M.S.Chauhan May 17, 2021

*शुभ रात्रि वंदन* *जय श्रीकृष्ण गोविंद* *👉एक कहानी जीवन की* *💐पैसे का जादू💐* !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! 👉 राजा चंद्रभान विद्वानों का बड़ा आदर-सम्मान किया करते थे एक दिन उनकी सभा में कहीं से कष्ट पीड़ित एक पंडित आया.. राजा ने उसको बहुत उदास तथा चिंतित मुद्रा में देखकर कुशलता पूछी, तब पंडित ने एक श्लोक में अपना सारा दु:ख कह सुनाया जिस श्लोक का अर्थ इस प्रकार था – “ राजन ! मेरी मां न तो मुझसे प्रसन्न होती है और न मेरी पत्नी से और मेरी पत्नी भी न तो मुझसे प्रसन्न होती है और ना ही मेरी मां से तथा साथ ही मैं भी न तो अपनी मां से प्रसन्न रहता हूं और ना ही अपनी पत्नी से बताइए इसमें किसका दोष है महाराज समझ गये कि पंडित के घर में नित्य कलह रहती है और इसके घर में कोई भी किसी से प्रसन्न नहीं रहता इसलिए यह पंडित दु:खी है महाराज ने मन में सोचा “ अवश्य ही पंडित के घर में बड़ी गरीबी होगी गरीबी में आपसी प्रेम सहानुभूति बिल्कुल नहीं रह जाती और छोटी-छोटी बातों को लेकर झगड़े होते रहते हैं और एक-दूसरे पर दोषारोपण करते हैं यदि पंडित के घर में सब को खाने-पीने का सुख होता तो कोई किसी से असंतुष्ट क्यों रहता धन का अभाव ही सबकी अप्रसन्नता और विरक्ति का एकमात्र कारण है राजा ने रोग को ठीक से पहचानकर उसकी ठीक औषधि दे दी उससे पंडित के घर का रोग सचमुच निर्मल हो गया महाराज से धन लेकर पंडित थैली खनखाता हुआ अपने घर लौटा पहले जब वह बाहर से खाली हाथ आता था तब घर में कोई उसे पूछता भी नहीं था, किंतु इस बार तो वह खूब पैसे कमाकर मालदार हो गया था उसका आदर-सत्कार घर के अंदर क्यों न होता पत्नी ने दौड़कर उसका स्वागत किया और बड़े प्रेम से पूछा – “ कहां चले गए थे मैं तुम्हारे मोह में व्याकुल दिन-रात तुम्हारी राह देखती रहती थी इसके बाद मां ने बहू से कहा – “ बहुरानी ला में पंखा चलाती हूं, तो दौड़कर जल्दी हाथ-मुँह में धोने के लिए पानी ले आ फिर जल्दी चूल्हा जलाकर कुछ खाने को बना दे पत्नी ने बड़ी प्रसन्नता से कहा – “अभी पकाती हूं, माँ जी अपने परिवार में पंडित ने ऐसा सद्भाव और प्रेम व्यवहार पहले कभी नहीं देखा था उस दिन से पहले तो वे आपस में सीधे मुंह बात भी नहीं किया करते थे मां-बेटे, पति-पत्नी और सास-बहू में बात-बात पर कहासुनी होती रहती थी घर में सबका मुंह लटका हुआ, फूला हुआ ही मिलता था लेकिन अब तो सब स्वभाव स्वरूप प्रसन्न लगते थे पैसे ने पंडित के घर की कलह दूर कर दी थी। सीख-सच है कि यदि घर में पैसा ना हो तो अवश्य ही घर के अंदर झगड़े होते हैं। यहां तक कि यदि बेटे के पास पैसे नहीं है, तो उसके मां बाप बेटे से सीधे मुंह बात करने को राजी नहीं होते। इसलिए यदि घर के अंदर अच्छा सामंजस्य बनाना है तो पैसे पर्याप्त मात्रा में अवश्य होने चाहिए। यह शिक्षा सिर्फ इसी कहानी तक ही लागू होती है। वरना मां बाप का प्यार तो अमूल्य होता है, चाहे बेटे के पास पैसे हो या ना हो उनका प्यार सदैव एक जैसा ही रहता है। 🌷🌼💖🙏💖🌼🌷

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M.S.Chauhan May 17, 2021

*कोरोना संक्रमण के भय और लॉकडाउन की बजह से हम सब अपने घरों में बंद हैं ,आज घर दुकान बाजार चर्च मस्जिद और मन्दिर सभी बंद है, हम सब बहुत परेशान हैं!* *डोरवेल बहुत ही संकोच में बजाई गयी थी तो मैं चौंका। कौन होगा दाई नौकर ड्राइवर और धोबी दादा सब्जी वाला सबकी डोरवेल बजाने की स्टाइल अलग ही होती है । वैसे भी 45 दिन से अधिक चल रहे अज्ञातवास में न कोई दोस्त आ रहे न कोई रिश्तेदार।* *गेट पर जाकर देखा तो मोहल्ला के मंदिर के पुजारी वयोवृद्ध पंडित जी खड़े थे । चरण स्पर्श भी नहीं कर सकते थे सो दूर से ही करबद्ध सादर प्रणाम किया । उन्होंने आशीर्वाद दिया । पुराने किन्तु साफ सूथरे थैले से प्रसाद निकाल कर दिया । प्रसाद कागज़ में लपेटकर दिया। हम दोनों मुँह में गमछा लपेटे एक दूसरे को देख रहे थे । पंडित जी ने कहा कि अक्षय तृतीया भी व्यतीत हो गयी आज मंगलवार था आप नहीं आए।* *हमने वर्तमान परिस्थिति स्पष्ट करते हुये समझाना चाहा कि स्थिति आप देख ही रहे हैं । अब तो भगवान जब सब ठीक ठाक करेंगे तभी आना होगा!* *तभी पंडित जी ने मुँह से अपना गमछा हटाया वे धीरेधीरे सुबकते हुये रो रहे थे। बोलने लगे कि आप लोगों के दान और चढ़ावे से ही मेरे परिवार का भरणपोषण होता है।एक महीने से सब बंद है। भूखों मरने की नौबत है ।* *हमलोगों के लिए अन्य कोई व्यवस्था नहीं है* *हमें भूख नहीं लगती है क्या* *हम भी धार्मिक मजदूर ही तो हैं ।* *हम उद्विग्न हो उठे । अपने परिवार को कोरोना से सुरक्षित रखने की चिंताओं के बीच इनकी चिंता ही हमें नहीं रही । हमने उन्हें शाब्दिक सान्त्वना देते हुये घर के अंदर आने का आग्रह किया । सूखे कपोलों में ढलके आँसू पोंछते हुये पंडित जी ने स्वल्पाहार लेने से मना कर दिया बोले घर में सब भूखे बैठे हैं मैं कैसे खा लूँ* *धर्मवाहकों का भी ध्यान रखें । मदरसों के मौलवियों की तरह कोई सरकार इन्हें वेतन नहीं देती!* 🌷🌷🌼🙏🌼🌷🌷

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M.S.Chauhan May 16, 2021

*जय श्री जगन्नाथ जी* *तुलसीदास जी को भगवान के साक्षात दर्शन"* ✍ *एक बार तुलसीदास जी महाराज को किसी ने बताया की जगन्नाथ जी मैं तो साक्षात भगवान ही दर्शन देते हैं बस फिर क्या था सुनकर तुलसीदास जी महाराज तो बहुत ही प्रसन्न हुए और अपने इष्टदेव का दर्शन करने श्रीजगन्नाथपुरी को चल दिए।* *महीनों की कठिन और थका देने वाली यात्रा के उपरांत जब वह जगन्नाथ पुरी पहुंचे तो मंदिर में भक्तों की भीड़ देख कर प्रसन्नमन से अंदर प्रविष्ट हुए।* *जगन्नाथ जी का दर्शन करते ही उन्हें बड़ा धक्का सा लगा वह निराश हो गये। और विचार किया कि यह हस्तपादविहीन देव हमारे जगत में सबसे सुंदर नेत्रों को सुख देने वाले मेरे इष्ट श्री राम नहीं हो सकते।* *इस प्रकार दुखी मन से बाहर निकल कर दूर एक वृक्ष के तले बैठ गये। सोचा कि इतनी दूर आना ब्यर्थ हुआ। क्या गोलाकार नेत्रों वाला हस्तपादविहीन दारुदेव मेरा राम हो सकता है? कदापि नहीं।* *रात्रि हो गयी, थके-माँदे, भूखे-प्यासे तुलसी का अंग टूट रहा था।* *अचानक एक आहट हुई। वे ध्यान से सुनने लगे। अरे बाबा ! तुलसीदास कौन है.? एक बालक हाथों में थाली लिए पुकार रहा था।* *आपने सोचा साथ आए लोगों में से शायद किसी ने पुजारियों को बता दिया होगा कि तुलसीदास जी भी दर्शन करने को आए हैं, इसलिये उन्होने प्रसाद भेज दिया होगा आप उठते हुए बोले - 'हाँ भाई ! मैं ही हूँ तुलसीदास!* *बालक ने कहा, 'अरे ! आप यहाँ हैं। मैं बड़ी देर से आपको खोज रहा हूँ।* *बालक ने कहा -'लीजिए, जगन्नाथ जी ने आपके लिए प्रसाद भेजा है।* *तुलसीदास बोले -- भैया कृपा करके इसे बापस ले जायें। बालक ने कहा, आश्चर्य की बात है, "जगन्नाथ का भात-जगत पसारे हाथ" और वह भी स्वयं महाप्रभु ने भेजा और आप अस्वीकार कर रहे हैं। कारण..............?* *तुलसीदास बोले, 'अरे भाई ! मैं बिना अपने इष्ट को भोग लगाये कुछ ग्रहण नहीं करता। फिर यह जगन्नाथ का जूठा प्रसाद जिसे मैं अपने इष्ट को समर्पित न कर सकूँ, यह मेरे किस काम का.?' बालक ने मुस्कराते हुए कहा अरे, बाबा ! आपके इष्ट ने ही तो भेजा है।* *तुलसीदास बोले - यह हस्तपादविहीन दारुमूर्ति मेरा इष्ट नहीं हो सकता।* *बालक ने कहा कि फिर आपने अपने श्रीरामचरितमानस में यह किस रूप का वर्णन किया है --* *"बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।* *कर बिनु कर्म करइ बिधि नाना॥* *आनन रहित सकल रस भोगी।* *बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥"* *अब तुलसीदास की भाव-भंगिमा देखने लायक थी। नेत्रों में अश्रु-बिन्दु, मुख से शब्द नहीं निकल रहे थे। थाल रखकर बालक यह कहकर अदृश्य हो गया कि मैं ही तुम्हारा राम हूँ। मेरे मंदिर के चारों द्वारों पर हनुमान का पहरा है। विभीषण नित्य मेरे दर्शन को आता है। कल प्रातः तुम भी आकर दर्शन कर लेना।* *तुलसीदास जी की स्थिति ऐसी की रोमावली रोमांचित थी, नेत्रों से अस्त्र अविरल बह रहे थे, और शरीर की कोई सुध ही नहीं उन्होंने बड़े ही प्रेम से प्रसाद ग्रहण किया।* *प्रातः मंदिर में जब तुलसीदास जी महाराज दर्शन करने के लिए गए तब उन्हें जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के स्थान पर श्री राम, लक्ष्मण एवं जानकी के भव्य दर्शन हुए। भगवान ने भक्त की इच्छा पूरी की।* *जिस स्थान पर तुलसीदास जी ने रात्रि व्यतीत की थी, वह स्थान 'तुलसी चौरा' नाम से विख्यात हुआ। वहाँ पर तुलसीदास जी की पीठ 'बड़छता मठ' के रूप में प्रतिष्ठित है।* *💎"जय श्री राधे राधे👏💝* *🌻जय श्री जगन्नाथ🌻*

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