rajni kundra Jan 22, 2020

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rajni kundra Jan 21, 2020

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rajni kundra Jan 20, 2020

कवि गालिब को एक दफा बहादुरशाह ने भोजन का निमंत्रण दिया था। गालिब था गरीब आदमी। और अब तक ऐसी दुनिया नहीं बन सकी कि कवि के पास भी खाने-पीने को पैसा हो सके। अच्छे आदमी को रोजी जुटानी अभी भी बहुत मुश्किल है। गालिब तो गरीब आदमी थे। कविताएं लिखी थीं, ऊँची कविताएं लिखने से क्या होता है? कपड़े उसके फटे-पुराने थे। मित्रों ने कहा, बादशाह के यहां इन कपड़ों से नहीं चलेगा। क्योंकि बादशाहों के महल में तो कपड़े पहचाने जाते हैं। हम उधार कपड़े ला देते हैं, तुम उन्हें पहनकर चले जाओ। जरा आदमी तो मालूम पड़ोगे। गालिब ने कहा, 'उधार कपड़े! यह तो बडी बुरी बात होगी कि मैं किसी और के कपड़े पहनकर जाऊं। मैं जैसा हूं, ठीक हूं। किसी और के कपड़े पहनने से क्या फर्क पड़ जायेगा? मैं तो वही रहूंगा।' मित्रों ने कहा, 'छोड़ो भी यह फिलासफी की बातें। इन सब बातों से वहां नहीं चलेगा। हो सकता है, पहरेदार वापस लौटा दें! इन कपड़ो में तो भिखमंगों जैसा मालूम पड़ते हो। ' ?' गालिब ने कहा, मैं तो जैसा हूं हूं। गालिब को बुलाया है कपड़ों को तो नहीं बुलाया? तो गालिब जायेगा। ......नासमझ था-कहना चाहिए, नादान, नहीं माना गालिब, और चला गया। दरवाजे पर द्वारपाल ने बंदूक आड़ी कर दी। पूछा कि, कहां भीतर जा रहे हो? 'गालिब ने कहा, 'मैं महाकवि गालिब हूं। सुना है नाम कभी? सम्राट ने बुलाया है-सम्राट का मित्र हूं, भोजन पर बुलाया है। द्वारपाल ने कहा- 'हटो रास्ते से। दिन भर में जो भी आता है, अपने को सम्राट का मित्र बताता है! हटो।। नहीं तो उठाकर बंद करवा दूंगा।' गालिब ने कहा, 'क्या कहते हो, मुझे पहचानते नहीं? ''द्वारपाल ने कहा, 'तुम्हारे कपड़े बता रहे है तुम कौन हो! फटे जूते बता रहे हैं कि तुम कौन हो! शक्ल देखी है कभी आइने में कि तुम कौन है?' गालिब दुखी होकर वापस लौट आया। मित्रों से उसने कहा, 'तुम ठीक ही कहते थे, वहां कपड़े पहचान जाते हैं। ले आओ उधार कपड़े। ' मित्रों ने कपड़े लाकर दिये। उधार कपड़े पहनकर गालिब फिर पहुंच गया। वहीं द्वारपाल झुक-झुक कर नमस्कार करने लगा। गालिब बहुत हैरान हुआ कि 'कैसी दुनिया है? 'भीतर गया तो बादशाह ने कहा, बडी देर से प्रतीक्षा कर रहा हूं। गालिब हंसने लगा, कुछ बोला नहीं। जब भोजन लगा दिया गया तो सम्राट खुद भोजन के लिए सामने बैठा- भोजन कराने के लिए। गालिब ने भोजन का कौर बनाया और अपने कोट को खिलाने लगा कि, 'ए कोट खा ! 'पगड़ी को खिलाने लगा कि 'ले पगड़ी खा! 'सम्राट ने कहा, 'आपके भोजन करने की बड़ी अजीब तरकीबें मालूम पड़ती हैं। यह कौन-सी आदत है 'यह आप क्या कर रहे हैं?' गालिब ने कहा, 'जब मैं आया था तो द्वार से ही लौटा दिया गया था। अब कपड़े आये हैं उधार। तो जो आए हैं, उन्हीं को भोजन भी करना चाहिए! ' बाहर की दुनिया में कपड़े चलते हैं।…. बाहर की दुनिया में कपड़े ही चलते हैं। वहां आत्माओं का चलना बहुत मुश्किल है; क्योंकि बाहर जो भीड़ इकट्ठी है, वह कपड़े वालों की भीड़ है। वहां आत्‍मा को चलाने की तपश्‍चर्या हो जाती है। लेकिन बाहर की दुनिया में जीवन नहीं मिलता। वहां हाथ में कपड़ों की लाश रह जाती है, अकेली। -ओशो" market://details?id=com.tuneonn.hindistories

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rajni kundra Jan 20, 2020

मिश्र में एक अद्भुत फकीर हुआ है झुन्‍नून। एक युवक ने आकर उससे पूछा, मैं भी सत्‍संग का आकांक्षी हूं। मुझे भी चरणों में जगह दो। झुन्‍नून ने उसकी तरफ देखा—दिखाई पड़ी होगी वहीँ बुद्ध की कलछी वाली बात जो दाल में रहकर भी उसका स्‍वाद नहीं ले पाती। उसने कहा,तू एक काम कर। खीसे में से एक पत्‍थर निकाला और कहा, जा बाजार में, सब्‍जी मंडी में चला जा, और दुकानदारों से पूछना कि इसके कितने दाम मिल सकते है। वह भागा हुआ गया। उसने जाकर सब्‍जियां बेचने वाले लोगों से पूछा। कई ने तो कहां हमें जरूरत ही नहीं है। दाम का क्‍या सवाल? दाम तो जरूरत से होता है। हटाओं अपने पत्‍थर को। पर किसी ने कहा कि ठीक है, सब्‍जी तौलने के काम आ जाएगा। तो दो पैसे ले लो। चार पैसे ले लो, पत्‍थर रंगीन था। मन को भा रहा था। पर झुन्‍नून ने कहा थ, बेचना मत, सिर्फ दाम पूछ कर आ जाना। ज्‍यादा से ज्‍यादा कितने दाम मिल सकते है। सब तरफ पूछकर आ गया, चार पैसे से ज्‍यादा कोई देने को तैयार नहीं हुआ। आकर उसने झुन्‍नून से कहा की चार पैसे से कोई एक पैसा ज्‍यादा देने को तैयार नहीं है। बहुत तो लेने को ही तैयार नहीं थे। कईयों ने तो डांट कर भगा दिया। सुबह बोनी का वक्‍त है। आ गये पत्‍थर बेचने। चल भाग यहां से। हम ग्राहकों से बात कर रहे है बीच में अपने पत्‍थर को उलझाये हुए है। अभी तो सांस लेनी की भी फुरसत नहीं है। शाम के वक्‍त आना। पर हमारे ये काम का ही नहीं है मत आना। किसी ने उत्‍सुकता भी दिखाई तो इस लिए सब्‍जी तौलने के काम आ जायेगा। इसका बांट बना लेगा। एक आदमी तो ऐसा भी मिला की काम को तो कोई नहीं है पर दे जा बच्‍चे खेल लेंगे। अब तुम ले आये हो तो चलो दे ही दो। और ये चार पैसे। बड़ी दया से चार दे रहे थे। जैसे मुझ पर बड़ा एहसान कर रहे हो। कहो तो बेच आऊं। गुरु ने कहा, अब तू ऐसा कर, सोने चाँदी वाले बाजार में जा और वहां जा कर पूछ आ। लेकिन बेचना नहीं है। सिर्फ दाम ही पूछ कर आने है। चाहे कोई कितने ही दाम क्‍यों न लगाये। क्‍योंकि यह पत्‍थर मेरा नहीं यह मेरे पास किसी कि अमानत है। इसलिए मैं तुझे दिये देता हूं केवल इसे अमानत ही समझना और वह भी अमानत पे अमानत। इसे बेचने का हक न तो मेरा है न तेरा। इस बात को गांठ बाद ले। वह बजार गया। वह तो हैरान होकर लौटा। सोने-चाँदी के दुकानदार हजार रूपये देने को तैयार है। भरोसा ही नहीं आ रहा कहां चार पैसे और कहां हजार रूपये। कितना फर्क हो गया। एक बार तो लगा की बैच ही दे। यह आदमी बाद में हजार दे या न दे। पर गुरु ने मना किया था इस लिए उसके हाथ बंधे थे वरना तो वह कब का बेच चुका होता। लौटकर आया और अपने गुरू को कहने लगा इस पत्‍थर के एक आदमी हजार रूपये देने को तैयार हो गया है। पाँच सौ से तो कम कोई देने को तैयार ही नहीं था। अब कहो तो इसे बेच आऊं। गुरु ने कहा, अब तू ऐसा कर, इसे बेच मत देना। बात तुझे याद है न। यह मेरे पास अमानत है ये अमानत में तुझे दे रहा हूं। अब तू जा हीरे-जवाहरात जहां बिकते है। जौहरी और पारखी जहां है। वहां ले जा; लेकिन बेचना नहीं है। चाहे कोई कितनी भी कीमत क्‍यों न लगाये। तेरे मन में कितना ही उत्‍साह और लालच आ जाए। बस मोल-भाव करना है। कीमत पता करनी है। कितने का बिक सकता है। वह गया तो और भी चकित रह गया। वहां तो दस लाख रूपया तक देने को तैयार है। इस पत्‍थर के। वह तो पागल ही हो गया। उसे लगा कहीं मैं सपना तो नहीं देख रहा। कहा दो पैसे, चार पैसे, और कहां हजार और कहां लाखों। इस बार उससे नही रहा जा रहा था। मन कर रहा था इससे सुनहरी मौका फिर नहीं आएगा। इसे बेच ही दे। जल्‍दी-जल्‍दी लौट कर अपने गुरु के पास आया। और गुरु ने उसका चेहरा देखते ही कहा पत्‍थर कहां है पहले वो दे। और पत्‍थर दे दिया। फिर पूछा सब ठीक है। समझा जो पत्‍थर तुझे दिया था उसकी कीमत देखी,अब अपनी और देख सत्‍य का तू आकांक्षी है, इतने से ही सत्‍य नहीं मिलता; पारखी भी है या नहीं? नहीं है तो हम सत्‍य देंगे और तू दो पैसे दाम बताएगा । शायद दो पैसे का भी नहीं समझेगा। पारखी होना जरूरी है। पहले पारखी होकर आ। सत्‍य तो है हम देने को भी तैयार है। लेकिन सिर्फ इतना तेरे कह देने से कि तू आकांक्षी है, काफी नहीं होता। क्‍योंकि मैं देखता हूं, अकड़ तेरी भारी है। पैर भी तूने झुककर छुए है। शरीर तो झुका, तू नहीं झुका। छू लिए है उपचार वश। छूने चाहिए इसलिए। और लोग भी छू रहे है इसलिए। झुकना ही तुझे नहीं आता। तो जिन हीरों की यहां चर्चा है। वह तो झुकने से ही उनकी परख आती है। तो पहले झुकना सीख कर आ। - ओशो" market://details?id=com.tuneonn.hindistories

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rajni kundra Jan 20, 2020

स्‍वामी राम एक कहानी कहा करते थे, वे कहते थे, एक प्रेमी था, वह दूर देश चला गया था। उसकी प्रेयसी राह देखती रही। वर्ष आए, गए। पत्र आते थे उसके, अब आता हूं, अब आता हूं। लेकिन प्रतीक्षा लंबी होती चली गई और वह नहीं आया। फिर वह प्रेयसी घबड़ा गई और एक दिन खुद ही चल कर उस जगह पहूंच गई जहां उसका प्रेमी था। वह उसके द्वार पर पहूंच गई, द्वार खुला था। वह भीतर पहूंच गई। प्रेमी कुछ लिखता था, वह सामने ही बैठ कर देखने लगी, उसका लिखना पूरा हो जाए। प्रेमी उसी प्रेयसी को पत्र लिख रहा था। और इतने दिन से उसने बार - बार वादा किया और टूट गया तो बहुत - बहुत क्षमाएं मांग रहा था। बहुत - बहुत प्रेम की बातें लिख रहा था, बड़े गीत और कविताएं लिख रहा था। वह लिखते ही चला जा रहा है। उसे पता भी नहीं है कि सामने कौन बैठा है। आधी रात हो गई तब वह पत्र कहीं पूरा हुआ। उसने आँख ऊपर उठाई तो वह घबड़ा गया। समझा कि क्‍या कोई भूत - प्रेत है। वह सामने कौन बैठा हुआ है? वह तो उसकी प्रेयसी है। नहीं लेकिन यह कैसे हो सकता है। वह चिल्‍लाने लगा कि नहीं - नहीं, यह कैसे हो सकता है? तू यहां है, तू कैसे, कहां से आई? उसकी प्रेयसी ने कहा: मैं घंटों से बैठी हूं और प्रतीक्षा कर रही हूं कि तुम्‍हारा लिखने काम बंद हो जाए तो शायद तुम्हारी आंख मेरे पास पहुंचे। और वह प्रेमी छाती पीट कर रोने लगा कि पागल हूं मैं। मैं तुझी को पत्र लिख रहा हूं और इस पत्र के लिखने के कारण तुझे नहीं देख पा रहा हूं और तू सामने मौजूद है। आधी रात बीत गई, तू यहां थी ही! परमात्मा उससे भी ज्यादा निकट मौजूद है। हम न मालूम क्या - क्या बातें किए चले जा रहे हैं। न मालूम क्या - क्या पत्र शास्त्र पढ़ रहे हैं। कोई गीता खोल कर बैठा हुआ है, कोई कुरान खोल कर बैठा हुआ है, कोई बाइबिल पढ़ रहा है। न मालूम क्या - क्या लोग कर रहे हैं; और जिसके लिए कर रहे हैं वह चारों तरफ हमेशा मौजूद है। लेकिन फुर्सत हो तब तो आंख उठे। काम बंद हो तो वह दिखाई पड़े, जो है। - ओशो" market://details?id=com.tuneonn.hindistories

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rajni kundra Jan 20, 2020

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rajni kundra Jan 20, 2020

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