🚩🙏 कौन से ऐसे ग्रह होते हैं, जो गायन में सफलता दिलाते हैं... आज गायन के क्षेत्र में नई-नई प्रतिभाओं को अपना हुनर दिखाने का मौका मिल रहा है। यदि हम पहले से जान लें कि गायन के क्षेत्र में हमें कितनी सफलता मिलेगी तो इस क्षेत्र में बढ़ना आसान रहेगा। आइए जानते हैं कि कौन से ऐसे ग्रह हैं, जो गायन के क्षेत्र में सफल बनाते हैं। हमारी जन्म कुंडली में किन-किन स्थानों का महत्व होता है जिससे उत्तम गायक बन सकते हैं। किसी भी जातक की जन्म कुंडली में लग्न स्वयं का, द्वितीय भाव वाणी का व तृतीय भाव स्वर का होता है। साथ ही शुक्र का गायन के क्षेत्र में बड़ा योगदान होता है। शास्त्रीय गायन में सफलता के लिए गुरु, क्लासिकल गानों के लिए शुक्र, चन्द्र का शुभ भावों में होना सफलता के मार्ग को प्रशस्त करता है। द्वितीय भाव लग्न से दूसरे भाव को कहते हैं। यह वाणी का भाव होता है वहीं तृतीय भाव स्वर का। जब तक दोनों भाव दोषरहित न हों तो आवाज व स्वर मधुर नहीं निकलते। लग्न स्वयं को दर्शाता है। लग्न भाव भी दोषमुक्त होना चाहिए। यदि आपकी जन्म लग्न वृषभ या तुला है तो लग्नेश शुक्र होगा और इसके साथ वृषभ लग्न में द्वितीय भाव का स्वामी बुध व तृतीय भाव का स्वामी चन्द्र होगा। अत: बुध शुभ व चन्द्र भी अशुभ ग्रहों के प्रभावों से दूर होना चाहिए। शुक्र की स्थिति भी वृषभ, तुला, मकर, कुंभ मीन में हो या लग्न को वृश्चिक राशि का होकर देखे तो सफलता निश्चित मिलती है। यदि चतुर्थ भाव में शुक्र हो तो उत्तम सफलता के योग देता है। तुला लग्न भी शुक्र प्रधान लग्न है व द्वितीय भाव मंगल की राशि वृश्चिक का व स्वर भाव तृतीय का स्वामी गुरु है और इन दोनों में मित्रता है। यदि इन भावों के स्वामी स्वराशि के हों या मित्र के हों या इन भावों को देखते हों व चतुर्थ भाव के स्वामी से संबंध हो तो सफलता भी उत्तम मिलती है। मेष लग्न में मंगल, शुक्र व बुध का शुभ स्थिति में होना चाहिए। मिथुन लग्न में बुध, चन्द्र व सूर्य का शुभ होना चाहिए। कर्क लग्न में चन्द्र, सूर्य व बुध, सिंह लग्न में सूर्य, बुध व शुक्र, कन्या लग्न में बुध, शुक्र व मंगल, वृश्चिक लग्न में मंगल, गुरु व शनि, धनु लग्न में गुरु व शनि, मकर लग्न में शनि व गुरु, कुंभ लग्न में शनि, गुरु व मंगल, मीन लग्न में गुरु, मंगल व शुक्र का शुभ होना चाहिए तभी उत्तम सफलता मिलती है। और यदि इन्हीं में से किसी की महादशा में अंतर भी इन्हीं में से किसी का हो, तो सफलता में चार चांद लग जाते हैं। 🚩🙏💐💐💐💐💐👏

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🚩🙏 अर्जुन ने दुर्योधन से क्या वरदान मांगा था और क्या वरदान को दुर्योधन ने पूरा किया था? महाभारत का युद्ध शुरू हुए कुछ दिन गुज़र चुके थे और जैसे जैसे दिन निकल रहे थे वैसे वैसे कौरवों की शक्ति भी कम होती जा रही थी. अपनी सेना की कमज़ोर स्थिति देखकर दुर्योधन क्रोधित होता हुआ पितामह भीष्म के पास पंहुचा क्योकि पूरी कौरव सेना के सेनानायक उस वक़्त पितामह भीष्म थे. दुर्योधन का उन पर क्रोध करना लाज़मी था. काफी देर बात करने के बाद भी जब दुर्योधन को युद्ध में कौरवों की वापसी का कोई खास उपाय नज़र नहीं आया तब उसने पितामह भीष्म पर आरोप लगाया कि आप पांडवों से लगाव के चलते पुरे मन से युद्ध नहीं लड़ रहे हैं. दुर्योधन के इस आरोप पर भीष्म नाराज़ होकर पांच ऐसे तीर निकाले, जिसमे इतनी शक्ति थी कि पांडवों की मृत्यु निश्चित थी. दुर्योधन उन तीरों को लेकर कल के युद्ध के लिए निकल गया. भगवान् श्री कृष्ण को तीरों वाली बात ज्ञात हो गयी तो उन्होंने तुरंत अर्जुन को दुर्योधन द्वारा दिया गया एक वरदान का स्मरण कराया और कहा की जाओ पार्थ और उससे वह पांचो तीर ले कर आओं. श्रीकृष्ण की बात सुनकर अर्जुन दुर्योधन के शिविर पंहुचा और वनवास के दौरान उसके द्वारा मिले एक वरदान का स्मरण कराया और कहा कि भ्राता आप को याद हैं जब हम वनवास में थे तब आप हम पर नज़र रखने के लिए वन में आ गए थे. दुर्योधन ने हां में जवाब दिया फिर अर्जुन कहा कि किसी दिन कुएं में जब आप स्नान कर रहे थे तभी गंधर्व राजकुमार भी वहा आकर नहाने लगे. आप राजकुमार की इस हरकत से क्रोधित होकर उन्हे अपमानित किया तो राजकुमार ने आप को बंधी बना लिया. फिर भ्राता युधिष्टिर ने आपकी ऐसी हालत देखकर मुझसे कहा की जाओ राजकुमार गंधर्व से कहो की दुर्योधन को मुक्त कर के जाने दे. तब राजकुमार गंधर्व मेरी बात सुनते हुए आपको मुक्त कर दिया था. मेरी इस सहायता से आपने मुझे एक वरदान मांगने को कहा था और आज मैं वही वरदान लेने आया हूँ आपसे. मुझे वरदान में भीष्म पितामह से मिले वह पांच तीर चाहिए. जब अर्जुन दुर्योधन के पास जाते है, तब वह अचंभित हो जाता है, लेकिन क्षत्रिय धर्म को निभाते हुए दुर्योधन वरदान के रूप में अर्जुन को वह तीर दे देते है। इसके बाद दुर्योधन भीष्‍म पितामह के पास जाकर निवेदन करते है, कि वे उसे पाँच दिव्‍य स्‍वर्णिम तीर और प्रदान करें। इस बात को सुनकर पितामह मुस्‍कुराते हुए कहते है, ” पुत्र, यह संभव नहीं है| समय, भाव, और स्थिति दोहराई नहीं जा सकती”। 🚩👏💐❤👆💐💐🙏

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🚩🙏दक्षिणा ” देने से ही क्यों मिलता है धार्मिक कर्मों का फल। कृपया पूरी पोस्ट पढ़ने का कष्ट करें। यजुर्वेद में एक बहुत सुंदर मन्त् है, वह कहता है ब्रह्मचर्य आदि व्रतों से ही दीक्षा प्राप्त होती है अर्थात् ब्रह्मविद्या या किसी अन्य विद्या में प्रवेश मिलता है। फिर दीक्षा से दक्षिणा अर्थात् धन समृद्धि आदि प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। यहाँ दक्षिणा मिलने का अर्थ है दक्षिणा देना, वेद ने यही माना है कि जो देता है उसे भगवान और अधिक देते हैं। जो नहीं देता है, भगवान उसका धन छीनकर दानियों को ही दे देते हैं। फिर कहता है दक्षिणा से श्रद्धा प्राप्त होती है, और श्रद्धा से सत्य प्राप्त होता है। क्रम है, व्रत –> दीक्षा –> दक्षिणा –> श्रद्धा –> सत्य मध्य में दक्षिणा है, एक बार दीक्षित हो गए, मार्ग पर बढ़ गए, और फिर दक्षिणा में लोभ किया तो मार्ग नष्ट हो जाता है। इसलिए विद्वानों, गुरु, आचार्य को दक्षिणा और पात्रों को दान देने से ही मार्ग आगे प्रशस्त होता है। दक्षिणा देने से अपने गुरु, आचार्य में श्रद्धा बढ़ती है। गुरु भी अपनी अन्य सांसारिक चिंताओं से मुक्ति पाकर शिष्य या यजमान के कल्याण के लिए और उत्साह से लग जाते हैं और अंततः सत्य से साक्षात्कार कराते हैं। अब दक्षिणा क्या होनी चाहिए, इस पर शास्त्र का स्पष्ट मत है कि दक्षिणा यथाशक्ति, यथासम्भव ही होनी चाहिए। न अपनी शक्ति से कम होनी चाहिए न ज्यादा की कोई आवश्यकता है।सनातन धर्म की समाज संरचना ऐसी थी कि अपरिग्रही ब्राह्मणों, पुरोहितों, ज्योतिष आदि आचार्यों का दायित्व समाज के ऊपर था। समाज उन्हें अपने सामर्थ्यानुसार दक्षिणा द्वारा पोषित करता था। बदले में वे समाज को अपने ज्ञान से पोषित करते थे। पर जैसे ही यजमान में कृपणता आई और आचार्य में लोभ आया वैसे ही यह व्यवस्था टूट गई। इससे हानि हुई कि जिनका कार्य पुरोहित बनकर कर्मकाण्ड कराना था, गुरु बनकर पढ़ाना लिखाना था, ज्योतिषाचार्य बनकर लोगों को जीवन के प्रति सचेत करके मार्ग दिखाना था, उन्हें यजमानों से उचित दक्षिणा न मिलने के कारण अपना घर चलाने के लिए दूसरे व्यवसायों अपनाने पड़े और इन विद्याओं का नाश हुआ। आज सब लोग एक पक्षीय रूप से तो देखते हैं कि ब्राह्मण पुरोहित ठीक नहीं करते, ज्योतिषी लूटते हैं और झूठ बताते हैं; लेकिन वे खुद का दोष नहीं देखते कि क्या यजमान धर्म का उन्होंने पालन किया? क्या यथाशक्ति, यथासम्भव वे इन आचार्यों को दक्षिणा देते हैं? आपके कोई जान पहचान के ज्योतिषी हैं तो आप चाहते हैं कि उन्हें मुफ्त में कुण्डली दिखा दें, उनसे इमोशनल अत्याचार करते हैं। यह नहीं देखते कि ज्योतिष विद्या प्राप्त करने के लिए कितने हज़ार घण्टे उन्होंने अध्ययन की तपस्या की होगी। वे आपकी कुण्डली को समझने में जो एक दो घण्टे खर्च करते हैं आप चाहते हैं उसकी कीमत 11, 51, या 101 रुपए दे दें। घर में कोई पूजापाठ है तो आप चाहते हैं कि 101 रुपए में पण्डित जी मान जाए। वह आपके घर दूर से एक दो घण्टे खर्च करके आते जाते है, 2 घण्टे खर्च करके पूजा कराकर अपना पूरा दिन खर्च करते है और बदले में 101, 151 रुपए में आप उसे विदा करना चाहते हैं। क्या यह आपकी यथाशक्ति-यथासम्भव है? यदि सब लोग उन पुरोहितों या ज्योतिषियों को बस 101 रुपया ही दें तो हर पर 2 घण्टे लगाकर वह केवल 5-6 लोगों की कुंडली या पूजापाठ ही तो करा पाएगे? । इसमें वह अपना घर कैसे चलाएगे? और शांति से नहीं चला पाएगे तो अपनी विद्या और यजमान पर ध्यान कैसे देगे? फिर जब वह मजबूरी में अपनी दक्षिणा फिक्स करे तो आप उन्हें पाखण्डी धंधेबाज कहते हो? यह क्या खुद का फोड़ा न देखकर दूसरे की सूजन निहारने वाली बात नहीं है? आप ज्योतिषी से तो उम्मीद करते हैं कि वह पाराशर स्मृति के अनुसार चलकर दक्षिणा न मांगे पर जब वही शास्त्र ज्योतिष आदि विद्याओं के लिए यथाशक्ति दक्षिणा देने की बात कहते हैं तो उसे नहीं मानते। तब आप 11 रुपए देकर कहते हैं बिना दक्षिणा दिए पाप लगता है पण्डितजी यह रख लीजिए। अरे 11 रुपए का एक ज्यूस भी नहीं आता है, क्यों उन जान पहचान के ज्योतिषियों और पुरोहितों को अपमानित करते हैं 11 रुपए देकर?? क्यों खुद के सिर पाप चढाते हैं। वेद ने स्पष्ट कहा है, “इन्द्र ऐसे कृपण/कंजूस लोगों को पैर से घास फूंस की तरह रौंद देते है।” मैं यह नहीं कह रहा कि सभी ज्योतिषी बहुत विद्वान या सारे ही पुरोहित बहुत अच्छे हैं। पर उनमें कई वास्तव में अच्छे हैं जिन्हें समाज हतोत्साहित करता है। ऐसे में वे अपने अध्ययन पर ध्यान नहीं दे पाते। उन्हें भी अपनी सांसारिक जरूरतें पूरी करने के लिए दूसरे रास्ते अपनाने पड़ते हैं। असंतुष्ट होकर आचार्य कभी भी कृपा नहीं कर सकते। सच्चे मन, पूर्ण विश्वास और उन्हें संतुष्टि देकर ही उनकी कृपा प्राप्त की जा सकती है। उनके द्वारा बताए गए उपाय भी तभी सफल होते हैं। पुराणों में एक कथा आती है, नारद जी ने प्रश्न किया कि दक्षिणाहीन कर्म का फल कौन भोगता है? तो भगवान नारायण ने उत्तर दिया,“मुने! दक्षिणाहीन कर्म में फल ही कैसे हो सकता है? क्योंकि फल परिश्रम करने की योग्यता तो दक्षिणावाले कर्म में ही है। बिना दक्षिणा वाला कर्म तो बलि के पेट में चला जाता है, अर्थात् नष्ट हो जाता है। आचार्यों से वैदिक विद्याओं का प्रयोग करवाना, पौरोहित्य करवाना आदि यज्ञ का अंग है।मनुस्मृति में महाराज मनु का स्पष्ट शब्दों में आदेश है,। “और पुण्य कर्मों को करे पर कम धन वाला यज्ञ न करे। न्यून/कम दक्षिणा देकर कोई यज्ञ नहीं करना चाहिए। कम दक्षिणा देकर यज्ञ कराने से यज्ञ की इन्द्रियाँ, यश, स्वर्ग, आयु, कीर्ति, प्रजा और पशुओं का नाश करती हैं।” अन्यत्र भी कहा है,“दक्षिणाहीन यज्ञ दीक्षित को नष्ट कर देता है।” वेद में भी कहा गया है,“प्रयत्न से उत्तम कर्म करने वाले के लिए जो योग्य दक्षिणा देता है, अग्नि उस मनुष्य की चारों ओर से सुरक्षा करता है।” ( इसमें श्रद्धा भाव भक्ति भी देखा जाता है ) “कंजूस कभी भी ज्ञानसम्पन्न नहीं हो सकते, वे सदा ही अंधकार में ठोकर खाते फिरेंगे। जो यज्ञ के कार्य के लिए अपना धन समर्पित करते हैं, वे उन्नति करते हैं और अदानशील व्यक्ति नष्ट हो जाते हैं।” इसलिए वैदिक विद्याओं को बचाने के लिए, सनातन धर्म की रक्षा के लिए केवल दोषारोपण न करें। आपके लिए वैदिक विद्या का प्रयोग करने वाले आचार्यों, अन्य योग्य सनातनी संस्थाओं और व्यक्तियों को उचित दान दक्षिणा देने में कंजूसी न करें। बहुत सी ऐसी जगहें हैं जहाँ धन बचा लेंगे। फालतू जगहों पर कंजूसी करेंगे तो धन बढ़ेगा, वैदिक विद्या और धर्म के कार्य में कंजूसी करेंगे तो धन घटेगा। इधर तो देने से ही बढ़ता है। इसमें शास्त्रों का स्पष्ट निर्देश है। सन्दर्भ {सोजन्य से (लिया गया है)} : १. यजुर्वेद 19.30 २. ऋग्वेद 5.34.7 ३. अथर्ववेद 20.63.5/ऋग्वेद 1.84.8 ४. ब्रह्मवैवर्त पुराण, प्रकृति खण्ड, अध्याय 42 ५. मनुस्मृति 11.39/40 ६. स्कन्दपुराण 5.33.27 ७. ऋग्वेद 1.31.15 ८. ऋग्वेद 4.51.3 🚩👏💐💐❤💐💐🙏

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*🚩🙏बुरा समय आपके जीवन के उन सत्यों से सामना करवाता है ,* *जिनकी आपने अच्छे समय में कभी कल्पना भी नहीं की होती ...* *आप के अच्छे समय मे आप के हितैसी बहुत होंगे, लेकिन जब भी तकलीफ का समय आएगा तब कुछ चुनिंदा ही दिखेंगे, जो आप को हिम्मत देगे,आगे बढ़ने का हौसला देगे,* *ईश्वर ने सब की समस्या का समाधान भी दिया है, बस आप को अपने धैर्य से विवेक से परिस्थितियों को सुलझाना है, अक्सर हम दोष देने लग जाते है, लेकिन असल मे हमे अपनी कमियों को समझना चाहिए,* *विपत्तियां कैसी भी हो कष्टदायक होती है,आज आप किसी की तकलीफ में साथ है, तो निश्चित ही आपकी मदद के लिए भी कोई साथ आएगा।एक ईश्वर पर दृढ़ता,सदैव रखे।* 🚩🙏🌹💐🌱👏

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*🚩🙏 किसी ने कहा धर्म छुट्टी पर है...* *धर्म की जय हो अधर्म का नाश हो प्राणियों में सद्भावना हो विश्व का कल्याण हो* मनुष्य जब अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों पर इतरा कर स्वयं को ब्रह्माण्ड का नियंता समझने वाले लोग एक नन्हे विषाणु से पराजित हो जाँय, तो धर्म चुपचाप मुस्कुरा रहा होता है। जब मनुष्य के बड़े-बड़े दावों के नाक के नीचे स्थितियां इतनी विकट हो जाँय कि संक्रमण के भय से पिता अपने पुत्र का शव लेने से इनकार कर दे(अमेरिका), तो धर्म चुपचाप मुस्कुरा रहा होता है। वे लोग, जिन्हें लगता है कि पृथ्वी पर विज्ञान पहली बार इतना सशक्त हुआ है, वे भावुक हैं तार्किक नहीं। अरबों वर्ष पुरानी पृथ्वी पर मानवीय सभ्यता का इतिहास लाखों वर्ष पुराना है। इन लाखों वर्षों में असँख्य बार सभ्यताएँ उपजीं, विकाश के चरम पर पहुँची, विज्ञान ने अंतिम ऊंचाई को स्पर्श किया, और फिर सभ्यताएँ समाप्त हो गईं। हर उत्थान का अंतिम पड़ाव पतन होता है, और हर पतन का अगला पड़ाव उत्थान... अपने वैज्ञानिक उत्थान के मद में चूर हो कर धर्म को भूल चुकी सभ्यताएँ जब प्रकृति के साथ अत्याचार करती हैं, तो उनका विकास ही उन्हें मार डालता है। फिर वही धर्म उन्हें पुनर्जन्म देता है। व्यक्ति हो या सभ्यता, पराजय के बाद उसे धर्म की गोद में ही शरण मिलती है। दिक्कत यह है कि हमने सम्प्रदायों को ही धर्म मानना शुरू कर दिया है। बहुत पीछे नहीं, मात्र पाँच हजार वर्ष पीछे जाइये। सिन्धु से लेकर नील तक, दजला-फ़रात से लेकर दक्षिण समुद्र तक, हर सभ्यता के पास धर्म था। सब प्रकृति की सुनते थे, और प्रकृति को ही पूजते भी थे। ऊर्जा देने वाले सूर्य, जल देने वाले इन्द्र, वायु के देवता पवन, अलग अलग नामों से ये ही सबके आराध्य थे। सब प्रकृति की सुनते थे, सब प्रकृति को पूजते थे। फिर मनुष्य शक्तिशाली हुआ, और उसने व्यवस्था के केंद्र से प्रकृति को हटा कर स्वयं को स्थापित करने का प्रयास किया। बुद्ध आये, महाबीर आये, जीजस आये, जरथरुस्थ आये... सबने अपनी-अपनी ब्याख्या दी। व्यवस्था के केंद्र से प्रकृति हट गई, व्यक्ति आ गया। हमने व्यक्तियों द्वारा चलाये गए सम्प्रदाय को ही धर्म मान लिया। धर्म मुस्कुराता रहा, क्योंकि उसे पता है कि अंत में सब उसी के पास जाएंगे। भारत इस मामले में तनिक अलग है। सनातन की गोद में भी असँख्य सम्प्रदाय उभरे, पर धर्म से नाता नहीं टूटा। प्रकृति से दूरी नहीं बनी। सारे सम्प्रदायों को अपनी गोद में रख कर भी सनातन प्रकृति का हाथ पकड़े रहा... धर्म कहीं नहीं गया। धर्म नहीं होता तो चिकित्सक अपने प्राणों को संकट में डाल कर रोगियों का उपचार नहीं कर रहे होते। धर्म नहीं होता तो भारत के हजारों लाखों युवक स्वयं आगे बढ़ कर भूखों तक अन्न नहीं पहुँचा रहे होते। धर्म नहीं होता तो पुलिस मौत के जमात में घुस कर रोगियों को अस्पताल तक नहीं पहुँचा रही होती। धर्म है, तभी मनुष्य कोरोना से लड़ पा रहा है। धर्म ड्यूटी कर रहा है। अधर्म कितना भी राह में रोड़ा अटकाए, धर्म कोरोना को पराजित कर के ही मानेगा। हमारी चेतना पर प्रकृति द्वार जड़ दिए गए ताले में जी जीवन मुस्कुराएगा, धर्म मुस्कुराएगा। क्योंकि अंत में जीत..... धर्म की होगी भारत जितेगा ही जितेगा🙏🙏 🚩🙏🌹⚘🌼💐👏

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*🚩🙏 धर्म और हम* आप सभी मित्रों को जय माता दी इस मैसेज को एक बार पढ़े और फिर अपनी प्रतिक्रिया दे कई बार लोग कहते हैं कि धर्म की हानि हो रही है, समाज का पतन हो रहा है और भी बहुत सी बातें । कई आयोजन होते हैं , विचार भी किये जाते हैं ,धर्म प्रचार के लिए सभाएँ भी गठित हैं , धर्माचार्य भी बहुत से हैं , आज सोशल मीडिया पर भी हर प्राणी धर्मोपदेष्टा बना हुआ है । फिर भी धर्म का पतन ! बहुत आश्चर्य की बात है । आज से ४० / ५० वर्ष पूर्व न तो धर्म प्रचार के इतने माध्यम थे न ही इतनी भारी मात्रा में कथा प्रवचन होते थे लेकिन फिर भी जन मानस में धर्म के प्रति अपार श्रद्धा थी । तो फिर आज क्या हो गया समाज को ? यह गम्भीर प्रश्न सामने खड़ा है । *इसका एक मात्र कारण है* अयोग्य , आचारहीन, असाम्प्रदायिक व्यक्तियों का धर्मोपदेशक होना । जो लोग स्वयं आचारहीन हैं श्रद्धाहीन हैं वो भला किसी को उपदेश देकर क्या उसके मन में धर्म के प्रति श्रद्धा जाग्रत करेंगें । आज कल धर्म का उपदेश तो सब देते हैं किंतु आचरण कोई नहीं करता । आज की स्थिति ऐसी है.... देखो वेद कहता है सत्यं वद अर्थात् सत्य बोलो । ये उपदेश हो गया । अब महाराज जी कहीं झूठ बोलते पाये गये किसी शिष्य ने कहा गुरु जी आप तो बोले थे सत्यं वद पर आप अभी अभी असत्य भाषण किये । तब महाराज जी कहते हैं देखो सत्यं वद में वद जो पद है वह मध्यम पुरुष का एक वचन है और मध्यम पुरुष का संबंध युस्मद् शब्द से है अर्थात् तुम सत्य बोलो हम नहीं । अब सोचिये जो ऐसा व्यक्ति धर्मोपदेष्टा है उसके उपदेश का कितने लोगों पर प्रभाव पड़ेगा । प्रभाव उसी के वाक्यों का पड़ता है जो तदनुकूल आचरण भी करे । धर्म धारण करने का विषय है , यदि आप को धर्म की चिंता है तो सबसे पहले धर्म का आचरण स्वयं कीजिये किसी को दिखाने के लिए नहीं , प्रसिद्धि पाने के लिए नहीं बल्कि अपने आप के लिए । कई लोग हैं जो जप , होम , संध्या वंदन करते हैं या और भी कुछ दान पुण्य का कार्य करते हैं तो तुरन्त फोटो खींच कर व्हाट्सएप fb पर अपलोड कर देते हैं , मैं अपने सभी मित्रों से निवेदन करता हूँ कृपया इन सब से बच कर रहें । इससे आपके द्वारा किये जा रहे कृत्यों का जो फल मिलना चाहिए नहीं मिलेगा । जो चीजें गोपनीय हैं उन्हें गोपनीय ही रहने देना चाहिए । आज का कड़वा सच है कि अयोग्य व्यक्तियों को भी धर्म के सर्वोच्च स्थान पर पहुंचने के लिए मात्र धन और वैभव चाहिए । जिसका उदाहरण हर कुम्भ के बाद देखने को मिल ही जाता है । आज कोई भी व्यक्ति जो सनातन धर्म का क ख भी नहीं जानता मात्र धन के बल पर किसी भी पद पर बैठ जाता है । समस्या यहीं समाप्त नहीं होती यहाँ से और बढ़ जाती है जब सम्मानित पदों के योग्य अधिकारी जो तत्तत् पदों पर अभिषिक्त हैं वो भी केवल हम विरोध करके बुरे क्यों बनें सोच कर चुप बैठ जाते हैं । और कुछ केवल लिफाफा पाकर । आगे ज्यादा कहना उचित भी नहीं है अत एव लेख यहीं समाप्त करती हूँ । बस अपने सभी व्हाट्सएप fb के धर्मनिष्ठ मित्रों से कहता हूँ कि आप अपना आचरण श्रेष्ठ रखें धर्म का पूर्ण पालन करें धर्म आपकी रक्षा करेगा और आपके द्वारा किया धर्म देश और समाज का भी पतन रोकेगा । निवेदन ..... कृपया लेख को विवादित न बनाएं किसी व्यक्ति विशेष का विरोध न तो मैं करता हूँ और न ही मेरा ऐसा कोई प्रयोजन ही है । मेरा उद्देश्य केवल सच को आपके सामने रखना मात्र है । 🚩👏⚘🌹🌱💐❤🙏

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*🚩🙏विशेष जानकारी अक्षय तृतीया* अक्षय तृतीया मुहूर्त अक्षय तृतीया - 26 अप्रैल 2020, अक्षय तृतीया पूजा मुहूर्त – 05:48 से 12:19 अगर बाज़ार खुले रहे तो सोना खरीदने का शुभ समय – 05:48 से 13:22 तृतीया तिथि प्रारंभ – 11:51 (25 अप्रैल 2020) तृतीया तिथि समाप्ति – 13:22 (26 अप्रैल 2020) अक्षय तृतीया के दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर नित्य कर्मों से निपट कर तांबे के बर्तन में शुद्ध जल लेकर भगवान सूर्य को पूर्व की ओर मुख करके चढ़ाएं तथा इन 3 में से किसी 1 मंत्र का जप करें- 👉 ॐ भास्कराय विग्रहे महातेजाय धीमहि, तन्नो सूर्य: प्रचोदयात् 👉 ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय, सहस्त्र किरणाय मनोवांछित फलं देहि देहि स्वाहा 👉 ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजो राशे जगत्पते, अनुकंपये मां भक्तया, ग्रहाणार्घ्यं दिवाकर 💐जय माता दी👏 🚩🙏🌱🌹⚘🌼💐👏

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