Mahesh Bhargava Aug 20, 2019

सुखद परिवार ✍️✍️✍️ एक सुनार से लक्ष्मी जी रूठ गई । जाते वक्त बोली मैं जा रही हूँ...और... मेरी जगह नुकसान आ रहा है । तैयार हो जाओ। लेकिन मै तुम्हे अंतिम भेट जरूर देना चाहती हूँ। मांगो जो भी इच्छा हो।👏 सुनार बहुत समझदार था। उसने 🙏 विनती की नुकसान आए तो आने दो । लेकिन उससे कहना की मेरे परिवार में आपसी प्रेम बना रहे। 🤔बस मेरी यही इच्छा है। लक्ष्मी जी ने तथास्तु कहा। कुछ दिन के बाद :- सुनार की सबसे छोटी बहू खिचड़ी बना रही थी। उसने नमक आदि डाला और अन्य काम करने लगी। तब दूसरे लड़के की बहू आई और उसने भी बिना चखे नमक डाला और चली गई। इसी प्रकार तीसरी, चौथी बहुएं आई और नमक डालकर चली गई ।💐 उनकी सास ने भी ऐसा किया।💐शाम को सबसे पहले सुनार आया। पहला निवाला मुह में लिया। देखा बहुत ज्यादा नमक है।लेकिन वह समझ गया नुकसान (हानि) आ चुका है। चुपचाप खिचड़ी खाई और चला गया। इसके बाद बङे बेटे का नम्बर आया। पहला निवाला मुह में लिया। पूछा पिता जी ने खाना खा लिया क्या कहा उन्होंने ? सभी ने उत्तर दिया :- " हाँ खा लिया, कुछ नही बोले।" अब लड़के ने सोचा जब पिता जी ही कुछ नही बोले तो मै भी चुपचाप खा लेता हूँ। इस प्रकार घर के अन्य सदस्य एक -एक आए। पहले वालो के बारे में पूछते और.. चुपचाप खाना खा कर चले गए।रात को नुकसान (हानि) हाथ जोड़कर सुनार से कहने लगा : - "मै जा रहा हूँ।" सुनार ने पूछा :- क्यों ? तब नुकसान (हानि ) कहता है, " आप लोग एक किलो तो नमक खा गए । लेकिन बिलकुल भी झगड़ा नही हुआ। मेरा यहाँ कोई काम नहीं।"💐💐💐👏👏👏 *निचोङ* ⭐झगड़ा कमजोरी , हानि , नुकसान की पहचान है। 👏जहाँ प्रेम है , वहाँ लक्ष्मी का वास है। 🔃सदा प्यार - प्रेम बांटते रहे। छोटे -बङे की कदर करे जो बङे हैं , वो बङे ही रहेंगे ।चाहे आपकी कमाई उसकी कमाई से बङी हो। 🙏🙏🙏🙏 *- Զเधे Զเधे अच्छे के साथ अच्छे बनें ,*पर बुरे के साथ बुरे नहीं।*....क्योंकि -* 🔰 *हीरे से हीरा तो तराशा जा* सकता है लेकिन कीचड़ से *कीचड़ साफ नहीं किया*जा सकता ।*

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Mahesh Bhargava Aug 20, 2019

*रामायण कथा का एक अंश* जिससे हमें *सीख* मिलती है *"एहसास"* की... 📝📝श्री राम, लक्ष्मण एवम् सीता' मैया* चित्रकूट पर्वत की ओर जा रहे थे, राह बहुत *पथरीली और कंटीली* थी ! कि यकायक *श्री राम* के चरणों मे *कांटा* चुभ गया ! श्रीराम *रूष्ट या क्रोधित* नहीं हुए, बल्कि हाथ जोड़कर धरती माता से *अनुरोध* करने लगे ! बोले- "माँ, मेरी एक *विनम्र प्रार्थना* है आपसे, क्या आप *स्वीकार* करेंगी ?" *धरती* बोली- "प्रभु प्रार्थना नहीं, आज्ञा दीजिए !" प्रभु बोले, "माँ, मेरी बस यही विनती है कि जब भरत मेरी खोज मे इस पथ से गुज़रे, तो आप *नरम* हो जाना ! कुछ पल के लिए अपने आँचल के ये पत्थर और कांटे छुपा लेना ! मुझे कांटा चुभा सो चुभा, पर मेरे भरत के पाँव मे *आघात* मत करना" श्री राम को यूँ व्यग्र देखकर धरा दंग रह गई ! पूछा- "भगवन, धृष्टता क्षमा हो ! पर क्या भरत आपसे अधिक सुकुमार हैं ? जब आप इतनी सहजता से सब सहन कर गए, तो क्या कुमार भरत सहन नही कर पाँएगें ? फिर उनको लेकर आपके चित में ऐसी *व्याकुलता* क्यों ?" *श्री राम* बोले- "नहीं...नहीं माते, आप मेरे कहने का अभिप्राय नही समझीं ! भरत को यदि कांटा चुभा, तो वह उसके पाँव को नहीं, उसके *हृदय* को विदीर्ण कर देगा !" *"हृदय विदीर्ण* !! ऐसा क्यों प्रभु ?", *धरती माँ* जिज्ञासा भरे स्वर में बोलीं ! "अपनी पीड़ा से नहीं माँ, बल्कि यह सोचकर कि...इसी *कंटीली राह* से मेरे भैया राम गुज़रे होंगे और ये *शूल* उनके पगों मे भी चुभे होंगे ! मैया, मेरा भरत कल्पना मे भी मेरी *पीड़ा* सहन नहीं कर सकता, इसलिए उसकी उपस्थिति मे आप *कमल पंखुड़ियों सी कोमल* बन जाना..!!" अर्थात *रिश्ते* अंदरूनी एहसास, आत्मीय अनुभूति के दम पर ही टिकते हैं । जहाँ *गहरी आत्मीयता* नही, वो रिश्ता शायद नही परंतु *दिखावा* हो सकता है । 🔰🔰 इसीलिए कहा गया है कि... *रिश्ते*खून से नहीं, *परिवार* से नही, *मित्रता* से नहीं, *व्यवहार* से नहीं, बल्कि... सिर्फ और सिर्फ *आत्मीय "एहसास"* से ही बनते और *निर्वहन* किए जाते हैं। जहाँ *एहसास* ही नहीं, *आत्मीयता* ही नहीं .. वहाँ *अपनापन* कहाँ से आएगा l 🍃🍂🍃🍂🍃

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Mahesh Bhargava Aug 19, 2019

कर्म ही असली भाग्य है* धीरे धीरे पढिये पसंद आएगा... 📝1👌मुसीबत में अगर मदद मांगो तो सोच कर मागना क्योंकि मुसीबत थोड़ी देर की होती है और एहसान जिंदगी भर का..... 2👌कल एक इन्सान रोटी मांगकर ले गया और करोड़ों कि दुआयें दे गया, पता ही नहीँ चला की, गरीब वो था की मैं.... 3👌जिस घाव से खून नहीं निकलता, समझ लेना वो ज़ख्म किसी अपने ने ही दिया है.. 4👌बचपन भी कमाल का था खेलते खेलते चाहें छत पर सोयें या ज़मीन पर, आँख बिस्तर पर ही खुलती थी... 5👌खोए हुए हम खुद हैं, और ढूंढते भगवान को हैं... 6👌अहंकार दिखा के किसी रिश्ते को तोड़ने से अच्छा है कि माफ़ी मांगकर वो रिश्ता निभाया जाये.... 7👌जिन्दगी तेरी भी अजब परिभाषा है.. सँवर गई तो जन्नत, नहीं तो सिर्फ तमाशा है... 8👌खुशीयाँ तकदीर में होनी चाहिये, तस्वीर मे तो हर कोई मुस्कुराता है... 9👌ज़िंदगी भी वीडियो गेम सी हो गयी है एक लेवल क्रॉस करो तो अगला लेवल और मुश्किल आ जाता हैं..... 10👌इतनी चाहत तो लाखों रुपये पाने की भी नही होती, जितनी बचपन की तस्वीर देखकर बचपन में जाने की होती है....... 11👌हमेशा छोटी छोटी गलतियों से बचने की कोशिश किया करो, क्योंकि इन्सान पहाड़ो से नहीं पत्थरों से ठोकर खाता है.. ​मनुष्य का अपना क्या है ?​ ​जन्म :-​ दुसरो ने दिया ​नाम :-​ दुसरो ने रखा ​शिक्षा :-​ दुसरो ने दी ​रोजगार :-​ दुसरो ने दिया और ​शमशान :-​ दुसरे ले जाएंगे तो व्यर्थ में घमंड किस बात पर करते है लोग 👏

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Mahesh Bhargava Aug 18, 2019

एक पंडित जी रामायण कथा सुना रहे थे। लोग आते और आनंद विभोर होकर जाते। पंडित जी का नियम था रोज कथा शुरू करने से पहले "आइए हनुमंत जी बिराजिए" कहकर हनुमान जी का आह्वान करते थे, फिर एक घण्टा प्रवचन करते थे।वकील साहब हर रोज कथा सुनने आते। वकील साहब के भक्तिभाव पर एक दिन तर्कशीलता हावी हो गई। उन्हें लगा कि महाराज रोज "आइए हनुमंत जी बिराजिए" कहते हैं तो क्या हनुमान जी सचमुच आते होंगे! अत: वकील साहब ने पंडित जी से पूछ ही डाला- महाराज जी, आप रामायण की कथा बहुत अच्छी कहते हैं। हमें बड़ा रस आता है परंतु आप जो गद्दी प्रतिदिन हनुमान जी को देते हैं उसपर क्या हनुमान जी सचमुच बिराजते हैं? पंडित जी ने कहा… हाँ यह मेरा व्यक्तिगत विश्वास है कि रामकथा हो रही हो तो हनुमान जी अवश्य पधारते हैं। वकील ने कहा… महाराज ऐसे बात नहीं बनेगी। हनुमान जी यहां आते हैं इसका कोई सबूत दीजिए । आपको साबित करके दिखाना चाहिए कि हनुमान जी आपकी कथा सुनने आते हैं। महाराज जी ने बहुत समझाया कि भैया आस्था को किसी सबूत की कसौटी पर नहीं कसना चाहिए यह तो भक्त और भगवान के बीच का प्रेमरस है, व्यक्तिगत श्रद्घा का विषय है । आप कहो तो मैं प्रवचन करना बंद कर दूँ या आप कथा में आना छोड़ दो। लेकिन वकील नहीं माना, वो कहता ही रहा कि आप कई दिनों से दावा करते आ रहे हैं। यह बात और स्थानों पर भी कहते होंगे,इसलिए महाराज आपको तो साबित करना होगा कि हनुमान जी कथा सुनने आते हैं। इस तरह दोनों के बीच वाद-विवाद होता रहा। मौखिक संघर्ष बढ़ता चला गया। हारकर पंडित जी महाराज ने कहा… हनुमान जी हैं या नहीं उसका सबूत कल दिलाऊंगा। कल कथा शुरू हो तब प्रयोग करूंगा। जिस गद्दी पर मैं हनुमानजी को विराजित होने को कहता हूं आप उस गद्दी को आज अपने घर ले जाना। कल अपने साथ उस गद्दी को लेकर आना और फिर मैं कल गद्दी यहाँ रखूंगा। मैं कथा से पहले हनुमानजी को बुलाऊंगा, फिर आप गद्दी ऊँची उठाना। यदि आपने गद्दी ऊँची कर दी तो समझना कि हनुमान जी नहीं हैं। वकील इस कसौटी के लिए तैयार हो गया। पंडित जी ने कहा… हम दोनों में से जो पराजित होगा वह क्या करेगा, इसका निर्णय भी कर लें ?.... यह तो सत्य की परीक्षा है। वकील ने कहा- मैं गद्दी ऊँची न कर सका तो वकालत छोड़कर आपसे दीक्षा ले लूंगा। आप पराजित हो गए तो क्या करोगे? पंडित जी ने कहा… मैं कथावाचन छोड़कर आपके ऑफिस का चपरासी बन जाऊंगा। अगले दिन कथा पंडाल में भारी भीड़ हुई जो लोग रोजाना कथा सुनने नहीं आते थे,वे भी भक्ति, प्रेम और विश्वास की परीक्षा देखने आए। काफी भीड़ हो गई। पंडाल भर गया। श्रद्घा और विश्वास का प्रश्न जो था। पंडित जी महाराज और वकील साहब कथा पंडाल में पधारे... गद्दी रखी गई। पंडित जी ने सजल नेत्रों से मंगलाचरण किया और फिर बोले "आइए हनुमंत जी बिराजिए" ऐसा बोलते ही पंडित जी के नेत्र सजल हो उठे । मन ही मन पंडित जी बोले… प्रभु ! आज मेरा प्रश्न नहीं बल्कि रघुकुल रीति की पंरपरा का सवाल है। मैं तो एक साधारण जन हूँ। मेरी भक्ति और आस्था की लाज रखना। फिर वकील साहब को निमंत्रण दिया गया आइए गद्दी ऊँची कीजिए। लोगों की आँखे जम गईं । वकील साहब खड़े हुए। उन्होंने गद्दी उठाने के लिए हाथ बढ़ाया पर गद्दी को स्पर्श भी न कर सके ! जो भी कारण रहा, उन्होंने तीन बार हाथ बढ़ाया, किन्तु तीनों बार असफल रहे। पंडित जी देख रहे थे, गद्दी को पकड़ना तो दूर वकील साहब गद्दी को छू भी न सके। तीनों बार वकील साहब पसीने से तर-बतर हो गए। वकील साहब पंडित जी महाराज के चरणों में गिर पड़े और बोले महाराज गद्दी उठाना तो दूर, मुझे नहीं मालूम कि क्यों मेरा हाथ भी गद्दी तक नहीं पहुंच पा रहा है। अत: मैं अपनी हार स्वीकार करता हूँ। कहते है कि श्रद्घा और भक्ति के साथ की गई आराधना में बहुत शक्ति होती है। मानो तो देव नहीं तो पत्थर। प्रभु की मूर्ति तो पाषाण की ही होती है लेकिन भक्त के भाव से उसमें प्राण प्रतिष्ठा होती है तो प्रभु बिराजते है। 🙏💞 श्री राम जी की जय.....💞🙏 🙏🙏जय बजरंगबली की.....

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Mahesh Bhargava Aug 17, 2019

👉🏼इंसान बनने का काढ़ा* *👉🏼यदि आप अच्छे इंसान बनना चाहते है तो निम्नलिखित काढ़े का निर्माण कर स्वयं प्रयोग करे➖☕ *👉🏼1 सच्चाई के पत्ते 1 ग्राम* *2 ईमानदारी की जड़ 3 ग्राम* *3 परोप कार के बीज 5 ग्राम* *4 रहम दिल का छिलका 4 ग्राम* *5 दान शीलता का छिलका 4 ग्राम* *6 स्वदेश प्रेम का रस 3 ग्राम* *7 उदारता का रस 3 ग्राम* *8 सतसंगत का रस 4 ग्राम👌🏻* *👉🏼निर्माण विधि➖👇🏻* *👉🏼👆🏻उपरोक्त बताई गई समस्त वस्तुओ को परमात्मा के बर्तन में एक साथ डालकर स्नेह भाव के चूल्हे पर रख कर प्रेम की अग्नि में धीरे धीरे पकाये। अच्छी तरह पक जाने पर नीचे उतार कर ठंडा करे। फिर शुद्ध मन के कपड़े से छान कर मस्तिष्क की शीशी में भर ले।😊* *👉🏼सेवन विधि➖👇🏻* *👉🏼इसको प्रति दिन संतोष के गुलकंद के साथ इन्साफ के चमच्च में सुबह दोपहर और शाम दिन में तीन बार सेवन करे।👌🏻* *👉🏼परहेज➖🤔👇* *👉🏼😡क्रोध की मिर्च अहंकार का तेल लोभ की मिठाई स्वार्थ का घी धोखे का पापड़। इन सबसे सावधान व दुरा चरण की भावना से बचना है* *👉🏼नोट➖इसका निर्माण प्रत्येक व्यक्ति द्वारा संभव है।😊👌🏻*

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Mahesh Bhargava Aug 15, 2019

सुंदर व्हाट्सएप स्टेटस आप सभी को रक्षाबंधन एवं स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं👏👏रक्षाबंधन_पर_बांधे_वैदिक_रक्षासूत्र...*रक्षासूत्र 🏵मात्र एक धागा🧶 नहीं बल्कि शुभ भावनाओं व शुभ संकल्पों का पुलिंदा है । यही सूत्र 🧶जब वैदिक रीति से बनाया जाता है और भगवन्नाम व भगवद्भाव सहित शुभ संकल्प 🚩 करके बाँधा जाता है तो इसका सामर्थ्य👏 असीम हो जाता है ।* *वैदिक राखी🏵 बनाने के लिए एक छोटा-सा ऊनी🧶, सूती या रेशमी पीले कपड़े का टुकड़ा लें । उसमें :* ```1. दूर्वा 2. अक्षत (साबूत चावल) 3. केसर या हल्दी 4. शुद्ध चंदन 5. सरसों के साबूत दाने ``` *👉 इन पाँच चीजों को मिलाकर कपड़े 🧵में #💌राखी का सन्देश #💐हैप्पी रक्षाबंधन

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