Dr Rajeev Saxena Mar 26, 2019

🙏🕉️🚩 *अमोघ शिव कवचम् ...!!* ------------------------------------------------------------------ अमोघ शिव कवच की महानता के बारे में जितना लिखा जाए कम है ,क्योंकि इस महान एवं अति शीघ्र फल प्रदान करने वाले कवच की महानता का कोई दूसरा सार ही नहीं है। समस्त प्रकार शारीरिक ,मानसिक ,आर्थिक एवं सामाजिक कष्टों से मुक्ति दिलाने में ये कवच अपना महान प्रभाव रखता है। कवच का अर्थ होता है सुरक्षा, अर्थात जिस प्रकार सदियों पहले योद्धा एवं राजा युद्ध भूमि में जाने से पहले अपने शरीर की सुरक्षा हेतु लौह कवच धारण करते थे ,ठीक उसी प्रकार हमारे ऋषि – मुनि भी अपने आपको सांसारिक कष्टों एवं दैहिक ,दैविक एवं भौतिक सभी प्रकार की व्याधियों से खुद को सुरक्षित रखने के लिए इन मान्त्रिक कवचों की रचना किया करते थे ,जो युगों -युगों से प्रत्येक मानव सभ्यता के लिए उपयोगी सिद्ध होते आयें है । इस अमोघ शिव कवच का नियमित पाठ करने वाले उपासक को अकाल मृत्यु , बीमारी ,कोर्ट कचहरी ,एवं भयानक से भी भयानक विपत्तियों का कोई असर नहीं होता । इस कवच का पाठ करने वाले साधक के शरीर के आस – पास एक सुरक्षा घेरा सा बना रहता हैं जिससे किसी भी तरह की नकारात्मक शक्तियों का असर साधक या साधक के परिवार पर कदापि नहीं होता । 🕉️ ।।ऋषभ उवाच।। 🕉️ अथापरं सर्व-पुराण-गुह्यं, निःशेष-पापौघ-हरं पवित्रम् । जय-प्रदं सर्व-विपत्-मोचनं, वक्ष्यै शैवं कवचं हिताय ते ॥ १ ॥ नमस्कृत्वा महा-देवं विश्व-व्यापिनमीश्‍वरम् । वक्ष्ये शिव-मयं वर्म, सर्व-रक्षा-करं नृणाम् ॥ २ ॥ शुचौ देशे समासीनो, यथा-वत्-कल्पितासनः । जितेन्द्रियो जित-प्राणश्‍चिंतयेच्छिवमव्ययम् ॥ ३ ॥ ह्रत्-पुण्डरीकान्तर-सन्निविष्टं, स्व-तेजसा व्याप्त-नभोऽवकाशम् । अतीन्द्रियं सूक्ष्ममनंतताद्यं, ध्यायेत्-परानन्द-मयं महेशम् ॥ ४ ॥ ध्यानावधूताखिल-कर्म-बन्धश्‍चिरं चिदानन्द-निमग्न-चेताः । षडक्षर-न्यास-समाहितात्मा, शैवेन कुर्यात्-कवचेन रक्षाम् ॥ ५ ॥ ऋषभ ऋषि कहतें हैं – मैंने यह वर-दायक शिव का जो कवच कहा है, समस्त प्राणियों की सब बाधाओं को शान्त करने वाला है और रहस्यों से भरा है । जो मनुष्य इस उत्तम ‘शिव-कवच’ को सदा धारण करता है, उसे भगवान् शम्भु के अनुग्रह से कोई भी भय नहीं होता । चाहे कम आयुवाला हो, चाहे मृत्यु सन्निकट हो अथवा चाहे महान् रोग से पीड़ित हो, इस कवच के प्रताप से वह तुरन्त सुख को प्राप्त करता है और दीर्घ आयु वाला होता है । सभी प्रकार की दरिद्रताओं को यह शान्त करता है और सब प्रकार से कल्याण करता है । जो इस ‘शिव-कवच’ को धारण करता है, वह देवताओं के भी द्वारा पूजित होता है । वह महान् पापों और क्षुद्र पापों के समूहों से छुटकारा पा जाता है तथा देहान्त होने पर ‘शिव-कवच’ के प्रभाव से मोक्ष को प्राप्त करता है । हे वत्स ! तुम भी श्रद्धा के साथ मेरे द्वारा दिए गए इस उत्तम ‘शिव-कवच’ को धारण करो । इससे शीघ्र ही निश्चय-पूर्वक तुम्हारा कल्याण होगा । 🕉️🚩 विनियोगः- ॐ अस्य श्रीशिव-कवच-स्तोत्र-मंत्रस्य श्री ब्रह्मा ऋषिः अनुष्टप् छन्दः। श्रीसदा-शिव-रुद्रो देवता। ह्रीं शक्तिः। रं कीलकम्। श्रीं ह्री क्लीं बीजम्। श्रीसदा-शिव-प्रीत्यर्थे शिव-कवच-स्तोत्र-पाठे विनियोगः। 🕉️🚩 ऋष्यादि-न्यासः- श्री ब्रह्मा ऋषये नमः शिरसि । अनुष्टप् छन्दभ्यो नमः मुखे । श्रीसदा-शिव-रुद्रो देवतायै नमः हृदि । ह्रीं शक्तये नमः नाभौ । रं कीलकाय नमः पादयो । श्रीं ह्री क्लीं बीजाय नमः गुह्ये । श्रीसदा-शिव-प्रीत्यर्थे शिव-कवच-स्तोत्र-पाठे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे । 🕉️🚩 कर-न्यासः – ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ ह्लां सर्व-शक्ति-धाम्ने ईशानात्मने अंगुष्ठाभ्यां नमः । ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ नं रिं नित्य-तृप्ति-धाम्ने तत्पुरुषात्मने तर्जनीभ्यां नमः । ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ मं रुं अनादि-शक्‍ति-धाम्ने अघोरात्मने मध्यामाभ्यां नमः । ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ शिं रैं स्वतंत्र-शक्ति-धाम्ने वाम-देवात्मने अनामिकाभ्यां नमः । ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ वां रौं अलुप्त-शक्ति-धाम्ने सद्यो जातात्मने कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ यं रः अनादि-शक्ति-धाम्ने सर्वात्मने करतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः। 🕉️🚩 अङ्ग-न्यासः – ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ ह्लां सर्व-शक्ति-धाम्ने ईशानात्मने हृदयाय नमः । ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ नं रिं नित्य-तृप्ति-धाम्ने तत्पुरुषात्मने शिरसे स्वाहा । ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ मं रुं अनादि-शक्‍ति-धाम्ने अघोरात्मने शिखायै वषट् । ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ शिं रैं स्वतंत्र-शक्ति-धाम्ने वाम-देवात्मने कवचाय हुं । ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ वां रौं अलुप्त-शक्ति-धाम्ने सद्यो जातात्मने नेत्र-त्रयाय वौषट् । ॐ नमो भगवते ज्वलज्ज्वाला-मालिने ॐ यं रः अनादि-शक्ति-धाम्ने सर्वात्मने अस्त्राय फट् । 🕉️ ॥ अथ ध्यानम् ॥ 🕉️ वज्र-दंष्ट्रं त्रि-नयनं काल-कण्ठमरिन्दमम् । सहस्र-करमत्युग्रं वंदे शंभुमुमा-पतिम् ॥ ।। मूल-पाठ ।। मां पातु देवोऽखिल-देवतात्मा, संसार-कूपे पतितं गंभीरे । तन्नाम-दिव्यं वर-मंत्र-मूलं, धुनोतु मे सर्वमघं ह्रदिस्थम् ॥ १ ॥ सर्वत्र मां रक्षतु विश्‍व-मूर्तिर्ज्योतिर्मयानन्द-घनश्‍चिदात्मा । अणोरणीयानुरु-शक्‍तिरेकः, स ईश्‍वरः पातु भयादशेषात् ॥ २ ॥ यो भू-स्वरूपेण बिभात विश्‍वं, पायात् स भूमेर्गिरिशोऽष्ट-मूर्तिः । योऽपां स्वरूपेण नृणां करोति, सञ्जीवनं सोऽवतु मां जलेभ्यः ॥ ३ ॥ कल्पावसाने भुवनानि दग्ध्वा, सर्वाणि यो नृत्यति भूरि-लीलः । स काल-रुद्रोऽवतु मां दवाग्नेर्वात्यादि-भीतेरखिलाच्च तापात् ॥ ४ ॥ प्रदीप्त-विद्युत् कनकावभासो, विद्या-वराभीति-कुठार-पाणिः । चतुर्मुखस्तत्पुरुषस्त्रिनेत्रः, प्राच्यां स्थितं रक्षतु मामजस्रम् ॥ ५ ॥ कुठार-खेटांकुश-पाश-शूल-कपाल-ढक्काक्ष-गुणान् दधानः । चतुर्मुखो नील-रुचिस्त्रिनेत्रः, पायादघोरो दिशि दक्षिणस्याम् ॥ ६ ॥ कुन्देन्दु-शङ्ख-स्फटिकावभासो, वेदाक्ष-माला वरदाभयांङ्कः । त्र्यक्षश्‍चतुर्वक्त्र उरु-प्रभावः, सद्योऽधिजातोऽवस्तु मां प्रतीच्याम् ॥ ७ ॥ वराक्ष-माला-भय-टङ्क-हस्तः, सरोज-किञ्जल्क-समान-वर्णः । त्रिलोचनश्‍चारु-चतुर्मुखो मां, पायादुदीच्या दिशि वाम-देवः ॥ ८ ॥ वेदाभ्येष्टांकुश-पाश-टङ्क-कपाल-ढक्काक्षक-शूल-पाणिः । सित-द्युतिः पञ्चमुखोऽवताम् मामीशान-ऊर्ध्वं परम-प्रकाशः ॥ ९ ॥ मूर्धानमव्यान् मम चंद्र-मौलिर्भालं ममाव्यादथ भाल-नेत्रः । नेत्रे ममाव्याद् भग-नेत्र-हारी, नासां सदा रक्षतु विश्‍व-नाथः ॥ १० ॥ पायाच्छ्रुती मे श्रुति-गीत-कीर्तिः, कपोलमव्यात् सततं कपाली । वक्त्रं सदा रक्षतु पञ्चवक्त्रो, जिह्वां सदा रक्षतु वेद-जिह्वः ॥ ११ ॥ कण्ठं गिरीशोऽवतु नील-कण्ठः, पाणि-द्वयं पातु पिनाक-पाणिः । दोर्मूलमव्यान्मम धर्म-बाहुर्वक्ष-स्थलं दक्ष-मखान्तकोऽव्यात् ॥ १२ ॥ ममोदरं पातु गिरीन्द्र-धन्वा, मध्यं ममाव्यान्मदनान्त-कारी । हेरम्ब-तातो मम पातु नाभिं, पायात् कटिं धूर्जटिरीश्‍वरो मे ॥ १३ ॥ ऊरु-द्वयं पातु कुबेर-मित्रो, जानु-द्वयं मे जगदीश्‍वरोऽव्यात् । जङ्घा-युगं पुङ्गव-केतुरव्यात्, पादौ ममाव्यात् सुर-वन्द्य-पादः ॥ १४ ॥ महेश्‍वरः पातु दिनादि-यामे, मां मध्य-यामेऽवतु वाम-देवः । त्र्यम्बकः पातु तृतीय-यामे, वृष-ध्वजः पातु दिनांत्य-यामे ॥ १५ ॥ पायान्निशादौ शशि-शेखरो मां, गङ्गा-धरो रक्षतु मां निशीथे । गौरी-पतिः पातु निशावसाने, मृत्युञ्जयो रक्षतु सर्व-कालम् ॥ १६ ॥ अन्तः-स्थितं रक्षतु शङ्करो मां, स्थाणुः सदा पातु बहिः-स्थित माम् । तदन्तरे पातु पतिः पशूनां, सदा-शिवो रक्षतु मां समन्तात् ॥ १७ ॥ तिष्ठन्तमव्याद् ‍भुवनैकनाथः, पायाद्‍ व्रजन्तं प्रथमाधि-नाथः । वेदान्त-वेद्योऽवतु मां निषण्णं, मामव्ययः पातु शिवः शयानम् ॥ १८ ॥ मार्गेषु मां रक्षतु नील-कंठः, शैलादि-दुर्गेषु पुर-त्रयारिः । अरण्य-वासादि-महा-प्रवासे, पायान्मृग-व्याध उदार-शक्तिः ॥ १९ ॥ कल्पान्तकाटोप-पटु-प्रकोप-स्फुटाट्ट-हासोच्चलिताण्ड-कोशः । घोरारि-सेनार्णव-दुर्निवार-महा-भयाद् रक्षतु वीर-भद्रः ॥ २० ॥ पत्त्यश्‍व-मातङ्ग-रथावरूथ-सहस्र-लक्षायुत-कोटि-भीषणम् । अक्षौहिणीनां शतमाततायिनाश्छिन्द्यान्मृडो घोर-कुठार-धारया ॥ २१ ॥ निहन्तु दस्यून् प्रलयानिलार्च्चिर्ज्ज्वलन् त्रिशूलं त्रिपुरांतकस्य । शार्दूल-सिंहर्क्ष-वृकादि-हिंस्रान् सन्त्रासयत्वीश-धनुः पिनाकः ॥ २२ ॥ दुःस्वप्न-दुःशकुन-दुर्गति-दौर्मनस्य-दुर्भिक्ष-दुर्व्यसन-दुःसह-दुर्यशांसि । उत्पात-ताप-विष-भीतिमसद्‍-गुहार्ति-व्याधींश्‍च नाशयतु मे जगतामधीशः ॥ २३ ॥ ॐ नमो भगवते सदा-शिवाय सकल-तत्त्वात्मकाय सर्व-मन्त्र-स्वरूपाय सर्व-यंत्राधिष्ठिताय सर्व-तंत्र-स्वरूपाय सर्व-तत्त्व-विदूराय ब्रह्म-रुद्रावतारिणे नील-कण्ठाय पार्वती-मनोहर-प्रियाय सोम-सूर्याग्नि-लोचनाय भस्मोद्‍-धूलित-विग्रहाय महा-मणि-मुकुट-धारणाय माणिक्य-भूषणाय सृष्टि-स्थिति-प्रलय-काल-रौद्रावताराय दक्षाध्वर-ध्वंसकाय महा-काल-भेदनाय मूलाधारैक-निलयाय तत्त्वातीताय गंगा-धराय सर्व-देवाधि-देवाय षडाश्रयाय वेदान्त-साराय । त्रि-वर्ग-साधनायानन्त-कोटि-ब्रह्माण्ड-नायकायानन्त-वासुकि-तक्षक-कर्कोट-शङ्‍ख-कुलिक-पद्म-महा-पद्मेत्यष्ट-महा-नाग-कुल-भूषणाय प्रणव-स्वरूपाय चिदाकाशाय आकाश-दिक्स्वरूपाय ग्रह-नक्षत्र-मालिने सकलाय कलङ्क-रहिताय सकल-लोकैक-कर्त्रे सकल-लोकैक-भर्त्रे सकल-लोकैक-संहर्त्रे सकल-लोकैक-गुरवे सकल-लोकैक-साक्षिणे सकल-लोकैक-वर-प्रदाय सकल-लोकैक-शङ्कराय शशाङ्क-शेखराय शाश्‍वत-निजावासाय निराभासाय निरामयाय निर्मलाय निर्लोभाय निर्मदाय निश्‍चिन्ताय निरहङ्काराय निरंकुशाय निष्कलंकाय निर्गुणाय निष्कामाय निरुपप्लवाय निरवद्याय निरन्तराय निष्कारणाय निरातङ्काय निष्प्रपंचाय निःसङ्गाय निर्द्वन्द्वाय निराधाराय नीरागाय निष्क्रोधाय निर्मलाय निष्पापाय निर्भयाय निर्विकल्पाय निर्भेदाय निष्क्रियाय निस्तुलाय निःसंशाय निरञ्जनाय निरुपम-विभवाय नित्य-शुद्ध-बुद्धि-परिपूर्ण-सच्चिदानन्दाद्वयाय परम-शान्त-स्वरूपाय तेजोरूपाय तेजोमयाय । जय जय रुद्र महा-रौद्र महावतार महा-भैरव काल-भैरव कपाल-माला-धर खट्वाङ्ग-खङ्ग-चर्म-पाशाङ्कुश-डमरु-शूल-चाप-बाण-गदा-शक्ति-भिन्दिपाल-तोमर-मुसल-मुद्-गर-पाश-परिघ-भुशुण्डी-शतघ्नी-चक्राद्यायुध भीषण-कर-सहस्र-मुख-दंष्ट्रा-कराल-वदन-विकटाट्ट-हास-विस्फारित ब्रह्माण्ड-मंडल नागेन्द्र-कुण्डल नागेन्द्र-वलय नागेन्द्र-चर्म-धर मृत्युञ्जय त्र्यम्बक त्रिपुरान्तक विश्‍व-रूप विरूपाक्ष विश्‍वेश्वर वृषभ-वाहन विश्वतोमुख ! सर्वतो रक्ष, रक्ष । मा ज्वल ज्वल । महा-मृत्युमप-मृत्यु-भयं नाशय-नाशय- ! चोर-भय-मुत्सादयोत्सादय । विष-सर्प-भयं शमय शमय । चोरान् मारय मारय । मम शत्रुनुच्चाट्योच्चाटय । त्रिशूलेन विदारय विदारय । कुठारेण भिन्धि भिन्धि । खड्‌गेन छिन्धि छिन्धि । खट्‍वांगेन विपोथय विपोथय । मुसलेन निष्पेषय निष्पेषय । वाणैः सन्ताडय सन्ताडय । रक्षांसि भीषय भीषय । अशेष-भूतानि विद्रावय विद्रावय । कूष्माण्ड-वेताल-मारी-गण-ब्रह्म-राक्षस-गणान्‌ संत्रासय संत्रासय । ममाभयं कुरु कुरु वित्रस्तं मामाश्‍वासयाश्‍वासय । नरक-महा-भयान्मामुद्धरोद्धर सञ्जीवय सञ्जीवय क्षुत्तृड्‌भ्यां मामाप्याययाप्याय दुःखातुरं मामानन्दयानन्दय शिवकवचेन मामाच्छादयाच्छादय मृत्युञ्जय त्र्यंबक सदाशिव ! नमस्ते नमस्ते नमस्ते । ।।इति श्रीस्कंदपुराणे एकाशीतिसाहस्रयां तृतीये ब्रह्मोत्तर-खण्डे अमोघ-शिव-कवचं समाप्तम् ।। 🙏🕉️🚩

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Dr Rajeev Saxena Mar 24, 2019

!!! भज गोविन्दम’ स्तोत्र !!! ‘भज गोविन्दम’ स्तोत्र की रचना शंकराचार्य ने की थी। यह मूल रूप से बारह पदों में सरल संस्कृत में लिखा गया एक सुंदर स्तोत्र है। इसलिए इसे द्वादश मंजरिका भी कहते हैं। ‘भज गोविन्दम’ में शंकराचार्य ने संसार के मोह में ना पड़ कर भगवान् कृष्ण की भक्ति करने का उपदेश दिया है। उनके अनुसार, संसार असार है और भगवान् का नाम शाश्वत है। उन्होंने मनुष्य को किताबी ज्ञान में समय ना गँवाकर और भौतिक वस्तुओं की लालसा, तृष्णा व मोह छोड़ कर भगवान् का भजन करने की शिक्षा दी है। इसलिए ‘भज गोविन्दम’ को ‘मोह मुगदर’ यानि मोह नाशक भी कहा जाता है। शंकराचार्य का कहना है कि अन्तकाल में मनुष्य की सारी अर्जित विद्याएँ और कलाएँ किसी काम नहीं आएँगी, काम आएगा तो बस हरि नाम। भज गोविन्दम श्री शंकराचार्य की एक बहुत ही खूबसूरत रचना है। इस स्तोत्र को मोहमुदगर भी कहा गया है जिसका अर्थ है- वह शक्ति जो आपको सांसारिक बंधनों से मुक्त कर दे । भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़मते। सम्प्राप्ते सन्निहिते मरणे, नहि नहि रक्षति डुकृञ् करणे ॥1॥ हे भटके हुए प्राणी, सदैव परमात्मा का ध्यान कर क्योंकि तेरी अंतिम सांस के वक्त तेरा यह सांसारिक ज्ञान तेरे काम नहीं आएगा। सब नष्ट हो जाएगा। मूढ़ जहीहि धनागमतृष्णां, कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम्। यल्लभसे निजकर्मोपात्तं, वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ॥2॥ हम हमेशा मोह माया के बंधनों में फसें रहते हैं और इसी कारण हमें सुख की प्राप्ति नहीं होती। हम हमेशा ज्यादा से ज्यादा पाने की कोशिश करते रहते हैं। सुखी जीवन बिताने के लिए हमें संतुष्ट रहना सीखना होगा। हमें जो भी मिलता है उसे हमें खुशी खुशी स्वीकार करना चाहिए क्योंकि हम जैसे कर्म करते हैं, हमें वैसे ही फल की प्राप्ति होती है। नारीस्तनभरनाभीनिवेशं, दृष्ट्वा- माया-मोहावेशम्। एतन्मांस-वसादि-विकारं, मनसि विचिन्तय बारम्बाररम् ॥ 3॥ हम स्त्री की सुन्दरता से मोहित होकर उसे पाने की निरंतर कोशिश करते हैं। परन्तु हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि यह सुन्दर शरीर सिर्फ हाड़ मांस का टुकड़ा है। नलिनीदलगतसलिलं तरलं, तद्वज्जीवितमतिशय चपलम्। विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं, लोकं शोकहतं च समस्तम् ॥4॥ हमारा जीवन क्षण-भंगुर है। यह उस पानी की बूँद की तरह है जो कमल की पंखुड़ियों से गिर कर समुद्र के विशाल जल स्त्रोत में अपना अस्तित्व खो देती है। हमारे चारों ओर प्राणी तरह तरह की कुंठाओं एवं कष्ट से पीड़ित हैं। ऐसे जीवन में कैसी सुन्दरता? यावद्वित्तोपार्जनसक्त:, तावत् निज परिवारो रक्तः। पश्चात् धावति जर्जर देहे, वार्तां पृच्छति कोऽपि न गेहे ॥5॥ जिस परिवार पर तुम ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, जिसके लिए तुम निरंतर मेहनत करते रहे, वह परिवार तुम्हारे साथ तभी तक है जब तक के तुम उनकी ज़रूरतों को पूरा करते हो। यावत्पवनो निवसति देहे तावत् पृच्छति कुशलं गेहे। गतवति वायौ देहापाये, भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये ॥6॥ तुम्हारे मृत्यु के एक क्षण पश्चात ही वह तुम्हारा दाह-संस्कार कर देंगे। यहाँ तक की तुम्हारी पत्नी जिसके साथ तुम ने अपनी पूरी ज़िन्दगी गुज़ारी, वह भी तुम्हारे मृत शरीर को घृणित दृष्टि से देखेगी। बालस्तावत् क्रीडासक्तः, तरुणस्तावत् तरुणीसक्तः। वृद्धस्तावत् चिन्तामग्नः पारे ब्रह्मणि कोऽपि न लग्नः ॥7॥ सारे बालक क्रीडा में व्यस्त हैं और नौजवान अपनी इन्द्रियों को संतुष्ट करने में समय बिता रहे हैं। बुज़ुर्ग केवल चिंता करने में व्यस्त हैं। किसी के पास भी उस परमात्मा को स्मरण करने का वक्त नहीं। का ते कांता कस्ते पुत्रः, संसारोऽयं अतीव विचित्रः। कस्य त्वं कः कुत अयातः तत्त्वं चिन्तय यदिदं भ्रातः ॥8॥ कौन है हमारा सच्चा साथी? हमारा पुत्र कौन हैं? इस क्षण- भंगुर, नश्वर एवं विचित्र संसार में हमारा अपना अस्तित्व क्या है? यह ध्यान देने वाली बात है। सत्संगत्वे निःसंगत्वं, निःसंगत्वे निर्मोहत्वं। निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः ॥9॥ संत परमात्माओ के साथ उठने बैठने से हम सांसारिक वस्तुओं एवं बंधनों से दूर होने लगते हैं। ऐसे हमें सुख की प्राप्ति होती है। सब बन्धनों से मुक्त होकर ही हम उस परम ज्ञान की प्राप्ति कर सकते हैं। वयसि गते कः कामविकारः शुष्के नीरे कः कासारः। क्षीणे वित्ते कः परिवारो ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः ॥10॥ यदि हमारा शरीर या मस्तिष्क स्वस्थ नहीं तो हमें शारीरिक सुख की प्राप्ति नहीं होगी। वह ताल ताल नहीं रहता यदि उसमें जल न हो। जिस प्रकार धन के बिखर जाने से पूरा परिवार बिखर जाता है, उसी तरह ज्ञान की प्राप्ति होते ही, हम इस विचित्र संसार के बन्धनों से मुक्त हो जाते है qमा कुरु धन-जन-यौवन-गर्वं, हरति निमेषात्कालः सर्वम्। मायामयमिदमखिलं हित्वा ब्रह्म पदं त्वं प्रविश विदित्वा ॥11॥ हमारे मित्र, यह धन दौलत, हमारी सुन्दरता एवं हमारा गुरूर, सब एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा। कुछ भी अमर नहीं है। यह संसार झूठ एवं कल्पनाओं का पुलिंदा है। हमें सदैव परम ज्ञान प्राप्त करने की कामना करनी चाहिए। दिनमपि रजनी सायं प्रातः शिशिरवसन्तौ पुनरायातः। कालः क्रीडति गच्छत्यायुः तदपि न मुञ्चति आशावायुः ॥12॥ समय का बीतना और ऋतुओं का बदलना सांसारिक नियम है। कोई भी व्यक्ति अमर नहीं होता। मृत्यु के सामने हर किसी को झुकना पड़ता है। परन्तु हम मोह माया के बन्धनों से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाते हैं। का ते कान्ता धनगतचिन्ता वातुल किं तव नास्ति नियन्ता। त्रिजगति सज्जन संगतिरेका भवति भवार्णवतरणे नौका ॥13॥ सांसारिक मोह माया, धन और स्त्री के बन्धनों में फंस कर एवं व्यर्थ की चिंता कर के हमें कुछ भी हासिल नहीं होगा। क्यों हम सदैव अपने आप को इन चिंताओं से घेरे रखते हैं? क्यों हम महात्माओं से प्रेरणा लेकर उनके दिखाए हुए मार्ग पर नहीं चलते? संत महात्माओं से जुड़ कर अथवा उनके दिए गए उपदेशों का पालन कर के ही हम सांसारिक बन्धनों एवं व्यर्थ की चिंताओं से मुक्त हो सकते हैं । जटिलो मुण्डी लुञ्चित केशः काषायाम्बर-बहुकृतवेषः। पश्यन्नपि च न पश्यति मूढः उदरनिमित्तं बहुकृत शोकः ॥14॥ इस संसार का हर व्यक्ति चाहे वह दिखने में कैसा भी हो, चाहे वह किसी भी रंग का वस्त्र धारण करता हो, निरंतर कर्म करता रहता है। क्यों? केवल रोज़ी रोटी कमाने के लिए। फिर भी पता नहीं क्यों हम सब कुछ जान कर भी अनजान बनें रहते हैं। अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं दशन विहीनं जातं तुण्डम्। वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चति आशापिण्डम् ॥15॥ जिस व्यक्ति का शरीर जवाब दे चूका है, जिसके बदन में प्राण सिर्फ नाम मात्र ही बचे हैं, जो व्यक्ति बिना सहारे के एक कदम भी नहीं चल सकता, वह व्यक्ति भी स्वयं को सांसारिक मोह माया से छुड़ाने में असमर्थ रहा है। अग्रे वह्निः पृष्ठेभानुः रात्रौ चिबुक- समर्पित-जानुः। करतलभिक्षा तरुतलवासः तदपि न मुञ्चति आशापाशः ॥16॥ समय निरंतर चलता रहता है। इसे न कोई रोक पाया है और न ही कोई रोक पायेगा। सिर्फ अपने शरीर को कष्ट देने से और किसी जंगल में अकेले में कठिन तपस्या करने से हमें मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी। कुरुते गंगासागरगमनं व्रतपरिपालनमथवा दानम्। ज्ञानविहिनः सर्वमतेन मुक्तिः न भवति जन्मशतेन ॥17॥ हमें मुक्ति की प्राप्ति सिर्फ आत्मज्ञान के द्वारा प्राप्त हो सकती है। लम्बी यात्रा पर जाने से या कठिन व्रत रखने से हमें परम ज्ञान अथवा मोक्ष प्राप्त नहीं होगा। सुर-मन्दिर-तरु-मूल- निवासः शय्या भूतलमजिनं वासः। सर्व-परिग्रह-भोग-त्यागः कस्य सुखं न करोति विरागः ॥18॥ जो इंसान संसार के भौतिक सुख सुविधाओं से ऊपर उठ चुका है, जिसके जीवन का लक्ष्य शारीरिक सुख एवं धन और समाज में प्रतिष्ठा की प्राप्ति मात्र नहीं है, वह प्राणी अपना सम्पूर्ण जीवन सुख एवं शांति से व्यतीत करता है। योगरतो वा भोगरतो वा संगरतो वा संगविहीनः। यस्य ब्रह्मणि रमते चित्तं नन्दति नन्दति नन्दति एव ॥19॥ चाहे हम योग की राह पर चलें या हम अपने सांसारिक उत्तरदायित्वों को पूर्ण करना ही बेहतर समझें, यदि हमने अपने आप को परमात्मा से जोड़ लें तो हमें सदैव सुख प्राप्त होगा। भगवद्गीता किञ्चिदधीता गंगा- जल-लव-कणिका-पीता। सकृदपि येन मुरारिसमर्चा तस्य यमः किं कुरुते चर्चाम् ॥20॥ जो अपना समय आत्मज्ञान को प्राप्त करने में लगाते हैं, जो सदैव परमात्मा का स्मरण करते हैं एवं भक्ति के मीठे रस में लीन हो जाते हैं, उन्हें ही इस संसार के सारे दुःख दर्द एवं कष्टों से मुक्ति मिलती है। पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम्। इह संसारे बहुदुस्तारे कृपयापारे पाहि मुरारे ॥21॥ हे परम पूज्य परमात्मा! मुझे अपनी शरण में ले लो। मैं इस जन्म और मृत्यु के चक्कर से मुक्ति प्राप्त करना चाहता हूँ। मुझे इस संसार रूपी विशाल समुद्र को पार करने की शक्ति दो ईश्वर। रथ्याचर्पट-विरचित- कन्थः पुण्यापुण्य-विवर्जित- पन्थः। योगी योगनियोजित चित्तः रमते बालोन्मत्तवदेव ॥22॥ जो योगी सांसारिक बन्धनों से मुक्त होकर अपनी इन्द्रियों को वश में करने में सक्षम हो जाता है, उसे किसी बात का डर नहीं रहता और वह निडर होकर, एक चंचल बालक के समान, अपना जीवन व्यतीत करता है। कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः का मे जननी को मे तातः। इति परिभावय सर्वमसारम् विश्वं त्यक्त्वा स्वप्नविचारम् ॥23॥ हम कौन हैं? हम कहाँ से आये हैं? हमारा इस संसार में क्या है? ऐसी बातों पर चिंता कर के हमें अपना समय व्यर्थ नहीं करना चाहिए। यह संसार एक स्वप्न की तरह ही झूठा एवं क्षण-भंगुर है। हम कौन हैं? हम कहाँ से आये हैं? हमारा इस संसार में क्या है? ऐसी बातों पर चिंता कर के हमें अपना समय व्यर्थ नहीं करना चाहिए। यह संसार एक स्वप्न की तरह ही झूठा एवं क्षण-भंगुर है। त्वयि मयि चान्यत्रैको विष्णुः व्यर्थं कुप्यसि सर्वसहिष्णुः। सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानं सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम् ॥24॥ संसार के कण कण में उस परमात्मा का वास है। कोई भी प्राणी ईश्वर की कृपा से अछूता नहीं है। शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ मा कुरु यत्नं विग्रहसन्धौ। भव समचित्तः सर्वत्र त्वं वाछंसि अचिराद् यदि विष्णुत्वम्॥ 25॥ हमें न ही किसी से अत्यधिक प्रेम करना चाहिए और न ही घृणा। सभी प्राणियों में ईश्वर का वास है। हमें सबको एक ही नज़र से देखना चाहिए और उनका आदर करना चाहिए क्योंकि तभी हम परमात्मा का आदर कर पाएंगे। कामं क्रोधं लोभं मोहं त्यक्त्वात्मानं भावय कोऽहम्। आत्मज्ञानविहीना मूढाः ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः ॥26॥ हमारे जीवन का लक्ष्य कदापि सांसारिक एवं भौतिक सुखों की प्राप्ति नहीं होना चाहिए। हमें उन्हें पाने के विचारों को त्याग कर, परम ज्ञान की प्राप्ति को अपना लक्ष्य बनाना चाहिए। तभी हम संसार के कष्ट एवं पीडाओं से मुक्ति पा सकेंगे। गेयं गीता नाम सहस्रं ध्येयं श्रीपति रूपमजस्रम्। नेयं सज्जन सङ्गे चित्तं देयं दीनजनाय च वित्तम् ॥27॥ उस परम परमेश्वर का सदैव ध्यान कीजिए। उसकी महिमा का गुणगान कीजिए। हमेशा संतों की संगती में रहिए और गरीब एवं बेसहारे व्यक्तियों की सहायता कीजिए। सुखतः क्रियते रामाभोगः पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः। यद्यपि लोके मरणं शरणं तदपि न मुञ्चति पापाचरणम् ॥28॥ जिस शरीर का हम इतना ख्याल रखते हैं और उसके द्वारा तरह तरह की भौतिक एवं शारीरिक सुख पाने की चेष्टा करते हैं, वह शरीर एक दिन नष्ट हो जाएगा। मृत्यु आने पर हमारा सजावटी शरीर मिट्टी में मिल जाएगा। फिर क्यों हम व्यर्थ ही बुरी आदतों में फंसते हैं। अर्थंमनर्थम् भावय नित्यं नास्ति ततः सुखलेशः सत्यम्। पुत्रादपि धनभजाम् भीतिः सर्वत्रैषा विहिता रीतिः ॥ 29॥ संसार के सभी भौतिक सुख हमारे दुखों का कारण है। जितना ज्यादा हम धन या अन्य भौतिक सुख की वस्तुओं को इकट्ठा करते हैं, उतना ही हमें उन्हें खोने का डर सताता रहता है। सम्पूर्ण संसार के जितने भी अत्यधिक धनवान व्यक्ति हैं, वे अपने परिवार वालों से भी डरते हैं। प्राणायामं प्रत्याहारं नित्यानित्य विवेकविचारम्। जाप्यसमेत समाधिविधानं कुर्ववधानं महदवधानम् ॥30॥ हमें सदैव इस बात को ध्यान में रखना चाहिए की यह संसार नश्वर है। हमें अपनी सांस, अपना भोजन और अपना चाल चलन संतुलित रखना चाहिए। हमें सचेत होकर उस ईश्वर पर अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर देना चाहिए। गुरुचरणाम्बुज निर्भर भक्तः संसारादचिराद्भव मुक्तः। सेन्द्रियमानस नियमादेवं द्रक्ष्यसि निज हृदयस्थं देवम् ॥ 31॥ ||●|| ॐ तत्सत् ||●||!

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Dr Rajeev Saxena Mar 14, 2019

श्री महाकाली हृदय स्तोत्रम ॥ श्रीकालिकाहृदयम् ॥ ॐ अस्य श्रीदक्षिणकाल्या हृदयस्तोत्रमन्त्रस्य श्रीमहाकाल ऋषिः । उष्णिक्छन्दः । श्रीदक्षिणकालिका देवता । क्रीं बीजं । ह्रीं शक्तिः । नमः कीलकं । सर्वत्र सर्वदा जपे विनियोगः ॥ अथ हृदयादिन्यासः । ॐ क्रां हृदयाय नमः । ॐ क्रीं शिरसे स्वाहा । ॐ क्रूं शिखायै वषट् । ॐ क्रैं कवचाय हुं । ॐ क्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ क्रः अस्त्राय फट् ॥ इति हृदयादिन्यासः ॥ अथ ध्यानम् । ॐ ध्यायेत्कालीं महामायां त्रिनेत्रां बहुरूपिणीम् । चतुर्भुजां ललजिह्वां पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ॥ १॥ नीलोत्पलदलप्रख्यां शत्रुसङ्घविदारिणीम् । नरमुण्डं तथा खङ्गं कमलं वरदं तथा ॥ २॥ बिभ्राणां रक्तवदनां दंष्ट्रालीं घोररूपिणीम् । अट्टाट्टहासनिरतां सर्वदा च दिगम्बराम् ॥ ३॥ शवासनस्थितां देवीं मुण्डमालाविभूषिताम् । इति ध्यात्वा महादेवीं ततस्तु हृदयं पठेत् ॥ ४॥ ॐ कालिका घोररूपाढया सर्वकामफलप्रदा । सर्वदेवस्तुता देवी शत्रुनाशं करोतु मे ॥ ५॥ ह्रींह्रींस्वरूपिणी श्रेष्ठा त्रिषु लोकेषु दुर्लभा । तव स्नेहान्मया ख्यातं न देयं यस्य कस्यचित् ॥ ६॥ अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि निशामय परात्मिके । यस्य विज्ञानमात्रेण जीवन्मुक्तो भविष्यति ॥ ७॥ नागयज्ञोपवीताञ्च चन्द्रार्द्धकृतशेखराम् । जटाजूटाञ्च सञ्चिन्त्य महाकालसमीपगाम् ॥ ८॥ एवं न्यासादयः सर्वे ये प्रकुर्वन्ति मानवाः । प्राप्नुवन्ति च ते मोक्षं सत्यं सत्यं वरानने ॥ ९॥ यन्त्रं श्रृणु परं देव्याः सर्वार्थसिद्धिदायकम् । गोप्यं गोप्यतरं गोप्यं गोप्यं गोप्यतरं महत् ॥ १०॥ त्रिकोणं पञ्चकं चाष्टकमलं भूपुरान्वितम् । मुण्डपङ्क्तिं च ज्वालां च कालीयन्त्रं सुसिद्धिदम् ॥ ११॥ मन्त्रं तु पूर्वकथितं धारयस्व सदा प्रिये । देव्या दक्षिणकाल्यास्तु नाममालां निशामय ॥ १२॥ काली दक्षिणकाली च कृष्णरूपा परात्मिका । मुण्डमाला विशालाक्षी सृष्टिसंहारकारिका ॥ १३ ॥ स्थितिरूपा महामाया योगनिद्रा भगात्मिका । भगसर्पिःपानरता भगोद्योता भगाङ्गजा ॥ १४ ॥ आद्या सदा नवा घोरा महातेजाः करालिका । प्रेतवाहा सिद्धिलक्ष्मीरनिरुद्धा सरस्वती ॥ १५॥ एतानि नाममाल्यानि ये पठन्ति दिने दिने । तेषां दासस्य दासोऽहं सत्यं सत्यं महेश्वरि ॥ १६॥ ॐ कालीं कालहरां देवी कङ्कालबीजरूपिणीम् । कालरूपां कलातीतां कालिकां दक्षिणां भजे ॥ १७॥ कुण्डगोलप्रियां देवीं खयम्भूकुसुमे रताम् । रतिप्रियां महारौद्रीं कालिकां प्रणमाम्यहम् ॥ १८॥ दूतीप्रियां महादूतीं दूतीयोगेश्वरीं पराम् । दूतोयोगोद्भवरतां दूतीरूपां नमाम्यहम् ॥ १९॥ क्रींमन्त्रेण जलं जप्त्वा सप्तधा सेचनेन तु । सर्वे रोगा विनश्यन्ति नात्र कार्या विचारणा ॥ २०॥ क्रींस्वाहान्तैर्महामन्त्रैश्चन्दनं साधयेत्ततः । तिलकं क्रियते प्राज्ञैर्लोको वश्यो भवेत्सदा ॥ २१॥ क्रीं हूं ह्रीं मन्त्रजप्तैश्च ह्यक्षतैः सप्तभिः प्रिये । महाभयविनाशश्च जायते नात्र संशयः ॥ २२॥ क्रीं ह्रीं ह्रूं स्वाहा मन्त्रेण श्मशानाग्निं च मन्त्रयेत् । शत्रोर्गृहे प्रतिक्षिप्त्वा शत्रोर्मृत्युर्भविष्यति ॥ २३॥ ह्रूं ह्रीं क्रीं चैव उच्चाटे पुष्पं संशोध्य सप्तधा । रिपूणां चैव चोच्चाटं नयत्येव न संशयः ॥ २४॥ आकर्षणे च क्रीं क्रीं क्रीं जप्त्वाऽक्षतान् प्रतिक्षिपेत् । सहस्रयोजनस्था च शीघ्रमागच्छति प्रिये ॥ २५॥ क्रीं क्रीं क्रीं ह्रूं ह्रूं ह्रीं ह्रीं च कज्जलं शोधितं तथा । तिलकेन जगन्मोहः सप्तधा मन्त्रमाचरेत् ॥ २६॥ हृदयं परमेशानि सर्वपापहरं परम् । अश्वमेधादियज्ञानां कोटिकोटिगुणोत्तरम् ॥ २७॥ कन्यादानादिदानानां कोटिकोटिगुणं फलम् । दूतीयागादियागानां कोटिकोटिफलं स्मृतम् ॥ २८॥ गङ्गादिसर्वतीर्थानां फलं कोटिगुणं स्मृतम् । एकधा पाठमात्रेण सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥ २९॥ कौमारीस्वेष्टरूपेण पूजां कृत्वा विधानतः । पठेत्स्तोत्रं महेशानि जीवन्मुक्तः स उच्यते ॥ ३०॥ रजस्वलाभगं दृष्ट्वा पठेदेकाग्रमानसः । लभते परमं स्थानं देवीलोके वरानने ॥ ३१॥ महादुःखे महारोगे महासङ्कटके दिने । महाभये महाघोरे पठेतस्तोत्रं महोत्तमम् । सत्यं सत्यं पुनः सत्यं गोपायेन्मातृजारवत् ॥ ३२॥ इति श्रीकालीह ॥

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Dr Rajeev Saxena Mar 8, 2019

श्री रामाष्टकम्‌। भजॆ विशॆष सुंदरं समस्त पापखंडनम्‌ । स्वभक्त चित्त रंजनं सदैव राममध्वयम्‌ ॥१॥ जटाकलापशॊभितं समस्त पापनाशकम्‌ ।कोई स्वभक्तभीति भंजनं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥२॥ निजस्वरूपबॊधकं कृपाकरं भवापहम्‌ । समं शिवं निरंजनम भजॆह राममद्वयम्‌ ॥३॥ सहप्रपंचकल्पितं ह्यनावरूप वास्तवम्‌ । निराकृतिं निरामयं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥४॥ निष्प्रपंच निर्विकल्प निर्मलं निरामयम्‌ । चिदॆकरूप संततं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥५॥ भवाब्धिपॊतरूपकं ह्यशॆष दॆहकल्पितम्‌ । गुणाकरं कृपाकरं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥६॥ महासुवाक्यबॊधकैर्विराज मानवाक्पदै: । परब्रह्मव्यापकं भजॆह राममद्वयम्‌ ॥७॥ शिवप्रदं सुखप्रदं भवच्छिदं भ्रमापहम्‌ । विराजमानदैशिकम भजॆह राममद्वयम्‌ ॥८॥ रामाष्टकं पठति य: सुकरं सुपुण्यम्‌ व्यासॆन भाषितमिदं शृणुतॆ मनुष्य: ॥९॥ विद्यां श्रीयं विपुल सौख्यमनंतकीर्तिम्‌ संप्राप्य दॆहविलयॆ लभतॆ च मॊक्षम्‌ ॥१०॥ ॥इति श्री व्यास विरचित रामाष्टकम संपूर्णम्‌ ॥

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