🙏 मूर्ति में जान 🙏 एक लड़की थी... उसे अपने घर के संस्कारो की वजह से लड्डू गोपाल की भक्ति मिली... उस लड़की की बड़ी आस्था थी लड्डू गोपाल में.... वह लड़की हमेशा वृन्दावन जाती थी और लड्डू गोपाल के दर्शन कर के आती थी.... धीरे धीरे वह बड़ी होती रही पर उसने वृन्दावन जाना नहीं छोड़ा... उसकी शादी हो गयी, बच्चे हो गए, वो भी बड़े हो गए, उनकी भी शादी हो गयी.. पर उस लड़की का नियम कायम था.... एक दिन जब वो लड़की बहुत बुड़िया हो गयी और उसके बस की चलना नहीं रहा... वो वृन्दावन जाकर लड्डू गोपाल की एक मूर्ति ले आई... और घर में रह कर ही उनकी पूजा करने लगी... एक दिन पूजा करने के बाद उस बुड़िया ने अपनी बहु से कहा की, बहु इस मूर्ति तो अंदर वाले कमरे में रख दे... बहु उस मूर्ति को लेकर अंदर गयी पर गलती से उस से वोह मूर्ति छूट गयी... बड़ी जोर के आवाज हुई... बुड़िया घबराई सी चिल्लाई, क्या हुआ बहु... बहु बोली, कुछ नहीं माँ जी केवल मूर्ति गिर गयी है.... यह सुन कर बुड़िया जोर जोर से रोने लगी.... वो रो रो कर यही चिल्लाये जा रही थी की कोई जाओ और जाकर डॉक्टर को बुलवाओ... मेरे लड्डू गोपाल को चोट लग गयी... मेरे लड्डू गोपाल को चोट लग गयी.... पहले तो बहु ने सोचा के बुड़िया नाटक कर रही है... पर जब काफी देर हो जाने के बाद भी वोह चुप नहीं हुई तो बहु को लगा की बुड़िया पागल हो गयी है.. अक्सर बुड़ापे में लोग सठिया जाते है.. शाम को जब बुड़िया का बेटा घर आया और उसे बहु ने सब समझाया तो उसे भी लगा की माँ सचमुच पागल हो गयी है... भला मूर्ति के लिए भी कोई डॉक्टर आता है.. फिर उसे अपने बच्चो का ख्याल आया.. और उस ने निश्चय किया की माँ को पागल खाने भेजना पड़ेगा.. नहीं तो माँ के पागलपन का असर मेरे बच्चो पर भी पड़ सकता है.... वहां पास में ही एक समझदार आदमी रहता था... जब उसके कानो तक यह बात पहुची तो उसने, उस माँ के बेटे को बुलाया और उसे समझाया की, देखो बेटा बुड़ापा और बचपन दोनों एक जैसे होते है... जो आदते बचपन में होती है वो ही बुड़ापे में... तू एक काम कर जा और एक डॉक्टर को बुला ला... उसे पहले से ही समझा दियो की तुझे एक मूर्ति का चेकअप करना है..... और बाद में यह बोलना है की मूर्ति तो ख़तम हो गई और उस में अब जान बाकि नहीं है... जब उसे पैसे मिलेंगे तो भला उसे क्या दिक्कत होगी यह कहने में.. इस तरह तुम्हारी माँ को पागल खाने भी नहीं जाना पड़ेगा और और उसकी जिद्द भी पूरी हो जायेगी... बेटे को बात समझ में आ गयी... वो गया और जैसा उस आदमी ने बताया था एक डॉक्टर को समझा दिया... डॉक्टर भी राजी हो गया... अगले दिन डॉक्टर उस बुड़िया के घर गया.. और घर में घुसते ही बोला अरी बुड़िया कहा है तेरे लड्डू गोपाल... बुड़िया ने मूर्ति को दिखाते हुए कहा, आओ डॉक्टर साहब आओ... देखना जरा क्या हो गया मेरे लड्डू गोपाल को.. डॉक्टर दूर से ही बोला... अरी बुड़िया इस में तो जान बाकि नहीं है... यह तो ख़तम हो गई... बुड़िया को गुस्सा आ गया.. बुड़िया ने डॉक्टर से पूछा क्यों रे डॉक्टर कितने साल हो गए तुझे डाक्टरी करते हुए.. डॉक्टर सकपकाया... और बोला 40 साल पर क्यों... बुड़िया ने कहा की इतने साल हो गए तुझे डाक्टरी करते हुए पर इतना समझ नहीं आया की मरीज को हाथ लगाये बिना उसकी बीमारी का पता नहीं चलता.. डॉक्टर को लगा की वो कुछ ज्यादा ही जल्दी अपना काम ख़तम कर रहा है.. उस ने जा कर मूर्ति की हाथ के नब्ज देखि.. और कहा की ले माँ कुछ नहीं है तेरे लड्डू गोपाल में.. बुड़िया बोली बेटा सही से देख.. ऐसा नहीं हो सकता... डॉक्टर ने इस बार छाती को चेक कर के देखा.. और फिर बोला माँ कुछ नहीं है अब तेरी मूर्ति में.. यह ख़त्म हो गयी... बुडिया ने कहा की बेटा वोह जो मशीन होती है न तुम्हारे पास उस से चेक कर के देख... डॉक्टर समझ गया की बुड़िया स्तेथोस्कोपे की बात कर रही है.. अब उस को पैसे मिले थे तो उसे क्या दिक्कत थी वोह भी लगा कर चेक करने में.. जवाब तो उसे पता ही था... उस डॉक्टर ने अपना स्तेथोस्कोपे निकाला.. और उस को उस मूर्ति के छाती पर रखा.. मूर्ति में से जोर जोर के धक् धक् के आवाज आई.. डॉक्टर घबरा गया.. उसने बार बार चेक करा.. और हर बार धक् धक् की आवाज आई.. उस डॉक्टर ने उस बुड़िया के पैर पकड़ लिए और बोला.. की माँ यह जो दुनिया तुझे पागल कहती है असल में यह दुनिया पागल है जो इस मूर्ति के पीछे छुपी तेरी भावनाओ को नहीं देख सकी. इस मूर्ति में जान नहीं थी यह तो तेरी श्रद्धा थी की इस मूर्ति में भी जान आ गयी.. जय जय श्री राधे

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🌴गुरू की बात को गिरिधारी भी नही टाल सकते🌰🌰🌰🌰🌰 वृंदावन मे एक संत के पास कुछ शिष्य रहते थे उनमे से एक शिष्य मंद बुद्धि का था। एक बार गुरु देव ने सभी शिष्यों को अपने करीब बुलाया और सब को एक मास के लिए ब्रज मे अलग-अलग स्थान पर रहने की आज्ञा दी और उस मंद बुद्धि को बरसाने जाकर रहने को कहा। मंद बुद्धि ने बाबा से पुछा बाबा मेरे रहने खाने की व्यवस्था वहा कौन करेगा। बाबा ने हंस कर कह दिया राधा रानी, कुछ दिनों बाद एक एक करके सब बालक लौट आए पर वो मंद बुद्धि बालक नही आया। बाबा को चिंता हुई के दो मास हो गए मंद बुद्धि बालक नही आया जाकर देखना चाहिए, बाबा अपने शिष्य की सुध लेने बरसाने आ गए। बाबा ने देखा एक सुन्दर कुटिया के बाहर एक सुन्दर बालक बहुत सुन्दर भजन कर रहा है, बाबा ने सोचा क्यों ना इन्ही से पुछा जाए। बाबा जैसे ही उनके करिब गए वो उठ कर बाबा के चरणों में गिर गया और बोला आप आ गए गुरु देव! बाबा ने पुछा ये सब कैसे तु ठीक कैसे हो गया शिष्य बोला बाबा आपके ही कहने से किशोरी जी ने मेरे रहने खाने पीने की व्यवस्था की और मुझे ठीक कर भजन करना भी सिखाया। बाबा अपने शिष्य पर बरसती किशोरी जी की कृपा को देख खुब प्रसन्न हुए और मन ही मन सोचने लगे मेरे कारण मेरी किशोरी जी को कितना कष्ट हुआ। उन्होंने मेरे शब्दो का मान रखते हुए मेरे शिष्य पर अपनी सारी कृपा उडेल दी। इसलिए कहते है गुरू की बात को गिरिधारी भी नही टाल सकते। ।।।। जय सिया राम जी ।।।।

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*प्रेम की नगरिया आँखों से दिखाई नहीं देती* करुणामयी राधे पत्रिका। भौतिकवादी युग को आँखों से देखा जा सकता है परंतु श्यामसुंदर की प्रेम नगरिया को कानों से सुना जाता है। श्यामसुंदर की जो प्रेम डगरिया है वह आँखों से नहीं बल्कि कानों से सुनकर उसके रास्ते पर चला जाता है। हर क्षण उनके गुणों को सुनो, हमें अपने-आप उनका रास्ता मिल जाएगा। भगवन्न नाम स्मरण व श्रवण से रास्ता ही नहीं वे खुद ही आकर तुम्हारे पास बैठ जाएंगे। स्वयं श्री कृष्ण ने कहा है, " मैं बैकुंठ में नहीं रहता, जहाँ मेरे भक्त स्नेह से मेरा नाम गाते व श्रवण करते हैं, मैं तो वहीँ उनके पास ही रहता हूँ। एक दवा ऐसी होती है जो केवल रोग को समाप्त करती है और एक दवा ऐसी होती है जो रोग को भी नष्ट करती है और स्वस्थ भी करती है। भगवन्नाम इसी दवा का नाम है। हर क्षण प्रभु का नाम लेते रहिये। ये पाप भी नाश कर देगा और मंगल भी करेगा। भगवान् को *देखकर प्रेम* नहीं किया जाता, भगवान् को *सुनकर प्रेम* किया जाता है। *करुणामयी राधे धार्मिक पत्रिका* (श्रीधामबरसाना से प्रकाशित) *श्री प्रवीण गोस्वामी जी* (सेवाधिकारी श्रीजी मंदिर, बरसाना) संपर्क सूत्र: 9319587188

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प्यारे सुंदर युगल सरकार राधा सच्चिदानंद ठाकुर जी की जय 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 अनेकों भकतवृंदो ने ठाकुर जी को अनेको विधियों की उपासना करके पाया बस शरत इतनी है कि लगन सच्ची और मन में दृढ़ विश्वास होना चाहिए। मेरे पिता जी कहते थे कि ठाकुर जी उनसे बातें करते हैं। दासी पहले भी विश्वास करती थी अब भी करती है। 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 विश्वास की कथा है ये 😊🌹 *कहानी* 🌹☺ एक बेटी ने एक संत से आग्रह किया कि वो घर आकर उसके बीमार पिता से मिलें, प्रार्थना करें...बेटी ने ये भी बताया कि उसके बुजुर्ग पिता पलंग से उठ भी नहीं सकते... जब संत घर आए तो पिता पलंग पर दो तकियों पर सिर रखकर लेटे हुए थे... एक खाली कुर्सी पलंग के साथ पड़ी थी...संत ने सोचा कि शायद मेरे आने की वजह से ये कुर्सी यहां पहले से ही रख दी गई... संत...मुझे लगता है कि आप मेरी ही उम्मीद कर रहे थे... पिता...नहीं, आप कौन हैं... संत ने अपना परिचय दिया...और फिर कहा...मुझे ये खाली कुर्सी देखकर लगा कि आप को मेरे आने का आभास था... पिता...ओह ये बात...खाली कुर्सी...आप...आपको अगर बुरा न लगे तो कृपया कमरे का दरवाज़ा बंद करेंगे... संत को ये सुनकर थोड़ी हैरत हुई, फिर भी दरवाज़ा बंद कर दिया... पिता...दरअसल इस खाली कुर्सी का राज़ मैंने किसी को नहीं बताया...अपनी बेटी को भी नहीं...पूरी ज़िंदगी, मैं ये जान नहीं सका कि प्रार्थना कैसे की जाती है...मंदिर जाता था, पुजारी के श्लोक सुनता...वो सिर के ऊपर से गुज़र जाते....कुछ पल्ले नहीं पड़ता था...मैंने फिर प्रार्थना की कोशिश करना छोड़ दिया...लेकिन चार साल पहले मेरा एक दोस्त मिला...उसने मुझे बताया कि प्रार्थना कुछ नहीं भगवान से सीधे संवाद का माध्यम होती है....उसी ने सलाह दी कि एक खाली कुर्सी अपने सामने रखो...फिर विश्वास करो कि वहां भगवान खुद ही विराजमान हैं...अब भगवान से ठीक वैसे ही बात करना शुरू करो, जैसे कि अभी तुम मुझसे कर रहे हो...मैंने ऐसा करके देखा...मुझे बहुत अच्छा लगा...फिर तो मैं रोज़ दो-दो घंटे ऐसा करके देखने लगा...लेकिन ये ध्यान रखता कि मेरी बेटी कभी मुझे ऐसा करते न देख ले...अगर वो देख लेती तो उसका ही नर्वस ब्रेकडाउन हो जाता या वो फिर मुझे साइकाइट्रिस्ट के पास ले जाती... ये सब सुनकर संत ने बुजुर्ग के लिए प्रार्थना की...सिर पर हाथ रखा और भगवान से बात करने के क्रम को जारी रखने के लिए कहा...संत को उसी दिन दो दिन के लिए शहर से बाहर जाना था...इसलिए विदा लेकर चले गए.. दो दिन बाद बेटी का संत को फोन आया कि उसके पिता की उसी दिन कुछ घंटे बाद मृत्यु हो गई थी, जिस दिन वो आप से मिले थे... संत ने पूछा कि उन्हें प्राण छोड़ते वक्त कोई तकलीफ़ तो नहीं हुई... बेटी ने जवाब दिया...नहीं, मैं जब घर से काम पर जा रही थी तो उन्होंने मुझे बुलाया...मेरा माथा प्यार से चूमा...ये सब करते हुए उनके चेहरे पर ऐसी शांति थी, जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी...जब मैं वापस आई तो वो हमेशा के लिए आंखें मूंद चुके थे...लेकिन मैंने एक अजीब सी चीज़ भी देखी...वो ऐसी मुद्रा में थे जैसे कि खाली कुर्सी पर किसी की गोद में अपना सिर झुकाया हो...संत जी, वो क्या था... ये सुनकर संत की आंखों से आंसू बह निकले...बड़ी मुश्किल से बोल पाए...काश, मैं भी जब दुनिया से जाऊं तो ऐसे ही जाऊं... जय श्री कृष्ण अखण्डमंडला त्रिभुवन नायक नयनाभिराम प्यारे युगल सरकार राधा सच्चिदानंद ठाकुर जी की जय 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹 🌹

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