🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 हिंदू कैलेंडर 2021 के अनुसार, वैशाख महीने में शुक्ल पक्ष के तीसरे दिन अक्षय तृतीया का त्यौहार मनाया जाता है। *👉अक्षय तृतीया का महत्व क्या है ?* यह दिन फसल कटाई के मौसम के लिए खेती का पहला दिन माना जाता है। यह दिन जैन लोगों के लिए भी बहुत महत्व रखता है क्योंकि वे अक्षय तृतीया के दिन गन्ने के रस का सेवन करके अपनी साल भर की तपस्या समाप्त करते हैं। इस विशेष दिन पर, व्यवसायी अपने नए साल की वित्तीय लेखा पुस्तक प्रारम्भ करते हैं। संपत्ति खरीदना, नए उद्यम शुरू करना और शादियों की योजना बनाना और अन्य सभी शुभ कार्य अक्षय तृतीया के दिन किए जाते हैं। सोने और चांदी के गहने खरीदना अक्षय तृतीया की मुख्य परंपरा है क्योंकि यह बहुतायत और सौभाग्य का प्रतीक है। यह भी माना जाता है कि अक्षय तृतीया का दिन काफी महत्व रखता है क्योंकि यह परशुराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है, भगवान विष्णु का एक अवतार है, जो क्षत्रियों के अत्याचार को समाप्त करने और न्याय स्थापित करने के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुए थे। *👉अक्षय तृतीया के अनुष्ठान क्या हैं?* अक्षय तृतीया के दिन, भक्त उपासना करते हैं और व्रत का पालन करते हैं और अन्य आवश्यक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। व्यक्ति जरूरतमंदों को कपड़े, घी, चावल, फल, नमक और सब्जियों का दान करते हैं। पूजा स्थल में, भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए, तुलसी जल छिड़का जाता है। यह दिन व्यवसायियों के लिए अत्यधिक शुभ माना जाता है और इसलिए वे आराधना करते हैं तथा देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा करते हैं और धन और प्रचुरता के लिए उनका आशीर्वाद मांगते हैं। पवित्र जल में पवित्र स्नान और पवित्र अग्नि में जौ अर्पित करना अक्षय तृतीया के महत्वपूर्ण अनुष्ठान हैं। भक्त पवित्र मंत्रों का भी जप करते हैं, ध्यान करते हैं और आध्यात्मिक गतिविधियाँ करते हैं ताकि भगवान विष्णु के दिव्य आशीर्वाद को पा सकें और सौभाग्य प्राप्त कर सकें। 🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃 *अक्षय तृतीया की शुभकामनाएं*

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एक बैंक डकैती के दौरान डाकुओ ने कहा :" सभी अपने हाथों को ऊपर कर लोक्योंकि यह पैसा देश का है पर जान आपकी अपनी है",....... यह है ब्रेन वाश करना..... डकैती के दौरान एक महिला बदहवास सी हो गयी तो डाकू बोला.." सभ्यता का परिचय दो, यह केवल डकैती है कोई बलात्कार नहीं" यह है प्रोफेशनल होना....... 20 लाख रुपए लूट कर जब घर गए तो छोटा वाला डाकू बोला...आओ पैसे गिनते है,तो बड़े वाले ने कहा : " कल न्यूज़ में आ जायेगी गिनने की क्या ज़रुरत"..... यह है अनुभव....... लुटने के बाद बैंक मेनेजर ने खजांची को बुलाया और कहा :" रुक पुलिस बुलाने से पहले 10 लाख निकाल के मेरे साले को देदे"..... यह है बहती गंगा में हाथ साफ़ करना....... खजांची बोला : ओके... एक करोड़ चोरी हुए है ऐसा रिपोर्ट में लिखवाता हूँ ताकि अपने पिछले 70 लाख डूबे हुए भी कवर हो जायेंगे..... यह है मौके पे चौका........ अगले दिन न्यूज़ में आया " सिटी बैंक में 1 करोड़ की डकेती"..... डाकूओ ने बार बार गिने लेकिन 20 लाख ही निकले... डाकू बोले हमने जान पर खेल कर सिर्फ 20 लाख कमाए लेकिन मैनेजर ने एक झटके में 80 लाख..... इसे कहते है "ज्ञान सोने से ज्यादा मूल्यवान है".............

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राधे - राधे -आज का भगवद् चिंतन 12- 05- 2021 🌞जीवन में सब कुछ एक निवेश की तरह ही होता है। प्रेम,समय, साथ, खुशी, सम्मान और अपमान, जितना - जितना हम दूसरों को देते जायेंगे, समय आने पर एक दिन वह व्याज सहित हमें अवश्य वापस मिलने वाला है। 🌞कभी दुख के क्षणों में अपने को अलग - थलग पाओ तो एक बार आत्मनिरीक्षण अवश्य कर लेना कि क्या जब मेरे अपनों को अथवा समाज को मेरी जरूरत थी तो मैं उन्हें अपना समय दे पाया था..? क्या किसी के दुख में मैं कभी सहभागी बन पाया था..? आपको अपने प्रति दूसरों के उदासीन व्यवहार का कारण स्वयं स्पष्ट हो जायेगा। 🌞कभी जीवन में अकेलापन महसूस होने लगे और आपको अपने आसपास कोई दिखाई न दे जिससे मन की दो चार बात करके मन को हल्का किया जा सके तो आपको एक बार पुनः आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता है। क्या आपकी उपस्थिति कभी किसी के अकेलेपन को दूर करने का कारण बन पाई थी अथवा नहीं...? आपको अपने एकाकी जीवन का कारण स्वयं समझ आ जायेगा। 🌞श्रीमदभागवत जी की कथा में हम लोग गाते है कि देवी द्रौपदी ने वासुदेव श्रीकृष्ण को एक बार एक छोटे से चीर का दान किया था और समय आने व आवश्यकता पड़ने पर विधि द्वारा वही चीर देवी द्रौपदी को साड़ियों के भंडार के रूप में लौटाया गया। 🌞अच्छा - बुरा, मान - अपमान, समय - साथ, और सुख - दुख जो कुछ भी आपके द्वारा बाँटा जायेगा, देर से सही मगर एक दिन आपको दोगुना होकर मिलेगा जरूर, ये तय है।

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*श्री गुरुचरण कमलेभ्यो नमः* *अक्षय्य तृतिया 2021 14~5~2021 (धर्मपुरी क्षेत्र) "श्री लक्ष्मी नृसिंह मंत्र जप अनुष्ठान्"* विनियोग:- अस्य श्री नृसिंव्ह मंत्रस्य अत्रि ऋषिः गायत्री छन्द श्री नृसिंव्हो देवता आत्मनो अभिष्ट सिद्ध्यर्थे जपे विनियोग करन्यासः ह्रीं क्ष्रां ह्रीं अंगुष्ठाभ्यां नमः ह्रीं क्ष्रीं ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः ह्रीं क्ष्रुं ह्रीं मध्यमाभ्यां नमः ह्रीं क्ष्रैं ह्रीं अनामिकाभ्यां नमः ह्रीं क्ष्रों ह्रीं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ह्रीं क्ष्रः ह्रीं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः अंगन्यास:- ह्रीं क्ष्रां ह्रीं ह्रदयाय नमः ह्रीं क्ष्रीं ह्रीं शिरसे स्वाहा ह्रीं क्ष्रुं ह्रीं शिखायै वषट् ह्रीं क्ष्रैं ह्रीं कवचाय हुँ ह्रीं क्ष्रों ह्रीं नेत्रत्रयाय वौषट् ह्रीं क्ष्रः ह्रीं अस्त्राय फट् ध्यान :- तपन सोम हुताशन लोचनं घन विराम हिमांशु समप्रभम् अभय चक्र पिनाक वराकरैर्दधतं मिन्दूधरं नृहरिं भजे।। मंत्र :- *" ह्रीं क्ष्रौं ह्रीं "* ( _एक लाख जप, दशांश हवन, घृत व खीर से_) भवदीय, उदयदत्त जोशी, श्री निखिल चेतना केन्द्र # 4౼8౼438, गौलीगुडा श्रीराम मंदिर के पीछे, हैदराबाद 500012, मोबाईल 9440782655 🌐🌐🌐🌐🌐🌐🌐🌐

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राधे - राधे -आज का भगवद् चिंतन 07- 05- 2021 🌞पुष्टि मार्ग का अर्थ उस प्रेम प्रधान भक्ति मार्ग से है, जहाँ भक्ति की प्राप्ति भगवान के विशेष अनुग्रह से अथवा तो विशेष कृपा से संभव हो पाती है।यह विश्वास कि जिस पर प्रभु कृपा करना चाहते हैं, जिसे मिलना चाहते हैं उसे ही मिल सकते हैं। जीव के प्रयत्न द्वारा नहीं अपितु प्रभु की कृपा द्वारा ही उनकी प्राप्ति संभव हो पाती है, यही पुष्टि मार्ग का मुख्य सिद्धांत है। महापुरुषों द्वारा भक्ति के दो मार्ग बताये गये हैं। एक मर्यादा मार्ग और दूसरा पुष्टि मार्ग। 🌞मर्यादा मार्ग में जीव को अपने साधन द्वारा ही प्रभु प्राप्ति का विधान बताया गया है। जिस प्रकार एक बंदर के बच्चे को अपनी माँ को स्वयं पकड़ना होता है। उसे ही ये ध्यान रखना होता है कि कहीं माँ मुझसे छूट न जाए और मैं गिर न जाऊँ। मर्यादा मार्ग में स्वयं के प्रयत्न पर विश्वास किया जाता है।अथवा स्वयं के प्रयत्न द्वारा प्रभु प्राप्ति का विधान बताया गया है। 🌞पुष्टि मार्ग में जीव का अपनी तरफ से कोई साधन और साधन की सामर्थ्य नहीं होता। जिस प्रकार एक बिल्ली के बच्चे को अपनी माँ को पकड़ना नहीं पड़ता। माँ ही स्वयं उसे पकड़कर इधर - उधर करती रहती है। उसी प्रकार पुष्टि जीव पूरी तरह प्रभु शरणागत ही होता है। पूर्ण समर्पण के साथ जो मेरे प्रभु की इच्छा है और जो मेरे हित में होगा वही मेरे प्रभु करेंगे, बस यही तो पुष्टि मार्ग का सिद्धांत है। 🌞पुष्टि मार्ग में साधन करना नहीं पड़ता अपितु भगवान स्वयं साधन बन जाते हैं। जहां साधन भी और साध्य भी केवल प्रभु ही हैं, वही तो पुष्टि मार्ग भी है। 🌞पुष्टि मार्ग का एक अर्थ यह भी है कि जहाँ भक्ति तो पुष्ट होती ही होती है अपितु भगवान भी पुष्ट होते हैं। संपूर्ण समर्पण और निष्ठा के साथ अपने सभी कर्मों को अपनी प्रसन्नता का थोड़ा भी विचार किए बगैर केवल और केवल उस प्रभु की प्रसन्नता के लिए करने का भाव ही पुष्टि मार्गीय भक्ति का स्वरूप है। 🙏पुष्टि मार्ग प्रवर्तक अखण्डभूमंडलाचार्य अनंतश्री विभूषित श्रीमद् महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के मंगलमय पावन प्राकट्य उत्सव की आप सभी को कोटि - कोटि शुभकामनाएं एवं मंगल बधाइयाँ!🙏

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राधे - राधे -आज का भगवद् चिंतन 6 मई 2021 🌞वाणी के बजाय कार्य से दिए गए उदाहरण कहीं ज्यादा प्रभावी होते हैं। कोरा उपदेश भी तब तक कोई काम नहीं आता जब तक उसे चरितार्थ न किया जाए। 🌞वर्तमान समय की एक समस्या यह भी है कि आज की पीढ़ी करने में कम और कहने में ज्यादा विश्वास रखती है। किसी बात को केवल कहा जाए और किया न जाए तो वो रेगिस्तान में बरसे उन बादलों के समान ही है, जो बरसे तो जरूर हैं मगर किसी के काम न आ पाये। बरसते ही उनकी बूँदें रेत में समा जाती हैं। 🌞प्रत्येक सफल आदमियों में एक बात की समानता मिलती है और वो ये कि उन्होंने केवल वाणी से नहीं अपितु अपने कार्यों से भी उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। उन्होंने जो कहा वो किया अथवा कहने की बजाय करने पर ज्यादा जोर दिया। 🌞बिना पुरुषार्थ के हमारे महान से महान संकल्प भी केवल रेत के विशाल महल का निर्माण करने जैसे हो जाते हैं। हमारे पास संकल्प रूपी मजबूत आधार शिला तो होनी ही चाहिए मगर पुरुषार्थ रूपी पिलर भी होने चाहिए, जिस पर सफलता रुपी गगनचुम्बी महल का निर्माण संभव हो सके। 🌞कहना जीवन की माँग नहीं, करना जीवन की माँग है। महत्वपूर्ण ये नहीं कि आप अच्छा कह रहे हैं अपितु महत्वपूर्ण तो ये है कि आप अच्छा कर रहे हैं। सृजनात्मकता जीवन की माँग ही नहीं अपितु अनिवार्यता भी है। इसलिए केवल अच्छा कहना नहीं अपितु अच्छा करना भी हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।

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राधे -राधे -आज का भगवद् चिंतन 04-05-2021 🌞ऑंख खोलकर दूसरों की बुराई देखने की बजाए आंख बंद करके स्वयं की बुराई को देखना ज्यादा बेहतर है। दूर दृष्टा बनो मगर दोष दृष्टा कभी मत बनो। जो दोष हम दूसरों में ढूढेते अगर वही दोष स्वयं में ढूंढ जाए तो जीवन के परिमार्जन का इससे श्रेष्ठतम कोई साधन नहीं हो सकता। 🌞शास्त्रों में एक बात पर विशेष जोर दिया कि मनुष्य को अंतर द्रष्टा होना चाहिए। जिसकी दृष्टि भीतर की तरफ मुड़ जाती है उसे स्वयं के भीतर ही उस अखंड ब्रह्म की सत्ता का आभास होने लगता है ।अंतर द्रष्टा होने का अर्थ मात्र इतना है कि दोष बाहर नहीं अपितु स्वयं के भीतर देखे जाएं। 🌞जब हमारे स्वयं के द्वारा स्वयं का मूल्यांकन होने लगता है। स्वयं द्वारा स्वयं को अच्छे और बुरे की कसौटी पर परखा जाता है और स्वयं द्वारा स्वयं को छिद्रान्वेषण किया जाता है तो उस स्थिति में हमारा मन शोधित शोधित होकर निर्मल और पावन होने लगता है। फिर वहीं *से निर्मल मन जन सो मोहि पावा* का सूत्र भी सत्य सिद्ध होने लगता है। 🌞निसंदेह जा हृदय की पवित्रता, बुद्धि की शुद्धता, विचारों की निर्मलता और चरित्र की उच्चता है वही *शिवोऽहम* के साथ-साथ *सर्व खल्विदं* ब्रह्मा का भाव स्वयं प्रकट हो जाता है। अतः स्वयं के दोष और दूसरों के गुण देखना ही आत्मन्नति का एक प्रमुख सूत्र और सर्वश्रेष्ठ साधना भी है।

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मंदिर की पैड़ी बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि जब भी किसी मंदिर में दर्शन के लिए जाएं तो दर्शन करने के बाद बाहर आकर मंदिर की पेडी या ऑटले पर थोड़ी देर बैठते हैं । क्या आप जानते हैं इस परंपरा का क्या कारण है? आजकल तो लोग मंदिर की पैड़ी पर बैठकर अपने घर की व्यापार की राजनीति की चर्चा करते हैं परंतु यह प्राचीन परंपरा एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई । वास्तव में मंदिर की पैड़ी पर बैठ कर के हमें एक श्लोक बोलना चाहिए। यह श्लोक आजकल के लोग भूल गए हैं। आप इस लोक को सुनें और आने वाली पीढ़ी को भी इसे बताएं। यह श्लोक इस प्रकार है - 🚩अनायासेन मरणम् ,बिना देन्येन जीवनम्। 🚩देहान्त तव सानिध्यम्, देहि मे परमेश्वरम् ।। इस श्लोक का अर्थ है- 🔱 अनायासेन मरणम्...... अर्थात बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो और हम कभी भी बीमार होकर बिस्तर पर पड़े पड़े ,कष्ट उठाकर मृत्यु को प्राप्त ना हो चलते फिरते ही हमारे प्राण निकल जाएं । 🔱 बिना देन्येन जीवनम्......... अर्थात परवशता का जीवन ना हो मतलब हमें कभी किसी के सहारे ना पड़े रहना पड़े। जैसे कि लकवा हो जाने पर व्यक्ति दूसरे पर आश्रित हो जाता है वैसे परवश या बेबस ना हो । ठाकुर जी की कृपा से बिना भीख के ही जीवन बसर हो सके । 🔱 देहांते तव सानिध्यम ........अर्थात जब भी मृत्यु हो तब भगवान के सम्मुख हो। जैसे भीष्म पितामह की मृत्यु के समय स्वयं ठाकुर जी उनके सम्मुख जाकर खड़े हो गए। उनके दर्शन करते हुए प्राण निकले । 🔱 देहि में परमेशवरम्..... हे परमेश्वर ऐसा वरदान हमें देना । यह प्रार्थना करें गाड़ी ,लाडी ,लड़का ,लड़की, पति, पत्नी ,घर धन यह नहीं मांगना है यह तो भगवान आप की पात्रता के हिसाब से खुद आपको देते हैं । इसीलिए दर्शन करने के बाद बैठकर यह प्रार्थना अवश्य करनी चाहिए । यह प्रार्थना है, याचना नहीं है । याचना सांसारिक पदार्थों के लिए होती है जैसे कि घर, व्यापार, नौकरी ,पुत्र ,पुत्री ,सांसारिक सुख, धन या अन्य बातों के लिए जो मांग की जाती है वह याचना है वह भीख है। हम प्रार्थना करते हैं प्रार्थना का विशेष अर्थ होता है अर्थात विशिष्ट, श्रेष्ठ । अर्थना अर्थात निवेदन। ठाकुर जी से प्रार्थना करें और प्रार्थना क्या करना है ,यह श्लोक बोलना है। जब हम मंदिर में दर्शन करने जाते हैं तो खुली आंखों से भगवान को देखना चाहिए, निहारना चाहिए । उनके दर्शन करना चाहिए। कुछ लोग वहां आंखें बंद करके खड़े रहते हैं । आंखें बंद क्यों करना हम तो दर्शन करने आए हैं । भगवान के स्वरूप का, श्री चरणों का ,मुखारविंद का, श्रंगार का, संपूर्णानंद लें । आंखों में भर ले स्वरूप को । दर्शन करें और दर्शन के बाद जब बाहर आकर बैठे तब नेत्र बंद करके जो दर्शन किए हैं उस स्वरूप का ध्यान करें । मंदिर में नेत्र नहीं बंद करना । बाहर आने के बाद पैड़ी पर बैठकर जब ठाकुर जी का ध्यान करें तब नेत्र बंद करें और अगर ठाकुर जी का स्वरूप ध्यान में नहीं आए तो दोबारा मंदिर में जाएं और भगवान का दर्शन करें । नेत्रों को बंद करने के पश्चात उपरोक्त श्लोक का पाठ करें। यहीं शास्त्र हैं यहीं बड़े बुजुर्गो का कहना हैं ! 🚩🚩🚩 जय श्रीराम --

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