Rajput Indra Apr 12, 2021

EXCELLENT INFO ABOUT SRI KRISHNA 1) Krishna was born *5252 years ago* 2) Date of *Birth* : *18 th July,3228 B.C* 3) Month : *Shravan* 4) Day : *Ashtami* 5) Nakshatra : *Rohini* 6) Day : *Wednesday* 7) Time : *00:00 A.M.* 8) Shri Krishna *lived 125 years, 08 months & 07 days.* 9) Date of *Death* : *18th February 3102BC.* 10) When Krishna was *89 years old* ; the mega war *(Kurukshetra war)* took place. 11) He died *36 years after the Kurukshetra* war. 12) Kurukshetra War was *started on Mrigashira Shukla Ekadashi, BC 3139. i.e "8th December 3139BC" and ended on "25th December, 3139BC".* 12) There was a *Solar eclipse between "3p.m to 5p.m on 21st December, 3139BC" ; cause of Jayadrath's death.* 13) Bhishma died on *2nd February,(First Ekadasi of the Uttarayana), in 3138 B.C.* 14) Krishna is worshipped as: (a)Krishna *Kanhaiyya* : *Mathura* (b) *Jagannath*:- In *Odisha* (c) *Vithoba*:- In *Maharashtra* (d) *Srinath*: In *Rajasthan* (e) *Dwarakadheesh*: In *Gujarat* (f) *Ranchhod*: In *Gujarat* (g) *Krishna* : *Udupi in Karnataka* h) *Guruvayurappan in Kerala* 15) *Bilological Father*: *Vasudeva* 16) *Biological Mother*: *Devaki* 17) *Adopted Father*:- *Nanda* 18) *Adopted Mother*: *Yashoda* 19 *Elder Brother*: *Balaram* 20) *Sister*: *Subhadra* 21) *Birth Place*: *Mathura* 22) *Wives*: *Rukmini, Satyabhama, Jambavati, Kalindi, Mitravinda, Nagnajiti, Bhadra, Lakshmana* 23) Krishna is reported to have *Killed only 4 people* in his life time. (i) *Chanoora* ; the Wrestler (ii) *Kamsa* ; his maternal uncle (iii) & (iv) *Shishupaala and Dantavakra* ; his cousins. 24) Life was not fair to him at all. His *mother* was from *Ugra clan*, and *Father* from *Yadava clan,* inter-racial marriage. 25) He was *born dark skinned.* He was not named at all throughout his life. The whole village of Gokul started calling him the black one ; *Kanha*. He was ridiculed and teased for being black, short and adopted too. His childhood was wrought with life threatening situations. 26) *'Drought' and "threat of wild wolves" made them shift from 'Gokul' to 'Vrindavan' at the age 9.* 27) He stayed in Vrindavan *till 14~16 years*. He killed his own uncle at the age of 14~16 years at Mathura.He then released his biological mother and father. 28) He *never returned to Vrindavan ever again.* 29) He had to *migrate to Dwaraka from Mathura due to threat of a Sindhu King ; Kala Yaavana.* 30) He *defeated 'Jarasandha' with the help of 'Vainatheya' Tribes on Gomantaka hill (now Goa).* 31) He *rebuilt Dwaraka*. 32) He then *left to Sandipani's Ashram in Ujjain* to start his schooling at age 16~18. 33) He had to *fight the pirates from Afrika and rescue his teachers son ; Punardatta*; who *was kidnapped near Prabhasa* ; a sea port in Gujarat. 34) After his education, he came to know about his cousins fate of Vanvas. He came to their rescue in ''Wax house'' and later his cousins got married to *Draupadi.* His role was immense in this saga. 35) Then, he helped his cousins establish Indraprastha and their Kingdom. 36) He *saved Draupadi from embarrassment.* 37) He *stood by his cousins during their exile.* 38) He stood by them and *made them win the Kurushetra war.* 39) He *saw his cherished city, Dwaraka washed away.* 40) He was *killed by a hunter (Jara by name)* in nearby forest. 41) He never did any miracles. His life was not a successful one. There was not a single moment when he was at peace throughout his life. At every turn, he had challenges and even more bigger challenges. 42) He *faced everything and everyone with a sense of responsibility and yet remained unattached.* 43) He is the *only person, who knew the past and probably future ; yet he lived at that present moment always.* 44) He and his life is truly *an example for every human being.*🌷🙏🏻 Jai Shri Krishna

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Rajput Indra Apr 10, 2021

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Rajput Indra Apr 10, 2021

#काल_का_इशारा ■■■◆◆■■◆◆■■◆◆ एक चतुर व्यक्ति को काल से बहुत डर लगता था, एक दिन उसे चतुराई सूझी और काल को अपना मित्र बना लिया। उसने अपने मित्र काल से कहा- मित्र, तुम किसी को भी नहीं छोड़ते हो, किसी दिन मुझे भी गाल में धर लोगो! काल ने कहा- ये मृत्यु लोक है. जो आया है उसे मरना ही है सृष्टि का यह शाश्वत नियम है इसलिए मैं मजबूर हूं, पर तुम मित्र हो इसलिए मैं जितनी रियायत कर सकता हूं करूंगा ही मुझसे क्या आशा रखते हो साफ-साफ कहो व्यक्ति ने कहा- मित्र मैं इतना ही चाहता हूं कि आप मुझे अपने लोक ले जाने के लिए आने से कुछ दिन पहले एक पत्र अवश्य लिख देना ताकि मैं अपने बाल- बच्चों को कारोबार की सभी बातें अच्छी तरह से समझा दूं और स्वयं भी भगवान भजन में लग जाऊं। काल ने प्रेम से कहा- यह कौन सी बड़ी बात है, मैं एक नहीं आपको चार पत्र भेज दूंगा चिंता मत करो चारों पत्रों के बीच समय भी अच्छा खासा दूंगा ताकि तुम सचेत होकर काम निपटा लो। मनुष्य बड़ा प्रसन्न हुआ सोचने लगा कि आज से मेरे मन से काल का भय भी निकल गया, मैं जाने से पूर्व अपने सभी कार्य पूर्ण करके जाऊंगा तो देवता भी मेरा स्वागत करेंगे। दिन बीतते गये आखिर मृत्यु की घड़ी आ पहुंची काल अपने दूतों सहित उसके समीप आकर बोला- मित्र अब समय पूरा हुआ मेरे साथ चलिए मैं सत्यता और दृढ़तापूर्वक अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करते हुए एक क्षण भी तुम्हें और यहां नहीं छोड़ूंगा। मनुष्य के माथे पर बल पड़ गए, भृकुटी तन गयी और कहने लगा- धिक्कार है तुम्हारे जैसे मित्रों पर मेरे साथ विश्वासघात करते हुए तुम्हें लज्जा नहीं आती? तुमने मुझे वचन दिया था कि लेने आने से पहले पत्र लिखूंगा. मुझे बड़ा दुःख है कि तुम बिना किसी सूचना के अचानक दूतों सहित मेरे ऊपर चढ़ आए. मित्रता तो दूर रही तुमने अपने वचनों को भी नहीं निभाया। काल हंसा और बोला- मित्र इतना झूठ तो न बोलो. मेरे सामने ही मुझे झूठा सिद्ध कर रहे हो मैंने आपको एक नहीं चार पत्र भेजे आपने एक भी उत्तर नहीं दिया। मनुष्य ने चौंककर पूछा – कौन से पत्र? कोई प्रमाण है? मुझे पत्र प्राप्त होने की कोई डाक रसीद आपके पास है तो दिखाओ। काल ने कहा – मित्र, घबराओ नहीं, मेरे चारों पत्र इस समय आपके पास मौजूद हैं। मेरा पहला पत्र आपके सिर पर चढ़कर बोला, आपके काले सुन्दर बालों को पकड़ कर उन्हें सफ़ेद कर दिया और यह भी कहा कि सावधान हो जाओ, जो करना है कर डालो। नाम, बड़ाई और धन-संग्रह के झंझटो को छोड़कर भजन में लग जाओ पर मेरे पत्र का आपके ऊपर जरा भी असर नहीं हुआ। बनावटी रंग लगा कर आपने अपने बालों को फिर से काला कर लिया और पुनः जवान बनने के सपनों में खो गए आज तक मेरे श्वेत अक्षर आपके सिर पर लिखे हुए हैं। कुछ दिन बाद मैंने दूसरा पत्र आपके नेत्रों के प्रति भेजा. नेत्रों की ज्योति मंद होने लगी। फिर भी आंखों पर मोटे शीशे चढ़ा कर आप जगत को देखने का प्रयत्न करने लगे दो मिनिट भी संसार की ओर से आंखे बंद करके, ज्योतिस्वरूप प्रभु का ध्यान मन में नहीं किया इतने पर भी सावधान नहीं हुए तो मुझे आपकी दीनदशा पर बहुत तरस आया और मित्रता के नाते मैंने तीसरा पत्र भी भेजा। इस पत्र ने आपके दांतो को छुआ, हिलाया और तोड़ दिया। आपने इस पत्र का भी जवाब न दिया बल्कि नकली दांत लगवाये और जबरदस्ती संसार के भौतिक पदार्थों का स्वाद लेने लगे। मुझे बहुत दुःख हुआ कि मैं सदा इसके भले की सोचता हूँ और यह हर बात एक नया, बनावटी रास्ता अपनाने को तैयार रहता है। अपने अन्तिम पत्र के रूप में मैंने रोग- क्लेश तथा पीड़ाओ को भेजा परन्तु आपने अहंकार वश सब अनसुना कर दिया। जब मनुष्य ने काल के भेजे हुए पत्रों को समझा तो फूट-फूट कर रोने लगा और अपने विपरीत कर्मो पर पश्चाताप करने लगा उसने स्वीकार किया कि मैंने गफलत में शुभ चेतावनी भरे इन पत्रों को नहीं पढ़ा मैं सदा यही सोचता रहा कि कल से भगवान का भजन करूंगा, अपनी कमाई अच्छे शुभ कार्यो में लगाऊंगा, पर वह कल नहीं आया। काल ने कहा – आज तक तुमने जो कुछ भी किया, राग-रंग, स्वार्थ और भोगों के लिए किया, जान-बूझकर ईश्वरीय नियमों को तोड़कर जो काम करता है, वह अक्षम्य है। मनुष्य को जब अपनी बातों से काम बनता नज़र नहीं आया तो उसने काल को करोड़ों की सम्पत्ति का लोभ दिखाया। काल ने हंसकर कहा- मित्र यह मेरे लिए धूल से अधिक कुछ भी नहीं है। धन-दौलत, शोहरत, सत्ता ये सब लोभ संसारी लोगो को वश में कर सकता है मुझे नहीं। मनुष्य ने पूछा- क्या कोई ऐसी वस्तु नहीं जो तुम्हें भी प्रिय हो जिससे तुम्हें लुभाया जा सके ऐसा कैसे हो सकता है! काल ने उत्तर दिया- यदि तुम मुझे लुभाना ही चाहते थे तो सच्चाई और शुभ कर्मो का धन संग्रह करते यह ऐसा धन है जिसके आगे मैं विवश हो सकता था, अपने निर्णय पर पुनर्विचार को बाध्य हो सकता था पर तुम्हारे पास तो यह धन धेले भर का भी नहीं है। तुम्हारे ये सारे रूपए-पैसे, जमीन-जायदाद, तिजोरी में जमा धन-संपत्ति सब यहीं छूट जाएगा, मेरे साथ तुम भी उसी प्रकार निवस्त्र जाओगे जैसे कोई भिखारी की आत्मा जाती है। काल ने जब मनुष्य की एक भी बात नहीं सुनी तो वह हाय-हाय करके रोने लगा। सभी सम्बन्धियों को पुकारा परन्तु काल ने उसके प्राण पकड़ लिए और चल पड़ा अपने गन्तव्य की ओर, काल ने कितनी बड़ी बात कही, एक ही सत्य है जो अटल है वह है कि हम एक दिन मरेेंगे जरूर, हम जीवन में कितनी दौलत जमा करेंगे, कितनी शोहरत पाएंगे, कैसी संतान होगी यह सब अनिश्चित होता है, समय के गर्भ में छुपा होता है. परंतु हम मरेगे एक दिन बस यही एक ही बात जन्म के साथ ही तय हो जाती है। ध्रुव सत्य है मृ्त्यु काल कभी भी दस्तक दे सकता है। प्रतिदिन उसकी तैयारी करनी होगी। समय के साथ उम्र की निशानियों को देख कर तो कम से कम हमें प्रभु परमेश्वर की याद में रहने का अभ्यास करना चाहिए और अभी तो कलयुग का अन्तिम समय है इस में तो हर एक को चाहे छोटा हो या बड़ा सब को प्रभु परमेश्वर की याद में रहकर ही कर्म करने हैं।

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Rajput Indra Apr 9, 2021

👍🏻 *ओशो* गजब का *ज्ञान* दे गये, *कोरोना* जैसी *जगत बिमारी* के लिए *70* के *दशक* में *हैजा* भी *महामारी* के रूप में पूरे *विश्व* में फैला था, तब *अमेरिका* में किसी ने *ओशो रजनीश जी* से प्रश्न किया -"इस *महामारी* से कैसे बचे ?" *ओशो* ने विस्तार से जो समझाया वो आज *कोरोना* के सम्बंध में भी बिल्कुल *प्रासंगिक* है। *ओशो* "यह *प्रश्न* ही आप *गलत* पूछ रहे हैं, *प्रश्न* ऐसा होना चाहिए था कि *महामारी* के कारण मेरे मन में *मरने का जो डर बैठ गया है* उसके सम्बन्ध में कुछ कहिए! इस *डर* से कैसे बचा जाए...? क्योंकि *वायरस* से *बचना* तो बहुत ही *आसान* है, लेकिन जो *डर* आपके और *दुनिया* के *अधिकतर लोगों* के *भीतर* बैठ गया है, उससे *बचना* बहुत ही *मुश्किल* है। अब इस *महामारी* से कम लोग, इसके *डर* के कारण लोग ज्यादा *मरेंगे*.......। *’डर’* से ज्यादा खतरनाक इस *दुनिया* में कोई भी *वायरस* नहीं है। इस *डर* को समझिये, अन्यथा *मौत* से पहले ही आप एक *जिंदा* लाश बन जाएँगे। यह जो *भयावह माहौल* आप अभी देख रहे हैं, इसका *वायरस* आदि से कोई *लेना* *देना* नहीं है। यह एक *सामूहिक पागलपन* है, जो एक *अन्तराल* के बाद हमेशा घटता रहता है, कारण *बदलते* रहते हैं, कभी *सरकारों की प्रतिस्पर्धा*, कभी *कच्चे तेल की कीमतें*, कभी *दो देशों की लड़ाई*, तो कभी *जैविक हथियारों की टेस्टिंग*!! इस तरह का *सामूहिक* *पागलपन* समय-समय पर *प्रगट* होता रहता है। *व्यक्तिगत पागलपन* की तरह *कौमगत*, *राज्यगत*, *देशगत* और *वैश्विक* *पागलपन* भी होता है। इस में *बहुत* से लोग या तो हमेशा के लिए *विक्षिप्त* हो जाते हैं या फिर *मर* जाते हैं । ऐसा पहले भी *हजारों* बार हुआ है, और आगे भी होता रहेगा और आप देखेंगे कि आने वाले बरसों में युद्ध *तोपों* से नहीं बल्कि *जैविक हथियारों* से लड़ें जाएंगे। 🌹मैं फिर कहता हूं हर समस्या *मूर्ख* के लिए *डर* होती है, जबकि *ज्ञानी* के लिए *अवसर*!! इस *महामारी* में आप *घर* बैठिए, *पुस्तकें पढ़िए*, शरीर को कष्ट दीजिए और *व्यायाम* कीजिये, *फिल्में* देखिये, *योग* कीजिये और एक माह में *15* किलो वजन घटाइए, चेहरे पर बच्चों जैसी ताजगी लाइये अपने *शौक़* पूरे कीजिए। मुझे अगर *15* दिन घर बैठने को कहा जाए तो में इन *15* दिनों में *30* पुस्तकें पढूंगा और नहीं तो एक *बुक* लिख डालिये, इस *महामन्दी* में पैसा *इन्वेस्ट* कीजिये, ये अवसर है जो *बीस तीस* साल में एक बार आता है *पैसा* बनाने की सोचिए....क्युं बीमारी की बात करके वक्त बर्बाद करते हैं... ये *’भय और भीड़’* का मनोविज्ञान सब के समझ नहीं आता है। *’डर’* में रस लेना बंद कीजिए... आमतौर पर हर आदमी *डर* में थोड़ा बहुत रस लेता है, अगर *डरने* में मजा नहीं आता तो लोग *भूतहा* फिल्म देखने क्यों जाते? ☘ यह सिर्फ़ एक *सामूहिक पागलपन* है जो *अखबारों* और *TV* के माध्यम से *भीड़* को बेचा जा रहा है... लेकिन *सामूहिक पागलपन* के *क्षण* में आपकी *मालकियत छिन* सकती है...आप *महामारी* से *डरते* हैं तो आप भी *भीड़* का ही हिस्सा है *ओशो* कहते है...TV पर खबरे सुनना या *अखबार* पढ़ना बंद करें ऐसा कोई भी *विडियो* या *न्यूज़* मत देखिये जिससे आपके भीतर *डर* पैदा हो... *महामारी* के बारे में बात करना *बंद* कर दीजिए, *डर* भी एक तरह का *आत्म-सम्मोहन* ही है। एक ही तरह के *विचार* को बार-बार *घोकने* से *शरीर* के भीतर *रासायनिक* बदलाव होने लगता है और यह *रासायनिक* बदलाव कभी कभी इतना *जहरीला* हो सकता है कि आपकी *जान* भी ले ले; *महामारी* के अलावा भी बहुत कुछ *दुनिया* में हो रहा है, उन पर *ध्यान* दीजिए; *ध्यान-साधना* से *साधक* के चारों तरफ एक *प्रोटेक्टिव Aura* बन जाता है, जो *बाहर* की *नकारात्मक उर्जा* को उसके भीतर *प्रवेश* नहीं करने देता है, अभी पूरी *दुनिया की उर्जा* *नाकारात्मक* हो चुकी है....... ऐसे में आप कभी भी इस *ब्लैक-होल* में गिर सकते हैं....ध्यान की *नाव* में बैठ कर हीं आप इस *झंझावात* से बच सकते हैं। *शास्त्रों* का *अध्ययन* कीजिए, *साधू-संगत* कीजिए, और *साधना* कीजिए, *विद्वानों* से सीखें *आहार* का भी *विशेष* ध्यान रखिए, *स्वच्छ* *जल* पीए, *अंतिम बात:* *धीरज* रखिए... *जल्द* ही सब कुछ *बदल* जाएगा....... जब तक *मौत* आ ही न जाए, तब तक उससे *डरने* की कोई ज़रूरत नहीं है और जो *अपरिहार्य* है उससे *डरने* का कोई *अर्थ* भी नहीं है, *डर* एक प्रकार की *मूढ़ता* है, अगर किसी *महामारी* से अभी नहीं भी मरे तो भी एक न एक दिन मरना ही होगा, और वो एक दिन कोई भी दिन हो सकता है, इसलिए *विद्वानों* की तरह *जीयें*, *भीड़* की तरह नहीं!!" -: *ओशो* :- ❤️*🌷जय सियाराम🌷* *🌹जय जलाराम🌹*

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Rajput Indra Apr 9, 2021

*भगवान् कृष्ण ने जब देह छोड़ा* तो उनका अंतिम संस्कार किया गया , *उनका सारा शरीर तो पांच तत्त्व में मिल गया* लेकिन उनका हृदय बिलकुल सामान्य एक जिन्दा आदमी की तरह धड़क रहा था *और वो बिलकुल सुरक्षित था ,* उनका हृदय आज तक सुरक्षित है *जो भगवान् जगन्नाथ की काठ की मूर्ति के अंदर रहता है* और उसी तरह धड़कता है , *ये बात बहुत कम लोगो को पता है* महाप्रभु का महा रहस्य सोने की झाड़ू से होती है सफाई...... *महाप्रभु जगन्नाथ(श्री कृष्ण) को कलियुग का भगवान भी कहते है....* पुरी(उड़ीसा) में जग्गनाथ स्वामी अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलराम के साथ निवास करते है... *मगर रहस्य ऐसे है* कि आजतक कोई न जान पाया *हर 12 साल में महाप्रभु की मूर्ती को बदला जाता है,* उस समय पूरे पुरी शहर में ब्लैकआउट किया जाता है *यानी पूरे शहर की लाइट बंद की जाती है।* लाइट बंद होने के बाद मंदिर परिसर को crpf की सेना चारो तरफ से घेर लेती है... *उस समय कोई भी मंदिर में नही जा सकता...* मंदिर के अंदर घना अंधेरा रहता है... *पुजारी की आँखों मे पट्टी बंधी होती है...* पुजारी के हाथ मे दस्ताने होते है.. *वो पुरानी मूर्ती से "ब्रह्म पदार्थ" निकालता है* और नई मूर्ती में डाल देता है... *ये ब्रह्म पदार्थ क्या है* आजतक किसी को नही पता... *इसे आजतक किसी ने नही देखा. ..* हज़ारो सालो से ये एक मूर्ती से दूसरी मूर्ती में ट्रांसफर किया जा रहा है... *ये एक अलौकिक पदार्थ है* जिसको छूने मात्र से किसी इंसान के जिस्म के चिथड़े उड़ जाए... *इस ब्रह्म पदार्थ का संबंध भगवान श्री कृष्ण से है...* मगर ये क्या है ,कोई नही जानता... *ये पूरी प्रक्रिया हर 12 साल में एक बार होती है...* उस समय सुरक्षा बहुत ज्यादा होती है... *मगर आजतक कोई भी पुजारी ये नही बता पाया* महाप्रभु जगन्नाथ की मूर्ती में आखिर ऐसा क्या है ??? *कुछ पुजारियों का कहना है* कि जब हमने उसे हाथ मे लिया तो खरगोश जैसा उछल रहा था... *आंखों में पट्टी थी...हाथ मे दस्ताने थे* तो हम सिर्फ महसूस कर पाए... *आज भी हर साल जगन्नाथ यात्रा के* उपलक्ष्य में सोने की झाड़ू से पुरी के राजा खुद झाड़ू लगाने आते है... *भगवान जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार से* पहला कदम अंदर रखते ही समुद्र की लहरों की आवाज अंदर सुनाई नहीं देती, *जबकि आश्चर्य में डाल देने वाली बात यह है* कि जैसे ही आप मंदिर से एक कदम बाहर रखेंगे, *वैसे ही समुद्र की आवाज सुनाई देंगी* आपने ज्यादातर मंदिरों के शिखर पर पक्षी बैठे-उड़ते देखे होंगे, *लेकिन जगन्नाथ मंदिर के ऊपर से कोई पक्षी नहीं गुजरता।* झंडा हमेशा हवा की उल्टी दिशामे लहराता है *दिन में किसी भी समय* भगवान जगन्नाथ मंदिर के मुख्य शिखर की परछाई नहीं बनती। *भगवान जगन्नाथ मंदिर के 45 मंजिला शिखर पर* स्थित झंडे को रोज बदला जाता है, *ऐसी मान्यता है कि अगर एक दिन भी झंडा नहीं बदला गया* तो मंदिर 18 सालों के लिए बंद हो जाएगा *इसी तरह भगवान जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर एक सुदर्शन चक्र भी है,* जो हर दिशा से देखने पर आपके मुंह आपकी तरफ दीखता है। *भगवान जगन्नाथ मंदिर की रसोई में* प्रसाद पकाने के लिए मिट्टी के 7 बर्तन एक-दूसरे के ऊपर रखे जाते हैं, *जिसे लकड़ी की आग से ही पकाया जाता है,* इस दौरान सबसे ऊपर रखे बर्तन का पकवान पहले पकता है। *भगवान जगन्नाथ मंदिर में हर दिन बनने वाला* प्रसाद भक्तों के लिए कभी कम नहीं पड़ता, *लेकिन हैरान करने वाली बात ये है* कि जैसे ही मंदिर के पट बंद होते हैं *वैसे ही प्रसाद भी खत्म हो जाता है।* ये सब बड़े आश्चर्य की बात हैं.. *🚩 जय श्री जगन्नाथ 🚩* 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 🙏🙏 जय श्री कृष्णा *ॐ नमः भगवतेय वासुदेवाय नमः* हर वक्त हरे कृष्णा ओर इस महामंत्र का जाप करते रहिऐ *108 *बार* हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे *राधे राधे जी* 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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Rajput Indra Apr 8, 2021

*कृष्ण के प्रति आसक्ति बनाना , परिवार के प्रति आसक्ति ....* अतः “गृहेषु सक्तस्य" आमतौर पर लोग पारिवारिक जीवन से बहुत अधिक आसक्त होते हैं । मैं कभी कभी कहता हूँ कि पश्चिमी देशों में जो युवा लड़के हैं , वे कृष्ण भावनामृत में आते हैं उनकी केवल एक बड़ी संपत्ति यह है कि वे पारिवारिक रूप से आसक्त नहीं होते हैं । यह बहुत अच्छी योग्यता है । किसी न किसी तरह , वे बन गए हैं । इसलिए कृष्ण के प्रति उनकी आसक्ति द्रढ हो गई है । भारत में उन्हें संगठित पारिवारिक आसक्ति है । उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं है । वे अब पैसे के पीछे पड़े हैं । यह मैंने अनुभव किया है । हाँ । तो परिवार से आसक्ति , कृष्णभावनामृत में आगे बढ़ने के मामले में सबसे बड़ी बाधा है । लेकिन यदि पूरा परिवार कृष्ण भावनाभावित है , तो यह बहुत अच्छा है । [ ... ] यदि परिवार के अनुसार , हर कोई कृष्ण की सेवा में लगा हुआ है , तो यह बहुत अच्छा है । वह साधारण परिवार नहीं है । वह आसक्ति साधारण आसक्ति नहीं है । लेकिन आम तौर पर लोग भौतिक रूप से आसक्त होते हैं । जिसकी यहाँ निंदा की जाती है । [ ... ] हर कोई सोच रहा है कि " मेरा परिवार , मेरी पत्नी , मेरे बच्चे , मेरा राष्ट्र , मेरा समुदाय , यही सब कुछ है । कृष्ण क्या है ? यह माया द्वारा थोपा गया सबसे बड़ा भ्रम है । लेकिन कोई भी आपको सुरक्षा देने में सक्षम नहीं होगा । सबकुछ खत्म हो जाएगा । कृष्ण को छोड़कर कोई भी व्यक्ति हमें कोई सुरक्षा नहीं दे सकता । यदि हम माया - जनम - मत्यु - जरा व्याधि [ भ.गी. १३.९ ] के चंगुल से मुक्त होना चाहते हैं तो हमें आध्यात्मिक गुरु के माध्यम से कृष्ण के चरण कमलों का आश्रय लेना चाहिए और उन भक्तों के साथ रहना चाहिए जिन्होंने स्वयं को इसी उद्देश्य के लिए लगाया है । *-( २४ जुन १ ९ ७६ , वृन्दावन )* ____________________________________ -Srila Prabhupada #League Of Devotees

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Rajput Indra Apr 7, 2021

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