मेरे अपने सिर्फ भगवान हैं और मैं भगवान का हूँ........ परम पूज्य श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार जी ने अपनी लेखनी से लिखा है प्रेम कि कोई परिभाषा नही है, क्योंकि जो प्रेम के सागर मे डूब गया वो कहाँ बता पायेगा कि प्रेम क्या है... भक्तों के प्रति भगवान का प्रेम या भगवान के प्रति भक्तगण का प्रेम क्या है.? भगवान बहुत जल्दी भक्त के प्रेमपाश में बन्ध जाते है, वो प्रेम पाने के लिए अपनी भगवत्ता का भी त्याग करने में संकोच नहीं करते, भक्तों की पराधीनता को भगवान ने अर्चावतार में प्रतक्षरूप से स्वीकारी है। भक्त जब चाहे उनको जगाये, सुलाये, उनके आगे भोग धराये इसका अर्चा (मूर्ति) के रूप में कभी विरोध नहीं करते। इस कलियुग में अर्चावतार ने तो अनेक लीलायें की हैं। ऐसी ही एक बहुत सुंदर लीला है, स्मरण आई ध्यान से पढे... एक दिन श्रीगिरिराज के श्रीहरिदेवजी ने श्रीकेशवाचार्य जी से कहा कि "बाबा बहुत दिना है गये आज तो खीर खाइबे को मन कर रयो है।" श्रीकेशवाचार्यजी यह सुनकर प्रेम से गद्गद हो गये। वे तुरन्त गये और मधुकरी करके खीर का सामान ले आये और खीर बनाई उनका मन प्रेम से परिपूर्ण हो रहा था कि 'आज तो ठाकुरजी ने कह कर खीर बनवाई है।' खीर को उतार कर चोड़ी थाल में फैला दिया ताकि ठंडी होकर खाने योग्य हो जाय और आप थोडा नियम में लग गये। कुछ समय बाद श्रीकेशवाचार्यजी श्रीमन्दिर में श्रीहरिदेव जी का श्रृंगार उतारने के लिये गये तो ठाकुरजी को वहां न पाकर चिन्तित हो गये कि 'ठाकुरजी गये तो कहा गये।' इधर-उधर देखते हुए रसोई में पहुंचे तो देखा कि ठाकुरजी पीढ़ा में बैठकर सपक-सपक खीर खा रहे हैं। न गरुड़ घंटी बजाई और न पर्दा ही लगाया। श्रीकेशवाचार्यजी बोले:- "जय जय सरकार आपको तो इतना भी धैर्य न हुआ, मैं थाली में परोस कर श्रीमन्दिर में लाता।" ठाकुरजी कहने लगे कि "बाबा तुमने तो इतने प्रेम ते खीर बनाइके राखी और हमारी भूख तो और बढ़ गयी। हमने सोची कि बाबा माला में उलझ गयो है, जाने कब भोग लगायेगो।" ऐसी अद्भुत-अद्वितीय अनेकों लीलायें है अर्चावतार की। प्रेम का मूल- अपनापन जिसमें हमारी प्रियता होगी उसकी याद अपने आप आयेगी। अपनी स्त्री , बेटी-बेटा इसलिये याद आते हैं कि उनमें हमारी प्रियता है, उनको हमने अपना माना है। यदि भगवान में प्रेम चाहते हो तो उनको अपना मान लो फिर उनकी याद स्वत: आयेगी करनी नहीं पडेगी। आप जिसको पसन्द करोगे उसमें मन स्वत: लगेगा। 'भगवान मेरे हैं' - इन शब्दों में जो शक्ति है, वह त्याग- तपस्या में नहीं है। जीवमात्र भगवान का पुत्र है, और भगवान सम्पूर्ण जीवों के पिता हैं। चौरासी लाख योनियाँ और उनके सिवाय देव, राक्षस, असुर, भूत, प्रेत, पिशाच आदि जितनी योनियाँ हैं, वे भी भगवान के पुत्र हैं। आप केवल स्वीकार कर लें कि हम भगवान के पुत्र हैं तो क्या वाधा है ? इतना स्वीकार कर लें तो बहुत काम हो गया.. वर्षों तक साधन करने से जो स्थिति नहीं बनती, वह स्थिति इतना स्वीकार करने से बन जायेगी। सबसे अन्तिम सबका निचोड यह बात है कि अपने केवल भगवान हैं, उनके सिवाय कोई अपना नहीं है। भगवान सदा हमारे साथ में रहते हैं, उनके सिवाय सदा कोई भी हमारे साथ में नहीं रहता। अगर इस बात को आप स्वीकार कर लो तो बहुत लाभ की बात है। जो चीज मिल जाये और बिछुड जाये वह अपनी चीज नहीं होती, परन्तु भगवान सदा ही मिले हुये रहते हैं, कभी बिछुडते नहीं। यह सब शास्त्रों का, पुराणों का, वेदों का सार है, इसलिये सबके साथ प्रेम का बर्ताव करो, पर हृदय से अपना मत मानो। हृदय से केवल भगवान को अपना मानो और दूसरों को अपना मानोगे तो एक दिन रोना पडेगा। वास्तव में भक्त वही है, जो भगवान का है। जो भगवान का होता है, वह साधारण आदमी नहीं होता। संसार का आदमी साधारण होता है। पदार्थ और क्रिया का सम्वन्ध इस लोक से है, हमारा इनके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। कोई काम करते समय यह सोच लो कि मैं भगवान का हूँ तो यह काम किस ठंग से करूँ, आपके मन में स्वत: स्फुरणा हो जायेगी। आप सच्चे हृदय से भगवान को चाहोगे तो भगवान का भजन क्या करें यह आपके मन में स्वत: आ जायेगा। "मैं केवल भगवान का ही हूँ, और केवल ही भगवान मेरे अपने हैं" यह नामजप से, भगवान के स्मरण से भी ऊँची बात है, यह असली भजन है। "भगवान मेरे हैं" यह प्रेम का जनक है... प्रेम त्याग, तपस्या आदि साधनों से नहीं होता प्रत्युत भगवान में अपनेपन से होता है।...... जय जय श्रीजु

+59 प्रतिक्रिया 6 कॉमेंट्स • 1 शेयर

स्वामिनी जु को सुबह ऐसे उठावें 🙏🏻 उठौ हो किशोरी गोरी भोर भयो लाड़िली जू, हँसि हँसि ठाड़ी बैन कीरति सुनावै हैं! ललिता,विशाखा,चंपकलता,चित्रा,तुंगविद्या, इन्दुलेखा,रंगदवी,सुदेवी जगावै हैं!! लाल बलबीर लै लै बीन कौ बजावै कोऊ, कोऊ मुस्कियाय घाय चरन सिरावै हैं! झीने सुर गावे तन आलस नसावै सबै, राधा मुखचन्द कौ चकोर ललचावै हैं!! यह सब भाव राज्य की पदावली है। प्रिया लाल जू भक्तों के भाव और प्रेम में ही साकार रूप लेते हैं और उन्हें अपने चिन्मय परिवेश में लिए चलते हैं। जहाँ इस भौतिक देह से तो नहीं अपितु कृपा स्वरूप चिन्मय देह मिलती है और अपने गुरु जी के आनुगत्य में छोटी सी सखी या किंकरी भाव में यह सब सेवा का क्रम चलता है। मैया कीरति जी प्रसन्नता से श्री लाड़िलीजू को मधुर वचनों से जगा रही हैं-हे लाड़िली जू !भोर हो गई है,अब आप जागें। हे किशोरी जू!आप श्री की प्रिय सखियाँ-ललिताजी, विशाखा जी, चंपकलता जी, चित्रा जी, तुगंविद्या जी, इन्दुलेखा जी, रंगदेवी जी और सुदेवी जी सब प्रीतिपूर्वक आप को जगाने का प्रयास कर रहीं हैं। लाल बलबीर जी कहते हैं कि कोई सखी श्यामा जू को प्रसन्न करने के लिए कर्ण प्रिय सुरों मे बीन बजाती है तो कोई उनके तन से आलस्य दूर करने के लिए उनके सुकोमल चरणो को स्पर्श करती है। सखी जन अति मधुर और झीने सुरों मे गायन करती हुई प्रिया जू की लालसा बढ़ाने के लिए गातीं हैं कि -श्यामा जू। आप जगने की अनुकम्पा कीजिए क्योंकि श्री श्याम रूपी चकोर, श्री राधा मुख रूपी चन्द्रमा के दर्शन करने के लिए अति आतुरता से प्रतीक्षा कर रहा है।

+20 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 0 शेयर

💛💝🌿🙇🏻‍♂️नवनीत गुलाब से कोमल हैं, हठी कंज की मंजुलता इनमें। गुललाला गुलाब प्रबाल जपा, छबि ऐसी न देखी ललाईन में॥ मुनि मानस मंदिर मध्य बसै, बस होत है सूधै सूभाईन में। रहुरे मन तू चित चाइन सों, वृषभानु किशोरी के पायन में॥ 💌श्री राधा मक्खन की तुलना में अधिक कोमल हैं और गुलाब की पंखुड़ियों से अधिक मुलायम हैं, जैसा कि श्री हठी जी कहते हैं, उनकी सुंदरता कमल के फूल से अधिक है। श्री राधा की छवि इतनी सुन्दर है की संसार में और किसी ने कहीं नहीं देखि, ना गुलाल के फूल में, ना गुलाब, प्रबाल, जपा के फूल में । वह उन महान मुनियों के ह्रदय मंदिर में निवास करती हैं जिनका स्वभाव सरल हो चूका है एवं जो सम्पूर्ण समर्पण कर चूके हैं। हे, मेरे मन, मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ, बड़े प्रेम और उत्साह के साथ, बस श्री राधाजू, श्री वृषभानुजी की बेटी के चरण कमलों में रह।

+32 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 0 शेयर

*🌸“प्रपत्ति-बोधिनी”🌸* _*‘नमामि भक्तमाल को’*_ _‘कलियुग की भक्त नारियाँ’_ _श्रीजीवाबाई जी_ ये भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त थीं | एक बार इनके पुत्र को शीतला निकलीं | लोक मान्यता के अनुसार लोगों ने इनसे शीतला देवी की पूजा करने को कहा | इनके पति ने भी जोर दिया | पर इन्होंने किसी की बात न सुनते हुए अपने इष्ट भगवान श्यामसुन्दर का ही ध्यान करना जारी रखा | पति ने क्रोधित होकर कहा कि यदि पुत्र मर गया तो इन्हें भी उसके साथ जलना होगा | ये मौन रहते हुए केवल भगवान का नाम जपती रहीं | पुत्र की हालत बिगड़ी और वो मर गया | लोग और परिवार वाले जितना बुरा इनको कह सकते थे, उन्होंने कहा | पर ये मौन ही रहीं और खुद श्मशान में जाकर चिता तैयार करी तथा पुत्र को गोद में लेकर उसपर बैठ गयीं | अब वो समय आया जब भक्ति ने अपना प्रताप दिखलाया और मृत पुत्र जीवित हो उठा | हम भक्ति करते रहें | परिस्थितियाँ कैसी भी हों- भजन न छूटे | हमारे पूर्व कर्मों का फल अपना काम करेगा और भक्ति अपना | पूर्व कर्मों को परिस्थितियाँ लाने दो और भक्ति को परिणाम | अनुकूलता को न आता देख और प्रतिकूलता को बढ़ता देख, भजन नहीं छूटना चाहिए | भजन जारी रहेगा तो चमत्कार घटेगा ही | ज़वाब भी भजन को ही देने दो | लोग कुछ भी कहते रहें, कोई ज़वाब नहीं दो | बस भक्ति का दामन पकड़े रहो | हमें भक्ति करनी है और भक्ति को बाकी काम | जय श्री राधे श्याम 🙏🙏🙏🙏🙏

+121 प्रतिक्रिया 41 कॉमेंट्स • 17 शेयर

एक पुरानी रचना फिर सामने आई......विरह ..... विरह में जो आनन्द है वह मिलन में कहाँ? विरह ही तो हमें उनके गुणों और हमारे जीवन में उनकी महत्ता का ज्ञान कराता है। वे जब जीव से बहुत प्रेम करते हैं तब अपने प्रेम के सर्वोत्कृष्ट फ़ल, विरह का आनन्द देते हैं। जगत में भी अपने किसी प्रियजन से बिछोह के बाद ही हम अपने जीवन में उसकी महत्ता को अनुभव कर पाते हैं। रास में भी अंतर्ध्यान होने के पीछे यही रहस्य है। मिलन में तो सुध-बुध खो जाती है, आनन्द कहाँ? मिलन में प्रतिक्षण विरह की आशंका व्याप्त रहती है किन्तु विरह में कैसी आशंका? एक ही विश्वास; मिलन होगा ही ! कब? वे जानें ! और मिलन की भी आकांक्षा नहीं ! क्योंकि वे तो साथ हैं ही; प्रतिपल, प्रतिक्षण ! विरह में जब "लीला घटती" है तब कैसा अदभुत गोपन परमानन्द ! कृष्ण के मथुरा आने पर क्या गोपियाँ उनके दर्शन के लिये आ नहीं सकतीं थीं किन्तु क्या वे आयीं? क्योंकि विरह में जो मिला, मिलन में नहीं ! यही तो रसिकों/प्रेमियों की अमूल्य निधि है; उनकी पूँजी है। पहले तो मिलन के लिये उसकी संध्या समय तक राह तकनी पड़ती थी कि आ रहे होंगे रसिकशेखर श्यामसुन्दर, गौओं के साथ ! किन्तु अब? अब तो वह प्रतिक्षण साथ ही हैं। अब कैसी प्रतीक्षा? अब कहाँ जाकर उनकी बाट देखना ! अब तो वे कहीं जाते ही नहीं ! उनकी ही लीला ! उनका ही चिंतन ! पहले तो कभी=कभी ही अंक से लगने का सौभाग्य मिलता था किन्तु अब कैसी दुविधा? सब समय उनके अंक में ! गाढ़ालिंगन में ! न लोक-लाज जाने का भय, न मर्यादा-भंग का भय ! कोई भय नहीं और साँवरा अपने पास ! उसके इतर कोई चिंतन नहीं ! कुन्ज हैं, निकुन्ज हैं; वे दृश्य भी, अदृश्य भी ! वे छोड़ते ही नहीं ! कभी छोड़ेगे भी नहीं ! तो अब कहाँ जाना? मेरा प्रियतम, मेरे पास ! प्रतिक्षण मिलन ! प्रतिक्षण विरह ! स्वयं उनकी भी तो यही अवस्था होती है ! विरह में चिंतन करते-करते श्रीकिशोरीजी की देह श्यामल हो जाती है और वे पुकार उठती हैं - राधे ! राधे !! राधे !!! और साँवरे की देह मानो स्वर्णिम हो उठती है और वे भी सुध-बुध भूलकर पुकार उठते हैं - हे कृष्ण ! हे माधव !! हे मनमोहन !!! जय जय श्री राधे

+58 प्रतिक्रिया 11 कॉमेंट्स • 5 शेयर

कालिदास बोले :- माते पानी पिला दीजिए बड़ा पुण्य होगा. स्त्री बोली :- बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं. अपना परिचय दो। मैं अवश्य पानी पिला दूंगी। कालिदास ने कहा :- मैं पथिक हूँ, कृपया पानी पिला दें। स्त्री बोली :- तुम पथिक कैसे हो सकते हो, पथिक तो केवल दो ही हैं सूर्य व चन्द्रमा, जो कभी रुकते नहीं हमेशा चलते रहते। तुम इनमें से कौन हो सत्य बताओ। कालिदास ने कहा :- मैं मेहमान हूँ, कृपया पानी पिला दें। स्त्री बोली :- तुम मेहमान कैसे हो सकते हो ? संसार में दो ही मेहमान हैं। पहला धन और दूसरा यौवन। इन्हें जाने में समय नहीं लगता। सत्य बताओ कौन हो तुम ? . (अब तक के सारे तर्क से पराजित हताश तो हो ही चुके थे) कालिदास बोले :- मैं सहनशील हूं। अब आप पानी पिला दें। स्त्री ने कहा :- नहीं, सहनशील तो दो ही हैं। पहली, धरती जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है। उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है, दूसरे पेड़ जिनको पत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं। तुम सहनशील नहीं। सच बताओ तुम कौन हो ? (कालिदास लगभग मूर्च्छा की स्थिति में आ गए और तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले) कालिदास बोले :- मैं हठी हूँ । . स्त्री बोली :- फिर असत्य. हठी तो दो ही हैं- पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं। सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप ? (पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके थे) कालिदास ने कहा :- फिर तो मैं मूर्ख ही हूँ । . स्त्री ने कहा :- नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो। मूर्ख दो ही हैं। पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है, और दूसरा दरबारी पंडित जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है। (कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे) वृद्धा ने कहा :- उठो वत्स ! (आवाज़ सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां खड़ी थी, कालिदास पुनः नतमस्तक हो गए) माता ने कहा :- शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार । तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग करना पड़ा। . कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े। शिक्षा :- विद्वत्ता पर कभी घमण्ड न करें, यही घमण्ड विद्वत्ता को नष्ट कर देता है। दो चीजों को कभी व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए..... अन्न के कण को "और" आनंद के क्षण को ___________________________________________ ____________________________________________

+27 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 25 शेयर