Santosh Hariharan Mar 6, 2021

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Santosh Hariharan Mar 5, 2021

भगवान ने आँखें सभी प्राणियों को दी हैं पर वे काम उतना ही देती हैं जितना कि उस प्राणी के निर्वाह के लिए आवश्यक है। बिना जरूरत का भार उसने किसी पर भी नहीं लादा है। सृष्टि का विस्तार असीम है। आवश्यक नहीं कि हर प्राणी उसके हर रहस्य को खोजें और उसके लिए हाथ पैर पटके जिसकी कि उसे सामान्य निर्वाह के लिए आवश्यकता ही नहीं है। हर प्राणी की शरीर संरचना इसी स्तर की है कि उसे अपना काम चलाने समय गुजारने में कठिनाई न पड़े और जानकारियों का इतना बोझ भी न लदे जो उसके लिए आवश्यक नहीं है। साधन सुविधाओं के संबंध में भी यही बात है। सृष्टि एक असीम सागर है उसमें से मछली, शैवाल, घोंघे, प्रबाल और बादल अपनी काम चलाऊ आवश्यकता ही पूर्ण करते हैं। जो अनावश्यक उसके लिए हाथ पैर नहीं पीटते। आँखों का अन्यान्य सभी अवयवों की तुलना में अधिक महत्व है। वे जीवनचर्या में बहुत काम आती हैं तो भी हर प्राणी के शरीर में उन्हें इस योग्य बनाया गया है और इस प्रकार लगाया गया है कि उन्हें दूसरों से तुलना करने के झंझट में न पड़कर अपना काम चलाते रहने की सुविधा मिलती रहे। मेंढक, रेंगने वाले कीड़े मकोड़े और मछलियाँ हिलती-जुलती चीजों को देखते हैं। जो स्थिर है वह उन्हें दिखाई ही नहीं पड़ता। मेंढक को एक लम्बा चौड़ा बगीचा मात्र भूरे पर्दे की तरह स्थिर दीखता है। या तो मक्खी आदि शिकार स्वयं उठे या मेढ़क उचले तभी उसे काम की वस्तु देखने पकड़ने का अवसर मिलता है। अन्यथा सब कुछ स्थिर एवं एक रंग का ही दीखता रहता है। कुत्ता सिर्फ काला सफेद रंग पहचानता है। शिकार तलाश करने में उसकी आँखें उतना काम नहीं देती जितना कि नाक के सहारे सूँघकर पता चलता है। आँखें तो रुकावटों से बचाने भर में काम आती है। खरगोश उसकी इस कमजोरी को भली-भाँति जानते हैं इसलिए अपना बचाव करने के लिए हवा की विपरीत दिशा में दौड़ते हैं ताकि सूँघने से पता न चले। घोड़े की आँखें ऊपर और नीचे भी देख सकती हैं। उसे शत्रुओं से बचने के लिए मात्र सामने देखना ही पर्याप्त नहीं होता वरन् अन्य दिशाओं में क्या हो रहा है इसकी जानकारी भी बहुत काम आती है। प्रकृति ने उसकी आँखें इसी हिसाब से बनाई हैं। चील गिद्धों की आँखें बहुत दूर का देख सकती है यही कारण है कि वे ऊँचे रहकर भी जमीन पर अपने आहार का पता लगाने को नीचे उतर पड़ते हैं। उकाव मछलियों की ताक में तालाबों के इर्द-गिर्द मंडराता रहता है। साँस लेने के लिए जैसे ही कोई मछली पानी से बाहर तनिक भी शिर उठाती है कि बिजली की तरह झपटकर वह उसे लपक लेता है। मनुष्य की पुतलियाँ चलती हैं और पलक झपकते हैं। जबकि यह विशेषता अन्य प्राणियों में बहुत कम मात्रा में ही देखी जाती है। मनुष्य प्रायः 700 प्रकार के रंगों को देख सकता है। किन्तु इससे क्या। सात रंगों के सम्मिश्रण तो 6700 के लगभग बनते हैं। इन सभी को देख पाना मनुष्य की आँखों के लिए सम्भव नहीं। टिड्डी, मक्खियों, मच्छरों के कई-कई आंखें होती है। वे कुछ से देखते हैं तथा कुछ से अन्य प्रकार के अनुभव करते हैं। प्रागैतिहासिक काल के प्राणी अपेक्षाकृत अधिक आँखों वाले थे जब मस्तिष्क का विकास हुआ और सामने दीखने वाली दो आँखें ही आवश्यक ज्ञान अर्जित करने में कई प्रकार की भूमिकाएँ निभाने लगीं तो उनकी बढ़ी हुई संख्या अनावश्यक होने के कारण क्रमशः समाप्त होती चली गई। मनुष्य और उसी वर्ग के पशुओं को रीढ़ वाले प्राणियों में गिना जाता है। उनमें से सभी की तीन आँखें होती है। दो प्रत्यक्ष दृश्यमान एक झोपड़ी के भीतर विद्यमान किन्तु टटोलने में अदृश्य। इस तीसरे नेत्र को वैज्ञानिक भाषा में ‘पीनियल ग्लाण्ड’ कहा जाता है। मनुष्य में यह ग्रन्थि प्रायः डेढ़ दो मिलीग्राम की होती है। बनावट आँख की तरह। इसमें एक पारदर्शक द्रव भरा रहता है। आँख की पुतली की तरह उसमें प्रकाश संवेदी कोशिकाएँ भी रहती हैं। न केवल मनुष्य में वरन् थोड़ा हट-बढ़कर थोड़े आकार प्रकार के अन्तर से यह प्रायः सभी रीढ़ वाले प्राणियों में पाई जाती है। प्रत्यक्ष वाली दो आँखें सिर्फ अमुक दूरी तक अमुक स्तर के प्रकाश में दीख पड़ने वाले दृश्य ही देख पाती हैं पर यह तीसरी आँख अनेकों काम आती है। प्रकाश की कमी पड़ने पर पलकों वाली आँखों को कुछ दिखाई नहीं पड़ता परन्तु सर्वदा, सर्वत्र किसी न किसी रूप में विद्यमान रहने वाली सूक्ष्म प्रकाश तरंगों के सहारे वह अन्धकार में भी बहुत कुछ देख सकती है, अनुमान इसी आधार पर लगाते जाते हैं। अन्धों के लिए तो यह लाठी का काम देती है। न केवल दृश्य वरन् गंध, शब्द और ताप की इन तरंगों को भी वह ग्रहण कर सकती है जो नाक, कान या त्वचा की पकड़ में सामान्यतया आती नहीं है। मछलियाँ इसी उपकरण के सहारे पानी का तापमान नापती हैं और अनुकूल क्षेत्र के लिए चली जाती हैं। वे समुद्र की गहराई और अत्यधिक दूरी में क्या स्थिति हैं, इस संबंध की सभी जानकारियाँ प्राप्त करती रहती हैं जो खुली आँखों की सामर्थ्य से बाहर है। मेंढ़कों की तीसरी आँख में ‘मेलाटोनि’ नामक हारमोन निकलता है। उसी प्रकृति वरदान के सहारे उनका काया उन चित्र विचित्र पुरुषार्थों को सम्पन्न करती रहती है जो अन्य प्राणियों के बस से बाहर है। पीनियल ग्लाण्ड का मनुष्य की विशेषतया महत्वाकाँक्षा और कामुकता के साथ गहरा संबंध है। इस क्षेत्र में थोड़ी से विशिष्टता बढ़ जाने से मनुष्य असाधारण रूप से महत्वाकाँक्षी हो उठते हैं और दुस्साहस भरे कदम उठाने के लिए बिना डरे, रुके, आतुर रहते देखा जाता। इसी प्रकार इस क्षेत्र के उतार-चढ़ावों से कामुकता की प्रवृत्ति पर गहरा असर पड़ता है। वह असाधारण रूप से उत्तेजित एवं अतृप्त भी रहती देखी गई है और ऐसा भी पाया गया कि उस उत्साह का एक प्रकार से लोप ही हो जाय एवं नपुँसकता की स्थिति बन पड़े। अल्प आयु में प्रौढ़ों जैसी परिपक्व एवं विकसित जननेन्द्रियों वाले कितने ही व्यक्तियों की यह विचित्रता, पीनियल ग्लाण्ड की उत्तेजना से संबंधित पाई गई है। इसी प्रकार शरीर से सर्वथा हृष्ट पुष्ट होने पर भी वासना से घृणा करने वालों या डरने वालों में इसी क्षेत्र की शिथिलता को आधारभूत कारण समझा गया है। इतना ही नहीं आयु की तुलना बहुत घटी या बढ़ी हुए व्यक्तित्व का आश्चर्य भी इसी कारण दृश्यमान होता है। कई अधेड़ों की प्रवृत्ति बचपन जैसी पाई गई है जबकि कई बच्चे बुजुर्गों जैसे गम्भीर और दूरदर्शी देखे गये हैं। इसी तीसरे नेत्र का सहयोग करने के लिए एक छोटी ग्रन्थि मस्तिष्क के पिछले भाग में रहती है। इसे ‘पिट्यूटरी’ ग्रन्थि कहते हैं। यों इसका प्रभाव क्षेत्र एड्रीनल और थाइराइड ग्रन्थियों से रिसने वाले हारमोनों पर अधिक रहता है फिर भी वह पीनियल के कामों में बराबर हिस्सा बंटाती और भार हलका करती है। इसीलिए इन दोनों का एक युग्म माना गया है। मनुष्य में उदासी या प्रसन्नता का स्वभाव इसी क्षेत्र की स्थिति एवं प्रतिक्रिया पर निर्भर रहता है। आलसी और उत्साही का अन्तर भी इसी क्षेत्र से सम्बन्धित है। शरीर का विकास जब असाधारण रूप से घट रहा या बढ़ रहा होता तब उसका कारण पोषण की न्यूनाधिकता न होकर उपरोक्त ग्रन्थियों की हलचलों में कोई व्यतिरेक उत्पन्न होने की बात ही मस्तिष्क विधा के ज्ञाता सोचते और तद्नुरूप उपचार करते देखे गये हैं। चूहों और मुर्गियों पर किये गये प्रयोगों में यह तथ्य स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुआ कि यह तीसरी आँख जो सामान्यतया निरर्थक जैसी प्रतीत होती है, उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति को उठाने गिराने में कितनी बड़ी भूमिका निभाती हैं। उस क्षेत्र को उत्तेजित कर देने पर यह प्राणी अपनी सामान्य गतिविधियों और योग्यताओं को कई गुना बढ़ा सके। जबकि शिथिल कर देने पर वे मुर्दनी के शिकार हुए और अपनी दक्षता तथा क्रियाशीलता सर्वथा स्वस्थ होते हुए भी गँवा बैठे। पीनियल ग्रन्थि मेंढक और गिरगिट के मस्तिष्क पर एक उभार के रूप में ऊँची उठी हुई देखी जा सकता है। वे इसी के सहारे ऋतुओं के अनुरूप अपनी स्थिति बदलते रहते हैं जिसे रंग परिवर्तन के रूप में देखा जा सकता है। मनुष्य की आंखें मस्तिष्कीय पीनियल ग्रन्थि से प्रभावित होतीं और उसी स्तर के अनुरूप दृश्य देखती हैं। इन्फ्रारेड और अल्फा वायलेट किरणों को पकड़ने की क्षमता उसमें विशेष रूप से पाई जाती है। इसलिए मनुष्य प्रकाश किरणों के सातों रंग न देखकर मात्र उन्हीं रंगों को उतनी ही मात्रा में देख पाता है जितने के लिए कि पीनियल ग्रन्थि का कामकाजी भाग सहमति प्रदान करता है। जिस प्रकार मस्तिष्क का मात्र 7 प्रतिशत कामकाजी प्रयोजनों में प्रयुक्त होता है और शेष भाग प्रस्तुत स्थिति में पड़ा रहता है उसी प्रकार पीनियल का एक अंश ही प्रकृति ने दैनिक व्यवहार में काम आने के लिए पर्याप्त समझा है और शेष को विशेष व्यक्तियों द्वारा, विशेष प्रयोजन के लिए, विशेष प्रयत्नों के सहारे प्रयुक्त किये जाने के लिए सुरक्षित रखा है। यदि उन अन्धेरे क्षेत्रों को प्रकाशवान बनाया जा सके तो न केवल पीनियल ग्रन्थि वरन् सुविस्तृत मस्तिष्कीय चेतना भी जागृत हो सकती है और मानवी क्षमता से रहस्य भरे चमत्कारों का समावेश हो सकता है। सन् 1898 में जर्मन चिकित्सक ह्यूबनर के सामने एक बारह वर्षीय ऐसा बालक लाया गया जिसके अन्य सभी अंग तो आयु के हिसाब से ही विकसित हुए थे किन्तु जननेन्द्रिय पूर्ण वयस्कों जितनी परिपुष्ट हो गई थी और वह सन्तानोत्पादन में हर दृष्टि से समर्थ थी। इस असाधारण और एकाँगी प्रगति का कारण उन्होंने खोजा तो पाया कि उसकी पीनियल ग्रन्थि को अविकसित रहने वाला भाग किसी कारण उत्तेजित हो गया है और उसने अपने प्रभाव क्षेत्र को अतिशय विकसित करने की भूमिका निभाई है। ह्यूबनर से पूर्व पीनियल ग्रन्थि की रहस्यमय क्षमता के संबंध में ईसा में 400 वर्ष पहले यूनान के चिकित्सक हैरी फिल्म ने ऐसे संकेत दिये थे कि यह क्षेत्र मानवी व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं को प्रभावित कर सकने में समर्थ है। फ्राँसीसी तत्ववेत्ता रेने डेस्कार्टीज ने भी इस क्षेत्र को आत्मा का निवास माना था और वहाँ दिव्य दर्शन की सम्भावना व्यक्ति की थी। पीनियल में कितनी ही अतीन्द्रिय क्षमताएँ विद्यमान है। आज्ञा चक्र जागरण एवं तृतीय नेत्र उन्मीलन के रूप में उन्हीं के माहात्म्य प्रतिफल की चर्चा होती रहती है। शिवजी द्वारा कामदेव जलाया जाना, दमयन्ती के शाप से व्याध का भस्म होना, गाँधार द्वारा दुर्योधन का वज्रांग बना दिया जाना, संजय को महाभारत का दृश्य धृतराष्ट्र को दिखाना, लेख द्वारा ऊषा के अनिरुद्ध दर्शन कराना जैसा पौराणिक आख्यायिकाएं इसी तृतीय नेत्र उन्मीलन के साथ जुड़ी हुई सिद्धियों का दिग्दर्शन कराती हैं। मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म में नेत्रों के द्वारा जिस वेधक दृष्टि को उगाया बढ़ाया एवं प्रयुक्त किया जाता है वस्तुतः वह उसी तृतीय नेत्र का उत्पादन है जिसे शरीर शास्त्री पीनियल ग्रन्थि के नाम से संवर्धन करते हैं। चर्म चक्षुओं की यदि हिफाजत न रखी जाय, उनके प्रति उपेक्षा बरती जाय, दृश्य शक्ति का व्यतिक्रम किया जाय तो वे असमय में ही खराब हो जाते हैं और समान या आँशिक मान्यता का शिकार बनना पड़ता है। यही बात तृतीय नेत्र के सम्बन्ध में भी है। ध्यान योग त्राटक अभ्यास आदि के माध्यम से आज्ञाचक्र के नाम से जानने वाले पीनियल संस्थान को विशिष्ट क्षमता सम्पन्न बना सकते हैं। तीसरी आँख प्रस्तुत दो आँखों से कम महत्वपूर्ण नहीं है। उसे न तो उपेक्षित पड़े रहने देना चाहिए और कुदृष्टि अपनाकर नष्ट-भ्रष्ट ही करना चाहिए।

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Santosh Hariharan Mar 4, 2021

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Santosh Hariharan Mar 4, 2021

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Santosh Hariharan Feb 3, 2021

{{{ॐ}}} #कर्म_फल_या_भोग मानसिक विषमता ही दुख है जिस प्रकार भोजन से हमे पोषण मिलता है वही कुपथ होने पर बीमारी भी लाता है और विष के सामान हो जाता है प्यासे व्यक्ति को जल तृप्ति देता है परन्तु जल मे डूबने लगे तो वही जल दुख हो जाता है । ब्रह्माण्ड को जितने भी पदार्थ है वह प्रकृति के आधीन है उनमे अनुकूलता ढूढनी चाहिए क्योंकि अनुकूलता ही सुख है और प्रतिकुलता दुःख है। मन का स्वभाव है जितना विकेन्द्रित उतना ही दुख हो और इसके विपरीत स्थिति मे सुख होगा दुर्बल मन ही दुखो को जन्म देता है मानसिक विषमता ही दुःख है मन की एकाग्रता ही उसे हटाने का साधन है। क्यो कि उससे मन को समता प्राप्त होती है दुःख को हम अवांछनीय कहकर उससे भागते है और जितना हम उससे भागते है उतना ही वह हमारा पीछा करता है । अगर किसी कारण से वह हमे छोड जाये तो हमारा विकासक्रम रूक जाता है दुख की भांति सुख का मूल भी तृष्णा है पुरुषार्थ हम तृष्णापूर्ति के लिए करते है वही हमे ज्ञान और तथा नयी शक्ति देता है यदि सुख की ईच्छा को अपने मन से निकाल दिया जाये तो भी हम पशुवत् हो जायेगें परन्तु सुख के पीछे भागने से सुख पाकर भी आनन्द नही पाया जा सकता क्योंकि दुख धैर्य की कसौटी है तो सुख मानवता की परीक्षा है।

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Santosh Hariharan Jan 21, 2021

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Santosh Hariharan Jan 15, 2021

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