरि नाम की महिमा में रंग गया। . हरि नाम की लूट, है लूट सके तो लूट। अंत काल पछतायेगा, जब प्राण जाएंगे छूट॥ ~~~~~~~~~~~~~~~~~ ((((((( जय जय श्री राधे ))))))) ~~~~~~~~~~~~~~~~~

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Seemma Valluvar Jan 13, 2022

मकर संक्रांति हिंदुओं का प्रमुख त्योहार है, पौष मास में इस दिन सूर्य उत्तरायण होकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, इस साल मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाएगी, इस वर्ष संक्रांति का पुण्य काल दोपहर 02.43 बजे से शाम 06.04 बजे तक है। मकर संक्रांति पर स्नान और दान जैसे कार्यों का विशेष महत्व माना जाता है। यह त्योहार अलग-अलग शहरों में अलग नामों से मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन किए गए दान का फल बाकी दिनों की तुलना में कई गुना अधिक होता है। वह जातकों को शनि और राहु की पीड़ा से भी मुक्ति मिलती है।मकर संक्रांति पर खिचड़ी का दान करना शुभ होता है। वहीं इस दिन खिचड़ी खाना भी शुभ माना गया है। इस दिन गुड़ दान करना शुभ है। मान्यता है कि इसके दान से सूर्यदेव प्रसन्न होते है। मकर संक्रांति के दिन तेल का दान करना शुभ माना गया है। मान्यता है कि तेल दान से शनि देव की कृपा मिलती है।इस दिन तिल का दान करना चाहिए। इससे शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलती है।मकर संक्रांति पर घी का दान करने से करियर में तरक्की होती है, मकर संक्रांति के दिन काले कंबल दान करना चाहिए। इससे शनि और राहु के दोष से मुक्ति मिलती है। जय माता दी 🙏🌺🌺🌺🌺🌺🚩

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Seemma Valluvar Jan 13, 2022

बालक श्रीकृष्ण का मुंडन संस्कार 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ प्राचीन काल में व्रज के लोगों का मुख्य व्यवसाय गौ-चारण ही था इसलिए मुख्य व्यवसाय से सम्बंधित कुछ वर्जनाएं भी थी. अब इसे वर्जनाएं कहें या सामाजिक नियम बालक का जब तक मुंडन नहीं हो जाता तब तक उसे जंगल में गाय चराने नहीं जाने दिया जाता था. अब तो हम काफी आधुनिक हो गये हैं या यूं कह सकते हैं अपनी जड़ों से दूर हो गये हैं नहीं तो हमारे यहाँ भी बालक को मुंडन के पहले ऐसी-वैसी जगह नहीं जाने दिया जाता था. खैर....बालक कृष्ण रोज़ अपने परिवार के व पास-पडौस के सभी पुरुषों को, थोड़े बड़े लड़कों को गाय चराने जाते देखते तो उनका भी मन करता पर मैया यशोदा उन्हें मना कर देती कि अभी तू छोटा है, थोड़ा बड़ा हो जा फिर जाने दूँगी. एक दिन बलराम जी को गाय चराने जाते देख कर लाला अड़ गये –“दाऊ जाते हैं तो मैं भी गाय चराने जाऊंगा....ये क्या बात हुई....वो बड़े और मैं छोटा ?” मैया ने समझाया कि दाऊ का मुंडन हो चुका है इसलिए वो जा सकते हैं, तुम्हारा मुंडन हो जायेगा तो तुम भी जा सकोगे. लाला को चिंता हुई इतनी सुन्दर लटें रखे या गाय चराने जाएँ ? बहुत सोच विचार के बाद उन्होंने सोचा कि लटें तो फिर से उग जायेगी पर गाय चराने का इतना आनंद अब मुझसे दूर नही रहना चाहिए. वे तुरंत नन्दबाबा से बोले –“कल ही मेरा मुंडन करा दो....मुझे गाय चराने जाना है.” नंदबाबा हँस के बोले –“ऐसे कैसे करा दें मुंडन....हमारे लाला के मुंडन में तो बहुत बड़ा आयोजन करेंगे तब लाला के केश जायेंगे.” लाला ने अधीरता से कहा –“आपको जो आयोजन करना है करो पर मुझे गाय चराने जाना है....आप जल्दी से जल्दी मेरा मुंडन करवाओ.” मुंडन तो करवाना ही था अतः नंदबाबा ने गर्गाचार्यजी से लाला के मुंडन का शुभ-मुहूर्त निकलवाने का आग्रह किया. निकट में अक्षय तृतीया का दिन शुभ था इसलिए उस दिन मुंडन का आयोजन तय हुआ. आसपास के सभी गावों में न्यौते बांटे गये, हर्षोल्लास से कई तैयारियां की गयी. आखिर आयोजन का दिन आ ही गया. आसपास के गावों के हजारों अतिथियों की उपस्थिति में भव्य आयोजन हुआ, मुंडन हुआ और मुंडन होते ही लाला मैया से बोले –“मैया मुझे कलेवा (नाश्ता) दो.....मुझे गाय चराने जाना है.” मैया थोड़ी नाराज़ होते हुए बोली –“इतने मेहमान आये हैं घर में तुम्हें देखने और तुम हो कि इतनी गर्मी में गाय चराने जाना है.....थोड़े दिन रुको गर्मी कम पड़ जाए तो मैं तुम्हें दाऊ के साथ भेज दूँगी.” लाला भी अड़ गये –“ऐसा थोड़े होता है....मैंने तो गाय चराने के लिए ही मुंडन कराया था....नहीं तो मैं इतनी सुन्दर लटों को काटने देता क्या ? मैं कुछ नहीं जानता.....मैं तो आज और अभी ही जाऊंगा गाय चराने.’’ मैया ने नन्दबाबा को बुला कर कहा –“लाला मान नहीं रहा.....थोड़ी दूर तक आप इसके साथ हो आइये.....इसका मन भी बहल जायेगा.....क्योंकि इस गर्मी में मैं इसे दाऊ के साथ या अकेले तो भेजूंगी नहीं.” नन्दबाबा सब को छोड़ कर निकले. लाला भी पूरी तैयारी के साथ छड़ी, बंसी, कलेवे की पोटली ले कर निकले एक बछिया भी ले ली जिसे हुर्र.....हुर्र कर घेर कर वो अपने मन में ही बहुत खुश हो रहे थे.....कि आखिर मैं बड़ा हो ही गया. बचपन में सब बड़े होने के पीछे भागते हैं कि कब हम बड़े होगे.....और आज हम बड़े सोचते हैं कि हम बालक ही रहते तो कितना अच्छा था. खैर.....गर्मी भी वैशाख माह की थी और व्रज में तो वैसे भी गर्मी प्रचंड होती है. थोड़ी ही देर में बालक श्रीकृष्ण गर्मी से बेहाल हो गये पर अपनी जिद के आगे हार कैसे मानते, बाबा को कहते कैसे की थक गया हूँ....अब घर ले चलो. चलते रहे....मैया होती तो खुद समझ के लाला को घर ले आती पर संग में बाबा थे, वे भी चलते रहे. थोड़ी ही दूर ललिताजी और कुछ अन्य सखियाँ मिली. देखते ही लाला की हालत समझ गयी. गर्मी से कृष्ण का मुख लाल हो गया था सिर पर बाल भी नही थे इसलिए लाला पसीना-पसीना हो गये थे. उन्होंने नन्दबाबा से कहा कि आप इसे हमारे पास छोड़ जाओ. हम इसे कुछ देर बाद नंदालय पहुंचा देंगे. नंदबाबा को रवाना कर वो लाला को निकट ही अपने कुंज में ले गयीं. उन्होंने बालक कृष्ण को कदम्ब की शीतल छांया में बिठाया और अपनी अन्य सखी को घर से चन्दन, खरबूजे के बीज, मिश्री का पका बूरा, इलायची, मिश्री आदि लाने को कहा. सभी सामग्री ला कर उन सखियों ने प्रेम भाव से कृष्ण के तन पर चन्दन की गोटियाँ लगाई और सिर पर चन्दन का लेप किया. कुछ सखियों ने पास में ही बूरे और खरबूजे के बीज के लड्डू बना दिए और इलायची को पीस कर मिश्री के रस में मिला कर शीतल शरबत तैयार कर दिया और बालक कृष्ण को प्रेमपूर्वक आरोगाया. साथ ही ललिता जी लाला को पंखा झलने लगी. यह सब अरोग कर लाला को नींद आने लगी तो ललिताजी ने उन्हें वहीँ सोने को कहा और स्वयं उन्हें पंखा झलती रही. कुछ देर आराम करने के बाद लाला उठे और ललिताजी उन्हें नंदालय छोड़ आयीं. आज भी अक्षय-तृतीया के दिन प्रभु को ललिताजी के भाव से बीज के लड्डू और इलायची का शीतल शर्बत आरोगाये जाते हैं व विशेष रूप से केशर मिश्रित चन्दन (जिसमें मलयगिरी पर्वत का चन्दन भी मिश्रित होता है) की गोटियाँ लगायी जाती है। लाला ने गर्मी में गाय चराने का विचार त्याग दिया था. औपचारिक रूप से श्री कृष्ण ने गौ-चारण उसी वर्ष गोपाष्टमी (दीपावली के बाद वाली अष्टमी) के दिन से प्रारंभ किया और इसी दिन से उन्हें गोपाल कहा जाता है. वर्ष में एक ये ही दिन ऐसा होता है जब बीज के लड्डू अकेले श्रीजी को आरोगाये जाते हैं अन्यथा अन्य दिनों में बीज के लड्डू के साथ चिरोंजी के लड्डू भी आरोगाये जाते हैं. 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ जय जय श्री हरि 🙏🌺🌺🌺🌺🚩

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