sahil grover Apr 10, 2020

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sahil grover Apr 9, 2020

(((( विश्वास से प्रभुप्राप्ति )))) . प्राचीन काल की एक घटना है... . एक बार एक किशोर ग्वाला अपनी गायों को चराने के लिए नदी के किनारे-किनारे उस जंगल में ले गया जहाँ हरी-भरी घास उगी थी। . नदी के तट पर बरगद का एक विशाल वृक्ष था, जिसकी घनी एवं शीतल छाया में अनेक राहगीर अपनी थकान मिटाते थे। . ग्वाला भी अपने गायों को चरने के लिए जंगल में छोड़कर उस वृक्ष की शीतल छाया में आराम करने के लिए बैठ गया। . मध्याह्न के समय उसने देखा कि एक साधु बाबा कहीं से आये और उन्होंने नदी में स्नान किया। . इसके बाद वे उस विशाल वटवृक्ष की शीतल छाया में आसन बिछाकर बैठ गये। . फिर उन्होंने दोनों आँखें बंद करके, नाक दबाकर कुछ क्रियाएँ कीं। . वह ग्वाला साधुबाबा के इन क्रियाकलापों को ध्यानपूर्वक देखता रहा। . जब संध्या-वंदन करके वे वहाँ से जाने की तैयारी करने लगे, तब उस ग्वाले ने बाबा के पास जाकर इन यौगिक क्रियाओं के विषय में पूछा। . उन्होंने कहाः- "ऐसा करके मैं भगवान से बातें कर रहा था।" . ग्वालाः- "क्या ऐसा करने से भगवान सचमुच में आते हैं और बातें करते हैं.?" . साधु बाबा सिर हिलाकर ग्वाले के प्रश्न का उत्तर 'हाँ' में देते हुए बाबा आगे बढ़ गये। . उनकी इतनी ऊँची स्थिति नहीं थी के वे भगवान से बातें कर सकें परंतु उन्होंने उस भोले-भाले ग्वाले को प्रोत्साहन देने के लिए ऐसा कह दिया था। . जब साधु वहाँ से चले गये, तब ग्वाला भी वैसी ही क्रियाएँ करने लगा परंतु उसको भगवान का कुछ पता नहीं चला। . फिर भी वह दृढ़ निश्चय करके बैठ गया कि 'बस, आज भगवान के दर्शन करने ही हैं।' . उसने सोचा कि 'वे साधु भगवान से बातें कर सकते हैं तो मैं क्यों नहीं कर सकता !' . तब ग्वाले ने पुनः अपनी दोनों आँखें बंद कर लें और नाक को जोर-से दबा लिया। . ऐसा करने से उसकी हृदयगती धीमी पड़ गयी तथा प्राण निकलने की नौबत आ गयी। . इधर भगवान शंकरजी का आसन डोलने लगा। . उन्होंने ध्यान में देखा कि किशोर ग्वाला भगवान से बातें करने के लिए हठपूर्वक आँखें बंद करके व नाक दबाकर बैठा है। . उस अबोध व निर्दोष ग्वाले को अकाल मृत्यु के मुँह में जाते देख भगवान शंकर उसके सामने प्रकट हो गये। . भगवान ने ग्वाले से कहाः-"वत्स ! आँखें खोलो, मैं आ गया हूँ, मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ।" . ग्वाले ने आँखें बंद रखते हुए इशारे से पूछा कि:-'आप कौन हैं ?' . भगवान शिव:-- "मैं वही भगवान हूँ जिसके लिए तुम आँखें बंद करके नाक दबाये बैठे हो।" . ग्वाले ने झट-से आँखें खोलीं और श्वास लेना शुरू किया परंतु उसने कभी भगवान को देखा तो था नहीं। . अतः वह कैसे पहचानता कि ये ही सचमुच में भगवान हैं। . उसने भगवान शिव को पेड़ के साथ रस्सी से बाँध दिया और साधु को बुलाने के लिए दौड़ता हुआ गया। . साधु अभी थोड़ी ही दूर पहुँचे थे, उन्हें रोककर ग्वाले ने सारी घटना कह सुनायी। . साधु झटपट वहाँ पहुँचे परंतु जिनके जीवन में झूठ-कपट होता है, विश्वास की कमी होती है... . साधन-भजन तो करते हैं परंतु दृढ़ निश्चय एवं प्रेम से नहीं करते उनको भगवान क्यों दिखेंगे..? . साधु को भगवान नजर ही नहीं आ रहे थे जबकि ग्वाले को स्पष्ट दिखायी दे रहे थे। . साधु ने कहा:-"मुझे तो कुछ नजर नहीं आ रहा है।" . तब ग्वाले ने इसका कारण भगवान से पूछा। . भगवान ने कहाः- "यंत्र की नाईं कोई हजार वर्ष भी जप- तप करे फिर भी मुझे प्राप्त नहीं कर सकता, . परंतु जो श्रद्धा, प्रीति और सच्चाई पूर्वक क्षण भर के लिए भी मुझे भजता है, मैं उसे शीघ्र दर्शन देता हूँ।" . भगवान ग्वाले से जो कह रहे थे वह साधु को भी सुनायी दे रहा था। . उनकी आँखों से पश्चाताप के आँसू बहने लगे, वे फूट-फूटकर रोने लगे। . इससे द्रवित होकर ग्वाले ने भगवान से उन्हें माफ करने के लिए प्रार्थना की। . ग्वाले की श्रद्धा व परदुःखकातरता के भाव से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने साधुबाबा को माफ कर दिया और उन्हें भी दर्शन दिये। . फिर दोनों को आशीर्वाद देकर वे अंतर्धान हो गये। . मित्रों आप उस ग्वाले की तरह नाक दबाकर हठ करें इसलिए वह कथा नहीं कही गयी है, . बल्कि अपने मन को समझायें कि यदि एक अनपढ़ ग्वाला साधारण साधु की देखा- देखी ही सही, विश्वासपूर्वक प्रभु को पुकारता है और उसे प्रभु के दर्शन हो जाते हैं ...!!! . यदि कोई व्यक्ति श्रद्धा, विश्वास , प्रीति और सच्चाई पूर्वक प्रभु साधना करे तो उसे प्रभु-प्राप्ति में देर कितनी। 🙏जय जय श्री राधे 🙏

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sahil grover Apr 9, 2020

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sahil grover Apr 9, 2020

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sahil grover Apr 9, 2020

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sahil grover Apr 9, 2020

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sahil grover Apr 8, 2020

. "हनुमान जी की चतुरता की एक अनसुनी कथा" एक समय कपिवर की प्रशंसा के आनन्द में मग्न श्रीराम ने सीताजी से कहा-"देवी ! लंका विजय में यदि हनुमान का सहयोग न मिलता तो आज भी मैं सीता वियोगी ही बना रहता।" सीताजी ने कहा-"आप बार-बार हनुमान की प्रशंसा करते रहते हैं, कभी उनके बल शौर्य की, कभी उनके ज्ञान की। अतः आज आप एक ऐसा प्रसंग सुनाइये कि जिसमें उनकी चतुरता से लंका विजय में विशेष सहायता हुई हो।" श्रीराम बोले, "ठीक याद दिलाया तुमने। युद्ध में रावण थक गया था। उसके अधिकतर वीर सैनिकों का वध हो चुका था। अब युद्ध में विजय प्राप्त करने का उसने अन्तिम उपाय सोचा। यह था देवी को प्रसन्न करने के लिए चण्डी महायज्ञ। यज्ञ आरम्भ हो गया। किन्तु हमारे हनुमान को चैन कहाँ ? यदि यज्ञ पूर्ण हो जाता और रावण देवी से वर प्राप्त करने मे सफल हो जाता तो उसकी विजय निश्चित थी। बस, तुरन्त उन्होने ब्राह्मण का रूप धारण किया और यज्ञ में शामिल ब्राह्मणों की सेवा करना प्रारम्भ कर दिया। ऐसी निःस्वार्थ सेवा देखकर ब्राह्मण अति प्रसन्न हुये। उन्होंने हनुमान से वर मांगने के लिए कहा। पहले तो हनुमान ने कुछ भी मांगने से इनकार कर दिया, किन्तु सेवा से संतुष्ट ब्राह्मणों का आग्रह देखकर उन्होंने एक वरदान मांग लिया।" "वरदान में क्या मांगा हनुमान ने ?" सीताजी के प्रश्न में उत्सुकता थी। श्रीराम बोले, "उनकी इसी याचना में तो चतुरता झलकती है। "जिस मंत्र को बार बार किया जा रहा था, उसी मंत्र के एक अक्षर का परिवर्तन का हनुमान ने वरदान में मांग लिया और बेचारे भोले ब्राह्मणों ने "तथास्तु" कह दिया। उसी के कारण मंत्र का अर्थ ही बदल गया, जिससे कि रावण का घोर विनाश हुआ।" सीताजी ने प्रश्न किया, "एक ही अक्षर से अर्थ में इतना परिवर्तन !" "कौन सा मंत्र था वह ?" श्रीराम ने मंत्र बताया- जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि। जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥ (अर्गलास्तोत्र-2) इस श्लोक में "भूतार्तिहारिणि" मे "ह" के स्थान पर "क" का उच्चारण करने का हनुमान ने वर मांगा। भूतार्तिहारिणि का अर्थ है, "संपूर्ण प्रणियों की पीड़ा हरने वाली और "भूतार्तिकारिणि" का अर्थ है प्राणियों को पीड़ित करने वाली।" इस प्रकार एक सिर्फ एक अक्षर बदलने ने रावण का विनाश हो गया। "ऐसे चतुरशिरोमणि हैं हमारे हनुमान।" श्रीराम ने प्रसंग को पूर्ण किया। सीताजी इस प्रसंग को सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुई। मित्रों आज के युग में हमें हनुमान की आवश्यकता है। ऐसे हनुमान की जो स्वामी भक्त हो, ज्ञानी हो, त्यागी हो, चरित्र सम्पन्न और जिसमें चतुरशीलता हो। सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान। सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥ भावार्थ:- श्री रघुनाथजी का गुणगान संपूर्ण सुंदर मंगलों का देने वाला है। जो इसे आदर सहित सुनेंगे, वे बिना किसी जहाज (अन्य साधन) के ही भवसागर को तर जाएँगे॥ 🙏जय जय श्री सीताराम 🙏

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