Preeti Jain Nov 25, 2021

🙋‍♂️ *एक कर्नल साहब कुएं में गिर गये!!* *सिपाही कुंए में रस्सा फेंकते, जैसे ही कर्नल साहब ऊपर आते, सिपाही रस्सी छोड़ कर कर्नल साहिब को सलूट करते, तो कर्नल कुएं में गिर जाते। एक अनुभवी सैनिक ने सलाह दी कि एक ब्रिगेडियर साहब को तकलीफ देते हैं ताकि उन्हें सैल्यूट ना करना पड़े। एक ब्रिगेडियर को बुलाया गया। ब्रिगेडियर साहब ने रस्सी फेंकी। कर्नल साहब ने रस्सी पकड़ी और ब्रिगेडियर साहब खींचने लगे। कर्नल साहब जैसे ही किनारे पर पहुंचे, उनकी नज़र ब्रिगेडियर साहब पर पड़ी, कर्नल साहब ने रस्सा छोडकर ब्रिगेडियर साहब को सलाम किया और फिर कुएं में गिर गए। यह बार बार हुआ।🙄🤔🙄🤔* *आख़िरकार कर्नल साहब की आवाज़ कुएं से आई।🗣️* *"'कमबख्तों, किसी दोस्त को बुलाओ'🧐'* *Moral of the story:- 🎯🎯👌* *दोस्त बहुत जरूरी है दुनिया में आपको बचाने के लिए......😁😁😁* *Dedicated To All The Friends😊😇*

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Preeti Jain Nov 23, 2021

2️⃣1️⃣❗1️⃣1️⃣❗2️⃣0️⃣2️⃣1️⃣ *(((( संसार में सबसे बड़ा कौन ))))* . एक बार नारद जी के मन में एक विचित्र सा कौतूहल पैदा हुआ। . उन्हें यह जानने की धुन सवार हुई कि ब्रह्मांड में सबसे बड़ा और महान कौन है? . नारद जी ने अपनी जिज्ञासा भगवान विष्णु के सामने ही रख दी। भगवान विष्णु मुस्कुराने लगे। . फिर बोले, नारद जी सब पृथ्वी पर टिका है। इसलिए पृथ्वी को बड़ा कह सकते हैं। और बोले परंतु नारद जी यहां भी एक शंका है। . नारद जी का कौतूहल शांत होने की बजाय और बढ़ गया। नारद जी ने पूछा स्वयं आप सशंकित हैं फिर तो विषय गंभीर है। कैसी शंका है प्रभु? . विष्णु जी बोले, समुद्र ने पृथ्वी को घेर रखा है। इसलिए समुद्र उससे भी बड़ा है। . अब नारद जी बोले, प्रभु आप कहते हैं तो मान लेता हूं कि समुद्र सबसे बड़ा है। . यह सुनकर विष्णु जी ने एक बात और छेड़ दी, परंतु नारद जी समुद्र को अगस्त्य मुनि ने पी लिया था। इसलिए समुद्र कैसे बड़ा हो सकता है? बड़े तो फिर अगस्त्य मुनि ही हुए। . नारद जी के माथे पर बल पड़ गया। फिर भी उन्होंने कहा, प्रभु आप कहते हैं तो अब अगस्त्य मुनि को ही बड़ा मान लेता हूं। . नारद जी अभी इस बात को स्वीकारने के लिए तैयार हुए ही थे कि विष्णु ने नई बात कहकर उनके मन को चंचल कर दिया। . श्री विष्णु जी बोले, नारद जी पर ये भी तो सोचिए वह रहते कहां हैं। . आकाशमंडल में एक सूई की नोक बराबर स्थान पर जुगनू की तरह दिखते हैं। फिर वह कैसे बड़े, बड़ा तो आकाश को होना चाहिए। . नारद जी बोले, हां प्रभु आप यह बात तो सही कर रहे हैं। आकाश के सामने अगस्त्य ऋषि का तो अस्तित्व ही विलीन हो जाता है। . आकाश ने ही तो सारी सृष्टि को घेर आच्छादित कर रखा है। आकाश ही श्रेष्ठ और सबसे बड़ा है। . भगवान विष्णु जी ने नारद जी को थोड़ा और भ्रमित करने की सोची। . श्रीहरि बोल पड़े, पर नारदजी आप एक बात भूल रहे हैं। वामन अवतार ने इस आकाश को एक ही पग में नाप लिया था फिर आकाश से विराट तो वामन हुए। . नारदजी ने श्रीहरि के चरण पकड़ लिए और बोले भगवन आप ही तो वामन अवतार में थे। . फिर अपने सोलह कलाएं भी धारण कीं और वामन से बड़े स्वरूप में भी आए। इसलिए यह तो निश्चय हो गया कि सबसे बड़े आप ही हैं। . भगवान विष्णु ने कहा, नारद, मैं विराट स्वरूप धारण करने के उपरांत भी, अपने भक्तों के छोटे हृदय में विराजमान हूं। . वहीं निवास करता हूं। जहां मुझे स्थान मिल जाए वह स्थान सबसे बड़ा हुआ न। . इसलिए सर्वोपरि और सबसे महान तो मेरे वे भक्त हैं जो शुद्ध हृदय से मेरी उपासना करके मुझे अपने हृदय में धारण कर लेते हैं। . उनसे विस्तृत और कौन हो सकता है। तुम भी मेरे सच्चे भक्त हो इसलिए वास्तव में तुम सबसे बड़े और महान हो। . श्रीहरि की बात सुनकर नारद जी के नेत्र भर आए। उन्हें संसार को नचाने वाले भगवान के हृदय की विशालता को देखकर आनंद भी हुआ और अपनी बुद्धि के लिए खेद भी। . नारद जी ने कहा, प्रभु संसार को धारण करने वाले आप स्वयं खुद को भक्तों से छोटा मानते हैं। फिर भक्तगण क्यों यह छोटे-बड़े का भेद करते हैं। . मुझे अपनी अज्ञानता पर दुख है। मैं आगे से कभी भी छोटे-बड़े के फेर में नहीं पड़ूंगा। . यदि परमात्मा के प्रति हमारी पूर्ण श्रद्धा, समर्पण और भक्ति है तो हम सदैव परमात्मा से परोक्ष रूप से जुड़ जाते हैं। . भगवान भक्त के वश में हैं भक्त अपनी निष्काम भक्ति से भगवान को वश में कर लेता है। . हमारे मन मे सदैव यही भाव होना चाहिए कि हे प्रभू, हे त्रिलोक के स्वामी इस संसार मे मेरा कुछ नही, यहां तक कि यह शरीर और श्वांसे भी मेरी नही है, फिर मैं आपको क्या समर्पण करूँ। . फिर भी जो कुछ भी तेरा है वह तुम्हे सौंपता हूँ। आप ही सर्वेश्वर है, आप ही नियंता है, आप ही सृजन हार और आप ही संहारक है..!! *🙏🏾🙏🏻🙏🏿जय जय श्री राधे*🙏🏼🙏🏽🙏

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Preeti Jain Nov 22, 2021

गर्मियों की छुट्टियों में 15 दिन के लिए मायके जाने के लिए पत्नी ज्योति और दोनों बच्चों को रेलवे स्टेशन छोड़ने गया तो मैडमजी ने सख्त हिदायत दी। माँजी-बाबूजी का ठीक से ध्यान रखना और समय-समय पर उन्हें दवाई और खाना खाने को कहियेगा। हाँ.. हाँ..ठीक है..जाओ तुम आराम से, 15 दिन क्या एक महीने बाद आना, माँ-बाबूजी और मैं मज़े से रहेंगे..और रही उनके ख्याल की बात तो... मैं भी आखिर बेटा हूँ उनका, (मैंने भी बड़ी अकड़ में कहा) ज्योति मुस्कुराते हुए ट्रैन में बैठ गई, कुछ देर में ही ट्रेन चल दी.. उन्हें छोड़कर घर लौटते वक्त सुबह के 08.10 ही हुए थे तो सोचा बाहर से ही कचोरी-समोसा ले चलूं ताकि माँ को नाश्ता ना बनाना पडे। घर पहुंचा तो माँ ने कहा... ° तुझे नहीं पता क्या..? हमने तला-गला खाना पिछले आठ महीनों से बंद कर दिया है.. वैसे तुझे पता भी कैसे होगा, तू कौन सा घर में रहता है। आखिरकार दोनों ने फिर दूध ब्रेड का ही नाश्ता कर लिया..!! नाश्ते के बाद मैंने दवाई का डिब्बा उनके सामने रख दिया और दवा लेने को कहा तो माँ बोली। ° हमें क्या पता कौन सी दवा लेनी है रोज तो बहू निकालकर ही देती है। मैंने ज्योति को फोन लगाकर दवाई पूछी हें निकालकर खिलाई। इसी तरह ज्योति के जाने के बाद मुझे उसे अनगिनत बार फोन लगाना पड़ा, कौन सी चीज कहाँ रखी है, माँ-बाबूजी को क्या पसन्द है क्या नहीं, कब कौन सी दवाई देनी है, रोज माँ-बाबूजी को बहू-बच्चों से दिन में 2 या 3 बार बात करवाना, गिन-गिन कर दिन काट रहे थे दोनों, सच कहूँ तो माँ-बाबूजी के चेहरे मुरझा गए थे, जैसे उनके बुढ़ापे की लाठी किसी ने छीन ली हो। बात-बात पर झुंझलाना और चिढ़-चिढ़ापन बढ़ गया था उनका, मैं खुद अपने आप को बेबस महसूस करने लगा, मुझसे उन दोनों का अकेलापन देखा नहीं जा रहा था। आखिरकार अपनी सारी अकड़ और एक बेटा होने के अहम को ताक पर रखकर एक सप्ताह बाद ही ज्योति को फोन करके बुलाना पड़ा। और जब ज्योति और बच्चे वापस घर आये तो दोनों के चेहरे की मुस्कुराहट और खुशी देखने लायक थी, जैसे पतझड़ के बाद किसी सूख चुके वृक्ष की शाख पर हरी पत्तियां खिल चुकी हो। और ऐसा हो भी क्यों नही... आखिर उनके परिवार को अपने कर्मों से रोशन करने वाली उनकी ज्योति जो आ गई थी। मुझे भी इन दिनों में एक बात बखूबी समझ आ गई थी और वो यह कि...!! वृद्ध माता-पिता के बुढ़ापे में असली सहारा एक अच्छी बहू ही होती है... ना कि बेटा आपको ये कहानी कैसी लगी हमें कमेंट बॉक्स में बताये और शेयर करना ना भूलें !🙏🙏🌹🌹

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Preeti Jain Nov 21, 2021

बहुत ही खूबसूरत पोस्ट लिखी है और बड़े दिल से लिखी है एक बार जरूर नमन कीजिए *जीवन में 45 पार का मर्द........* *कैसा होता है ?* थोड़ी सी सफेदी कनपटियों के पास, खुल रहा हो जैसे आसमां बारिश के बाद, जिम्मेदारियों के बोझ से झुकते हुए कंधे, जिंदगी की भट्टी में खुद को गलाता हुआ, अनुभव की पूंजी हाथ में लिए, परिवार को वो सब देने की जद्दोजहद में, जो उसे नहीं मिल पाया था, बस बहे जा रहा है समय की धारा में, *बीवी और प्यारे से बच्चों में* पूरा दिन दुनिया से लड़ कर थका हारा, रात को घर आता है, सुकून की तलाश में, लेकिन क्या मिल पाता है सुकून उसे ? दरवाजे पर ही तैयार हैं बच्चे, पापा से ये मंगाया था, वो मंगाया था, नहीं लाए तो क्यों नहीं लाए, लाए तो ये क्यों लाए वो क्यों नहीं लाए, अब वो क्या कहे बच्चों से, कि जेब में पैसे थोड़े कम थे, कभी प्यार से, कभी डांट कर, समझा देता है उनको, एक बूंद आंसू की जमी रह जाती है, आँख के कोने में, लेकिन दिखती नहीं बच्चों को, उस दिन दिखेगी उन्हें, जब वो खुद, बन जाएंगे माँ बाप अपने बच्चों के, खाने की थाली में दो रोटी के साथ, परोस दी हैं पत्नी ने दस चिंताएं, *कभी,* तुम्हीं नें बच्चों को सर चढ़ा रखा है, कुछ कहते ही नहीं, *कभी,* हर वक्त डांटते ही रहते हो बच्चों को, कभी प्यार से बात भी कर लिया करो, लड़की सयानी हो रही है, तुम्हें तो कुछ दिखाई ही नहीं देता, लड़का हाथ से निकला जा रहा है, तुम्हें तो कोई फिक्र ही नहीं है, पड़ोसियों के झगड़े, मुहल्ले की बातें, शिकवे शिकायतें दुनिया भर की, सबको पानी के घूंट के साथ, गले के नीचे उतार लेता है, जिसने एक बार हलाहल पान किया, वो सदियों नीलकंठ बन पूजा गया, यहाँ रोज़ थोड़ा थोड़ा विष पीना पड़ता है, जिंदा रहने की चाह में, फिर लेटते ही बिस्तर पर, मर जाता है एक रात के लिए, *क्योंकि* सुबह फिर जिंदा होना है, काम पर जाना है, कमा कर लाना है, ताकि घर चल सके,....ताकि घर चल सके.....ताकि घर चल सके।।।। *दिलसे सभी पिताओं को समर्पित,,,,,,,,,,,,,,,

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