तंत्र साधना से गुप्त नवरात्रि में प्राप्त करें सिद्धि शारदीय नवरात्र के वक्त शक्ति की प्रतीक माँ दुर्गा की अाराधना जोर-शोर से की जाती है। हालांकि चैत्र नवरात्र में भी देवी की अराधना बड़े पैमाने पर होती है। क्या अापको पता है कि साल भर में शारदीय और चैत्र नवरात्र के अलावा दो और नवरात्र सहित कुल चार नवरात्र होते हैं। अगर नहीं तो हम अापको बताते हैं। इन दोनों के अलावा दो गुप्त नवरात्र होते हैं। पहले इसके बारे में कम ही लोगों को पता था, लेकिन अब लोग इसके बारे में भी जानने लगे हैं। हालांकि इन दोनों गुप्त नवरात्रों में भी माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की आराधना के साथ ही दस महाविद्या की पूजा की जाती है। खास तौर पर गुप्त नवरात्र में तंत्र साधना की जाती है। अाषाढ़ और माघ माह में मनाई जाती है गुप्त नवरात्रि? गुप्त नवरात्रि आषाढ़ और माघ माह के शुक्ल पक्ष में मनाई जाती है। तंत्र पूजा के लिए गुप्त नवरात्रि को बहुत खास माना जाता है। वर्ष 2019 में गुप्त नवरात्र माघ माह के शुक्ल पक्ष में 5 फरवरी से शुरू हो रही है, जिसका समापन 14 फरवरी को होगा। 10 महाविद्या की होती है पूजा गुप्त नवरात्रि की पूजा के नौ दिनों में माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की बजाय दस महाविद्याओं की पूजा की जाती है। ये दस महाविद्याएं मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी हैं। गुप्त नवरात्रि के उपाय- बनेंगे सारे बिगड़े काम गुप्त नवरात्रि में तंत्र शास्त्र के अनुसार उपाय करने से शीघ्र ही शुभ फल मिलते हैं। गुप्त नवरात्रि में गुप्त नवरात्रि के उपाय (gupt navratri ke upay) करने से धन, संतान, विवाह, नौकरी, प्रमोशन, स्वास्थ्य में लाभ मिलता है और सभी बाधाएं और परेशानियां दूर हो जाती है। इन 9 दिनों में व्रत रखने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। सामान्य नवरात्रि में सात्विक और तांत्रिक पूजा दोनों की जाती है, जबकि गुप्त नवरात्रि में सिर्फ तांत्रिक पूजा ही की जाती है, इसलिए गुप्त नवरात्रि में साधक अपनी साधना को गुप्त रखते हैं, गुप्त नवरात्रि में पूजा जितनी गोपनीय होगी सफलता उतनी ही प्रबल होगी। हिन्दू धर्मशास्त्र की मान्यताओं के अनुसार गुप्त नवरात्रि के अचूक उपाय इस प्रकार हैं... गुप्त नवरात्रि के उपाय (1) Gupt Navratri Ke Upay मनपसंद वर का उपाय / शीघ्र विवाह का उपाय : गुप्त नवरात्रि में नौ दिनों तक शिव मंदिर जाकर भगवान शिव और मां पार्वती पर गंगाजल और दूध से अभिषेक करने के बाद पंचोपचार (धूप, दीप, पुष्प, चन्दन और नैवेद्य) से उनका पूजन करें। मौली/कलावा से भगवान शिव और मां पार्वती की प्रतिमा के मध्य गठबंधन कर दें। उत्तर दिशा की तरफ मुख कर के लाल चंदन की माला से 108 बार नीचे दिए गए मन्त्र का जाप करें- मंत्र- 'हे गौरी शंकरार्धांगी। यथा त्वं शंकर प्रिया। तथा मां कुरु कल्याणी, कान्त कान्तां सुदुर्लभाम।। गुप्त नवरात्रि के उपाय (2) Gupt Navratri Ke Upay धन लाभ के लिए उपाय / धन प्राप्ति के उपाय : गुप्त नवरात्रि तंत्र साधना से धन लाभ के लिए उपाय किये जाते हैं। किसी भी दिन सबसे पहले स्वच्छ होकर घर में श्रीयंत्र की स्थापना करें। उसका कुंकुम, इत्र, फूल, धूप, तथा दीप से पूजन करें। लाल या पीले आसान पर उत्तर दिशा की ओर मुख करके हल्दी की माला से ‘ॐ श्रीं श्रीये नम:’ मंत्र का 108 बार जाप करें। गुप्त नवरात्रि के उपाय (3) Gupt Navratri Ke Upay परीक्षा में सफलता का उपाय / इंटरव्यू में सफलता का उपाय : गुप्त नवरात्रि में नौ दिनों तक माँ सरस्वती की आराधना करें। सबसे पहले पूर्व दिशा की ओर मुख करके सफेद रंग का सूती आसन बिछाएं ओर उस पर बैठ जाएं। चांदी के लौटे में गंगाजल भरकर रखें और सरस्वती चालीसा का पाठ करें। सफ़ेद फूल की माला माता को चढ़ाएं, माता के चित्र या प्रतिमा पर केसर व इत्र छिड़क कर इसका पूजन करें। इसके बाद माँ सरस्वती का मंत्र- 'ऊँ ह्लीं वाग्वादिनी भगवती मम कार्य सिद्धि कुरु कुरु फट् स्वाहा।' का सफ़ेद चन्दन की माला से जाप करें ओर जब भी आप परीक्षा या इंटरव्यू के लिए जाएँ तो इस माला को पहन कर जाएं। सफलता मिलने पर माला को किसी भी पवित्र जगह रख दें, अगर पहनना चाहते हैं तो हमेशा सात्विक (मांस-मदिरा से दूर) रहें। गुप्त नवरात्रि के उपाय (4) Gupt Navratri Ke Upay तरक्की का उपाय / बरकत बढ़ाने का उपाय : गुप्त नवरात्रि में नौ दिनों तक स्वच्छ होकर साफ कपड़े में मोती शंख को रखें और उस पर केसर से स्वस्तिक का चिह्न बनायें। शंख को मंदिर में स्थापित करें और स्फटिक माला से महालक्ष्मी मंत्र 'श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम: का 108 बार जाप करें और मंत्रोच्चार के साथ एक-एक चावल (108 साबुत दाने) इस शंख में डालें। नवरात्रि के नौवें दिन पूजन के बाद चावल के साथ शंख को भी उस थैली में रखकर तिजोरी में रख दें। गुप्त नवरात्रि के उपाय (5) Gupt Navratri Ke Upay शत्रु शमन का उपाय / शत्रु पर विजय प्राप्ति का उपाय : गुप्त नवरात्रि में तंत्र साधना के अनुसार माँ दुर्गा का पूजन विधि अनुसार करने से शत्रुओं पर आसानी से विजय प्राप्त हो सकती है। गुप्त नवरात्रि में नौ दिनों तक स्वच्छ होकर दुर्गा सप्तसती का पाठ करें। सबसे पहले एक लाल आसान बिछाकर पूर्व की ओर मुख कर बैठ जाएँ ओर नीचे दिए गए मंत्र का 21 माला नित्य संकल्प लेकर नवरात्रि में व्रत रखें। शत्रु नाशक मंत्र सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते | भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोस्तु ते || का 108 बार (21 माला) का जाप करें। रोज हवन करें, हवन सामग्री में कालीमिर्च और सरसों जरूर डालें। माता को 108 आहुतियां दें। नौ दिनों तक ऐसा करने से शत्रु आपके सामने घुटने तक देंगे गुप्त नवरात्रि पूजा विधि व नियम Gupt Navratri Puja Vidhi गुप्त नवरात्रि में सबसे पहले नौ दिनों के लिए कलश की स्थापना करें।एक लकड़ी की चौकी पर लाल पेंट करवाकर लाल कपड़ा बिछाएं और माँ मूर्ति या चित्र की स्थापना करें।इसके बाद माता की चौकी के सामने देसी घी का एकमुखी दीपक जलाएं और माँ दुर्गा का मंत्र "ऊं ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडाय विच्चे" का 108 बार जाप करें। वेला मंत्र, दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तशती का पाठ करें और सुबह और शाम दोनों समय माता की आरती जरूर गाएं। गुप्त नवरात्रि में नौ दिनों तक स्वच्छ और ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए माता को लौंग, बताशा, पंचमेवा और पान के पत्ते का भोग लगाएं। मात को लाल फूल बहुत प्रिये होते हैं इसलिए मां को लाल फूल चढ़ाएं याद रहे माता को आक, मदार, दूब और तुलसी भूलकर भी ना चढ़ाएं।

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गुरुभक्त एकलव्य के सात रहस्य जानकर आश्चर्यचकित हो जाएंगे आप!!!!!!!! प्राचीन भारत में हुए हजारों धनुर्धरों में सर्वश्रेष्ठ कौन था? यह तय करना मुश्‍किल है। उन्हीं धनुर्धरों में से एक एकलव्य थे। एकलव्य को कुछ लोग शिकारी का पुत्र कहते हैं और कुछ लोग भील का पुत्र। कुछ लोग यह कहकर प्रचारित करते हैं कि शूद्र होने के कारण एकलव्य को गुरु द्रोणाचार्य ने शिक्षा नहीं दी थी। लेकिन यह सभी बातें गलत है। कौन थे एकलव्य : एकलव्य को लेकर समाज में बहुत तरह की भ्रांतियां इसलिए है क्योंकि लोग महाभारत और पुराण पढ़ते नहीं और जिसने जो लिख दिया उस लिखे हुए की बात को ही सत्य मानते हैं। एक झूठ को जब बार बार प्रचारित किया जाता है तो वह सत्य ही लगने लगता है। सत्य को जानने के लिए तर्क को अलग रखकर धैर्य का परिचय देना होता है। सभी ने महाभारत की इस कथा को तोड़-मरोड़कर अपने-अपने तरीके से लिखा। दरअसल, महाभारत का संपूर्ण प्रपंच श्रीकृष्ण की इच्छा से संचालित होता है। पांडव पक्ष के सभी वरिष्ठ लोगों ने अर्जुन को बचाने और उसे महान बनाने के लिए हर तरह का भेद और प्रपंच किया। यदि गुरु द्रोण ने एकलव्य से अंगूठा मांग लिया था तो उसके पीछे भी श्रीकृष्ण की ही इच्छा थी। महाभारत में एक स्थान पर श्रीकृष्ण ने अर्जुन से स्पष्ट किया कि 'तुम्हारे प्रेम में मैंने क्या-क्या नहीं किया है। तुम संसार के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कहलाओ इसके लिए मैंने द्रोणाचार्य का वध करवाया, महापराक्रमी कर्ण को कमजोर किया और न चाहते हुए भी तुम्हारी जानकारी के बिना निषादराज के दत्तक पुत्र एकलव्य को भी वीरगति दी ताकि तुम्हारे रास्ते में कोई बाधा ना आए।'... दरअसल, एकलव्य भगवान श्रीकृष्ण के पितृव्य (चाचा) के पुत्र थे जिसे बाल्यकाल में ​ज्योति​ष के आधार पर वनवासी भील राज निषादराज को सौंप दिया गया था। एकलव्य अपना अंगूठा दक्षिणा में नहीं देते या गुरु द्रोणाचार्य एकलव्य का अंगूठा दक्षिणा में नहीं मांगते तो इतिहास में एकलव्य का नाम नहीं होता। एकलव्य को इस बात का कभी दुख नहीं हुआ कि गुरु द्रोणाचार्य ने उनसे अंगूठा मांग लिया। गुरु द्रोणाचार्य भी एक ऋषि थे वे भलिभांति जानते थे कि उन्हें क्या करना है। वे भीष्मपितामह और अर्जुन को दिए हुए वचन से बंधे थे। गुरु द्रोणाचार्य के समक्ष धर्मसंकट उत्पन्न हो गया था। उन्होंने भीष्मपितामह को वचन दिया था कि वे कौरववंश के राजकुमारों को ही शिक्षा देंगे और अर्जुन को वचन दिया था कि तुमसे बड़ा कोई धनुर्धर नहीं होगा। गुरु द्रोणाराचार्य ने यह नहीं कहा था कि मैंने किसी शूद्र को शिक्षा नहीं देने का वचन दिया है। लेकिन इस घटना को कुछ लोगों के समूह ने गलत अर्थो में लिया और उस अर्थ को बड़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करके समाज में विभाजन किया। इस सामाजिक विभाजन को हवा देने वाले संगठन भी कौन है यह सब जानते हैं। द्रोणाचार्य ने जिस अर्जुन को महान सिद्ध करने के लिए एकलव्य का अंगूठा कटवा दिया था, उसी अर्जुन के खिलाफ उन्हें युद्ध लड़ना पड़ा और उसी अर्जुन के पुत्र की हत्या का कारण भी वे ही बने थे और उसी अर्जुन के साले के हाथों उनकी मृत्यु को प्राप्त हुए थे। द्रोणाचार्य के चरित्र को समझना अत्यंत कठिन है। पहला रहस्य : - राजपुत्र थे एकलव्य : महाभारत काल में प्रयाग (इलाहाबाद) के तटवर्ती प्रदेश में सुदूर तक फैला श्रृंगवेरपुर राज्य निषादराज हिरण्यधनु का था। गंगा के तट पर अवस्थित श्रृंगवेरपुर उसकी सुदृढ़ राजधानी थी। एक मान्यता अनुसार वे श्रीकृष्ण के चाचा का पुत्र था जिसे उन्होंने निषाद जाति के राजा को सौंप दिया था। उस समय श्रृंगवेरपुर राज्य की शक्ति मगध, हस्तिनापुर, मथुरा, चेदि और चन्देरी आदि बड़े राज्यों के समान ही थी। निषादराज हिरण्यधनु और उनके सेनापति गिरिबीर की वीरता विख्यात थी। राजा राज्य का संचालन आमात्य (मंत्रि) परिषद की सहायता से करता था। द्रोणभक्त एकलव्य निषादराज हिरण्यधनु के पुत्र थे। उनकी माता का नाम रानी सुलेखा था। उल्लेखनी है कि निषाद नामक एक जाति आज भी भारत में निवास करती है। एकलव्य न तो भील थे और न ही आदिवासी वे निषाद जाति के थे। इस बात का खुलासा होगा अगले पन्नों पर। गौरतलब है कि महाभारत लिखने वाले वेद व्यास किसी ब्राह्मण, छत्रिय जाति से नहीं थे वे भी निषाद जाति से थे जिसे आजकल सबसे पिछड़ा वर्ग का माना जाता है। महाभारत के आदिपर्व में एकलव्य की कथा आती है। धृतराष्‍ट्र, पांडु और विदुर की दादी सत्यवती एक निषाद कन्या ही थी। सत्यवती के पुत्र विचित्रवीर्य की पत्नियों ने वेदव्यास के नियोग से दो पुत्रों को जन्म दिया और तीसरा पुत्र दासी का था। अम्बिका के पुत्र धृतराष्ट, अम्बालिका के पुत्र पांडु और दासीपुत्र विदुर थे। दूसरा रहस्य : - एकलव्य को क्यों कहा जाता है एकलव्य? प्रारंभ में एकलव्य का नाम अभिद्युम्न रखा गया था। प्राय: लोग उसे अभय नाम से ही बुलाते थे। पांच वर्ष की आयु में एकलव्य की शिक्षा की व्यवस्था कुलीय गुरुकुल में की गई। यह ऐसा गुरुकुल था जहां सभी जाति और समाज के उच्चवर्ग के लोग पढ़ते थे। एकलव्य का जिस तरह चित्रण किया जाता है वह उस तरह के नहीं थे। वे एक राजपुत्र थे और उनके पिता की कौरवों के राज्य में प्रतिष्ठा थी। बालपन से ही अस्त्र-शस्त्र विद्या में बालक की लय, लगन और एकनिष्ठता को देखते हुए गुरु ने बालक का नाम 'एकलव्य' रख दिया था। एकलव्य के युवा होने पर उसका विवाह हिरण्यधनु ने अपने एक निषाद मित्र की कन्या सुणीता से करा दिया। एक बार पुलक मुनि ने जब एकलव्य का आत्मविश्वास और धनुष बाण को सिखने की उसकी लगन को देखा तो उन्होंने उनके पिता निषादराज हिरण्यधनु से कहा कि उनका पुत्र बेहतरीन धनुर्धर बनने के काबिल है, इसे सही दीक्षा दिलवाने का प्रयास करना चाहिए। पुलक मुनि की बात से प्रभावित होकर राजा हिरण्यधनु, अपने पुत्र एकलव्य को द्रोण जैसे महान गुरु के पास ले जाते हैं। तीसरा रहस्य : - एकलव्य-द्रोण संवाद : उस समय धनुर्विद्या में गुरु द्रोण की ख्याति थी। एकलव्य धनुर्विद्या की उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहता था। एकलव्य को अपनी लगन और निष्ठा पर पूर्ण विश्‍वास था। एकलव्य गुरु द्रोणाचार्य के पास आकर बोला- 'गुरुदेव, मुझे धनुर्विद्या सिखाने की कृपा करें!' तब गुरु द्रोणाचार्य के समक्ष धर्मसंकट उत्पन्न हुआ क्योंकि उन्होंने भीष्म पितामह को वचन दे दिया था कि वे केवल कौरव कुल के राजकुमारों को ही शिक्षा देंगे और एकलव्य राजकुमार तो थे लेकिन कौरव कुल से नहीं थे। अतः उसे धनुर्विद्या कैसे सिखाऊं? अतः द्रोणाचार्य ने एकलव्य से कहा- 'मैं विवश हूं तुझे धनुर्विद्या नहीं सिखा सकूंगा।' एकलव्य घर से निश्चय करके निकला था कि वह केवल गुरु द्रोणाचार्य को ही अपना गुरु बनाएगा। द्रोण की ओर से इंनकार करने के बाद हिरण्यधनु तो वापिस अपने राज्य लौट आए लेकिन एकलव्य को द्रोण के सेवक के तौर पर उन्हीं के पास छोड़ गए। द्रोण की ओर से दीक्षा देने की बात नकार देने के बावजूद एकलव्य ने हिम्मत नहीं हारी, वह सेवकों की भांति उनके साथ रहने लगा। द्रोणाचार्य ने एकलव्य को रहने के लिए एक झोपड़ी दिलवा दी। एकलव्य का काम बस इतना होता था कि जब सभी राजकुमार बाण विद्या का अभ्यास कर चले जाएं तब वह सभी बाणों को उठाकर वापस तर्कश में डालकर रख दें। जब द्रोणाचार्य अपने शिष्यों को अस्त्र चलाना सिखाते थे तब एकलव्य भी वहीं छिपकर द्रोण की हर बात, हर सीख को सुनता था। अपने राजकुमार होने के बावजूद एकलव्य द्रोण के पास एक सेवक बनकर रह रहा था। एकलव्य ने अपने खाली समय में द्रोण की सीख के अनुसार अरण्य में रहते हुए ही एकांत में तीर चलाना सीखता था। चौथा रहस्य : - जब पता चला द्रोणाचार्य को : एक दिन अभ्यास जल्दी समाप्त हो जाने के कारण कौरववंशी सभी राजकुमार समय से पहले ही लौट गए। ऐसे में एकलव्य को धनुष चलाने का एक अदद मौका मिल गया। लेकिन अफसोस उनके अचूक निशाने को दुर्योधन ने देख लिया और द्रोणाचार्य को इस बात की जानकारी दी। द्रोणाचार्य ने एकलव्य को वहां से चले जाने को कहा। हताश-निराश एकलव्य अपने महल की ओर रुख कर गया, लेकिन रास्ते में उसने सोचा कि वह घर जाकर क्या करेगा, इसलिए बीच में ही एक आदिवासी बस्ती में ठहर गया। उसने आदिवासी सरदार को अपना परिचय दिया और कहा कि वह यहां रहकर धनुष विद्या का अभ्यास करना चाहता है। सरदार ने प्रसन्नतापूर्वक एकलव्य को अनुमति दे दी। आदिवासियों या भीलों के बीच रहने के कारण एकलव्य को शिकारी या भील जाति का मान लिया गया। एकलव्य ने आदिवासियों के बीच रहकर वहां गुरु द्रोणाचार्य की मिट्टी की मूर्ति बनाई और मूर्ति की ओर एकटक देखकर ध्यान करके उसी से प्रेरणा लेकर वह धनुर्विद्या सीखने लगा। मन की एकाग्रता तथा गुरुभक्ति के कारण उसे उस मूर्ति से प्रेरणा मिलने लगी और वह धनुर्विद्या में बहुत आगे बढ़ गया। समय बीतता गया और कौरव वंश के अन्य बालकों, कौरव और पांडवों के साथ-साथ एकलव्य भी युवा हो गया। द्रोणाचार्य ने बचपन में ही अर्जुन को यह वचन दिया था कि उससे बेहतर धनुर्धर इस ब्रह्मांड में दूसरा नहीं होगा। लेकिन एक दिन द्रोण और अर्जुन, दोनों की ही यह गलतफहमी दूर हो गई, जब उन्होंने एकलव्य को धनुष चलाते हुए देखा। पांचवां रहस्य : - राजकुमारों का कुत्ता : एक बार गुरु द्रोणाचार्य, पांडव एवं कौरव को लेकर धनुर्विद्या का प्रयोग करने अरण्य में आए। उनके साथ एक कुत्ता भी था, जो थोड़ा आगे निकल गया। कुत्ता वहीं पहुंचा जहां एकलव्य अपनी धनुर्विद्या का प्रयोग कर रहा था। एकलव्य के खुले बाल एवं फटे कपड़े देखकर कुत्ता भौंकने लगा। एकलव्य ने कुत्ते को लगे नहीं, चोट न पहुंचे और उसका भौंकना बंद हो जाए इस ढंग से सात बाण उसके मुंह में थमा दिए। कुत्ता वापिस वहां गया, जहां गुरु द्रोणाचार्य के साथ पांडव और कौरव थे। तब अर्जुन ने कुत्ते को देखकर कहा- गुरुदेव, यह विद्या तो मैं भी नहीं जानता। यह कैसे संभव हुआ? आपने तो कहा था कि मेरी बराबरी का दूसरा कोई धनुर्धारी नहीं होगा, किंतु ऐसी विद्या तो मुझे भी नहीं आती।' द्रोणाचार्य ने आगे जाकर देखा तो वहां हिरण्यधनु का पुत्र गुरुभक्त एकलव्य था। द्रोणाचार्य ने पूछा- 'बेटा! यह विद्या कहां से सीखी तुमने?' एकलव्य- 'गुरुदेव! आपकी ही कृपा से सीख रहा हूं।' द्रोणाचार्य तो वचन दे चुके थे कि अर्जुन की बराबरी का धनुर्धर दूसरा कोई न होगा। किंतु यह तो आगे निकल गया। अब गुरु द्रोणाचार्य के लिए धर्मसंकट खड़ा हो गया था। एकलव्य की प्रतिभा को देखकर द्रोणाचार्य संकट में पड़ गए। लेकिन अचानक उन्हें एक युक्ति समझ में आई और उन्होंने कहा- 'मेरी मूर्ति को सामने रखकर तुमने धनुर्विद्या तो सीख ली, किंतु मेरी गुरुदक्षिणा कौन देगा?' एकलव्य ने कहा- 'गुरुदेव, जो आप मांगें?' द्रोणाचार्य ने कहा- तुम्हें मुझे दाएं हाथ का अंगूठा गुरुदक्षिणा में देना होगा।' उन्होंने एकलव्य से गुरुदक्षिणा में उसके दाएं हाथ का अंगूठा इसलिए मांगा ताकि एकलव्य कभी धनुष चला ना पाए। एकलव्य ने एक पल भी विचार किए बिना अपने दाएं हाथ का अंगूठा काटकर गुरुदेव के चरणों में अर्पण कर दिया। धन्य है एकलव्य जो गुरुमूर्ति से प्रेरणा पाकर धनुर्विद्या में सफल हुआ और गुरुदक्षिणा देकर दुनिया को अपने साहस, त्याग और समर्पण का परिचय दिया। आज भी ऐसे साहसी धनुर्धर एकलव्य को उसकी गुरुनिष्ठा और गुरुभक्ति के लिए याद किया जाता है। इस संवाद को इस तरह समझे... एकलव्य द्रोणाचार्य संवाद: द्रोणाचार्य:- किसके शिष्य हो? एकलव्य:- गुरु द्रोणाचार्य का। द्रोणाचार्य:- किन्तु मेने तो तुम्हें कोई शिक्षा नहीं दी। एकलव्य:- किन्तु मेने तो आप ही को गुरु माना है। द्रोणाचार्य:- किसके पुत्र हो? एकलव्य:- निषात् राज भिल्ल राजा का। द्रोणाचार्य:- कौन वह जरासंघ की सेना का सेनापति? एकलव्य:- जी हां गुरुदेव। द्रोणाचार्य:- इतनी योग्यता प्राप्ति के बाद तुम कहां जाओगे? एकलव्य:- मैं अपने पिता के साथ जरासंघ की सेना का नेतृत्व करूंगा। द्रोणाचार्य:- तुम ये जानते हो जरासंघ मानवता का शत्रु है? नर पिशाच है? एकलव्य:- जी गुरुदेव! मैं फिर भी वहीं जाऊंगा। द्रोणाचार्य:- ओह! तुमने मुझे गुरु माना है, तो तुम्हें मुझे गुरुदक्षिणा देनी पड़ेगी। एकलव्य:- मैं तैयार हूं। द्रोणाचार्य:- अपने दांये हाथ का अंगूठा मुझे दे दो। एकलव्य:- जो आज्ञा (एकलव्य वैसा ही करता है।) इसके बाद जाते समय गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य को दांए हाथ की तर्जनी और मध्यमा दो अंगुलियों को दिखाते हुये संकेत दिया कि बाण दो अंगुलियों से भी चलाया जा सकता है। यदि युद्ध में अंगुठा कट गया तो क्या युद्ध स्थल छोड़ कर भाग जाओगे। परिणाम एकलव्य ने पुन: अभ्यास किया और पुन: पूर्ववत् दक्षता प्राप्त कर ली। प्रश्न यही उठता है कि अन्ततोगत्वा अंगूठा कटवाने का उद्देश्य क्या रहा? तो इसके समाधान हेतु यह समझना होगा कि वह किसका पुत्र था? वह निषात् राज भिल्ल् का दत्तक पुत्र था। जोकि जरासंघ की सेना का सेना​पति था। वह जरासंघ जो कि अत्यन्त अत्याचारी, क्रूर एवं श्रीकृष्ण का शत्रु था। उसने अपने बल से आसपास के कई राजाओं को बन्दी बना लिया था। ऐसे में उसकी क्षमता में वृद्धि होने का अर्थ है मानव जाति के लिए संकट को बढ़ाना। इसीलिए उसका अंगूठा कटवाया। अर्जुन ने युद्ध में दिव्यास्त्रों का प्रयोग नहीं करने का संकल्प लिया ऐसे में उस कुरूक्षेत्र में लौकिक शस्त्रों में अर्जुन से अधिक ज्ञाता व सामर्थ्यशाली स्वयं भगवान् कृष्ण थे और दूसरे थे एकलव्य। एकलव्य अपने गुरु द्रोणाचार्य के प्रति क्रोध का भाव रखते हुए कौरवों के पक्ष में लड़ा। जबकि वह जिस सेना का सेनापति बन सकता था वह थी जरासंघ के पुत्र की सेना जो कि पाण्डवों की ओर से लड़ा था। इसीलिए युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व योगीराज कृष्ण ने उसे युद्ध के लिए चुनौती दी और उसे वीरगति प्रदान की। छठा रहस्य : - आधुनिक तिरंदाजी के जनक : कुमार एकलव्य अंगूठा बलिदान करने के बाद पिता हिरण्यधनु के पास चला जाता है। एकलव्य अपने साधनापूर्ण कौशल से बिना अंगूठे के धनुर्विद्या में पुन: दक्षता प्राप्त कर लेता है। आज के युग में आयोजित होने वाली सभी तीरंदाजी प्रतियोगिताओं में अंगूठे का प्रयोग नहीं होता है, अत: एकलव्य को आधुनिक तीरंदाजी का जनक कहना उचित होगा। पिता की मृत्यु के बाद एकलव्य श्रृंगबेर राज्य का शासक बनता हैं और अमात्य परिषद की मंत्रणा से वह न केवल अपने राज्य का संचालन करता है, बल्कि निषाद जाति के लोगों की एक सशक्त सेना और नौसेना गठित करता है और अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार भी करता है। सातवां रहस्य : - यादव सेना को हराया था एकलव्य ने : एकलव्य अपनी विस्तारवादी सोच के चलते जरासंध से जा मिला था। जरासंध की सेना की तरफ से उसने मथुरा पर आक्रमण करके यादव सेना का लगभग सफाया कर दिया था। इसका उल्लेख विष्णु पुराण और हरिवंश पुराण में मिलता है। यादव सेना के सफाया होने के बाद यह सूचना जब श्रीकृष्‍ण के पास पहुंचती है तो वे भी एकलव्य को देखने को उत्सुक हो जाते हैं। दाहिने हाथ में महज चार अंगुलियों के सहारे धनुष बाण चलाते हुए एकलव्य को देखकर वे समझ जाते हैं कि यह पांडवों और उनकी सेना के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। तब श्रीकृष्‍ण का एकलव्य से युद्ध होता है और इस युद्ध में एकलव्य वीरगति को प्राप्त होता है। एकलव्य के वीरगति को प्राप्त होने के बाद उसका पुत्र केतुमान सिंहासन पर बैठता है और वह कौरवों की सेना की ओर से पांडवों के खिलाफ लड़ता है। महाभारत युद्ध में वह भीम के हाथ से मारा जाता है।

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महाभारत के सबसे चर्चित पात्र महात्मा विदुर की कथा!!!!!!! विदुर,अर्थ कुशल, बुद्धिमान अथवा मनीषी हिन्दू ग्रन्थ महाभारत के केन्द्रीय पात्रों में से एक व हस्तिनापुर के प्रधानमंत्री, कौरवो और पांडवो के काका और धृतराष्ट्र एवं पाण्डु के भाई थे। उनका जन्म एक दासी के गर्भ से हुआ था। विदुर को धर्मराज का अवतार भी माना जाता है। हस्तिनापुर नरेश शान्तनु और रानी सत्यवती के चित्रांगद और विचित्रवीर्य नामक दो पुत्र हुये। शान्तनु का स्वर्गवास चित्रांगद और विचित्रवीर्य के बाल्यकाल में ही हो गया था इसलिये उनका पालन पोषण भीष्म ने किया। भीष्म ने चित्रांगद के बड़े होने पर उन्हें राजगद्दी पर बिठा दिया लेकिन कुछ ही काल में गन्धर्वों से युद्ध करते हुये चित्रांगद मारा गया। इस पर भीष्म ने उनके अनुज विचित्रवीर्य को राज्य सौंप दिया। अब भीष्म को विचित्रवीर्य के विवाह की चिन्ता हुई। उन्हीं दिनों काशीराज की तीन कन्याओं, अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका का स्वयंवर होने वाला था। उनके स्वयंवर में जाकर अकेले ही भीष्म ने वहाँ आये समस्त राजाओं को परास्त कर दिया और तीनों कन्याओं का हरण कर के हस्तिनापुर ले आये। बड़ी कन्या अम्बा ने भीष्म को बताया कि वह अपना तन-मन राजा शाल्व को अर्पित कर चुकी है। उसकी बात सुन कर भीष्म ने उसे राजा शाल्व के पास भिजवा दिया और अम्बिका और अम्बालिका का विवाह विचित्रवीर्य के साथ करवा दिया। राजा शाल्व ने अम्बा को ग्रहण नहीं किया अतः वह हस्तिनापुर लौट कर आ गई और भीष्म से बोली, "हे आर्य! आप मुझे हर कर लाये हैं अतएव आप मुझसे विवाह करें।" किन्तु भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा के कारण उसके अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। अम्बा रुष्ट हो कर परशुराम के पास गई और उनसे अपनी व्यथा सुना कर सहायता माँगी। परशुराम ने अम्बा से कहा, "हे देवि! आप चिन्ता न करें, मैं आपका विवाह भीष्म के साथ करवाउँगा।" परशुराम ने भीष्म को बुलावा भेजा किन्तु भीष्म उनके पास नहीं गये। इस पर क्रोधित होकर परशुराम भीष्म के पास पहुँचे और दोनों वीरों में भयानक युद्ध छिड़ गया। दोनों ही अभूतपूर्व योद्धा थे इसलिये हार-जीत का फैसला नहीं हो सका। आखिर देवताओं ने हस्तक्षेप कर के इस युद्ध को बन्द करवा दिया। अम्बा निराश हो कर वन में तपस्या करने चली गई। विचित्रवीर्य अपनी दोनों रानियों के साथ भोग विलास में रत हो गये किन्तु दोनों ही रानियों से उनकी कोई सन्तान नहीं हुई और वे क्षय रोग से पीड़ित हो कर मृत्यु को प्राप्त हो गये। अब कुल नाश होने के भय से माता सत्यवती ने एक दिन भीष्म से कहा, "पुत्र! इस वंश को नष्ट होने से बचाने के लिये मेरी आज्ञा है कि तुम इन दोनों रानियों से पुत्र उत्पन्न करो।" माता की बात सुन कर भीष्म ने कहा, "माता! मैं अपनी प्रतिज्ञा किसी भी स्थिति में भंग नहीं कर सकता।" यह सुन कर माता सत्यवती को अत्यन्त दुःख हुआ। अचानक उन्हें अपने पुत्र वेदव्यास का स्मरण हो आया। स्मरण करते ही वेदव्यास वहाँ उपस्थित हो गये। सत्यवती उन्हें देख कर बोलीं, "हे पुत्र! तुम्हारे सभी भाई निःसन्तान ही स्वर्गवासी हो गये। अतः मेरे वंश को नाश होने से बचाने के लिये मैं तुम्हें आज्ञा देती हूँ कि तुम उनकी पत्नियों से सन्तान उत्पन्न करो। " वेदव्यास उनकी आज्ञा मान कर बोले, "माता! आप उन दोनों रानियों से कह दीजिये कि वे एक वर्ष तक नियम व्रत का पालन करते रहें तभी उनको गर्भ धारण होगा।" एक वर्ष व्यतीत हो जाने पर वेदव्यास सबसे पहले बड़ी रानी अम्बिका के पास गये। अम्बिका ने उनके तेज से डर कर अपने नेत्र बन्द कर लिये। वेदव्यास लौट कर माता से बोले, "माता अम्बिका का बड़ा तेजस्वी पुत्र होगा किन्तु नेत्र बन्द करने के दोष के कारण वह अंधा होगा।" सत्यवती को यह सुन कर अत्यन्त दुःख हुआ और उन्होंने वेदव्यास को छोटी रानी अम्बालिका के पास भेजा। अम्बालिका वेदव्यास को देख कर भय से पीली पड़ गई। उसके कक्ष से लौटने पर वेदव्यास ने सत्यवती से कहा, "माता! अम्बालिका के गर्भ से पाण्डु रोग से ग्रसित पुत्र होगा। " इससे माता सत्यवती को और भी दुःख हुआ और उन्होंने बड़ी रानी अम्बिका को पुनः वेदव्यास के पास जाने का आदेश दिया। इस बार बड़ी रानी ने स्वयं न जा कर अपनी दासी को वेदव्यास के पास भेज दिया। दासी ने आनन्दपूर्वक वेदव्यास से भोग कराया। इस बार वेदव्यास ने माता सत्यवती के पास आ कर कहा, "माते! इस दासी के गर्भ से वेद-वेदान्त में पारंगत अत्यन्त नीतिवान पुत्र उत्पन्न होगा।" इतना कह कर वेदव्यास तपस्या करने चले गये। समय आने पर अम्बिका के गर्भ से जन्मान्ध धृतराष्ट्र, अम्बालिका के गर्भ से पाण्डु रोग से ग्रसित पाण्डु तथा दासी के गर्भ से धर्मात्मा विदुर का जन्म हुआ। विदुर का धृतराष्ट्र तथा गान्धारी को उपदेश एवं वनगमन !!!!!!! सम्पूर्ण तीर्थों की यात्रा करने पश्चात् विदुर जी हस्तिनापुर आये। उन्होंने मैत्रेय जी से आत्मज्ञान प्राप्त कर किया था। धर्मराज युधिष्ठिर, भीम अर्जुन, नकुल सहदेव, धृतराष्ट्र, युयुत्सु, संजय, कृपाचार्य, कुन्ती गांधारी, द्रौपदी, सुभद्रा, उत्तरा, कृपी नगर के गणमान्य नागरिकों के साथ विदुर जी के दर्शन के लिये आये। सभी के यथायोग्य अभिवादन के पश्चात् युधिष्ठिर ने कहा - "हे चाचाजी!आपने हम सब का पालन पोषण किया है और समय समय पर हमारी प्राणरक्षा करके आपत्तियों से बचाया है। अपने उपदेशों से हमें सन्मार्ग दिखाया है। अब आप हमें अपने तीर्थयात्रा का वृतान्त कहिये। अपनी इस यात्रा में आप द्वारिका भी अवश्य गये होंगे, कृपा करके हमारे आराध्य श्रीकृष्णचन्द्र का हाल चाल भी बताइये।" अजातशत्रु युधिष्ठिर के इन वचनों को सुन कर विदुर जी ने उन्हें सभी तीर्थों का वर्णन सुनाया, किन्तु यदुवंश के विनाश का वर्णन को न कहना ही उचित समझा। वे जानते थे कि यदुवंश के विनाश का वर्णन सुन कर युधिष्ठिर को अत्यन्त क्लेश होगा और वे पाण्डवों को दुखी नहीं देख सकते थे। कुछ दिनों तक विदुर झि प्रसन्नता पूर्वक हस्तिनापुर में रहे। विदुर जी धर्मराज के अवतार थे। मांडव्य ऋषि ने धर्मराज को श्राप दे दिया था इसी कारण वे सौ वर्ष पर्यन्त शूद्र बन कर रहे। एक समय एक राजा के दूतों ने मांडव्य हषि के आश्रम पर कुछ चोरों को पकड़ा था। दूतों ने चोरों के साथ मांडव्य ऋषि को भी चोर समझ कर पकड़ लिया। राजा ने चोरों को शूली पर चढ़ाने की आज्ञा दी। उन चोरों के साथ मांडव्ठ ऋषि को भी शूली पर चढ़ा दिया गया किन्तु इस बात का पता लगते ही कि चोर नहीं हैं बल्कि ऋषि हैं, राजा ने उन्हें शूली से उतरवा कर अपने अपराध के लिये क्षमा मांगी। मांडव्य ऋषि ने धर्मराज के पहुँच कर प्रश्न किया कि तुमने मझे मेरे किस पाप के कारण शूली पर चढ़वाया? धर्मराज ने कहा कि आपने बचपन में एक टिड्डे को कुश को नोंक से छेदा था, इसी पाप में आप को यह दंड मिला। ऋषि बोले - "वह कार्य मैंने अज्ञानवश किया था और तुमने अज्ञानवश किये गये कार्य का इतना कठोर दंड देकर अपराध किया है। अतः तुम इसी कारण से सौ वर्ष तक शूद्र योनि में जन्म लेकर मृत्युलोक में रहो।" मुनि के शाप के कारण ही धर्मराज को विदुर जी का अवतार लेना पड़ा था। वे काल की गति को भली भाँति जानते थे। उन्होंने अपने बड़े भ्राता धृतराष्ट्र को समझाया कि महाराज! अब भविष्य में वड़अ बुरा समय आने वाला है। आप यहाँ से तुरन्त वन की ओर निकल चलिये। कराल काल शीघ्र ही यहाँ आने वाला है जिसे संसार का कोई भी प्राणी टाल नहीं सकता। आपके पुत्र-पौत्रादि सभी नष्ट हो चुके हैं और वृद्धावस्था के कारण आपके इन्द्रिय भी शिथिल हो गईं हैं। आपने इन पाण्डवों को महान क्लेश दिये, उन्हें मरवाने कि कुचेष्टा की, उनकी पत्नी द्रौपदी को भरि सभा में अपमानित किया और उनका राज्य छीन लिया। फिर भी उन्हीं का अन्न खाकर अपने शरीर को पाल रहे हैं और भीमसेन के दुर्वचन सुनते रहते हैं। आप मेरी बात बात मान कर सन्यास धारण कर शीघ्र ही चुपचाप यहाँ से उत्तराखंड की ओर चले जाइये। विदुर जी के इन वचनों से धृतराष्ट्र को प्रज्ञाचक्षु प्राप्त हो गये और वे उसी रात गांधारी को साथ लेकर चुपचाप विदुर जी के साथ वन को चले गये। प्रातःकाल सन्ध्यावंदन से निवृत होकर ब्राह्मणों को तल, गौ, भूमि और सुवर्ण दान करके जब युधिष्ठिर अपने गुरुजन धृतराष्ट्र, विदुर और गांधारी के दर्शन करने गये तब उन्हें वहाँ न पाकर चिंतित हुये कि कहीं भीमसेन के कटुवचनों से त्रस्त होकर अथवा पुत्र शोक से दुखि हो कर कहीं गंगा में तो नहीं डूब गये। यदि ऐसा है तो मैं ही अपराधी समझा जाउँगा। वे उनके शोक से दुखी रहने लगे। एक दिन देवर्षि नारद अपने तम्बूरे के साथ वहाँ पधारे। युधिष्ठिर ने प्रणाम करके और यथोचित सत्कार के साथ आसन देकर उनसे विदुर, धृतराष्ट्र और गांधारी के विषय में प्रश्न किया। उनके इस प्रश्न पर नारद जी बोले - "हे युधिष्ठिर! तुम किसी प्रकार का शोक मत करो। यह सम्पूर्ण विशव परमात्मा के वश में है और वही सब की रक्षा करता है। तुम्हारा यह समझना कि मैं ही उनकी रक्षा करता हूँ, तुम्हारी भूल है। यह संसार नश्वर है तथा जाने वालों के लिये शोक नहीं करना चाहिये। शोक का कारण केवल मोह ही है, इस मोह को त्याग दो। यह पंचभौतिक शरीर नाशवान एवं काल के वश में है। तुम्हारे चाचा धृतराष्ट्र, माता गांधारी एवं विदुर उत्तराखंड में सप्तश्रोत नामक स्थान पर आश्रम बना कर रहते हैं। वे वहाँ तीनों काल स्नान कर के अग्नहोत्र करते हैं और उनके सम्पूर्ण पाप धुल चुके हैं। अब उनकी कामनाएँ भी शान्त हो चुकी हैं। सदा भगवान के ध्यान में रहने के कारण तमोगुण, रजोगुण, सतोगुण और अहंकार बुद्धि नष्ट हो चुकी है। उन्होंने अपने आप को भगवान में लीन कर दिया है। "अब मैं तुम्हें बताता हूँ कि वे आज से पाँचवे दिन अपने शरीर को त्याग देंगे। वन में अग्नि लग जाने के कारण वे उसी में भस्म हो जायेंगे। उनकी साध्वी पत्नी गांधारी भी उसी अग्नि में प्रवेश कर जायेंगी। फिर विदुर जी वहाँ से तीर्थयात्रा के लिये चले जायेंगे। अतः तुम उनके विषय में चिंता करना त्याग दो।" इतना कह कर देवर्षि नारद आकाशमार्ग से स्वर्ग के लिये प्रस्थान कर गये। युधिष्ठिर ने देवर्षि नारद के उपदेश को समझ कर शोक का परित्याग कर दिया।

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