pawan rathor Aug 6, 2020

*पिता का आशीर्वाद और उस आशीर्वाद की परीक्षा* *गुजरात के खंभात के एक व्यापारी की यह सत्य घटना है।* जब मृत्यु का समय सन्निकट आया तो पिता ने अपने एकमात्र पुत्र धनपाल को बुलाकर कहा कि बेटा - मेरे पास धन संपत्ति नहीं है कि मैं तुम्हें विरासत में दूं पर मैंने जीवनभर सच्चाई और प्रामाणिकता से काम किया है तो मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि तुम जीवन में बहुत सुखी रहोगे और धूल को भी हाथ लगाओगे तो वह सोना बन जायेगी। बेटे ने सिर झुका कर पिताजी के पैर छुए। पिता ने सिर पर हाथ रख कर आशीर्वाद दिया और संतोष से अपने प्राण त्याग दिए। अब घर का खर्च बेटे धनपाल को संभालना था।उसने एक छोटी सी ठेलागाड़ी पर अपना व्यापार आरंभ किया। धीरे-धीरे व्यापार बढ़ने लगा। एक छोटी सी दुकान ले ली। व्यापार और बढ़ा। अब नगर के संपन्न लोगों में उसकी गिनती होने लगी। उसको विश्वास था कि यह सब मेरे पिता के आशीर्वाद का ही फल है क्योंकि उन्होंने जीवन में दु:ख उठाया पर कभी धैर्य नहीं छोड़ा, श्रद्धा नहीं छोड़ी, प्रामाणिकता नहीं छोड़ी इसलिए उनकी वाणी में बल था, उनका आशीर्वाद फलीभूत हुआ और मैं सुखी हुआ। उसके मुंह से बार-बार यह बात निकलती थी। एक दिन एक मित्र ने पूछा कि, तुम्हारे पिता में इतना बल था तो वह स्वयं संपन्न क्यों नहीं हुए? सुखी क्यों नहीं हुए? धनपाल ने कहा कि, मैं पिता की ताकत की बात नहीं कर रहा हूं, मैं उनके आशीर्वाद की ताकत की बात कर रहा हूं। इस प्रकार वह बार-बार अपने पिता के आशीर्वाद की बात करता तो लोगों ने उसका नाम ही रख दिया *"पिता का आशीर्वाद"* धनपाल को इससे बुरा नहीं लगता। वह कहता कि, मैं अपने पिता के आशीर्वाद के योग्य निकलूं, यही चाहता हूं। ऐसा करते हुए कई साल बीत गए। वह विदेशों में व्यापार करने लगा। जहां भी व्यापार करता उससे बहुत लाभ होता। एक बार उसके मन में आया कि मुझे लाभ ही लाभ होता है तो मैं एक बार क्षति का अनुभव करूं तो उसने अपने एक मित्र से पूछा कि, ऐसा व्यापार बताओ कि जिसमें मुझे क्षति हो। मित्र को लगा कि इसको अपनी सफलता और पैसों का घमंड आ गया है। इसका घमंड दूर करने के लिए इसको ऐसा धंधा बताऊं कि इसको क्षति ही क्षति हो। मित्र ने बताया कि, तुम भारत में *लौंग* खरीदो और जहाज में भरकर अफ्रीका के जंजीबार में जाकर बेचो! धनपाल को यह बात ठीक लगी। जंजीबार तो लौंग का देश है। वहां से लौंग भारत में आते हैं और यहां 10-12 गुना भाव पर बिकते हैं। भारत में खरीदकर जंजीबार में बेचे तो स्पष्ट क्षति सामने दिखाई दे रही है परंतु धनपाल ने तय किया कि मैं भारत में लौंग खरीदकर जंजीबार स्वयं लेकर जाऊंगा। देखूं कि पिता का आशीर्वाद कितना साथ देता है! क्षति का अनुभव लेने के लिए उसने भारत में लोंग खरीदे और जहाज में भरकर स्वयं उनके साथ जंजीबार द्वीप पहुंचा। जंजीबार में सुल्तान का राज्य था। धनपाल जहाज से उतरकर व्यापारियों से मिलने के लिए लंबे रेतीले रास्ते पर जा रहा था। उसे सामने से सुल्तान जैसा व्यक्ति पैदल सिपाहियों के साथ आता हुआ दिखाई दिया। धनपाल ने किसी से पूछा कि, यह कौन है? उसने कहा कि, यह सुल्तान हैं। सुल्तान ने धनपाल को सामने देखकर उसका परिचय पूछा। धनपाल ने कहा कि, मैं भारत के गुजरात के खंभात का व्यापारी हूं और यहां पर व्यापार करने आया हूं । सुल्तान ने उसको व्यापारी समझकर उसका आदर किया और उससे बात करने लगा। धनपाल ने देखा कि सुल्तान के साथ सैंकड़ों सिपाही हैं परंतु उनके हाथ में तलवार, बंदूक आदि कुछ भी न होकर बड़ी बड़ी छलनियां हैं। उसको आश्चर्य हुआ। उसने विनम्रतापूर्वक सुल्तान से पूछा कि, आपके सैनिक इतनी छलनी लेकर क्यों जा रहे हैं? सुल्तान ने हंसकर कहा कि, बात यह है कि आज सवेरे मैं समुद्र तट पर घूमने आया था तब मेरी उंगली में से एक अंगूठी यहां कहीं निकल कर गिर गई। अब रेत में अंगूठी कहां गिरी पता नहीं तो इसलिए मैं इन सैनिकों को साथ लेकर आया हूं। यह रेत छानकर मेरी अंगूठी उसमें से तलाश करेंगे। धनपाल ने कहा - अंगूठी बहुत महंगी होगी। सुल्तान ने कहा - नहीं! उससे बहुत अधिक कीमत वाली अनगिनत अंगूठियां मेरे पास हैं पर वह अंगूठी एक फकीर का आशीर्वाद है। मैं मानता हूं कि मेरी सल्तनत इतनी मजबूत और सुखी उस फकीर के आशीर्वाद से है इसलिए मेरे मन में उस अंगूठी का मूल्य सल्तनत से भी अधिक है। इतना कहकर सुल्तान ने फिर पूछा कि, बोलो सेठ! इस बार आप क्या माल लेकर आये हो। धनपाल ने कहा कि - लौंग लौंऽग! सुल्तान के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। यह तो लौंग का ही देश है सेठ! यहां लौंग बेचने आये हो? किसने आपको ऐसी सलाह दी? अवश्य वह कोई आपका दुश्मन होगा। यहां तो एक पैसे में मुट्ठीभर लोंग मिलते हैं। यहां लोंग को कौन खरीदेगा? और तुम क्या कमाओगे? धनपाल ने कहा कि, मुझे यही देखना है कि यहां भी लाभ होता है या नहीं। मेरे पिता के आशीर्वाद से आज तक मैंने जो धंधा किया उसमें लाभ ही लाभ हुआ तो अब मैं देखना चाहता हूं कि उनका आशीर्वाद यहां भी फलता है या नहीं! सुल्तान ने पूछा कि, पिता का आशीर्वाद? इसका क्या अर्थ? धनपाल ने कहा कि, मेरे पिता सारा जीवन ईमानदारी और प्रामाणिकता से काम करते रहे परंतु धन नहीं कमा सके। उन्होंने मरते समय मुझे भगवान का नाम लेकर मेरे सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया था कि तेरे हाथ में धूल भी सोना बन जाएगी। ऐसा बोलते-बोलते धनपाल नीचे झुका और जमीन की रेत से एक मुट्ठी भरी और सम्राट सुल्तान के सामने मुट्ठी खोलकर उंगलियों के बीच में से रेत नीचे गिराई तो धनपाल और सुल्तान दोनों का आश्चर्य का पार नहीं रहा। उसके हाथ में एक हीरे जड़ित अंगूठी थी। यह वही सुल्तान की खोई हुई अंगूठी थी। अंगूठी देखकर सुल्तान बहुत प्रसन्न हो गया। सुल्तान ने कहा - वाह खुदा! आप की करामात का पार नहीं। आप पिता के आशीर्वाद को सच्चा करते हो। धनपाल ने कहा कि, फकीर के आशीर्वाद को भी वही परमात्मा सच्चा करता है। सुल्तान खुश हुआ। धनपाल को गले लगाया और कहा कि, मांग सेठ! आज तू जो मांगेगा मैं दूंगा। धनपाल ने कहा कि आप 100 वर्ष तक जीवित रहो और प्रजा का अच्छी तरह से पालन करो। प्रजा सुखी रहे। इसके अतिरिक्त मुझे कुछ नहीं चाहिए। सुल्तान प्रसन्न हो गया। सुल्तान ने कहा कि, सेठ! तुम्हारा सारा माल मैं आज खरीदता हूं और तुम्हें मुंह मांगी कीमत दूंगा। *सीख -* इस कहानी से शिक्षा मिलती है कि *पिता का आशीर्वाद हो तो दुनिया की कोई ताकत कहीं भी तुम्हें पराजित नहीं होने देगी। पिता और माता की सेवा का फल निश्चित रूप से मिलता है। आशीर्वाद जैसी और कोई संपत्ति नहीं! बालक के मन को जानने वाली मां और भविष्य को संवारने वाले पिता यही दुनिया के दो महान ज्योतिषी हैंं, बस इनका सम्मान करो तो तुम्हें भगवान से कुछ भी मांगना नहीं पड़ेगा। अपने बुजु़र्गों का सम्मान करें, यही भगवान की सबसे बड़ी सेवा है।* *ऐसे माता-पिता को नमन, जिन्हें उनका आशीर्वाद प्राप्त हुआ।* कॉपी पेस्ट 🌷जय श्री कुंजबिहारी श्री हरिदास जी।🌷🙏

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pawan rathor Aug 3, 2020

माना कि अंग्रेज बुरे थे मगर इतने बुरे भी नहीं थे जितने मुगल शासक थे और इसका उदाहरण झारखंड के रामगढ़ जिले का यह मंदिर है..! बात 1925 की है जब अंग्रेज रेलवे लाइन बिछा रहे थे झारखंड में तो रामगढ़ जिले में खुदाई के दौरान उन्हें यह मंदिर मिला..! अंग्रेज अफसर ने खुदाई और ज्यादा करवाई तो एक छोटा सा मंदिर जिसमें शिवलिंग और शिवलिंग के ऊपर मां गंगा की मूर्ति दीवार पर लगी हुई मिली जब पूरे मंदिर की मिट्टी हटाई गई तो मां गंगा के हाथों की उंगलियों में से पानी की एक धार छूट गई और वह सीधे शिवलिंग पर गई तब से लेकर आज तक 24 ही घंटे इस मंदिर में जलाभिषेक अपने आप होता है..! इस मंदिर की वजह से अंग्रेज अफसरों ने अपनी रेलवे लाइन को 13 किलोमीटर का मोड़ दिया और इस मंदिर को बचाया आज इस मंदिर को लोग टूटी झरना के नाम से जानते हैं वैज्ञानिकों ने यहां आकर रिसर्च किए कि आखिर पानी आ कहां से रहा है मगर उसका पता आज तक कोई नहीं लगा पाया। अंग्रेज अफसरों ने पास में ही एक हेड पंप लगाया ताकि रेलवे लाइन में काम करने वाले मजदूरों को पानी मिलता रहे कहते हैं कि अंग्रेज अफसरों ने मंदिर की पूजा की थी उसके बाद उस हेडपंप को खोदा गया था उस हेडपंप में भी पानी आज अपने आप आता है। लोग दूर-दूर से यहां दर्शन करने आते हैं और शिव पर चढ़े चरणामृत को अपने साथ ले जाते हैं कहते हैं कि जिस तरह गंगा का पानी खराब नहीं होता उसी तरह यह पानी भी कभी खराब नहीं होता यहां के लोग इसे गंगाजल ही कहते हैं अब यह तो प्रभु जाने कि झारखंड में गंगा कैसे पहुंची.. जय हो भोले नाथ की

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pawan rathor Jul 8, 2020

शक्ती मां तारा और बामा खेपा ( पागल ) की कथा ¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤ पश्चिम बंगाल के एक गांव में वामा चरण नाम के बालक का जन्म हुआ । बालक के जन्म के कुछ समय बाद उसके पिता का देहांत हो गया । माता भी गरीब थी । इसलिए बच्चों के पालन पोषण की समस्या आई । उन्हें मामा के पास भेज दिया गया । मामा तारापीठ के पास के गांव में रहते थे । जैसा कि आमतौर पर अनाथ बच्चों के साथ होता है । दोनों बच्चों के साथ बहुत अच्छा व्यवहार नहीं हुआ । धीरे धीरे वामाचरण की रुचि बाबाओं की तरफ होने लगी । गांव के मशान में आने वाले बाबाओं की संगत में रहते रहते बामाचरण में भी देवी के प्रति रुझान बढ़ने लगा । अब वह तारा माई को बड़ी मां कहते और अपनी मां को छोटी मा । बामा चरण कभी श्मशान में जलती चिता के पास जाकर बैठ जाता कभी यूं ही हवा में बातें करता रहता । ऐसे ही वह युवावस्था तक पहुंच गया । उसकी हरकतों की वजह से उसका नाम बामाचरण से वामा खेपा पड़ चुका था । खेपा का मतलब होता है पागल । यानी गांव वाले उसको आधा पागल समझते थे । उसके नाम के साथ उन्होंने पागल उपनाम जोड़ दिया था । वे यह नहीं जानते थे कि वस्तुत: कितनी उच्च कोटि का महामानव उनके साथ है । वह भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि थी । मंगलवार का दिन था । भगवती तारा की सिद्धि का परम सिद्ध मुहूर्त । रात का समय था । बामाखेपा जलती हुई चिता के बगल में श्मशान में बैठा हुआ था तभी ! नीले आकाश से ज्योति फूट पड़ी और चारों तरफ प्रकाश ही प्रकाश फैल गया। उसी प्रकाश में वामाचरण को माँ तारा के दर्शन हुए। । कमर में बाघ की खाल पहने हुए ! एक हाथ में कैंची लिए । एक हाथ में खोपड़ी लिए । एक हाथ में नीले कमल का पुष्प लिए । एक हाथ में खड्ग लिए हुए। महावर लगे सुंदर पैरो में पायल पहने हुए । खुले हुए कमर तक बिखरे केश से युक्त , परम ब्रह्मांड की स्वामिनी, सौंदर्य की प्रतिमूर्ति । नील वर्णी , मंद मंद मुसकाती माँ तारा, वामाखेपा के सामने खड़ी थी……. वामाखेपा उस भव्य और सुंदर देवी को देखकर खुशी से भर गए। माता ने उसके सर पर हाथ फेरा और बामाखेपा वही समाधिस्थ हो गए । 3 दिन और 3 रात उसी समाधि की अवस्था में वे श्मशान में रहे । 3 दिन के बाद उन्हें होश आया और होश आते ही वह मां मां चिल्लाते हुए इधर उधर दौडने लगे । अब गांव वालों को पूरा यकीन हो गया कि बामा पूरा पागल हो गया है । बामा की यह स्थिति महीने भर रही .... कुछ दिन बाद वहां की रानी जी को सपने में भगवती तारा ने दर्शन दिए और निर्देश दिया कि मसान के पास मेरे लिए मंदिर का निर्माण करो और बामा को पुजारी बनाओ । अगले दिन से मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ हो गया । कुछ ही दिनों में मंदिर बनकर तैयार हो गया और बामा को मंदिर का पुजारी बना दिया गया । बामा बेहद खुश हो गए क्योंकि उनकी बड़ी मां अब उनके साथ थी…... रानी के द्वारा बनाया मंदिर अर्थात मोटे चढ़ावे की संभावना । अब ऐसे मंदिर में एक आधे पागल को पुजारी बनाना बहुत से पण्डों को रास नहीं आया । वे बामाखेपा को निपटाने का मार्ग खोजते रहते थे । बामाखेपा की हरकतें अजीब अजीब हुआ करती थी । कई बार वह दिन भर पूजा करता । कई बार 2-2, 3-3 दिन तक पूजा ही नहीं करता । कभी देवी को माला पहनाता कभी खुद पहन लेता । इनमें से कोई भी प्रक्रम पंडों के हिसाब से शास्त्रीय पूजन विधि से मैच नहीं खाता था । यह बात उनको खटक रही थी । फिर एक दिन ऐसा हुआ कि प्रसाद बना और प्रसाद बनने के बाद जब मंदिर में पहुंचा तो देवी को भोग लगाने से पहले वामा चरण के मन में विचार आया, कि इसे चक्कर देख लो यह माता के खाने के लायक है भी कि नहीं । बस फिर क्या था । उन्होंने प्रसाद की थाली में हाथ डाला और चखने के लिए अपने मुंह में डाल लिया । चखने के बाद जब सही लगा तो बाकी प्रसाद उन्होंने माई को अर्पित कर दिया । इतना बड़ा अवसर पंडित कहाँ छोड़ते । उन्होंने बवाल मचा दिया कि, देवी के प्रसाद को बामा ने खा लिया है । उसे जूठा कर दिया है । झूठा प्रसाद देवी को चढ़ा दिया है । अब देवी रुष्ट हो जाएगी, उसका प्रकोप सारे गांव को झेलना पड़ेगा । उसके बाद भीड़तंत्र का बोलबाला हुआ और गांव वालों ने मिलकर पंडों के साथ बामाचरण की कस कर पिटाई कर दी । उसे श्मशान में ले जाकर फेंक दिया । मंदिर पर पण्डों का कब्जा हो गया । उन्होंने शुद्धीकरण और तमाम प्रक्रियाएं की । उस दिन पूजन पण्डों के अनुसार संपन्न हुआ । उधर बामाखेपा को होश आया तो वह माई पर गुस्सा हो गया - मैंने गलत क्या किया जो तूने मुझे पिटवा दिया । तुझे देने से पहले खाना स्वादिष्ट है या नहीं देख रहा था । इसमें मेरी गलती क्या थी ? मैं तो तुम्हें स्वादिष्ट भोग लगाने का प्रयास कर रहा था और चाहता था कि तुझे अच्छे स्वाद का प्रसाद ही मिले । अगर स्वाद गड़बड़ होता तो उसे फेककर दूसरा बनवाता । लेकिन तूने बेवजह मुझे पिटवाया जा मैं अब तेरे पास नही आऊंगा । मसान घाट पर बैठकर बामाचरण ने मां को सारी बातें सुना दी और वहां से उठकर चला गया जंगल की ओर । जंगल में जाकर एक गुफा में बैठ गया । यह स्थिति बिलकुल वैसे ही थी जैसे अपनी मां से रूठ कर बच्चे किसी कोने में जाकर छुप जाते हैं । बामाचरण और तारा माई के बीच में मां और बेटे जैसा रिश्ता था । यह रिश्ता बिल्कुल वैसा ही था जैसे एक अबोध शिशु और उसकी मां की बीच में होता है । अपने शिशु की व्यथा तारा माई को सहन नहीं हुई । उसी रात रानी के स्वप्न में माई प्रकट हुई । क्रोधित माई ने रानी को फटकार लगाई - तेरे पण्डों ने मेरे पुत्र को बुरी तरह से मारा है । मैं तेरा मंदिर छोड़ कर जा रही हूं । अब तुझे और तेरे राज्य को मेरा प्रकोप सहना पड़ेगा, अगर उससे बचना चाहती है तो कल के कल मेरे पुत्र को वापस लाकर मंदिर में पूजा का भार सौंप, वरना प्रतिफल भुगतने के लिए तैयार रह । एक तो तारा माई का रूप ऐसे ही भयानक है । क्रोधित अवस्था में तो सीधी सरल माता भी काली से कम नहीं दिखाई देती । क्रोधित माई का स्वरूप व्याख्या से परे था । रानी हड़बड़ा कर पलंग पर उठ बैठी । रानी के लिए रात बिताना भी मुश्किल हो गया । उसने सारी रात जागकर बिताई । अगले दिन अपने सेवकों को दौड़ाया और मामले का पता लगाने के लिए कहा । जैसे ही पूरी जानकारी प्राप्त हुई रानी अपने लाव लश्कर के साथ मंदिर पहुंच गई । सारे पण्डों को कसकर फटकार लगाई और मंदिर में प्रवेश से प्रतिबंधित कर दिया । अपने सेवकों को आदेश दिया कि जैसे भी हो बामाखेपा को पकड़कर लाओ । अब सारे सेवक चारों तरफ बामाखेपा की खोज में लग गए । एक सेवक को गुफा में बैठा हुआ बामाखेपा मिल गया । बड़ी मनोव्वल के बाद भी वह नहीं माना सेवक ने जाकर रानी को बात बताई । अंततः रानी खुद गुफा तक पहुंची । बामा ने उनपर भी अपना गुस्सा उतारा - आप के कहने पर मैं पूजा कर रहा था और मुझे देखो इन लोगों ने कितना मारा ! उनकी बाल सुलभ सहजता को देखकर रानी का नारी हृदय भी ममत्व से भर गया । उनकी समझ में आ गया कि तारा माई का मातृत्व इस बामाखेपा के प्रति क्यों है । उन्होंने फरमान जारी कर दिया - इस मंदिर का पुजारी बामाखेपा है । उसकी जैसी मर्जी हो जैसी विधि वह करना चाहे उस प्रकार से पूजा करने के लिए वह स्वतंत्र है । कोई भी उसके मार्ग में आएगा तो दंड का भागी होगा । यह मंदिर बामाखेपा का है और तारा माई भी बामाखेपा की है । वह जिस विधान को सही समझे, उस विधान से पूजा करेगा और वही विधान यहां पर सही माना जाएगा । बामाखेपा को तो जैसे मन मांगी मुराद मिल गई । मां और बेटे का मिलन हो चुका था । मंदिर व्यवस्था फिर से बामाखेपा के हिसाब से चलने लगी । ऐसा माना जाता है कि तारा माई खुद बामाखेपा के हाथ से प्रसाद ग्रहण करती थी । ऐसे अद्भुत ढंग से बामाखेपा तारा माई के पूजन करते जिसका कोई नियम नहीं था । कभी सुबह 4 बजे पूजा चल रही है तो कभी दोपहर 12 बजे तक पूजा प्रारंभ नहीं होती । क़भी रात भर पूजा चल रही है तो कभी पूरे दिन भर मंदिर की ओर बामाखेपा के दर्शन ही नहीं होते थे । उनकी पूजन विधि लोगों को पसंद नहीं थी ,लेकिन उनके पास कोई उपाय नहीं था , क्योंकि रानी का फरमान था । बामाखेपा अपनी मस्ती में जीते थे और लोग उन्हें नीचा दिखाने का रास्ता खोजते । एक दिन बामाखेपा की मां का निधन हो गया । नदी में बाढ़ थी । नदी के उस पार गांव था ।बामा जिद पर अड़ गए छोटी मां का दाह संस्कार बड़ी मां के पास वाले श्मशान में किया जाएगा । गांव वाले बाढ़ वाली नदी को पार करने में जान का खतरा है यह जानते थे , लेकिन बामा को समझाना किसी के बस की बात नहीं । नाव वाले से बाबा ने देह को नदी के पार पहुंचाने की बात की । नाव वाले ने साफ इंकार कर दिया । बाबा ने नाव देने के लिए कहा । नाव वाला हाथ जोड़कर बोला - बाबा यही मेरे जीवन का सहारा है अगर बाढ़ में यह बह गया तो मैं घर कैसे चलाउँगा ? बामा के चेहरे में रहस्यमई मुस्कान बिखर गई । जैसे उन्होंने कोई निर्णय ले लिया हो । उन्होंने अपनी माता के शव को उठाया और खुद नदी पर चलते हुए इस पार पहुंच गए । गांव वाले आंखें फाड़े उस दृश्य को देखते रह गए । बामा की इच्छा के अनुसार ही उन्होंने माई के मंदिर के पास वाले श्मशान में अपनी मां का दाह संस्कार संपन्न किया । मृत्यु भोज के लिए आसपास के सारे गांव में जितने लोग हैं, सभी को निमंत्रित करने के लिए बामाखेपा ने अपने घर के लोगों और आसपास के लोगों को कहा । सब इसे बामाखेपा का पागलपन समझकर शांत रहें । जिसके पास दो वक्त की रोटी का पता नहीं वह आसपास के 20 गांव को खाना कैसे खिलाएंगा यह उनके लिए कल्पना से भी परे की बात थी । जब कोई भी निमंत्रण देने जाने को तैयार नहीं हुआ तो बामाखेपा अकेले निकल पड़े । उन्होंने आसपास के 20 गांवों में हर किसी को मृत्यु भोज के लिए आमंत्रित कर लिया । सारे गांव वाले यह देखने के लिए तारापीठ पहुंचने लगे कि देखा जाए यह पगला किस प्रकार से इतने सारे लोगों को मृत्यु भोज कराता है । गांव वालों की आंखें उस समय फटी की फटी रह गई जब सुबह से बैल गाड़ियों में भर-भर कर अनाज सब्जी आदि तारापीठ की तरफ आने लगी । बैल गाड़ियों का पूरा एक काफिला मंदिर के पास पहुंच गया । अनाज और सब्जियों का ढेर लग गया । जो लोग आए थे उन्होंने खाना बनाना भी प्रारंभ कर दिया । दोपहर होते-होते सुस्वादु भोजन की गंध से पूरा इलाका महक रहा था । प्रकृति भी अपना परीक्षण कब छोड़ती है, आसमान में बादल छाने लगे । प्रकृति ने भी उग्र रूप धारण कर लिया । बिजली कड़कने लगी । हवाएं चलने लगी और जोरदार बारिश के आसार नजर आने लगे । बामाखेपा अपनी जगह से उठे और जिस जगह पर श्राद्ध भोज होना था , उस पूरे जगह को बांस के डंडे से एक घेरा बनाकर घेर दिया । घनघोर बारिश चालू हो गई लेकिन घेरे के अंदर एक बूंद पानी भी नहीं गिरी । गांव वाले देख सकते थे कि वे जहां बैठकर भोजन कर रहे हैं वह पूरा हिस्सा सूखा हुआ है, और उस घेरे के बाहर पानी की मोटी मोटी बूंदें बरस रही है । जमीन से जल धाराएं बह रही हैं । वह पूरा इलाका जिसमें भोज का आयोजन था ,पूरी तरह से सूखा हुआ था । 20 गांव से आए हुए सभी लोगों ने छक कर भोजन किया । हर कोई तृप्त हो गया । अब बारी थी वापस अपने अपने गांव जाने की । घनघोर बारिश को देखते हुए वापस जाने के लिए दिक्कत आएगी यह सोचकर सभी चिंतित थे । बामाखेपा ने माई के सामने अपना अनुरोध पेश किया और कुछ ही क्षणों में आसमान पूरी तरह से साफ हो गया और धूप खिल गई । सारे लोग बड़ी सहजता से अपने अपने गांव तक पहुंच गए । इस घटना के बाद बामाखेपा की अलौकिकता के बारे में लोगों को पता लगा । धीरे-धीरे लोगों की भीड़ बामाखेपा की तारा पीठ में बढ़ने लगी । कोई बीमार आता तो बामाखेपा उस पर हाथ फेर देते तो वह स्वस्थ हो जाता है । निसंतानों को संतान की प्राप्ति हो जाती और सभी आगंतुकों की इच्छा और मनोकामना तारापीठ में पूरी होने लगी । बामाखेपा कभी भी बिना चखे माई को भोजन नहीं कराते थे । माई स्वयं अपने हाथ से उनको भोजन खिलाती थी और उनके हाथों से भोजन ग्रहण करती थी । ऐसे अद्भुत महामानव बामाखेपा अपने अंत समय में माई की प्रतिमा में लीन हो गए ।

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pawan rathor Jun 27, 2020

पान का बीड़ा तीन साधु थे, यात्रा कर रहे थे यमुना किनारे उनमें तीसरा साधु जो था वो बुढा था, वृद्ध था, उसने कहा ''भाई हम इस गाँव के बाहर मन्दिर में आसन लगा के यहां रहेगे'' तुम तो जवान हो, तुम चलेे जाओ। तो दो जवान साधु आगे गये चलते-चलते संध्या हो गयी दोनों साधुओं ने सोचा अब बरसाना आ रहा है, राधा रानी जी का गाँव, क्या करेंगे ? मांगेगे कहाँ ? बोले मांगना कहाँ हम तो राधारानी के मेहमान है, खिलाएगी तो खा लेंगे नहीं तो मन्दिर में आरती के समय कहीं कुछ प्रसाद मिलेगा वो खा के पानी पिलेगें..! साधुओं ने मज़ाक-मज़ाक में ऐसा कहा, वो साधु पहुंच गये बरसाना और बरसाना में आरती हुई, मन्दिर में उत्सव भी हुआ था साधु बाबा बोले मांगेगे तो नहीं राधारानी के मेहमान है, ऐसे कह कर साधु सो गये। रात्रि में 11 बजे राधारानी जी के पुजारी को राधारानी जी ने ऐसा जगाया, राधा रानी बोली ''मेहमान हमारे भूखे हैं, तू सो रहा है। ''पुजारी जी ने पूछा मेहमान कौन है ? राधा रानी जी ने कहा वह दो साधु... पुजारी के तो होश-हवास उड़ गये, पुजारी उठे, सोये साधुओं को उठाया तुम, तुम राधारानी के मेहमान हो क्या ? साधु बोले नहीं हम तो ऐसे ही पुजारी बोले नहीं आप बैठो हाथ-पैर धोये पत्तले लायें और अच्छे से अच्छा जो मन्दिर का प्रसाद था, उत्सव का प्रसाद था, जो भी था, लड्डू, रसगुल्ले, खीर बस टनाटन पक्की रसोई जिमाई। वो साधु थोड़ा टहल के बोले, राधा रानी जी हमने तो मज़ाक में कहा था तुमने सचमुच में हमको मेहमान बना लिया माँ, हे राधे मैया... साधु राधारानी का चिन्तन करते-करते सो गये, दोनों साधुओं को एक जैसा सपना आया। सपने में वो 12 साल की राधारानी बोलतीं है... साधु बाबा भोजन तो कर लिया आपने, तृप्त तो हो गये, भूख तो मिट गयी ? भोजन तो अच्छा रहा ? साधु बोले हाँ भोजन, जल आपको सुखद लगे ? साधु बोले हाँ अब कोई और आवश्यकता है क्या ? साधु बोले नहीं-नहीं मैया राधारानी बोलीं देखो वो पुजारी डरा-डरा तुमको भोजन तो कराया लेकिन मेरा पान बीडे का प्रसाद देना भूल गया लो ये मैं पान बीडा देती हूँ आपको, ऐसा कहकर उनके सिरहाने पर रखा दिया सपने में देख रहे हैं के राधारानी जी सिरहाने पर पान बीडा रख रही है ऐसे ही उनकी आँख खुल गई। देखा तो सचमुच में पान बीड़ा सिरहाने पर है दोनों साधुओं के! मेरी राधा प्यारी की कृपा का क्या कहना.. जय जय श्री राधे कौन कहता है कि दिल्लगी बर्बाद करती है.. निभाने वाली लाडो हो तो दुनिया याद करती है....! 🙏🏻🙏🏻राधे राधे🙏🏻🙏🏻 जय जय श्री राधे कृष्णा

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pawan rathor Jun 25, 2020

*एक आदमी ने एक भूत पकड़ लिया और उसे बेचने शहर गया। संयोगवश उसकी मुलाकात एक सेठ से हुई। सेठ ने उससे पूछा- भाई! यह क्या है?* *उसने जवाब दिया कि यह एक भूत है। इसमें अपार बल है। कितना भी कठिन कार्य क्यों न हो, यह एक पल में निपटा देता है। यह कई वर्षों का काम मिनटों में कर सकता है।* *सेठ भूत की प्रशंसा सुनकर ललचा गया और उसकी कीमत पूछी। उस आदमी ने कहा- कीमत बस पाँच सौ रुपए है। कीमत सुनकर सेठ ने हैरानी से पूछा- बस पाँच सौ रुपए?* *उस आदमी ने कहा- सेठ जी! जहाँ इसके असंख्य गुण हैं वहाँ एक दोष भी है। अगर इसे काम न मिले तो मालिक को खाने दौड़ता है।* *सेठ ने विचार किया कि मेरे तो सैकड़ों व्यवसाय हैं, विलायत तक कारोबार है। यह भूत मर जाएगा पर काम खत्म न होगा। यह सोचकर उसने भूत खरीद लिया।* *भूत तो भूत ही था। उसने अपना चेहरा फैलाया बोला- काम! काम! काम! काम!* *सेठ भी तैयार ही था। तुरंत दस काम बता दिए। पर भूत उसकी सोच से कहीं अधिक तेज था। इधर मुंह से काम निकलता, उधर पूरा होता। अब सेठ घबरा गया।* *संयोग से एक संत वहाँ आए। सेठ ने विनयपूर्वक उन्हें भूत की पूरी कहानी बताई। संत ने हँस कर कहा- अब जरा भी चिंता मत करो। एक काम करो। उस भूत से कहो कि एक लम्बा बाँस लाकर, आपके आँगन में गाड़ दे। बस, जब काम हो तो काम करवा लो, और कोई काम न हो, तो उसे कहें कि वह बाँस पर चढ़ा और उतरा करे। तब आपके काम भी हो जाएँगे और आपको कोई परेशानी भी न रहेगी।* *सेठ ने ऐसा ही किया और सुख से रहने लगा।* *यह मन ही वह भूत है। यह सदा कुछ न कुछ करता रहता है। एक पल भी खाली बिठाना चाहो तो खाने को दौड़ता है। श्वास ही बाँस है। श्वास पर नामजप का अभ्यास ही, बाँस पर चढ़ना उतरना है।* *हम भी ऐसा ही करें। जब आवश्यकता हो, मन से काम ले लें। जब काम न रहे तो श्वास में नाम जपने लगो। तब आप भी सुख से रहने लगेंगे।*

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pawan rathor Jun 15, 2020

🌿🍀🍁🌿🍀🍁🌿🍀🍁 *हे! बांके बिहारी गिरधारी,हो प्यार तुम्हारे चरणों में,* *नटवर मधुसुदन, बनवारी हो प्यार तुम्हारे चरणों में।* *मैं जग से उब चुका मोहन,सब जग को परख चुका मोहन* *अब शरण तिहारी गिरधारी, हो प्यार तुम्हारे चरणों में।* *भाई,सुत,नार,कुटुम्बी जन,मैं मेरे के सब बंधन* *सब स्वार्थ के ये सब संसारी,हो प्यार तुम्हारे चरणों में।* *मैं सुख में रहूं चाहे दुख मैं रहूं,कांटों में रहूं या फूलों में रहूं,* *वन में ,घर में, जहां भी रहूं हो प्यार तुम्हारे चरणो में।* *नख कुंद कांति कस्तुरी सम, चर्चित चंदन अर्पित मम मन* *तेरे चरणों की बलिहारी,हो प्यार तुम्हारे चरणों में* *मन के मंदिर में आओ तुम,नस नस में श्याम समाओ तुम* *तुमरे है हम,हमरे हो तुम, हो प्यार तुम्हारे लिए चरणों में।* *इस जीवन के तुम जीवन हो,हे श्याम तुम्ही मेरे तन हो* *सुख शांति मूल तप चिंतन हो, हो प्यार तुम्हारे चरणों में* *हे! बांके बिहारी गिरधारी,हो प्यार तुम्हारे चरणों में,* *नटवर मधुसुदन बनवारी,हो प्यार तुम्हारे चरणों में* *जय श्री कृष्णा* *राधे-राधे* ⛲⛲⛲⛲⛲⛲⛲⛲⛲

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pawan rathor Jun 1, 2020

*🌹🌿सुंदर कथा.🌿🌹* कन्धे पर कपड़े का थान लादे और हाट-बाजार जाने की तैयारी करते हुए नामदेव जी से पत्नि ने कहा- भगत जी! आज घर में खाने को कुछ भी नहीं है। आटा, नमक, दाल, चावल, गुड़ और शक्कर सब खत्म हो गए हैं। शाम को बाजार से आते हुए घर के लिए राशन का सामान लेते आइएगा। भक्त नामदेव जी ने उत्तर दिया- देखता हूँ जैसी विठ्ठल जीकी क्रपा। अगर कोई अच्छा मूल्य मिला, तो निश्चय ही घर में आज धन-धान्य आ जायेगा। पत्नि बोली संत जी! अगर अच्छी कीमत ना भी मिले, तब भी इस बुने हुए थान को बेचकर कुछ राशन तो ले आना। घर के बड़े-बूढ़े तो भूख बर्दाश्त कर लेंगे। पर बच्चे अभी छोटे हैं, उनके लिए तो कुछ ले ही आना। जैसी मेरे विठ्ठल की इच्छा। ऐसा कहकर भक्त नामदेव जी हाट-बाजार को चले गए। बाजार में उन्हें किसी ने पुकारा- वाह सांई! कपड़ा तो बड़ा अच्छा बुना है और ठोक भी अच्छी लगाई है। तेरा परिवार बसता रहे। ये फकीर ठंड में कांप-कांप कर मर जाएगा। दया के घर में आ और रब के नाम पर दो चादरे का कपड़ा इस फकीर की झोली में डाल दे। भक्त नामदेव जी- दो चादरे में कितना कपड़ा लगेगा फकीर जी? फकीर ने जितना कपड़ा मांगा, इतेफाक से भक्त नामदेव जी के थान में कुल कपड़ा उतना ही था। और भक्त नामदेव जी ने पूरा थान उस फकीर को दान कर दिया। दान करने के बाद जब भक्त नामदेव जी घर लौटने लगे तो उनके सामने परिजनो के भूखे चेहरे नजर आने लगे। फिर पत्नि की कही बात, कि घर में खाने की सब सामग्री खत्म है। दाम कम भी मिले तो भी बच्चो के लिए तो कुछ ले ही आना। अब दाम तो क्या, थान भी दान जा चुका था। भक्त नामदेव जी एकांत मे पीपल की छाँव मे बैठ गए। जैसी मेरे विठ्ठल की इच्छा। जब सारी सृष्टि की सार पूर्ती वो खुद करता है, तो अब मेरे परिवार की सार भी वो ही करेगा। और फिर भक्त नामदेव जी अपने हरिविठ्ठल के भजन में लीन गए। अब भगवान कहां रुकने वाले थे। भक्त नामदेव जी ने सारे परिवार की जिम्मेवारी अब उनके सुपुर्द जो कर दी थी। अब भगवान जी ने भक्त जी की झोंपड़ी का दरवाजा खटखटाया। नामदेव जी की पत्नी ने पूछा- कौन है? नामदेव का घर यही है ना? भगवान जी ने पूछा। अंदर से आवाज हां जी यही आपको कुछ चाहिये भगवान सोचने लगे कि धन्य है नामदेव जी का परिवार घर मे कुछ भी नही है फिर ह्र्दय मे देने की सहायता की जिज्ञयासा हैl भगवान बोले दरवाजा खोलिये लेकिन आप कौन? भगवान जी ने कहा- सेवक की क्या पहचान होती है भगतानी? जैसे नामदेव जी विठ्ठल के सेवक, वैसे ही मैं नामदेव जी का सेवक हूl ये राशन का सामान रखवा लो। पत्नि ने दरवाजा पूरा खोल दिया। फिर इतना राशन घर में उतरना शुरू हुआ, कि घर के जीवों की घर में रहने की जगह ही कम पड़ गई। इतना सामान! नामदेव जी ने भेजा है? मुझे नहीं लगता। पत्नी ने पूछा। भगवान जी ने कहा- हाँ भगतानी! आज नामदेव का थान सच्ची सरकार ने खरीदा है। जो नामदेव का सामर्थ्य था उसने भुगता दिया। और अब जो मेरी सरकार का सामर्थ्य है वो चुकता कर रही है। जगह और बताओ। सब कुछ आने वाला है भगत जी के घर में। शाम ढलने लगी थी और रात का अंधेरा अपने पांव पसारने लगा था। समान रखवाते-रखवाते पत्नि थक चुकी थीं। बच्चे घर में अमीरी आते देख खुश थे। वो कभी बोरे से शक्कर निकाल कर खाते और कभी गुड़। कभी मेवे देख कर मन ललचाते और झोली भर-भर कर मेवे लेकर बैठ जाते। उनके बालमन अभी तक तृप्त नहीं हुए थे। भक्त नामदेव जी अभी तक घर नहीं आये थे, पर सामान आना लगातार जारी था। आखिर पत्नी ने हाथ जोड़ कर कहा- सेवक जी! अब बाकी का सामान संत जी के आने के बाद ही आप ले आना। हमें उन्हें ढूंढ़ने जाना है क्योंकी वो अभी तक घर नहीं आए हैं। भगवान जी बोले- वो तो गाँव के बाहर पीपल के नीचे बैठकर विठ्ठल सरकार का भजन-सिमरन कर रहे हैं। अब परिजन नामदेव जी को देखने गये सब परिवार वालों को सामने देखकर नामदेव जी सोचने लगे, जरूर ये भूख से बेहाल होकर मुझे ढूंढ़ रहे हैं। इससे पहले की संत नामदेव जी कुछ कहते उनकी पत्नी बोल पड़ीं- कुछ पैसे बचा लेने थे। अगर थान अच्छे भाव बिक गया था, तो सारा सामान संत जी आज ही खरीद कर घर भेजना था क्या? भक्त नामदेव जी कुछ पल के लिए विस्मित हुए। फिर बच्चों के खिलते चेहरे देखकर उन्हें एहसास हो गया, कि जरूर मेरे प्रभु ने कोई खेल कर दिया है। पत्नि ने कहा अच्छी सरकार को आपने थान बेचा और वो तो समान घर मे भैजने से रुकता ही नहीं था। पता नही कितने वर्षों तक का राशन दे गया। उससे मिन्नत कर के रुकवाया- बस कर! बाकी संत जी के आने के बाद उनसे पूछ कर कहीं रखवाएँगे। भक्त नामदेव जी हँसने लगे और बोले- ! *वो सरकार है ही ऐसी।* *जब देना शुरू करती है तो सब लेने वाले थक जाते हैं।* *उसकी बख्शीश कभी भी खत्म नहीं होती।* *वह सच्ची सरकार की तरह सदा कायम रहती है। *राधे राधे* 🌹🌿🌿🌹* *🌹🌿🙌🙌🌿🌹*

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pawan rathor Jun 1, 2020

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