🙏 🙏 🌹ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः🌹🙏 🙏 🌹ओम नमो भगवते वासुदेवया यह एक प्रसिद्ध हिन्दू मंत्र है। यह मंत्र भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण दोनों का मंत्र है। इसमें दो परंपराएं हैं-तांत्रिक और पुराणिक। तांत्रिक पंरपराये में ऋषि प्रजापति आते है और पुराणिक पंरपरा में ऋषि नारदा जी आते है। हालांकि, दोनों कहते हैं कि यह सर्वोच्च विष्णु मंत्र है। 🌹शारदा तिलक तन्त्रम कहते है कि ‘देवदर्शन महामंत्र् प्राधन वैष्णवगाम’ बारह वैष्णव मंत्रों में यह मत्रं प्रमुख हैं।🙏 इसी प्रकार ‘श्रीमद् भगवतम्’ के 12 अध्याय को इस मंत्र के 12 अक्षर के विस्तार के रूप में लिए गए है। इस मंत्र को मुक्ति का मंत्र कहा जाता है और मोक्ष प्राप्त करने के लिए एक आध्यात्मिक सूत्र के रूप में माना जाता है। 🌹 मंत्र ‘श्रीमद् भगवतम्’ का प्रमुख मंत्र है इस मंत्र का वर्णन विष्णु पुराण में भी मिलता है। 🌹🌹ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः🌹🌹 🌹मंत्र का अर्थ:- 🌹ओम - ओम यह ब्रंह्माडीय व लौकीक ध्वनि है। 🌹नमो - अभिवादन व नमस्कार। 🌹भगवते - शक्तिशाली, दयालु व जो दिव्य है। 🌹वासुदेवयः - वासु का अर्थ हैः सभी प्राणियों में जीवन देवयः का अर्थ हैः ईश्वर। इसका मतलब है कि भगवान (जीवन/प्रकाश) जो सभी प्राणियों का जीवन है। 🌹वासुदेव भगवान! अर्थात् जो वासुदेव भगवान नर में से नारायण बने, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ। 🌹 🙏🙏 🌹जय जय नारायण नारायण हरि हरि 🌷🙏

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🚩🎊💰🎊💰🎊💰🎊💰🚩 *(अक्षय पुण्य प्राप्त करने का पर्व है-अक्षय तृतीया)* (इस दिन दिये दान के कण कण का मिलता है अक्षय पुण्य) ~~~~~~~~~~~~~~~~~ *👉🏻हर साल वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतिया को अक्षय तृतीया का पर्व मनाया जाता है। इस समय सूर्य और चंद्रमा उच्च भाव में होते हैं। धार्मिक मान्यताओं अनुसार ये दिन बेहद ही शुभ होता है। इस दिन कोई भी शुभ काम बिना मुहूर्त देखे किया जा सकता है। अक्षय तृतीया का पावन पर्व इस बार 14 मई को है। इस खास मौके पर सोने की खरीदारी करने की परंपरा है।* ~~~~~~~~~~~~~~~~~ *(बिहारी जी के चरण दर्शन)* बांकेबिहारी मन्दिर वृन्दावन में साल में यह अकेला पवित्र दिन है जब ठाकुर बांकेबिहारी जी के चरण दर्शन भक्तों को मिलते हैं । हर वर्ष देश विदेश के करोड़ो भक्त इस दिन चरण दर्शन कर भगवान को पायल भेंट करते हैं । ~~~~~~~~~~~~~~~~~ *(स्नान दान का प्रमुख पर्व)* अक्षय तृतीया के दिन अबूझ मुहूर्त रहता है। यानी इस दिन कोई भी शुभ काम बिना मुहूर्त देखे किये जा सकते हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। *(भगवान परशुराम अवतार)* धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन भगवान परशुराम का अवतार हुआ था। इस पवित्र दिन पर दान- पुण्य करने का भी बहुत अधिक महत्व होता है। *अक्षय तृतीया के पर सोना खरीदने की भी परंपरा है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन सोने की खरीददारी करने से घर-परिवार में सुख- समृद्धि आती है।* *👉🏻अक्षय तृतीया- शुक्रवार 14 मई 2021 को* अक्षय तृतीया पूजा मुहूर्त- 05:38 AM से 12:18 PM अवधि- 06 घण्टे 40 मिनट्स तृतीया तिथि प्रारम्भ- मई 14, 2021 को 05:38 AM बजे तृतीया तिथि समाप्त- मई 15, 2021 को 07:59 AM बजे 🎷🎷🎷🎷🎷🎷🎷

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🌺 *फल-फलारी के पद* 🌺 🎄 *चिकसौली के चना चोर श्यामसुन्दर* ☘* एक दिन श्याम सुंदर अपने सखाओं के साथ चिकसौली में विहार करने आये तो देखा एक खेत में चने लग रहे बहुत सुंदर सखाओं ने श्याम सुंदर कहा आज तो चनेखाने का मन कर रहा है पता लगाओ ये खेत किसका है 2 लोग पहरेदारी करो अगर खेत का मालिक आये तो इसरा करदेना सब भाग निकलेगे 🌴*सब लोग खेत में जाके चने खाने लगे स्वादिस्ट स्वादिष्ट सखा कह रहे आज तो आनंद आ गया तभी उस खेत की मालकिन के एक सखी जो खेत की देख भाल करती थी वो आगयी डंडा लेके कोंन है जो हमारी मालकिन के खेत से चने चुरा का खा रहा है उसके डर के मारे सारे ग्वालबाल भाग गये 🌳*श्यामसुन्दर नहीं भागे वो चने खाते रहे सखी ने बहुत डाटा डंडा से डराया पर पर श्यामसुन्दर नहीं भागे 🌱*गोपी बोली में अपनी सखि जो खेत की मालकिन को बताती हु उस खेत की मालकिन चित्रा जी थी उस सखी ने चित्रा जी बताया पूरा वृतान्त *🎋चित्रा जी बोली तूने उन को भगा या नहीं वो बोली सबको भगाया पर एक नहीं भगा पूछी कोंन नहीं भागा 🌾*बोली श्यामसुन्दर नाम है उसका चित्रा जी मन ही मन मुस्कुराए और बोली आज तो कृपा होगयी श्यामसुन्दर खुद आये है चित्रा जी बोली में खुद जाती हु चित्रा जी ग्वाल बन कर गयी ओर श्याम सुंदर से पूछी क्या कर रहे हो 🍃*श्याम सुंदर बोले चने खा रहा हु पर डर लग रहा है कही खेत का मालिक ना आ जाये 🍂*चित्रा जी चिंता मत करो खूब खायो में खेत के मालिक को जानती हु तुम चिंता मत करो खूब मन लगाकर खाओ 🌿*श्याम सुंदर आवाज लगाकर अपने दोस्तों को भी बुला लिया चिंता मत करो जी भर के खायो में पहरेदारी कर रही हो खेत का मालिक आएगा तो बता दूँगी थोड़ी देर बाद चित्रा जी खुद खेत में आगयी और श्यामसुन्दर जी चने छील छील कर देने लगी चित्रा जी जी भर कर चने खिलाये और पीताम्बर में बांध दिए देखो चने चोर की कितनी खातिरदारी हो रही है। 🌺 *चिकसोली में चना चुराये*।। 🌹 *गारी द दौडी रखवारन* *ग्वाल सहित गोपाल भजाये ।।१।*. 🌸 *हरे बुट दाबे बगल में* 🌻 *स्वास भरे गहवर बन आये*।। 🍁 *नागरिया बैठी छकहारिन* *छील छील नंदलाल खवाये ।।२।* *श्यामसुन्दर की जय हो*🌴🍀🌱🎄🎋🌾🍃☘🌳 श्री राधे श्याम राधे श्याम श्यामा श्याम सुंदर

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राधे राधे श्याम सब को मिले वृंदावन धाम ********************** उस ग्वालिन का नाम था "प्रभावती" । समस्त गोकुल की गोपियों में इसका प्रभाव अच्छा था । ये अपनें को सबसे बुद्धिमान और चतुर् समझती......सुन्दर थी ....किन्तु जितनी सुन्दर थी उससे ज्यादा अपनें को मानती । पर - तात ! एक दिन नन्दनन्दन को इसनें देख लिया .........."मुँह में माखन लगा है ........और अंगूठा दिखाते हुए चिढ़ा रहे हैं ".......उफ़ ! वो झाँकी ......बस इसी झाँकी नें इसे बाबरी बना दिया था । इसकी बुद्धि अब कन्हैया के पास है ..........ये कुछ भी सोचती है - कन्हैया के बारे में ही सोचती है.........."मुँह में माखन लगा है और अंगूठा दिखा रहे हैं".......इसके कलेजे में गढ़ गयी थी ये छबि । सब को पता है प्रभावती में कितनी अकड़ है ......पर ये "लगन" ऐसी है कि अच्छे अच्छों की अकड़ निकाल दे .........फिर इसकी लगन तो कन्हैया से लगी थी । बेचारी अपनें स्वाभिमान को ताक में रखकर आगयी आज तो ........नन्द महल में ......द्वार पर खड़ी है ...........पर कोई दिखाई नही दे रहा इसे ......इसनें धीरे से महल के भीतर झाँका ....... ओह ! बृजरानी की गोद में कन्हैया बैठे हैं...........इसनें देख लिया .......श्याम घन .........नीलमणी .......केश घुँघराले .......काले .........उनको ही बांध दिया है बृजरानी नें ........और ऊपर एक मयूर का पच्छ लगा दिया है ...........अधर लाल हैं और पतले हैं ........ प्रभावती छुप के देख रही है .................... बृजरानी इधर उधर देखती हैं.........दही मथना है ..........और ये कन्हैया अब दूध पीनें के लिये मचल रहा है .............क्या करूँ ? दधि मन्थन न करूँ तो दही बिगड़ जाएगा ....और दूध न पिलाऊं कन्हैया को तो, ये जिद्दी है ...........क्या करूँ ? बृजरानी इधर उधर देख रही हैं.........कोई गोपी भी आज दिखाई नही दे रही .............. तभी बृजरानी नें प्रभावती को देख लिया ...........और बड़े प्रेम से बोलीं .........अरे ! प्रभावती ! तू ? सुन तो .........मेरा एक काम कर दे । प्रभावती यही तो चाहती थी कि इसको नन्द महल में कुछ काम मिले .....ताकि ये कन्हैया को जी भर के देख सके । सुन ना ........दधिमन्थन कर दे ......! प्रार्थना के स्वर में बोलीं थीं बृजरानी । देख ! मैं तब तक इसको दूध पिला देती हूँ .......... प्रभावती नें सिर "हाँ" में हिलाया ..........उसनें अपनी प्रसन्नता प्रकट न होनें दी ........उसका तो मनमयुर नाच रहा था ......वो यही तो चाहती थी ।.......इधर कन्हैया को गोद में लेकर दूध पिलानें लगीं बृजरानी .....प्रभावती बृजरानी की गोद में देखते हुए दधि मटकी की ओर बढ़ी .........यशोदा तो दूध पिलानें में व्यस्त हो गयीं..........प्रभावती का ध्यान कन्हैया की ओर ही था.......चलते हुये .....दही की मटकी गिर गयी ........दही फ़ैल गया । बाबरी प्रभावती को कुछ भान नही है .........मटकी को सीधा करके "रई" चलानें लगी ...............मटकी खाली है ........दही तो फ़ैल चुका है आँगन में ...........खाली मटकी को चला रही है प्रभावती । उसे कुछ भान नही है .......उसे बस नन्दनन्दन की छबि का ध्यान है ........फिर मन में सोचती है .....क्या भाग्य पाया है इस बृजरानी नें ......आहा ! ऐसा सुन्दर गोपाल गोद में है और दूध पी रहा है । "अरी ! अपनें को सम्भाल"........बृजरानी नें पीछे से आवाज दी । प्रभावती को अब होश आया ........ उसनें जब देखा आँगन में दही फैला हुआ है ......और वो खाली मटकी में रई चलाये जा रही है ...... अब तो प्रभावती संकोच और लज्जा के मारे धरती में गढ़ी जा रही थी। पर बृजरानी नें भी प्रभावती को कुछ नही कहा .............बेचारी नें एक बार फिर यशोदा जी के गोद में देखा ............दूध, मुँह में फैला हुआ था कन्हैया के........और वो मुस्कुरा के प्रभावती की ओर ही देख रहे थे । इस मुस्कुराहट नें - अग्नि में घी का काम किया था ......... प्रभावती चली गयी अपनें घर .....किन्तु दूसरे दिन फिर - *************************************************** आज फिर आगयी...........और द्वार से खड़ी होकर महल के भीतर देख रही है ये प्रभावती । बृजेश्वरी दूध पिला रही हैं.......पर कन्हैया मान नही रहे........ दाऊ भी खड़े हैं बगल में.......उन्होंने तो पी लिया .......... देख ! तेरा भाई दूध पी लेता है ......तू नही पीता .......तू गन्दा है । "मैं गन्दा नही हूँ".............चिल्लाये कन्हैया ............प्रभावती मुग्ध हो गयी ........उसे यही तो चाहिए था .............आहा ! उसका हृदय गदगद् हो उठा ......."कन्हैया" .....भीतर से चीत्कार उठी वो । देख ! देख लाला ! गोद में बिठा लिया बृजरानी नें.......तू तो राजा बेटा है.....तू तो सबसे अच्छा है.....मुख चूम रही हैं अपनें लाल का ... "दूध पी लाला".........बृजरानी नें फिर दूध पिलाना चाहा । नही .......मैं दूध नही पीयूँगा............. फिर मना । प्रभावती देख रही है .............देह भान भूल गयी है ये । अच्छा देख ! तुझे चोटी बड़ी करनी है ना ? मैया नें ये भी पूछ लिया । फिर बोलीं ........दाऊ भैया की चोटी कितनी बड़ी है .....और तेरी चोटी तो नेक सी है ......इत्ती सी ............ "मुझे भी चोटी बड़ी करनी है" .........कन्हैया फिर मचले ....... प्रभावती हँस पड़ी ............वो आनन्दित हो उठी । तू दूध पी ......दूध पीयेगा तो चोटी बड़ी होगी .......नही तो । दूध पीनें से चोटी बड़ी होती है ? भोलेपन से पूछा । और क्या ! ले पी ........दूध का कटोरा मुँह में लगा दिया ......... प्रभावती छुप छुप कर देख रही है.........एक घूँट पीया .........फिर चोटी नापनें लगे ........चोटी तो बड़ी हुयी नहीं ? कन्हैया नें पूछा । पूरा दूध पीयेगा तब बड़ी होगी........दूध पी ......... प्रभावती देख रही है ......नापते जा रहे हैं चोटी .....और दूध पीते जा रहे हैं............ अपनें को भूली सी वो प्रभावती अपलक देख रही है कन्हैया को .......रोष में आगये लालन ..........मुँह फुला लिया गेंद की तरह .....कमर में हाथ रख लिया .......झूठी है तू मैया ! चोटी तो बड़ी हुयी नही ? हँसी फूट पड़ी यशोदा की ............पकड़ कर अपनें हिय से लगा लिया था अपनें प्यारे बाल गोपाल को । उफ़ ! प्रभावती की दशा देखनें जैसी थी । ************************************************** तीसरे दिन फिर आयी प्रभावती नन्द महल में.......इसका मन नही लगता अब घर में ..........ये तो बस घर का काम किसी तरह कर लेती है ........चिर अभ्यास वश ........बाकी इसका मन तो नन्दनन्दन में ही अटक गया है । बृजरानी नें आज नाना प्रकार के मिष्ठान्न बनाये हैं............और उन्हें सजाकर एक बड़ी सी थाल में रख दिया है । मनुहार कर रही हैं........लला ! खाओ मिठाई ......... "मुझे नही खाना"............जिद्दी है ये बाल गोपाल । मिठाई खाना तो अलग बात है ......ये तो उस तरफ देख भी नही रहे । प्रभावती विचार करती है .............और मन ही मन पूछती है ......फिर क्या खाना है लालन तुम्हे ? "मुझे माखन खाना है" ...........खींज कर बोले । प्रभावती आनन्द सिन्धु में डूब गयी ...........आहा ! माखन प्रिय है मेरे कन्हैया को ...........कन्हैया के अमृतमय वचनों को बड़े ध्यान से सुन रही है ये ग्वालन .........उन अमृत वचनों के श्रवण से उसमें मत्तता छाती जा रही है ........और उसी मत्तता के कारण प्रभावती में एक भावना जाग्रत हुयी ........और ये भावना सच्चे हृदय की थी । क्या कभी कन्हैया मेरे घर भी आयेंगें ? क्या कभी कन्हैया मेरे घर आकर माखन भी खायेगें ? पर - प्रभावती फिर शान्त हो गयी.........नही आयेगें.......मेरे घर ये नही आयेंगें.......क्यों की मुझे देख लेंगे तो इन्हें संकोच होगा ...... फिर तुरन्त प्रभावती सोचती है..........नही नही .......जब ये मेरे घर आकर माखन खायेगें तब मैं इनके सामनें नही आऊँगी .........छुप कर इन्हें देखती रहूँगी.......ओह ! कितना आनन्द आएगा मुझे ये सब देखकर ........मैं तो निहाल हो जाऊँगी ......... फिर उदास हो गयी ...........मेरी कामना पूरी होगी ? नही होगी , मेरी ये साध पूरी..........प्रभावती अब धीरे धीरे अपनें घर की ओर चली............. तात विदुर जी ! ये कन्हैया है ...........सबकी सुनता है ........और सच्चे हृदय से कोई कामना करे .......तो ये अवश्य पूरी करता है । "सूरदास प्रभु अन्तर्यामी, ग्वालिन मन की जानी ।।। राधे श्याम ।।

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वरुथिनी एकादशी व्रत कथा। बहुत समय पहले एक राज्य में मांधाता नाम के एक राजा राज्य करता थे। कहा जाता है कि वह राजा दान-पुण्य में विश्वास रखते थे और बेहद तपस्वी थे। राजा मांधाता बहुत प्रतापी और प्रख्यात राजा थे। एक दिन वह जंगल गए और वहां तपस्या करने लगे। तपस्या करने के दौरान जंगल में से एक भालू आया और राजा मांधाता के पैरों को खाने लगा। राजा मांधाता तपस्या में इतने लीन थे कि उन्होंने भालू को कुछ नहीं कहा और ना ही उसे भगाया। जब राजा मांधाता को पीड़ा होने लगी तब वह भगवान विष्णु को याद करने लगे। राजा की पुकार से भगवान विष्णु प्रकट हुए और राजा के प्राण बचाए। जब राजा मांधाता ने अपने पैरों को देखा तब वह बेहद उदास हुए। राजा मांधाता की उदासीनता को देखकर भगवान विष्णु ने कहा कि यह तुम्हारे पिछले जन्म में किए गए पापों का फल है। इसके साथ भगवान विष्णु ने राजा मांधाता को पैर ठीक करने का रास्ता बताया। भगवान विष्णु ने कहा कि तुम्हें मथुरा जाकर वरुथिनी एकादशी व्रत करना होगा। भगवान विष्णु की बात मानकर राजा मांधाता ने ठीक वैसा ही किया और व्रत के फल स्वरुप राजा मांधाता के सभी पाप मिट गए और उनका पैर ठीक हो गया। जय श्री नारायण।

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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः वरुथिनी एकादशी व्रत कथा युधिष्ठिर ने पूछा : हे वासुदेव ! वैशाख मास के कृष्णपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है? कृपया उसकी महिमा बताइये। भगवान श्रीकृष्ण बोले: राजन् ! वैशाख (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार चैत्र ) कृष्णपक्ष की एकादशी ‘वरुथिनी’ के नाम से प्रसिद्ध है । यह इस लोक और परलोक में भी सौभाग्य प्रदान करनेवाली है । ‘वरुथिनी’ के व्रत से सदा सुख की प्राप्ति और पाप की हानि होती है । ‘वरुथिनी’ के व्रत से ही मान्धाता तथा धुन्धुमार आदि अन्य अनेक राजा स्वर्गलोक को प्राप्त हुए हैं । जो फल दस हजार वर्षों तक तपस्या करने के बाद मनुष्य को प्राप्त होता है, वही फल इस ‘वरुथिनी एकादशी’ का व्रत रखनेमात्र से प्राप्त हो जाता है । नृपश्रेष्ठ ! घोड़े के दान से हाथी का दान श्रेष्ठ है । भूमिदान उससे भी बड़ा है । भूमिदान से भी अधिक महत्त्व तिलदान का है । तिलदान से बढ़कर स्वर्णदान और स्वर्णदान से बढ़कर अन्नदान है, क्योंकि देवता,पितर तथा मनुष्यों को अन्न से ही तृप्ति होती है । विद्वान पुरुषों ने कन्यादान को भी इस दान के ही समान बताया है । कन्यादान के तुल्य ही गाय का दान है, यह साक्षात् भगवान का कथन है । इन सब दानों से भी बड़ा विद्यादान है । मनुष्य ‘वरुथिनी एकादशी’ का व्रत करके विद्यादान का भी फल प्राप्त कर लेता है । जो लोग पाप से मोहित होकर कन्या के धन से जीविका चलाते हैं, वे पुण्य का क्षय होने पर यातनामक नरक में जाते हैं । अत: सर्वथा प्रयत्न करके कन्या के धन से बचना चाहिए उसे अपने काम में नहीं लाना चाहिए । जो अपनी शक्ति के अनुसार अपनी कन्या को आभूषणों से विभूषित करके पवित्र भाव से कन्या का दान करता है, उसके पुण्य की संख्या बताने में चित्रगुप्त भी असमर्थ हैं । ‘वरुथिनी एकादशी’ करके भी मनुष्य उसीके समान फल प्राप्त करता है । राजन् ! रात को जागरण करके जो भगवान मधुसूदन का पूजन करते हैं, वे सब पापों से मुक्त हो परम गति को प्राप्त होते हैं । अत: पापभीरु मनुष्यों को पूर्ण प्रयत्न करके इस एकादशी का व्रत करना चाहिए । यमराज से डरनेवाला मनुष्य अवश्य ‘वरुथिनी एकादशी’ का व्रत करे । राजन् ! इसके पढ़ने और सुनने से सहस्र गौदान का फल मिलता है और मनुष्य सब पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है ।।।। राधे राधे श्याम सब को मिले वृंदावन धाम।।।।

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🙏🙏भगवान् श्री रामजी और भक्त श्री हनुमानजी की पहली मुलाकात के प्रसंग का चिन्तन करेंगे🙏🙏 🌷🌷🌷🚩🚩🚩🌷🌷🌷 किष्किंधा काण्ड में, ऋषयमूक पर्वत की तलहटी में प्रभु आ चुके हैं, हनुमानजी स्वयं यह समझ नहीं पायें कि भगवान् आये हैं, हनुमानजी ने देखा कि कोई दो राजकुमार आये हैं लेकिन पहचान नहीं पाये हैं और सीधा प्रश्न किया? को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा। छत्री रूप फिरहु बन बीरा ॥ कठिन भूमि कोमल पद गामी। कवन हेतु बिचरहु बन स्वामी॥ भावार्थ:-हे वीर! साँवले और गोरे शरीर वाले आप कौन हैं, जो क्षत्रिय के रूप में वन में फिर रहे हैं? हे स्वामी! कठोर भूमि पर कोमल चरणों से चलने वाले आप किस कारण वन में विचर रहे हैं?॥ मृदुल मनोहर सुंदर गाता। सहत दुसह बन आतप बाता ॥ की तुम्ह तीनि देव महँ कोऊ। नर नारायन की तुम्ह दोऊ॥ भावार्थ:-मन को हरण करने वाले आपके सुंदर, कोमल अंग हैं और आप वन के दुःसह धूप और वायु को सह रहे हैं क्या आप ब्रह्मा, विष्णु, महेश- इन तीन देवताओं में से कोई हैं या आप दोनों नर और नारायण हैं॥ * जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार। की तुम्ह अखिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार॥ भावार्थ:-अथवा आप जगत्‌ के मूल कारण और संपूर्ण लोकों के स्वामी स्वयं भगवान्‌ हैं, जिन्होंने लोगों को भवसागर से पार उतारने तथा पृथ्वी का भार नष्ट करने के लिए मनुष्य रूप में अवतार लिया है?॥ श्री हनुमानजी ने प्रश्नों की झडी लगा दी, भगवान सम्मुख खडे हैं, और हनुमानजी पूछ रहे हैं कोन हो तुम? "नर-नारायण या जग कारन तारन भव, भंजन धरनी भार" कितने प्रश्न किये? प्रभु मुस्कुराये, यहां हनुमानजी वेश बदलकर आये हैं भगवान ने थोडा भ्रम पैदा कर दिया। भगवान् ने सिधे उत्तर नहीं दिये, हनुमानजी ने जितने प्रश्न किये थे नर, नारायण जग तारण जितने प्रश्न थे सब काट दियें, प्रश्नों को काटकर बिल्कुल उल्टा उत्तर दिया, हनुमानजी ने जितने प्रश्न किये थे भगवान् श्रीरामजी ने सब प्रश्न काट दियें, और भगवान् कहते हैं। * कोसलेस दसरथ के जाए। हम पितु बचन मानि बन आए॥ नाम राम लछिमन दोउ भाई। संग नारि सुकुमारि सुहाई॥ भावार्थ:-(श्री रामचंद्रजी ने कहा-) हम कोसलराज दशरथजी के पुत्र हैं और पिता का वचन मानकर वन आए हैं। हमारे राम-लक्ष्मण नाम हैं, हम दोनों भाई हैं। हमारे साथ सुंदर सुकुमारी स्त्री थी॥ * इहाँ हरी निसिचर बैदेही। बिप्र फिरहिं हम खोजत तेही॥ आपन चरित कहा हम गाई। कहहु बिप्र निज कथा बुझाई॥ भावार्थ:-यहाँ (वन में) राक्षस ने (मेरी पत्नी) जानकी को हर लिया। हे ब्राह्मण! हम उसे ही खोजते फिरते हैं। हमने तो अपना चरित्र कह सुनाया। अब हे ब्राह्मण! अपनी कथा समझाकर कहिए ॥ भगवान् कहना चाहते हैं कि हम निराकार नहीं है, दशरथजी के पुत्र हैं, जग कारण, तारण भव, हम जग के कारण से नहीं आयें हैं बल्कि पिता की आज्ञा से आये हैं, पिता के कारण आयें हैं, ब्रह्म तो व्यापक होता है लेकिन हमारी जानकीजी को कोई हरण करके ले गया है, हम तो उन्हें खोज रहे हैं, क्योंकि व्यापक को तो कोई वियोग नहीं होता, हम तो वियोग में घूम रहे हैं। लेकिन जैसे ही भगवान् के श्रीमुख से निकला कौसलेस तो हनुमानजी को तुरन्त भगवान् के वरदान की याद आ गई कि कौसलेस के यहाँ तो मेरे प्रभु रामजी अवतार लेनेवाले है क्या वहीं भगवान् इस समय? भगवान् ने कहा तुमने नाटक तो किया लेकिन तुम फेल हो गये, तुम ब्राह्मण बनकर आये लेकिन तुम ब्राहमण थे नहीं यह भूमिका तुम ठीक से नहीं निभा पायें, हनुमानजी ने पूछा कैसे नहीं निभा पाया? प्रभु पहिचानि परेऊ गहि चरना। सो सुख उमा जाइ नहिं बरना।। प्रभु बोले ब्राह्मण कभी क्षत्रिय को प्रणाम नहीं करता और हम क्षत्रीय वेश में तुमने आकर सिर झुका कर हमको प्रणाम किया, तभी हम समझ गये कि तुम असली ब्राह्मण नहीं हो सकते, दोनों का अविस्मरणीय रसमय वार्तालाप, रामचरित मानस में तुलसीदासजी ने यहाँ अमृत भर दिया है, भक्त और भगवान् का मिलन पूर्ण आनन्द देने वाला है। हम भी इस आनन्द का रसास्वादन कर सकते हैं, हनुमानजी महाराज को गुरु बना कर, मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि ब्रह्म और जीव के बीच में गुरु होते हैं, जैसे वर और कन्या के बीच में पुरोहित होते हैं बन्धन के लिये, गठबंधन (विवाह) के लिये, ऐसे ही जीव और ब्रह्म के बीच जो गठबन्धन का कार्य करते हैं वो गुरु करते हैं। जैसे माँ बालक का परिचय कराती है, देखो बेटा यह तुम्हारे मामाजी है, चाचाजी है, ताऊजी है, फुफाजी हैं, ऐसे ही गुरूदेव है जो जीव को भगवान् का परिचय कराते हैं, उनका अनुभव कराते हैं, लेकिन हमारा अहंकार गुरु का दर्शन नहीं होने देता और यह प्रश्न आज का नहीं है यह प्रश्न हर युग में उठाया गया है, ऐसा नहीं है कि कलयुग का मनुष्य बहुत दुष्ट है और सतयुग का मनुष्य बहुत अच्छा रहा हो। मनुष्य की मनोस्थिति हर युग में एक जैसी है, गुरु का अर्थ है- गुरु माने किसी के हो जाना किसी के चरणों में शीश झुकाना, मैरी बुद्धि जो मैरे अनुसार चलती थी हे गुरूदेव! अब मैं इसे आपको समर्पित करता हूँ, अब यह मैरे अनुसार नहीं चलेगी बल्कि आपके अनुसार चलेगी, भाई-बहनों! इसी भावना से, कोमल ह्रदय से जो साधक गुरु के श्रीचरणों में अपने आप को समर्पित कर दें, भगवान् की उस पर कृपा दृष्टि अवश्य रहती है 🚩🚩🌷🌷🙏🙏🌷🌷🚩🚩

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*जब नाम भगवान ने सुदर्शन रूप से भक्त की रक्षा की –* *एक संत हुए श्री अनंतकृष्ण बाबा जी । उनके पास एक लड़का सत्संग के लिए आया करता था । प्रभावित होकर दीक्षा के लिए प्रार्थना करने पर बाबा ने कहा कि महामंत्र का ११ लाख जप करके आओ उसके बाद विचार करेंगे । लगभग कुछ महीनों में संख्या पूरी करके वह बाबा के पास पुनः आया । बाबा ने कहा ११ लाख और जप करके आना । अभी ३ – ४ वर्ष ही बीते थे साधक जीवन मे प्रवेश किए हुए । उसके मन मे श्रद्धा की कमी हो गयी । वह एक दिन कही जा रहा था तो एक तांत्रिक को कुछ सिद्धियों का प्रदर्शन करते हुए देखा । तांत्रिक ने उससे अपने बारे मे पूछा, उसने अपनी उपासना के बारे मे बताया ।* *तांत्रिक ने पूछा कि तुम इतने वर्षों से इतनी संख्या में जप करते हो – साधन करते हो उससे तुम्हे कुछ अनुभूति हुई ? उस लड़के ने कहा अनुभूति तो हुई नही । तांत्रिक ने कहा की देखो तुम आदि जवान हो, हमारी तरह प्रेत सिद्ध कर लो – तुम्हारे सब काम प्रेत कर दिया करेगा, मै भी प्रेतों से सब काम करवाता हूं और मौज करता हूँ । यह शीघ्र ही थोडे मंत्रो के जप से सिद्ध हो जाता है । उसमें तांत्रिक से साधन की विधि जानी । उसने विधि से तंत्रिक मंत्रो का जाप किया पर कुछ हुआ नही । उसने तांत्रिक से कहा की मुझे तो कोई प्रेत सिद्ध हुआ नही । तांत्रिक ने कहा पुनः प्रयास करो । इस बार भी प्रेत प्रकट नही हुआ । तांत्रिक ने प्रेत को बुलाकर पूछा कि तुम इसके सामने क्यों नही प्रकट होते ?* उस प्रेत ने कहा मै तो जैसे ही इसके थोड़े निकट जाता हूँ, इसके पीछे एक चक्र प्रकट हो जाता है । मै महान बलवान होनेपर भी उस चक्र के तेज के सामने टिक नही सकता । अवश्य ही कोई शक्ति इसकी रक्षा करती है । इस घटना के कुछ समय बाद उसको बाबा की याद आयी । जब वह बाबा के पास आया तो बाबा बोले – बच्चा ! तेरा पतन होने से साक्षात नाम भगवान ने सुदर्शन रूप से तुझे बचा लिया । नाम भगवान यदि तुझे नही बचते तो हजारो वर्षो तक तू भी प्रेत योनि में कष्ट पाता फिरता । नाम का प्रभाव प्रकट रूप से न दिखे तब भी नाम का प्रभाव होता ही है । नाम जपने वाले कि रक्षा भगवान सदा करते है । जय श्री राधे

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