Naresh Lodwal Sep 11, 2019

बेटी नाराज हो गयी पापा जाने लगे जब ऑफिस, बेटी जिद पर अड़ी रही, activa के लिए, वो भी आज papa ने मजबूरी दिखाई, पर बेटी माने तब न. बेटी ने जिद में आकर papa से बात करना बंद कर दी. पापा बेचारे क्या करे ? बहुत कोशिश की, papa ने, ऑफिस से बेटी को मनाने की,पर बेटी phone उठाये तब न. mood ख़राब हुआ पापा का छाती में दर्द होने लगा immediate गया boss के पास, urgent loan पास करवाया, showroom गया, बेटी की ख़ुशी के लिए, activa खरीद ली. बेटी को फिर फ़ोन किया ये बताने के लिए कि उसकी activa शाम को आ रही है पर बेटी अब भी नाराज मुंह फूलाये बैठी थी, जिदी थी papa से अब भी नाराज थी पापा शांत हो गए, chest pain बढ़ने लगा, बहुत प्यार करता था बेटी से बेटी ने phone नहीं उठाया, और दर्द बढ़ने लगा. activa तो पहुंच चुकी घर पर papa को attack आ गया, ऑफिस में ही. घर पर activa देखकर बहुत खुश हुई बेटी, हद से ज्यादा पर पापा नहीं दिखे पीछे पीछे कोई ambulance आ गयी, सब परेशान, कौन था उसमें Body बाहर निकाली गयी बेटी ने देखा, वो papa थे. ऑफिस staff ने बताया सुबह से बहुत परेशान थे activa के लिए, बेटी के लिए urgent loan पास करवाके activa तक book की घर पे बेटी को फ़ोन किया पर शायद बेटी नाराज थी इसलिए फ़ोन नहीं उठाया ये upset हो गए, बेटी से बहुत प्यार करते थे phone न उठाने के कारण उसे chest pain होने लगा, कुछ ही sec में वही लेट गए वही पर ढेर हो गए। सोचिये, उस वक़्त बेटी की क्या हालत हुई होगी जार जार रो रही थी माफ़ कर दो पापा, बहुत बड़ी गलती हो गयी मुझसे मुझे नहीं पता, पापा, आप इस बेटी को बहुत प्यार करते हो, माफ़ कर दो पापा. पर अब क्या हो सकता था ? ACtiva बाहर खड़ी थी PApa की dead body भी वहीं थी बेटी सिर्फ पछता सकती थी, अपनी ज़िद पर, पापा से नाराज होकर. काश, वो फ़ोन उठाती तो papa आज जिन्दा होते हर बच्चे चाहे वो बेटा हो या बेटी से request है कि dad की salary देखिये, घर की income देखिये, घर की ज़रूरतों को देखिये। आप जो डिमांड करते हो क्या आपके पापा कैपेबल हैं, नहीं तो थोड़ा सब्र कीजिये पापा कभी भी बच्चों की बातें ignore नहीं करते !!!!😭😂😭 🌹🌹🙏 अगर आपको ये पोस्ट सही लगी हो तो एक पल निकाल कर औरो तक जरूर पहुंचाइये . ..👏🏻 धन्यवाद मुझे पता है आप एक अच्छा काम करेगे (((🆚))))

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Naresh Lodwal Sep 9, 2019

🌷🌻🌷🌻🌷🌻🌷🌻🌷🌻 *अपने विचारों को आकार दें* हमारे विचार के बल से हमारा शरीर चल रहा है सुबह से शाम तक शरीर के अंदर भी और शरीर के बाहर भी सैंकड़ो क्रियाएँ चलती हैं मन ने विचार दिया उठो और शरीर ने अनुकरण किया । मन ने विचार दिया सोओ शरीर ने उसका भी अनुकरण किया। सारा जीवन ही विचारों से निर्मित है कईयों को विचार आता है कि अमुक ने मुझे आगे बढ़ने में, जीवन में कुछ कर दिखाने में सहयोग नहीं दिया परंतु इस दुनिया में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं कि जिन को बाहरी जगत में सब कुछ सुलभ था परंतु अन्तर्जगत अर्थात मन के विचार कमजोर होने के कारण सुलभ को भी दुर्लभ बना बैठे। *आज हमने जीवन में जो पाया वह सशक्त विचारों के बल से और जो खोया आशक्त विचारों के कारण। कोई व्यक्ति न हमें कुछ दे सकता है न कुछ हमसे छीन सकता है । हम अपने भाग्य के निर्माता स्वयं हैं।* जब विचार ही हमारे भाग्य निर्माता हैं तो वह कैसे होने चाहिए? यह हमें ही निर्धारित करना है हम जीवन की बाकी चीजों को आकार देने के बजाय क्यों ना सबसे पहले अपने विचारों को आकार दे इस सूक्ष्म कार्य को संपन्न करने वाला विषय है आध्यात्मिक ज्ञान..... *ॐ शांति* 😊🌹 🌷🌻🌷🌻🌷🌻🌷🌻🌷🌻

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Naresh Lodwal Sep 9, 2019

भक्त के अधीन भगवान🌹🌹 🙏 एक कसाई था सदना। वह बहुत ईमानदार था, वो भगवान के नाम कीर्तन में मस्त रहता था। यहां तक की मांस को काटते-बेचते हुए भी वह भगवद्नाम गुनगुनाता रहता था। एक दिन वह अपनी ही धुन में कहीं जा रहा था, कि उसके पैर से कोई पत्थर टकराया। वह रूक गया, उसने देखा एक काले रंग के गोल पत्थर से उसका पैर टकरा गया है। उसने वह पत्थर उठा लिया व जेब में रख लिया, यह सोच कर कि यह माँस तोलने के काम आयेगा। वापिस आकर उसने वह पत्थर माँस के वजन को तोलने के काम में लगाया। कुछ ही दिनों में उसने समझ लिया कि यह पत्थर कोई साधारण नहीं है। जितना वजन उसको तोलना होता, पत्थर उतने वजन का ही हो जाता है। धीरे-धीरे यह बात फैलने लगी कि सदना कसाई के पास वजन करने वाला पत्थर है, वह जितना चाहता है, पत्थर उतना ही तोल देता है। किसी को एक किलो मांस देना होता तो तराजू में उस पत्थर को एक तरफ डालने पर, दूसरी ओर एक किलो का मांस ही तुलता। अगर किसी को दो किलो चाहिए हो तो वह पत्थर दो किलो के भार जितना भारी हो जाता। इस चमत्कार के कारण उसके यहां लोगों की भीड़ जुटने लगी। भीड़ जुटने के साथ ही सदना की दुकान की बिक्री बढ़ गई। बात एक शुद्ध ब्राह्मण तक भी पहुंची। हालांकि वह ऐसी अशुद्ध जगह पर नहीं जाना चाहता थे, जहां मांस कटता हो व बिकता हो। किन्तु चमत्कारिक पत्थर को देखने की उत्सुकता उसे सदना की दुकान तक खींच लाई । दूर से खड़ा वह सदना कसाई को मीट तोलते देखने लगा। उसने देखा कि कैसे वह पत्थर हर प्रकार के वजन को बराबर तोल रहा था। ध्यान से देखने पर उसके शरीर के रोंए खड़े हो गए। भीड़ के छटने के बाद ब्राह्मण सदना कसाई के पास गया। ब्राह्मण को अपनी दुकान में आया देखकर सदना कसाई प्रसन्न भी हुआ और आश्चर्यचकित भी। बड़ी नम्रता से सदना ने ब्राह्मण को बैठने के लिए स्थान दिया और पूछा कि वह उनकी क्या सेवा कर सकता है! ब्राह्मण बोला- “तुम्हारे इस चमत्कारिक पत्थर को देखने के लिए ही मैं तुम्हारी दुकान पर आया हूँ, या युँ कहें कि ये चमत्कारी पत्थर ही मुझे खींच कर तुम्हारी दुकान पर ले आया है।" बातों ही बातों में उन्होंने सदना कसाई को बताया कि जिसे पत्थर समझ कर वो माँस तोल रहा है, वास्तव में वो शालीग्राम जी हैं, जोकि भगवान का स्वरूप होता है। शालीग्राम जी को इस तरह गले-कटे मांस के बीच में रखना व उनसे मांस तोलना बहुत बड़ा पाप है सदना बड़ी ही सरल प्रकृति का भक्त था। ब्राह्मण की बात सुनकर उसे लगा कि अनजाने में मैं तो बहुत पाप कर रहा हूं। अनुनय-विनय करके सदना ने वह शालिग्राम उन ब्राह्मण को दे दिया और कहा कि “आप तो ब्राह्मण हैं, अत: आप ही इनकी सेवा-परिचर्या करके इन्हें प्रसन्न करें।मेरे योग्य कुछ सेवा हो तो मुझे अवश्य बताएं।“ ब्राह्मण उस शालीग्राम शिला को बहुत सम्मान से घर ले आए। घर आकर उन्होंने श्रीशालीग्राम को स्नान करवाया, पँचामृत से अभिषेक किया व पूजा-अर्चना आरम्भ कर दी कुछ दिन ही बीते थे कि उन ब्राह्मण के स्वप्न में श्री शालीग्राम जी आए व कहा- *हे ब्राह्मण! मैं तुम्हारी सेवाओं से प्रसन्न हूं, किन्तु तुम मुझे उसी कसाई के पास छोड़ आओ स्वप्न में ही ब्राह्मण ने कारण पूछा तो उत्तर मिला कि- तुम मेरी अर्चना-पूजा करते हो, मुझे अच्छा लगता है, परन्तु जो भक्त मेरे नाम का गुणगान - कीर्तन करते रहते हैं, उनको मैं अपने-आप को भी बेच देता हूँ। सदना तुम्हारी तरह मेरा अर्चन नहीं करता है परन्तु वह हर समय मेरा नाम गुनगुनाता रहता है जोकि मुझे अच्छा लगता है, इसलिए तो मैं उसके पास गया था ब्राह्मण अगले दिन ही, सदना कसाई के पास गया व उनको प्रणाम करके, सारी बात बताई व श्रीशालीग्रामजी को उन्हें सौंप दिया ब्राह्मण की बात सुनकर सदना कसाई की आंखों में आँसू आ गए। मन ही मन उन्होंने माँस बेचने-खरीदने के कार्य को तिलांजली देने की सोची और निश्चय किया कि यदि मेरे ठाकुर को कीर्तन पसन्द है, तो मैं अधिक से अधिक समय नाम-कीर्तन ही करूंगा 🙏🙏🌹🌹 Joy Sri Krishna🌹🌹🙏🙏 दिल से प्रभु का नाम लीजिये, ॐ.....🙏🙏🙏

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Naresh Lodwal Sep 7, 2019

🙏💗 सरस्वती माता की जय💗🙏 एक नगर में एक दिन दो मृत्यु हो गई थी ! बड़ी दिलचस्प घटना हुई थी । एक योगी और एक वेश्या ---- दोनों एक ही दिन एक ही घडी में संसार से चल दिए थे । दोनों का आवास भी आमने-सामने ही । दोनों जीए भी साथ ही साथ और मरे भी साथ ही साथ । एक और गहरा आश्चर्य भी था। वह तो योगी और वेश्या को छोड़ और किसी को ज्ञात नहीं है। जैसे ही उनकी मृत्यु हुई, वैसे ही उन्हें ले जाने के लिए ऊपर से दूत आए, लेकिन वे दूत वेश्या को लेकर स्वर्ग की ओर चले और योगी को लेकर नर्क की ओर । योगी ने कहा: "मित्रो, निश्चय ही कुछ भूल हो गई है। वेश्या को स्वर्ग की और लिये जाते हो और मुझे नर्क की और? यह कैसा अन्याय है--यह कैसा अंधेर है?" उन दूतों ने कहा: "नहीं महानुभाव, न भूल है न अन्याय, न अंधेर! कृपाकर थोड़ा नीचे देखें। " योगी ने नीचे धरती की और देखा ! वहां उसके शरीर को फूलों से सजाया गया था और उसका विशाल जलूस निकाला जा रहा था! हजारों- हजारों लोग रामधुन गाते हुए, उसके शरीर को शमशान की और ले जा रहे थे! वहां उसके लिए चंदन की चिता तैयार थी, दूसरी तरफ सड़क के किनारे वेश्या की लाश पड़ी थी। उसे कोई उठाने वाला भी नहीं था, इसलिए गीध और कुत्ते उसे फाड़-फाड़कर खा रहे थे। यह देख वह योगी बोला: "धरती के लोग ही कहीं ज्यादा न्याय कर रहे है। " उन दूतों ने उत्तर दिया: "क्योंकि धरती के लोग केवल वही जानते है, जो बाहर था। शरीर से ज्यादा गहरी उनकी पहुंच नहीं ! असली सवाल तो शरीर का नहीं, मन का है। शरीर से तुम सन्यासी थे, किंतु मन में तुम्हारे क्या था? क्या सदा ही तुम्हारा मन वेश्या में अनुरक्त नहीं था? क्या सदा ही तुम्हारे मन में यह वासना नहीं जागती रही कि उधर वेश्या के घर में कैसा सुंदर संगीत और नृत्य चल रहा है, वहां बड़ा आनंद आता होगा और मेरा जीवन कैसा नीरस है। और उधर वह वेश्या, वह निरंतर ही सोचती थी कि योगी का जीवन कैसा आनंदपूर्ण है। रात्रि को जब तुम भजन गाते थे तो वह भाव-विभोर हो रोती थी। इधर सन्यासी के अहंकार से तुम भरते जा रहे थे, उधर पाप की पीड़ा से वह विनम्र होती जाती थी। तुम अपने तथा कथित ज्ञान के कारण कठोर होते गए और वह अपने अज्ञान- बोध के कारण सरल। अंतत तुम्हारा अहंकारग्रस्त व्यक्तित्व बचा और उसका अहंशून्य! मृत्यु के क्षण में तुम्हारे चित्त् में अहंकार था, वासना थी! उसके चित्त् में न अहंकार था, न वासना। उसका चित्त् तो परमात्मा के प्रकाश, प्रेम और प्रार्थना से परिपूर्ण था!" जीवन का सत्य बाह्य आचरण में नहीं है। फिर बाह्य के परिवर्तन से क्या होगा? सत्य है बहुत आंतरिक---आत्यंतिक रूप से आंतरिक। उसे जानने और पाने के लिए व्यक्तित्व की परिधि पर नहीं, केंद्र पर श्रम करना होता है! उस केंद्र को खोजो। खोजने से वह निश्चय ही मिलता है, क्योंकि वह स्वयं में ही तो छिपा है! धर्म परिधि का परिवर्तन नहीं, अंतस की क्रांति है !धर्म परिधि पर अभिनय नहीं, केंद्र पर श्रम है। धर्म श्रम है, स्वयं पर! उस श्रम से ही स्व मिटता और सत्य उपलब्ध होता है ! 🙏💗 सरस्वती माता की जय💗🙏

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Naresh Lodwal Sep 4, 2019

Short Story...दिल को छू लेने वाली #एक Postman ने एक घर के दरवाजे पर दस्तक देते हुए कहा,”चिट्ठी ले लीजिये।”अंदर से एक Ladki की आवाज आई,”आ रही हूँ।” लेकिन तीन-चार मिनट तक कोई न आया तो Postman ने फिर कहा,”अरे भाई!मकान में कोई है क्या,अपनी चिट्ठी ले लो।”लड़की की फिर आवाज आई,”Postman साहब,दरवाजे के नीचे से चिट्ठी अंदर डाल दीजिए,मैं आ रही हूँ।”Postman ने कहा,”नहीं, मैं खड़ा हूँ, रजिस्टर्ड चिट्ठी है, पावती पर तुम्हारे साइन चाहिये।” करीबन छह-सात मिनट बाद दरवाजा खुला। Postman इस देरी के लिए झल्लाया हुआ तो था ही और उस पर चिल्लाने वाला था ही, लेकिन दरवाजा खुलते ही वह चौंक गया, सामने एक अपाहिज कन्या जिसके पांव नहीं थे, सामने खड़ी थी। Postman चुपचाप पत्र देकर और उसके साइन लेकर चला गया। हफ़्ते, दो हफ़्ते में जब कभी उस लड़की के लिए डाक आती, एक आवाज देता और जब तक वह कन्या न आती तब तक खड़ा रहता। एक दिन उसने Postman को नंगे पाँव देखा। दीपावली नजदीक आ रही थी। उसने सोचा Postman को क्या ईनाम दूँ। एक दिन जब Postmanडाक देकर चला गया,तब उस लड़की ने,जहां मिट्टी में पोस्टमैन के पाँव के निशान बने थे, उन पर काग़ज़ रख कर उन पाँवों का चित्र उतार लिया। अगले दिन उसने अपने यहाँ काम करने वाली बाई से उस नाप के जूते मंगवा लिये। दीपावली आई और उसके अगले दिन Postman ने गली के सब लोगों से तो ईनाम माँगा और सोचा कि अब इस बिटिया से क्या इनाम लेना? पर गली में आया हूँ तो उससे मिल ही लूँ। उसने दरवाजा खटखटाया। अंदर से आवाज आई,”कौन?”पोस्टमैन, उत्तर मिला। लड़की हाथ में एक गिफ्ट पैक लेकर आई और कहा,”अंकल, मेरी तरफ से दीपावली पर आपको यह भेंट है।” Postman ने कहा,”तुम तो मेरे लिए बेटी के समान हो, तुमसे मैं गिफ्ट कैसे लूँ?” कन्या ने आग्रह किया कि मेरी इस गिफ्ट के लिए मना नहीं करें।”ठीक है कहते हुए Postman ने पैकेट ले लिया। बालिका ने कहा,”अंकल इस पैकेट को घर ले जाकर खोलना। घर जाकर जब उसने पैकेट खोला तो विस्मित रह गया, क्योंकि उसमें एक जोड़ी जूते थे।उसकी आँखें भर आई। अगले दिन वह ऑफिस पहुंचा और पोस्टमास्टर से फरियाद की कि उसका तबादला फ़ौरन कर दिया जाए। पोस्टमास्टर ने कारण पूछा,तो Postman ने वे जूते टेबल पर रखते हुए सारी कहानी सुनाई और भीगी आँखों और रुंधे कंठ से कहा,”आज के बाद मैं उस गली में नहीं जा सकूँगा। उस अपाहिज बच्ची ने तो मेरे नंगे पाँवों को तो जूते दे दिये पर मैं उसे पाँव कैसे दे पाऊँगा?” ” संवेदनशीलता यानि,दूसरों के दुःख-दर्द को समझना, अनुभव करना और उसके दुःख-दर्द में भागीदारी करना,उसमें शरीक होना। यह ऐसा मानवीय गुण है जिसके बिना इंसान अधूरा है। ईश्वर से प्रार्थना है कि वह हमें संवेदनशीलता रूपी आभूषण प्रदान करें ताकि हम दूसरों के दुःख-दर्द को कम करने में योगदान कर सकें।संकट की घड़ी में कोई यह नहीं समझे कि वह अकेला है, अपितु उसे महसूस हो कि सारी मानवता उसके साथ है।

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Naresh Lodwal Sep 4, 2019

पुण्यों का मोल। एक व्यापारी जितना अमीर था उतना ही दान-पुण्य करने वाला, वह सदैव यज्ञ-पूजा आदि कराता रहता था। एक यज्ञ में उसने अपना सबकुछ दान कर दिया। अब उसके पास परिवार चलाने लायक भी पैसे नहीं बचे थे। व्यापारी की पत्नी ने सुझाव दिया कि पड़ोस के नगर में एक बड़े सेठ रहते हैं। वह दूसरों के पुण्य खरीदते हैं। आप उनके पास जाइए और अपने कुछ पुण्य बेचकर थोड़े पैसे ले आइए, जिससे फिर से काम-धंधा शुरू हो सके। पुण्य बेचने की व्यापारी की बिलकुल इच्छा नहीं थी, लेकिन पत्नी के दबाव और बच्चों की चिंता में वह पुण्य बेचने को तैयार हुआ। पत्नी ने रास्ते में खाने के लिए चार रोटियां बनाकर दे दीं। व्यापारी चलता-चलता उस नगर के पास पहुंचा जहां पुण्य के खरीदार सेठ रहते थे। उसे भूख लगी थी। नगर में प्रवेश करने से पहले उसने सोचा भोजन कर लिया जाए। उसने जैसे ही रोटियां निकालीं एक कुतिया तुरंत के जन्मे अपने तीन बच्चों के साथ आ खड़ी हुई। कुतिया ने बच्चे जंगल में जन्म दिए थे। बारिश के दिन थे और बच्चे छोटे थे, इसलिए वह उन्हें छोड़कर नगर में नहीं जा सकती थी। व्यापारी को दया आ गई। उसने एक रोटी कुतिया को खाने के लिए दे दिया। कुतिया पलक झपकते रोटी चट कर गई लेकिन वह अब भी भूख से हांफ रही थी। व्यापारी ने दूसरी रोटी, फिर तीसरी और फिर चारो रोटियां कुतिया को खिला दीं। खुद केवल पानी पीकर सेठ के पास पहुंचा। व्यापारी ने सेठ से कहा कि वह अपना पुण्य बेचने आया है। सेठ व्यस्त था। उसने कहा कि शाम को आओ। दोपहर में सेठ भोजन के लिए घर गया और उसने अपनी पत्नी को बताया कि एक व्यापारी अपने पुण्य बेचने आया है। उसका कौन सा पुण्य खरीदूं। सेठ की पत्नी बहुत पतिव्रता और सिद्ध थी। उसने ध्यान लगाकर देख लिया कि आज व्यापारी ने कुतिया को रोटी खिलाई है। उसने अपने पति से कहा कि उसका आज का पुण्य खरीदना जो उसने एक जानवर को रोटी खिलाकर कमाया है। वह उसका अब तक का सर्वश्रेष्ठ पुण्य है। व्यापारी शाम को फिर अपना पुण्य बेचने आया। सेठ ने कहा- आज आपने जो यज्ञ किया है मैं उसका पुण्य लेना चाहता हूं। व्यापारी हंसने लगा। उसने कहा कि अगर मेरे पास यज्ञ के लिए पैसे होते तो क्या मैं आपके पास पुण्य बेचने आता! सेठ ने कहा कि आज आपने किसी भूखे जानवर को भोजन कराकर उसके और उसके बच्चों के प्राणों की रक्षा की है। मुझे वही पुण्य चाहिए। व्यापारी वह पुण्य बेचने को तैयार हुआ। सेठ ने कहा कि उस पुण्य के बदले वह व्यापारी को चार रोटियों के वजन के बराबर हीरे-मोती देगा। चार रोटियां बनाई गईं और उसे तराजू के एक पलड़े में रखा गया। दूसरे पलड़े में सेठ ने एक पोटली में भरकर हीरे-जवाहरात रखे। पलड़ा हिला तक नहीं। दूसरी पोटली मंगाई गई। फिर भी पलड़ा नहीं हिला। कई पोटलियों के रखने पर भी जब पलड़ा नहीं हिला तो व्यापारी ने कहा- सेठजी, मैंने विचार बदल दिया है. मैं अब पुण्य नहीं बेचना चाहता। व्यापारी खाली हाथ अपने घर की ओर चल पड़ा। उसे डर हुआ कि कहीं घर में घुसते ही पत्नी के साथ कलह न शुरू हो जाए। जहां उसने कुतिया को रोटियां डाली थी, वहां से कुछ कंकड़-पत्थर उठाए और साथ में रखकर गांठ बांध दी। घर पहुंचने पर पत्नी ने पूछा कि पुण्य बेचकर कितने पैसे मिले तो उसने थैली दिखाई और कहा इसे भोजन के बाद रात को ही खोलेंगे। इसके बाद गांव में कुछ उधार मांगने चला गया। इधर उसकी पत्नी ने जबसे थैली देखी थी उसे सब्र नहीं हो रहा था। पति के जाते ही उसने थैली खोली। उसकी आंखे फटी रह गईं। थैली हीरे-जवाहरातों से भरी थी। व्यापारी घर लौटा तो उसकी पत्नी ने पूछा कि पुण्यों का इतना अच्छा मोल किसने दिया ? इतने हीरे-जवाहरात कहां से आए ?? व्यापारी को अंदेशा हुआ कि पत्नी सारा भेद जानकर ताने तो नहीं मार रही लेकिन, उसके चेहरे की चमक से ऐसा लग नहीं रहा था। व्यापारी ने कहा- दिखाओ कहां हैं हीरे-जवाहरात। पत्नी ने लाकर पोटली उसके सामने उलट दी। उसमें से बेशकीमती रत्न गिरे। व्यापारी हैरान रह गया। फिर उसने पत्नी को सारी बात बता दी। पत्नी को पछतावा हुआ कि उसने अपने पति को विपत्ति में पुण्य बेचने को विवश किया। दोनों ने तय किया कि वह इसमें से कुछ अंश निकालकर व्यापार शुरू करेंगे। व्यापार से प्राप्त धन को इसमें मिलाकर जनकल्याण में लगा देंगे। ईश्वर आपकी परीक्षा लेता है। परीक्षा में वह सबसे ज्यादा आपके उसी गुण को परखता है जिस पर आपको गर्व हो। अगर आप परीक्षा में खरे उतर जाते हैं तो ईश्वर वह गुण आपमें हमेशा के लिए वरदान स्वरूप दे देते हैं। अगर परीक्षा में उतीर्ण न हुए तो ईश्वर उस गुण के लिए योग्य किसी अन्य व्यक्ति की तलाश में लग जाते हैं। इसलिए विपत्तिकाल में भी भगवान पर भरोसा रखकर सही राह चलनी चाहिए। आपके कंकड़-पत्थर भी अनमोल रत्न हो सकते हैं। जय श्री राम....🙏😊

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Naresh Lodwal Sep 3, 2019

. "#भोला #किसान" एक बार एक किसान जंगल में लकड़ी बिनने गया तो उसने एक अद्भुत बात देखी। एक लोमड़ी के दो पैर नहीं थे, फिर भी वह खुशी-खुशी घसीट कर चल रही थी। यह कैसे जीवित रहती है जबकि किसी शिकार को भी नहीं पकड़ सकती, किसान ने सोचा। तभी उसने देखा कि एक शेर अपने दांतो में एक शिकार दबाए उसी तरफ आ रहा है। सभी जानवर भागने लगे, वह किसान भी पेड़ पर चढ़ गया। उसने देखा कि शेर, उस लोमड़ी के पास आया। उसे खाने की जगह, प्यार से शिकार का थोड़ा हिस्सा डालकर चला गया। दूसरे दिन भी उसने देखा कि शेर बड़े प्यार से लोमड़ी को खाना देकर चला गया। किसान ने इस अद्भुत लीला के लिए भगवान का मन में नमन किया। उसे अहसास हो गया कि भगवान जिसे पैदा करते है उसकी रोटी का भी इंतजाम कर देते हैं। यह जानकर वह भी एक निर्जन स्थान चला गया और वहां पर चुपचाप बैठ कर भोजन का रास्ता देखता। कई दिन व्यतीत हो गए, कोई नहीं आया। वह मरणासन्न होकर वापस लौटने लगा, तभी उसे एक विद्वान महात्मा मिले। उन्होंने उसे भोजन पानी कराया, तो वह किसान उनके चरणों में गिरकर वह लोमड़ी की बात बताते हुए बोला, महाराज, भगवान ने उस अपंग लोमड़ी पर दया दिखाई पर मैं तो मरते-मरते बचा; ऐसा क्यों हुआ कि भगवान् मुझ पर इतने निर्दयी हो गए ? महात्मा उस किसान के सिर पर हाथ फिराकर मुस्कुराकर बोले, तुम इतने नासमझ हो गए कि तुमने भगवान का इशारा भी नहीं समझा इसीलिए तुम्हें इस तरह की मुसीबत उठानी पड़ी। तुम ये क्यों नहीं समझे कि भगवान् तुम्हे उस शेर की तरह मदद करने वाला बनते देखना चाहते थे, निरीह लोमड़ी की तरह नहीं। हमारे जीवन में भी ऐसा कई बार होता है कि हमें चीजें जिस तरह समझनी चाहिए उसके विपरीत समझ लेते हैं। ईश्वर ने हम सभी के अंदर कुछ न कुछ ऐसी शक्तियाँ दी हैं जो हमें महान बना सकती हैं। चुनाव हमें करना है, शेर बनना है या लोमड़ी। #मेरे #प्यारे #बाँके,, #तेरी ही #अदालत में,#तेरी ही #शिकायत #करने #गए थे, , #उफ़्फ़......,, #तेरा #पर्दा #क्या #हटा कि #सारा #मामला #रफ़ा-दफ़ा हो #गया #Զเधे_Զเधे

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Naresh Lodwal Sep 2, 2019

Ram Ram ji,(((( निरन्तर भगवन् चिन्तन )))) . एक महात्मा थे। जीवन भर उन्होंने भजन ही किया था। . उनकी कुटिया के सामने एक तालाब था। जब उनका शरीर छूटने का समय आया तो देखा कि एक बगुला मछली मार रहा है। . उन्होंने उस बगुले को उड़ा दिया। इधर उनका शरीर छूटा तो नरक गये। . उनके चेले को स्वप्न में दिखायी पड़ा; वे कह रहे थे, बेटा ! हमने जीवन भर कोई पाप नहीं किया, केवल बगुला उड़ा देने मात्र से नरक जाना पड़ा। तुम सावधान रहना। . जब शिष्य का भी शरीर छूटने का समय आया तो वही दृश्य पुनः आया। . बगुला मछली पकड़ रहा था। गुरु का निर्देश मानकर उसने बगुले को नहीं उड़ाया। . मरने पर वह भी नरक जाने लगा तो गुरुभाई को आकाशवाणी मिली कि गुरुजी ने बगुला उड़ाया था इसलिए नरक गये। . हमने नहीं उड़ाया इसलिए नरक में जा रहे हैं। तुम बचना......! . गुरुभाई का शरीर छूटने का समय आया तो संयोग से पुनः बगुला मछली मारता दिखाई पड़ा। . गुरुभाई ने भगवान् को प्रणाम किया कि . भगवन्.! आप ही मछली में हो और आप ही बगुले में भी। हमें नहीं मालूम कि क्या झूठ है.? क्या सच है.? . कौन पाप है, कौन पुण्य.? आप अपनी व्यवस्था देखें। मुझे तो आपके चिन्तन की डोरी से प्रयोजन है। . वह शरीर छूटने पर प्रभु के धाम गया। . नारद जी ने भगवान से पूछा, भगवन् ! अन्ततः वे नरक क्यों गये ? महात्मा जी ने बगुला उड़ाकर कोई पाप तो नहीं किया ? . उन्होंने बताया, नारद ! उस दिन बगुले का भोजन वही था। उन्होंने उसे उड़ा दिया। भूख से छटपटाकर बगुला मर गया अतः पाप हुआ, इसलिए नरक गये। . नारद ने पूछा, दूसरे ने तो नहीं उड़ाया, वह क्यों नरक गया ? . बोले, उस दिन बगुले का पेट भरा था। वह विनोदवश मछली पकड़ रहा था, उसे उड़ा देना चाहिए था। शिष्य से भूल हुई, इसी पाप से वह नरक गया। . नारद ने पूछा, और तीसरा ? . भगवान् ने कहा, तीसरा अपने भजन में लगा रह गया, सारी जिम्मेदारी हमारे ऊपर सौंप दी। . जैसी होनी थी, वह हुई; किन्तु मुझसे सम्बन्ध जोड़े रह जाने के कारण, मेरे ही चिन्तन के प्रभाव से वह मेरे धाम को प्राप्त हुआ।। . अतः पाप-पुण्य की चिन्ता में समय को न गँवाकर जो निरन्तर चिन्तन में लगा रहता है, वह पा जाता है। . जितने समय हमारा मन भगवान् के नाम, रुप, लीला, गुण, धाम और उनके संतों में रहता है केवल उतने समय ही हम पापमुक्त रहते हैं। . भगवान् कृष्ण कहते हैं.. . यज्ञार्थात्कर्मणोsन्यत्र लोकोsयं कर्मबन्धन:' . यज्ञ के अतिरिक्त जो कुछ भी किया जाता है वह इसी लोक में बाँधकर रखने वाला है, जिसमें खाना-पीना सभी कुछ आ जाता है। . पाप, पुण्य दोनों बन्धनकारी हैं, इन दोनों को छोड़कर जो भक्ति वाला कर्म है अर्थात् मन को निरंतर भगवान् में रखें तो पाप, पुण्य दोनों भगवान् को अर्पित हो जाएंगे। . भगवान् केवल मन की क्रिया ही नोट करेंगे, इसका मन तो मुझ में था, इसने कुछ किया ही नहीं। यह भक्ति ही भव बंधन काटने वाली है ~~~~~~~~~~~~~~~~~ ((((((( जय जय श्री राधे ))))))) ~~~~~~~~~~~~~~~~~

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