,,,,,- कर्मफल -,,,,,- और-,,,,,- ईश्वर-,,,,, सत्य सनातन संस्कृति संस्कार धर्म की जय हो जटाजूट में शशि गंग हे - नेत्र तीन सुखधाम । कान में कुण्डल गले भुजंग दरसे आठ याम । नेक यह हर्षन अनमोल ।। भोला मनका ओला दोला भरदेगा झोला ।। सत्य , शिव और सौंदर्य उसी एक ( प्रभु ) के विभिन्न रूप हैं ।। संसार की रचना करने वाला वह परमात्मा सदेव प्राणियों के ह्रदय में स्थिर है । इस महात्मा ( परमात्मा ) को जो शुध्द हृदय और निर्मल मन से अपने भीतर विघमान देखते हैं , वे अमृतत्व को प्राप्त कर लेते हैं ।। इस संसार रूपी समुद्र को पार करने के लिए यह मानव शरीर ⛵ नाव के समान है, जिसमें बैठकर आत्मा रूपी नाविक भवसागर को पार कर सकता है ।। श्रध्दा का अर्थ है - आत्म- विश्वास और आत्म - विश्वास का अर्थ है _ ईश्वर का विश्वास ।

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सत्य सनातन संस्कृति संस्कार धर्म की जय हो श्री सूर्य सुवन सुखधाम आपकी उपमा न्यारी है सत् सत् बार प्रणाम आपकी महिमा प्यारी है । श्री विधी का नेक विधान कभी टाले नहीं टलता है । रोज सुबह को उगता सूरज शाम को ढलता है ।। वीदना बाई ने लिखे छटी रात के अंक । राई धंटे न तिल बड़े , रे रे जीव निसंक ‌। हमेशा समय रहा बलवान यहां बस किसका चलता है । रोज सुबह को उगता सूरज रोज शाम को ढ़लता है अंतर कोन जन्म का था इस जन्म हुआ ये मेल । ब्याह सदी हम समझ रहे , यह कुदरत का खेल ।। खेल नहीं ये है नव निर्माण , ये जग इसी से चलता हैं । रोज सुबह को उगता सूरज रोज शाम को ढलता है। पांच तत्त्व संग्रह कीये छाले फोड़े तीन । ब्रह्मा विष्णु और सदाशिव ,आदि शक्ति सुत तीन ।। नेक श्रृष्टि का नवनिर्माण ,नेक जग में फलता है रोज सुबह को उगता सूरज रोज शाम को ढ़लता है

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