Ritu Thakur Mar 2, 2021

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Ritu Thakur Feb 28, 2021

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Ritu Thakur Dec 16, 2020

अध्याय 2 : *गीता का सार* श्लोक *2.13* देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा । तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥१३॥ *भावार्थ* *जिस प्रकार शरीरधारी आत्मा इस (वर्तमान) शरीर में बाल्यावस्था से तरुणावस्था में और फिर वृद्धावस्था में निरन्तर अग्रसर होता रहता है, उसी प्रकार मृत्यु होने पर आत्मा दूसरे शरीर में चला जाता है | धीर व्यक्ति ऐसे परिवर्तन से मोह को प्राप्त नहीं होता |* *तात्पर्य* *प्रत्येक जीव एक व्यष्टि आत्मा है* | वह प्रतिक्षण अपना शरीर बदलता रहता है – कभी बालक के रूप में, कभी युवा तथा कभी वृद्ध पुरुष के रूप में | *तो भी आत्मा वही रहता है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता* | यह व्यष्टि आत्मा मृत्यु होने पर अन्ततोगत्वा एक शरीर बदल कर दुसरे शरीर में देहान्तरण कर जाता है और चूँकि अगले जन्म में इसको शरीर मिलना अवश्यम्भावी है – चाहे वह शरीर आध्यात्मिक हो या भौतिक – अतः अर्जुन के लिए न तो भीष्म, न ही द्रोण के लिए शोक करने का कोई कारण था | अपितु उसे प्रसन्न होना चाहिए था कि वे पुराने शरीरों को बदल कर नए शरीर ग्रहण करेंगे और इस तरह वे नई शक्ति प्राप्त करेंगे | *ऐसे शरीर-परिवर्तन से जीवन में किये कर्म के अनुसार नाना प्रकार के सुखोपभोग या कष्टों का लेखा हो जाता है* | चूंकि भीष्म व द्रोण साधु पुरुष थे इसीलिए अगले जन्म में उन्हें आध्यात्मिक शरीर प्राप्त होंगे; नहीं तो कम से कम उन्हें स्वर्ग के भोग करने के अनुरूप शरीर तो प्राप्त होंगे ही, अतः दोनों ही दशाओं में शोक का कोई कारण नहीं था | *जिस मनुष्य को व्यष्टि आत्मा, परमात्मा तथा भौतिक और आध्यात्मिक प्रकृति का पूर्ण ज्ञान होता है वह धीर कहलाता है* | ऐसा मनुष्य कभी भी शरीर-परिवर्तन द्वारा ठगा नहीं जाता | आत्मा के एकात्मवाद का मायावादी सिद्धान्त मान्य नहीं हो सकता क्योंकि आत्मा के इस प्रकार विखण्डन से परमेश्र्वर विखंडनीय या परिवर्तनशील हो जायेगा जो परमात्मा के अपरिवर्तनीय होने के सिद्धान्त के विरुद्ध होगा | *गीता में पुष्टि हुई है कि परमात्मा के खण्डों का शाश्र्वत (सनातन) अस्तित्व है जिन्हें क्षर कहा जाता है अर्थात् उनमंु भौतिक प्रकृति में गिरने की प्रवृत्ति होती है* | ये भिन्न अंश (खण्ड) *नित्य भिन्न रहते हैं* , यहाँ तक कि मुक्ति के बाद भी व्यष्टि आत्मा जैसे का तैसा – *भिन्न अंश बना रहता है* | किन्तु एक बार मुक्त होने पर वह श्रीभगवान् के साथ सच्चिदानन्द रूप में रहता है | *परमात्मा* पर प्रतिबिम्बवाद का सिद्धान्त व्यवहृत किया जा सकता है, जो *प्रत्येक शरीर में विद्यमान रहता है* | वह व्यष्टि जीव से भिन्न होता है | जब आकाश का प्रतिबिम्ब जल में पड़ता है तो प्रतिबिम्ब में सूर्य, चन्द्र तथा तारे सब कुछ रहते हैं | तारों की तुलना जीवों से तथा सूर्य या चन्द्र की परमेश्र्वर से की जा सकती है | *व्यष्टि अंश आत्मा को अर्जुन के रूप में और परमात्मा को श्रीभगवान् के रूप में प्रदर्शित किया जाता है* | जैसा कि चतुर्थ अध्याय के प्रारम्भ में स्पष्ट है, वे एक ही स्तर पर नहीं होते | यदि अर्जुन कृष्ण के समान स्तर पर हो और कृष्ण अर्जुन से श्रेष्ठतर न हों तो उनमें उपदेशक तथा उपदिष्ट का सम्बन्ध अर्थहीन होगा | यदि ये दोनों माया द्वारा मोहित होते हैं तो एक को उपदेशक तथा दुसरे को उपदिष्ट होने की कोई आवश्यकता नहीं है | ऐसा उपदेश व्यर्थ होगा क्योंकि *माया के चंगुल में रहकर कोई भी प्रमाणिक उपदेशक नहीं बन सकता* | ऐसी परिस्थितियों में यह मान लिया जाता है कि भगवान् कृष्ण प्रमेश्र्वर हैं जो पद में माया द्वारा विस्मृत अर्जुन रूपी जीव से श्रेष्ठ हैं |

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Ritu Thakur Dec 6, 2020

*।।पूजा से जुड़ी हुईं अति महत्वपूर्ण बातें।।* ✍️एक हाथ से प्रणाम 🙏नही करना चाहिए। ✍️ सोए हुए व्यक्ति का चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए। ✍️ बड़ों को प्रणाम करते समय उनके दाहिने पैर पर दाहिने हाथ से और उनके बांये पैर को बांये हाथ से छूकर प्रणाम करें। ✍️ जप करते समय जीभ या होंठ को नहीं हिलाना चाहिए। इसे उपांशु जप कहते हैं। इसका फल सौगुणा फलदायक होता हैं। ✍️ जप करते समय दाहिने हाथ को कपड़े या गौमुखी से ढककर रखना चाहिए। ✍️जप के बाद आसन के नीचे की भूमि को स्पर्श कर नेत्रों से लगाना चाहिए। ✍️ संक्रान्ति, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार और सन्ध्या के समय तुलसी तोड़ना निषिद्ध हैं। ✍️ दीपक से दीपक🕯️ को नही जलाना चाहिए। ✍️ यज्ञ, श्राद्ध आदि में काले तिल का प्रयोग करना चाहिए, सफेद तिल का नहीं। ✍️शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाना चाहिए। पीपल की सात परिक्रमा करनी चाहिए। परिक्रमा करना श्रेष्ठ है, ✍️कूमड़ा-मतीरा-नारियल आदि को स्त्रियां नहीं तोड़े या चाकू आदि से नहीं काटें। यह उत्तम नही माना गया हैं। ✍️ भोजन प्रसाद को लाघंना नहीं चाहिए। ✍️ देव प्रतिमा देखकर अवश्य प्रणाम करें। ✍️ किसी को भी कोई वस्तु या दान-दक्षिणा दाहिने हाथ से देना चाहिए। ✍️ एकादशी, अमावस्या, कृृष्ण चतुर्दशी, पूर्णिमा व्रत तथा श्राद्ध के दिन क्षौर-कर्म (दाढ़ी) नहीं बनाना चाहिए । ✍️बिना यज्ञोपवित या शिखा बंधन के जो भी कार्य, कर्म किया जाता है, वह निष्फल हो जाता हैं। ✍️ शंकर जी को बिल्वपत्र, विष्णु जी को तुलसी, गणेश जी को दूर्वा, लक्ष्मी जी को कमल प्रिय हैं। ✍️ शंकर जी को शिवरात्रि के सिवाय कुंुकुम नहीं चढ़ती। ✍️ शिवजी को कुंद, विष्णु जी को धतूरा, देवी जी को आक तथा मदार और सूर्य भगवानको तगर के फूल नहीं चढ़ावे। ✍️ अक्षत देवताओं को तीन बार तथा पितरों को एक बार धोकर चढ़ावंे। ✍️नये बिल्व पत्र नहीं मिले तो चढ़ाये हुए बिल्व पत्र धोकर फिर चढ़ाए जा सकते हैं। ✍️ विष्णु भगवान को चावल गणेश जी को तुलसी, दुर्गा जी और सूर्य नारायण को बिल्व पत्र नहीं चढ़ावें। ✍️ पत्र-पुष्प-फल🌻🌺🍑🍒 का मुख नीचे करके नहीं चढ़ावें, जैसे उत्पन्न होते हों वैसे ही चढ़ावें। ✍️ किंतु बिल्वपत्र उलटा करके डंडी तोड़कर शंकर पर चढ़ावें। ✍️पान 🌱की डंडी का अग्रभाग तोड़कर चढ़ावें। ✍️ सड़ा हुआ पान 🍃या पुष्प नहीं चढ़ावे। ✍️गणेश को तुलसी 🌱भाद्र शुक्ल चतुर्थी को चढ़ती हैं। ✍️ पांच रात्रि तक कमल💮 का फूल बासी नहीं होता है। ✍️दस रात्रि तक तुलसी पत्र बासी नहीं होते हैं। ✍️ सभी धार्मिक कार्यो में पत्नी को दाहिने भाग में बिठाकर धार्मिक क्रियाएं सम्पन्न करनी चाहिए। ✍️ पूजन करनेवाला ललाट पर तिलक लगाकर ही पूजा करें। ✍️ पूर्वाभिमुख बैठकर अपने बांयी ओर घंटा, धूप तथा दाहिनी ओर शंख, जलपात्र एवं पूजन सामग्री रखें। ✍️ घी का दीपक अपने बांयी ओर तथा देवता को दाहिने ओर रखें एवं चांवल पर दीपक रखकर प्रज्वलित करें।

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