Sanjay Garg Dec 5, 2019

तिथि:- 05 दिसंबर 2019 दिन:- वीरवार *आज का चिंतन* आदमी मंदिर तक तो पहुँच जाता हैं मगर भगवान तक नहीं पहुँच पाता। मंदिर तक पहुँचना आसान है किंतु भगवान तक पहुँचना बहुत कठिन । चरण हमें मंदिर तक लेकर जाता है और आचरण भगवान तक। चरण में समर्थ होगा तो वो हमें मंदिर तक पहुँचा देगा और आचरण स्वच्छ होगा तो वो हमें भगवान तक पहुँचा देगा। मानव मन की विकृतियां, काम क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार ही मंदिर और भगवान के बीच का पर्दा है। जब तक इन बुराइयों का पर्दा नहीं हट जाता, तब तक मंदिर में पहुँचने के बावजूद भी हम भगवान से कोसों दूर होते हैं। मंदिर तक पहुँचना तन का विषय है और भगवान तक पहुँचना मन का। *।। निर्मल मन जन सो मोहि भावा।।* अर्थात जहाँ मन की निर्मलता है, मन की सरलता है, मन की निष्कपटता है, वहाँ भगवान का वास अवश्यमेव है। मंदिर बुहारने के साथ-साथ मन को बुहारने और उसे स्वच्छ करने पर भी जोर दिया जाए तो भगवान तक पहुँचना और भी आसान हो जाएगा।

+4 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 2 शेयर
Sanjay Garg Dec 2, 2019

तिथि:- 02 दिसंबर 2019 दिन:- सोमवार *आज का चिंतन॥* 🦚 *बुरी आदतें भी एक अभिशाप की तरह ही होती हैं, जो धीरे-धीरे किसी भी व्यक्ति के अपयश और अपकीर्ति का कारण बन जाती हैं ।* 🦚 *बुरी आदतों का भी अपना एक नशा होता है। अगर समय से इन्हें रोका न गया तो ये भी लत बन जाती हैं। यदि एक बार किसी बुरी आदत कि लत लग गई तो स्वयं को बुरी लगने के बावजूद भी हम उस काम को किए बिना रह ही नहीं पायेंगे। हम आदतन उस काम को करने के लिए मजबूर हो जायेंगे।* 🦚 *बुरी आदतें हमारी प्रगति मार्ग में सबसे बड़ी बाधक होती हैं। कुछ बुरी आदतें हमारे व्यक्तिगत जीवन को दूषित करती हैं, कुछ सामाजिक जीवन को तो कुछ नैतिक जीवन को भी दूषित करती हैं।* 🦚 *गलत देखना, गलत सुनना, गलत बोलना, गलत खाना - पीना, गलत करना व गलत दिशा में जाना, ये सब हमारी बुरी आदतें ही तो हैं। हमें निरंतर इन सबसे बचने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए।* 🦚 *महान दार्शनिक सुकरात ने लिखा है कि "हर वर्ष एक बुरी आदत को मूल से खोदकर फेंका जाए, तो कुछ ही वर्षों में बुरे-से-बुरा व्यक्ति भी भला हो सकता है।* 🦚 *अच्छी आदतें अच्छे इंसान को जन्म देती है और बुरी आदतें बुरे इंसान को। बुरी आदतों से निरंतर बचने का प्रयास न किया गया तो आपके भीतर कब एक बुरे इंसान ने जन्म ले लिया आपको खुद पता नहीं चलेगा।* *आदतें बुरी त्यागने का कुछ तो जतन कर ले।* *मिल जायेंगे प्रभु तुझे बस इतना भजन कर ले॥* 🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚

+3 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 4 शेयर
Sanjay Garg Nov 28, 2019

तिथि:- 28 नवंबर 2019 दिन:- वीरवार *आज का चिंतन॥* जीवन को पूरी तरह प्रारब्ध के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। हम आज जो हैं जैसे हैं उसमें सारी भूमिका प्रारब्ध की ही नहीं हो सकती है उसमें हमारे द्वारा कृत कर्म भी बराबर के जिम्मेदार होते हैं। माना कि हमारा कर्म ही हमारे प्रारब्ध का निर्माण करता है मगर बावजूद इसके कर्म और प्रारब्ध में एक सूक्ष्म भेद भी जरूर है। मेहनत के अभाव में फल की इच्छा करना और इच्छा पूर्ति न होने पर प्रारब्ध को दोष देना प्रारब्ध दोष नहीं अपितु मेहनत के अनुपात में फल की प्राप्ति न होना प्रारब्ध दोष जरूर है। प्रश्न आता है कि सब कुछ प्रारब्ध में लिखा है तो कर्म की क्या आवश्यकता है..? आचार्य चाणक्य कहते हैं कि कर्म फिर भी करने ही चाहिए क्योंकि क्या पता प्रारब्ध में यही लिखा हो कि कर्म करके ही सब प्राप्त होगा। भगवान श्रीकृष्ण भी अर्जुन को बार बार यही समझा रहे हैं कि हे अर्जुन सतत शुभ और श्रेष्ठ कर्म करते रहो ताकि तुम्हारा कर्म ही योग बन जाए। जहाँ कर्म ही योग बन जाता है वहाँ योगेश्वर को भी आते देर नहीं लगती। कर्मशील लोग अपने प्रारब्ध के निर्माता स्वयं होते हैं यही तो गीता और रामायण जैसे ग्रंथ हमें सिखाते हैं। इसलिए कर्म योगी बनो केवल कर्म भोगी नहीं।

+4 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 4 शेयर
Sanjay Garg Nov 11, 2019

दिनांक:- 11 नवंबर 2019 आज का चिन्तन सुख का अर्थ केवल कुछ पा लेना नहीं अपितु जो है उसमे संतोष कर लेना भी है। जीवन में सुख तब नहीं आता जब हम ज्यादा पा लेते हैं बल्कि तब भी आता है जब ज्यादा पाने का भाव हमारे भीतर से चला जाता है। सोने के महल में भी आदमी दुखी हो सकता है यदि पाने की इच्छा समाप्त नहीं हुई हो और झोपड़ी में भी आदमी परम सुखी हो सकता है यदि ज्यादा पाने की लालसा मिट गई हो तो। असंतोषी को तो कितना भी मिल जाये वह हमेशा अतृप्त ही रहेगा। सुख बाहर की नहीं, भीतर की संपदा है। यह संपदा धन से नहीं धैर्य से प्राप्त होती है। हमारा सुख इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने धनवान है अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि है कि कितने धैर्यवान हैं। सुख और प्रसन्नता आपकी सोच पर निर्भर करती है।

+4 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 7 शेयर
Sanjay Garg Nov 9, 2019

दिनांक :- 09 नवंबर 2019 आज का चिन्तन जिस प्रकार आप किसी वस्तु को लेने बाजार जाते हो तो उसका एक उचित मूल्य अदा करने पर ही उसे प्राप्त करते हो। इसी प्रकार जीवन में भी हम जो प्राप्त करते हैं सबका कुछ ना कुछ मूल्य चुकाना ही पड़ता है। विवेकानन्द जी कहा करते थे कि महान त्याग के बिना महान लक्ष्य को पाना संभव नहीं। अगर आपके जीवन का लक्ष्य महान है तो यह ख्याल तो भूल जाओ कि बिना त्याग और समर्पण के उसे प्राप्त कर लेंगे। बड़ा लक्ष्य बड़े त्याग के बिना नहीं मिलता। कई प्रहार सहने के बाद पत्थर के भीतर छिपा हुआ ईश्वर का रूप प्रगट होता है। अगर चोटी तक पहुँचना है तो रास्ते के कंकड़ पत्थरों से होने वाले कष्ट को भूलना ही होगा।

+4 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 3 शेयर
Sanjay Garg Oct 29, 2019

तिथि : 29-10-2019 दिन: मंगलवार आज का चिन्तन कोई भी परिस्थिति हमें इतना विचलित नहीं करती जितना कि हमारी मनस्थिति हमें विचलित करती है। अगर मनस्थिति उच्च हो तो दुर्गम से दुर्गम परिस्थिति पर हम भी माँ दुर्गा की तरह विजय प्राप्त कर सकते हैं। और यदि मनस्थिति निम्न हो तो छोटी से छोटी घटनाओं से हम विचलित होने लगेगें। यह बात ज्यादा मायने नहीं रखती है कि हमारे सामने परिस्थिति कैसी है अपितु जितनी यह बात मायने रखती है कि हमारी मनस्थिति कैसी है ? परिस्थितियों के साथ जूझने के वजाय अपनी मनस्थिति के साथ सूझने व बूझने का प्रयास करो फिर आपको अपने आप लगने लगेगा कि वाकई परिस्थिति इतनी भी प्रतिकूल नहीं जितना कि मैंने उसे बनाया था। परिस्थिति को नहीं मनस्थिति को सुधारने का प्रयास करें।

+11 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 4 शेयर