Radhika singh Dec 14, 2019

आज की कथा ,आप सभी पढ़े, अब देखते है ,कोन पढ़ता है। "भगवान" से अलग कर देता है-अभिमान भक्ति में अहंकार... भक्ति को तामसी (घमण्ड.. अभिमान.. क्रोध.. कठोरता.. और अज्ञान)कर देता है... जो लोग यह हठ करते हैं कि "हम" ही सही हैं...इस तरह अहंकार व्यक्ति के अज्ञानता और मूर्खता का परिचायक है... क्योंकि भगवान को गर्व-अहंकार बिल्कुल भी नहीं सुहाता है ऐसा अहंकारी मनुष्य अज्ञानवश... "मैं यह हूँ".. "मैं वो हूँ".."यह तू है"..."मैं कर्ता हूँ"...ऐसा मानकर हरेक कार्य को अपने द्वारा किया हुआ समझता है...यही उसके दु:ख व पतन का कारण है...! अर्जुन को लगता था कि भगवान "श्रीकृष्ण" का सबसे लाड़ला मैं ही हूँ... उन्होंने मेरे प्रेम के वश ही अपनी बहन सुभद्रा को मुझे सौंप दिया है... इसलिए युद्धक्षेत्र में वे मेरे सारथि बने... यहां तक कि रणभूमि में स्वयं अपने हाथों से मेरे घोड़ों के घाव तक भी धोते रहे... यद्यपि मैं उनको प्रसन्न करने के लिए कुछ नहीं करता... फिर भी मुझे सुखी करने में उन्हें बहुत आन्नद मिलता है...साथ ही अर्जुन को अपनी बाण-विद्या पर बहुत घमण्ड हो गया था... ! एक दिन अर्जुन ने "श्रीकृष्ण" से कहा, "रामावतार के समय आपने समुद्र पर सेतु बनाने के लिए वानर-भालुओं को बेकार में ही कष्ट दिया... आपने क्यों नहीं समुद्र के ऊपर अपने बाणों से पुल बना लिया... वानर सेना के साथ बहुत आराम से लंका पहुंच जाते...!" "प्रभु" को समझते देर न लगी कि... अभिमान की मदिरा ने अर्जुन के मन को मतवाला बना दिया है... "श्रीकृष्ण" ने कहा,"क्या तुम अपने बाणों से समुद्र पर पुल बना सकते हो... ?" -"हाँ अवश्य आप आदेश करे...!" -"पहले तुम समुद्र के एक छोटे से अंश पर ही बाणों से पुल बनाकर दिखाओ... बाद में मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दूंगा...!" यह सुनकर अर्जुन ने तुरन्त ही समुद्र के एक भाग पर बाणों का पुल तैयार कर दिया... तब श्रीकृष्ण ने हनुमानजी का स्मरण किया और हनुमानजी तुरन्त ही वहां उपस्थित हो गये... "श्रीकृष्ण" ने हनुमानजी से कहा,"तुम इस पुल पर चलकर दिखाओ...!" "जो आज्ञा"...कहकर हनुमानजी जैसे ही उस पुल पर चढ़े वह चरमराकर टूट गया..तभी अर्जुन ने देखा कि "श्रीकृष्ण" की पीठ से रक्त बह रहा है...घबराते हुए अर्जुन ने पूछा... "प्रभु ! आपकी पीठ से रक्त क्यों बह रहा है...?" -"हनुमान के पांव रखते ही तुम्हारा बनाया पुल समुद्र में धंस जाता... इससे तुम्हारी बड़ी बदनामी होती... तुम्हारे सम्मान की रक्षा के लिए...मैं कच्छप रूप धारण कर पुल के नीचे आधार बन कर टिक गया... मैंने पुल को डूबने से तो बचा लिया... किन्तु पुल के टूटे भाग से बाण निकल कर मेरी पीठ में धंस गये...जिससे मेरे पीठ में से रक्त बह रहा है... वानर सेना में तो हनुमान जैसे बलशाली असंख्य वानर थे... अब तुम्हीं बताओ क्या उनके भार को बाणों का पुल सहन कर सकता था... ?" अर्जुन को सारा रहस्य समझ आ गया और "प्रभु" के चरणों मे गिर पड़े... उनका अहंकार भी नष्ट हो गया... ! Good Night 😴 दोस्तों

+22 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 1 शेयर
Radhika singh Dec 13, 2019

धर्म ज्ञान श्री कृष्ण के बारे में कूछ रोचक जानकारीया कृष्ण को पूर्णावतार कहा गया है। कृष्ण के जीवन में वह सबकुछ है जिसकी मानव को आवश्यकता होती है। कृष्ण गुरु हैं, तो शिष्य भी। आदर्श पति हैं तो प्रेमी भी। आदर्श मित्र हैं, तो शत्रु भी। वे आदर्श पुत्र हैं, तो पिता भी। युद्ध में कुशल हैं तो बुद्ध भी। कृष्ण के जीवन में हर वह रंग है, जो धरती पर पाए जाते हैं इसीलिए तो उन्हें पूर्णावतार कहा गया है। मूढ़ हैं वे लोग, जो उन्हें छोड़कर अन्य को भजते हैं… ‘भज गोविन्दं मुढ़मते। आठ का अंक : """"""”""""""""""""""" कृष्ण के जीवन में आठ अंक का अजब संयोग है। उनका जन्म आठवें मनु के काल में अष्टमी के दिन वसुदेव के आठवें पुत्र के रूप में जन्म हुआ था। उनकी आठ सखियां, आठ पत्नियां, आठमित्र और आठ शत्रु थे। इस तरह उनके जीवन में आठ अंक का बहुत संयोग है। कृष्ण के नाम : """"""""""""""""""""""" नंदलाल, गोपाल, बांके बिहारी, कन्हैया, केशव, श्याम, रणछोड़दास, द्वारिकाधीश और वासुदेव। बाकी बाद में भक्तों ने रखे जैसे ‍मुरलीधर, माधव, गिरधारी, घनश्याम, माखनचोर, मुरारी, मनोहर, हरि, रासबिहारी आदि। कृष्ण के माता-पिता : """"”""""""""""""""""""""""""""""" कृष्ण की माता का नाम देवकी और पिता का नाम वसुदेव था। उनको जिन्होंने पाला था उनका नाम यशोदा और धर्मपिता का नाम नंद था। बलराम की माता रोहिणी ने भी उन्हें माता के समान दुलार दिया। रोहिणी वसुदेव की प‍त्नी थीं। कृष्ण के गुरु : """"""""""""""""""""""" गुरु संदीपनि ने कृष्ण को वेद शास्त्रों सहित 14 विद्या और 64 कलाओं का ज्ञान दिया था। गुरु घोरंगिरस ने सांगोपांग ब्रह्म ‍ज्ञान की शिक्षा दी थी। माना यह भी जाता है कि श्रीकृष्ण अपने चचेरे भाई और जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ के प्रवचन सुना करते थे। कृष्ण के भाई : """""""""""""""""""""" कृष्ण के भाइयों में नेमिनाथ, बलराम और गद थे। शौरपुरी (मथुरा) के यादववंशी राजा अंधकवृष्णी के ज्येष्ठ पुत्र समुद्रविजय के पुत्र थे नेमिनाथ। अंधकवृष्णी के सबसे छोटे पुत्र वसुदेव से उत्पन्न हुए भगवान श्रीकृष्ण। इस प्रकार नेमिनाथ और श्रीकृष्ण दोनों चचेरे भाई थे। इसके बाद बलराम और गद भी कृष्ण के भाई थे। कृष्ण की बहनें : """""""""""""""""""""""""" कृष्ण की 3 बहनें थी : 1. एकानंगा (यह यशोदा की पुत्री थीं)। 2. सुभद्रा : वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी से बलराम और सुभद्र का जन्म हुआ। वसुदेव देवकी के साथ जिस समय कारागृह में बंदी थे, उस समय ये नंद के यहां रहती थीं। सुभद्रा का विवाह कृष्ण ने अपनी बुआ कुंती के पुत्र अर्जुन से किया था। जबकि बलराम दुर्योधन से करना चाहते थे। 3. द्रौपदी : पांडवों की पत्नी द्रौपदी हालांकि कृष्ण की बहन नहीं थी, लेकिन श्रीकृष्‍ण इसे अपनी मानस ‍भगिनी मानते थे। 4.देवकी के गर्भ से सती ने महामाया के रूप में इनके घर जन्म लिया, जो कंस के पटकने पर हाथ से छूट गई थी। कहते हैं, विन्ध्याचल में इसी देवी का निवास है। यह भी कृष्ण की बहन थीं। कृष्ण की पत्नियां : """""""""""""""""""""""""""" रुक्मिणी, जाम्बवंती, सत्यभामा, मित्रवंदा, सत्या, लक्ष्मणा, भद्रा और कालिंदी। कृष्ण के पुत्र : """"""""""""""""""""""""" रुक्मणी से प्रद्युम्न, चारुदेष्ण, जम्बवंती से साम्ब, मित्रवंदा से वृक, सत्या से वीर, सत्यभामा से भानु, लक्ष्मणा से…, भद्रा से… और कालिंदी से…। कृष्ण की पुत्रियां : """""""""""""""''"""'''''''''''''""""" रुक्मणी से कृष्ण की एक पुत्री थीं जिसका नाम चारू था। कृष्ण के पौत्र : """""""""""""""""""""""" प्रद्युम्न से अनिरुद्ध। अनिरुद्ध का विवाह वाणासुर की पुत्री उषा के साथ हुआ था। कृष्ण की 8 सखियां : """"""""""""""""""""""""""""""""" राधा, ललिता आदि सहित कृष्ण की 8 सखियां थीं। सखियों के नाम निम्न हैं- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार इनके नाम इस तरह हैं- चन्द्रावली, श्यामा, शैव्या, पद्या, राधा, ललिता, विशाखा तथा भद्रा। कुछ जगह ये नाम इस प्रकार हैं- चित्रा, सुदेवी, ललिता, विशाखा, चम्पकलता, तुंगविद्या, इन्दुलेखा, रग्डदेवी और सुदेवी। इसके अलावा भौमासुर से मुक्त कराई गई सभी महिलाएं कृष्ण की सखियां थीं। कुछ जगह पर- ललिता, विशाखा, चम्पकलता, चित्रादेवी, तुङ्गविद्या, इन्दुलेखा, रंगदेवी और कृत्रिमा (मनेली)। इनमें से कुछ नामों में अंतर है। कृष्ण के 8 मित्र : """"""""""""""""""""""""" श्रीदामा, सुदामा, सुबल, स्तोक कृष्ण, अर्जुन, वृषबन्धु, मन:सौख्य, सुभग, बली और प्राणभानु। इनमें से आठ उनके साथ मित्र थे। ये नाम आदिपुराण में मिलते हैं। हालांकि इसके अलावा भी कृष्ण के हजारों मित्र थे जिसनें दुर्योधन का नाम भी लिया जाता है। कृष्ण के शत्रु : """""""""""""""""""""""""" कंस, जरासंध, शिशुपाल, कालयवन, पौंड्रक। कंस तो मामा था। कंस का श्वसुर जरासंध था। शिशुपाल कृष्ण की बुआ का लड़का था। कालयवन यवन जाति का मलेच्छ जा था जो जरासंध का मित्र था। पौंड्रक काशी नरेश था जो खुद को विष्णु का अवतार मानता था। कृष्ण के शिष्य : """""""""""""""""""""""""" कृष्ण ने किया जिनका वध : ताड़का, पूतना, चाणूड़, शकटासुर, कालिया, धेनुक, प्रलंब, अरिष्टासुर, बकासुर, तृणावर्त अघासुर, मुष्टिक, यमलार्जुन, द्विविद, केशी, व्योमासुर, कंस, प्रौंड्रक और नरकासुर आदि। कृष्ण चिन्ह : """"""""""""""""""""" सुदर्शन चक्र, मोर मुकुट, बंसी, पितांभर वस्त्र, पांचजन्य शंख, गाय, कमल का फूल और माखन मिश्री। कृष्ण लोक : """""""""""""""""""""" वैकुंठ, गोलोक, विष्णु लोक। *कृष्ण ग्रंथ : महाभारत और गीता कृष्ण का कुल : """""""""""""""""""""""" यदुकुल। कृष्ण के समय उनके कुल के कुल 18 कुल थे। अर्थात उनके कुल की कुल 18 शाखाएं थीं। यह अंधक-वृष्णियों का कुल था। वृष्णि होने के कारण ये वैष्णव कहलाए। अन्धक, वृष्णि, कुकर, दाशार्ह भोजक आदि यादवों की समस्त शाखाएं मथुरा में कुकरपुरी (घाटी ककोरन) नामक स्थान में यमुना के तट पर मथुरा के उग्रसेन महाराज के संरक्षण में निवास करती थीं। शाप के चलते सिर्फ यदु‍ओं का नाश होने के बाद अर्जुन द्वारा श्रीकृष्ण के पौत्र वज्रनाभ को द्वारिका से मथुरा लाकर उन्हें मथुरा जनपद का शासक बनाया गया। इसी समय परीक्षित भी हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठाए गए। वज्र के नाम पर बाद में यह संपूर्ण क्षेत्र ब्रज कहलाने लगा। जरासंध के वंशज सृतजय ने वज्रनाभ वंशज शतसेन से 2781 वि.पू. में मथुरा का राज्य छीन लिया था। बाद में मागधों के राजाओं की गद्दी प्रद्योत, शिशुनाग वंशधरों पर होती हुई नंद ओर मौर्यवंश पर आई। मथुराकेमथुर नंदगाव, वृंदावन, गोवर्धन, बरसाना, मधुवन और द्वारिका। कृष्ण पर्व : """"""""""""""""""" श्री कृष्ण ने ही होली और अन्नकूट महोत्सव की शुरुआत की थी। जन्माष्टमी के दिन उनका जन्मदिन मनाया जाता है। मथुरा मंडल के ये 41 स्थान कृष्ण से जुड़े हैं:- """"""""""""""""""""""""" मधुवन, तालवन, कुमुदवन, शांतनु कुण्ड, सतोहा, बहुलावन, राधा-कृष्ण कुण्ड, गोवर्धन, काम्यक वन, संच्दर सरोवर, जतीपुरा, डीग का लक्ष्मण मंदिर, साक्षी गोपाल मंदिर, जल महल, कमोद वन, चरन पहाड़ी कुण्ड, काम्यवन, बरसाना, नंदगांव, जावट, कोकिलावन, कोसी, शेरगढ, चीर घाट, नौहझील, श्री भद्रवन, भांडीरवन, बेलवन, राया वन, गोपाल कुण्ड, कबीर कुण्ड, भोयी कुण्ड, ग्राम पडरारी के वनखंडी में शिव मंदिर, दाऊजी, महावन, ब्रह्मांड घाट, चिंताहरण महादेव, गोकुल, संकेत तीर्थ, लोहवन और वृन्दावन। इसके बाद द्वारिका, तिरुपति बालाजी, श्रीनाथद्वारा और खाटू श्याम प्रमुख कृष्ण स्थान है। भक्तिकाल के कृष्ण भक्त: """"""""""""""""""""""""""""""""""""""" सूरदास, ध्रुवदास, रसखान, व्यासजी, स्वामी हरिदास, मीराबाई, गदाधर भट्ट, हितहरिवंश, गोविन्दस्वामी, छीतस्वामी, चतुर्भुजदास, कुंभनदास, परमानंद, कृष्णदास, श्रीभट्ट, सूरदास मदनमोहन, नंददास, चैतन्य महाप्रभु आदि। कृष्णा जिनका नाम है गोकुल जिनका धाम है ऐसे श्री कृष्ण को मेरा बारम्बार प्रणाम है 🐄🚶🏻🐄🚶🏻🐄🚶🏻 ।।जय श्रीहरी शरणम्।। ।।श्रीकृषणम् वन्दे जगद्गुरु की जय।। जय श्रीराधे कृष्णा 🙏🏻🌹🙏🌹🙏🌹🙏🏻 Good Night 😴 दोस्तों

+33 प्रतिक्रिया 9 कॉमेंट्स • 2 शेयर
Radhika singh Dec 13, 2019

#अधूरा_ज्ञान_खतरनाक_होता_है। 33 करोड़ नहीं 33 कोटि देवी देवता हैं हिंदू धर्म में ; कोटि = प्रकार । देवभाषा संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते हैं । कोटि का मतलब प्रकार होता है और एक अर्थ करोड़ भी होता है। हिंदू धर्म का दुष्प्रचार करने के लिए ये बात उड़ाई गयी की हिन्दूओं के 33 करोड़ देवी देवता हैं और अब तो मुर्ख हिन्दू खुद ही गाते फिरते हैं की हमारे 33 करोड़ देवी देवता हैं... कुल 33 प्रकार के देवी देवता हैँ हिंदू धर्म में :- 12 प्रकार हैँ :- आदित्य , धाता, मित, आर्यमा, शक्रा, वरुण, अँशभाग, विवास्वान, पूष, सविता, तवास्था, और विष्णु...! 8 प्रकार हैं :- वासु:, धरध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष। 11 प्रकार हैं :- रुद्र: ,हरबहुरुप, त्रयँबक, अपराजिता, बृषाकापि, शँभू, कपार्दी, रेवात, मृगव्याध, शर्वा, और कपाली। एवँ दो प्रकार हैँ अश्विनी और कुमार । कुल :- 12+8+11+2=33 कोटी अगर कभी भगवान् के आगे हाथ जोड़ा है । तो इस जानकारी को अधिक से अधिक लोगो तक पहुचाएं । यह बहुत ही अच्छी जानकारी है इसे अधिक से अधिक लोगों में बाँटिये और इस कार्य के माध्यम से पुण्य के भागीदार बनिये । 🙏अब आपकी बारी है कि इस जानकारी को आगे बढ़ाए 📜अपने भारत की संस्कृति को पहचानें। ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुचायें। खासकर अपने बच्चों को बताएं क्योंकि ये बात उन्हें कोई दूसरा व्यक्ति नहीं बताएगा... 📜😇 दो पक्ष- कृष्ण पक्ष , शुक्ल पक्ष ! 📜😇 तीन ऋण - देव ऋण , पितृ ऋण , ऋषि ऋण ! 📜😇 चार युग - सतयुग , त्रेतायुग , द्वापरयुग , कलियुग ! 📜😇 चार धाम - द्वारिका , बद्रीनाथ , जगन्नाथ पुरी , रामेश्वरम धाम ! 📜😇 चारपीठ - शारदा पीठ ( द्वारिका ) ज्योतिष पीठ ( जोशीमठ बद्रिधाम ) गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) , शृंगेरीपीठ ! 📜😇 चार वेद- ऋग्वेद , अथर्वेद , यजुर्वेद , सामवेद ! 📜😇 चार आश्रम - ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , वानप्रस्थ , संन्यास ! 📜😇 चार अंतःकरण - मन , बुद्धि , चित्त , अहंकार ! 📜😇 पञ्च गव्य - गाय का घी , दूध , दही , गोमूत्र , गोबर ! 📜 📜😇 पंच तत्त्व - पृथ्वी , जल , अग्नि , वायु , आकाश ! 📜😇 छह दर्शन - वैशेषिक , न्याय , सांख्य , योग , पूर्व मिसांसा , दक्षिण मिसांसा ! 📜😇 सप्त ऋषि - विश्वामित्र , जमदाग्नि , भरद्वाज , गौतम , अत्री , वशिष्ठ और कश्यप! 📜😇 सप्त पुरी - अयोध्या पुरी , मथुरा पुरी , माया पुरी ( हरिद्वार ) , काशी , कांची ( शिन कांची - विष्णु कांची ) , अवंतिका और द्वारिका पुरी ! 📜😊 आठ योग - यम , नियम , आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान एवं समािध ! 📜 📜 📜😇 दस दिशाएं - पूर्व , पश्चिम , उत्तर , दक्षिण , ईशान , नैऋत्य , वायव्य , अग्नि आकाश एवं पाताल 📜😇 बारह मास - चैत्र , वैशाख , ज्येष्ठ , अषाढ , श्रावण , भाद्रपद , अश्विन , कार्तिक , मार्गशीर्ष , पौष , माघ , फागुन ! 📜 📜 📜😇 पंद्रह तिथियाँ - प्रतिपदा , द्वितीय , तृतीय , चतुर्थी , पंचमी , षष्ठी , सप्तमी , अष्टमी , नवमी , दशमी , एकादशी , द्वादशी , त्रयोदशी , चतुर्दशी , पूर्णिमा , अमावास्या ! 📜😇 स्मृतियां - मनु , विष्णु , अत्री , हारीत , याज्ञवल्क्य , उशना , अंगीरा , यम , आपस्तम्ब , सर्वत , कात्यायन , ब्रहस्पति , पराशर , व्यास , शांख्य , लिखित , दक्ष , शातातप , वशिष्ठ ! ********************** इस पोस्ट को अधिकाधिक शेयर करें जिससे सबको हमारी सनातन भारतीय संस्कृति का ज्ञान हो। ऊपर जाने पर एक सवाल ये भी पूँछा जायेगा कि अपनी अँगुलियों के नाम बताओ । जवाब:- अपने हाथ की छोटी उँगली से शुरू करें :- (1)जल (2) पृथ्वी (3)आकाश (4)वायू (5) अग्नि ये वो बातें हैं जो बहुत कम लोगों को मालूम होंगी । 5 जगह हँसना करोड़ो पाप के बराबर है 1. श्मशान में 2. अर्थी के पीछे 3. शौक में 4. मन्दिर में 5. कथा में सिर्फ 1 बार भेजो बहुत लोग इन पापो से बचेंगे ।। अकेले हो? परमात्मा को याद करो । परेशान हो? ग्रँथ पढ़ो । उदास हो? कथाए पढो । टेन्शन मे हो? भगवत गीता पढो । फ्री हो? अच्छी चीजे फोरवार्ड करो हे परमात्मा हम पर और समस्त प्राणियो पर कृपा करो...... सूचना क्या आप जानते हैं ? हिन्दू ग्रंथ रामायण, गीता, आदि को सुनने,पढ़ने से कैन्सर नहीं होता है बल्कि कैन्सर अगर हो तो वो भी खत्म हो जाता है। व्रत,उपवास करने से तेज़ बढ़ता है,सर दर्द और बाल गिरने से बचाव होता है । आरती----के दौरान ताली बजाने से दिल मजबूत होता है । ये मेसेज असुर भेजने से रोकेगा मगर आप ऐसा नही होने दे और मेसेज सब नम्बरो को भेजे । श्रीमद भगवत गीता पुराण और रामायण । . ''कैन्सर" एक खतरनाक बीमारी है... बहुत से लोग इसको खुद दावत देते हैं ... बहुत मामूली इलाज करके इस बीमारी से काफी हद तक बचा जा सकता है ... अक्सर लोग खाना खाने के बाद "पानी" पी लेते है ... खाना खाने के बाद "पानी" ख़ून में मौजूद "कैन्सर "का अणु बनाने वाले '''सैल्स'''को '''आक्सीजन''' पैदा करता है... ''हिन्दु ग्रंथो मे बताया गया है कि... खाने से पहले'पानी 'पीना अमृत"है... खाने के बीच मे 'पानी ' पीना शरीर की ''पूजा'' है... खाना खत्म होने से पहले 'पानी' ''पीना औषधि'' है... खाने के बाद 'पानी' पीना" बीमारीयो का घर है... बेहतर है खाना खत्म होने के कुछ देर बाद 'पानी 'पीये... ये बात उनको भी बतायें जो आपको "जान"से भी ज्यादा प्यारे है रोज एक सेब नो डाक्टर । रोज पांच बदाम, नो कैन्सर । रोज एक निबु, नो पेट बढना । रोज एक गिलास दूध, नो बौना (कद का छोटा)। रोज 12 गिलास पानी, नो चेहेरे की समस्या । रोज चार काजू, नो भूख । रोज मन्दिर जाओ, नो टेन्शन । रोज कथा सुनो मन को शान्ति मिलेगी ।। "चेहरे के लिए ताजा पानी"। "मन के लिए गीता की बाते"। "सेहत के लिए योग"। और खुश रहने के लिए परमात्मा को याद किया करो । अच्छी बाते फैलाना पुण्य है.किस्मत मे करोड़ो खुशियाँ लिख दी जाती हैं । जीवन के अंतिम दिनो मे इन्सान इक इक पुण्य के लिए तरसेगा । जय श्री कृष्ण 🙏🙏🙏 Good Afternoon Friends 🌞

+19 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 2 शेयर
Radhika singh Dec 13, 2019

🌿🙏🙏🌹🌹Jai mata di 🌹🌹🙏🙏 🌿एक महिला रोज मंदिर जाती थी l एक दिन उस महिला ने पुजारी से कहा अब मैं मंदिर नही आया करूँगी । इस पर पुजारी ने पूछा क्यों ??? तब महिला बोली मैं देखती हूँ लोग मंदिर परिसर मे अपने फोन से अपने व्यापार की बात करते हैं l कुछ ने तो मंदिर को ही गपशप करने का स्थान चुन रखा है l कुछ पूजा कम पाखंड,दिखावा ज्यादा करते हैं l इस पर पुजारी कुछ देर तक चुप रहे फिर कहा सही है.. परंतु अपना अंतिम निर्णय लेने से पहले आप मेरे कहने से कुछ कर सकती हैं। महिला बोली -आप बताइए क्या करना है ? पुजारी ने कहा- एक गिलास पानी भर लीजिए और 2 बार मंदिर परिसर के अंदर परिक्रमा लगाइए शर्त ये है कि गिलास का पानी गिरना नही चाहिये। महिला बोली-मैं ऐसा कर सकती हूँ फिर थोड़ी ही देर में उस महिला ने ऐसा कर दिखाया। उसके बाद मंदिर के पुजारी ने महिला से 3 सवाल पूछे :- 1.क्या आपने किसी को फोन पर बात करते देखा l 2.क्या आपने किसी को मंदिर मे गपशप करते देखा l 3.क्या किसी को पाखंड करते देखा l महिला बोली-नही मैंने कुछ भी नही देखा l फिर पुजारी बोले- जब आप परिक्रमा लगा रही थी तो आपका पूरा ध्यान गिलास पर था कि इसमे से पानी न गिर जाए इसलिए आपको कुछ दिखाई नही दिया। अब जब भी आप मंदिर आये तो सिर्फ अपना ध्यान प्रभु में ही लगाना फिर आपको कुछ दिखाई ही नही देगा । सिर्फ भगवान ही सर्ववृत दिखाई देगा जब ऐसा होगा तो स्वयं ही कल्पना कर लीजियेगा। #प्यारे__ हिम्मत ही है कहाँ, मुझमे इतनी कि, तेरी दूनियाँ की मुश्किलौं से, मै अकेले लड़ पाऊँ, ये तो तूम हो प्यारे, जो सामने खडे होकर, मेरी हर मुश्किल का हल, निकाल देते हो ❥ Զเधे-Զเधे ❥ Good Morning 🌞 Friends

+36 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 1 शेयर
Radhika singh Dec 12, 2019

वन्दे विष्णुं और श्रीमद्भगवद्गीता आज मार्गशीर्ष शुक्ल ग्यारस मोक्षदा एकादशी अर्थात गीता जयन्ती (८/१२/२०१९) की शुभ संध्या पर सभी मित्रों,पाठकों और लेखकों को भगवद्गीता की प्रादुर्भाव तिथि पर कोटि कोटि बधाइयां।भगवान विष्णु की व्यापकता और लक्ष्मी पति की महत्ता श्रीमद्भगवद्गीता के परिपेक्ष्य में। "शान्ताकारं(शान्त+आकारं),भुजगशयनं,पद्मनाभं,सुरेशं (सुर+ईशं) विश्वाधारं(विश्व+आधारं),गगनसद्रशं,मेघवर्णं,शुभाङ्गम्(शुभ+अङ्गम्)।लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिः ध्यान गम्यं।वन्दे विष्णुं भवभय हरं सर्वलोक एक नाथं। भावार्थ- ०१ शान्ताकारं भुजगशयनं -"जिनका कि आकार अति शांत है।जो कि भुजग अर्थात शेष नाग की शैय्या पर विश्राम करते हैं। योग निद्रा लेते हैं,("अनन्तः च अस्मि नागानां " गीता १०/२९।अर्थात नागों में मैं शेष नाग या अनंत नाग हूँ )! ०२.पध्मनाभं -जिनकी कि नाभी से पद्म (कलम) का प्रादुर्भाव है ("ब्रह्माणं ईशम् कमल आसन स्थम् "गीता ११/१५।"अर्थात कमल के आसान पर बैठे हुए श्रष्टि कर्ता ब्रह्मा) ०३.सुरेशं -और जो कि सभी देवताओं के ईश अर्थात भगवान हैं ! ("कस्मात् च ते न नमेरन् महात्मन् ब्रह्मणः अपि आदिकर्त्रे" गीता ११/३७।अर्थात ये सभी देवता/ऋषि मुनि आपको क्यों नहीं प्रणाम करे जबकि आप ब्रह्मा सहित इन सभी की उत्पत्ति का कारण हो अर्थात इन सभी सिद्ध पुरुषों और देवताओं के भी भगवान।), ०४.विश्वाधारं -जो कि इस विश्व,इस ब्रह्माण्ड का आधार या मूल कारण हैं ("यतः प्रवत्तिः भूतानां।गीता १८/४६और" त्वम् अस्य विश्वस्य परं निधानं" गीता ११/३८।भावार्थ जिसकी कि प्रवर्ति से सभी भूतों की उत्पत्ति हुई है और जो कि इस सम्पूर्ण विश्व का परम आश्रय है।) ०५.गगनसद्रशं- और जो कि आकाश के सामान सर्वत्र व्याप्त हैं।(यथा आकाश स्थितः नित्यम् वायुः सर्वत्रगो महान्।तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानि इति उप धारय। गीता ९/६।भावार्थ "जिस प्रकार सर्वत्र विचरने वाली वायु हमेशा आकाश में ही स्थित है उसी प्रकार सभी भूत प्राणी मेरे संकल्प के आधार पर मुझ वासुदेव में ही स्थित हैं।")! ०६.मेघवर्णं शुभाङ्गम् लक्ष्मीकान्तं -जिनका कि वर्ण या रंग घने मेघों के सामान है और जिनके कि अंग अति शुभ और सुन्दर हैं।जो कि लक्ष्मी देवी के कांत अर्थात स्वामी या पति हैं। "यत्र योगेश्वरः कृष्णः,तत्र श्रीः"अर्थात जहाँ भगवान् कृष्ण हैं वहां श्री है )! ०७.कमलनयनं -जिनके कि नेत्र कमल के सद्रश्य हैं।("त्वतः कमलपत्राक्ष" गीता ११/२!अर्थात आप कमल नयनों वाले)! ०८ योगिभिःध्यान गम्यम्- और जो कि योगियों द्वारा ध्यान गम्य हैं अर्थात योगियों को समाधि में दर्शन देने वाले हैं।("योगिनां अपि सर्वेषां मत् गतेन अन्तर आत्मना।श्रद्धावान् भजते यः माम् सः मे युक्त्मतःमतः" गीता ६/४७ भावार्थ सभी योगियों में जो मुझे ध्यान में समाधिस्थ होकर प्रेमपूर्वक भजता है या ध्यान में मेरा दर्शन करता है वह योगी मुझे सबसेअधिक प्रिय है)! ०९.वन्दे विष्णुं भव भय हरं -ऐसे भगवान विष्णु।श्री नारायण या हरि की मैं वन्दना करता हूँ जो कि इस भव या संसार के भय और त्रास से मुक्ति दिलाने वाले हैं।("तेषां अहं समुद्धर्ता म्रत्यु संसार सागरात्" गीता १२/७ भावार्थ उन भक्तों को मैं इस संसार रूपी चक्र या भवसागर से उबारने वाला होता हूँ)! १० .सर्व लोक एक नाथम् - यही वो भगवान विष्णु,हरि(सभी पापों को हरने वाले)अर्थात नारायण (नारा+आयन= जल में विश्राम करने वाले) सभी लोकों (जल,थल और नभ अर्थात त्रिलोक) के एकमात्र,एकक्षत्र नाथ या स्वामी हैं।("यतः प्रवत्तिःभूतानां येन सर्वम् इदम् ततं" गीता १८/४६।भावार्थ जिस परमेश्वर से इस संसार की उत्पत्ति हुई है और जिसके कि अन्दर यह सम्पूर्ण संसार या जगत और सभी भूत प्राणी स्थित हैं वही इस संसारका एकक्षत्र मालिक है अर्थात हरिः,नारायण, भगवान विष्णु या श्री कृष्ण। और उक्त लक्ष्मी और उनके कान्त अर्थात भवन विष्णु की स्तुति के बाद लेख का समापन श्रीमद्भगवद्गीता के अंतिम श्लोक १८/७८ अर्थात मोक्ष संन्यास योग से जिसमे कि संजय ये कहते हैं। "यत्र योगेश्वरः कृष्णः यत्र पार्थः धनुर्धरः।तत्र श्रीः विजयः भूतिः ध्रुवा नीतिः मतिः मम।भावार्थ "जहाँ पर भगवान कृष्ण अर्थात श्री हरिः हैं और जहाँ पर अर्जुन के समान धनुर्धारी भक्त और भगवान का सच्चा सखा है वहीं पर श्री(लक्ष्मी),विजय,अचल विभूती और सत्य नीति का निवास है। श्रीमद्भगवद्गीता १८/७८! जय कृष्णा जय कृष्णा कृष्णा।जय कृष्णा जय श्री कृष्णा। जय गीता,जय गीता गीता।जय गीता जय भगवद्गीता।गीता विद्यार्थी हरेकृष्ण हरेकृष्ण,कृष्ण कृष्ण हरे हरे।हरे राम हरे राम,राम राम हरे हरे। एक प्रयास कि हम सभी श्रीमद्भगवद्गीता से जुड़े रहे ताकि कालान्तर में सदगति सुनिश्चित हो। गीता दर्शन/गीता ध्यान/गीता चिंतन।विशिष्ट मकसद- भगवद्गीता की महत्ता और व्यापकता का जनसाधारण के बीच पुनुरुत्थान।!The Mission is to revive the Glory of Shrimad Bhagavad Geeta the Voice of the Lord. जय श्री कृष्ण अर्पणं अस्तु!

+30 प्रतिक्रिया 8 कॉमेंट्स • 2 शेयर
Radhika singh Dec 12, 2019

+35 प्रतिक्रिया 6 कॉमेंट्स • 4 शेयर