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*~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~* *शिवलिंग पर जल चढ़ाते वक्त पूर्व दिशा में नहीं होना चाहिए आपका मुंह, जानें पूजा के लिए कौन सी दिशा है सही* *~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~* *शिव पुराण के अनुसार शिवलिंग के पास अलग-अलग दिशाओं में अन्य देवी-देवताओं का स्थान होता है।* कई लोग शिवलिंग की पूजा बिना नियम और विधि की जानकारी के बिना करते हैं। इससे पूजा का फल तो नहीं मिलता बल्कि दोष भी लगता है। शिव पुराण के अनुसार शिवलिंग के पास अलग-अलग दिशाओं में अन्य देवी-देवताओं का स्थान होता है। कुछ लोग शिवलिंग की पूजा पीछे से भी करते हैं जो कि गलत माना गया है। शिवपुराण के अनुसार शिवलिंग पर जल चढ़ाने और पूजा में सही दिशा में बैठने के साथ भस्म का त्रिपुण्ड लगाने का भी नियम बताया है। इसके साथ रुद्राक्ष की माला भी पहननी चाहिए। भस्म न हो तो मिट्टी से भी मस्तक पर त्रिपुंड लगाने का विधान शास्त्रों में बताया गया है। *जानिए शिवलिंग की पूजा करते वक्त किस दिशा में मुंह हाेना चाहिए-* 1. शिवलिंग की पूजा के समय पूर्व दिशा की ओर मुंह नहीं होना चाहिए क्योंकि यह दिशा भगवान शिव के आगे या सामने होती है और धार्मिक नियम के अनुसार देव मूर्ति या प्रतिमा के ठीक सामने न तो खड़े होना चाहिए और न ही बैठना चाहिए। ऐसा करने से दोष लगता है। 2. पूजा के समय उत्तर दिशा में नहीं खड़े होना चाहिए यानी आपका मुंह दक्षिण दिशा में नहीं होना चाहिए। क्योंकि उत्तर दिशा में भगवान शंकर का बायां अंग माना जाता है, जो शक्तिरूपा देवी पार्वती का स्थान है। 3. पूजा के दौरान पश्चिम दिशा में नहीं बैठना चाहिए यानी आपका मुंह पूर्व दिशा में नहीं होना चाहिए क्योंकि वह भगवान शंकर की पीठ मानी जाती है। इसलिए पीछे से देवपूजा करना शुभ फल नहीं देता। 4. इस प्रकार एक दिशा बचती है - वह है दक्षिण दिशा। इस दिशा में बैठकर यानी उत्तर दिशा में मुंह रखकर शिवलिंग की पूजा करना श्रेष्ठ माना गया है। ऐसा करने से पूजा का पूरा फल मिलता है। मनोकामनाएं भी पूरी हो जाती हैं। 5. सरल अर्थ में शिवलिंग के दक्षिण दिशा की ओर बैठकर यानि उत्तर दिशा की ओर मुंह कर पूजा और अभिषेक शीघ्र फल देने वाला माना गया है। इसलिए उज्जैन के दक्षिणमुखी महाकाल और अन्य दक्षिणमुखी शिवलिंग की पूजा का बहुत धार्मिक महत्व है।

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ओम नमः शिवायगावों विश्वस्य मातरः गाय विश्व की माता है गौ वर धन पूजा पर ये विचार जरूर कीजिये गौ यानी गाय वर यानी वरदान धन मतलब लक्ष्मी लक्ष्मी हम अन्न को कहते है मतलब गाय के गोबर में लक्ष्मी यानी अन्न उपजाने वाले सभी जीवाणु होते है । यह अपनी #सजीव जल या #पंचगव्य की लैब रिपोर्ट देखकर आपको यकीन हो जाएगा । प्रकृति पदार्थ से बना है और पदार्थ ऊर्जा से बना है । #ऊर्जा 9 प्रकार की है प्रथमं शैल पुत्री जिसे #आधुनिक #विज्ञान ने #हिंग्स बोसान #कण कहा है । जिसे गॉडपार्टिकल भी कहा गया है । द्वितीय ब्रम्ह चारिणी तृतीय चन्द्र घण्टा .... .... अष्टम महागौरी है महागौरी अर्थात गाय गाय के गौमूत्र में सभी पदार्थ है हाइड्रोजन हीलियम.....से लेकर यूरेनियम तक पिछले वर्ष वैज्ञानिको ने गौमूत्र में 0.03%स्वर्ण भी खोज है । #गौमूत्र विषनासी भी है । हमने गाय के गोबर से बने जैव घोल से वो सब जीवाणु भी खोज निकाले है जो पौधे को सभी उर्वरक देते है पौधों को #बीमारियों से बचाने वाले जीवाणु भी पाए गए है । नरसिंहपुर जिला mp के जिन किसानों ने ऐसे घोल का उपयोग किया है वो सब बहुत लाभ भी पा रहे है । गाय के #जिन अंगों में #जिन देवताओं का #चित्र पाया गया है । उन अंगों से उस देवता का रूपक पदार्थ या जीवाणु मिलते जा रहे है । #गाय ने ही गौमूत्र, दूध,दही महि,घी के पदार्थ के रूप में दुनिया को (व्रक्ष व जीव जंतु सबको) पोषण दिया है और #गोबर के रूप में सूक्ष्म #जीवाणुओ का प्रजनन कर #प्रकृति की इकोलॉजी (पारिस्थितिक तंत्र) को प्रारम्भ किया है । इतना ही नही गाय के गोबर के कंडे को #अग्निहोत्र पात्र पर जलाकर गौ घृत चावल के छोटे से 2 हवन करने पर एथिलीन ओक्साइड प्रापलीन ऑक्साइड बीटा प्रापयो ऑक्साइड फार्मेल्डिहाइड जैसे अनेक गैस निकलती है प्रकारन्तर में पंच तत्वो (भूमि,गगन,वायु,अग्नि,नीर) का निर्माण करती है । और यही पंच तत्व सृस्टि का निर्माण करते है । इसीलिए गाय को माता कहा गया है । जैसे जैसे विज्ञान आगे बढ़ता जाएगा जो गाय को माता नही मानते है वो सब अंततोगत्वा जान ही जायेंगे की गाय विश्व की माता है । गौतम बुद्ध ने बार बार कहा है कि मानो नही जानो मैंने तो पके चावल का एक दाना छूकर जान ही लिया है कि सारा चावल पक गया है । वैसे ही आप भी जान लो । और मान भी लो और गौसेवा में लग जाओ कहि विज्ञान के खोज के चक्कर मे आपका शरीर ही आपका साथ न छोड़ दे ।

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जिस जाति व्यवस्था के लिए मनुस्मृति को दोषी ठहराया जाता है, उसमें जातिवाद का उल्लेख तक नहीं है। महर्षि मनु मानव संविधान के प्रथम प्रवक्ता और आदि शासक माने जाते हैं। मनु की संतान होने के कारण ही मनुष्यों को मानव या मनुष्य कहा जाता है। मनुस्मृति मानव समाज का प्रथम संविधान है, न्याय व्यवस्था का शास्त्र है। यह वेदों के अनुकूल है। वेद की कानून व्यवस्था अथवा न्याय व्यवस्था को कर्तव्य व्यवस्था भी कहा गया है। उसी के आधार पर मनु ने सरल भाषा में मनुस्मृति का निर्माण किया। वैदिक दर्शन में संविधान या कानून का नाम ही धर्मशास्त्र है। महर्षि मनु कहते है- धर्मो रक्षति रक्षित:। अर्थात जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। यदि वर्तमान संदर्भ में कहें तो जो कानून की रक्षा करता है कानून उसकी रक्षा करता है। आगे चलकर महर्षि याज्ञवल्क्य ने भी धर्मशास्त्र का निर्माण किया जिसे याज्ञवल्क्य स्मृति के नाम से जाना जाता है। अंग्रेजी काल में भी भारत की कानून व्यवस्था का मूल आधार मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति रहा है। कानून के विद्यार्थी इसे भली-भांति जानते हैं। राजस्थान हाईकोर्ट में मनु की प्रतिमा भी स्थापित है। मनु किसी को दलित नहीं मानते। दलित संबंधी व्यवस्थाएं तो अंग्रेजों और आधुनिकवादियों की देन हैं। दलित शब्द प्राचीन संस्कृति में है ही नहीं। चार वर्ण जाति न होकर मनुष्य की चार श्रेणियां हैं, जो पूरी तरह उसकी योग्यता पर आधारित है। प्रथम ब्राह्मण, द्वितीय क्षत्रिय, तृतीय वैश्य और चतुर्थ शूद्र। वर्तमान संदर्भ में भी यदि हम देखें तो शासन-प्रशासन को संचालन के लिए लोगों को चार श्रेणियों- प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ श्रेणी में बांटा गया है। मनु की व्यवस्था के अनुसार हम प्रथम श्रेणी को ब्राह्मण, द्वितीय को क्षत्रिय, तृतीय को वैश्य और चतुर्थ को शूद्र की श्रेणी में रख सकते हैं। मनु कहते हैं- ‘जन्मना जायते शूद्र:’ अर्थात जन्म से तो सभी मनुष्य शूद्र के रूप में ही पैदा होते हैं। बाद में योग्यता के आधार पर ही व्यक्ति ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र बनता है। मनु की व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण की संतान यदि अयोग्य है तो वह अपनी योग्यता के अनुसार चतुर्थ श्रेणी या शूद्र बन जाती है। ऐसे ही चतुर्थ श्रेणी अथवा शूद्र की संतान योग्यता के आधार पर प्रथम श्रेणी अथवा ब्राह्मण बन सकती है। हमारे प्राचीन समाज में ऐसे कई उदाहरण है, जब व्यक्ति शूद्र से ब्राह्मण बना। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के गुरु वशिष्ठ महाशूद्र चांडाल की संतान थे, लेकिन अपनी योग्यता के बल पर वे ब्रह्मर्षि बने। एक मछुआ (निषाद) मां की संतान व्यास महर्षि व्यास बने। आज भी कथा-भागवत शुरू होने से पहले व्यास पीठ पूजन की परंपरा है। विश्वामित्र अपनी योग्यता से क्षत्रिय से ब्रह्मर्षि बने। ऐसे और भी कई उदाहरण हमारे ग्रंथों में मौजूद हैं, जिनसे इन आरोपों का स्वत: ही खंडन होता है कि मनु दलित विरोधी थे।

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