Malkhan Singh UP Aug 13, 2019

*卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐* *ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ* 🙏🏻🌼🙏🏻🌼🙏🏻🌼🙏🏻🌼🙏🏻🌼 👣👣👣👣👣👣👣👣👣👣 *👣🙏🏻🌼जय सीता राम 🌼🙏🏻👣* 👣👣👣👣👣👣👣👣👣👣 *सीताराम सीताराम सीताराम कहिये* *जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये * *मुख में हो राम नाम राम सेवा हाथ में * *तू अकेला नाहिं प्यारे राम तेरे साथ में * *विधि का विधान जान हानि लाभ सहिये * *किया अभिमान तो फिर मान नहीं पायेगा * *होगा प्यारे वही जो श्री रामजी को भायेगा * *फल आशा त्याग शुभ कर्म करते रहिये * *ज़िन्दगी की डोर सौंप हाथ दीनानाथ के * *महलों मे राखे चाहे झोंपड़ी मे वास दे * *धन्यवाद निर्विवाद राम राम कहिये * *आशा एक रामजी से दूजी आशा छोड़ दे * *नाता एक रामजी से दूजे नाते तोड़ दे * *साधु संग राम रंग अंग अंग रंगिये * *काम रस त्याग प्यारे राम रस पगिये * *सीता राम सीता राम सीताराम कहिये * *जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये * 👣👣👣👣👣👣👣👣👣👣 *👣🙏🏻🌼जय सीता राम 🌼🙏🏻👣* 👣👣👣👣👣👣👣👣👣👣

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Malkhan Singh UP Aug 12, 2019

*🕉️ऊँ नमः शिवाय 🙏हर हर महादेव🕉️* *🚩अति दुर्लभ मृतसंजीवनी महामृत्युंजय मंत्र 🚩* यह जो मंत्र है यह मूल रूपेण मंत्रराज है जीवन में रोग द्वेष व्यधि पीड़ा कष्ट शत्रु भय व काल सभी कुछ इसके समक्ष शून्य है या कभी जीवन में ऐसा भी समय आता है जब कोई रास्ता न दिखाई दे जीवन अंधकारमय लगने लगे तब इस मंत्र का जाप व अनुष्ठान खुद करे या आचार्य से करवा ले । एवमारध्य गौरीशं देवं मृत्युञ्जयमेश्वरं । मृतसञ्जीवनं नाम्ना कवचं प्रजपेत् सदा ॥१॥ गौरीपति मृत्युञ्जयेश्र्वर भगवान् शंकर की विधिपूर्वक आराधना करने के पश्र्चात भक्त को सदा मृतसञ्जीवन नामक कवचका सुस्पष्ट पाठ करना चाहिये ॥१॥ सारात् सारतरं पुण्यं गुह्याद्गुह्यतरं शुभं । महादेवस्य कवचं मृतसञ्जीवनामकं ॥ २॥ महादेव भगवान् शंकर का यह मृतसञ्जीवन नामक कवच का तत्त्व का भी तत्त्व है पुण्यप्रद है गुह्य और मङ्गल प्रदान करने वाला है ॥२॥ समाहितमना भूत्वा शृणुष्व कवचं शुभं । शृत्वैतद्दिव्य कवचं रहस्यं कुरु सर्वदा ॥३॥ आचार्य शिष्यको उपदेश करते हैं कि – हे वत्स अपने मनको एकाग्र करके इस मृतसञ्जीवन कवच को सुनो । यह परम कल्याणकारी दिव्य कवच है । इसकी गोपनीयता सदा बनाये रखना ॥३॥ वराभयकरो यज्वा सर्वदेवनिषेवितः । मृत्युञ्जयो महादेवः प्राच्यां मां पातु सर्वदा ॥४॥ जरा से अभय करने वाले निरन्तर यज्ञ करने वाले सभी देवत ओं से आराधित हे मृत्युञ्जय महादेव आप पर्वदिशा में मेरी सदा रक्षा करें ॥४॥ दधाअनः शक्तिमभयां त्रिमुखं षड्भुजः प्रभुः ।सदाशिवोऽग्निरूपी मामाग्नेय्यां पातु सर्वदा ॥५॥ अभय प्रदान करने वाली शक्ति को धारण करने वाले तीन मुखों वाले तथा छ भुजओं वाले अग्रिरूपी प्रभु सदाशिव अग्रिकोण में मेरी सदा रक्षा करें ॥५॥ अष्टदसभुजोपेतो दण्डाभयकरो विभुः । यमरूपि महादेवो दक्षिणस्यां सदावतु ॥६॥ अट्ठारह भुजाओं से युक्त हाथ में दण्ड और अभयमुद्रा धारण करने वाले सर्वत्र व्याप्त यमरुपी महादेव शिव दक्षिणदिशा में मेरी सदा रक्षा करें ॥६॥ खड्गाभयकरो धीरो रक्षोगणनिषेवितः । रक्षोरूपी महेशो मां नैरृत्यां सर्वदावतु ॥७॥ हाथ में खड्ग और अभय मुद्रा धारण करने वाले धैर्यशाली दैत्यगणों से आराधित रक्षो रुपी महेश नैर्ऋत्यकोण में मेरी सदा रक्षा करें ॥७॥ पाशाभयभुजः सर्वरत्नाकरनिषेवितः । वरुणात्मा महादेवः पश्चिमे मां सदावतु ॥८॥ हाथ में अभय मुद्रा और पाश धाराण करने वाले शभी रत्नाकरों से सेवित वरुण स्वरूप महादेव भगवान् शंकर पश्चिम दिशा में मेरी सदा रक्षा करें ॥८॥ गदाभयकरः प्राणनायकः सर्वदागतिः । वायव्यां मारुतात्मा मां शङ्करः पातु सर्वदा ॥९॥ हाथों में गदा और अभय मुद्रा धारण करने वाले प्राणोके रक्षक सर्वदा गतिशील वायुस्वरूप शंकरजी वायव्य कोण में मेरी सदा रक्षा करें ॥९॥ शङ्खाभयकरस्थो मां नायकः परमेश्वरः । सर्वात्मान्तरदिग्भागे पातु मां शङ्करः प्रभुः ॥१०॥ हाथों में शंख और अभय मुद्रा धारण करने वाले नायक सर्वमार्गद्रष्टा सर्वात्मा सर्वव्यापक परमेश्वर भगवान् शिव समस्त दिशाओं के मध्य में मेरी रक्षा करें ॥१०॥ शूलाभयकरः सर्वविद्यानमधिनायकः । ईशानात्मा तथैशान्यां पातु मां परमेश्वरः ॥११॥ हाथों में शंख और अभयमुद्रा धारण करनेवाले सभी विद्याओंके स्वामी ईशानस्वरूप भगवान् परमेश्व शिव ईशानकोणमें मेरी रक्षा करें ॥११॥ ऊर्ध्वभागे ब्रःमरूपी विश्वात्माऽधः सदावतु । शिरो मे शङ्करः पातु ललाटं चन्द्रशेखरः॥१२॥ ब्रह्मरूपी शिव मेरी ऊर्ध्वभाग में तथा विश्वात्मस्वरूप शिव अधोभाग में मेरी सदा रक्षा करें । शंकर मेरे सिर की और चन्द्रशेखर मेरे ललाट की रक्षा करें ॥१२॥ भूमध्यं सर्वलोकेशस्त्रिणेत्रो लोचनेऽवतु । भ्रूयुग्मं गिरिशः पातु कर्णौ पातु महेश्वरः ॥१३॥ मेरे भौंहों के मध्यमें सर्वलो केश और दोनों नेत्रों की त्रिनेत्र भगवान् शंकर रक्षा करें दोनों भौंहों की रक्षा गिरिश एवं दोनों कानों को रक्षा भगवान् महेश्वर करें ॥१३॥ नासिकां मे महादेव ओष्ठौ पातु वृषध्वजः । जिह्वां मे दक्षिणामूर्तिर्दन्तान्मे गिरिशोऽवतु ॥१४॥ महादेव मेरी नासीका की तथा वृषभ ध्वज मेरे दोनों ओठों की सदा रक्षा करें । दक्षिणा मूर्ति मेरी जिह्वा की तथा गिरिश मेरे दाँतों की रक्षा करें ॥१४॥ मृतुय्ञ्जयो मुखं पातु कण्ठं मे नागभूषणः । पिनाकि मत्करौ पातु त्रिशूलि हृदयं मम ॥१५॥ मृत्युञ्जय मेरे मुख की एवं नाग भूषण भगवान् शिव मेरे कण्ठ की रक्षा करें । पिनाकी मेरे दोनों हाथों की तथा त्रिशूली मेरे हृदय की रक्षा करें ॥१५॥ पञ्चवक्त्रः स्तनौ पातु उदरं जगदीश्वरः । नाभिं पातु विरूपाक्षः पार्श्वौ मे पार्वतीपतिः ॥१६॥ पञ्चवक्त्र मेरे दोनों स्तनो की और जगदीश्वर मेरे उदर की रक्षा करें । विरूपाक्ष नाभि की और पार्वती पति पार्श्वभाग की रक्षा करें ॥१६॥ कटद्वयं गिरीशौ मे पृष्ठं मे प्रमथाधिपः । गुह्यं महेश्वरः पातु ममोरू पातु भैरवः ॥१७॥ गिरीश मेरे दोनों कटिभाग की तथा प्रमथाधिप पृष्टभाग की रक्षा करें । महेश ्वर मेरे गुह्यभाग की और भैरव मेरे दोनों ऊरुओं की रक्षा करें ॥१७॥ जानुनी मे जगद्दर्ता जङ्घे मे जगदम्बिका । पादौ मे सततं पातु लोकवन्द्यः सदाशिवः ॥१८॥ जगद्धर्ता मेरे दोनों घुटनों की जगदम्बिका मेरे दोनों जंघो की तथा लोकवन्दनीय सदाशिव निरन्तर मेरे दोनों पैरों की रक्षा करें ॥१८॥ गिरिशः पातु मे भार्यां भवः पातु सुतान्मम । मृत्युञ्जयो ममायुष्यं चित्तं मे गणनायकः ॥१९॥ गिरीश मेरी भार्या की रक्षा करें तथा भव मेरे पुत्रों की रक्षा करें । मृत्युञ्जय मेरे आयु की गणनायक मेरे चित्त की रक्षा करें ॥१९॥ सर्वाङ्गं मे सदा पातु कालकालः सदाशिवः । एतत्ते कवचं पुण्यं देवतानां च दुर्लभम् ॥२०॥ कालों के काल सदाशिव मेरे सभी अंगो की रक्षा करें । हे वत्स देवताओं के लिये भी दुर्लभ इस पवित्र कवच का वर्णन मैंने तुमसे किया है ॥२०॥ मृतसञ्जीवनं नाम्ना महादेवेन कीर्तितम् । सह्स्रावर्तनं चास्य पुरश्चरणमीरितम् ॥२१॥ महादेवजी ने मृतसञ्जीवन नामक इस कवच को कहा है । इस कवच की सहस्त्र आवृत्ति को पुरश्चरण कहा गया है ॥२१॥ यः पठेच्छृणुयान्नित्यं श्रावयेत्सु समाहितः । सकालमृत्युं निर्जित्य सदायुष्यं समश्नुते ॥२२॥ जो अपने मन को एकाग्र करके नित्य इसका पाठ करता है सुनता अथावा दूसरों को सुनाता है वह अकाल मृत्यु को जीतकर पूर्ण आयु का उपयोग करता है ॥ २२॥ हस्तेन वा यदा स्पृष्ट्वा मृतं सञ्जीवयत्यसौ । आधयोव्याध्यस्तस्य न भवन्ति कदाचन ॥२३॥ जो व्यक्ति अपने हाथ से मरणासन्न व्यक्ति के शरीर का स्पर्श करते हुए इस मृतसञ्जीवन कवच का पाठ करता है उस आसन्नमृत्यु प्राणी के भीतर चेतनता आ जाती है । फिर उसे कभी आधिव्याधि नहीं होतीं ॥२३॥ कालमृयुमपि प्राप्तमसौ जयति सर्वदा । अणिमादिगुणैश्वर्यं लभते मानवोत्तमः ॥२४॥ यह मृतसञ्जीवन कवच काल के गाल में गये हुए व्यक्ति को भी जीवन प्रदान कर ‍देता है और वह मानवोत्तम अणिमा आदि गुणों से युक्त ऐश्वर्य को प्राप्त करता है ॥२४॥ युद्दारम्भे पठित्वेदमष्टाविशतिवारकं । युद्दमध्ये स्थितः शत्रुः सद्यः सर्वैर्न दृश्यते ॥२५॥ युद्ध आरम्भ होने के पूर्व जो इस मृतसञ्जीवन कवच का २८ बार पाठ करके रणभूमि में उपस्थित होता है वह उस समय सभी शत्रुऔं से अदृश्य रहता है ॥२५॥ न ब्रह्मादीनि चास्त्राणि क्षयं कुर्वन्ति तस्य वै । विजयं लभते देवयुद्दमध्येऽपि सर्वदा ॥२६॥ यदि देवतऔं के भी साथ युद्ध छिड जाय तो उसमें उसका विनाश ब्रह्मास्त्र भी नही कर सकते वह विजय प्राप्त करता है ॥२६॥ प्रातरूत्थाय सततं यः पठेत्कवचं शुभं । अक्षय्यं लभते सौख्यमिह लोके परत्र च ॥२७॥ जो प्रातकाल उठकर इस कल्याणकारी कवच सदा पाठ करता है उसे इस लोक तथा परलोक में भी अक्षय्य सुख प्राप्त होता है ॥२७॥ सर्वव्याधिविनिर्मृक्तः सर्वरोगविवर्जितः । अजरामरणो भूत्वा सदा षोडशवार्षिकः ॥२८॥ वह सम्पूर्ण व्याधियों से मुक्त हो जाता है सब प्रकार के रोग उसके शरीर से भाग जाते हैं । वह अजरअमर होकर सदा के लिये सोलह वर्षवाला व्यक्ति बन जाता है ॥२८॥ विचरव्यखिलान् लोकान् प्राप्य भोगांश्च दुर्लभान् । तस्मादिदं महागोप्यं कवचम् समुदाहृतम् ॥२९॥ इस लोक में दुर्लभ भोगों को प्राप्त कर सम्पूर्ण लोकों में विचरण करता रहता है । इसलिये इस महा गोपनीय कवच को मृतसञ्जीवन नाम से कहा है ॥२९॥ मृतसञ्जीवनं नाम्ना देवतैरपि दुर्लभम् ॥३०॥ यह देवतओं के लिय भी दुर्लभ है ॥३०॥ ॥ इति वसिष्ठ कृत मृतसञ्जीवन स्तोत्रम् ॥ पोस्ट सिद्ध साधक साधना 🌹जय गुरुदेव 🌹

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Malkhan Singh UP Aug 10, 2019

*🌹जय श्री राम🙏जय हनुमान🙏हर हर महादेव🌹* *राम नाम में शिव बसे,शिव में बसे श्री राम ।* *राम कहो या शिव कहो,मिलता दिल को आराम।।* पार्वती शिवजी से बोली, हे, नीलकंठ योगेश्वर, तुम किसकी पूजा करते हो, कौन है वो परमेश्वर, हर हर महादेव हर हर महादेव, हर हर महादेव हर हर महादेव, शिवजी बोले श्रष्टि कर्ता, जगत पति सर्वेश्वर, निशदिन जिनका ध्यान धरूँ मैं, वो है मेरे रामेश्वर, हर हर महादेव हर हर महादेव, हर हर महादेव हर हर महादेव।। गौरी बोली वही राम क्या, दशरथ पुत्र अयोध्या वासी, चौदह बरस रहे जो बन में, लोग कहे जिनको वनवासी, शिवजी बोले सत्य कहा है, वही राम है दशरथ नंदन, ऋषि मुनि सब देवी देवता, कहते है उनको दुःख भंजन। निराकार साकार हुए है, वो मेरे परमेश्वर, निशदिन जिनका ध्यान धरूँ मैं, वो है मेरे रामेश्वर, हर हर महादेव हर हर महादेव, हर हर महादेव हर हर महादेव।। बोली सती ये भेद है गहरा, सकल जगत के प्राण अधारा, किस हेतु फिर लखन सिया संग, श्री राम वनवास सिधारे, सुनो उमा अब ध्यान लगा के, वो थी सारी राम की माया, रावण के संहार की खातिर, जगत पति ने खेल रचाया। सदा सर्वदा पूज रहे है, वो मेरे हृदयेश्वर, निशदिन जिनका ध्यान धरूँ मै, वो है मेरे रामेश्वर, हर हर महादेव हर हर महादेव, हर हर महादेव हर हर महादेव।। कहा उमा ने जान गई मैं, श्री राम है कर्ता कारण, मन की दुविधा दूर हुई है, शंका का अब हुआ निवारण, है पति परमेश्वर मेरे, परम सत्य है आपकी पूजा, सारा भरम मिटा इस मन का, आप राम का रूप है दूजा। ब्रम्हा विष्णु स्वयं आप है, सर्व रूप महेश्वर, धन्य भई मैं पाकर तुमको, हे मेरे परमेश्वर, हर हर महादेव हर हर महादेव, हर हर महादेव हर हर महादेव।। पारवती शिवजी से बोली, नीलकंठ योगेश्वर, तुम किसकी पूजा करते हो, कौन है वो परमेश्वर, हर हर महादेव हर हर महादेव, हर हर महादेव हर हर महादेव, शिवजी बोले श्रष्टि कर्ता, जगत पति सर्वेश्वर, निशदिन जिनका ध्यान धरूँ मैं, वो है मेरे रामेश्वर, हर हर महादेव हर हर महादेव, हर हर महादेव हर हर महादेव।। 🙏💘 जय भोले भंडारी की💘🙏* *#🔱हर हर महादेव,⚜️⚜️* *🙏🕉️जय श्री राम🕉️🙏*

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Malkhan Singh UP Aug 1, 2019

**❇️जय श्री विष्णुहरि जी🙏जय श्री महाकाल की❇️* *मायमन्दिर ग्रुप के सभी सम्मानित मित्रों, भाईयों एवं बहनों को मेरा सादर नमन👏। अनुरोध करना है कि तीन दिन से मेरा स्वास्थ्य खराब है, चिकित्सक के अनुसार स्वस्थ होने मे कुछ समय लग सकता है। अतः तबतक ऐप से अनुपस्थित रहेंगे...। अबतक के आप सभी के सम्मान एवं प्यार के लिए हृदय से बहुत बहुत अभार.....👏👏। **************************** *महफि़ल थी दुआओं की, *तो मैंने भी एक दुआ माँग ली... *खुश रहे सदा मेरे ग्रुप के साथी, *श्री हरि जी से कृपा माँग ली... *जय श्री राधेश्याम👏 *🌸🙏राम राम सा🙏🌸* ************************* *॥ हरि ॐ॥*जय श्री हरि जी II* *श्री कृष्ण गोविँद हरे मुरारे* *हे नाथ नारायण वासुदेव* *॥जय श्री राम॥*राधे राधे जीII* *आप सभी का हर दिन हर पलशुभ हो* *🌹🙏राम राम सा🙏🌹* ****************************

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Malkhan Singh UP Jul 29, 2019

चातुर्मास विशेष 〰️〰️🌼〰️〰️हर हर महादेव🙏राम राम जी------🌸 चातुर्मास में वर्ष के चार महीने आते हैं सावन, भादों, क्वार, कार्तिक। (श्रावण, भाद्र,अश्विन, कार्तिक-मास) एक दण्डी तथा त्रिदंडी सभी के लिए ही चातुर्मास व्रत करणीय है अर्थात एक दंडी -ज्ञानीगण तथा त्रिदंडी भक्त गण दोनों ही चातुर्मास व्रत का पालन करते हैं। श्री शंकर मठ के अनुयायियों में भी चातुर्मास व्रत की व्यवस्था है। मनुष्य एक हजार अश्वमेध यज्ञ करके मनुष्य जिस फल को पाता है, वही चातुर्मास्य व्रत (11 जुलाई से 7 नवंबर 2019) के अनुष्ठान से प्राप्त कर लेता है। आषाढ़ के शुक्ल पक्ष में एकादशी के दिन 12 जुलाई अथवा गुरुपूर्णिमा 16 जुलाई का उपवास करके मनुष्य भक्तिपूर्वक चातुर्मास्य व्रत प्रारंभ करे। इन चार महीनों में ब्रह्मचर्य का पालन, त्याग, पत्तल पर भोजन, उपवास, मौन, जप, ध्यान, स्नान, दान, पुण्य आदि विशेष लाभप्रद होते हैं। व्रतों में सबसे उत्तम व्रत है – ब्रह्मचर्य का पालन। विशेषतः चतुर्मास में यह व्रत संसार में अधिक गुणकारक है। जो चतुर्मास में अपने प्रिय भोगों का श्रद्धा एवं प्रयत्नपूर्वक त्याग करता है, उसकी त्यागी हुई वे वस्तुएँ उसे अक्षय रूप में प्राप्त होती हैं। चतुर्मास में गुड़ का त्याग करने से मनुष्य को मधुरता की प्राप्ति होती है। ताम्बूल का त्याग करने से मनुष्य भोग-सामग्री से सम्पन्न होता है और उसका कंठ सुरीला होता है। दही छोड़ने वाले मनुष्य को गोलोक मिलता है। नमक छोड़ने वाले के सभी पूर्तकर्म (परोपकार एवं धर्म सम्बन्धी कार्य) सफल होते हैं। जो मौनव्रत धारण करता है उसकी आज्ञा का कोई उल्लंघन नहीं करता। चतुर्मास में काले एवं नीले रंग के वस्त्र त्याग देने चाहिए। कुसुम्भ (लाल) रंग व केसर का भी त्याग कर देना चाहिए। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी 12 जुलाई को श्रीहरि के योगनिद्रा में प्रवृत्त हो जाने पर मनुष्य चार मास अर्थात् कार्तिक की पूर्णिमा 12 नवंबर तक भूमि पर शयन करे। ऐसा करने वाला मनुष्य बहुत से धन से युक्त होता और विमान प्राप्त करता है। जो भगवान जनार्दन के शयन करने पर शहद का सेवन करता है, उसे महान पाप लगता है। चतुर्मास में अनार, नींबू, नारियल तथा मिर्च, उड़द और चने का भी त्याग करे। चातुर्मास्य में परनिंदा का विशेष रूप से त्याग करे। परनिंदा को सुनने वाला भी पापी होता है। चतुर्मास में ताँबे के पात्र में भोजन विशेष रूप से त्याज्य है। काँसे के बर्तनों का त्याग करके मनुष्य अन्यान्य धातुओं के पात्रों का उपयोग करे। अगर कोई धातुपात्रों का भी त्याग करके पलाशपत्र, मदारपत्र या वटपत्र की पत्तल में भोजन करे तो इसका अनुपम फल बताया गया है। अन्य किसी प्रकार का पात्र न मिलने पर मिट्टी का पात्र ही उत्तम है अथवा स्वयं ही पलाश के पत्ते लाकर उनकी पत्तल बनाये और उससे भोजन-पात्र का कार्य ले। पलाश के पत्तों से बनी पत्तल में किया गया भोजन चान्द्रायण व्रत एवं एकादशी व्रत के समान पुण्य प्रदान करने वाला माना गया है। प्रतिदिन एक समय भोजन करने वाला पुरुष अग्निष्टोम यज्ञ के फल का भागी होता है। पंचगव्य सेवन करने वाले मनुष्य को चान्द्रायण व्रत का फल मिलता है। यदि धीर पुरुष चतुर्मास में नित्य परिमित अन्न का भोजन करता है तो उसके सब पातकों का नाश हो जाता है और वह वैकुण्ठ धाम को पाता है। चतुर्मास में केवल एक ही अन्न का भोजन करने वाला मनुष्य रोगी नहीं होता। जो मनुष्य चतुर्मास में केवल दूध पीकर अथवा फल खाकर रहता है, उसके सहस्रों पाप तत्काल विलीन हो जाते हैं। जो चतुर्मास में भगवान विष्णु के आगे खड़ा होकर 'पुरुष सूक्त' का पाठ करता है, उसकी बुद्धि बढ़ती है)। कैसा भी दबू विद्यार्थी हो बुद्धिमान बनेगा | चतुर्मास सब गुणों से युक्त समय है। इसमें धर्मयुक्त श्रद्धा से शुभ कर्मों का अनुष्ठान करना चाहिए। देवशयनी एकादशी जुलाई से देवउठनी एकादशी तक उक्त धर्मों का साधन एवं नियम महान फल देने वाला है। चतुर्मास में भगवान नारायण योगनिद्रा में शयन करते हैं, इसलिए चार मास शादी-विवाह और सकाम यज्ञ नहीं होते। ये मास तपस्या करने के हैं। चतुर्मास में योगाभ्यास करने वाला मनुष्य ब्रह्मपद को प्राप्त होता है। 'नमो नारायणाय' का जप करने से सौ गुने फल की प्राप्ति होती है। यदि मनुष्य चतुर्मास में भक्तिपूर्वक योग के अभ्यास में तत्पर न हुआ तो निःसंदेह उसके हाथ से अमृत का कलश गिर गया। जो मनुष्य नियम, व्रत अथवा जप के बिना चौमासा बिताता है वह मूर्ख है। चतुर्मास में विशेष रूप से जल की शुद्धि होती है। उस समय तीर्थ और नदी आदि में स्नान करने का विशेष महत्त्व है। नदियों के संगम में स्नान के पश्चात् पितरों एवं देवताओं का तर्पण करके जप, होम आदि करने से अनंत फल की प्राप्ति होती है। जो मनुष्य जल में तिल और आँवले का मिश्रण अथवा बिल्वपत्र डालकर ॐ नमः शिवाय का चार-पाँच बार जप करके उस जल से स्नान करता है, उसे नित्य महान पुण्य प्राप्त होता है। चतुर्मास में अन्न, जल, गौ का दान, प्रतिदिन वेदपाठ और हवन – ये सब महान फल देने वाले हैं। सद्धर्म, सत्कथा, सत्पुरुषों की सेवा, संतों के दर्शन, भगवान विष्णु का पूजन आदि सत्कर्मों में संलग्न रहना और दान में अनुराग होना – ये सब बातें चतुर्मास में दुर्लभ बतायी गयी हैं। चतुर्मास में दूध, दही, घी एवं मट्ठे का दान महाफल देने वाला होता है। जो चतुर्मास में भगवान की प्रीति के लिए विद्या, गौ व भूमि का दान करता है, वह अपने पूर्वजों का उद्धार कर देता है। विशेषतः चतुर्मास में अग्नि में आहूति, भगवद् भक्त एवं पवित्र ब्राह्मणों को दान और गौओं की भलीभाँति सेवा, पूजा करनी चाहिए। चतुर्मास में जो स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय और देवपूजन किया जाता है, वह सब अक्षय हो जाता है। जो एक अथवा दोनों समय पुराण सुनता है, वह पापों से मुक्त होकर भगवान विष्णु के धाम को जाता है। जो भगवान के शयन करने पर विशेषतः उनके नाम का कीर्तन और जप करता है, उसे कोटि गुना फल मिलता है। (पद्म पुराण के उत्तर खंड, स्कंद पुराण के ब्राह्म खंड एवं नागर खंड उत्तरार्ध से संकलित) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ जय श्री राम🌸🌸🌸 #🙏 धर्म-कर्म 🙏 ❇️🌿🙏हर हर महादेव जी🙏🌿❇️

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Malkhan Singh UP Jul 28, 2019

🏵️ जय श्री हरि जी🙏कामिका एकादशी व्रत कथा 🏵️ 🌞ऊँ सूर्यदेवाय नमः🙏ऊँ नमः शिवाय🌞 👉युधिष्ठिर ने पूछा: गोविन्द ! वासुदेव ! आपको मेरा नमस्कार है ! श्रावण (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार आषाढ़) के कृष्णपक्ष में कौन सी एकादशी होती है ? कृपया उसका वर्णन कीजिये । भगवान श्रीकृष्ण बोले: राजन् ! सुनो । मैं तुम्हें एक पापनाशक उपाख्यान सुनाता हूँ, जिसे पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने नारदजी के पूछने पर कहा था । नारदजी ने प्रश्न किया: हे भगवन् ! हे कमलासन ! मैं आपसे यह सुनना चाहता हूँ कि श्रवण के कृष्णपक्ष में जो एकादशी होती है, उसका क्या नाम है? उसके देवता कौन हैं तथा उससे कौन सा पुण्य होता है? प्रभो ! यह सब बताइये । ब्रह्माजी ने कहा: नारद ! सुनो । मैं सम्पूर्ण लोकों के हित की इच्छा से तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दे रहा हूँ । श्रावण मास में जो कृष्णपक्ष की एकादशी होती है, उसका नाम ‘कामिका’ है । उसके स्मरणमात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है । उस दिन श्रीधर, हरि, विष्णु, माधव और मधुसूदन आदि नामों से भगवान का पूजन करना चाहिए । भगवान श्रीकृष्ण के पूजन से जो फल मिलता है, वह गंगा, काशी, नैमिषारण्य तथा पुष्कर क्षेत्र में भी सुलभ नहीं है । सिंह राशि के बृहस्पति होने पर तथा व्यतीपात और दण्डयोग में गोदावरी स्नान से जिस फल की प्राप्ति होती है, वही फल भगवान श्रीकृष्ण के पूजन से भी मिलता है । जो समुद्र और वनसहित समूची पृथ्वी का दान करता है तथा जो ‘कामिका एकादशी’ का व्रत करता है, वे दोनों समान फल के भागी माने गये हैं । जो ब्यायी हुई गाय को अन्यान्य सामग्रियों सहित दान करता है, उस मनुष्य को जिस फल की प्राप्ति होती है, वही ‘कामिका एकादशी’ का व्रत करनेवाले को मिलता है । जो नरश्रेष्ठ श्रावण मास में भगवान श्रीधर का पूजन करता है, उसके द्वारा गन्धर्वों और नागों सहित सम्पूर्ण देवताओं की पूजा हो जाती है । अत: पापभीरु मनुष्यों को यथाशक्ति पूरा प्रयत्न करके ‘कामिका एकादशी’ के दिन श्रीहरि का पूजन करना चाहिए । जो पापरुपी पंक से भरे हुए संसार समुद्र में डूब रहे हैं, उनका उद्धार करने के लिए ‘कामिका एकादशी’ का व्रत सबसे उत्तम है । अध्यात्म विधापरायण पुरुषों को जिस फल की प्राप्ति होती है, उससे बहुत अधिक फल ‘कामिका एकादशी’ व्रत का सेवन करनेवालों को मिलता है । ‘कामिका एकादशी’ का व्रत करनेवाला मनुष्य रात्रि में जागरण करके न तो कभी भयंकर यमदूत का दर्शन करता है और न कभी दुर्गति में ही पड़ता है । लालमणि, मोती, वैदूर्य और मूँगे आदि से पूजित होकर भी भगवान विष्णु वैसे संतुष्ट नहीं होते, जैसे तुलसीदल से पूजित होने पर होते हैं । जिसने तुलसी की मंजरियों से श्रीकेशव का पूजन कर लिया है, उसके जन्मभर का पाप निश्चय ही नष्ट हो जाता है । या दृष्टा निखिलाघसंघशमनी स्पृष्टा वपुष्पावनी रोगाणामभिवन्दिता निरसनी सिक्तान्तकत्रासिनी । प्रत्यासत्तिविधायिनी भगवत: कृष्णस्य संरोपिता न्यस्ता तच्चरणे विमुक्तिफलदा तस्यै तुलस्यै नम: ॥ ‘जो दर्शन करने पर सारे पापसमुदाय का नाश कर देती है, स्पर्श करने पर शरीर को पवित्र बनाती है, प्रणाम करने पर रोगों का निवारण करती है, जल से सींचने पर यमराज को भी भय पहुँचाती है, आरोपित करने पर भगवान श्रीकृष्ण के समीप ले जाती है और भगवान के चरणों मे चढ़ाने पर मोक्षरुपी फल प्रदान करती है, उस तुलसी देवी को नमस्कार है ।’ जो मनुष्य एकादशी को दिन रात दीपदान करता है, उसके पुण्य की संख्या चित्रगुप्त भी नहीं जानते । एकादशी के दिन भगवान श्रीकृष्ण के सम्मुख जिसका दीपक जलता है, उसके पितर स्वर्गलोक में स्थित होकर अमृतपान से तृप्त होते हैं । घी या तिल के तेल से भगवान के सामने दीपक जलाकर मनुष्य देह त्याग के पश्चात् करोड़ो दीपकों से पूजित हो स्वर्गलोक में जाता है ।’ भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: युधिष्ठिर ! यह तुम्हारे सामने मैंने ‘कामिका एकादशी’ की महिमा का वर्णन किया है । ‘कामिका’ सब पातकों को हरनेवाली है, अत: मानवों को इसका व्रत अवश्य करना चाहिए । यह स्वर्गलोक तथा महान पुण्यफल प्रदान करनेवाली है । जो मनुष्य श्रद्धा के साथ इसका माहात्म्य श्रवण करता है, वह सब पापों से मुक्त हो श्रीविष्णुलोक में जाता है । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । 🏵️ प्रेम से बोलिये जय जय श्री राधे 🏵️

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Malkhan Singh UP Jul 27, 2019

योग और आस्था का चमत्कार, वीडियो जरूर देखें.. 👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇 भारत मे तमिलनाडु व कर्नाटक की सीमा पर स्थित तमिलनाडु के प्रमुख औद्योगिक शहर में एक लड़के ने बिना किसी सपोर्ट के योग के बल पर काफी ऊँचाई तक हवा में उड़कर /तैरकर दिखाया, इससे वैज्ञानिक भी अचरज में पड़ गए हैं । जैसे ये बात पुस्तकों में पढ़ने को मिली थी कि योग के बल पर स्वामी राम कृष्ण परमहंस नदी के जल की सतह पर सीधे चलते हुए नदी पार कर लेते थे, योगक्रिया के बल पर शरीर के सम्पूर्ण भार को ऊपर ही रोक लेते थे और जलस्तर पर शरीर के भार का कोई प्रभाव नहीं आने पाता था, इस योगक्रिया के अङ्ग्रेज भी कायल हो गए थे । आज कुछ इसी प्रकार की अद्भुत घटना कोयम्बटूर में घटी, जिसका सैकडों लोगों ने वीडियो बनाया, इस योगक्रिया के रहस्य को वैज्ञानिक समझ पाने में अभी तक असमर्थ हैं। 🌷🌿🙏जय श्री राम🙏हर हर महादेव🙏🌿🌷

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