Mahesh Sharma Jun 3, 2021

ठाकुरजी की सेवा एक सासु माँ और बहू थी। सासु माँ हर रोज ठाकुर जी पूरे नियम और श्रद्धा के साथ सेवा करती थी। 🐾 एक दिन शरद रितु मेँ सासु माँ को किसी कारण वश शहर से बाहर जाना पडा। 🐾 सासु माँ ने विचार किया के ठाकुर जी को साथ ले जाने से रास्ते मेँ उनकी सेवा-पूजा नियम से नहीँ हो सकेँगी। सासु माँ ने विचार किया के ठाकुर जी की सेवा का कार्य अब बहु को देना पड़ेगा लेकिन बहु को तो कोई अक्कल है ही नहीँ के ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी हैँ। सासु माँ ने बहु ने बुलाया ओर समझाया के ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी है। कैसे ठाकुर जी को लाड लडाना है। सासु माँ ने बहु को समझाया के बहु मैँ यात्रा पर जा रही हूँ और अब ठाकुर जी की सेवा पूजा का सारा कार्य तुमको करना है। सासु माँ ने बहु को समझाया देख ऐसे तीन बार घंटी बजाकर सुबह ठाकुर जी को जगाना। फिर ठाकुर जी को मंगल भोग कराना। फिर ठाकुर जी स्नान करवाना। ठाकुर जी को कपड़े पहनाना। फिर ठाकुर जी का श्रृंगार करना ओर फिर ठाकुर जी को दर्पण दिखाना। दर्पण मेँ ठाकुर जी का हंस्ता हुआ मुख देखना बाद मेँ ठाकुर जी राजभोग लगाना। इस तरह सासु माँ बहु को सारे सेवा नियम समझाकर यात्रा पर चली गई। अब बहु ने ठाकुर जी की सेवा कार्य उसी प्रकार शुरु किया जैसा सासु माँ ने समझाया था। ठाकुर जी को जगाया नहलाया कपड़े पहनाये श्रृंगार किया और दर्पण दिखाया। सासु माँ ने कहा था की दर्पण मेँ ठाकुर जी का हस्ता हुआ देखकर ही राजभोग लगाना। दर्पण मेँ ठाकुर जी का हस्ता हुआ मुख ना देखकर बहु को बड़ा आश्चर्य हुआ। बहु ने विचार किया शायद मुझसे सेवा मेँ कही कोई गलती हो गई हैँ तभी दर्पण मे ठाकुर जी का हस्ता हुआ मुख नहीँ दिख रहा। बहु ने फिर से ठाकुर जी को नहलाया श्रृंगार किया दर्पण दिखाया। लेकिन ठाकुर जी का हस्ता हुआ मुख नहीँ दिखा। बहु ने फिर विचार किया की शायद फिर से कुछ गलती हो गई। बहु ने फिर से ठाकुर जी को नहलाया श्रृंगार किया दर्पण दिखाया। जब ठाकुर जी का हस्ता हुआ मुख नही दिखा बहु ने फिर से ठाकुर जी को नहलाया । ऐसे करते करते बहु ने ठाकुर जी को 12 बार स्नान किया। हर बार दर्पण दिखाया मगर ठाकुर जी का हस्ता हुआ मुख नहीँ दिखा। अब बहु ने 13वी बार फिर से ठाकुर जी को नहलाने की तैयारी की। अब ठाकुर जी ने विचार किया की जो इसको हस्ता हुआ मुख नहीँ दिखा तो ये तो आज पूरा दिन नहलाती रहेगी। अब बहु ने ठाकुर जी को नहलाया कपड़े पहनाये श्रृंगार किया और दर्पण दिखाया। अब बहु ने जैसे ही ठाकुर जी को दर्पण दिखाया तो ठाकुर जी अपनी मनमोहनी मंद मंद मुस्कान से हंसे। बहु को संतोष हुआ की अब ठाकुर जी ने मेरी सेवा स्वीकार करी। अब यह रोज का नियम बन गया ठाकुर जी रोज हंसते। सेवा करते करते अब तो ऐसा हो गया के बहु जब भी ठाकुर जी के कमरे मेँ जाती बहु को देखकर ठाकुर जी हँसने लगते। कुछ समय बाद सासु माँ वापस आ गई। सासु माँ ने ठाकुर जी से कहा की प्रभु क्षमा करना अगर बहु से आपकी सेवा मेँ कोई कमी रह गई हो तो अब मैँ आ गई हूँ आपकी सेवा पूजा बड़े ध्यान से करुंगी। तभी सासु माँ ने देखा की ठाकुर जी हंसे और बोले की मैय्या आपकी सेवा भाव मेँ कोई कमी नहीँ हैँ आप बहुत सुंदर सेवा करती हैँ लेकिन मैय्या दर्पण दिखाने की सेवा तो आपकी बहु से ही करवानी है... *कहानी का सार :* पूजा पाठ तो हर कोई कर लेता है लेकिन मन में ईश्वर के प्रति निस्वार्थ प्रेम भाव हो, मन में क्षण मात्र भी मोह और स्वार्थ न हो, मन साफ, सहज और सरल हो, और ईश्वर पर पक्का विश्वास हो, जैसे मीराबाई, करमा बाई, सूरदास जी का ईश्वर के प्रति भक्ति से ज्यादा पूर्ण विश्वास था। ऐसे भक्तों को दर्शन देने के लिए भगवान स्वयं भक्त के पास चले आते हैं। *बोलो जय श्री कृष्णा* 🙏🌹🙏🌹🙏

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Mahesh Sharma May 25, 2021

*रामायण का एक प्रेरणादायक प्रसंग* *सुबह मेघनाथ से लक्ष्म ण का अंतिम युद्ध होने वाला था। वह मेघनाथ जो अब तक अविजित था। जिसकी भुजाओं के बल पर रावण युद्ध कर रहा था। अप्रितम योद्धा ! जिसके पास सभी दिव्यास्त्र थे।* *सुबह लक्ष्मण जी , भगवान राम से आशीर्वाद लेने गये।* *उस समय भगवान राम पूजा कर रहे थे !* *पूजा समाप्ति के पश्चात प्रभु श्री राम ने हनुमानजी से पूछा अभी कितना समय है युद्ध होने में?* *हनुमानजी ने कहा कि अभी कुछ समय है! यह तो प्रातःकाल है।* *भगवान राम ने लक्ष्मण जी से कहा ! यह पात्र लो भिक्षा मांगकर लाओ , जो पहला व्यक्ति मिले उसी से कुछ अन्न मांग लेना।* *सभी बड़े आश्चर्य में पड़ गये। आशीर्वाद की जगह भिक्षा! लेकिन लक्ष्मण जी को जाना ही था।* *लक्ष्मण जी जब भिक्षा मांगने के लिए निकले तो उन्हें सबसे पहले रावण का सैनिक मिल गया! आज्ञा अनुसार मांगना ही था। यदि भगवान की आज्ञा न होती तो उस सैनिक को लक्ष्मण जी वहीं मार देते। परंतु वे उससे भिक्षा मांगते हैं।* *सैनिक ने अपनी रसद से लक्ष्मण जी को कुछ अन्न दे दिए।* *लक्ष्मण जी वह अन्न लेकर भगवान राम को अर्पित कर दिए।* *तत्पश्चात भगवान राम ने उन्हें आशीर्वाद दिया...विजयी भवः।* *भिक्षा का मर्म किसी के समझ नहीं आया ! कोई पूछ भी नहीं सकता था... फिर भी यह प्रश्न तो रह ही गया।* *फ़िर भीषण युद्ध हुआ!* *अंत मे मेघनाथ ने त्रिलोक कि अंतिम शक्तियों को लक्ष्मण जी पर चलाया। ब्रह्मास्त्र , पशुपात्र , सुदर्शन चक्र ! इन अस्त्रों कि कोई काट न थी।* *लक्ष्मण जी सिर झुकाकर इन अस्त्रों को प्रणाम किए। सभी अस्त्र उनको आशीर्वाद देकर वापस चले गए।* *उसके बाद राम का ध्यान करके लक्ष्मण जी ने मेघनाथ पर बाण चलाया ! वह हँसने लगा और उसका सिर कटकर जमीन पर गिर गया। उसकी मृत्यु हो गई।* *उसी दिन सन्ध्याकालीन समय भगवान राम शिव की आराधना कर रहे थे। वह प्रश्न तो अबतक रह ही गया था। हनुमानजी ने पूछ लिया! प्रभु वह भिक्षा का मर्म क्या है ?* *भगवान मुस्कराने लगे , बोले मैं लक्ष्मण को जानता हूँ....वह अत्यंत क्रोधी है।लेकिन युद्ध में बहुत ही विन्रमता कि आवश्यकता पड़ती है! विजयी तो वही होता है जो विन्रम हो। मैं जानता था मेघनाथ! ब्रह्मांड कि चिंता नहीं करेगा। वह युद्ध जीतने के लिये दिव्यास्त्रों का प्रयोग करेगा! इन अमोघ शक्तियों के सामने विन्रमता ही काम कर सकती थी। इसलिये मैंने लक्ष्मण को सुबह झुकना बताया!एक वीर शक्तिशाली व्यक्ति जब भिक्षा मांगेगा तो विन्रमता स्वयं प्रवाहित होगी। लक्ष्मण ने मेरे नाम से बाण छोड़ा था ...यदि मेघनाथ उस बाण के सामने विन्रमता दिखाता तो मैं भी उसे क्षमा कर देता।* *भगवान श्रीरामचन्द्र जी एक महान राजा के साथ अद्वितीय सेनापति भी थे। युद्धकाल में विन्रमता शक्ति संचय का भी मार्ग है ! वीर पुरुष को शोभा भी देता है।इसलिए किसी भी बड़े धर्म युद्ध में विजय प्राप्ति के लिए विनम्रता औऱ धैर्य का होना अत्यंत आवश्यक है.*..... *रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा भी है.*.................. *धीरज धर्म मित्र अरु नारी...* *आपद काल परिखिअहिं चारी...!!* *।। जय सियाराम ।।* *।। जय जय हनुमान ।।* 🙏🙏🌹🙏🙏

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Mahesh Sharma May 25, 2021

*रामायण का एक प्रेरणादायक प्रसंग* *सुबह मेघनाथ से लक्ष्म ण का अंतिम युद्ध होने वाला था। वह मेघनाथ जो अब तक अविजित था। जिसकी भुजाओं के बल पर रावण युद्ध कर रहा था। अप्रितम योद्धा ! जिसके पास सभी दिव्यास्त्र थे।* *सुबह लक्ष्मण जी , भगवान राम से आशीर्वाद लेने गये।* *उस समय भगवान राम पूजा कर रहे थे !* *पूजा समाप्ति के पश्चात प्रभु श्री राम ने हनुमानजी से पूछा अभी कितना समय है युद्ध होने में?* *हनुमानजी ने कहा कि अभी कुछ समय है! यह तो प्रातःकाल है।* *भगवान राम ने लक्ष्मण जी से कहा ! यह पात्र लो भिक्षा मांगकर लाओ , जो पहला व्यक्ति मिले उसी से कुछ अन्न मांग लेना।* *सभी बड़े आश्चर्य में पड़ गये। आशीर्वाद की जगह भिक्षा! लेकिन लक्ष्मण जी को जाना ही था।* *लक्ष्मण जी जब भिक्षा मांगने के लिए निकले तो उन्हें सबसे पहले रावण का सैनिक मिल गया! आज्ञा अनुसार मांगना ही था। यदि भगवान की आज्ञा न होती तो उस सैनिक को लक्ष्मण जी वहीं मार देते। परंतु वे उससे भिक्षा मांगते हैं।* *सैनिक ने अपनी रसद से लक्ष्मण जी को कुछ अन्न दे दिए।* *लक्ष्मण जी वह अन्न लेकर भगवान राम को अर्पित कर दिए।* *तत्पश्चात भगवान राम ने उन्हें आशीर्वाद दिया...विजयी भवः।* *भिक्षा का मर्म किसी के समझ नहीं आया ! कोई पूछ भी नहीं सकता था... फिर भी यह प्रश्न तो रह ही गया।* *फ़िर भीषण युद्ध हुआ!* *अंत मे मेघनाथ ने त्रिलोक कि अंतिम शक्तियों को लक्ष्मण जी पर चलाया। ब्रह्मास्त्र , पशुपात्र , सुदर्शन चक्र ! इन अस्त्रों कि कोई काट न थी।* *लक्ष्मण जी सिर झुकाकर इन अस्त्रों को प्रणाम किए। सभी अस्त्र उनको आशीर्वाद देकर वापस चले गए।* *उसके बाद राम का ध्यान करके लक्ष्मण जी ने मेघनाथ पर बाण चलाया ! वह हँसने लगा और उसका सिर कटकर जमीन पर गिर गया। उसकी मृत्यु हो गई।* *उसी दिन सन्ध्याकालीन समय भगवान राम शिव की आराधना कर रहे थे। वह प्रश्न तो अबतक रह ही गया था। हनुमानजी ने पूछ लिया! प्रभु वह भिक्षा का मर्म क्या है ?* *भगवान मुस्कराने लगे , बोले मैं लक्ष्मण को जानता हूँ....वह अत्यंत क्रोधी है।लेकिन युद्ध में बहुत ही विन्रमता कि आवश्यकता पड़ती है! विजयी तो वही होता है जो विन्रम हो। मैं जानता था मेघनाथ! ब्रह्मांड कि चिंता नहीं करेगा। वह युद्ध जीतने के लिये दिव्यास्त्रों का प्रयोग करेगा! इन अमोघ शक्तियों के सामने विन्रमता ही काम कर सकती थी। इसलिये मैंने लक्ष्मण को सुबह झुकना बताया!एक वीर शक्तिशाली व्यक्ति जब भिक्षा मांगेगा तो विन्रमता स्वयं प्रवाहित होगी। लक्ष्मण ने मेरे नाम से बाण छोड़ा था ...यदि मेघनाथ उस बाण के सामने विन्रमता दिखाता तो मैं भी उसे क्षमा कर देता।* *भगवान श्रीरामचन्द्र जी एक महान राजा के साथ अद्वितीय सेनापति भी थे। युद्धकाल में विन्रमता शक्ति संचय का भी मार्ग है ! वीर पुरुष को शोभा भी देता है।इसलिए किसी भी बड़े धर्म युद्ध में विजय प्राप्ति के लिए विनम्रता औऱ धैर्य का होना अत्यंत आवश्यक है.*..... *रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा भी है.*.................. *धीरज धर्म मित्र अरु नारी...* *आपद काल परिखिअहिं चारी...!!* *।। जय सियाराम ।।* *।। जय जय हनुमान ।।* 🙏🙏🌹🙏🙏

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