लोभ और भय...... मैंने सुना है, राजा भोज के दरबार में बड़े पंडित थे, बड़े ज्ञानी थे और कभी कभी वह उनकी परीक्षा भी लिया करता था। एक दिन वह अपना तोता राजमहल से ले आया दरबार में। तोता एक ही रट लगाता था, एक ही बात दोहराता था बार बार : 'बस एक ही भूल है, बस एक ही भूल है, बस एक ही भूल है।' राजा ने अपने दरबारियों से पूछा, "यह कौन सी भूल की बात कर रहा है तोता?" पंडित बड़ी मुश्किल में पड़ गए। और राजा ने कहा, "अगर ठीक जवाब न दिया तो फांसी, ठीक जबाब दिया तो लाखों के पुरस्कार और सम्मान।" अब अटकलबाजी नहीं चल सकती थी, खतरनाक मामला था। ठीक जवाब क्या हो? तोते से तो पूछा भी नहीं जा सकता। तोता कुछ और जानता भी नहीं। तोता इतना ही कहता है, तुम लाख पूछो, वह इतना ही कहता है : 'बस एक ही भूल है।' सोच विचार में पड़ गए पंडित। उन्होंने मोहलत मांगी, खोजबीन में निकल गए। जो राजा का सब से बड़ा पंडित था दरबार में, वह भी घूमने लगा कि कहीं कोई ज्ञानी मिल जाए। अब तो ज्ञानी से पूछे बिना न चलेगा। शास्त्रों में देखने से अब कुछ अर्थ नहीं है। अनुमान से भी अब काम नहीं होगा। जहां जीवन खतरे में हो, वहां अनुमान से काम नहीं चलता। तर्क इत्यादि भी काम नहीं देते। तोते से कुछ राज़ निकलवाया नहीं जा सकता। वह अनेकों के पास गया लेकिन कहीं कोई जवाब न दे सका कि तोते के प्रश्न का उत्तर क्या होगा। बड़ा उदास लौटता था राजमहल की तरफ कि एक चरवाहा मिल गया। उसने पूछा, "पंडित जी, बहुत उदास हैं? जैसे पहाड़ टूट पड़ा हो आप के ऊपर, कि मौत आनेवाली हो, इतने उदास! बात क्या है?" तो उसने अपनी अड़चन कही, दुविधा कही। उस चरवाहे ने कहा, "फिक्र न करें, मैं हल कर दूंगा। मुझे पता है। लेकिन एक ही उलझन है। मैं चल तो सकता हूँ लेकिन मैं बहुत दुर्बल हूँ और मेरा यह जो कुत्ता है इसको मैं अपने कंधे पर रखकर नहीं ले जा सकता। इसको पीछे भी नहीं छोड़ सकता। इससे मेरा बड़ा लगाव है।" पंडित ने कहा, "तुम फिक्र छोड़ो। मैं इसे कंधे पर रख लेता हूँ।" उन ब्राह्मण महाराज ने कुत्ते को कंधे पर रख लिया। दोनों राजमहल में पहुंचे। तोते ने वही रट लगा रखी थी कि एक ही भूल है, बस एक ही भूल है। चरवाहा हंसा उसने कहा, "महाराज, देखें भूल यह खड़ी है।" वह पंडित कुत्ते को कंधे पर लिए खड़ा था। राजा ने कहा, "मैं समझा नहीं।" उसने कहा कि "शास्त्रों में लिखा है कि कुत्ते को पंडित न छुए और अगर छुए तो स्नान करे और आपका महापंडित कुत्ते को कंधे पर लिए खड़ा है। लोभ जो न करवाए सो थोड़ा है। बस, एक ही भूल है : लोभ और भय लोभ का ही दूसरा हिस्सा है, नकारात्मक हिस्सा। यह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक तरफ भय, एक तरफ लोभ। ये दोनों बहुत अलग अलग नहीं हैं। जो भय से धार्मिक है वह डरा है दंड से, नर्क से, वह धार्मिक नहीं है। और जो लोभ से धार्मिक है, जो लोलुप हो रहा है वह वासनाग्रस्त है स्वर्ग से, वह धार्मिक नहीं है। फिर धार्मिक कौन है? धार्मिक वही है जिसे न लोभ है, न भय। जिसे कोई चीज लुभाती नहीं और कोई चीज डराती भी नहीं। जो भय और प्रलोभन के पार उठा है वही सत्य को देखने में समर्थ हो पाता है। सत्य को देखने के लिए लोभ और भय से मुक्ति चाहिए। सत्य की पहली शर्त है अभय क्योंकि जब तक भय तुम्हें डांवाडोल कर रहा है तब तक तुम्हारा चित्त ठहरेगा ही नहीं। भय कंपाता है, भय के कारण कंपन होता है। तुम्हारी भीतर की ज्योति कंपती रहती है। तुम्हारे भीतर हजार तरंगें उठती हैं लोभ की, भय की जय जय श्रीराधे जी

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. "सन्त गणेशनाथ" छत्रपति शिवाजी महाराज के समय की बात है। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में उज्जैनी के पास एक छोटे ग्राम में गणेशनाथ का जन्म हुआ। यह कुल भगवान् का भक्त था। माता-पिता भगवान की पूजा करते और भगवन्नाम का कीर्तन करते थे। बचपन से ही गणेशनाथ में भक्ति के संस्कार पड़े। माता उन्हें प्रोत्साहित करती और वे तुतलाते हुए भगवान का नाम ले लेकर नाचते। पिता ने भी उन्हें संसार के विषयो में लगने की शिक्षा देने के बदले भगवान का माहात्म्य ही सुनाया था। धन्य हैं वे माता-पिता, जो अपने बालक को विषतुल्य विषय भोगो में नहीं लगाते, बल्कि उसे भगवान के पावन चरणों में लगने की प्रेरणा देते हैं। पिता-माता से गणेशनाथ ने भगवन्नाम कीर्तन का प्रेम और वैराग्य का संस्कार पैतृक धन के रूप में पाया। माता-पिता गणेशनाथ की युवावस्था प्रारम्भ होने के पूर्व ही परलोकवासी हो गये थे। घर मे अकेले गणेशनाथ रह गये। किन्तु उन्हें अब चिन्ता क्या ? हरिनाम का रस उन्हें मिल चुका था। कामिनी काञ्चन का माया जाल उनके चित्त को कभी आकर्षित नहीं कर सका। वे तो अब सत्संग और अखण्ड भजन के लिये उत्सुक हो उठे। उन्होंने एक लंगोटी लगा ली। जाडा हो, गरमी हो या है वर्षा हो, अब उनको दूसरे किसी वस्त्र से काम नहीं था। वे भगवान् का नाम कीर्तन करते, पद गाते आनन्दमय हो नृत्य करने लगते थे। धीरे धीरे वैराग्य बढता ही गया। दिनभर जंगल में जाकर एकान्त में उच्चस्वर से नाम कीर्तन करते और रात्रि को घर लौट आते। रातको गाँव के लोगों को भगवान् की कथा सुनाते। कुछ समय बीतने पर ये गांव छोड़कर पण्ढरपुर चले आये और वहीं श्री कृष्ण का भजन करने लगे। एक बार छत्रपति शिवाजी महाराज पण्ढरपुर पधारे। पण्ढरपुर में उन दिनों अपने वैराग्य तथा संकीर्तन प्रेम के कारण साधु गणेशनाथ प्रसिद्ध को चुके थे। शिवाजी महाराज इनके दर्शन करने गये। उस समय ये कीर्तन करते हुए नृत्य कर रहे थे। बहुत रात बीत गयी, पर इन्हें तो शरीर का पता ही नहीं था। छत्रपति चुपचाप देखते रहे। जब कीर्तन समाप्त हुआ, तब शिवाजी ने इनके चरणोंमें मुकुट रखकर अपने खेमे में रात्रि विश्राम करने की इनसे प्रार्थना की। भक्त बड़े संकोच में पड़ गये। अनेक प्रकार से उन्होंने अस्वीकार करना चाहा, पर शिवाजी महाराज आग्रह करते ही गये। अन्त में उनकी प्रार्थना स्वीकार करके गणेशनाथ बहुत से कंकड़ चुनकर अपने वस्त्र में बाँधने लगे। छत्रपति ने आश्चर्य से पूछा -इनका क्या होगा ? आपने कहा- ये भगवान् का स्मरण दिलायेंगे। राजशिविर में गणेशनाथ जी के सत्कार के लिये सब प्रकार की उत्तम व्यवस्था की गयी। सुन्दर पकवान सोने के थाल में सजाये गये, सुगन्धित जल से उनके चरण धोये स्वयं छत्रपति ने, इत्र आदि उपस्थित किया गया और स्वर्ण के पलंग पर कोमल गद्देके ऊपर फूल बिछाये गये उनको सुलाने के लिये। गणेशनाथ ने यह सब देखा तो सन्न रह गये। जैसे कोई शेर गाय के छोटे बछड़े को उठाकर अपनी मांद में ले जाये और वह बेचारा बछड़ा भय के मारे भागने का रास्ता न पा सके, यही दशा गणेशनाथ की हो गयी। उन्हें भोग के ये सारे पदार्थ जलती हुई अग्नि के समान जान पड़ते थे। किसी प्रकार थोडा सा कुछ खाकर वे विश्राम करने गये। उस फूल बिछी शय्यापर अपने साथ लायी बडी गठरी के कंकडों को बिछाकर उन पर बैठ गये। वे रोते-रोते कहते जाते थे- पाण्डुरंग ! मेरे स्वामी ! तुमने मुझे कहां लाकर डाल दिया ? अवश्य मेरे कपटी ह्रदय में इन भोगो के प्रति कहीं कुछ आसक्ति थी, तभी तो तुमने मुझे यहाँ भेजा है। विट्ठल ! मुझे ये पदार्थ नरक की यन्त्रणा जैसे जान पड़ते हैं। मुझे तो तुम्हारा ही स्मरण चाहिये। किसी प्रकार रात बीती। सवेरे शिवाजी महाराज ने आकर प्रणाम करके पूछा – महाराज ! रात्रि सुख से तो व्यतीत हुई ? गणेशनाथ जी ने उत्तर दिया- जो क्षण विट्ठल का नाम लेने में बीते, वही सफल हुये। आज की रात हरिनाम लेने-में व्यतीत हुई अत: वह सफल हुई। शिवाजी ने जब सन्त के भाव सुने, तब उनके नेत्रों से आँसू बहने लगे। साधु को आग्रह करके अपने यहाँ ले आने का उन्हें पश्चात्ताप हुआ। उन्होंने चरणों में गिरकर क्षमा मांगी। साधक के लिये एक सबसे बडा विघ्न है लोक प्रख्याति। प्रतिष्ठा के कारण जितना शीघ्र साधक मोह मे पड़ता है, उतनी शीघ्रता से पतन दूसरे किसी विघ्न से नहीं होता। अतएव साधक को सदा सावधान होकर शूकरो विष्ठा के समान प्रतिष्ठा से दूर रहना चाहिये। गणेशनाथ जी ने देखा कि पंढरपुर में अब लोग मुझें जान गये हैं, अब मनुष्यों की भीड़ मेरे पास एकत्र होने लगी है, तब वे घने जंगल में चले गये। परंतु फूल खिलेगा तो सुगन्धि फैलेगी ही और उससे आकर्षित होकर भौरे भी वहां एकत्र होंगे ही। गणेशनाथ जी में भगवान का जो दिव्य अनुराग प्रकट हुआ था, उससे आकर्षित होकर भगवान् के प्रेमी भक्त वन में भी उनके पास एकत्र होने लगे । गणेशनाथ जी का भगवत् प्रेम ऐसा था कि वे जिसे भी छू देते थे, वही उन्मत्त की भाँति नाचने लगता था। वही भगवन्नाम का कीर्तन करने लगता था। श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने भक्तों से एक बार कहा था- सच्चा भगवद भक्त वह है, जिसके पास जाते ही दूसरे इच्छा न होने पर भी विवश् की भाँति अपने आप भगवान् का नाम लेने लगें। गणेशनाथ जी इसी प्रकार के भगवान् के भक्त थे। श्री गणेशनाथ जी के प्रेम की महिमा अपार है। वे जब भगवान के प्रेम में उन्मत्त होकर पांडुरंग विट्ठल ! पांडुरंग विट्ठल ! विट्ठल रुक्मिणी ! कहकर नृत्य करने लगते थे, तब वहां के सब मनुष्य उनके साथ कीर्तन करने को जैसे विवश हो जाते थे। ऐसे भगवद्भक्त तो नित्य भगवान् को प्राप्त हैं। वे भगवन्मय हैं। उनके स्मरण से, उनके चरित का हदय में चिन्तन करने से मनुष्य के पाप ताप नष्ट हो जाते हैं और मानुष हृदय में भगवान् का अनुराग जागृत हो जाता है। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ********************************************

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दुर्भाग्य से बचने के लिए गुरुवार को कौन से काम करने या नहीं करने चाहिए..|| क्या आप जानते हैं कि कुछ काम ऐसे हैं जो हमें भूलकर भी गुरुवार के दिन नहीं करने चाहिए। हमने बुजुर्गों से भी सुना हैं कि ये काम करने से हमारे जीवन में नाकारात्मक प्रभाव पड़ता है। जिससे हमें भारी नुक्सान भी हो सकता है। गुरुवार के दिन कौन से कार्य ना करें..... गुरुवार के दिन नाखून ना काटे। गुरुवार के दिन बाल न कटवाए। इस दिन स्त्रियों को बाल नही धोने चाहिए। इस दिन हमें कपड़े नही धोने चाहिए। इस दिन हमें ना तो घर में खिचड़ी बनानी चाहिए और ना ही खानी चाहिए। हमें कभी भी पिता, गुरु तथा साधु संत का अपमान नहीं करना चाहिए। क्योंकि ये सभी बृहस्पति का प्रतिनिधि करते हैं। गुरुवार के दिन कौन से कार्य करें सूर्य उदय होने से पहले स्नान कर के भगवान विष्णु के समक्ष गाय के शुद्ध देसी घी का दीपक जलाएं। भगवान शिव पर पीले रंग के लड्डू अर्पित करें| केसर या हल्दी का तिलक मस्तक पर लगाएं। संभव हो तो व्रत रखें। पीली चीजों का दान करें। केले के पेड़ का पूजन करें, प्रसाद में पीले रंग के पकवान अथवा फल अर्पित करें। केले का दान करें।

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जप करने के समय स्मरण रखने वाली कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण बातें :- 1). पवित्र हरिनाम को भी अर्च-विग्रह और पवित्र धाम के समान ही गुणनिधि समझना । 2). जप भी राधा-कृष्ण की पूजा है, इसलिए हमें पूर्ण उद्यम के साथ जप करना चाहिए । 3). भगवान कृष्ण हमारे भाव और प्रयासों के अनुरूप ही आदान-प्रदान करते हैं । यह हम में जितना अधिक होगा, भगवान भी उतना अधिक प्रतिदान करेंगे । भगवान का प्रतिदान वास्तव में कई गुना अधिक होता है क्योंकि इस सम्बन्ध को प्रगाढ़ करने के लिए वे हमसे कही अधिक आतुर रहते हैं । 4). जप कोई प्रक्रिया नहीं है यह एक सम्बन्ध है । जब हम जप करते हैं तो हम भगवान से टूटे हुए सम्बन्ध को ठीक कर रहे होते हैं । इसलिए जब हम भगवान को पुकारते हैं तो पश्चाताप और समर्पण भाव से पुकारना चाहिए । समर्पण भरी पुकार में इस बात का पश्चाताप हो कि भगवान से विमुख होकर हमने कितने जन्म यूँही व्यर्थ गवाँ दिए । 5). अपराध-सहित जप और अपराध-रहित जप में मात्र हमारे सच्चे प्रयास का अंतर है । गंभीर प्रयास ही प्रेम-भक्ति की सीढ़ी है । जब हम अपराधों से बचने का निरंतर प्रयास करते हैं तो वे स्वतः ही समाप्त होने लगते है । 6). मालाओं की गिनती से अधिक महत्वपूर्ण उनकी गुणवत्ता है । अगर गुणवत्ता अच्छी है तो गिनती स्वतः ही बढ़ जाएगी । अगर गिनती अधिक है तो कई बार गुणवत्ता में गिरावट आती है । 7). जप करते समय कभी भी यह विचार मन में न लाएं की “मुझे करना पड़ रहा है”, बल्कि विचार ऐसे होने चाहिए की “मैं जप करना चाहता हूँ”। अगर आपको यह लगे की जप “करना पड़ रहा है” तो बेहतर होगा कि उस समय आप जप ना ही करें । भगवान कृष्ण से सम्बन्ध बनाने के लिए कोई आपको बाध्य न करे आप स्वयं ही इस सम्बन्ध को बढाने के लिए आतुर होने चाहिए, तभी भगवान प्रतिदान करेंगे । 8). जब आप जप कर रहे हों तब केवल जप ही करें । मन का जप में उपस्थित रहना ही जप के प्रति न्याय है । अगर आप सचमुच गंभीर होंगे तो वातावरण स्वतः ही अनुकूल बन जायेगा और आपको जप के लिए अधिक समय भी मिलेगा । 9). जप ही आपका दिनभर में सबसे प्रिय कार्य हो । जब समय मिले तब जप कर लिया । और जब जप कर रहे हों तो सम्पूर्ण संसार प्रतीक्षा कर सकता है । 10). माया और कृष्ण, दोनों एक ही समय पर नहीं पाये जा सकते । जब हम भौतिक विकर्षणों को अधिक महत्त्व देते हैं तब भगवान कृष्ण हमारे जीवन और जप दोनों से विलुप्त हो जाते हैं । इसलिए जब जप कर रहे हों हो कृष्ण को चुनें और माया को उसके हर रूप में अस्वीकार कर दें । 11). कृष्ण और माया के चुनाव में कोई अति-मुर्ख ही माया को चुनेगा । वैज्ञानिक मापदंड के अनुसार भी कृष्ण ही माया से अधिक बेहतर चुनाव हैं । कृष्ण के साथ गंभीरता से किये गए कम प्रयास में भी अधिक लाभ मिलता है और माया के साथ लाभ की कोई गारंटी नहीं है, और फल पूर्व-कर्मों पर निर्भर रहता है । 12). पवित्र हरिनाम का जप हमारे भगवद्धाम जाने के लिए, टिकट के समान है । यह हमारी भगवद्धाम जाने की गंभीरता पर निर्भर करता है कि हम शीघ्र पहुँचना चाहते हैं या कई जन्मों के बाद आराम से । 13). भगवान कृष्ण के नाम, माया से हमारी रक्षा करते हैं । वास्तव में बाधा लगने वाली शारीरिक और मानसिक असुविधाएं जप करने वाले गंभीर भक्त के सामने कुछ नहीं है । 14). कृष्ण हमारी गंभीरता से आकर्षित होते हैं और जप करते समय आने वाले क्रोध, निराशा, ईर्ष्या इत्यादि बुरे विचारों से हमारी रक्षा करते हैं । 15). कई लोग धन, ज्ञान और कई भौतिक लाभों के लिए देवी-देवताओं की पूजा करते हैं । वह एक व्यापार मात्र है, आप उनके लिए कुछ कीजिये और वे आपके लिए । परन्तु कृष्ण से हमारा सम्बन्ध अलग प्रकार का है, यह सम्बन्ध मात्र लेन-देन से बढ़कर और भी अधिक प्रगाढ़ है । वे हमें अहैतुकी कृपा और प्रेम प्रदान करते हैं और हम भी वही करते हैं । हमें आशा है आपके जप में अब सुधार होगा । कृपया स्मरण रखें “ध्यान-रहित” किया हुआ जप वास्तव में जप है ही नहीं । सदैव जपिए, हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे । हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ॥ हरे कृष्ण !!

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. "पाप का बाप" एक पण्डितजी काशी से विद्याध्ययन करके अपने गांव वापिस आए। शादी की, पत्नी घर पर आई। एक दिन पत्नी ने पण्डितजी से पूछा– ’आपने काशी में विद्याध्ययन किया है, आप बड़े विद्वान है। यह बताइए कि पाप का बाप (मूल) कौन है ?’ पण्डितजी अपनी पोथी-पत्रे पटलते रहे, पर पत्नी के प्रश्न का उत्तर नहीं दे सके। उन्हें बड़ी शर्मिन्दगी महसूस हुई कि हमने इतनी विद्या ग्रहण की पर आज पत्नी के सामने लज्जित होना पड़ा। वे पुन: काशी विद्याध्ययन के लिए चल दिए। मार्ग में वे एक घर के बाहर विश्राम के लिए रुक गये। वह घर एक वेश्या का था। वेश्या ने पण्डितजी से पूछा–’कहां जा रहे हैं, महाराज ?’ पण्डितजी ने वेश्या को बताया कि ‘मेरी स्त्री ने पूछा है कि पाप का बाप कौन है ? इसी प्रश्न का उत्तर खोजने काशी जा रहा हूँ।’ वेश्या ने कहा–’आप वहां क्यों जाते हैं, इस प्रश्न का उत्तर तो मैं आपको यहीं बता सकती हूँ।’ पण्डितजी प्रसन्न हो गए कि यहीं काम बन गया, पत्नी के प्रश्न का उत्तर इस वेश्या के पास है। अब उन्हें दूर नहीं जाना पड़ेगा। वेश्या ने पण्डितजी को सौ रुपये भेंट देते हुए कहा–’महाराज! कल अमावस्या के दिन आप मेरे घर भोजन के लिए आना, मैं आपके प्रश्न का उत्तर दे दूंगी।’ सौ रुपये का नोट उठाते हुए पण्डितजी ने कहा–’क्या हर्ज है, कर लेंगे भोजन।’ यह कहकर वेश्या को अमावस्या के दिन आने की कहकर पण्डितजी चले गए। अमावस्या के दिन वेश्या ने रसोई बनाने का सब सामान इकट्ठा कर दिया। पण्डितजी आए और रसोई बनाने लगे तो वेश्या ने कहा–’पक्की रसोई तो आप सबके हाथ की पाते (खाते) ही हो, कच्ची रसोई हरेक के हाथ की बनी नहीं खाते। मैं पक्की रसोई बना देती हूँ, आप पा (खा) लेना।’ ऐसा कहकर वेश्या ने सौ रुपये का एक नोट पण्डितजी की तरफ बढ़ा दिया। सौ का नोट देखकर पण्डितजी की आंखों में चमक आ गई। उन्होंने सोचा–पक्की रसोई हम दूसरों के हाथ की खा ही लेते हैं, तो यहां भी पक्की रसोई खाने में कोई हर्ज नहीं है। वेश्या ने पक्की रसोई बनाकर पण्डितजी को खाना परोस दिया। तभी वेश्या ने एक और सौ का नोट पण्डित के आगे रख दिया और हाथ जोड़कर विनती करते हुए बोली–’महाराज! जब आप मेरे हाथ की बनी रसोई पा रहे हैं, तो मैं अपने हाथ से आपको ग्रास दे दूँ तो आपको कोई ऐतराज तो नहीं है, क्योंकि हाथ तो वहीं हैं जिन्होंने रसोई बनाई है।’ पण्डितजी की आंखों के सामने सौ का करारा नोट नाच रहा था। वे बोले–’सही कहा आपने, हाथ तो वे वही हैं।’ पण्डितजी वेश्या के हाथ से भोजन का ग्रास लेने को तैयार हो गये। पण्डितजी ने वेश्या के हाथ से ग्रास लेने के लिए जैसे ही मुंह खोला, वेश्या ने एक करारा थप्पड़ पण्डितजी के गाल पर जड़ दिया और बोली–’खबरदार ! जो मेरे घर का अन्न खाया। मैं आपका धर्मभ्रष्ट नहीं करना चाहती। अभी तक आपको ज्ञान नहीं हुआ। यह सब नाटक तो मैंने आपके प्रश्न का उत्तर देने के लिए किया था। जैसे-जैसे मैं आपको सौ रुपये का नोट देती गयी, आप लोभ में पड़ते गए और पाप करने के लिए तैयार हो गए। इस कहानी से सिद्ध होता है कि पाप का बाप लोभ, तृष्णा ही है। मनुष्य अधिक धन-संग्रह के लोभ में पाप की कमाई करने से भी नहीं चूकता। इसीलिए शास्त्रों में अधिक धनसंग्रह को विष या मद कहा गया है। पहले कनक का अर्थ धतूरा है जिसे खाने से बुद्धि भ्रमित होती है, किन्तु दूसरे कनक का अर्थ सोना (धन) है जिसे देखने से ही बुद्धि भ्रमित हो जाती है। कामना या तृष्णा का कोई अंत नहीं है। तृष्णा कभी जीर्ण (बूढ़ी) नहीं होती, हम ही जीर्ण हो जाते हैं। इसलिए प्यारे भक्तों मेरे कृष्णा से प्रेम कीजिये और पाप से बचने का रास्ते पर चलिए। पाप से बचने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने इन चार बातों का त्याग बतलाया है– "जो प्राप्त नहीं है उसकी कामना"। "जो प्राप्त है उसकी ममता"। "निर्वाह की चिन्ता और मैं ऐसा हूँ यानी अंहकार।" इन चार बातों का त्याग कर मनुष्य पाप से दूर रहकर सच्ची शान्ति प्राप्त कर सकता है। ----------:::×:::---------- -श्रद्धेय सन्त श्रीरामसुखदासजी महाराज "जय जय श्री राधे" ******************************************** /

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*नाम रुपी रस* बाबूलाल गांव का एक बहुत ही बड़ा जमीदार था। बड़े बड़े खेत खलिहान बड़े-बड़े फलों के बाग बगीचे उसके पास थे ।लेकिन बाबूलाल इतना बड़ा जमींदार होने के बावजूद भी बहुत ही साधारण जीवन व्यतीत करता था। उसकी पत्नी का नाम सावित्री था जैसा उसका नाम था वैसे ही सावित्री की तरह वह अपने पति की खूब सेवा करती थी ।बाबूलाल के घर दो बेटे और एक बेटी थी। बच्चों में भी उसने खूब अच्छे संस्कार दिए थे ।रूपवान होने के साथ-साथ तीनों बच्चे बहुत ही गुणवान थे ।बाबूलाल को बचपन से ही उसकी मां ने गले में कंठी माला और हाथ में झोली माला देकर उसकी महत्ता को समझा दिया था ।बाबूलाल बचपन से ही झोली माला से महामंत्र का निरंतर जाप करता रहता था। मां के गुजर जाने के बाद उसका साथ उसकी पत्नी ने खूब निभाया। पत्नी भी खूब संस्कारी थी। घर में इतना धन होने के बावजूद भी बाबूलाल और उसकी पत्नी बहुत ही साधारण जीवन व्यतीत करते थे। बाबूलाल की पत्नी अपने हाथों से अपने पति के वस्त्रों को धोती ठाकुर जी और अपने पति बच्चों के लिए खुद भोजन तैयार करती। घर में नौकर चाकरों की कोई कमी ना थी। लेकिन फिर भी बाबूलाल की पत्नी अपने बच्चों और पति का काम खुद ही करती थी ।बाबूलाल ने कभी भी अपने हाथ से झोली माला को नहीं छोड़ा था निरंतर उसके हाथ से झोली माला में महामंत्र का जाप चलता ही रहता था ।चाहे बुखार की जकड़न हो या सर्दी की अकड़न हो उसकी हाथ से माला कभी ना छूटती। रात को सोते वक्त वो ठाकुर जी के चरणों में झोली माला को रख देता ।लेकिन उसके मन रूपी मनके से महामंत्र का जाप निरंतर चलता ही रहता। कुल मिलाकर वह 24 घंटे महामंत्र का जाप करता ही रहता था। लगातार महामंत्र का जाप करने से उस माला के मनको पर स्वयं राधा कृष्ण के नाम का आवरण चढ चुका था। एकादशी व्रत करना बाबू लाल और सावित्री के नियम में शामिल था और द्वादशी के दिन वह दूर दूर से ब्राह्मणों को बुलाकर उनको भोजन करवाता और खूब दान दक्षिणा देता। इतना दान देने के बावजूद भी वह खुद एक साधारण सी धोती कुर्ता पहनता था और उसकी पत्नी भी सूती साड़ी ही पहनती ।कुल मिलाकर वह बहुत ही साधारण जीवन व्यतीत करते थे! ठाकुर जी का खूब नाम लेते थे ।देखते ही देखते कब बच्चे बड़े हो गए बाबूलाल को पता ही नहीं चला। अब उसकी बेटी जवान हो चुकी थी और एक बहुत अच्छे घर से उसका रिश्ता तय हो गया। शादी का दिन भी तय हो गया। ठाकुर जी की कृपा से शादी बहुत अच्छी तरह से संपन्न हो कर उसकी बेटी घर से विदा हो गई। बाबूलाल कभी भी अपनी झोली माला को इधर उधर ना रखकर ठाकुर जी के चरणों में हमेशा रखता था। लेकिन बेटी की शादी में वह इतना उलझ गया कि उसको याद ही नहीं रहा कि रात को सोते समय उसकी झोली माला उसके कुर्ते की जेब में रह गई है। सुबह 5:00 बजे उठकर उसकी पत्नी जो कि रोज नदी में स्नान करने जाती थी और साथ में ही अपनने और अपने पति के कपड़ों को भी धो कर आती थी । कुर्ता और धोती लेकर सावित्री नदी किनारे धोने के लिए चली गई। कुर्ते को उसने एक पत्थर पर रख कर जैसे ही धोना शुरू किया धोते-धोते उसको महामंत्र के जाप की आवाज आने लगी ।बाबूलाल की पत्नी एकदम से घबरा गई है कि सुबह-सुबह महामंत्र का जाप नदी किनारे कौन कर रहा है जैसे जैसे वह कुरते को पत्थर पर पटकती वैसे वैसे आवाज और तेज होती गई ।उसकी पत्नी हक्की बक्की हो गई कि महामंत्र की आवाज कहां से आ रही है ।जब उसने ध्यान लगाकर सुना तो उसने देखा कि कुर्ते की जेब के अंदर से आवाज आ रही है। उसने जब कुरते को देखा तो उसमें झोली माला को देखकर वो एकदम से सकपका सी गई और उसने झट से नदी के पानी से हाथ होकर उस माला को कुर्ते की जेब से निकालकर मस्तक पर लगाया ।और ठाकुर जी से क्षमा मांगने लगी कि भूलवश मैने पत्थर पर झोली माला को पटक दिया । हजार बार वह ठाकुर जी से क्षमा मांग चुकी थी ।जब वह वापस आई तो उसने देखा कि बाबूलाल घर के आंगन में बहुत घबराया हुआ सा इधर-उधर चक्कर लगा रहा है। सावित्री ने पूछा कि आप इतने चिंतित क्यों हैं तो बाबूलाल ने बोला कि मेरी झोली माला नहीं मिल रही तो उसकी पत्नी ने हाथ जोड़कर क्षमा मांगते हुए अपने पति से कहा कि यह भूलवश आपके कुर्ते में रह गई थी और मैंने उसको ऐसे ही धो दिया ।अपनी माला को पाकर बाबूलाल के जैसे शरीर से निकले हुए प्राण वापस आ गए हो। उसने माला को पकड़ा और अपने सीने से लगाया और सीने से माला को लगाकर उसको ऐसा लगा कि जैसे उसने ठाकुर जी और किशोरी जी को सीने से लगा लिया हो और आनंद से उसकी आंखो से झरझर आंसु बहने लगे और उसकी आंखों में निकलने वाले ठंडे ठंडे आंसु उसके शरीर को भिगोने लगे।क्योंकि आनंद और प्रेम में निकलने वाले आंसू हमेशा ठंडे होते हैं और शोक में निकलने वाले आंसू हमेशा गर्म होते हैं ।अभी सुबह के 6:00 बजे थे जैसे-जैसे सूरज चढ़ने लगा वैसे वैसे गांव में शोर मचने लगा कि नदी किनारे एक पत्थर ऐसा है जो कि सोने जैसा चमक रहा है और अपने आप ही हिल रहा है और उसमें से अजीब सी ध्वनि निकल रही है। सब लोग उस पत्थर को देखने के लिए जा रहे थे ।बाबूलाल और उसकी पत्नी के कानो में भी उस पत्थर के बारे में बातें पढ़ी तो वह भी देखने के लिए चल पड़े ।बाबूलाल की पत्नी यह देखकर हैरान हो गई यह तो वही पत्थर है जिस पर उसने अपने पति के कुरत्ते को धोया था ।और जिसमें झोली माला थी वह सब कुछ समझ गई जब उसने पास जाकर उस ध्वनि को सुना वह ध्वनि ओर कुछ नहीं बल्कि महामंत्र की ध्वनी थी क्योंकि झोली माला के ऊपर चढ़ा हुआ राधा कृष्ण नाम का रस निचुड कर उस पत्थर पर पड़ गया था जिसके कारण वह सोने जैसा चमक रहा था और महामंत्र के आनंद मे अपने आप ही झूम रहा था। बाबूलाल उसकी पत्नी एक दूसरे के साथ बातें करने लगे और कहने लगे कि अगर महामंत्र की झोली माला से निकले महामंत्र के रस से एक पत्थर सोने जैसा चमक रहा है और उसके आनंद से झूम रहा है और अगर हम अपने हृदय रूपी मानस पटल पर राधाकृष्ण के नाम रुपी रस और महामंत्र के रस को निचोड़ ले तो उस मंत्र के मद में चूर श्री राधाकृष्ण नाम की नैया हमेशा हमारे हृदय में हिचकोले खाती फिरेगी !! 🙏जय हो महामंत्र की !! 🙏जय हो हम सब के प्यारे श्यामाश्याम जू की !! 💮!!हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे!!💮 💮!!हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे!!💮

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गृप वाले सभी वैष्णवों कों 🌷🤚 🌷🌱🌷🌱🌷🌱🌷🌱🌷🌱🌷 एकादशी के लिए कई वैष्णवों द्वारा हमारे पास अलग-अलग मेसेज आ रहे है उनके बारे में सही जानकारी । 👆👆👆👆👆👆👆👆👆👆👆 सबसे पहले तो हम एकादशी के सभी प्रश्नों संक्षिप्त मे लिख देते है । ताकि जिनको जो संशय हो वो हिसाब से समज पाये । ( 1 ) श्री महाप्रभुजी ने कहा है कि एकादशी करने से करोड यज्ञ का दान मिले , करोड गायो के दान जितना फल मिले , 81 रुषी को भोजन करवायें इतना फल मिले , करोड बार गंगा स्नान करने जितना फल मिले .................... क्या यह ? 👉 जैसे-जैसे मिडिया से अच्छी जानकारी प्राप्त होती है ऐसे थोड़ी ग़लत फेमी भी होती है । सबसे पहली बात तो यह है की श्री महाप्रभुजी ने कभी भी फल की आशा रखने का सिखाया ही नहीं है । तो फिर ऐसी बात कहां से ? पुष्टि मार्ग में चार जयंती ओर एकादशी के व्रत का ही पालन करना ऐसा ही कहा है । श्री महाप्रभुजी ने सेवा करना ओर अपने से हो सके इतना पालन करके सच्ची राहोंपे चलना सिखाया है नहीं के एक एकादशी जैसा उपवास करलो ओर ठेर सारे फलो की आशाएँ रखके बैठ जाव । श्री महाप्रभुजी ने बताया है ऐसे सेवा करो मेवा की आशा मत रखो ओर ऐसी बातें पर भी अनदेखा करो । ( 2 ) प्रतिदिन जल अर्पण करो लेकिन एकादशी के दिन जल अर्पण नहीं करना चाहिए ? 👉 बिलकुल गलत बात है ................. प्रतिदिन जल पीलावो तो फिर एकादशी को क्युं नहीं ? एकादशी पे जल की जरूरत तुलसीजी को नहीं पड़े ? जल तो हररोज पीलाना ही चाहिए । एक एकादशी पे आप भी जल बीना की करो तो सब समज में आ जायेगा । ( 3 ) तुलसी के मांजर को तोड़ लेना चाहिए क्योंकि तुलसी जी को मांजर से कष्ट होता है ? 👉 मांजर से तुलसी जी को कोई कष्ट नहीं होता है लेकिन मांजर होने से तुलसीजी कम हो जाता है इसी लिए जो कष्टदायक होता तो वोही मांजर मे से तुलसीजी उगते । अपने यहां तो अन्नकुट भोग में मांजर की मालाजी आवे बाद में ही आगे का क्रम शरु होता है । ( 4 ) रविवार ओर द्वादशी के दिन तुलसी जी नहीं तोड़ना चाहिए ? 👉रविवार ओर द्वादशी को तुलसीजी नहीं तोड़े तो क्या हमारे यहां ओर मंदिर में बिराजमान श्री ठाकुरजी को रविवार ओर द्वादशी को दुधघर ही धरे ? कैसी बातें हो रही है ? श्री ठाकुरजी को तुलसीजी के बीना सखडी भोग आवे ही नहीं । तो फिर ऐसी बातें क्युं ? श्रीठाकुरजी के लिए तुलसीजी की आवश्यकता हो तो कभी भी पेड़-पोथे में से ले सकते हैं । ( 5 ) तुलसी जी की यह 👆सब सेवा करो तो श्री ठाकुरजी की सेवा बराबर ही है ? 👉तुलसीजी का स्थान उच्च है वो है लेकिन श्री ठाकुरजी की बरोबरी ना कीसी से हुई है ओर ना होंगी । तुलसीजी को जल पीलाया , मांजर तोड़े , हररोज प्रदिक्षीणा की , नमन कीया ओर क्यां सेवा ? बस इतनी सेवा में फल की आशा ............. ? श्री ठाकुरजी के चरणाॅविंद में श्री तुलसीजी बिराजमान है इतना फर्क में सब समजलो वोही बहेतर है । 🌷🌱अ.सौ रुपा बहुजी 🌱🌷

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।।श्री राधा।। परम पूज्य राधा भाव निमग्न श्री राधा बाबा वचनामृत *भगवान के यहाँ अवश्य सुनाई देती है* सत्सँग करने से मनुष्य को थोड़ी या बहुत अवश्य शान्ति मिलती है।श्रद्धा जिस दिन पूरी हो जायगी, उसी दिन भगवान की दया एवम भगवान--दोनों ही प्रत्यक्ष हो जायेंगे। दयामय से प्रार्थना करनी चाहिये- प्रभो! मेरे अन्तःकरण में शुद्ध दया एवं प्रेम का संचार कीजिये। वे अतिशय दयालु हैं। भक्त को कभी निराश नहीं करते। उनके यहाँ विलम्ब से या जल्दी अवश्य सुनाई होती है। श्रीराधाबाबा जु !! : *आस्तिकता की आधारशिलाएं* *अपने लिये भजन आपको ही करना पड़ेगा* प्रतिदिन आयु कम हो रही , मृत्यु निकट आ रही है इसे मत भूलें। मृत्यु के बाद आपके न रहने पर भी यहाँ किसी काम में कोई अड़चन होगी, यह बिल्कुल ठीक मानिये। आप देखते हैं-—परिवार में किसी न व्यक्ति की मृत्यु के समय कितना हाहाकार मचता है पर पीछे सब अतीत के गर्भ में दब जाता है। उनका अभाव कितने आदमियों को खटकता है। यह दशा हम सबकी होगी। लोग भूल जायेंगे और जगत का काम ठीक है ,जैसा चलना चाहिये वैसा चलता रहेगा। पर आपके बिना एक काम नहीं होगा। आपके लिये भजन आपको ही करना पड़ेगा। इस काम की पूर्ति आपको ही करनी पड़ेगी। इसलिये खूब गम्भीरता से मन को जो यहां फंस रहा है यहाँ से निकालकर सुधार में लगाइये। भगवत्प्राप्ति के सिवा कई ऐसी स्थिति नहीं है कि जो निर्भय हो, जहाँ से पतन का भय न हो ।सर्वत्र अशान्ति है, सर्वत्र भय लगा है। इसलिये उस स्थिति को पाने में ही हमारी सार्थकता , जिसे पाकर अशान्ति मिट जाय--अनन्त शान्ति मिल जाय, सदा के लिये हम सुखी हो जायें। श्रीराधाबाबा जु !!

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