Malkhan Singh Apr 18, 2019

बहुत ही सुंदर प्रकरण, जो रामचरितमानस से ली गयी है प्रार्थना है सोने से पहले एक बार अंत तक जरूर पढ़ें भावार्थ सहित कितना सुंदर वर्णन है...🙏🙏🙏 ******************************************* विद्वान व विद्यावान में अन्तर!!!!! विद्यावान गुनी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर ॥ एक होता है विद्वान और एक विद्यावान । दोनों में आपस में बहुत अन्तर है । इसे हम ऐसे समझ सकते हैं, रावण विद्वान है और हनुमान जी विद्यावान हैं । रावण के दस सिर हैं । चार वेद और छह: शास्त्र दोनों मिलाकर दस हैं । इन्हीं को दस सिर कहा गया है । जिसके सिर में ये दसों भरे हों, वही दस शीश हैं । रावण वास्तव में विद्वान है । लेकिन विडम्बना क्या है ? सीता जी का हरण करके ले आया। कईं बार विद्वान लोग अपनी विद्वता के कारण दूसरों को शान्ति से नहीं रहने देते। उनका अभिमान दूसरों की सीता रुपी शान्ति का हरण कर लेता है और हनुमान जी उन्हीं खोई हुई सीता रुपी शान्ति को वापिस भगवान से मिला देते हैं । यही विद्वान और विद्यावान में अन्तर है । हनुमान जी गये, रावण को समझाने । यही विद्वान और विद्यावान का मिलन है । हनुमान जी ने कहा — विनती करउँ जोरि कर रावन । सुनहु मान तजि मोर सिखावन ॥ हनुमान जी ने हाथ जोड़कर कहा कि मैं विनती करता हूँ, तो क्या हनुमान जी में बल नहीं है ? नहीं, ऐसी बात नहीं है। विनती दोनों करते हैं, जो भय से भरा हो या भाव से भरा हो । रावण ने कहा कि तुम क्या, यहाँ देखो कितने लोग हाथ जोड़कर मेरे सामने खड़े हैं । कर जोरे सुर दिसिप विनीता । भृकुटी विलोकत सकल सभीता ॥ रावण के दरबार में देवता और दिग्पाल भय से हाथ जोड़े खड़े हैं और भृकुटी की ओर देख रहे हैं । परन्तु हनुमान जी भय से हाथ जोड़कर नहीं खड़े हैं । रावण ने कहा भी — कीधौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही । देखउँ अति असंक सठ तोही ॥ रावण ने कहा – “तुमने मेरे बारे में सुना नहीं है ? तू बहुत निडर दिखता है !” हनुमान जी बोले – “क्या यह जरुरी है कि तुम्हारे सामने जो आये, वह डरता हुआ आये ?” रावण बोला – “देख लो, यहाँ जितने देवता और अन्य खड़े हैं, वे सब डरकर ही खड़े हैं ।” हनुमान जी बोले – “उनके डर का कारण है, वे तुम्हारी भृकुटी की ओर देख रहे हैं ।” भृकुटी विलोकत सकल सभीता । परन्तु मैं भगवान राम की भृकुटी की ओर देखता हूँ । उनकी भृकुटी कैसी है ? बोले — भृकुटी विलास सृष्टि लय होई । सपनेहु संकट परै कि सोई ॥ जिनकी भृकुटी टेढ़ी हो जाये तो प्रलय हो जाए और उनकी ओर देखने वाले पर स्वप्न में भी संकट नहीं आए । मैं उन श्रीराम जी की भृकुटी की ओर देखता हूँ । रावण बोला – “यह विचित्र बात है । जब राम जी की भृकुटी की ओर देखते हो तो हाथ हमारे आगे क्यों जोड़ रहे हो ? विनती करउँ जोरि कर रावन । हनुमान जी बोले – “यह तुम्हारा भ्रम है । हाथ तो मैं उन्हीं को जोड़ रहा हूँ ।” रावण बोला – “वह यहाँ कहाँ हैं ?” हनुमान जी ने कहा कि “यही समझाने आया हूँ। मेरे प्रभु राम जी ने कहा था — सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमन्त । मैं सेवक सचराचर रुप स्वामी भगवन्त ॥ भगवान ने कहा है कि सबमें मुझको देखना । इसीलिए मैं तुम्हें नहीं, तुझमें भी भगवान को ही देख रहा हूँ ।” इसलिए हनुमान जी कहते हैं — खायउँ फल प्रभु लागी भूखा । और सबके देह परम प्रिय स्वामी ॥ हनुमान जी रावण को प्रभु और स्वामी कहते हैं और रावण — मृत्यु निकट आई खल तोही । लागेसि अधम सिखावन मोही ॥ रावण खल और अधम कहकर हनुमान जी को सम्बोधित करता है । यही विद्यावान का लक्षण है कि अपने को गाली देने वाले में भी जिसे भगवान दिखाई दे, वही विद्यावान है । विद्यावान का लक्षण है — विद्या ददाति विनयं । विनयाति याति पात्रताम् ॥ पढ़ लिखकर जो विनम्र हो जाये, वह विद्यावान और जो पढ़ लिखकर अकड़ जाये, वह विद्वान । तुलसी दास जी कहते हैं — बरसहिं जलद भूमि नियराये । जथा नवहिं वुध विद्या पाये ॥ जैसे बादल जल से भरने पर नीचे आ जाते हैं, वैसे विचारवान व्यक्ति विद्या पाकर विनम्र हो जाते हैं । इसी प्रकार हनुमान जी हैं – विनम्र और रावण है – विद्वान । यहाँ प्रश्न उठता है कि विद्वान कौन है ? इसके उत्तर में कहा गया है कि जिसकी दिमागी क्षमता तो बढ़ गयी, परन्तु दिल खराब हो, हृदय में अभिमान हो, वही विद्वान है और अब प्रश्न है कि विद्यावान कौन है ? उत्तर में कहा गया है कि जिसके हृदय में भगवान हो और जो दूसरों के हृदय में भी भगवान को बिठाने की बात करे, वही विद्यावान है । हनुमान जी ने कहा – “रावण ! और तो ठीक है, पर तुम्हारा दिल ठीक नहीं है । कैसे ठीक होगा ? कहा कि — राम चरन पंकज उर धरहू । लंका अचल राज तुम करहू ॥ अपने हृदय में राम जी को बिठा लो और फिर मजे से लंका में राज करो । यहाँ हनुमान जी रावण के हृदय में भगवान को बिठाने की बात करते हैं, इसलिए वे विद्यावान हैं । सीख : विद्यावान बनने का प्रयत्न करें । सत्यम् परम् धीमहि 🌹जय श्री राम🙏🏻जय हनुमानजी🌹

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Malkhan Singh Apr 16, 2019

🌻जय श्री राम जानकी जी🙏जय बजरंग बली की🌻 🌹🌺🌺🌹 माता सीता के जीवन के बारे में कुछ अनसुने सत्य 👏👏👏👏 माता सीता के बारे में तो हम सभी जानते हैं। माता सीता रामायण का मुख्य पात्र हैं। सीता मिथिला के राजा जनक की ज्येष्ठ पुत्री थी। उनका विवाह श्री राम से हुआ था। माता सीता एक आदर्श नारी थी। वह एक अच्छी पुत्री आदर्श पत्नी तथा उच्च चरित्र वाली महिला थी। माता सीता को देवी लक्ष्मी का रूप माना जाता है। उनके बारे में कुछ ऐसे सत्य हैं जिन्हें ज्यादातर लोग नही जानते हैं। आज हम ऐसे ही कुछ तथ्यों पर नजर डालेंगे। 1 रामचरित मानस में सीता माता का जिक्र कुल 147 बार हुआ है। 2 रामचरित मानस में सीता के स्वयंवर का उल्लेख है लेकिन वाल्मीकि रामायण में उनके स्वयंवर के बारे में नही बताया गया है। 3 वाल्मीकि रामायण के अनुसार माता सीता का विवाह बाल्यवस्था में ही हो गया था। उनके विवाह के समय उनकी आयु केवल 6 साल थी। 4 वाल्मीकि रामायण के अनुसार माता सीता विवाह के 12 साल बाद श्री राम के साथ अयोध्या में रहीं। 5 18 वर्ष की उम्र में माता सीता श्री राम के साथ वनवास चली गयी थी। 6 विवाह के पश्चात् माता सीता कभी अपने मायके जनकपुर नही गयी। वनवास जाने से पहले पिता जनक ने देवी सीता को जनकपुर ले जाने का प्रस्ताव रखा परन्तु देवी सीता ने मना कर दिया। 7 तुलसीदास ने लिखा है कि मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को श्री राम और सीता माता का विवाह हुआ था। लेकिन रामायण में ऐसा कुछ नही बताया गया है। 8 वाल्मीकि रामायण के अनुसार सीता का हरण रावण ने अपने रथ में किया था। वह दिव्य रथ सोने का बना हुआ था। लेकिन तुलसीदास ने लिखा है कि रावण सीता माता के हरण के पश्चात उन्हें अपने पुष्पक विमान से लंका ले गया था। 9 रावण जब सीता माता का हरण कर के उन्हें लंका ले गया तो उसके बाद देवी सीता को 435 दिन लंका में रहना पड़ा था। 10 वाल्मीकि रामायण के अनुसार सीता के हरण के पश्चात देव इंद्र ने ऐसी खीर बनाकर माता सीता को खिलाई कि जब तक सीता माता को लंका में रहना पड़ा उन्हें भूखप्यास ही नही लगी। लेकिन तुलसीदास ने इस बारे में कोई वर्णन नही किया है। 11 रावण के पास देवी सीता नही बल्कि उनकी प्रतिछाया थी। जब तक माता सीता लंका में रही तब तक उनका असली रूप अग्नि देव के पास रहा। 12 माता सीता जब लंका से लोटी उनकी आयु 33 वर्ष थी। 13 लंका से लौटकर 33 वर्ष की आयु में देवी सीता को महारानी का पद मिला। 14 वाल्मीकि रामायण में ऐसा उल्लेख किया गया है कि जब देवी सीता ने लव और कुश को वाल्मीकि आश्रम में जन्म दिया उस समय उनके सबसे छोटे देवर शत्रुघ्न उसी आश्रम में मौजूद थे। 15श्री राम ने जल समाधि लेकर दे ह का त्याग किया था जबकि माता सीता सशरीर ही परलोक चली गयी थी। 🚩🚩🚩🙏राम राम जी🙏🚩🚩🚩

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