Rakesh singla Jan 24, 2021

*🌷भगवान के दर्शन🌷* 🌅सूरदास जी तो जन्म से अंधे थे पर भजन की महिमा तो देखो जब वो भजन करते थे तो बाल कृष्ण उनके सामने बैठकर उनका भजन सुनते थे ।हम आखे से देखकर भी भगवान को देख नहीं पाते और सूरदास जी अंधे होकर भी देख लेते थे एक बार वो भजन कर रहे थे तो वो भावराग में खो गए जिसमें कृष्णजी, राधा जी के साथ नृत्य कर रहे थे और तभी राधा जी की एक पायल गिर गई तो सूरदास जी ने वो पायल उठा ली। तो भगवान कृष्ण ने कहा कि सूरदास जी जब राधा जी अपनी पायल मागने आए, तो आप उनके पैर पकड लेना। जब राधा जी जब पायल मागॅने आई, तो सूरदास जी ने पैर पकड लिए और कहा जब तक आप दोनों हमें दर्शन नहीं दोगें, मै पैर नहीं छोंडूगा। दोनो ने उन्हें दर्शन दिए और मन की आखें तो थी ही उनके पास उन्हें दृष्टि भी प्रदान की और जब वो दर्शन देकर जाने लगी, तो सूरदास जी ने कहा-कि ये आखें तो ले जाओ. तब राधा जी ने कहा - कि आप जन्म से अंधे हो अब आप को दुनिया नहीं देखनी? तो उन्हेाने कहा मैने आपको देख लिया अब मुझे कुछ नहीं देखना।। हम आंखे होते हुऐ भी नहीं देख पा रहे और उन्होने अंधे होकर भी देख लिया। जिसके भजन में जैसी ताकत होगी बाके बिहारी वैसे ही प्रकट होगें, भजन की उम्र नहीं होती है तो जिसने बचपन में, जवानी मे भजन नहीं किया, वो कहे कि मै बुढापे में भजन करूगा तो भगवान भी कहते है कि जैसे तुम मुझे ये अपने जीवन का बचा हुआ समय दे रहे हो, वो भी अपने साथ वैसे ही करेगे. क्येांकि जो भक्त भगवान को जैसे भजता है भगवान भी उसको वैसा ही देते है. और जब व्यक्ति का बुरा होता है तो भगवान को कोसता है । वो ये भूल जाता है, कि क्या हमनें भगवान का भजन किया था। पहले खुद से ही प्रश्न कर लो क्योकि जब तक वो व्यक्ति ये नहीं करेगा तो बाके बिहारी कैसे आएगें । हरिदास जी थे जिन्होंने अपनी संगीत साधना से भगवान को प्रकट कर लिया था कैसे प्रकट कर लिया उनके भजन में शक्ति थी। जैसे उन्होने वो राग गाया, और भगवान राधा जी के साथ प्रकट हो गए, तो हमें देखना है भजन में बहुत शक्ति है । 🍁💦🙏Զเधे👣Զเधे🙏🏻💦🍁 *☘🌷!! हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे !!💖* *☘💞हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे !!🌹💐* ÷सदैव जपिए एवँ प्रसन्न रहिए÷

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Rakesh singla Jan 14, 2021

🌼द्वारकाधीश की कृपा🌼 . कहते हैं भक्ति सच्ची हो तो ईश्वर को भक्त के सामने आना ही पड़ता है और ईश्वर के जिसे दर्शन हो जाएं उसे कुछ न कुछ देकर ही जाते हैं। . यह एक ऐसे ही भक्त की कथा है जिसे भगवान श्री कृष्ण ने दर्शन दिए और जाते-जाते छोड़ गए शरीर पर शंख और चक्र के निशान। . यह कथा है आमेर नरेश श्री पृथ्वीराज जी स्वामी की। एक बार इनके गुरु पयोहारी जी द्वारिका जी यात्रा पर जाने लगे तो पृथ्वीराज भी द्वारिका जाने की तैयारी करने लगे। इन्होंने कहा कि द्वारिका जाकर शरीर पर शंख चक्र बनवाउंगा। . गुरु पयोहारी जी ने कहा कि अगर तुम राज्य छोड़कर चले जाओगे तो राज्य में अव्यवस्था फैल जाएगी। धर्म-कर्म से लोगों का ध्यान हट जाएगा। इसलिए आमेर में रहकर ही कृष्ण की भक्ति करो। . गुरु की बात मानकर श्रीपृथ्वीराज जी आमेर में ही रह गए लेकिन इनका ध्यान द्वारकाधीश में ही लगा रहा। रात में जब यह सोए हुए थे तब इन्हें लगा कि अचानक तेज प्रकाश फैल गया है और भगवान श्री द्वारकाधीश स्वयं प्रकट हो गए हैं। . राजा श्रीपृथ्वीराज जी ने द्वारकाधीश जी की परिक्रमा की और प्रणाम किया। भगवन ने कहा कि तुम अब गोमती संगम में डूबकी लगाओ। राजा को लगा कि वह गोमती तट पर पहुंच गए हैं और गोमती में डूबकी लगा रहे हैं। . सुबह जब राजा महल से बाहर नहीं निकले तो रानी उनके शयन कक्ष में पहुंची। रानी ने देखा राजा सोए हुए हैं और उनका पूरा शरीर भींगा हुआ है जैसे स्नान करके आए हों। रानी ने देखा कि राजा के बाजू पर शंख और चक्र के निशान उभर आए हैं। . राजा की नींद खुली तो वह भी इस चमत्कार को देख कर हैरान थे। उन्हें लगा कि भगवान स्वयं उनकी इच्छा पूरी करने के लिए आए थे। इसके बाद राजा पूरी तरह से कृष्ण भक्ति में लीन हो गए। . मुस्कान तेरी सांवरे मेरे मन मे बस रही हैं जादू भरी नजर से कई तीर कस रही हैं *** कुर्बान हो चुके है तेरी हर अदा पे मोहन तेरे रूप के भँवर मे मेरी जान फँस रही हैं *** चित्त को चुरा रही है चितवन तुम्हारी झाँकी तेरी झाँकी सांवरे तेरी प्यारी सी झाँकी *** खुद को भुला रही हे सुध बुध गवा रही है मुस्कान तेरी प्यारे मेरे मन मे बस रही है.. जय जय श्री राधे RADHE RADHE JAI SHREE KRISHNA JI VERY GOOD MORNING JI

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Rakesh singla Jan 6, 2021

(((( पवित्र दान ! )))) . एक सेठ ने अन्नसत्र खोल रखा था। उनमें दान की भावना तो कम थी पर समाज उन्हें दानवीर समझकर उनकी प्रशंसा करे यह भावना मुख्य थी। . उनके प्रशंसक भी कम नहीं थे। थोक का व्यापार था उनका। वर्ष के अंत में अन्न के कोठारों में जो सड़ा गला अन्न बिकने से बच जाता था, वह के लिए भेज दिया जाता था। . प्रायः सड़ी ज्वार की रोटी ही सेठ के अन्नसत्र में भूखों को प्राप्त होती थी . सेठ के पुत्र का विवाह हुआ। पुत्रवधू घर आयी। वह बड़ी सुशील, धर्मज्ञ और विचारशील थी। . उसे जब पता चला कि उसके ससुर द्वारा खोले गये अन्नसत्र में सड़ी ज्वार की रोटी दी जाती है तो उसे बड़ा दुःख हुआ। . उसने भोजन बनाने की सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। . पहले ही दिन उसने अन्नसत्र से सड़ी ज्वार का आटा मँगवाकर एक रोटी बनायी और सेठ जब भोजन करने बैठे तो उनकी थाली में भोजन के साथ वह रोटी भी परोस दी। . काली, मोटी रोटी देखकर कौतुहलवश सेठ ने पहला ग्रास उसी रोटी का मुख में डाला। ग्रास मुँह में जाते ही वे थू-थू करने लगे और थूकते हुए बोले... . “बेटी ! घर में आटा तो बहुत है। यह तूने रोटी बनाने के लिए सड़ी ज्वार का आटा कहाँ से मँगाया ?” . पुत्रवधू बोलीः “पिता जी ! यह आटा परलोक से मँगाया है।” . ससुर बोलेः “बेटी ! मैं कुछ समझा नहीं।” . “पिता जी ! जो दान पुण्य हमने पिछले जन्म में किया वही कमाई अब खा रहे हैं और जो हम इस जन्म में करेंगे वही हमें परलोक में मिलेगा। . हमारे अन्नसत्र में इसी आटे की रोटी गरीबों को दी जाती है। परलोक में केवल इसी आटे की रोटी पर रहना है। . इसलिए मैंने सोचा कि अभी से हमें इसे खाने का अभ्यास हो जाय तो वहाँ कष्ट कम होगा।” . सेठ को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने अपनी पुत्रवधू से क्षमा माँगी और अन्नसत्र का सड़ा आटा उसी दिन फिँकवा दिया। . तब से अन्नसत्र से गरीबों, भूखों को अच्छे आटे की रोटी मिलने लगी। . आप दान तो करो लेकिन दान ऐसा हो कि जिससे दूसरे का मंगल-ही-मंगल हो। . जितना आप मंगल की भावना से दान करते हो उतना दान लेने वाले का भला होता ही है, साथ में आपका भी इहलोक और परलोक सुधर जाता है। . दान करते समय यह भावना नहीं होनी चाहिए कि लोग मेरी प्रशंसा करें, वाहवाही करें। दान इतना गुप्त हो कि देते समय आपके दूसरे हाथ को भी पता न चले। . रहीम एक नवाब थे। वे प्रतिदिन दान किया करते थे। उनका दान देने का ढंग अनोखा था। . वे रूपये पैसों की ढेरी लगवा लेते थे और आँखें नीची करके उस ढेर में से मुट्ठी भर-भरकर याचकों को देते जाते थे। . एक दिन संत तुलसीदासजी भी वहाँ उपस्थित थे। उन्होंने देखा कि एक याचक दो-तीन बार ले चुका है परंतु रहीम फिर भी उसे दे रहे हैं ! . यह दृश्य देखकर तुलसीदास जी ने पूछाः . सीखे कहाँ नवाबजू देनी ऐसी देन ? ज्यों ज्यों कर ऊँचे चढ़े त्यों त्यों नीचे नैन।। . तब रहीम ने बड़ी नम्रता से उत्तर दियाः . देने हारा और है, जो देता दिन रैन। लोग भरम हम पै करें, या विधि नीचे नैन।। . असल में दाता तो कोई दूसरा है, जो दिन-रात दे रहा है, हम पर व्यर्थ ही भ्रम होता है कि हम दाता हैं, इसीलिए आँखें झुक जाती हैं। . कितनी ऊँची दृष्टि है ! कितना पवित्र दान है ! दान श्रद्धा, प्रेम, सहानुभूति एवं नम्रतापूर्वक दो, कुढ़कर, जलकर, खीजकर मत दो। . अहं सजाने की गलती नहीं करो, अहं को विसर्जित करके विशेष नम्रता से सामने वाले के अंतरात्मा का आशीष पाओ। ~~~~~~~~~~~~~~~~~ ((((((( जय जय श्री राधे ))))))) ~~~~~~~~~~~~~~~~~

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Rakesh singla Jan 5, 2021

*न्यायधीश का दण्ड* 👉🏽अमेरिका में एक पंद्रह साल का लड़का था, स्टोर से चोरी करता हुआ पकड़ा गया। पकड़े जाने पर गार्ड की गिरफ्त से भागने की कोशिश में स्टोर का एक शेल्फ भी टूट गया। जज ने जुर्म सुना और लड़के से पूछा, "तुमने क्या सचमुच कुछ चुराया था ब्रैड और पनीर का पैकेट"? लड़के ने नीचे नज़रें कर के जवाब दिया। ;- हाँ' जज,:- 'क्यों ?' लड़का,:- मुझे ज़रूरत थी। जज:- 'खरीद लेते। लड़का:- पैसे नहीं थे।' जज:- घर वालों से ले लेते।' लड़का:- 'घर में सिर्फ मां है। बीमार और बेरोज़गार है, ब्रैड और पनीर भी उसी के लिए चुराई थी जज:- तुम कुछ काम नहीं करते ? लड़का:- *करता था एक कार वाश में। मां की देखभाल के लिए एक दिन की छुट्टी की थी, तो मुझे निकाल दिया गया।' जज:- तुम किसी से मदद मांग लेते? लड़का:- *सुबह से घर से निकला था, तकरीबन पचास लोगों के पास गया, बिल्कुल आख़िर में ये क़दम उठाया।* जिरह ख़त्म हुई, जज ने फैसला सुनाना शुरू किया, चोरी और ख़ुसूसन ब्रैड की चोरी बहुत शर्मनाक जुर्म है और इस जुर्म के हम सब ज़िम्मेदार हैं। 'अदालत में मौजूद हर शख़्स मुझ सहित सब मुजरिम हैं, इसलिए यहाँ मौजूद हर शख़्स पर दस-दस डालर का जुर्माना लगाया जाता है। दस डालर दिए बग़ैर कोई भी यहां से बाहर नहीं निकल सकेगा।' ये कह कर जज ने दस डालर अपनी जेब से बाहर निकाल कर रख दिए और फिर पेन उठाया लिखना शुरू किया:- इसके अलावा मैं स्टोर पर एक हज़ार डालर का जुर्माना करता हूं कि उसने एक भूखे बच्चे से ग़ैर इंसानी सुलूक करते हुए पुलिस के हवाले किया। अगर चौबीस घंटे में जुर्माना जमा नहीं किया तो कोर्ट स्टोर सील करने का हुक्म दे देगी।' जुर्माने की पूर्ण राशि इस लड़के को देकर कोर्ट उस लड़के से माफी तलब करती है। फैसला सुनने के बाद कोर्ट में मौजूद लोगों के आंखों से आंसू तो बरस ही रहे थे, उस लड़के के भी हिचकियां बंध गईं। वह लड़का बार बार जज को देख रहा था जो अपने आंसू छिपाते हुए बाहर निकल गये। क्या हमारा समाज, सिस्टम और अदालत इस तरह के निर्णय के लिए तैयार हैं? चाणक्य ने कहा है कि यदि कोई भूखा व्यक्ति रोटी चोरी करता पकड़ा जाए तो उस देश के लोगों को शर्म आनी चाहिए।

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Rakesh singla Jan 4, 2021

*।। तीन गुरु ।।* ☘🌸☘🌸☘🌸☘🌸☘🌸☘ *बहुत समय पहले की बात है, किसी नगर में एक बेहद प्रभावशाली महंत रहते थे। उन के पास शिक्षा लेने हेतु दूर दूर से शिष्य आते थे। एक दिन एक शिष्य ने महंत से सवाल किया, ” स्वामीजी आपके गुरु कौन है ? * आपने किस गुरु से शिक्षा प्राप्त की है ?” महंत शिष्य का सवाल सुन मुस्कुराए और बोले, ” मेरे हजारो गुरु हैं ! यदि मै उनके नाम गिनाने बैठ जाऊ तो शायद महीनों लग जाए। लेकिन फिर भी मै अपने तीन गुरुओं के बारे में तुम्हें जरुर बताऊंगा। मेरा पहला गुरु था एक चोर। एक बार में रास्ता भटक गया था और जब दूर किसी गाव में पंहुचा तो बहुत देर हो गयी थी। सब दुकाने और घर बंद हो चुके थे। लेकिन आख़िरकार मुझे एक आदमी मिला जो एक दीवार में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा था। मैंने उससे पूछा कि मैं कहां ठहर सकता हूं, तो वह बोला की आधी रात गए इस समय आपको कहीं कोई भी आसरा मिलना बहुत मुश्किल होगा, लेकिन आप चाहे तो मेरे साथ आज कि रात ठहर सकते हो। मैं एक चोर हूं और अगर एक चोर के साथ रहने में आपको कोई परेशानी नहीं होगी तो आप मेरे साथ रह सकते हैं। “वह इतना प्यारा आदमी था कि मैं उसके साथ एक रात कि जगह एक महीने तक रह गया ! वह हर रात मुझे कहता कि मैं अपने काम पर जाता हूं, आप आराम करो, प्रार्थना करो। जब वह काम से आता तो मैं उससे पूछता की कुछ मिला तुम्हें? तो वह कहता की आज तो कुछ नहीं मिला पर अगर भगवान ने चाहा तो जल्द ही जरुर कुछ मिलेगा। वह कभी निराश और उदास नहीं होता था, और हमेशा मस्त रहता था। कुछ दिन बाद मैं उसको धन्यवाद करके वापस आपने घर आ गया। जब मुझे ध्यान करते हुए सालों-साल बीत गए थे और कुछ भी नहीं हो रहा था तो कई बार ऐसे क्षण आते थे कि मैं बिलकुल हताश और निराश होकर साधना छोड़ लेने की ठान लेता था। और तब अचानक मुझे उस चोर की याद आती जो रोज कहता था कि भगवान ने चाहा तो जल्द ही कुछ जरुर मिलेगा और इस तरह मैं हमेशा अपना ध्यान लगता और साधना में लीन रहता। और मेरा दूसरा गुरु एक कुत्ता था। एक बहुत गर्मी वाले दिन मैं कही जा रहा था और मैं बहुत प्यासा था और पानी के तलाश में घूम रहा था कि सामने से एक कुत्ता दौड़ता हुआ आया। वह भी बहुत प्यासा था। पास ही एक नदी थी। उस कुत्ते ने आगे जाकर नदी में झांका तो उसे एक और कुत्ता पानी में नजर आया जो की उसकी अपनी ही परछाई थी। कुत्ता उसे देख बहुत डर गया। वह परछाई को देखकर भौंकता और पीछे हट जाता, लेकिन बहुत प्यास लगने के कारण वह वापस पानी के पास लौट आता। अंततः, अपने डर के बावजूद वह नदी में कूद पड़ा और उसके कूदते ही वह परछाई भी गायब हो गई। उस कुत्ते के इस साहस को देख मुझे एक बहुत बड़ी सिख मिल गई। अपने डर के बावजूद व्यक्ति को छलांग लगा लेनी होती है। सफलता उसे ही मिलती है जो व्यक्ति डर का साहस से मुकाबला करता है।” और मेरा तीसरा गुरु एक छोटा बच्चा है। मैं एक गांव से गुजर रहा था कि मैंने देखा एक छोटा बच्चा एक जलती हुई मोमबत्ती ले जा रहा था। वह पास के किसी मंदिर में मोमबत्ती रखने जा रहा था। मजाक में ही मैंने उससे पूछा की क्या यह मोमबत्ती तुमने जलाई है ? वह बोला, जी मैंने ही जलाई है। तो मैंने उससे कहा की एक क्षण था जब यह मोमबत्ती बुझी हुई थी और फिर एक क्षण आया जब यह मोमबत्ती जल गई। क्या तुम मुझे वह स्त्रोत दिखा सकते हो जहां से वह ज्योति आई? ”वह बच्चा हँसा और मोमबत्ती को फूंख मारकर बुझाते हुए बोला, अब आपने ज्योति को जाते हुए देखा है। कहां गई वह ? आप ही मुझे बताइए।“ “मेरा अहंकार चकनाचूर हो गया, मेरा ज्ञान जाता रहा। और उस क्षण मुझे अपनी ही मूढ़ता का एहसास हुआ। तब से मैंने कोरे ज्ञान से हाथ धो लिए। “ मित्रों, शिष्य होने का अर्थ क्या है ? शिष्य होने का अर्थ है पुरे अस्तित्व के प्रति खुले होना। हर समय हर ओर से सीखने को तैयार रहना। कभी किसी कि बात का बुरा नहीं मानना चाहिए, किसी भी इंसान की कही हुई बात को ठंडे दिमाग से एकांत में बैठकर सोचना चाहिए की उसने क्या क्या कहा और क्यों कहा तब उसकी कही बातों से अपनी कि हुई गलतियों को समझे और अपनी कमियों को दूर करें। जीवन का हर क्षण, हमें कुछ न कुछ सीखने का मौका देता है। हमें जीवन में हमेशा एक शिष्य बनकर अच्छी बातों को सीखते रहना चाहिए। *यह जीवन हमें आये दिन किसी न किसी रूप में किसी गुरु से मिलाता रहता है , यह हम पर निर्भर करता है कि क्या हम उस महंत की तरह एक शिष्य बनकर उस गुरु से मिलने वाली शिक्षा को ग्रहण कर पा रहे हैं की नहीं..!!* ☘🌸☘🌸☘🌸☘🌸☘🌸☘ *सदैव प्रसन्न रहें...* 😊🙏 *कभी अपने लिए तो कभी अपनों के लिए...*

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Rakesh singla Dec 22, 2020

12 बातें जो हर सनातन धर्म अनुयायी को ध्यान रखनी चाहिए। 1. क्या भगवान राम या भगवान कृष्ण कभी इंग्लैंड के *house of lord* के सदस्य रहे थे ? नहीं ना... तो फिर ये क्या ~Lord Rama, Lord Krishna~ लगा रखा है ? सीधे सीधे *भगवान राम, भगवान कृष्ण* कहिये - अंग्रेजी में भी । 2. किसी की मृत्यु होने पर ~RIP~ बिलकुल मत कहिये। यानी rest in peace जो दफ़नाने वालों के लिए कहा जाता है। आप कहिये - *"ओम शांति"*, अथवा *"मोक्ष प्राप्ति हो"* ! आत्मा कभी एक स्थान पर _आराम या विश्राम नहीं करती ! आत्मा का पुनर्जन्म होता है अथवा उसे मोक्ष मिलता है !_ 3. अपने रामायण एवं महाभारत जैसे ग्रंथों को कभी भी ~mythological~ मत कहियेगा ! *"mythological" शब्द बना है "myth" से और "myth" शब्द बना है हिंदी के "मिथ्या" शब्द से।* *"मिथ्या" अर्थात 'झूठा' या 'जिसका कोई अस्तित्व ना हो'* और हमारे सभी देवी देवता, राम और कृष्ण *वास्तविक रूप में प्रकट हुए हैं* ये हमारा *गौरवशाली इतिहास* है और *राम एवं कृष्ण* हमारे ऐतिहासिक देवपुरुष हैं , _कोई ~mythological कलाकार~ नहीं !_ 4. _अपने इष्ट देवों का नाम आदर सहित लें। उनका मज़ाक न बनने दें !_ 5. हमारें मंदिरों को ~प्रार्थनागृह~ न कहें ! मंदिर *देवालय* होते हैं। _भगवान के निवासगृह_ ! वह ~प्रार्थनागृह~ नहीं होते ! _मंदिर में केवल प्रार्थना नहीं होती ! अन्य पूजा पद्धति में सिर्फ साप्ताहिक प्रार्थना होती है, जबकि हिंदू धर्म में ये नित्य कर्म है।_ 6. अपने बच्चों के जन्मदिन पर दीप ~बुझा~ के अपशकुन न करें ! अग्निदेव को न बुझाएँ ! *दीप प्रज्ज्वलित करना अर्थात प्रकाश का संचार करना* अपितु बच्चों को दीप की प्रार्थना सिखायें *"तमसो मा ज्योतिर्गमय"* ( _हे अग्नि देवता, मुझे अंधेरे से उजाले की ओर जाने का रास्ता बताएँ_ ) ये सारे प्रतीक बच्चों के मस्तिष्क में गहरा असर करते हैं ! 7. कृपया ~spirituality~ और ~materialistic~ जैसे शब्दों का उपयोग करने से बचें ! _हिंदूओं के लिये सारा विश्व दिव्यत्व से भरा है !_ ~spirituality~ और ~materialistic~ जैसे शब्द अनेक वर्ष पहले यूरोप से यहाँ आये जिन्होंने चर्च और सत्ता में फर्क किया था - या विज्ञान और धर्म में ! _इसके विपरीत भारतवर्ष में ऋषि मुनि हमारे पहले वैज्ञानिक थे और सनातन धर्म का मूल विज्ञान में ही है ! यंत्र, तंत्र, एवं मंत्र यह हमारे धर्म का ही हिस्सा हैं !_ 8. ~"Sin"~ इस शब्द के स्थान पर "पाप" शब्द का प्रयोग करें ! हम हिंदूओं में केवल *धर्म* ( कर्तव्यपरायणता, न्याय, एवं प्राप्त अधिकार ) और *अधर्म* (जब धर्म पालन न हो) है ! _पाप अधर्म का हिस्सा है !_ 9. ध्यान के लिये ~'meditation'~ एवं प्राणायाम के लिये ~'breathing exercise'~ इन संज्ञाओं का प्रयोग न करें ! _यह बिलकुल विपरीत अर्थ ध्वनित करते हैं !_ 10. क्या आप भगवान से डरते हैं ? नहीं ना , डरना भी नहीं चाहिए, *क्योंकि भगवान तो चराचर में विद्यमान हैं*। अजन्मा, परोपकारी, न्यायकारी और सर्वशक्तिमान हैं ! इतना ही नहीं हम मे स्वयं भगवान मौजुद हैं ! तो फिर अपने आपको ~"God fearing"~ अर्थात ~भगवान से डरने वाला~ मत कहिये ! *God believer या भगवान में विश्वास रखने वाला कहिए* 11. कभी भी किसी को बधाई देनी हो तो 'बधाई' या 'शुभकामनाएँ' शब्द का प्रयोग कीजिये और बधाई स्वीकार करनी हो तो धन्यवाद शब्द प्रयोग कीजिये। ~मुबारक और शुक्रिया~ शब्द का प्रयोग न किया जाए क्योंकि इनके अर्थ अलग हैं । 12. हिन्दुओं में 7 फेरे लेकर विवाह किया जाता है। कोई कॉन्ट्रैक्ट का विवाह नहीं होता। इसलिए TV आदि फिल्में देखकर देखकर भेड़चाल में अपनी धर्मपत्नी को ~बीवी~ मत कहिए। यदि आप उन्हें अपनी जीवन संगिनी मानते हैं तो पत्नी शब्द प्रयोग कीजिये। यदि आप उनको कॉन्ट्रैक्ट के साथ ब्याह कर लाये हैं तो आप बीवी कह सकते हैं । ध्यान रहे, विश्व में केवल उनका सम्मान होता है जो स्वयं का सम्मान करते है ! मेरी पोस्ट किसी के विरुद्ध नहीं है, ये बस अपनी सनातन संस्कृति के लिए आदर है। *सनातन धर्म के मान के लिए, सम्मान बढ़ाने के लिए इन विचारों को अपने सभी मित्रों एवं संबंधियों के साथ अवश्य ही साझा (share) करें और अपने हिन्दू होने पर गर्व और गौरव करें.....* *।।मर्यादापुरुषोत्तम श्री राम चन्द्र जी की जय।।* *।।योगिराज श्री कृष्ण महाराज की जय।।* 🙏🚩🚩🙏

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Rakesh singla Dec 16, 2020

👉 सुंदर सीख 👈 एक दिन स्कूल में छुट्टी की घोषणा होने के कारण, एक दर्जी का बेटा, अपने पापा की दुकान पर चला गया । वहाँ जाकर वह बड़े ध्यान से अपने पापा को काम करते हुए देखने लगा । उसने देखा कि उसके पापा कैंची से कपड़े को काटते हैं और कैंची को पैर के पास टांग से दबाकर रख देते हैं । फिर सुई से उसको सीते हैं और सीने के बाद सुई को अपनी टोपी पर लगा लेते हैं । जब उसने इसी क्रिया को चार-पाँच बार देखा तो उससे रहा नहीं गया, तो उसने अपने पापा से कहा कि वह एक बात उनसे पूछना चाहता है ? पापा ने कहा- बेटा बोलो, क्या पूछना चाहते हो ? बेटा बोला- पापा, मैं बड़ी देर से आपको देख रहा हूं, आप जब भी कपड़ा काटते हैं, उसके बाद कैंची को पैर के नीचे दबा देते हैं, और सुई से कपड़ा सीने के बाद, उसे टोपी पर लगा लेते हैं, ऐसा क्यों ? इसका जो उत्तर पापा ने दिया- उन दो पंक्तियाँ में मानों उसने ज़िन्दगी का सार समझा दिया। उत्तर था- ”बेटा, कैंची काटने का काम करती है और सुई जोड़ने का काम करती है। काटनेवाले की जगह हमेशा नीची होती है परन्तु जोड़नेवाले की जगह हमेशा ऊपर होती है । यही कारण है कि मैं सुई को टोपी पर लगाता हूं और कैंची को पैर के नीचे रखता हूं ।” इसलिये अगर जीवन में ऊँचाइयाँ छूना हो तो, जोड़नेवाले बने तोड़नेवाले नहीं।🙏

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Rakesh singla Dec 13, 2020

कार्तिक महीने में एक बुढिया माई तुलसीजी को सींचती और कहती कि, हे तुलसी माता! सत् की दाता मैं तेरा बिडला सीचती हूँ, मुझे बहु दे, पीताम्बर की धोती दे, मीठा मीठा गास दे, बैकुंठा में वास दे, चटक की चाल दे, पटक की मौत दे, चंदन का काठ दे, रानी सा राज दे, दाल भात का भोजन दे, ग्यारस की मौत दे, कृष्ण जी का कन्धा दे। तुलसी माता यह सुनकर सूखने लगी तो भगवान ने पूछा कि, हे तुलसी! तुम क्यों सूख़ रही हो? तुलसी माता ने कहा कि एक बुढिया रोज आती है और यही बात कह जाती है। मैं सब बात तो पूरा कर दूँगी लेकिन कृष्ण का कन्धा कहां से लाऊंगी? भगवान बोले - जब वो मरेगी तो मैं अपने आप कंधा दे आऊंगा। तू बुढिया माई से कह देना। बाद में बुढिया माई मर गई। सब लोग आ गये। जब माई को ले जाने लगे तो वह किसी से न उठी। तब भगवान एक बारह बरस के बालक का रूप धारण करके आये। बालक ने कहा, मैं कान में एक बात कहूँगा तो बुढिया माई उठ जाएगी। बालक ने कान में कहा, बुढिया माई मन की निकाल ले, पीताम्बर की धोती ले, मीठा मीठा गास ले, बैंकुंठा का वास ले, चटक की चल ले, पटक की मौत ले, कृष्ण जी का कन्धा ले! यह सुनकर बुढिया माई हल्की हो गई। भगवान ने कन्धा दिया और बुढिया माई को मुक्ति मिल गयी। हे तुलसी माता! जैसे बुढिया माई को मुक्ति दी वैसे सबको देना🙌🏻🙌🏻🙏🌹 पोस्ट कॉपी पेस्ट। 🌹जय मां तुलसी।🌹🙏

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