सुप्रभात मित्रों🙏😊🙏 वाहन 'और' Durghatna 'दुर्घटना है। नाम अर्थ के रूप में, इस यंत्र दुर्घटना, चोट, या प्राचीन वैदिक ग्रंथों, वाहन से संबंधित विशेष रूप से उन लोगों के प्रति के रूप में अन्य गलत Haps से सुरक्षा सुनिश्चित करता है। इसे बचाने के लिए और किसी भी तरह के गलत भाग्य से पूजा को बचाने के लिए एक ढाल के रूप में कार्य करता है, और अपने ही सुनिश्चित करता है, अपने परिवार की और प्राचीन वैदिक ग्रंथों के अनुसार यात्रा के दौरान अपने के संबंधित सुरक्षा के लिए। Vahan Durghtna यंत्र सड़क में या दूर सड़क दुर्घटनाओं से दूर रहने के लिए, वाहनों में सुरक्षा के लिए यंत्र है। यह घर के बाहर के क्षेत्र में सुरक्षित पूजा रहता है और कुछ भी किसी भी तरह से व्यक्ति को नुकसान नहीं है। Vahandurghtna यंत्र ड्राइविंग में और ज्योतिष के शब्दों के अनुसार उनकी कुंडली चार्ट में वाहनों के साथ बाधाओं को होने वाले लोगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनकी जन्म कुंडली से भविष्यवाणी के रूप में सड़कों में डर के लिए कहा गया है जो लोग इस यंत्र को अपनाने और यह निश्चित रूप से जीवन के अपने डर को कम करेगा और सड़क में या ड्राइविंग के दौरान कई बाधाओं से उन्हें बचाव होगा के रूप में सभी अनुष्ठानों के साथ यह पूजा करनी चाहिए। आप अपने कार्यालय या वेदी जगह पर इस यंत्र रखने के लिए और पूजा कर सकते हैं। । आप 21/108 समय के लिए है और आप vayapar Durghtna यंत्र की सकारात्मक ऊर्जा के साथ धन्य हो जाएगा जप की ऊर्जा के साथ इस मंत्र का जाप करने के लिए है। इस प्रकार के रूप Vayapar Durghtna मंत्र है ओम ओम् Hraam Hreem श्री वायु Putreye नमः कैसे वेदी में यंत्र का उपयोग करने के लिए?      तुम्हारी आँखों के स्तर पर यंत्र के केंद्र में रखकर, उत्तर या पूर्व की ओर एक वेदी पर यंत्र रखें।      गुलाब जल या दूध के साथ यंत्र को धो कर साफ कपड़े से यन्त्र साफ कर लें। भंग नहीं किया जाएगा यंत्र का समय है, लेकिन ऊर्जा की अवधि से अधिक रंग में परिवर्तन नहीं होगा। सबसे पहले यंत्र की बढ़त पर है और बीच में तो चंदन और कुमकुम लागू होते हैं। भगवान (कर्म योग) के लिए इस अभ्यास का फल संस्कार के लिए मत भूलना। तब वेदी में यंत्र के सामने एक मोमबत्ती या घी के दीपक और धूप छड़ी प्रकाश और पूजा करते हैं। यंत्र के सामने के रूप में उपरोक्त मंत्र का जाप। इस प्रकार, Yantras आपदाओं को टालना ही नहीं बल्कि जीवन के लिए अच्छी बातें लाने में मदद करते हैं। Yantras किसी के जीवन के लिए मूल्य जोड़ने और लोगों की सबसे द्वारा समझा नहीं कर रहे हैं, जो कुछ मुद्दों को ठीक करने के लिए रहस्यमय शक्तियों की क्या ज़रूरत है।

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शुभ रात्रि मित्रों🙏😊🙏 आयरलैंड में एक जगह है तारा हिल्स यानि तारा की पहाड़ियाँ, जहाँ ये शिवलिंग स्थापित है। वैज्ञानिक इसे 4000 वर्ष प्राचीन बताते हैं, ये शिवलिंग यहाँ के Pre - Christian युग का है जब यहाँ मूर्ति पूजक रहते थे। आज से 2500 वर्ष पहले तक आयरलैंड के सभी राजाओं का राज्याभिषेक यहीं इन्हीं के आशीर्वाद से होता था, फिर 500 AD में ये परम्परा बंद कर दी गई। अभी 7-8 साल पहले वहाँ के कुछ Radical ग़्रुप ने इस शिवलिंग को नुक़सान पहुँचाने की कोशिश भी की थी। इसमें तो कोई शक नहीं कि ये शिवलिंग है क्यूँकि जिस देवी तारा के नाम पर ये पर्वत स्थित है हमारे शास्त्रों में तारा माता पार्वती को भी कहते हैं। ये तथ्य सिर्फ़ इस बात के लिए नहीं बताया गया कि हम शिव की या अपने धर्म की व्यापकता को समझें और मानें, ये बताने के पीछे मुख्य मक़सद ये है कि अगर हम अब भी नहीं समझे और ऐसी ही सहृदयता दिखाते रहे, मूर्ख बनते रहे तो एक दिन हम और हमारा धर्म ऐसे ही अवशेषों में खोजा जाएगा और तब वो हमें अच्छे और समझदार के रूप में नहीं बल्कि आत्मघाती मूर्ख सभ्यता के रूप में याद करेंगे। साभार

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शुभ प्रभात .... आज बाबा बैजनाथ🙏🏻की अपार कृपा और आर्शीवाद आप एवं आपके परिवार पर बना रहे ! आप सभी की मनोकामना पूर्ण करें, सुख शान्ति प्रदान करे, ऐसी कामना करते है ! दोस्तो ,💐💐 सभी लोग चाहते हैं, कि *दूसरा व्यक्ति मुझे पसंद करे, मुझे अच्छा माने, मेरी प्रशंसा करे, मुझे बुद्धिजीवी समझे ,हमारी तरफ करे ।* परंतु यह कैसे होगा??? यह तब होगा, जब दूसरा व्यक्ति मुझ में कुछ अच्छे गुण देखे, अच्छे आचरण देखे, तभी वह मुझ से प्रभावित होगा, और तभी वह मुझे अच्छा मानेगा या कहेगा। अब प्रश्न यह है कि दूसरा व्यक्ति मुझ से प्रभावित कैसे होगा ??? इस संबंध में लोग बहुत सा दिखावा करते हैं। वे अपने आप को बहुत अच्छा बना कर दूसरों के सामने प्रस्तुत करते हैं। अपने बहुत सारे गुणों का व्याख्यान करते हैं। परंतु सभी जानते हैं कि सुनी सुनाई बात अनेक बार गलत भी हो सकती है। जो घटना अथवा क्रिया स्वयं अपनी आंखों से सामने प्रत्यक्ष दिखती है, वह तो निश्चित रुप से सत्य भी होती है तथा प्रभावित भी करती है। तो कहने का सार यह हुआ, कि *सुनने की अपेक्षा देखने का प्रभाव अधिक होता है.* यदि आप दूसरों को प्रभावित करना चाहते हैं तो *अपने गुणों और उत्तम आचरणों को दूसरों के सामने सुनाएं कम, और दिखाएं अधिक। अर्थात आपका उत्तम आचरण क्रियात्मक रूप में दूसरों के सामने अधिक प्रस्तुत करें.* *जब वे स्वयं अपनी आंखों से आपका उत्तम आचरण देखेंगे, तो निश्चित रुप से आप से प्रभावित होंगे। तभी वे आपको अच्छा मानेंगे और कहेंगे।* साभार🙏👉 |('}_, |(_/\\_ "" *सुनील पाठक* "" जमशेदपुर

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दारिद्रय दहन स्त्रोत आर्थिक परेशानी और कर्ज से मुक्ति दिलाता है शिवजी का दारिद्रय दहन स्तोत्र. कारगर मंत्र है आजमाकर देखे जो व्यक्ति घोर आर्थिक संकट से जूझ रहे हों, कर्ज में डूबे हों, व्यापार व्यवसाय की पूंजी बार-बार फंस जाती हो उन्हें दारिद्रय दहन स्तोत्र से शिवजी की आराधना करनी चाहिए. महर्षि वशिष्ठ द्वारा रचित यह स्तोत्र बहुत असरदायक है. यदि संकट बहुत ज्यादा है तो शिवमंदिर में या शिव की प्रतिमा के सामने प्रतिदिन तीन बार इसका पाठ करें तो विशेष लाभ होगा. जो व्यक्ति कष्ट में हैं अगर वह स्वयं पाठ करें तो सर्वोत्तम फलदायी होता है लेकिन परिजन जैसे पत्नी या माता-पिता भी उसके बदले पाठ करें तो लाभ होता है. शिवजी का ध्यान कर मन में संकल्प करें. जो मनोकामना हो उसका ध्यान करें फिर पाठ आरंभ करें. श्लोकों को गाकर पढ़े तो बहुत अच्छा, अन्यथा मन में भी पाठ कर सकते हैं. आर्थिक संकटों के साथ-साथ परिवार में सुख शांति के लिए भी इस मंत्र का जप बताया गया है. ।।दारिद्रय दहन स्तोत्रम्।।  विश्वेशराय नरकार्ण अवतारणाय कर्णामृताय शशिशेखर धारणाय। कर्पूर कान्ति धवलाय, जटाधराय, दारिद्रय दुख दहनाय नमः शिवाय।।१ गौरी प्रियाय रजनीश कलाधराय, कलांतकाय भुजगाधिप कंकणाय। गंगाधराय गजराज विमर्दनाय द्रारिद्रय दुख दहनाय नमः शिवाय।।२ भक्तिप्रियाय भवरोग भयापहाय उग्राय दुर्ग भवसागर तारणाय। ज्योतिर्मयाय गुणनाम सुनृत्यकाय, दारिद्रय दुख दहनाय नमः शिवाय।।३ चर्माम्बराय शवभस्म विलेपनाय, भालेक्षणाय मणिकुंडल-मण्डिताय। मँजीर पादयुगलाय जटाधराय दारिद्रय दुख दहनाय नमः शिवाय।।४ पंचाननाय फणिराज विभूषणाय हेमांशुकाय भुवनत्रय मंडिताय। आनंद भूमि वरदाय तमोमयाय, दारिद्रय दुख दहनाय नमः शिवाय।।५ भानुप्रियाय भवसागर तारणाय, कालान्तकाय कमलासन पूजिताय। नेत्रत्रयाय शुभलक्षण लक्षिताय दारिद्रय दुख दहनाय नमः शिवाय।।६ रामप्रियाय रधुनाथ वरप्रदाय नाग प्रियाय नरकार्ण अवताराणाय। पुण्येषु पुण्य भरिताय सुरार्चिताय, दारिद्रय दुख दहनाय नमः शिवाय।।७ मुक्तेश्वराय फलदाय गणेश्वराय गीतप्रियाय वृषभेश्वर वाहनाय। मातंग चर्म वसनाय महेश्वराय, दारिद्रय दुख दहनाय नमः शिवाय।।८ वसिष्ठेन कृतं स्तोत्रं सर्व रोग निवारणम् सर्व संपत् करं शीघ्रं पुत्र पौत्रादि वर्धनम्।। शुभदं कामदं ह्दयं धनधान्य प्रवर्धनम् त्रिसंध्यं यः पठेन् नित्यम् स हि स्वर्गम् वाप्युन्यात्।।९ ।।इति श्रीवशिष्ठरचितं दारिद्रयुदुखदहन शिवस्तोत्रम संपूर्णम।।

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👉हिन्दू धर्म के 10 चमत्कारिक मंत्र... 'मंत्र' का अर्थ होता है मन को एक तंत्र में बांधना। यदि अनावश्यक और अत्यधिक विचार उत्पन्न हो रहे हैं और जिनके कारण चिंता पैदा हो रही है, तो मंत्र सबसे कारगर औषधि है। आप जिस भी ईष्ट की पूजा, प्रार्थना या ध्यान करते हैं उसके नाम का मंत्र जप सकते हैं।   मंत्र 3 प्रकार के हैं- सात्विक, तांत्रिक और साबर। सभी मंत्रों का अपना-अलग महत्व है। प्रतिदिन जपने वाले मंत्रों को सात्विक मंत्र माना जाता है। आओ जानते हैं ऐसे कौन से मंत्र हैं जिनमें से किसी एक को प्रतिदिन जपना चाहिए जिससे मन की शक्ति ही नहीं बढ़ती, बल्कि सभी संकटों से मुक्ति भी मिलती है।   इन मंत्रों के जप या स्मरण के वक्त सामान्य पवित्रता का ध्यान रखें। जैसे घर में हो तो देवस्थान में बैठकर, कार्यालय में हो तो पैरों से जूते-चप्पल उतारकर इन मंत्र और देवताओं का ध्यान करें। इससे आप मानसिक बल पाएंगे, जो आपकी ऊर्जा को जरूर बढ़ाने वाले साबित होंगे।     पहला मंत्र :    क्लेशनाशक मंत्र : कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणत क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नम:॥   मंत्र प्रभाव : इस मंत्र का नित्य जप करने से कलह और क्लेशों का अंत होकर परिवार में खुशियां वापस लौट आती हैं।    दूसरा मंत्र :    शांतिदायक मंत्र : श्री राम, जय राम, जय जय राम     मंत्र प्रभाव :  हनुमानजी भी राम नाम का ही जप करते रहते हैं। कहते हैं राम से भी बढ़कर श्रीराम का नाम है। इस मंत्र का निरंतर जप करते रहने से मन में शांति का प्रसार होता है, चिंताओं से छुटकारा मिलता है तथा दिमाग शांत रहता है। राम नाम के जप को सबसे उत्तम माना गया है। यह सभी तरह के नकारात्मक विचारों को समाप्त कर देता है और हृदय को निर्मल बनाकर भक्ति भाव का संचार करता है।   तीसरा मंत्र :    चिंता मुक्ति मंत्र : ॐ नम: शिवाय।   मंत्र प्रभाव : इस मंत्र का निरंतर जप करते रहने से चिंतामुक्त जीवन मिलता है। यह मंत्र जीवन में शांति और शीतलता प्रदान करता है। शिवलिंग पर जल व बिल्वपत्र चढ़ाते हुए यह शिव मंत्र बोलें व रुद्राक्ष की माला से जप भी करें। तीन शब्दों का यह मंत्र महामंत्र है।   चौथा मंत्र :    संकटमोचन मंत्र : ॐ हं हनुमते नम:।   मंत्र प्रभाव : यदि दिल में किसी भी प्रकार की घबराहट, डर या आशंका है तो निरंतर प्रतिदिन इस मंत्र का जप करें और फिर निश्चिंत हो जाएं। किसी भी कार्य की सफलता और विजयी होने के लिए इसका निरंतर जप करना चाहिए। यह मंत्र आत्मविश्वास बढ़ाता है।   हनुमानजी को सिंदूर, गुड़-चना चढ़ाकर इस मंत्र का नित्य स्मरण या जप सफलता व यश देने वाला माना गया है। यदि मृत्युतुल्य कष्ट हो रहा है, तो इस मंत्र का तुरंत ही जप करना चाहिए।   पांचवां मंत्र :  शांति, सुख और समृद्धि हेतु : भगवान विष्णु के वैसे तो बहुत मंत्र हैं, लेकिन यहां कुछ प्रमुख प्रस्तुत हैं।   1.  ॐ नमो नारायण। या श्रीमन नारायण नारायण हरि-हरि।   2. ॐ भूरिदा भूरि देहिनो, मा दभ्रं भूर्या भर। भूरि घेदिन्द्र दित्ससि।। ॐ भूरिदा त्यसि श्रुत: पुरूत्रा शूर वृत्रहन्। आ नो भजस्व राधसि।।   3. ॐ नारायणाय विद्महे। वासुदेवाय धीमहि।  तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।।   4. त्वमेव माता च पिता त्वमेव। त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव। त्वमेव सर्व मम देवदेव।।   5.  शांताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्। विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।। लक्ष्मीकान्तंकमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्। वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।   मंत्र प्रभाव : भगवान विष्णु को जगतपालक माना जाता है। वे ही हम सभी के पालनहार हैं इसलिए पीले फूल व पीला वस्त्र चढ़ाकर उक्त किसी एक मंत्र से उनका स्मरण करते रहेंगे, तो जीवन में सकारात्मक विचारों और घटनाओं का विकास होकर जीवन खुशहाल बन जाएगा। विष्णु और लक्ष्मी की पूजा एवं प्रार्थना करते रहने से सुख और समृद्धि का विकास होता है।    छठा मंत्र :    मृत्यु पर विजय के लिए महामृंत्युजय मंत्र :  ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिंपुष्टिवर्द्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धानान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।।    मंत्र प्रभाव : शिव का महामृंत्युजय मंत्र मृत्यु व काल को टालने वाला माना जाता है इसलिए शिवलिंग पर दूध मिला जल, धतूरा चढ़ाकर यह मंत्र हर रोज बोलना संकटमोचक होता है। यदि आपके घर का कोई सदस्य अस्पताल में भर्ती है या बहुत ज्यादा बीमार है तो नियमपूर्वक इस मंत्र का सहारा लें। बस शर्त यह है कि इसे जपने वाले को शुद्ध और पवित्र रहना जरूरी है अन्यथा यह मंत्र अपना असर छोड़ देता है।   सातवां मंत्र    सिद्धि और मोक्षदायी गायत्री मंत्र :  ।।ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।।   अर्थ : उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अंत:करण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।   मंत्र प्रभाव : यह दुनिया का एकमात्र ऐसा मंत्र है, जो ईश्वर के प्रति, ईश्वर का साक्षी और ईश्वर के लिए है। यह मंत्रों का मंत्र सभी हिन्दू शास्त्रों में प्रथम और 'महामंत्र' कहा गया है। हर समस्या के लिए मात्र यह एक ही मंत्र कारगर है। बस शर्त यह है कि इसे जपने वाले को शुद्ध और पवित्र रहना जरूरी है अन्यथा यह मंत्र अपना असर छोड़ देता है।   आठवां मंत्र :    समृद्धिदायक मंत्र : ॐ गं गणपते नम:।   मंत्र प्रभाव : भगवान गणेश को विघ्नहर्ता माना गया है। सभी मांगलिक कार्यों की शुरुआत में श्री गणेशाय नम: मंत्र का उत्चारण किया जाता है। उक्त दोनों मंत्रों का गणेशजी को दूर्वा व चुटकीभर सिंदूर व घी चढ़ाकर कम से कम 108 बार जप करें। इससे जीवन में सभी तरह के शुभ और लाभ की शुरुआत होगी।   नौवां मंत्र :  अचानक आए संकट से मुक्ति हेतु : कालिका का यह अचूक मंत्र है। इसे माता जल्द से सुन लेती हैं, लेकिन आपको इसके लिए सावधान रहने की जरूरत है। आजमाने के लिए मंत्र का इस्तेमाल न करें। यदि आप काली के भक्त हैं तो ही करें।   1 : ॐ कालिके नम:। 2 : ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि कालिके स्वाहा।   मंत्र प्रभाव : इस मंत्र का प्रतिदिन 108 बार जाप करने से आर्थिक लाभ मिलता है। इससे धन संबंधित परेशानी दूर हो जाती है। माता काली की कृपा से सब काम संभव हो जाते हैं। 15 दिन में एक बार किसी भी मंगलवार या शुक्रवार के दिन काली माता को मीठा पान व मिठाई का भोग लगाते रहें।   दसवां मंत्र :    दरिद्रतानाशक मंत्र : ॐ ह्रीं ह्रीं श्री लक्ष्मी वासुदेवाय नम:। मंत्र प्रभाव : इस मंत्र की 11 माला सुबह शुद्ध भावना से दीप जलाकर और धूप देकर जपने से धन, सुख, शांति प्राप्त होती है। खासकर धन के अभाव को दूर करने के लिए इस मंत्र का जप करना चाहिए।

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👉पवित्रीण क्यों और कैसे ? गुरुदेव तो अधिकतर ध्यान में ही रहते थे। तपोभूमि में आने वाले अतिथियों और यात्रियों से तो हमें ही निपटना होता था, उनकी शंकाओं का समाधान करना होता था। तर्कशील व्यक्ति को संतुष्ट करने में कभी-कभी बड़ी कठिनाई होती थी। इसी से एक दिन हमने पूज्य गुरुदेव से प्रश्न किया ‘‘गुरुदेव ! पवित्रीकरण सर्वप्रथम क्यों करते हैं ? क्या जल हथेली में लेकर मंत्र पढ़कर छिड़क लेने मात्र से हम पवित्र हो जाते हैं ? फिर हम तो पहले ही नहा धोकर साफ धुले वस्त्र पहनकर बैठते हैं।’’ इस पर गुरुजी पहले तो खूब हँसे फिर बाद में बोले, ‘‘बेटा ! क्रिया के साथ भावना भी आवश्यक है। मात्र स्थूल उपचार से कुछ होता नहीं। अध्यात्म को गहराई में घुसकर जानना होता है। मोती समुद्र में भीतर ही मिलते हैं, ऊपर तो कंकण पत्थर ही हाथ आते हैं। केवल जप से जीभ हिलाने से फायदा हैं नहीं। भावना के बिना जप बेकार होता है। मंत्र के साथ यह भावना करनी चाहिए कि चारों तरफ से पवित्रता की वर्षा हो रही है दो हमारी अपवित्रता को, मलिनता को धो रही है। धरती गर्मी के दिनों में तपने लगती है परन्तु जब बरसात होती है तो चारों ओर हरियाली, शीतलता छा जाती है। पवित्रीकरण के साथ भी ऐसी ही भावना करनी चाहिए कि आध्यात्मिकता की वर्षा से शरीर के ताप निकल रहे हैं, दूर हो रहे हैं। शांति की, करुणा की, संवेदना की, पवित्रता की फुहारें पड़ रही हैं, मन शुद्ध और पवित्र हो रहा है। परन्तु आजकल तो लोग भावना यह करते हैं कि हमारी भैंस दूध कम क्यों कर रही है ? हमें भगवान ने बेटा क्यों नहीं दिया ? धन सम्पत्ति क्यों नहीं दी ? इस प्रकार की मनौतियों का क्रम चल पड़ा है। क्रिया तो केवल संकेत है, इशारा है, प्रतीक है। जिस प्रकार रेलगाड़ी को गार्ड लाल झंडी दिखाते हैं तो गाड़ी रुक जाती है, हरी झंड़ी दिखाते हैं तो चल पड़ती है। भावना का ही दूसरा नाम ‘देवता’ है। शंकर भगवान् कैलाश पर्वत पर ढूँढ़ने से मिलने वाले नहीं हैं। मीरा ने तो भावना से ही पत्थर की मूर्ति में भगवान कृष्ण के साक्षात दर्शन कर लिए थे। एकलव्य ने भावना से, श्रद्धा से गुरुद्रोणाचार्य की मिट्टी की मूर्ति बनाकर उससे की धनुर्विद्या सीख ली थी। उत्कृष्ट भावनाएं ही देवता बनकर हमारी सहायता को आती हैं। वे भावनाएं ही तो थीं जिनके बल पर भगवान् स्वयं नंदा नाई की जगह पैर दबाने चले गए थे, सुदामा के चरण धोकर पी गए थे, शबरी के घर जूठे बेर खाने पहुंच गए थे। भगवान को चापलूसी नहीं श्रेष्ठ कार्य ही पसंद होते हैं। शरीर और मन की पवित्रता, शुद्धता से ही भगवान का अवतरण होता है। पवित्र आचरण करना चाहिए। ऐसी भावना और आचरण से जब पवित्रीकरण की क्रिया होगी तो शरीर और अंत:करण की धुलाई होगी। हमें इसी भावना से शरीर-मन-अंत:करण को पवित्र करना चाहिए।’’

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बातें बिल्व वृक्ष की- बिल्व वृक्ष के आसपास सांप नहीं आते । अगर किसी की शव यात्रा बिल्व वृक्ष की छाया से होकर गुजरे तो उसका मोक्ष हो जाता है । वायुमंडल में व्याप्त अशुध्दियों को सोखने की क्षमता सबसे ज्यादा बिल्व वृक्ष में होती है । 4. चार पांच छः या सात पत्तो वाले बिल्व पत्रक पाने वाला परम भाग्यशाली और शिव को अर्पण करने से अनंत गुना फल मिलता है । बेल वृक्ष को काटने से वंश का नाश होता है। और बेल वृक्ष लगाने से वंश की वृद्धि होती है। सुबह शाम बेल वृक्ष के दर्शन मात्र से पापो का नाश होता है। बेल वृक्ष को सींचने से पितर तृप्त होते है। बेल वृक्ष और सफ़ेद आक् को जोड़े से लगाने पर अटूट लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। बेल पत्र और ताम्र धातु के एक विशेष प्रयोग से ऋषि मुनि स्वर्ण धातु का उत्पादन करते थे । जीवन में सिर्फ एक बार और वो भी यदि भूल से भी शिवलिंग पर बेल पत्र चढ़ा दिया हो तो भी उसके सारे पाप मुक्त हो जाते है । बेल वृक्ष का रोपण, पोषण और संवर्धन करने से महादेव से साक्षात्कार करने का अवश्य लाभ मिलता है। कृपया बिल्व पत्र का पेड़ जरूर लगाये । बिल्व पत्र के लिए पेड़ को क्षति न पहुचाएं शिवजी की पूजा में ध्यान रखने योग्य बात शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव को कौन सी चीज़ चढाने से मिलता है क्या फल किसी भी देवी-देवता का पूजन करते वक़्त उनको अनेक चीज़ें अर्पित की जाती है। प्रायः भगवन को अर्पित की जाने वाली हर चीज़ का फल अलग होता है। शिव पुराण में इस बात का वर्णन मिलता है की भगवन शिव को अर्पित करने वाली अलग-अलग चीज़ों का क्या फल होता है। शिवपुराण के अनुसार जानिए कौन सा अनाज भगवान शिव को चढ़ाने से क्या फल मिलता है: भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है। तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है। जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है। गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।यह सभी अन्न भगवान को अर्पण करने के बाद गरीबों में वितरीत कर देना चाहिए। शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन सा रस (द्रव्य) चढ़ाने से उसका क्या फल मिलता है। ज्वर (बुखार) होने पर भगवान शिव को जलधारा चढ़ाने से शीघ्र लाभ मिलता है। सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी जलधारा द्वारा शिव की पूजा उत्तम बताई गई है। नपुंसक व्यक्ति अगर शुद्ध घी से भगवान शिव का अभिषेक करे, ब्राह्मणों को भोजन कराए तथा सोमवार का व्रत करे तो उसकी समस्या का निदान संभव है। तेज दिमाग के लिए शक्कर मिश्रित दूध भगवान शिव को चढ़ाएं। सुगंधित तेल से भगवान शिव का अभिषेक करने पर समृद्धि में वृद्धि होती है। शिवलिंग पर ईख (गन्ना) का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों की प्राप्ति होती है। शिव को गंगाजल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है। मधु (शहद) से भगवान शिव का अभिषेक करने से राजयक्ष्मा (टीबी) रोग में आराम मिलता है। शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन का फूल चढ़ाया जाए तो उसका क्या फल मिलता है। लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने पर भोग व मोक्ष की प्राप्ति होती है। चमेली के फूल से पूजन करने पर वाहन सुख मिलता है। अलसी के फूलों से शिव का पूजन करने से मनुष्य भगवान विष्णु को प्रिय होता है। शमी पत्रों (पत्तों) से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है। बेला के फूल से पूजन करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती है। जूही के फूल से शिव का पूजन करें तो घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती। कनेर के फूलों से शिव पूजन करने से नए वस्त्र मिलते हैं। हरसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि होती है। धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशनकरता है। लाल डंठलवाला धतूरा पूजन में शुभ माना गया है। दूर्वा से पूजन करने पर आयु बढ़ती है।

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महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की विधि विधान से साधना एवं महामृत्युंजय मंत्र का जाप करके हम अपने जीवन के कष्ट दुख एवं परेशानी को दूर कर सकते हैं। 👉जो व्यक्ति विधि विधान से पूजा नहीं कर सकते हैं वे अपने घर में लगभग 3 इंच से छोटा पारद शिवलिंग या स्फटिक शिवलिंग स्थापित करके सामान्य पूजन करके रुद्राक्ष की माला से महामृत्युंजय मंत्र का ज्यादा से ज्यादा जाप कर सकते हैं । 👉 महामृत्युंजय मंत्र का जाप प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में हमेशा करना चाहिए। महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से जीवन में कष्ट , रोग इत्यादि परेशानी दूर होती है तथा जो भी क्रूर ग्रह जन्म कुंडली में परेशान करते हैं इन से होने वाली परेशानी भी दूर होती है । 🍁 महामृत्युञ्जय मन्त्र - ॥ ॐ ह्रौं जुं सः त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि वर्धनं उर्वारुकमिव बन्धनान मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् सः जुं ह्रौं ॐ ॥ 🌹 साधना प्रारंभ करने से पहले पूजा स्थान में पूजन करने से संबंधित सामग्री अक्षत, अष्टगंध , जल , दूध , दही , शक्कर , घी , शहद , पुष्प , बिल्वपत्र , प्रसाद इत्यादि रख ले । सफेद वस्त्र धारण करें कंबल को मोड़ के लगभग दो-तीन इंच का बैठने के लिए आसन बनाएं एवं उस पर सफेद वस्त्र बिछा दे ।🌹 🔸 पवित्रीकरण बायें हाथ में जल लेकर उसे दाये हाथ से ढक कर मंत्र पढे एवं मंत्र पढ़ने के बाद इस जल को दाहिने हाथ से अपने सम्पूर्ण शरीर पर छिड़क ले ॥ ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतरः शुचिः ॥ 🔸आचमन मन , वाणि एवं हृदय की शुद्धि के लिए आचमनी द्वारा जल लेकर तीन बार मंत्र के उच्चारण के साथ पिए ( ॐ केशवया नमः , ॐ नारायणाय नमः , ॐ माधवाय नमः ) ॐ हृषीकेशाय नमः ( इस मंत्र को बोलकर हाथ धो ले ) 🔸 शिखा बंधन शिखा पर दाहिना हाथ रखकर दैवी शक्ति की स्थापना करें ॥ चिद्रुपिणि महामाये दिव्य तेजः समन्विते , तिष्ठ देवि शिखामध्ये तेजो वृद्धिं कुरुष्व मे ॥ 🔸न्यास संपूर्ण शरीर को साधना के लिये पुष्ट एवं सबल बनाने के लिए प्रत्येक मन्त्र के साथ संबन्धित अंग को दाहिने हाथ से स्पर्श करें ॐ वाङ्ग में आस्येस्तु - मुख को ॐ नसोर्मे प्राणोऽस्तु - नासिका के छिद्रों को ॐ चक्षुर्में तेजोस्तु - दोनो नेत्रों को ॐ कर्णयोमें श्रोत्रंमस्तु – दोनो कानो को ॐ बह्वोर्मे बलमस्तु - दोनो बाजुओं को ॐ ऊवोर्में ओजोस्तु - दोनों जंघाओ को ॐ अरिष्टानि मे अङ्गानि सन्तु –- सम्पूर्ण शरीर को 🔸आसन पूजन अब अपने आसन के नीचे चन्दन से त्रिकोण बनाकर उसपर अक्षत , पुष्प समर्पित करें एवं मन्त्र बोलते हुए हाथ जोडकर प्रार्थना करें ॥ ॐ पृथ्वि त्वया धृतालोका देवि त्वं विष्णुना धृता , त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम् ॥ 🔸 दिग् बन्धन बायें हाथ में जल या चावल लेकर दाहिने हाथ से चारों दिशाओ में छिड़कें ॥ ॐ अपसर्पन्तु ये भूता ये भूताःभूमि संस्थिताः , ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया , अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचाः सर्वतो दिशम् , सर्वे षामविरोधेन पूजाकर्म समारम्भे ॥ 🔸गणेश स्मरण सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः , लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः धुम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः , द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा , संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते 🔸 श्री गुरु ध्यान अस्थि चर्म युक्त देह को हिं गुरु नहीं कहते अपितु इस देह में जो ज्ञान समाहित है उसे गुरु कहते हैं , इस ज्ञान की प्राप्ति के लिये उन्होने जो तप और त्याग किया है , हम उन्हें नमन करते हैं , गुरु हीं हमें दैहिक , भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करने का ज्ञान देतें हैं इसलिये शास्त्रों में गुरु का महत्व सभी देवताओं से ऊँचा माना गया है , ईश्वर से भी पहले गुरु का ध्यान एवं पूजन करना शास्त्र सम्मत कही गई है। अखण्ड मण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः ध्यान मूलं गुरोर्मूर्तिः पूजा मूलं गुरोः पदं मन्त्र मूलं गुरोर्वाक्यं मोक्ष मूलं गुरोः कृपा ॥ श्री गुरु चरण कमलेभ्यो नमः प्रार्थनां समर्पयामि , श्री गुरुं मम हृदये आवाहयामि मम हृदये कमलमध्ये स्थापयामि नमः ॥ 🔸भगवान शिव जी का ध्यान - ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं रत्नाकल्पोज्जवलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम् पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्ववन्द्यं निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम् भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः ध्यानार्थे बिल्वपत्रं समर्पयामि 🔸आवाहन – ॥ आगच्छन्तु सुरश्रेष्ठा भवन्त्वत्र स्थिराः समे यावत् पूजां करिष्यामि तावत् तिष्ठन्तु सन्निधौ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , आवाहनार्थे पुष्पं समर्पयामि । 🔸आसन – ॥ अनेकरत्नसंयुक्तं नानामणिगणान्वितम् कार्तस्वरमयं दिव्यमासनं प्रतिगृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , आसनार्थे बिवपत्राणि समर्पयामि । 🔸स्नान ॥ मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापहरं शुभम् तदिदं कल्पितं देव स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः पाद्यं , अर्ध्यं , आचमनीयं च स्नानं समर्पयामि , पुनः आचमनीयं जलं समर्पयामि । (पांच आचमनि जल प्लेटे मे चदायें ) 🔸दुग्धस्नान ॥ काम्धेनुसमुभ्दूतं सर्वेषां जीवनं परम् पावनं यज्ञहेतुश्च पयः स्नानाय गृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , पयः स्नानं समर्पयामि , पयः स्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि , शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि । 🔸दधिस्नान ॥ पयसस्तु समुभ्दूतं मधुराम्लं शशिप्रभम् दध्यानीतं मया देव स्नानार्थं पतिगृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , दधि स्नानं समर्पयामि , दधि स्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि , शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि । 🔸घृतस्नान ॥ नवनीतसमुत्पन्नं सर्वसंतोषकारकम् घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं पतिगृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , घृतस्नानं समर्पयामि , घृतस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि , शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि । 🔸मधुस्नान ॥ पुष्परेणुसमुत्पन्नं सुस्वादु मधुरं मधु तेजःपुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं पतिगृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , मधुस्नानं समर्पयामि , मधुस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि , शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि । 🔸शर्करास्नान ॥ इक्षुसारसमुभ्दूतां शर्करां पुष्टिदां शुभाम् मलापहारिकां दिव्यां स्नानार्थं पतिगृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , शर्करास्नानं समर्पयामि , शर्करास्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि , शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि । 🔸पञ्चामृतस्नान ॥ पयो दधि घृतं चैव मधु च शर्करान्वितम् पञ्चामृतं मयाऽऽनीतं स्नानार्थं पतिगृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , पञ्चामृतस्नानं समर्पयामि , पञ्चामृतस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि , शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि । 🔸गन्धोदकस्नान ॥ मलयाचलसम्भूतचन्दनेन विमिश्रितम् इदं गन्धोकस्नानं कुङ्कुमाक्तं नु गृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , गन्धोदकस्नानं समर्पयामि , गन्धोदकस्नानान्ते शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि , शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि । 🔸शुद्धोदकस्नान ॥ शुद्धं यत् सलिलं दिव्यं गङ्गाजलसमं स्मृतम् समर्पितं मया भक्त्या शुद्धस्नानाय गृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । 🔸अभिषेक शुद्ध जल एवं दुध से अभिषेक करे यदि आप पढ़ सकते हैं तो ( रुद्राष्टाध्यायी का पाठ करें ( पांचवे अध्याय के 16 मंत्र ) या ॥ ॐ नमः शिवाय ॥ मंत्र बोलकर दूध एवं जल मिलकर उससे अभिषेक करें । ॐ उमामहेश्वराभ्यां नम: अभिषेकं समर्पयामि । 🔸शांति पाठ – ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष (गूं) शांति: पृथिवी शान्तिराप: शांतिरोषधय: शांति: । वनस्पतय: शांतिर्विश्वे देवा: शांतिर्ब्रह्मा शांति: सर्व (गूं) शांति: शांतिरेव शांति: सा मा शांतिरेधि । 🔸वस्त्र ॥ सर्वभुषादिके सौम्ये लोके लज्जानिवारणे , मयोपपादिते तुभ्यं गृह्यतां वसिसे शुभे ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , वस्त्रोपवस्त्रं समर्पयामि , आचमनीयं जलं समर्पयामि । 🔸यज्ञोपवीत ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् । आयुष्यमग्रयं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥ यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवितेनोपनह्यामि । नवभिस्तन्तुभिर्युक्तं त्रिगुणं देवतामयम् । उपवीतं मया दत्तं गृहाण परमेश्वर ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , यज्ञोपवीतं समर्पयामि , यज्ञोपवीतान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि । 🔸 चन्दन ॥ ॐ श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढयं सुमनोहरं , विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , चन्दनं समर्पयामि । 🔸अक्षत ॥ अक्षताश्च सुरश्रेष्ठ कुङ्कुमाक्ताः सुशोभिताः , मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , अक्षतान् समर्पयामि । 🔸 पुष्प माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि भक्तितः , मयाऽऽ ह्रतानि पुष्पाणि पूजार्थं प्रतिगृह्यतां ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , पुष्पं समर्पयामि । 🔸बिल्वपत्र ॥ त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुतम् त्रिजन्मपापसंहारं बिल्वपत्रं शिवार्पणम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , बिल्वपत्रं समर्पयामि 🔸दुर्वा ॥ दूर्वाङ्कुरान सुहरितानमृतान् मङ्गलप्रदान् आनीतांस्तव पूजार्थं गृहाण परमेश्वर ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , दूर्वाङ्कुरान् समर्पयामि 🔸धूप ॥ वनस्पति रसोद् भूतो गन्धाढयो सुमनोहरः , आघ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , धूपं आघ्रापयामि । 🔸दीप ॥ साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया , दीपं गृहाण देवेश त्रैलोक्यतिमिरापहम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , दीपं दर्शयामि । 🔸 नैवैद्य ॥ शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च , आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवैद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , नैवैद्यं निवेदयामि नानाऋतुफलानि च समर्पयामि , आचमनीयं जलं समर्पयामि । 🔸ताम्बूल ॥ पूगीफलं महद्दिव्यम् नागवल्लीदलैर्युतम् एलालवङ्ग संयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम् ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , ताम्बूलं समर्पयामि । 🔸दक्षिण ॥ हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , कृतायाः पूजायाः सद् गुण्यार्थे द्रव्यदक्षिणां समर्पयामि । 🔸 आरती ॥ कदलीगर्भसम्भूतं कर्पूरं तु प्रदीपितम् , आरार्तिकमहं कुर्वे पश्य मां वरदो भव ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , आरार्तिकं समर्पयामि । 🔸 मन्त्रपुष्पाञ्जलि ॥ नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोद् भवानि च पुष्पाञ्जलिर्मया दत्तो गृहान परमेश्वर ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , मन्त्रपुष्पाञ्जलिम् समर्पयामि । 🔸प्रदक्षिणा ॥ यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च , तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , प्रदक्षिणां समर्पयामि । 🔸नमस्कार ॥ नमः सर्वहितार्थाय जगदाधारहेतवे साष्टाङ्गोऽयं प्रणामस्ते प्रयत्नेन मया कृतः ॥ भगवते श्री साम्बसदाशिवाय नमः , नमस्कारान समर्पयामि । ♦️🔸अब रुद्राक्ष की माला से महामृत्युंजय मंत्र का जाप अपनी सुविधानुसार करें । 🔸♦️ 🔸जप समर्पण ( दाहिने हाथ में जल लेकर मंत्र बोलें एवं जमीन पर छोड़ दें ) ॥ ॐ गुह्यातिगुह्य गोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपं , सिद्धिर्भवतु मं देव त्वत् प्रसादान्महेश्वर ॥ 🔸क्षमा याचना मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन ,यत्युजितं मया देव परिपूर्ण तदस्तु मे आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् , पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम , तस्मात् कारुण्यभावेन रक्ष मां परमेश्वर ( इन मन्त्रों का श्रद्धापूर्वक उच्चारण कर अपनी विवस्ता एवं त्रुटियों के लिये क्षमा – याचना करें ) ना तो मैं आवाहन करना जानता हूँ , ना विसर्जन करना जानता हूँ और ना पूजा करना हीं जानता हूँ । हे परमात्मा क्षमा करें । हे परमात्मा मैंने जो मंत्रहीन , क्रियाहीन और भक्तिहीन पूजन किया है , वह सब आपकी दया से पूर्ण हो । 💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥 ॐ तत्सद् ब्रह्मार्पणमस्त

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