कौन हैं ये नागा साधू ? ******************** महाकुंभ, अर्धकुंभ या फिर सिंहस्थ कुंभ में आपने नागा साधुओं को जरूर देखा होगा. इनको देखकर आप सभी के मन में अक्सर यह सवाल उठते होंगे कि - कौन हैं ये नागा साधु, कहां से आते हैं और कुंभ खत्म होते ही कहां चले जाते हैं ? आइए आज हम लोग चर्चा करते है हिंदू धर्म के इन सबसे रहस्यमयी लोगों के बारे में. "नागा" शब्द बहुत पुराना है. यह शब्द संस्कृत के 'नग' शब्द से निकला है, जिसका अर्थ 'पहाड़' से होता है. इस पर रहने वाले लोग 'पहाड़ी' या 'नागा' कहलाते हैं. 'नागा' का अर्थ 'नग्न' रहने वाले व्यक्तियों से भी है. भारत में नागवंश और नागा जाति का बहुत पुराना इतिहास है. शैव पंथ से कई संन्यासी पंथों और परंपराओं की शुरुआत मानी गई है. भारत में प्राचीन काल से नागवंशी, नागा जाति और दसनामी संप्रदाय के लोग रहते आए हैं. उत्तर भारत का एक संप्रदाय "नाथ संप्रदाय" भी दसनामी संप्रदाय से ही संबंध रखता है". 'नागा' से तात्पर्य 'एकबहादुर लड़ाकू व्यक्ति' से लिया जाता है. जैसा कि हम जानते है कि - सनातन धर्म के वर्तमान स्वरूप की नींव आध्य शंकराचार्य ने रखी थी. शंकराचार्य का जन्म 8 वीं शताब्दी के मध्य में हुआ था. उस समय भारत सम्रद्ध तो बहुत था परन्तु धर्म से विमुख होने लगा था. भारत की धन संपदा को लूटने के लालच में तमाम आक्रमणकारी यहां आ रहे थे. कुछ उस खजाने को अपने साथ वापस ले गए तो कुछ भारत की दिव्य आभा से ऐसे मोहित हुए कि यहीं बस गए, लेकिन कुल मिलाकर सामान्य शांति-व्यवस्था बाधित थी. ईश्वर, धर्म, धर्मशास्त्रों को तर्क, शस्त्र और शास्त्र सभी तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था. ऐसे में आध्य शंकराचार्य ने सनातन धर्म की पुनर्स्थापना के लिए कई बड़े कदम उठाए जिनमें से एक था देश के चार कोनों पर चार पीठों (चार धाम) का निर्माण करना. आदिगुरु आध्य शंकराचार्य को लगने लगा था कि - केवल आध्यात्मिक शक्ति से ही इन चुनौतियों का मुकाबला करना काफी नहीं है. इसके लिए अधर्मियों से युद्ध करने के लिए धर्मयोद्दाओं की भी आवश्यकता है. तब उन्होंने जोर दिया कि युवा साधु व्यायाम करके अपने शरीर को मजबूत बनाए और हथियार चलाने में भी कुशलता हासिल करें. इसके लिए उन्होंने कुछ ऐसे मठों का निर्माण किया, जिनमे व्यायाम करने और तरह तरह के शस्त्र संचालन का अभ्यास कराया जाता था, ऐसे मठों को अखाड़ा कहा जाने लगा. आम बोलचाल की भाषा में भी अखाड़े उन जगहों को कहा जाता है जहां पहलवान कसरत के दांवपेंच सीखते हैं. कालांतर में कई और अखाड़े अस्तित्व में आए. शंकराचार्य ने अखाड़ों को सुझाव दिया कि - मठ, मंदिरों और श्रद्धालुओं की रक्षा के लिए जरूरत पडऩे पर शक्ति का प्रयोग करें. इस तरह विदेशी और विधर्मी आक्रमणों के उस दौर में इन अखाड़ों ने एक भारत को सुरक्षा कवच देने का काम किया. विदेशी आक्रमण की स्थिति में नागा योद्धा साधुओं ने अनेकों युद्धों में हिस्सा लिया. प्रथ्वीराज चौहान के समय में हुए मोहम्मद गौरी के पहले आक्रमण के समय सेना के पहुँचने से पहले ही नागा साधुओ ने कुरुक्षेत्र में गौरी की सेना को घेर लिया था जब गौरी की सेना कुरुक्षेत्र और पेहोवा के मंदिरों को नुकशान पहुंचाने की कोशिश कर रही थी. उसके बाद प्रथ्वी राज की सेना ने गौरी की सेना को तराइन (तरावडी) में काट दिया था. इस युद्ध के बाद पड़े कुम्भ में , नागा योद्धाओं को सम्मान देने के लिए, प्रथ्वीराज चौहान ने कुम्भ में सबसे पहले स्नान करने का अधिकार दिया था. तब से यह परम्परा चली आ रही है कि - कुम्भ का पहला स्नान नागा साधू करेंगे. इन नागा धर्म योद्धाओं ने केवल एक में ही नहीं बल्कि अनेकों युद्धों में विदेशी आक्रान्ताओं को टक्कर दी. दिल्ली को लूटने के बाद हरिद्वार के विध्वंस को निकले "तैमूर लंग" को भी हरिद्वार के पास हुई ज्वालापुर की लड़ाई में नागाओं ने मार भगाया था. तैमूर के हमले के समय जब ज्यादातर राजा डर कर छुप गए थे. जोगराज सिंह गुर्जर, हरवीर जाट, राम प्यारी, धूलाधाडी , आदि के साथ साथ नागा योद्धाओं ने तैमूर लंग को भारत से भागने पर मजबूर किया था. इसी प्रकार खिलजी के आक्रमण के समय नाथ सम्प्रदाय के योद्धा साधुओं ने कडा मुकाबला किया था. अहेमद शाह अब्दाली के आक्रमण के समय जब उत्तर भारत के राजाओं ने नोटा दबा दिया था और मराठा सेना पानीपत में हार गई थी तब मथुरा - वृन्दावन - गोकुल की रक्षा के लिए 40,000 नागा योद्धाओं ने अब्दाली से टक्कर ली थी.. पानीपत की हार का बदला लेने के लिए जब पेशवा माधवराव ने अफगानिस्तान पर आक्रमण किया था तो नागा योद्धाओं ने अब्दाली के स्थानीय मददगारों को मारा था. इस प्रकार आप अब यह समझ चुके होंगे कि - नागा साधू सनातन धर्म के रक्षक धर्म योद्धा हैं. यह सांसारिक सुखों से दूर रहकर केवल धर्म के लिए जीते हैं. अब बात करते हैं कि - नागा साधू कौन बनते हैं तथा कैसे बनते है. नागाओं को आम दुनिया से अलग और विशेष बनना होता है. नागा साधु बनने की प्रक्रिया बहुत कठिन है. नागा साधु बनने के लिए इतनी कठिन परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है कि शायद कोई आम आदमी इसे पार ही नहीं कर पाए इस प्रक्रिया को पूरा होने में कई साल लग जाते हैं. जब कोई व्यक्ति साधु बनने के लिए किसी अखाड़े में जाता है, तो उसे कभी सीधे-सीधे अखाड़े में शामिल नहीं किया जाता, पहले अखाड़ा अपने स्तर पर ये पता लगाता कि वह साधु क्यों बनना चाहता है? उस व्यक्ति की तथा उसके परिवार की संपूर्ण पृष्ठभूमि देखी जाती है. पहले उसे नागाा सन्यासी जीवन की कठिनता से परिचय कराया जाता है अगर अखाड़े को ये लगता है कि वह साधु बनने के लिए सही व्यक्ति है, तो ही उसे अखाड़े में प्रवेश की अनुमति मिलती है. अखाड़े में प्रवेश के बाद उसको ब्रह्मचर्य की शिक्षा दी जाती है. उसके तप, ब्रह्मचर्य, वैराग्य, ध्यान, संन्यास और धर्म का अनुशासन तथा निष्ठा आदि प्रमुखता से परखे-देखे जाते हैं। इसमें 6 महीने से लेकर 12 साल तक लग जाते हैं. अगर अखाड़ा यह निश्चित कर लें कि वह दीक्षा देने लायक हो चुका है फिर उसे अगली प्रक्रिया में ले जाया जाता है. इसके बाद वह अपना श्राद्ध, मुंडन और पिंडदान करते हैं तथा गुरु मंत्र लेकर संन्यास धर्म मे दीक्षित होते है. अपना श्राद्ध करने का मतलब सांसारिक रिश्तेदारों से सम्बन्ध तोड़ लेना. कई अखाड़ों मे महिलाओं को भी नागा साधु की दीक्षा दी जाती है.वैसे तो महिला नागा साधु और पुरुष नागा साधु के नियम कायदे समान ही है, फर्क केवल इतना ही है की महिला नागा साधु को एक पीला वस्त्र लपेटकर रखना पड़ता है और यही वस्त्र पहन कर स्नान करना पड़ता है. उन्हें नग्न स्नान की अनुमति नहीं है, जो व्यक्ति ब्रह्मचर्य का पालन करने की परीक्षा से सफलतापूर्वक गुजर जाता है, तो उसे ब्रह्मचारी से महापुरुष बनाया जाता है. उसके पांच गुरु बनाए जाते हैं. ये पांच गुरु पंच देव या पंच परमेश्वर (शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य और गणेश) होते हैं. इन्हें भस्म, भगवा, रूद्राक्ष आदि चीजें दी जाती हैं. यह नागाओं के प्रतीक और आभूषण होते हैं. महापुरुष के बाद नागाओं को अवधूत बनाया जाता है. इसमें सबसे पहले उसे अपने बाल कटवाने होते हैं. अवधूत रूप में दीक्षा लेने वाले को खुद का तर्पण और पिंडदान करना होता है. ये पिंडदान अखाड़े के पुरोहित करवाते हैं. अब ये संसार और परिवार के लिए मृत हो जाते हैं. इनका एक ही उद्देश्य होता है सनातन और वैदिक धर्म की रक्षा. नागा साधुओं को वस्त्र धारण करने की भी अनुमति नहीं होती. अगर वस्त्र धारण करने हों, तो सिर्फ गेरुए रंग का एक वस्त्र ही नागा साधु पहन सकते हैं. नागा साधुओं को शरीर पर सिर्फ भस्म लगाने की अनुमति होती है. नागा साधुओं को विभूति एवं रुद्राक्ष धारण करना पड़ता है, उन्हें अपनी चोटी का त्याग करना होता है और जटा रखनी होती है. नागा साधुओं को 24 घंटे में केवल एक ही समय भोजन करना होता है. वो भोजन भी भिक्षा मांग कर लिया गया होता है. एक नागा साधु को अधिक से अधिक सात घरों से भिक्षा लेने का अधिकार है. अगर सात घरों से भिक्षा मांगने पर कोई भिक्षा ना मिले, तो वह आठवे घर में भिक्षा मांगने भी नहीं जा सकता. उसे उस दिन भूखा ही रहना पड़ता है. नागा साधु सोने के लिए पलंग, खाट या अन्य किसी साधन का उपयोग नहीं कर सकता. नागा साधु केवल पृथ्वी पर ही सोते हैं. यह बहुत ही कठोर नियम है, जिसका पालन हर नागा साधु को करना पड़ता है. दीक्षा के बाद गुरु से मिले गुरुमंत्र में ही उसे संपूर्ण आस्था रखनी होती है. उसकी भविष्य की सारी तपस्या इसी गुरु मंत्र पर आधारित होती है. कुम्भ मेले के अलावा नागा साधु पूरी तरह तरह से आम आवादी से दूर रहते हैं और गुफाओं, कन्दराओं मे कठोर तप करते हैं. ये लोग बस्ती से बाहर निवास करते हैं. ये किसी को प्रणाम नहीं करते है तथा केवल संन्यासी को ही प्रणाम करते हैं. ऐसे और भी कुछ नियम हैं, जो दीक्षा लेने वाले हर नागा साधु को पालन करना पड़ते हैं. नागाओं को सिर्फ साधु नहीं, बल्कि योद्धा माना गया है. वे युद्ध कला में माहिर, क्रोधी और बलवान शरीर के स्वामी होते हैं. अक्सर नागा साधु अपने साथ तलवार, फरसा या त्रिशूल लेकर चलते हैं. ये हथियार इनके योद्धा होने के प्रमाण हैं, नागाओं में चिमटा रखना अनिवार्य होता है. चिमटा हथियार भी है और इनका औजार भी. नागा साधू अपने भक्तों को चिमटे से छूकर ही आशीर्वाद देते हैं. माना जाता है कि- जिसको सिद्ध नागा साधू चिमटा छू जाए उसका कल्याण हो जाता है. आधुनिक आग्नेयास्त्रों के आने के बाद से इन अखाड़ों ने अपना पारम्परिक सैन्य चरित्र त्याग दिया है. अब इन अखाड़ों में सनातनी मूल्यों का अनुपालन करते हुए संयमित जीवन जीने पर ध्यान रहता है. इस समय 13 प्रमुख अखाड़े हैं जिनमें प्रत्येक के शीर्ष पर महन्त आसीन होते हैं. प्रयागराज के कुंभ में उपाधि पाने वाले को नागा, उज्जैन में खूनी नागा, हरिद्वार में बर्फानी नागा, नासिक में उपाधि पाने वाले को खिचड़िया नागा कहा जाता है. इससे यह पता चल पाता है कि उसे किस कुंभ में नागा बनाया गया है. इन प्रमुख अखाड़ों के नाम प्रकार हैः श्री निरंजनी अखाड़ा, श्री जूनादत्त या जूना अखाड़ा, श्री महानिर्वाण अखाड़ा, श्री अटल अखाड़ा, श्री आह्वान अखाड़ा, श्री आनंद अखाड़ा, श्री पंचाग्नि अखाड़ा, श्री नागपंथी गोरखनाथ अखाड़ा, श्री वैष्णव अखाड़ा, श्री उदासीन पंचायती बड़ा अखाड़ा, श्री उदासीन नया अखाड़ा, श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा, निर्मोही अखाड़ा। वरीयता के हिसाब से इनको कोतवाल, पुजारी, बड़ा कोतवाल, भंडारी, कोठारी, बड़ा कोठारी, महंत और सचिव जैसे पद दिए जाते हैं. सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण पद सचिव का होता है. नागा साधु अखाड़े के आश्रम और मंदिरों में रहते हैं. तथा तपस्या करने के लिए हिमालय या ऊंचे पहाड़ों की गुफाओं में जीवन बिताते हैं।

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*चेन्नई के एक स्कूल ने अपने बच्चों को छुट्टियों का जो एसाइनमेंट दिया वो पूरी दुनिया में वायरल हो रहा है.* वजह बस इतनी कि उसे बेहद सोच समझकर बनाया गया है. इसे पढ़कर अहसास होता है कि हम वास्तव में कहां आ पहुंचे हैं और अपने बच्चों को क्या दे रहे हैं. अन्नाई वायलेट मैट्रीकुलेशन एंड हायर सेकेंडरी स्कूल ने बच्चों के लिए नहीं बल्कि पेरेंट्स के लिए होमवर्क दिया है, जिसे हर एक पेरेंट को पढ़ना चाहिए. उन्होंने लिखा- पिछले 10 महीने आपके बच्चों की देखभाल करने में हमें अच्छा लगा.आपने गौर किया होगा कि उन्हें स्कूल आना बहुत अच्छा लगता है. अगले दो महीने उनके प्राकृतिक संरक्षक यानी आप उनके साथ छुट्टियां बिताएंगे. हम आपको कुछ टिप्स दे रहे हैं जिससे ये समय उनके लिए उपयोगी और खुशनुमा साबित हो. - अपने बच्चों के साथ कम से कम दो बार खाना जरूर खाएं. उन्हें किसानों के महत्व और उनके कठिन परिश्रम के बारे में बताएं. और उन्हें बताएं कि अपना खाना बेकार न करें. - खाने के बाद उन्हें अपनी प्लेटें खुद धोने दें. इस तरह के कामों से बच्चे मेहनत की कीमत समझेंगे. - उन्हें अपने साथ खाना बनाने में मदद करने दें. उन्हें उनके लिए सब्जी या फिर सलाद बनाने दें. - तीन पड़ोसियों के घर जाएं. उनके बारे में और जानें और घनिष्ठता बढ़ाएं. - दादा-दादी/ नाना-नानी के घर जाएं और उन्हें बच्चों के साथ घुलने मिलने दें. उनका प्यार और भावनात्मक सहारा आपके बच्चों के लिए बहुत जरूरी है. उनके साथ तस्वीरें लें. - उन्हें अपने काम करने की जगह पर लेकर जाएं जिससे वो समझ सकें कि आप परिवार के लिए कितनी मेहनत करते हैं. - किसी भी स्थानीय त्योहार या स्थानीय बाजार को मिस न करें. - अपने बच्चों को किचन गार्डन बनाने के लिए बीज बोने के लिए प्रेरित करें. पेड़ पौधों के बारे में जानकारी होना भी आपके बच्चे के विकास के लिए जरूरी है. - अपने बचपन और अपने परिवार के इतिहास के बारे में बच्चों को बताएं. - अपने बच्चों का बाहर जाकर खेलने दें, चोट लगने दें, गंदा होने दें. कभी कभार गिरना और दर्द सहना उनके लिए अच्छा है. सोफे के कुशन जैसी आराम की जिंदगी आपके बच्चों को आलसी बना देगी. - उन्हें कोई पालतू जानवर जैसे कुत्ता, बिल्ली, चिड़िया या मछली पालने दें. - उन्हें कुछ लोक गीत सुनाएं. - अपने बच्चों के लिए रंग बिरंगी तस्वीरों वाली कुछ कहानी की किताबें लेकर आएं. - अपने बच्चों को टीवी, मोबाइल फोन, कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स से दूर रखें. इन सबके लिए तो उनका पूरा जीवन पड़ा है. - उन्हें चॉकलेट्स, जैली, क्रीम केक, चिप्स, गैस वाले पेय पदार्थ और पफ्स जैसे बेकरी प्रोडक्ट्स और समोसे जैसे तले हुए खाद्य पदार्थ देने से बचें. - अपने बच्चों की आंखों में देखें और ईश्वर को धन्यवाद दें कि उन्होंने इतना अच्छा तोहफा आपको दिया. अब से आने वाले कुछ सालों में वो नई ऊंचाइयों पर होंगे. माता-पिता होने के नाते ये जरूरी है कि आप अपना समय बच्चों को दें. अगर आप माता-पिता हैं तो इसे पढ़कर आपकी आंखें नम जरूर हुई होंगी. और आखें अगर नम हैं तो वजह साफ है कि आपके बच्चे वास्तव में इन सब चीजों से दूर हैं. इस एसाइनमेंट में लिखा एक-एक शब्द ये बता रहा है कि जब हम छोटे थे तो ये सब बातें हमारी जीवनशैली का हिस्सा थीं, जिसके साथ हम बड़े हुए हैं, लेकिन आज हमारे ही बच्चे इन सब चीजों से दूर हैं, जिसकी वजह शायद हम खुद हैं....।।

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हिंदू धर्म को नष्ट करने व हिंदूओ को दुनिया के नक़्शे से मिटाने के लिए अनेक षड़यंत्र रचे गए हैं और चल भी रहे हैं, लेकिन हिंदू धर्म सनातन धर्म है, दुनिया के सभी हिन्दू विरोधी मिलकर भी प्रयास करें तो भी इसे नहीं मिटा सकते हैं क्योंकि ये सनातन धर्म है जब से सृष्टि का उद्गम हुआ है तब से यह धर्म है जिस दिन हिन्दू धर्म का अस्तित्व मिट जायेगा उस दिन से सृष्टि का प्रलय हो जायेगा सनातन धर्म ही सृष्टि का नाभि है । दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका से एक ऐसी खबर सामने आई है जो समस्त सनातनियों के लिए गर्व करने की बात है । इस रिपोर्ट के मुताबिक़, अमेरिका में हिंदू समुदाय के लोग सबसे ज्यादा पढ़े लिखे हैं । प्यू रिसर्च के मुताबिक, अमेरिका में रह रहे सभी धार्मिक समुहों में हिंदू समुदाय के लोग सबसे ज्यादा शिक्षित है । पिछले महीने दिसंबर में जारी हुई इस रिपोर्ट में बताया गया है कि शिक्षा के मामले में अमेरिका में रह रहे हिंदुओ ने यहूदी समुदाय के लोगों को भी पछाड़ दिया है, जो अब तक सबसे ऊपर थे । इस रिपोर्ट के अनुसार, कॉलेज डिग्री वालों में सबसे अधिक संख्या हिंदुओं की है । इस रिपोर्ट के मुताबिक़, नॉर्थ अमेरिका, यूरोप, कैरिबायाई और सब-सहारा अफ्रीका देशों से लेकर जहां भी हिंदू बहुसंख्यक हैं, वहां हिंदू समुदाय के लोग ही सबसे ज्यादा शिक्षित है । रिपोर्ट के मुताबिक, धर्म के आधार पर अगर देखा जाए तो 77 फीसदी के साथ कॉलेज डिग्री वालों में से हिंदुओं की संख्या सबसे ज्यादा है । हिंदुओं के बाद दूसरा नंबर यूनिटेरियन समुदाय के लोगों का आता है, जो दूसरे सबसे ज्यादा शिक्षित है । भारतीय अमेरिकी समुदाय ने अमेरिका में सबसे धनी और सबसे शिक्षित के रूप में अपनी पहचान बनाई है । प्यू के अध्ययन में कहा गया है कि अधिक शिक्षित होने के कारण ही हिंदू देश में अमीर हैं । इस संगठन ने आर्थित सफलता और शिक्षा के बीच के संबंध के बारे में बताया है । प्यू के 2014 के अध्ययन के अनुसार यहूदी और हिंदुओं की वार्षिक आय अधिक है । यहुदियों में 10 में से 4 (44 फीसदी) लोग और हिंदुओं में 10 में से 3 (36 फीसदी) लोग ऐसे हैं जिनकी सालाना एक लाख डॉलर के करीब है । अमेरिका में हिंदू सांसद लड़ेगी चुनाव… वॉशिंगटन: अमेरिका की पहली हिंदू सांसद तुलसी गेबार्ड 2020 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवारी भर रही हैं । तमाम कयासों पर विराम देते हुए गेबार्ड ने यह साफ़ कर दिया है कि वे 2020 का अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव लड़ने वाली हैं । अमेरिकी सीनेट में हवाई का प्रतिनिधित्व करने वाली डेमोक्रेट सांसद तुलसी बेबार्ड ने मीडिया को बताया है कि, ‘मैंने तय कर लिया है कि मैं राष्ट्रपति चुनाव लड़ूंगी ।’ अमेरिका के इतिहास में ऐसा पहली बार होगा जब किसी हिंदू को अमेरिका की किसी पार्टी की ओर से राष्ट्रपति चुनाव की उम्मीदवारी मिलेगी । वहीं अगर गेबार्ड 2020 का राष्ट्रपति चुनाव में जीत दर्ज करती हैं, तो वे अमेरिका की प्रथम महिला और सबसे युवा राष्ट्रपति होंगी । आपको बता दें कि तुलसी गेबार्ड हिंदू जरूर हैं, लेकिन वे भारतीय मूल की नहीं है । तुलसी गेबार्ड का जन्म अमेरिका के समोआ में एक कैथोलिक परिवार के घर हुआ था । उनकी मां कॉकेशियन हैं, जिन्होंने बाद में हिंदू धर्म अपना लिया था । तुलसी दो साल की थीं, तब वे अपनी माँ के साथ हवाई आकर रहने लगीं और बाद में उन्होंने भी हिंदू धर्म अपना लिया । तुलसी पहली ऐसी अमेरिकी सांसद हैं, जिन्होंने भगवत गीता को हाथ में लेकर शपथ ग्रहण की थी । हिन्दुत्व एक व्यवस्था है मानव में महामानव और महामानव में महेश्वर को प्रगट करने की । यह द्विपादपशु सदृश उच्छृंखल व्यक्ति को देवता बनाने वाली एक महान परम्परा है । ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का उद्घोष केवल इसी संस्कृति के द्वारा किया गया है….. भारतीय हिंदूओ को भी अपनी महिमा समझनी पड़ेगी और हिंदू संस्कृति पर हो रहे है कुठाराघात को रोकना पड़ेगा, हिन्दू धर्म, हिन्दू साधु-संत, हिंदू कार्यकर्ता, हिन्दू मंदिर मिटाने के भरपूर प्रयास किये जा रहे हैं, जिसमें इसाई मिशनरियां, इस्लामिक राष्ट्र, विदेशी कंपनियां, वामपंथी आदि लगे हैं । इसको रोकने के लिए सभी हिंदूओं को मिलकर प्रयास करना होगा ।

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क्यों लपेटा जाता है कान पर जनेऊ और क्यों बाँधी जाती है शिखा............ हिन्दू धर्म में अनेक मान्यताओं को माना जाता है| हर मान्यता का अपना ही एक महत्व है| इनमें से एक मान्यता है जनेऊ धारण करना और श‌िखा बांधना| शास्त्रों के अनुसार जनेऊ धारण करने वाले को शौच कर्म के समय कान पर जनेऊ लपेटकर रखना चाह‌िए| जबकि शिखा को हमेशा बांधकर रखना चाह‌िए| यह केवल धर्म से जुड़ी मान्यता नहीं है बल्कि इसका एक वैज्ञानिक कारण भी है| यदि आपको इस मन्यता से जुड़े फायदे के बारे में पता चलेगा तो आप भी इसका लाभ उठाना पसंद करेंगे| आइए जानते हैं कि शिखा क्यों बांधी जाती है| शिखा को जीवन का आधार कहा गया है| प्राचीन काल में जब किसी को उसके अपराध के लिए मृत्यु दंड देना होता था परन्तु उसका वध नहीं क‌िया जा सकता था तब उसकी श‌िखा काट ली जाती थी| शिखा काटने के पीछे एक वैज्ञानिक कारण छिपा हुआ है| मस्तिष्क के भीतर जहां पर बालों का आवर्त होता है उस स्थान पर नाड़ियों का मेल होता है| उसे ‘अधिपति मर्म’ कहा जाता है| यह हमारे मस्तिष्क का बहुत नाजुक स्थान होता है| यदि व्यक्ति को इस स्थान पर चोट लगे तो उसकी मृत्यु हो सकती है| शिखा इस स्थान के लिए कवच का काम करती है| शिखा तीव्र सर्दी, गर्मी से मर्मस्थान को सुरक्षित रखने के साथ – साथ चोट लगने से भी बचाव करती है| मस्तिष्क में जहां शिखा का स्थान होता है| वहां शरीर की सभी नाड़ियों का मेल होता है| इस स्‍थान के मूल भाग को ‘मस्तुलिंग’ कहा जाता है| यह मस्तिष्क के साथ ज्ञानेन्द्रियों यानी कान, नाक, जीभ, आँख को प्रभाव‌ित करता है साथ ही कामेन्द्रियों जैसे हाथ, पैर आदि पर भी न‌ियंत्रण रखता है| मस्तुलिंग जितने सामर्थ्यवान होते हैं उतनी ही ज्ञानेन्द्रियों और कामेन्द्रियों की शक्ति बढ़ती है| शिखा व्यक्ति के मन को भी संयमित करता है| यदि हम शिखा बांधते हैं तो अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रख सकते हैं| इसल‌िए ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले लोग श‌िखा बांधकर रखते हैं| यदि जनेऊ की बात करें तो मान्यता है कि शौच के समय इसे दाएं कान पर धारण करना चाहिए| माना जाता है कि दायां कान अधिक पवित्र होता है और इस तरफ प्रमुख देवताओं का वास होता है| शास्त्रों में कहा गया है कि “आदित्या वसवो रुद्रा, वायुरग्निश्च घर्रयाट‍। विप्रस्य दक्षिणे कर्णे, नित्यं तिष्ठन्ति देवताः।। दाएं कान पर जनेऊ रखने से यह देवताओं के संपर्क में रहता है जिससे शौच के समय भी जनेऊ की शुद्घता और पवित्रता बनी रहती है| वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाये तो जनेऊ पुरुष के स्वास्थ्य और पौरुष के लिए बहुत ही लाभकारी होता है| यह हृदय रोग की संभावना को कम करता है| चिकित्सा विज्ञान के अनुसार यह दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ा होता है| मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्र की रक्षा होती है| जिन पुरुषों को स्वप्न दोष होता है उन्हें सोते समय कान पर जनेऊ लपेट कर सोना चाहिए| माना जाता है कि स्वप्न दोष की समस्या से मुक्ति मिल जाती है|

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