एक बार अकबर बीरबल हमेशा की तरह टहलने जा रहे थे ! रास्ते में एक तुलसी का पौधा दिखा .. मंत्री बीरबल ने झुक कर प्रणाम किया ! अकबर ने पूछा कौन हे ये ? बीरबल -- मेरी माता हे ! 💫अकबर ने तुलसी के झाड़ को उखाड़ कर फेक दिया और बोला .. कितनी माता हैं तुम हिन्दू लोगो की ...! बीरबल ने उसका जबाब देने की एक तरकीब सूझी! .. आगे एक बिच्छुपत्ती (खुजली वाला ) झाड़ मिला .. बीरबल उसे दंडवत प्रणाम कर कहा: जय हो बाप मेरे ! ! ✨अकबर को गुस्सा आया .. दोनों हाथो से झाड़ को उखाड़ने लगा .. इतने में अकबर को भयंकर खुजली होने लगी तो बोला: .. बीरबल ये क्या हो गया ! बीरबल ने कहा आप ने मेरी माँ को मारा इस लिए ये गुस्सा हो गए! ✨अकबर जहाँ भी हाथ लगता खुजली होने लगती .. बोला: बीरबल जल्दी कोई उपाय बतायो! बीरबल बोला: उपाय तो है लेकिन वो भी हमारी माँ है .. उससे विनती करनी पड़ेगी ! अकबर बोला: जल्दी करो ! आगे गाय खड़ी थी बीरबल ने कहा गाय से विनती करो कि ... हे माता दवाई दो..🌈 गाय ने गोबर कर दिया .. अकबर के शरीर पर उसका लेप करने से फौरन खुजली से राहत मिल गई! अकबर बोला .. बीरबल अब क्या राजमहल में ऐसे ही जायेंगे? 🙏बीरबल ने कहा: .. नहीं बादशाह हमारी एक और माँ है! सामने गंगा बह रही थी .. आप बोलिए हर -हर गंगे .. जय गंगा मईया की .. और कूद जाइए ! नहा कर अपनेआप को तरोताजा महसूस करते हुए अकबर ने बीरबल से कहा: .. कि ये तुलसी माता, गौ माता, गंगा माता तो जगत माता हैं! इनको मानने वालों को ही *"हिन्दू"* कहते हैं ..! 🎭 *हिन्दू एक "संस्कृति" है , "सभ्यता" है .. सम्प्रदाय नहीं.....!* जय श्रीराधे जी

+56 प्रतिक्रिया 20 कॉमेंट्स • 42 शेयर

#बाँके_बिहारी_जी_की_कृपा... #पोशाक_को_स्वयं_धारण_करना... वृंदावन में एक कथा प्रचलित है कि एक ठाकुर भूपेंद्र सिंह नामक व्‍यक्‍ति थे। जिनकी भरतपुर के पास एक रियासत थी। इन्‍होंने अपना पूरा जीवन भोग विलास में बिताया। धर्म के नाम पर ये कभी रामायण की कथा करवाते, तो कभी भागवत की कथा करवाते थे, बस इसी को यह धर्म समझते थे। झूठी शान और शौकत का दिखावा करता थे। झूठी शान और शौकत का दिखावा करने वाले ठाकुर भूपेंदर सिंह की पत्नी भगवान पर काफी विश्‍वास रखती थी। वह साल में नियमानुसार वृंदावन जा कर श्री बांके बिहारी की पूजा करती। जबकि भूपेंदर सिंह भगवान में कभी आस्‍था विश्‍वास नहीं रखता था। उल्‍टा वह अपन बीवी को इस बात का ताना भी मारता था, लेकिन उनकी पत्नी ने कभी भी इस बात का बुरा नहीं माना। एक दिन भूपेंद्र सिंह शिकार से लौट कर अपने महल को फूलों से सजा हुआ पाते हैं। घर में विशेष प्रसाद बनाया गया था, लेकिन ये आते ही उखड़ गए और नौकरों पर चिल्‍लाने लगे। तब उनकी बीवी ने बताया कि आज बाँके बिहारी का प्रकट दिवस है जिसके बारे में वे उन्‍हें पहले बता चुकी हैं। लेकिन भूपेंद्र सिंह को याद ना होने के बाद कारण वह उन पर चिल्‍लाने लगे, जिसके बाद उन्‍हें लज्‍जा महसूस हुई और वह अपनी बीवी के सामने चुप हो गए। धीरे धीरे ठाकुर भूपेंद्र सिंह की रुचि भोग विलास में बढ़ने लगी और वह अपनी पत्‍नी से दूर होते चले गए। ऐसे में उनकी पत्नी बाँके बिहारी जी के और करीब चली गईं और एक दिन उन्‍होंने ठान लिया कि वह अब से वृंदावन में ही रहेंगी। ठाकुर की पत्नी ने बांके बिहारी के लिए पोषाक तैयार करवाई थी, जिस बारे में ठाकुर को पता चल गया था और वह उसे गायब करवाना चाहते थे। उन्‍होंने पोषाक गायब करवा दी, जिसके बारे में ठाकुर की पत्नी को पता ही नहीं चला और वह वृंदावन में पहुंच कर उस पोषक के आने का इंतजार करने लगी। ठाकुर ने पोशाक चोरी होने की खबर वृन्दावन आने पर अपनी पत्नी को देने की सोची। जब वह वृंदावन पहुंचे तो देखते हैं, कि वहां पर सभी भक्‍त बांके बिहारी लाल की जय !! जय जय श्री राधे !! करते हुए भीड़ लगाए हुए थे। लेकिन ठाकुर के मन में अपनी पत्नी को नीचा दिखाने का विचार था। वह जैसे ही अपनी पत्नी को ढूंढते हुए मंदिर पहुंचे, वह देखते हैं कि उनकी पत्नी उन्‍हें देख कर खुश हो रही होती है और कहती है कि भगवान ने मेरी सुन ली कि तुम आज यहां आए हो। वह ठाकुर जी का हाथ थाम कर बांके बिहारी के सामने ले जाती है। बांके बिहारी ने वही पोशाक पहन रखी थी, ठाकुर जैसे ही विग्रह के सामने पहुंचते हैं। वह देखते हैं कि बांके बिहारी ने वही पोषाक पहन रखी थी, जिसे उन्‍होंने चोरी करवाई थी। इसे देख ठाकुर हैरान परेशान हो गया और जब उसने बांके बिहारी से आंखें मिलाई तब उसकी नजरें खुद शर्म से झुक गईं। उनकी पत्नी ने बताया कि इस पोषाक को बीती रात उनके बेटे ने लाई थी। यह सुन कर ठाकुर का दिमाग खराब हो गया और यह सोचते सोचते उसकी आंख लग गई। ठाकुर विश्राम करने को गया तो बांके बिहारी सपने में आए और ठाकुर से कहते हैं। क्‍यों हैरान हो गए कि पोशाक मुझ तक कैसे पहुंची। वे बोले कि इस दुनिया में जिसे मुझ तक आना है उसे दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती। पोषाक तो क्‍या तू खुद को देख, तू भी वृंदावन आ गया। यह बात सुन ठाकुर साहब की नींद खुल जाती है और उनका दिमाग सुन्‍न पड़ जाता है। वह भी बाँके बिहारी जी का भक्त बन जाता है। बाँके बिहारी ऐसी अनेक लीला भक्तो के साथ करते है। श्रीबाँकेबिहारी लाल की जय...😊 जय श्री राधे... जय श्री हरिदास...

+53 प्रतिक्रिया 5 कॉमेंट्स • 19 शेयर

परम पूज्य श्रीराधाबाबाजू ~ सिनेमा से बढ़कर व्यभिचार काम के अड्डे क्या होंगे ? इससे बड़ा अड्डा आजतक तो हमने नही देखा। तुम्हारे सारे जीवन का नक्शा सिनेमा पर टिका है । छोरो ! छोरियो ! सिनेमा से बढ़कर मलिन वस्तु क्या हो सकती है ? बढ़िया से बढ़िया फ़िल्म हो चाहे, पर मलिन वृति के परमाणु उसमे भरे पड़े है। तुम (सिनेमा देखने वाले) क्या परमार्थ की बात करोगे । अभिनेत्रियां मलिनता की मूर्ति है, काम के परमाणु का चारो ओर प्रवाह वहा रही हैं। जीवन का इतना नग्न चित्र ; प्रवचन भरा चित्र तुम क्यों देखते हो ? यदि तुम कुत्ते की मौत मरना न चाहो तो फिर सिनेमा क्यों देखते हो ? एक भी सिनेमा देखने वाले के जीवन में अध्यात्म नही आ सकता। सिनेमा देखने वालो के लिये चाहे वे अपने से अपने हों, हमारे पास कोई स्थान नही है । सबकी अंतिम १५ साँस में पूरी खबर ले ली जायेगी । आपके सबकी नस-नस का मुझे पता है। मुझे धोखा देने वाला न तो पैदा है न होगा। ३५ वर्ष हो रहे हैं हमने सपने में भी झूठ नहीं बोली है मैंने एक-एक को बड़े प्यार से रास्ता दिखलाया पर फिर भी जब सुखी न हुए तो............. मन पछितै है अवसर बीते। दुर्लभ देह पाहि हरि पद भजु। जैसे-तैसे भगवान से जुड़कर अपने जीवन का रास्ता ठीक कर लो। जैसे सांस खत्म हुआ आपकी सारी बातें भूल जाएंगी। कर्म, वचन, मन से ऐसा करो कि भगवान प्रसन्न हो जायें। सहस्त्र बाहु, बलि, रावण, सरीखों को भी काल खा गया। १९३९ के आस-पास जब मैं रतनगढ़ में शौच जाता था तो रास्ते में इतने मकान दिखते पर हमें कोई उनको बनवाने वाला नहीं दीखता। सब चले गये। परमार्थ का सरगम

+33 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 7 शेयर

संत नरसी महेता.... भक्त नरसी जी भगवान श्यामसुंदर के अनन्य भक्त थे, वे सत्संग करते हुए ठाकुर जी को केदारा राग सुनाया करते थे... जिसे सुनकर ठाकुर जी के गले की माला अपने आप नरसी जी के गले में आ जाया करती थी. एक बार भक्त नरसी जी के घर संतों की मंडली आई तो नरसी जी एक सेठ से राशन उधार लेने गये, पर सेठ ने राशन के बदले कुछ गिरवी रखने को कहा... नरसी जी ने अपना केदारा राग का भजन गिरवी रख दिया और वायदा किया कि उधार चुकाने तक इस राग को नही गाऊंगा और सेठ से राशन लाकर संतो को भोजन करवाया. उधर राजा को नरसी जी से जलने वाले पंडितो ने भड़काया कि नरसी जी सब ढोंग करते है. भजन गाते हुए माला को कच्ची डोर से बांधते है जिससे माला अपने आप गिरती है. राजा ने परीक्षा लेने के लिए नरसी जी को उनके भक्त समाज सहित महल में भजन सत्संग करने के लिए बुलाया और कहा कि हम भी ठाकुर जी की कृपा के दर्शन करना चाहते है. नरसी जी संतो के साथ राजा के महल में आये और सत्संग शुरू कर दिया. राजा ने अभिमान में आकर रेशम की मजबूत डोर मंगाई और उसमें हार पिरोकर ठाकुर जी को पहनाया. नरसी जी ने कीर्तन आरंभ किया.. आनंद बरसने लगा.. नरसी जी ने बहुत से भावपूर्ण भजन गाये पर माला नही गिरी.. नरसी जी के विरोधी बहुत प्रसन्न हुए कि अब राजा नरसी जी को दंड देगा. क्यूंकि ठाकुर जी की माला केदारा राग सुनने से ही गिरती थी और नरसी जी केदारा राग को गिरवी रखे हुए थे.. अब नरसी जी ठाकुर जी को उलाहना देते हुए गाने लगे.. कि ठाकुर जी आप माला पहने रखो, भक्तो की लाज जाती है तो जाये, माला संभाले रखो आप अब ठाकुर जी नरसी जी का रूप बनाकर सेठ के घर गये और दरवाजा खटखटाया. सेठ जी सो रहे थे पत्नी ने कहा कि नरसी जी भजन छुड़वाने आये है.. सेठ ने सोते सोते ही कहा कि पैसे ले लो और रसीद बनाकर भजन सहित दे दो.. उधर नरसी जी भाव से कीर्तन कर ऱहे थे.. पर सब संत हैरान थे कि आज नरसी जी केदारा राग क्यूं नही गा रहे.. पर नरसी जी के मन की तो भगवान ही जानते थे.. भगवान ने एक भक्त का रूप बनाया और नरसी जी के पास जाकर उनकी गोद में भजन और रसीद डाल दी.. बस फिर क्या था नरसी जी जान गये कि ये ठाकुर जी की लीला है.. उन्होने उसी समय भाव से केदारा राग का वो भजन गाना शुरू किया.. सब समाज आनंद से भर गया और इस बार ठाकुर जी सिहांसन से उठे.. नुपुरों की झन्न झन्न ध्वनि करते हुए स्वयं जाकर नरसी जी के गले में हार पहनाया.. और अपने भक्त का मान बढ़ाया.. राजा और नरसी जी के विरोधी पंडित नरसी जी की भक्ति से प्रभावित हुए और नरसी जी के संग से वो भी भक्त बन गये. हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरें हरे राम हरें राम राम राम हरे हरे

+43 प्रतिक्रिया 15 कॉमेंट्स • 15 शेयर

*‼ अति सुंदर कथा‼* *प्रेम से भरी ओढ़नी* .वृंदावन के पास एक गाँव में भोली-भाली माई ‘पंजीरी’ रहती थी।. दूध बेच कर वह अपनी जीवन नैया चलाती थी। वह मदनमोहन जी की अनन्य भक्त थी। . ठाकुर मदनमोहन लाल भी उससे बहुत प्रसन्न रहते थे। वे उसे स्वप्न में दर्शन देते और उससे कभी कुछ खाने को माँगते, कभी कुछ। पंजीरी उसी दिन ही उन्हें वह चीज बनाकर भेंट करती, . वह उनकी दूध की सेवा नित्य करती थी, सबसे पहले उनके लिए प्रसाद निकालती, रोज उनके दर्शन करने जाती और दूध दे आती। . लेकिन गरीब पंजीरी को चढ़ावे के बाद बचे दूध से इतने पैसे भी नहीं मिलते थे कि दो वक्त का खाना भी खा पाये, अतः कभी कभी मंदिर जाते समय यमुना जी से थोड़ा सा जल दूध में मिला लेती। . फिर लौटकर अपने प्रभु की अराधना में मस्त होकर बाकी समय अपनी कुटिया में बाल गोपाल के भजन कीर्तन करके बिताती। . कृष्ण कन्हैया तो अपने भक्तों की टोह में रहते ही हैं, नित नई लीला करते हैं। . एक दिन पंजीरी के सुंदर जीवन क्रम में भी रोड़ा आ गया। जल के साथ-साथ एक छोटी सी मछली भी दूध में आ गई और मदनमोहन जी के चढ़ावे में चली गई। . दूध डालते समय मंदिर के गोसाईं की दृष्टि पड़ गई। गोसाईं जी को बहुत गुस्सा आया, उन्होंने दूध वापस कर दिया, . पंजीरी को खूब डाँटा फटकारा और मंदिर में उस का प्रवेश निषेध कर दिया। . पंजीरी पर तो आसमान टूट पड़ा। रोती-बिलखती घर पहुँची-ठाकुर; मुझसे बड़ा अपराध हो गया, क्षमा करो, पानी तो रोज मिलाती हूँ, तुमसे कहाँ छिपा है, . ना मिलाओ तो गुजारा कैसे हो ? और उस बेचारी मछली का भी क्या दोष ? उस पर तो तुम्हारी कृपा हुई तो तुम्हारे पास तक पहुँची। . लेकिन प्रभु, तुमने तो आज तक कोई आपत्ति नहीं की, प्रेम से दूध पीते रहे, फिर ये गोसाईं कौन होता है मुझे रोकने वाला। . और मुझे ज़्यादा दुख इसलिए है कि तुम्हारे मंदिर के गोसाईं ने मुझे इतनी खरी खोटी सुनाई और तुम कुछ नहीं बोले। . ठाकुर, यही मेरा अपराध है तो मैं प्रतिज्ञा करती हूँ कि तुम अगर रूठे रहोगे, मेरा चढ़ावा स्वीकार नहीं करोगे तो मैं भी अन्न-जल ग्रहण नहीं करुंगी, . यहीं प्राण त्याग दूंगी। भूखी प्यासी, रोते रोते शाम हो गई। . तभी पंजीरी के कानों में एक मधुर कंठ सुनाई दिया- माई ओ माई, उठी तो दरवाजे पर देखा कि एक सुदर्शन किंतु थका-हारा सा एक किशोर कुटिया में झाँक रहा है। . कौन हो बेटा...??? . मैया, बृजवासी ही हूँ, मदन मोहन के दर्शन करने आया हूँ। बड़ी भूख लगी है कुछ खाने का मिल जाए तो तुम्हारा बड़ा आभारी रहूँगा। . पंजीरी के शरीर में ममता की लहर दौड़ गई। कोई पूछने की बात है बेटा, घर तुम्हारा है। . ना जाने तुम कौन हो जिसने आते ही मुझ पर ऐसा जादू बिखेर दिया है। . बड़ी दूर से आए हो क्या ? क्या खाओगे ? अभी जल्दी से बना दूँगी। . अरे मैया, इस समय क्या रसोई बनाओगी, थोड़ा सा दूध दे दो वही पी कर सो जाउँगा। . दूध की बात सुनते ही पंजीरी की आँखें डबडबा आयीं, फिर अपने आप को सँभालते हुए बोली- . बेटा, दूध तो है पर सवेरे का है, जरा ठहरो अभी गैया को सहला कर थोड़ा ताजा दूध दुह लेती हूँ। . अरे नहीं मैया, उसमें समय लगेगा। सवेरे का भूखा प्यासा हूँ, दूध का नाम लेकर तूने मुझे अधीर बना दिया है, . अरे वही सुबह का दे दो, तुम बाद में दुहती रहना। . डबडबायी आँखों से बोली... थोड़ा पानी मिला हुआ दूध है। . अरे मैया तुम मुझे भूखा मारोगी क्या ? जल्दी से दूध छान कर दे दो वरना मैं यहीं प्राण छोड़ दूंगा। . पंजीरी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि ये बालक कैसी बात कर रहा है, दौड़ी-दौड़ी गई और झटपट दूध दे दिया। . दूध पीकर बालक का चेहरा खिल उठा। . मैया, कितना स्वादिष्ट दूध है। तू तो यूँ ही ना जाने क्या-क्या बहाने बना रही थी, . अब तो मेरी आँखों में नींद भर आई है, अब मैं सो रहा हूँ, इतना कहकर वो वहीं सो गया। . पंजीरी को फ़ुरसत हो गई तो दिन भर की थकान, दुख और अवसाद ने उसे फिर घेर लिया। . जाड़े के दिन थे ,भूखे पेट उसकी आँखों में नींद कहाँ से आती। जाडा़ बढ़ने लगा तो अपनी ओढ़नी बालक को ओढ़ा दी। . दूसरे प्रहर जो आँख लगी कि ठाकुर श्री मदन मोहन लाल जी को सम्मुख खड़ा पाया। . ठाकुर जी बोले, मैया, मुझे भूखा मारेगी क्या ? गोसाईं की बात का बुरा मान कर रूठ गयी। . खुद पेट में अन्न का एक दाना तक न डाला और मुझे दूध पीने को कह रही है। . मैंने तो आज तेरे घर आकर दूध पी लिया अब तू भी अपना व्रत तोड़ कर कुछ खा पी ले और देख, . मैं रोज़ तेरे दूध की प्रतीक्षा में व्याकुल रहता हूँ, मुझे उसी से तृप्ति मिलती है। अपना नियम कभी मत तोड़ना। . गोसाईं भी अब तेरे को कुछ ना कहेंगे। दूध में पानी मिलाती हो, तो क्या हुआ ? उससे तो दूध जल्दी हज़म हो जाता है। अब उठो और भोजन करो। . पंजीरी हड़बड़ाकर उठी, देखा कि बालक तो कुटिया में कहीं नहीं था। . सचमुच लाला ही कुटिया में पधारे थे। पंजीरी का रोम-रोम हर्षोल्लास का सागर बन गया। . झटपट दो टिक्कड़ बनाए और मदन मोहन को भोग लगाकर आनंदपूर्वक खाने लगी। उसकी आंखों से अश्रुधारा बह रही थी। . थोड़ी देर में सवेरा हो गया पंजीरी ने देखा कि ठाकुर जी उसकी ओढ़नी ले गये हैं और अपना पीतांबर कुटिया में ही छोड़ गए हैं। . इधर मंदिर के पट खुलते ही गोसाईं ने ठाकुर जी को देखा तो पाया की प्रभु एक फटी पुरानी सी ओढ़नी ओढ़े आनंद के सागर में डूबे हैं। . उसने सोचा कि प्रभु ने अवश्य फिर कोई लीला की है, लेकिन इसका रहस्य उसकी समझ से परे था। . लीला-उद्घाटन के लिए पंजीरी दूध और ठाकुर जी का पीताम्बर लेकर मंदिर के द्वार पर पहुँची और बोली, . गुसाईं जी, देखो तो लाला को, पीतांबर मेरे घर छोड़ आये और मेरी फटी ओढ़नी ले आये। . कल सवेरे आपने मुझे भगा दिया था, लेकिन भूखा प्यासा मेरा लाला दूध के लिये मेरी कुटिया पर आ गया। . गोसाईं जी पंजीरी के सामने बैठ गए। . भक्त और भगवान के बीच मैंने क्या कर डाला, भक्ति बंधन को ठेस पहुंचा कर मैंने कितना बड़ा अपराध कर डाला, माई, मुझे क्षमा कर दो। . पंजीरी बोली.. गुसाई जी, देखी तुमने लाला की चतुराई, अपना पीतांबर मेरी कुटिया मे जानबूझकर छोड़ दिया और मेरी फटी-चिथड़ी ओढ़नी उठा लाये। . भक्तों के सम्मान की रक्षा करना तो इनकी पुरानी आदत है।” . ठाकुर धीरे-धीरे मुस्कुरा रहे थे, अरे मैया तू क्या जाने कि तेरे प्रेम से भरी ओढ़नी ओड़ने में जो सुख है वो पीतांबर में कहाँ..!! *‼ प्रेम से कहो श्री राधे‼* *‼वृन्दावन बिहारीलाल की जय‼*

+28 प्रतिक्रिया 13 कॉमेंट्स • 6 शेयर

. "तमसाच्छन्न बुद्धि" तमसाच्छन्न बुद्धियुक्त मनुष्य के मन से दया, करुणा, प्रेम और सहानुभूति आदि गुण लुप्त हो जाते हैं और वह अपने को सुखी बनाने के लिये क्रूरता के साथ दूसरों को दु:ख पहुँचाने लगता है। अन्त में उसका स्वभाव ही ऐसा बन जाता है। कि वह दूसरों के दुःख में ही अपने को सुखी मानता है, दूसरों के विपत्ति के आँसू देखकर ही उसका चित्त प्रफुल्लित होता है, यहाँ तक कि वह अपनी हानि करके भी दूसरों को दु:खी करता है। ऐसा मनुष्य राक्षस से भी अधम बताया गया है। एक मनुष्य ने भगवान् शिव की आराधना की, शिवजी प्रसन्न हुए, उसका पड़ोसी भी बड़े भक्ति भाव से शिवजी के लिये तप कर रहा था। शिवजी ने दोनों के भक्ति का विचार कर आकाशवाणी में उससे कहा कि 'मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ, इच्छित वर माँग, पर तुझे जो मिलेगा उससे दूना तेरे पड़ोसी को मिलेगा, क्योंकि उसके तप का महत्त्व तेरे तप से दूना है।' यह सुनते ही वह बड़ा दुःखी हो गया। उसने सोचा 'क्या माँगूं ? पुत्र, धन और कीर्ति की बड़ी इच्छा थी; परंतु अब यह सब कैसे माँगू ? जो एक पुत्र माँगता हूँ तो उसके दो होते हैं, लाख रुपये माँगता हूँ। तो उस नालायक को दो लाख मिलते हैं, कीर्ति चाहता हूँ तो उसकी मुझसे दूनी होती है।' अन्त में उसने खूब सोच-विचारकर शिवजी से कहा, 'प्रभो ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरी एक आँख फोड़ डालिये।' उसने सोचा, 'मेरा तो काम एक आँख से भी चल जायगा। वह तो दोनों फूटने से बिलकुल निकम्मा हो जायेगा। इससे अधिक सुख की बात मेरे लिये और क्या होगी ?' मित्रों ! इस दृष्टान्त को पढ़कर हँसियेगा नहीं, हमें चाहिये कि हम अपने हृदय पटल को टटोलें। क्या कभी उसमें इस प्रकार के भाव नहीं पैदा होते ? चाहे पचास हजार रुपये मेरे लग जायँ पर तुझको तो नीचा दिखाकर छोडूँगा, मेरा चाहे जितना नुकसान हो जाय पर उसको तो सुख से नहीं रहने दूँगा, 'इस मामले में चाहे मेरा घर तबाह हो जाय लेकिन उसको तो भिखमंगा बनाकर छोडूँगा।' इस प्रकार के विचार और उद्गार हम लोगों के हृदय में ही तो पैदा होते और निकलते हैं। इसका कारण यही है कि हम लोगों ने देहात्मबोध के कारण अपनी ममता की सीमा बहुत ही संकुचित कर ली है, छोटे गड़हे का पानी गंदला हुआ ही करता है। इसी प्रकार संकुचित ममता भी बड़ी गंदी हो जाती है। हमारे प्रेम का संकोच हो गया है, तभी यह दशा है! इसी से आज लौकिक और पारलौकिक सभी क्षेत्रों में हमारा पतन हो रहा है!' ---------:::×:::----------- - श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार (श्रीभाईजी) 'सरस प्रसंग' "जय जय श्री राधे" *******************************************

+66 प्रतिक्रिया 17 कॉमेंट्स • 5 शेयर