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साक्षात् पूर्णब्रह्म परमेश्वर श्री राम श्री रामचन्द्र जी साक्षात् पूर्णब्रह्म परमात्मा भगवान् विष्णु के अवतार थे, यह बात वाल्मीकीय रामायण में जगह जगह कही गई है | जब संसार में रावण का उपद्रव बहुत बढ़ गया, देवता और ऋषिगण बहुत दु:खी हो गये, तब उन्होंने जाकर ब्रह्मा से प्रार्थना की | पितामह ब्रह्मा देवताओं को धीरज बंधा रहे थे कि उसी समय भगवान् विष्णु के प्रकट होने का वर्णन इस प्रकार आता है :- एतस्मिन्नन्तरे विष्णुरुपयातो महाद्युति: | शंखचक्रगदापाणि: पीतवासा जगत्पति: || वैनतेयं समारुह्य भास्करस्तोयदं यथा | तप्तहाटककेयूरो वन्द्यमान: सुरोत्तमै: ||....(वा.रा.१|१५|१६-१७) ‘ इतने में ही महान् तेजस्वी उत्तम देवताओं दारा वन्दनीय जगत्पति भगवान् विष्णु मेघ पर चढ़े हुए सूर्य के समान गरुड़ पर सवार हो वहाँ आ पहुंचे | उनके शरीर पर पीताम्बर तथा हाथों में शंख, चक्र और गदा आदि आयुध एवं चमकीले स्वर्ण के बाजूबंद शोभा पा रहे थे |’ इसके बाद देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान् ने राजा दशरथ के घर मनुष्य रूप में अवतार लेना स्वीकार किया | फिर वहीं अंतर्धान हो गए | श्री रामचंद्र जी का विवाह होने के बाद जब वे अयोध्या को लोट रहे थे, उस समय रास्ते में परशुराम जी मिले | श्रीराम विष्णु के अवतार हैं या नहीं-- इसकी परीक्षा करने के लिए उन्होंने श्रीराम से भगवान् विष्णु के धनुष पर बाण चढाने के लिए कहा; तब श्रीरामचन्द्र जी ने तुरंत ही उनके हाथ से धनुष लेकर उस पर बाण चढ़ा दिया और कहा –“यह दिव्य वैष्णव बाण है ! इसे कहाँ छोड़ा जाए ?” यह देख-सुन कर परशुराम जी चकित हो गए | उनका तेज श्रीराम में जा मिला | उस समय श्रीराम की स्तुति करते हुए परशुराम जी कहते हैं :-- अक्षय्यं मधुहन्तारं जानामि त्वां सुरेश्वरम् | धनुषोऽस्य परामर्शात् स्वस्ति तेऽस्तु परंतप ||.....(वा.रा.१|७६|१७) “शत्रुतापन राम ! आपका कल्याण हो ! इस धनुष के चढाने से मैं जान गया कि आप मधु-दैत्य को मारनेवाले, देवताओं के स्वामि, साक्षात् अविनाशी विष्णु हैं |”----इस प्रकार श्रीराम के प्रभाव का वर्णन करके और उनकी प्रदक्षिणा करके परशुराम जी चले गये | रावण का वध हो जाने के बाद जब ब्रह्मा सहित देवता लोग श्री रामचंद्र जी के पास आए और उनसे बातचीत करते हुए श्रीराम ने यह कहा कि ..”मैं तो अपने को दशरथ जी का पुत्र राम नाम का मनुष्य ही समझता हूँ ! मैं जो हूँ, जहाँ से आया हूँ—यह आप लोग ही बताएं” | इस पर ब्रह्मा जी ने सबके सामने सम्पूर्ण रहस्य खोल दिया | वहाँ राम के महत्त्व का वर्णन करते हुए ब्रह्माजी कहते हैं :-- भवान्नारायणो देव: श्रीमांश्चक्रायुध: प्रभु : | एकश्रृंगो वराहस्त्वं भूतभव्यसपत्नजित् || अक्षरं ब्रह्म सत्यं च मध्ये चान्ते च राघव | लोकानां त्वं परो धर्मो विष्वक्सेनश्चतुर्भुज : || शार्ङ्गधन्वा हृषिकेश: पुरुष: पुरुषोत्तम: | अजित: खड्गध्रिग् विष्णु: कृष्णश्चैव बृहद्बल: ||..... वा.रा.६|११७|१३-१५) “ आप साक्षात् चक्रपाणि लक्ष्मीपति प्रभु श्री नारायणदेव हैं | आप ही भूत-भविष्य के शत्रुओं को जीतने वाले और एक श्रृंगधारी वराह भगवान् हैं | राघव ! आप आदि, मध्य और अंत में सत्य स्वरूप अविनाशी ब्रह्म हैं | आप सम्पूर्ण लोकों के परमधर्म चतुर्भुज विष्णु हैं | आप ही अजित, पुरुष, पुरुषोत्तम, हृषीकेश तथा शार्ङ्ग-धनुष वाले, खड्गधारी विष्णु हैं और आप ही महा बलवान कृष्ण हैं |” इसी तरह और भी बहुत कुछ कहा है | वहीं राजा दशरथ भी लक्ष्मण के साथ बातचीत करते समय श्रीराम की सेवा का महत्त्व बतलाकर कहते हैं :-- एतत्तदुक्तमव्यक्तमक्षरं ब्रह्म सम्मितम् | देवानां हृदयं सौम्य गुह्यं राम: परंतप: || अवाप्तं धर्माचरणं यशश्च विपुल्म त्वया | एनं शुश्रूषताव्यग्रं वैदेह्या सह सीतया ||.....(वा.रा.६|११९|३२-३३) “ सौम्य ! ये परंतप राम साक्षात् वेदवर्णित अविनाशी अव्यक्त ब्रह्म हैं | ये देवों के हृदय और परम रहस्यमय हैं | जनकनन्दिनी सीता के सहित इनकी सावधानीपूर्वक सेवा करके तुमने पवित्र धर्म का आचरण और बड़े भारी यश का लाभ किया है |“ इसके सिवा और भी अनेक बार ब्रह्माजी, देवता और महर्षियों ने श्रीराम के अमित प्रभाव का यथासाध्य वर्णन किया है | मनुष्य लीला समाप्त करके परमधाम में पधारने के प्रसंग में भी यह बात स्पष्ट करदी गई है कि श्रीराम साक्षात् पूर्ण-ब्रह्म परमेश्वर थे | अत: वाल्मीकीय रामायण को प्रामाणिक ग्रन्थ मानने वाला कोई भी मनुष्य श्रीराम के ईश्वर होने में शंका कर सके, ऐसी गुंजाईश नहीं है | {गीताप्रेस,गोरखपुर द्वारा प्रकाशित तत्त्व चिंतामणि पुस्तक से }

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