Seema Varshney Mar 28, 2020

नवरात्री के चतुर्थ दिवस आदि शक्ति माँ दुर्गा के @@@@@ *कूष्मांडा स्वरूप*@@@@@ की उपासना विधि एवं समृद्धि पाने के उपाय सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च। दधानाहस्तपद्याभ्यां कुष्माण्डा शुभदास्तु में॥ माँ श्री दुर्गा का चतुर्थ रूप कूष्मांडा हैं। अपनी मन्द हंसी से अपने उदर से अण्ड अर्थात ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारंण इन्हें कूष्माण्डा देवी के नाम से जाना जाता है। संस्कृत भाषा में कूष्माण्ड कूम्हडे को कहा जाता है, कूम्हडे की बलि इन्हें प्रिय है, इस कारण से भी इन्हें कूष्माण्डा के नाम से जाना जाता है। जब सृष्टि नहीं थी और चारों ओर अंधकार ही अंधकार था तब इन्होंने ईषत हास्य से ब्रह्माण्ड की रचना की थी। यह सृष्टि की आदिस्वरूपा हैं और आदिशक्ति भी। इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में है। सूर्यलोक में निवास करने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है। कुष्मांडा देवी के शरीर की चमक भी सूर्य के समान ही है कोई और देवी देवता इनके तेज और प्रभाव की बराबरी नहीं कर सकतें। माता कुष्मांडा तेज की देवी है इन्ही के तेज और प्रभाव से दसों दिशाओं को प्रकाश मिलता है। कहते हैं की सारे ब्रह्माण्ड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में जो तेज है वो देवी कुष्मांडा की देन है। श्री कूष्मांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक नष्ट हो जाते हैं। इनकी आराधना से मनुष्य त्रिविध ताप से मुक्त होता है। माँ कुष्माण्डा सदैव अपने भक्तों पर कृपा दृष्टि रखती है। इनकी पूजा आराधना से हृदय को शांति एवं लक्ष्मी की प्राप्ति होती हैं। इस दिन भक्त का मन ‘अनाहत’ चक्र में स्थित होता है, अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और शांत मन से कूष्माण्डा देवी के स्वरूप को ध्यान में रखकर पूजा करनी चाहिए। संस्कृत भाषा में कूष्माण्ड कूम्हडे को कहा जाता है, कूम्हडे की बलि इन्हें प्रिय है, इस कारण भी इन्हें कूष्माण्डा के नाम से जाना जाता है। माँ कुष्मांडा पूजा विधि 〰🌼〰🌼〰🌼〰 जो साधक कुण्डलिनी जागृत करने की इच्छा से देवी अराधना में समर्पित हैं उन्हें दुर्गा पूजा के चौथे दिन माता कूष्माण्डा की सभी प्रकार से विधिवत पूजा अर्चना करनी चाहिए फिर मन को ‘अनाहत’ में स्थापित करने हेतु मां का आशीर्वाद लेना चाहिए और साधना में बैठना चाहिए। इस प्रकार जो साधक प्रयास करते हैं उन्हें भगवती कूष्माण्डा सफलता प्रदान करती हैं जिससे व्यक्ति सभी प्रकार के भय से मुक्त हो जाता है और मां का अनुग्रह प्राप्त करता है। अतः इस दिन पवित्र मन से माँ के स्वरूप को ध्यान में रखकर पूजन करना चाहिए। माँ कूष्माण्डा देवी की पूजा से भक्त के सभी रोग नष्ट हो जाते हैं। माँ की भक्ति से आयु, यश, बल और स्वास्थ्य की वृध्दि होती है। इनकी आठ भुजायें हैं इसीलिए इन्हें अष्टभुजा कहा जाता है। इनके सात हाथों में कमण्डल, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। आठवें हाथ में सभी सिध्दियों और निधियों को देने वाली जपमाला है। कूष्माण्डा देवी अल्पसेवा और अल्पभक्ति से ही प्रसन्न हो जाती हैं। यदि साधक सच्चे मन से इनका शरणागत बन जाये तो उसे अत्यन्त सुगमता से परम पद की प्राप्ति हो जाती है। देवी कुष्मांडा का वाहन सिंह है। दुर्गा पूजा के चौथे दिन देवी कूष्माण्डा की पूजा का विधान उसी प्रकार है जिस प्रकार देवी ब्रह्मचारिणी और चन्द्रघंटा की पूजा की जाती है। इस दिन भी आप सबसे पहले कलश और उसमें उपस्थित देवी देवता की पूजा करें फिर माता के परिवार में शामिल देवी देवता की पूजा करें जो देवी की प्रतिमा के दोनों तरफ विरजामन हैं. इनकी पूजा के पश्चात देवी कूष्माण्डा की पूजा करे: पूजा की विधि शुरू करने से पहले हाथों में फूल लेकर देवी को प्रणाम कर इस मंत्र का ध्यान करें सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे।। माँ कुष्मांडा शप्तशती मंत्र 〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰 या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। माँ कूष्मांडा का उपासना मंत्र 〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰 कुत्सित: कूष्मा कूष्मा-त्रिविधतापयुत: संसार:, स अण्डे मांसपेश्यामुदररूपायां यस्या: सा कूष्मांडा माँ कुष्मांडा ध्यान मन्त्र 〰🌼〰🌼〰🌼〰 वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्। सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥ भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्। कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥ पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्। मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥ प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्। कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥ माँ कुष्मांडा स्तोत्र पाठ 〰🌼〰🌼〰🌼〰 दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दरिद्रादि विनाशनीम्। जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥ जगतमाता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्। चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥ त्रैलोक्यसुन्दरी त्वंहिदुःख शोक निवारिणीम्। परमानन्दमयी, कूष्माण्डे प्रणमाभ्यहम्॥ माँ कुष्मांडा कवच 〰🌼〰🌼〰 हंसरै में शिर पातु कूष्माण्डे भवनाशिनीम्। हसलकरीं नेत्रेच, हसरौश्च ललाटकम्॥ कौमारी पातु सर्वगात्रे, वाराही उत्तरे तथा,पूर्वे पातु वैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणे मम। दिगिव्दिक्षु सर्वत्रेव कूं बीजं सर्वदावतु॥ 4. कूष्मांडा : ब्रह्मांड को उत्पन्न करने की शक्ति प्राप्त करने के बाद उन्हें कूष्मांड कहा जाने लगा। उदर से अंड तक वह अपने भीतर ब्रह्मांड को समेटे हुए है, इसीलिए कूष्मां डा कहलाती है। माँ कुष्मांडा पौरिणीक कथा 〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰 दुर्गा सप्तशती के कवच में वर्णन है की कुत्सित: कूष्मा कूष्मा-त्रिविधतापयुत: संसार:, स अण्डे मांसपेश्यामुदररूपायां यस्या: सा कूष्मांडा। वह देवी जिनके उदर में त्रिविध तापयुक्त संसार स्थित है वह कूष्माण्डा हैं। देवी कूष्माण्डा इस चराचार जगत की अधिष्ठात्री हैं। जब सृष्टि की रचना नहीं हुई थी उस समय अंधकार का साम्राज्य था। देवी कुष्मांडा जिनका मुखमंड सैकड़ों सूर्य की प्रभा से प्रदिप्त है उस समय प्रकट हुई उनके मुख पर बिखरी मुस्कुराहट से सृष्टि की पलकें झपकनी शुरू हो गयी और जिस प्रकार फूल में अण्ड का जन्म होता है उसी प्रकार कुसुम अर्थात फूल के समान मां की हंसी से सृष्टि में ब्रह्मण्ड का जन्म हुआ। इस देवी का निवास सूर्यमण्डल के मध्य में है और यह सूर्य मंडल को अपने संकेत से नियंत्रित रखती हैं। देवी कूष्मांडा अष्टभुजा से युक्त हैं अत: इन्हें देवी अष्टभुजा के नाम से भी जाना जाता है। देवी अपने इन हाथों में क्रमश: कमण्डलु, धनुष, बाण, कमल का फूल, अमृत से भरा कलश, चक्र तथा गदा है। देवी के आठवें हाथ में बिजरंके (कमल फूल का बीज) का माला है है, यह माला भक्तों को सभी प्रकार की ऋद्धि सिद्धि देने वाला है। देवी अपने प्रिय वाहन सिंह पर सवार हैं। जो भक्त श्रद्धा पूर्वक इस देवी की उपासना दुर्गा पूजा के चौथे दिन करता है उसके सभी प्रकार के कष्ट रोग, शोक का अंत होता है और आयु एवं यश की प्राप्ति होती है। माँ कुष्मांडा उपासना का साथ धन अर्जित करने का मंत्र 〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰 मंत्र (१) 👉 ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालेय प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नम : मंत्र (२)👉 दुर्गे स्मृता हरसिभीतिमशेष जन्तो : स्वस्थ्याई : स्मृता मति मतीव शुभाम ददासि लक्ष्मी प्राप्ति के आसन उपाय 〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰 उपाय (१)👉 पान में गुलाब की सात पंखुड़ियां रखें और पान को देवी जी को चढ़ा दें l आप को धन की प्राप्ति होगी उपाय (२)👉 गुलाब की फूल में कपूर का टुकड़ा रखें l शाम के समय फूल में एक कपूर जला दें और फूल देवी को चढ़ा दें l इससे आपको अचानक धन मिल सकता है उपाय (३)👉 चौदह मुखी रुद्राक्ष सोने में जड़वा कर किसी पत्र में लाल फूल बिछाकर उस पर रखें दूध, दही, घी ,मधु ,और गंगाजल से स्नान कराएँ l धूप दीप से पूजा करके धारण करें | उपाय (४)👉 इमली के पेड़ की डाल काट कर घर में रखें या धन रखने की स्थान पर रखें तो धन की वृद्धि होगी | उपाय (५)👉 एक नारियल और उसके साथ एक लाल फूल ,एक पीला ,एक नीला फूल और सफ़ेद फूल माँ को चढ़ाएं …नवमी के दिन ये फूल नदी में बहा दें |और नारियल को लाल कपडे में लपेट कर तिजोरी में रखें माँ प्राराब्ध काटेगी अखण्ड लक्ष्मी की प्राप्ति होगी। माँ कुष्मांडा जी की आरती 〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰 ॐ जय माँ कुष्मांडाचौथ जब नवरात्र हो, कुष्मांडा को ध्याते। जिसने रचा ब्रह्माण्ड यह, पूजन है करवाते।। ॐ जय माँ कुष्मांडा आद्यशक्ति कहते जिन्हें, अष्टभुजी है रूप। इस शक्ति के तेज से, कही छाँव कही धुप।। ॐ जय माँ कुष्मांडा कुम्हड़े की बलि करती है, तांत्रिक से स्वीकार। पेठे से भी रजति, सात्विक करे विचार।। ॐ जय माँ कुष्मांडा क्रोधित जब हो जाए, यह उल्टा करे व्यवहार। उसको रखती दूर माँ, देती दुःख अपार।। ॐ जय माँ कुष्मांडा सूर्य चंद्र की रौशनी, यह जग में फैलाये। शरणागत में आया, माँ तू ही राह दिखाये।। ॐ जय माँ कुष्मांडा। माँ दुर्गा की आरती 〰🌼〰🌼〰 जय अंबे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी । तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ॥ ॐ जय… मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को । उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको ॥ ॐ जय… कनक समान कलेवर, रक्तांबर राजै । रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै ॥ ॐ जय… केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी । सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी ॥ ॐ जय… कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती । कोटिक चंद्र दिवाकर, राजत सम ज्योती ॥ ॐ जय… शुंभ-निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती । धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती ॥ॐ जय… चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे । मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भय दूर करे ॥ॐ जय… ब्रह्माणी, रूद्राणी, तुम कमला रानी । आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ॥ॐ जय… चौंसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैंरू । बाजत ताल मृदंगा, अरू बाजत डमरू ॥ॐ जय… तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता । भक्तन की दुख हरता, सुख संपति करता ॥ॐ जय… भुजा चार अति शोभित, वरमुद्रा धारी । >मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी ॥ॐ जय… कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती । श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती ॥ॐ जय… श्री अंबेजी की आरति, जो कोइ नर गावे । कहत शिवानंद स्वामी, सुख-संपति पावे ॥

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Seema Varshney Dec 10, 2019

मित्रो बहुत भावुक ज्ञानवर्धक कथा है, जब भगवान शंकर को पता चलता है, कि रामावतार हो चुका है, तो वह प्रभुश्रीराम के बालरूप के दर्शन करने के लिये कागभुशुण्डि जी के साथ मनुष्य को रूप बना के अयोध्या आते हैं, आगे पढें,,,,,,, *बंदउँ बालरूप सोइ रामू। सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू॥ मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥ भावार्थ:-मैं उन्हीं श्री रामचन्द्रजी के बाल रूप की वंदना करता हूँ, जिनका नाम जपने से सब सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। मंगल के धाम, अमंगल के हरने वाले और श्री दशरथजी के आँगन में खेलने वाले (बालरूप) श्री रामचन्द्रजी मुझ पर कृपा करें॥ जिस समय भगवान राम का जन्म हुआ तो चारों और उत्सव मनाया जा रहा है। भगवान शिव भी भगवान राम के बाल रूप का दर्शन करने गए थे। वही कथा पार्वती माँ को सुना रहे है। भगवान शिव कहते हैं पार्वती जिस समय भगवान का अवतरण हुआ था उस समय मुझसे रहा नही गया। मैं अपने मन को रोक नही पाया और तुरंत अवधपुरी पहुंच गया। मेरी चोरी ये थी की मैंने तुमको नही बताया। भगवान ये कहना चाह रहे हैं की जब भगवान का बुलावा आये तो किसी का इंतजार मत करना। और एक मानव रूप धारण कर लिया। पार्वती बोली की आप महादेव हो। और मानव बनकर क्यों गए? भगवान शिव बोले हैं की जब महादेव के देव भी मानव बनकर आ सकते हैं तो मैं मानव ना बनूँ तो ये कैसे हो सकता हैं? जैसे ही अयोध्या में पहुंचा हुईं बहुत भीड़ लगी हुई हैं। भोलेनाथ बहुत प्रयास कर रहे हैं राम जी के दर्शन करने का। लेकिन नही जा पा रहे हैं। शिव ने थोड़ी ताकत लगाई हैं। और थोड़ा धक्का दिया हैं। जैसे ही शिव ने धक्का दिया हैं तो अंदर से ऐसा धक्का आया हैं की भोले नाथ दूर जाकर मंदिर के एक शिवलिंग के पास टकराकर गिर गए हैं। भोलेनाथ बोले की ये लो, हो गए दर्शन। राम के तो हुए नही पर मेरे खुद के हो गए। भोलेनाथ ने सोचा की ऐसी भीड़ में दर्शन कैसे हो? तब भोलेनाथ को याद आई मेरा एक चेला हैं वो दिखाई नही दे रहा हैं। यहीं कहीं ही होगा। वो चेला हैं काकभुशुण्डि जी महाराज। सोच रहे हैं की भगवान का दर्शन करने जरूर आये होंगे। जैसे ही भोलेनाथ ने इन्हे याद किया हैं तो काकभुशुण्डि जी तुरंत आ गए हैं। क्योंकि कौवे के रूप में हैं। भोलेनाथ को कहते हैं महादेव कैसे बुलाया हैं। जल्दी बताइये। भोलेनाथ बोले की जल्दी बताऊ। पर क्यू? कहाँ जाना हैं? काकभुशुण्डि जी बोले की तुम्हारे पीछे उत्सव छोड़ कर आया हूँ। शिव जी बोले की तुम कहाँ थे? उसने कहा की प्रभु मैं तो अंदर ही था। दशरथ जी खूबआनन्द लूटा रहे हैं। बड़ा आनंद हो रहा हैं। भगवान शिव बोले की बढ़िया हैं। मानव को तो भीड़ के कारण रोक सकते हैं पर कौवे को कौन रोकेगा। वाह! चेला आनंद ले रहा हैं और गुरु यहाँ बैठा हैं। भोलेबाबा कहते हैं की चेला जी कोई युक्ति बताइये, हमे भी दर्शन करवाइये। काकभुशुण्डि जी ने कहा की महाराज चलो कोई युक्ति बनाते हैं। काकभुशुण्डि ने भी मानव रूप धारण कर लिया। बहुत बार प्रयास किया हैं लेकिन इन्हे अंदर नही जाने दिया। अब जब काफी समय हुआ तो भगवान राम ने भी रोना शुरू कर दिया। इनके मन में भी भोले बाबा के दर्शन करने की तड़प जाग गई हैं। अब राम जी दुःख में तड़प कर रो रहे हैं। और जब ये पीड़ा भरी पुकार मैया के कानों में गई हैं तो कौसल्या जी बिलख पड़ी हैं। की मेरे लाल को आज क्या हो गया हैं। इधर भोले बाबा ने भी पूरा नाटक किया है। भोले बाबा एक 80 साल के ज्योतिष बन गए हैं। गोस्वामी जी ने गीतावली में इस भाव को बताया हैं। और स्वयं ज्योतिषी बन कर काकभुशुण्डि जी को अपना शिष्य बना लिया है और सरयू जी के किनारे बैठ गए है। जितने भी लोग रस्ते से आ-जा रहे है भगवान शिव सबके हाथ देख रहे है। और भविष्यवाणी कर रहे हैं। अब अवधपुरी में चर्चा शुरू हो गई हैं कोई बहुत बड़ा ज्योतिषी आ गया हैं। गोस्वामी जी कह रहे हैं। अवध आजु आगमी एकु आयो। जब भगवान राम ने रोना शुरू किया हैं तो माँ बहुत परेशान हैं। गुरु वशिष्ठ जी को खबर की गई हैं। लेकिन वशिष्ठ जी व्यस्त हैं। इतने में एक नौकर आकर बोला की मैया,” मुझे खबर मिली हैं की एक बहुत बड़ा ज्योतिषी अवध पूरी में आया हैं। आपकी आज्ञा हो तो उसे बुला लाऊँ।” माँ तो परेशान थी। मैया ने कहा- की जाओ और जल्दी बुला कर लाओ। बस मेरे लाल का रोना बंद हो जाये। दौड़े दौड़े सेवक गए हैं । भोले बाबा सरयू नदी के किनारे बैठे हुए हैं। नौकरों ने कहा की आप ही वो ज्योतिषी हैं जिसकी चर्चा हर जगह फैली हुई हैं। भोले बाबा बोले तुम लोग कहाँ से आये हो? वो बोले की हम राजभवन से आये हैं। ये सुनते ही भोले नाथ का रोम-रोम पुलकित हो गया हैं। समझ गए हैं की मेरे राम ने ही इन्हे भिजवाया हैं। भगवान शिव बोले की क्या करना हैं बोलो? वो सेवक बोले की महाराज जल्दी चलिए, सुबह से लाला आज बहुत रो रहे हैं। रानी ने आपको बुलाया हैं। भोले नाथ जैसे ही चलने लगे तो काकभुशुण्डि जी कुरता पकड़ लिया हैं। की महाराज मैं भी तो आपके साथ में हूँ। मुझे भी साथ लेके चलो। भोले नाथ बोले की तुमने दर्शन तो कर लिए हैं। तुम जाकर क्या करोगे? काकभुशुण्डि जी कहते हैं की मैंने दर्शन तो किया हैं पर स्पर्श नही किया हैं प्रभु का। यदि तुम स्पर्श करवाओगे तो ठीक नही हैं नही तो अभी पोल खोलता हूँ तुम्हारी। जितनी भी कृपा होगी उस पर हमे भी तो मिलनी चाहिए। भोले नाथ बोले की ठीक हैं आपको भी दर्शन करवा देते हैं पर आप पोल मत खोलना। जब राजभवन पर पहुंचे हैं तो पहरेदारों ने रोक लिया हैं। हाँ भैया कौन हो और कहाँ जा रहे हो? नौकर बोले की इन्हे रानी ने बुलाया हैं। ये ज्योतिषी हैं। इन्हे अंदर जाने दो। अब भोले बाबा राजभवन में अंदर प्रवेश करने लगे हैं पर काकभुशुण्डि जी को रोक लिया हैं। पहरेदार बोले ठीक हैं ये ज्योतिषी हैं तो अंदर जा रहे हैं पर ये साथ में कौन हैं जो अंदर चला जा रहा हैं। इनके अंदर जाने का क्या काम? दशरथ जी का आदेश हैं की किसी अनजान को अंदर नही आने देना हैं। भोले बाबा मुस्कुरा कर अंदर जाने लगे हैं तभी काकभुशुण्डि बोले की प्रभु साथ लेके जाओ नही तो पोल खोलता हूँ अभी। भोले बाबा बोले की ठीक हैं मैं कुछ करता हूँ। भोले बाबा कहते हैं की भैया बात ऐसी हैं। मैंने 80 साल का बूढ़ा हो गया हूँ। ज्योतिषी तो पक्का हूँ पर आँखों से कम दिखाई देता हैं। ये मेरे चेला हैं। इनके बिना मेरा काम चलेगा। मैया बोली की करो महाराज अब जो आपको अपना झाड़-फूँक करना हैं। भोले नाथ बोले की मैया- इतनी दूर से कुछ नही होगा। ना तो तू मुँह दिखा रही। ना तू स्पर्श करवा रही। बिना मुँह देखा और बिना स्पर्श करे मैं कुछ नही कर सकता हूँ। मुझे एक एक अंग देखना पड़ेगा की नजर कहाँ लगी हैं। नाक को लगी हैं या आँख को लगी हैं। मैया बोली की दूर से कुछ नही होगा? भोले नाथ बोले-मैया दूर से कुछ भी नही होगा। आज मैया ने अपनी साडी का पल्लू उठा लिया और जो राम जी अब तक रो रहे थे भगवान शिव को देख कर खिलखिलाकर मुस्कुराने लगे हैं। मैया बोली-महाराज आप तो कमाल के ब्राह्मण हो। आपने सिर्फ लाला को देखा ही हैं और लाला का रोना बंद कर दिया हैं। भगवान शिव बोले की मैया अभी तो नजर पड़ी हैं और रोना बंद हो गया हैं अगर तू गोदी में दे दे तो हमेशा के लिए आनंद आ जाये। अब मैया ने तुरंत राम जी को लेकर भोले नाथ की गोदी में दे दिया हैं। जैसे ही भगवान, भगवान शिव की गोदी में आये हैं। मानो साक्षात शिव और राम का मिलान हो गया हैं। भगवान शिव की नेत्रों से आंसू बहने लगे हैं। अब तक जिस बाल छवि का मन में दर्शन करते थे आज साक्षात दर्शन हो गए हैं। भोले नाथ कभी हाथ पकड़ते हैं, कभी गाल छूते हैं और माथा सहलाते हैं। भगवान राम भी टुकुर-टुकुर अपनी आँखों से शिव जी को देख रहे हैं। जब थोड़ी देर हो गई तो काकभुशुण्डि जी ने पीछे से कुरता पकड़ा हैं। और कहते हैं हमारा हिस्सा भी तो दीजिये। आपने आनंद ले लिया हैं तो मुझे पर भी कृपा करो। अब भगवान शिव जब राम को काकभुशुण्डि की गोद में देने लगे तो मैया ने रोक दिया हैं। की इनकी गोद में लाला को क्यों दे रहे हो? भगवान शिव बोले की मैया मैं बूढ़ा हो गया हूँ ये मेरे चेला हैं। ये हाथ देखेंगे और मैं भविष्य बताऊंगा। काकभुशुण्डि जी की गोद में लाला को दे दिया हैं। अब काकभुशुण्डि जी भी भगवान का दर्शन पा रहे हैं। और भोले नाथ ने भगवान का सारा भविष्य बताया हैं। सब बता दिया हैं की आपके लाला कोई साधारण लाला नही होंगे आपका लाला का जग में बहुत नाम होगा। आपके लाला के नाम से ही लोग भव सागर तर जायेंगे। मैया बोली की ये सब ठीक हैं पर ये बताओ की लाला की शादी कब होगी? भोले नाथ बोले की इतना बता सकते हैं आगे चलकर आप थोड़ा ध्यान रखना। एक बूढ़े बाबा आपके लाला को आपसे मांगने के लिए आएंगे। और जब वो मांगने आये तो तुम तुरंत दिलवा देना। मना मत करवाना। क्योंकि आपके लाला उनके साथ चले जायेंगे तो वहां से बहू लेकर ही आएंगे। कौसल्या जी बोली की आप चिंता मत करो महाराज ये बात मेरे दिमाग में नोट हो गई हैं। मैं इसे हमेशा याद रखूंगी। इस प्रकार भोले बाबा ने सब बताया हैं। मैया ने बोला की आपने बड़ी कृपा की हैं मेरे लाला का रोना बंद करवा दिया हैं। मेरे लाला का भविष्य बता दिया हैं। अब मेरे लाला को आशीर्वाद भी दे दीजिये। भगवान शिव ने खूब आशीर्वाद दिया हैं। हे राम! आप जुग-जुग जियो। सबको आनंदित करो। इस प्रकार से भोले नाथ बड़ी मस्ती में राम जी को आशीर्वाद देके अपने धाम पधारते है। भोले नाथ जी ने ये भी कहा है की इस चरित्र को सब लोग नही जान सकते। बस जिस पर राम की कृपा होगी वो ही लोग इस चरित्र को जान सकते है। पार्वती जी कहती है महाराज हम पर राम जी की कृपा बनी हुई है तभी हम ये सब जान पाये है। * इष्टदेव मम बालक रामा। सोभा बपुष कोटि सत कामा॥ निज प्रभु बदन निहारि निहारी। लोचन सुफल करउँ उरगारी॥ भावार्थ:-बालक रूप श्री रामचंद्रजी मेरे इष्टदेव हैं, जिनके शरीर में अरबों कामदेवों की शोभा है। हे गरुड़जी! अपने प्रभु का मुख देख-देखकर मैं नेत्रों को सफल करता हूँ॥ बोलिए शंकर पार्वती जी की जय !! बाल रूप श्री राम की जय !!

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Seema Varshney Oct 8, 2019

#दशहरा (विजयदशमी,आयुध-पूजा) विशेष 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 अश्विन (क्वार) मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विजय दशमी या दशहरे के नाम से मनाया जाता है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसीलिये इस दशमी को विजयादशमी के नाम से जाना जाता है। दशहरा वर्ष की तीन अत्यन्त शुभ तिथियों में से एक है, अन्य दो हैं चैत्र शुक्ल की एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा। इसी दिन लोग नया कार्य प्रारम्भ करते हैं, शस्त्र-पूजा की जाती है। प्राचीन काल में राजा लोग इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण-यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं। रामलीला का आयोजन होता है। रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है। दशहरा अथवा विजयदशमी भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह शक्ति-पूजा का पर्व है, शस्त्र पूजन की तिथि है। हर्ष और उल्लास तथा विजय का पर्व है। भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक है, शौर्य की उपासक है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया है। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है। दशहरे का महत्त्व 〰〰🌼〰〰 भारत कृषि प्रधान देश है इसलिए जब किसान अपने खेत में सुनहरी फसल उगाकर अनाज रूपी संपत्ति घर लाता है तो उसके उल्लास और उमंग का पारावार नहीं रहता। इस प्रसन्नता के अवसर पर वह भगवान की कृपा को मानता है और उसे प्रकट करने के लिए वह उसका पूजन करता है। समस्त भारतवर्ष में यह पर्व विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस अवसर पर सिलंगण के नाम से सामाजिक महोत्सव के रूप में भी इसको मनाया जाता है। सायंकाल के समय पर सभी ग्रामीणजन सुंदर-सुंदर नव वस्त्रों से सुसज्जित होकर गाँव की सीमा पार कर शमी वृक्ष के पत्तों के रूप में 'स्वर्ण' लूटकर अपने ग्राम में वापस आते हैं। फिर उस स्वर्ण का परस्पर आदान-प्रदान किया जाता है। विजय पर्व के रूप में दशहरा 〰〰🌼〰〰🌼〰〰 दशहरे का उत्सव शक्ति और शक्ति का समन्वय बताने वाला उत्सव है। नवरात्रि के नौ दिन जगदम्बा की उपासना करके शक्तिशाली बना हुआ मनुष्य विजय प्राप्ति के लिए तत्पर रहता है। इस दृष्टि से दशहरे अर्थात विजय के लिए प्रस्थान का उत्सव का उत्सव आवश्यक भी है। भारतीय संस्कृति सदा से ही वीरता व शौर्य की समर्थक रही है। प्रत्येक व्यक्ति और समाज के रुधिर में वीरता का प्रादुर्भाव हो कारण से ही दशहरे का उत्सव मनाया जाता है। यदि कभी युद्ध अनिवार्य ही हो तब शत्रु के आक्रमण की प्रतीक्षा ना कर उस पर हमला कर उसका पराभव करना ही कुशल राजनीति है। भगवान राम के समय से यह दिन विजय प्रस्थान का प्रतीक निश्चित है। भगवान राम ने रावण से युद्ध हेतु इसी दिन प्रस्थान किया था। मराठा रत्न शिवाजी ने भी औरंगजेब के विरुद्ध इसी दिन प्रस्थान करके हिन्दू धर्म का रक्षण किया था। भारतीय इतिहास में अनेक उदाहरण हैं जब हिन्दू राजा इस दिन विजय-प्रस्थान करते थे। इस पर्व को भगवती के 'विजया' नाम पर भी 'विजयादशमी' कहते हैं। इस दिन भगवान रामचंद्र चौदह वर्ष का वनवास भोगकर तथा रावण का वध कर अयोध्या पहुँचे थे। इसलिए भी इस पर्व को 'विजयादशमी' कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि आश्विन शुक्ल दशमी को तारा उदय होने के समय 'विजय' नामक मुहूर्त होता है। यह काल सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है। इसलिए भी इसे विजयादशमी कहते हैं। ऐसा माना गया है कि शत्रु पर विजय पाने के लिए इसी समय प्रस्थान करना चाहिए। इस दिन श्रवण नक्षत्र का योग और भी अधिक शुभ माना गया है। युद्ध करने का प्रसंग न होने पर भी इस काल में राजाओं (महत्त्वपूर्ण पदों पर पदासीन लोग) को सीमा का उल्लंघन करना चाहिए। दुर्योधन ने पांडवों को जुए में पराजित करके बारह वर्ष के वनवास के साथ तेरहवें वर्ष में अज्ञातवास की शर्त दी थी। तेरहवें वर्ष यदि उनका पता लग जाता तो उन्हें पुनः बारह वर्ष का वनवास भोगना पड़ता। इसी अज्ञातवास में अर्जुन ने अपना धनुष एक शमी वृक्ष पर रखा था तथा स्वयं वृहन्नला वेश में राजा विराट के यहँ नौकरी कर ली थी। जब गोरक्षा के लिए विराट के पुत्र धृष्टद्युम्न ने अर्जुन को अपने साथ लिया, तब अर्जुन ने शमी वृक्ष पर से अपने हथियार उठाकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी। विजयादशमी के दिन भगवान रामचंद्रजी के लंका पर चढ़ाई करने के लिए प्रस्थान करते समय शमी वृक्ष ने भगवान की विजय का उद्घोष किया था। विजयकाल में शमी पूजन इसीलिए होता है। दशहरे पर करने के कुछ विशेष उपाय 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 👉 दशहरे के द‌िन नीलकंठ पक्षी का दर्शन बहुत ही शुभ होता है। माना जाता है क‌ि इस द‌िन यह पक्षी द‌िखे तो आने वाला साल खुशहाल होता है। 👉 दशहरा के द‌िन शमी के वृक्ष की पूजा करें। अगर संभव हो तो इस द‌िन अपने घर में शमी के पेड़ लगाएं और न‌ियम‌ित दीप द‌िखाएं। मान्यता है क‌ि दशहरा के द‌िन कुबेर ने राजा रघु को स्वर्ण मुद्राएं देने के ल‌िए शमी के पत्तों को सोने का बना द‌िया था। तभी से शमी को सोना देने वाला पेड़ माना जाता है 🌼🌼आप सभीको विजय दशमी की हार्दिक शुभकामनाये🌼🌼 〰️〰️🌼〰️〰️🌼जय श्री राम ️🌼〰️〰️🌼〰️〰

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Seema Varshney Sep 30, 2019

तृतीय नवरात्र ~ माता चंद्रघंटा "" पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता "" भगवती दुर्गा अपने तीसरे स्वरूप में चन्द्रघण्टा नाम से जानी जाती हैं। नवरात्र के तीसरे दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन किया जाता है। इनका रूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके मस्तक में घंटे के आकार का अर्धचन्द्र है। इसी कारण से इन्हें चन्द्रघंटा देवी कहा जाता है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला हैं। इनके दस हाथ हैं। इनके दसों हाथों में खड्ग, बाण अस्त्र दृ शस्त्र आदि विभूषित हैं। इनका वाहन सिंह है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्यत रहने की होती है। इनके घंटे सी भयानक चण्ड ध्वनि से अत्याचारी दानव-दैत्य-राक्षस सदैव प्रकम्पित रहते हैं। नवरात्रे के दुर्गा-उपासना में तीसरे दिन की पूजा का अत्याधिक महत्व है। माता चन्द्रधण्टा की उपासना हमारे इस लोक और परलोक दोनों के लिए परमकल्याणकारी और सद् गति को देने वाली है। पूर्ण कथा --> आज के दिन माँ दुर्गा के तृतीय स्वरुप माता चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना होगी. माँ चंद्रघंटा के सिर पर चंद्र और हाथ में घंटा है. आवाहन, संकल्प और नाद के रूप में आराध्य यह देवी सरस्वती का रूप है. देवासुर संग्राम में देवी ने घंटे की नाद से अनेकानेक असुरों का दमन किया. शास्त्रों ने सुर और संगीत दोनों की ही मुद्रा शांत और आत्मनिर्भर करने वाली मानी गयी है. सुर और संगीत दोनों को ही वशीकरण का बीज मन्त्र माना गया है. चंद्रघंटा देवी इसी की आराध्य शक्ति है. चन्द्रमा शांति का प्रतीक है और घंटा नाद का. माँ चंद्रघंटा नाद के साथ शांति का सन्देश देती है. देवी की आराधना में नाद पर विशेष ध्यान दिया जाता है. वादन और गायन दोनों ही नाद के प्रतीक हैं. आ के इस स्वरुप की आराधना को सिद्धकुंजिका स्तोत्रं का पाठ मंगल फलदायी है.. ध्यान मन्त्र --> "" वन्दे वाच्छित लाभाय चन्द्रर्घकृत शेखराम्। सिंहारूढा दशभुजां चन्द्रघण्टा यशंस्वनीम्घ् कंचनाभां मणिपुर स्थितां तृतीयं दुर्गा त्रिनेत्राम्। खड्ग, गदा, त्रिशूल, चापशंर पद्म कमण्डलु माला वराभीतकराम्घ् पटाम्बर परिधानां मृदुहास्यां नानालंकार भूषिताम्। मंजीर हार, केयूर, किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम्घ् प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुग कुचाम्। कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटिं नितम्बनीम्घ् "" स्तोत मन्त्र --> "" आपद्धद्धयी त्वंहि आधा शक्तिरू शुभा पराम्। अणिमादि सिद्धिदात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यीहम्घ् चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्ट मंत्र स्वरूपणीम्। धनदात्री आनंददात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्घ् नानारूपधारिणी इच्छामयी ऐश्वर्यदायनीम्। सौभाग्यारोग्य दायिनी चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्घ् "" कवच मन्त्र --> "" रहस्यं श्रणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने। श्री चन्द्रघण्टास्य कवचं सर्वसिद्धि दायकम्घ् बिना न्यासं बिना विनियोगं बिना शापोद्ध रं बिना होमं। स्नान शौचादिकं नास्ति श्रद्धामात्रेण सिद्धिकमघ् कुशिष्याम कुटिलाय वंचकाय निन्दकाय च। न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचितम्घ् "" शक्ति के रूप में विराजमान मां चंद्रघंटा मस्तक पर घंटे के आकार के चंद्रमा को धारण किए हुए हैं। देवी का यह तीसरा स्वरूप भक्तों का कल्याण करता है। इन्हें ज्ञान की देवी भी माना गया है। बाघ पर सवार मां चंद्रघंटा के चारों तरफ अद्भुत तेज है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। यह तीन नेत्रों और दस हाथों वाली हैं। इनके दस हाथों में कमल, धनुष-बाण, कमंडल, त्रिशूल और गदा जैसे अस्त्र-शस्त्र हैं। कंठ में सफेद पुष्पों की माला और शीर्ष पर रत्नजडिघ्त मुकुट विराजमान हैं। यह साधकों को चिरायु, आरोग्य, सुखी और संपन्न होने का वरदान देती हैं। कहा जाता है कि यह हर समय दुष्टों के संहार के लिए तैयार रहती हैं और युद्ध से पहले उनके घंटे की आवाज ही राक्षसों को भयभीत करने के लिए काफी होती है। उपासना मंत्र --> "" पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते महयं चन्दघण्टेति विश्रुता।। ""

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Seema Varshney Sep 29, 2019

द्वितीय नवदुर्गा: माता ब्रह्मचारिणी नवरात्र पर्व के दूसरे दिन "माता ब्रह्मचारिणी" की पूजा-अर्चना की जाती है | भगवान शिव से विवाह हेतु प्रतिज्ञाबद्ध होने के कारण ये ब्रह्मचारिणी कहलायी | ब्रह्म का अर्थ है तपस्या ओर चारिणी यानी आचरण करने वाली| इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली देवी ब्रह्मचारिणी कथा : माता ब्रह्मचारिणी हिमालय और मैना की पुत्री हैं. इन्होंने देवर्षि नारद जी के कहने पर भगवान शंकर की ऐसी कठोर तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने इन्हें मनोवांछित वरदान दिया. जिसके फलस्वरूप यह देवी भगवान भोले नाथ की वामिनी अर्थात पत्नी बनी. जो व्यक्ति अध्यात्म और आत्मिक आनंद की कामना रखते हैं उन्हें इस देवी की पूजा से सहज यह सब प्राप्त होता है. देवी का दूसरा स्वरूप योग साधक को साधना के केन्द्र के उस सूक्ष्मतम अंश से साक्षात्कार करा देता है जिसके पश्चात व्यक्ति की ऐन्द्रियां अपने नियंत्रण में रहती और साधक मोक्ष का भागी बनता है. इस देवी की प्रतिमा की पंचोपचार सहित पूजा करके जो साधक स्वाधिष्ठान चक्र में मन को स्थापित करता है उसकी साधना सफल हो जाती है और व्यक्ति की कुण्डलनी शक्ति जागृत हो जाती है. जो व्यक्ति भक्ति भाव एवं श्रद्धादुर्गा पूजा के दूसरे दिन मॉ ब्रह्मचारिणी की पूजा करते हैं उन्हें सुख, आरोग्य की प्राप्ति होती है और प्रसन्न रहता है, उसे किसी प्रकार का भय नहीं सताता है. माता ब्रह्मचारिणी की उपासना मंत्रः दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥ माता का स्वरूप देवी ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ मे जप की माला है ओर बाए हाथ मे कमंडल है | देवी ब्रह्मचारिणी साक्षात ब्रह्म का स्वरूप है अर्थात तपस्या का मूर्तिमान रूप है | ये देवी भगवती दुर्गा, शिवस्वरूपा, गणेशजननी, नारायनी, विष्णुमाया ओर पूर्ण ब्रह्मस्वरूपिणी के नाम से प्रसिद्ध है आराधना महत्वः देवी ब्रह्मचारिणी की उपासना से मनुष्य मे तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार , संयम की वृद्धि होती है | जीवन की कठिन समय मे भी उसका मन कर्तव्य पथ से विचलित नही होता है | देवी अपने साधको की मलिनता , दुर्गणो ओर दोषो को खत्म करती है | देवी की कृपा से सर्वत्र सिद्धि ओर विजय की प्राप्ति होती है | पूजा मे उपयोगी वस्तु मां भगवती को नवरात्र के दूसरे दिन चीनी का भोग लगाना चाहिए और ब्राह्मण को दान में भी चीनी ही देनी चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से मनुष्य दीर्घायु होता है। इनकी उपासना करने से मनुष्य में तप, त्याग, सदाचार आदि की वृद्धि होती है। ब्रह्मचारिणी पूजा विधि : देवी ब्रह्मचारिणी जी की पूजा का विधान इस प्रकार है, सर्वप्रथम आपने जिन देवी-देवताओ एवं गणों व योगिनियों को कलश में आमत्रित किया है उनकी फूल, अक्षत, रोली, चंदन, से पूजा करें उन्हें दूध, दही, शर्करा, घृत, व मधु से स्नान करायें व देवी को जो कुछ भी प्रसाद अर्पित कर रहे हैं उसमें से एक अंश इन्हें भी अर्पण करें. प्रसाद के पश्चात आचमन और फिर पान, सुपारीभेंट कर इनकी प्रदक्षिणा करें. कलश देवता की पूजा के पश्चात इसी प्रकार नवग्रह, दशदिक्पाल, नगर देवता, ग्राम देवता, की पूजा करें. इनकी पूजा के पश्चात मॉ ब्रह्मचारिणी की पूजा करें.देवी की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर प्रार्थना करें “दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू. देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा”..इसके पश्चात् देवी को पंचामृत स्नान करायें और फिर भांति भांति से फूल, अक्षत, कुमकुम, सिन्दुर, अर्पित करें देवी को अरूहूल का फूल (लाल रंग का एकविशेष फूल) व कमल काफी पसंद है उनकी माला पहनायें. प्रसाद और आचमन के पश्चात् पान सुपारी भेंट कर प्रदक्षिणा करें और घी व कपूर मिलाकर देवी की आरती करें. अंत में क्षमा प्रार्थना करें “आवाहनं न जानामि न जानामि वसर्जनं, पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरी.. ब्रह्मचारिणी की मंत्र : या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू। देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।। ब्रह्मचारिणी की ध्यान : वन्दे वांछित लाभायचन्द्रार्घकृतशेखराम्। जपमालाकमण्डलु धराब्रह्मचारिणी शुभाम्॥ गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम। धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥ परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन। पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥ ब्रह्मचारिणी की स्तोत्र पाठ : तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्। ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥ शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी। शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणीप्रणमाम्यहम्॥ ब्रह्मचारिणी की कवच : त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी। अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥ पंचदशी कण्ठे पातुमध्यदेशे पातुमहेश्वरी॥ षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो। अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी। ब्रह्मचारिणी माता की आरती जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता। जय चतुरानन प्रिय सुख दाता। ब्रह्मा जी के मन भाती हो। ज्ञान सभी को सिखलाती हो। ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा। जिसको जपे सकल संसारा। जय गायत्री वेद की माता। जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता। कमी कोई रहने न पाए। कोई भी दुख सहने न पाए। उसकी विरति रहे ठिकाने। जो ​तेरी महिमा को जाने। रुद्राक्ष की माला ले कर। जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर। आलस छोड़ करे गुणगाना। मां तुम उसको सुख पहुंचाना। ब्रह्माचारिणी तेरो नाम। पूर्ण करो सब मेरे काम। भक्त तेरे चरणों का पुजारी। रखना लाज मेरी महतारी। जय मां विंध्यवासिनी। जय माता दी

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Seema Varshney Aug 30, 2019

बहुत सुन्दर कथा एक महिला रोज मंदिर जाती थी ! एक दिन उस महिला ने पुजारी से कहा अब मैं मंदिर नही आया करूँगी ! इस पर पुजारी ने पूछा -- क्यों ? तब महिला बोली -- मैं देखती हूँ लोग मंदिर परिसर में अपने फोन से अपने व्यापार की बात करते हैं ! कुछ ने तो मंदिर को ही गपशप करने का स्थान चुन रखा है ! कुछ पूजा कम पाखंड,दिखावा ज्यादा करते हैं ! इस पर पुजारी कुछ देर तक चुप रहे फिर कहा -- सही है ! परंतु अपना अंतिम निर्णय लेने से पहले क्या आप मेरे कहने से कुछ कर सकती हैं ! महिला बोली -आप बताइए क्या करना है ? पुजारी ने कहा -- एक गिलास पानी भर लीजिए और 2 बार मंदिर परिसर के अंदर परिक्रमा लगाइए । शर्त ये है कि गिलास का पानी गिरना नहीं चाहिये ! महिला बोली -- मैं ऐसा कर सकती हूँ ! फिर थोड़ी ही देर में उस महिला ने ऐसा ही कर दिखाया ! उसके बाद मंदिर के पुजारी ने महिला से 3 सवाल पूछे - 1.क्या आपने किसी को फोन पर बात करते देखा? 2.क्या आपने किसी को मंदिर में गपशप करते देखा? 3.क्या किसी को पाखंड करते देखा? महिला बोली -- नहीं मैंने कुछ भी नहीं देखा ! फिर पुजारी बोले --- जब आप परिक्रमा लगा रही थीं तो आपका पूरा ध्यान गिलास पर था कि इसमें से पानी न गिर जाए इसलिए आपको कुछ दिखाई नहीं दिया| अब जब भी आप मंदिर आयें तो अपना ध्यान सिर्फ़ परम पिता परमात्मा में ही लगाना फिर आपको कुछ दिखाई नहीं देगा| सिर्फ भगवान ही सर्वत्र दिखाई देगें| '' जाकी रही भावना जैसी .. प्रभु मूरत देखी तिन तैसी|'' जीवन मे दुःखो के लिए कौन जिम्मेदार है ? 👉🏻ना भगवान, 👉🏻ना गृह-नक्षत्र, 👉🏻ना भाग्य, 👉🏻ना रिश्तेदार, 👉🏻ना पडोसी, 👉🏻ना सरकार, जिम्मेदार आप स्वयं है| 1) आपका सरदर्द, फालतू विचार का परिणाम| 2) पेट दर्द, गलत खाने का परिणाम| 3) आपका कर्ज, जरूरत से ज्यादा खर्चे का परिणाम| 4) आपका दुर्बल /मोटा /बीमार शरीर, गलत जीवन शैली का परिणाम| 5) आपके कोर्ट केस, आप के अहंकार का परिणाम| 6) आपके फालतू विवाद, ज्यादा व् व्यर्थ बोलने का परिणाम| उपरोक्त कारणों के अलावा सैकड़ों कारण है और बेवजह दोषारोपण दूसरों पर करते रहते हैं | इसमें ईश्वर दोषी नहीं है| अगर हम इन कष्टों के कारणों पर बारिकी से विचार करें तो पाएंगे की कहीं न कहीं हमारी मूर्खताएं ही इनके पीछे है| *_गिले-शिकवे सिर्फ़ साँस लेने तक ही चलते हैं,_* *_बाद में तो सिर्फ़ पछतावे रह जाते हैं..!!_ 🌴🌴जय श्री राम🍂🍂

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