Lalit Mishra Sep 29, 2019

नवरात्रि कलश स्थापना आवश्यक सामग्री जौ बोने के लिए मिटटी का पात्र साफ़ मिट्टी मिटटी का एक छोटा घड़ा कलश को ढकने के लिए मिट्टी का एक ढक्कन गंगा जल सुपारी 1 या 2 रुपए का सिक्का आम की पत्तियां अक्षत / कच्चे चावल मोली / कलावा / रक्षा सूत्र जौ (जवारे) इत्र (वैकल्पिक) फुल और फुल माला नारियल लाल कपडा / लाल चुन्नी दूर्वा घास नवरात्र में कलश स्थापित करने वाले को सबसे पहले पवित्र होने के मंत्र- ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ हाथ में कुश और जल लेकर इस मंत्र को पढ़कर स्वयं को और पूजन सामग्रियों को पवित्र कर लेना चाहिए। इसके बाद दाएं हाथ में अक्षत, फूल, जल, पान, सिक्का और सुपारी लेकर दुर्गा पूजन का संकल्प करना चाहिए। नवरात्र पूजा संकल्प मंत्रः- ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु:, ॐ अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे पुण्य (अपने नगर/गांव का नाम लें) क्षेत्रे बौद्धावतारे वीर विक्रमादित्यनृपते: 2076, तमेऽब्दे परिधावी नाम संवत्सरे दक्षिणायने शरद ऋतो महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे आश्विन मासे शुक्ल पक्षे प्र​तिपदायां तिथौ रवि वासरे (गोत्र का नाम लें) गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुकनामा (अपना नाम लें) सकलपापक्षयपूर्वकं सर्वारिष्ट शांतिनिमित्तं सर्वमंगलकामनया- श्रुतिस्मृत्योक्तफलप्राप्त्यर्थं मनेप्सित कार्य सिद्धयर्थं श्री दुर्गा पूजनं च महं क​रिष्ये। तत्पूर्वागंत्वेन ​निर्विघ्नतापूर्वक कार्य ​सिद्धयर्थं यथा​मिलितोपचारे गणप​ति पूजनं क​रिष्ये। (अगर आप इतना लंबा मंत्र बोलने में कठिनाई महसूस करते हैं तो ‘यथोपलब्धपूजनसामग्रीभिः कार्य सिद्धयर्थं कलशाधिष्ठित देवता सहित, श्री दुर्गा पूजनं महं क​रिष्ये। इस मंत्र से भी संकल्प कर सकते हैं) माता की मूर्ति या तस्वीर के सामने कलश मिट्टी के ऊपर रखकर हाथ में अक्षत, फूल, और गंगाजल लेकर वरुण देवता का आह्वान करना चाहिए। कलश में सर्वऔषधी एवं पंचरत्न डालें। कलश के नीचे रखी मिट्टी में सप्तधान्य और सप्तमृतिका मिलाएं। आम के पत्ते कलश में डालें। कलश के ऊपर एक पात्र में अनाज भरकर इसके ऊपर एक दीप जलाएं। कलश में पंचपल्लव डालें इसके ऊपर लाल वस्त्र लपेटकर एक पानी वाला नारियल रखें। कलश के नीचे मिट्टी में जौ के दानें फैलाएं। देवी का ध्यान करें- खड्गं चक्र गदेषु चाप परिघांछूलं भुशुण्डीं शिर:, शंखं सन्दधतीं करैस्त्रि नयनां सर्वांग भूषावृताम। नीलाश्मद्युतिमास्य पाद दशकां सेवे महाकालिकाम, यामस्तीत स्वपिते हरो कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम॥ इसके बाद गणेशजी और सभी देवी-देवाताओं की पूजा करें। अंत में भगवान शिव और ब्रह्मा जी की पूजा करनी चाहिए। इसके बाद मां भगवती की पूजा करके दुर्गा जी की पूजा पाठ करने चाहिए।

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Lalit Mishra Jul 21, 2019

क्या है रूद्राभिषेक? कैसे किया जाता है? क्यों किया जाता है? पढें भूतभावन भोलेनाथ के पवित्र मास श्रावण में एक उपयोगी एवम विस्तृत प्रस्तुति। रुद्राभिषेक का महत्त्व तथा लाभ भगवान शिव के रुद्राभिषेक से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है साथ ही ग्रह जनित दोषों और रोगों से शीघ्र ही मुक्ति मिल जाती है। रूद्रहृदयोपनिषद अनुसार शिव हैं – सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका: अर्थात् सभी देवताओं की आत्मा में रूद्र उपस्थित हैं और सभी देवता रूद्र की आत्मा हैं। भगवान शंकर सर्व कल्याणकारी देव के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उनकी पूजा,अराधना समस्त मनोरथ को पूर्ण करती है। हिंदू धर्मशास्त्रों के मुताबिक भगवान शिव का पूजन करने से सभी मनोकामनाएं शीघ्र ही पूर्ण होती हैं। भगवान शिव को शुक्लयजुर्वेद अत्यन्त प्रिय है कहा भी गया है वेदः शिवः शिवो वेदः। इसी कारण ऋषियों ने शुकलयजुर्वेदीय रुद्राष्टाध्यायी से रुद्राभिषेक करने का विधान शास्त्रों में बतलाया गया है यथा – यजुर्मयो हृदयं देवो यजुर्भिः शत्रुद्रियैः। पूजनीयो महारुद्रो सन्ततिश्रेयमिच्छता।। शुकलयजुर्वेदीय रुद्राष्टाध्यायी में बताये गये विधि से रुद्राभिषेक करने से विशेष लाभ की प्राप्ति होती है ।जाबालोपनिषद में याज्ञवल्क्य ने कहा – शतरुद्रियेणेति अर्थात शतरुद्रिय के सतत पाठ करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। परन्तु जो भक्त यजुर्वेदीय विधि-विधान से पूजा करने में असमर्थ हैं या इस विधान से परिचित नहीं हैं वे लोग केवल भगवान शिव के षडाक्षरी मंत्र– ॐ नम:शिवाय का जप करते हुए रुद्राभिषेक का पूर्ण लाभ प्राप्त कर सकते है। महाशिवरात्रि पर शिव-आराधना करने से महादेव शीघ्र ही प्रसन्न होते है। शिव भक्त इस दिन अवश्य ही शिवजी का अभिषेक करते हैं। क्या है रुद्राभिषेक ? अभिषेक शब्द का शाब्दिक अर्थ है – स्नान करना अथवा कराना। रुद्राभिषेक का अर्थ है भगवान रुद्र का अभिषेक अर्थात शिवलिंग पर रुद्र के मंत्रों के द्वारा अभिषेक करना। यह पवित्र-स्नान रुद्ररूप शिव को कराया जाता है। वर्तमान समय में अभिषेक रुद्राभिषेक के रुप में ही विश्रुत है। अभिषेक के कई रूप तथा प्रकार होते हैं। शिव जी को प्रसंन्न करने का सबसे श्रेष्ठ तरीका है रुद्राभिषेक करना अथवा श्रेष्ठ ब्राह्मण विद्वानों के द्वारा कराना। वैसे भी अपनी जटा में गंगा को धारण करने से भगवान शिव को जलधाराप्रिय माना गया है। रुद्राभिषेक क्यों करते हैं? रुद्राष्टाध्यायी के अनुसार शिव ही रूद्र हैं और रुद्र ही शिव है। रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र: अर्थात रूद्र रूप में प्रतिष्ठित शिव हमारे सभी दु:खों को शीघ्र ही समाप्त कर देते हैं। वस्तुतः जो दुःख हम भोगते है उसका कारण हम सब स्वयं ही है हमारे द्वारा जाने अनजाने में किये गए प्रकृति विरुद्ध आचरण के परिणाम स्वरूप ही हम दुःख भोगते हैं। रुद्राभिषेक का आरम्भ कैसे हुआ ? प्रचलित कथा के अनुसार भगवान विष्णु की नाभि से उत्पन्न कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई। ब्रह्माजी जबअपने जन्म का कारण जानने के लिए भगवान विष्णु के पास पहुंचे तो उन्होंने ब्रह्मा की उत्पत्ति का रहस्य बताया और यह भी कहा कि मेरे कारण ही आपकी उत्पत्ति हुई है। परन्तु ब्रह्माजी यह मानने के लिए तैयार नहीं हुए और दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध से नाराज भगवान रुद्र लिंग रूप में प्रकट हुए। इस लिंग का आदि अन्त जब ब्रह्मा और विष्णु को कहीं पता नहीं चला तो हार मान लिया और लिंग का अभिषेक किया, जिससे भगवान प्रसन्न हुए। कहा जाता है कि यहीं से रुद्राभिषेक का आरम्भ हुआ। एक अन्य कथा के अनुसार –– एक बार भगवान शिव सपरिवार वृषभ पर बैठकर विहार कर रहे थे। उसी समय माता पार्वती ने मर्त्यलोक में रुद्राभिषेक कर्म में प्रवृत्त लोगो को देखा तो भगवान शिव से जिज्ञासा कि की हे नाथ मर्त्यलोक में इस इस तरह आपकी पूजा क्यों की जाती है? तथा इसका फल क्या है? भगवान शिव ने कहा – हे प्रिये! जो मनुष्य शीघ्र ही अपनी कामना पूर्ण करना चाहता है वह आशुतोषस्वरूप मेरा विविध द्रव्यों से विविध फल की प्राप्ति हेतु अभिषेक करता है। जो मनुष्य शुक्लयजुर्वेदीय रुद्राष्टाध्यायी से अभिषेक करता है उसे मैं प्रसन्न होकर शीघ्र मनोवांछित फल प्रदान करता हूँ। जो व्यक्ति जिस कामना की पूर्ति के लिए रुद्राभिषेक करता है वह उसी प्रकार के द्रव्यों का प्रयोग करता है अर्थात यदि कोई वाहन प्राप्त करने की इच्छा से रुद्राभिषेक करता है तो उसे दही से अभिषेक करना चाहिए यदि कोई रोग दुःख से छुटकारा पाना चाहता है तो उसे कुशा के जल से अभिषेक करना या कराना चाहिए। रुद्राभिषेक से क्या क्या लाभ मिलता है ? शिव पुराण के अनुसार किस द्रव्य से अभिषेक करने से क्या फल मिलता है अर्थात आप जिस उद्देश्य की पूर्ति हेतु रुद्राभिषेक करा रहे है उसके लिए किस द्रव्य का इस्तेमाल करना चाहिए का उल्लेख शिव पुराण में किया गया है उसका सविस्तार विवरण प्रस्तुत कर रहा हू और आप से अनुरोध है की आप इसी के अनुरूप रुद्राभिषेक कराये तो आपको पूर्ण लाभ मिलेगा। जरूर पढ़े “शिवजी को कौन सा फूल चढाने से क्या फल मिलता है” जानिए शिवजी की पूजा में क्या नहीं चढ़ाना चाहिए संस्कृत श्लोक जलेन वृष्टिमाप्नोति व्याधिशांत्यै कुशोदकै दध्ना च पशुकामाय श्रिया इक्षुरसेन वै। मध्वाज्येन धनार्थी स्यान्मुमुक्षुस्तीर्थवारिणा। पुत्रार्थी पुत्रमाप्नोति पयसा चाभिषेचनात।। बन्ध्या वा काकबंध्या वा मृतवत्सा यांगना। जवरप्रकोपशांत्यर्थम् जलधारा शिवप्रिया।। घृतधारा शिवे कार्या यावन्मन्त्रसहस्त्रकम्। तदा वंशस्यविस्तारो जायते नात्र संशयः। प्रमेह रोग शांत्यर्थम् प्राप्नुयात मान्सेप्सितम। केवलं दुग्धधारा च वदा कार्या विशेषतः। शर्करा मिश्रिता तत्र यदा बुद्धिर्जडा भवेत्। श्रेष्ठा बुद्धिर्भवेत्तस्य कृपया शङ्करस्य च!! सार्षपेनैव तैलेन शत्रुनाशो भवेदिह! पापक्षयार्थी मधुना निर्व्याधिः सर्पिषा तथा।। जीवनार्थी तू पयसा श्रीकामीक्षुरसेन वै। पुत्रार्थी शर्करायास्तु रसेनार्चेतिछवं तथा। महलिंगाभिषेकेन सुप्रीतः शंकरो मुदा। कुर्याद्विधानं रुद्राणां यजुर्वेद्विनिर्मितम्। अर्थात जल से रुद्राभिषेक करने पर — वृष्टि होती है। कुशा जल से अभिषेक करने पर — रोग, दुःख से छुटकारा मिलती है। दही से अभिषेक करने पर — पशु, भवन तथा वाहन की प्राप्ति होती है। गन्ने के रस से अभिषेक करने पर — लक्ष्मी प्राप्ति मधु युक्त जल से अभिषेक करने पर — धन वृद्धि के लिए। तीर्थ जल से अभिषेकक करने पर — मोक्ष की प्राप्ति होती है। इत्र मिले जल से अभिषेक करने से — बीमारी नष्ट होती है । दूध् से अभिषेककरने से — पुत्र प्राप्ति,प्रमेह रोग की शान्ति तथा मनोकामनाएं पूर्ण गंगाजल से अभिषेक करने से — ज्वर ठीक हो जाता है। दूध् शर्करा मिश्रित अभिषेक करने से — सद्बुद्धि प्राप्ति हेतू। घी से अभिषेक करने से — वंश विस्तार होती है। सरसों के तेल से अभिषेक करने से — रोग तथा शत्रु का नाश होता है। शुद्ध शहद रुद्राभिषेक करने से —- पाप क्षय हेतू। इस प्रकार शिव के रूद्र रूप के पूजन और अभिषेक करने से जाने-अनजाने होने वाले पापाचरण से भक्तों को शीघ्र ही छुटकारा मिल जाता है और साधक में शिवत्व रूप सत्यं शिवम सुन्दरम् का उदय हो जाता है उसके बाद शिव के शुभाशीर्वाद सेसमृद्धि, धन-धान्य, विद्या और संतान की प्राप्ति के साथ-साथ सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाते हैं।

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Lalit Mishra Jul 20, 2019

अद्भुतअकल्पनीय पाताल भुवनेश्‍वर गुफ़ा ,गुफा में शंकराचार्य द्वारा स्थापित है, तांबे मड़ा श‍िव लिंग? भारत के मंदिर स्थापत्य कला के अद्भुत नमूने व लोगों की गहरी आस्था के अद्भुत केंद्र है। साथ ही आस-पास का प्राकृतिक सौंदर्य हमें ईश्वर के और भी नजदीक ले जाता है। उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के गंगोलीहाट कस्बे में स्थित प्राचीन गुफा मंदिर पाताल भुवनेश्वर के दर्शन भी कुछ ऐसे ही हैं। सड़क के दोनों ओर मौन खड़े वृक्षों के मध्य धूप छांव के बीच हिचकोले खाते आपका वाहन अल्मोड़ा शहर की ऊंची नीची घाटियों से गुजरता चला जाता है। कभी सैंकड़ों फुट नीचे तो कभी चढ़ाई-चढ़ते-चढ़ते वाहन बादलों की पालकी में हवा में तैर रहा होता है। ऐसे में अचानक सामने दिखाई देने लगती हैं धवल हिमालय पर्वत की नयनाभिराम नंदा देवी, पंचचूली, पिंडारी, ऊंटाधूरा आदि चोटियां। उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के प्रसिद्ध नगर अल्मोड़ा से केवल चार घंटे में टैक्सी द्वारा शेराघाट होते 160 किलोमीटर की दूरी तय कर गंगोलीहाट नामक स्थान पर पहुंचते-पहुंचते प्रकृति सब कुछ लुटा देती है पर्यटकों पर। प्रकृति की गोद में बच्चों की तरह अठखेली करते यात्रीगण जरा सी भी थकान महसूस नहीं करते। (पर्यटक दिल्ली से चल कर पहले दिन 350 कि.मी. की दूरी तय कर अल्मोड़ा पहुंच सकते हैं)। अगर थोड़ी सी थकान हो भी गई तो उसे दूर करने और कुदरत की आश्‍र्चयजनक गुफ़ाओं को देखने के लिए आप को अपने वाहन से गगोलीहाट से अब केवल 8 कि.मी. की दूरी तय करनी है और कुछ देर बाद ही आप पहुंच जाते हैं भारत के प्राचीनतम ग्रन्थ स्कन्द पुराण में वर्णित पाताल भुवनेश्‍वर की गुफा के सामने। कुमाऊं हिल्स के एक जिला पिथौरागढ़ की तहसील को गुफाओं वाला देव कहा गया है। प्राचीन काल से ही पाताल भुवनेश्‍वर प्रसिद्ध रहा है। चारों ओर वृक्षों से आच्छादित एक गुफा जो बाहर से किसी गांव के पुराने घर का 4 फुट लम्बा, डेढ़ फुट चौड़ा द्वार यानि एक बड़ी सूई में छोटा सा छेद मालूम होता है, उस द्वार के सामने पहुंच कर एकदम आप उस स्थान विशेष से प्रभावित नहीं होंगे। यही है सरयू नदी व रामगंगा नदी के मध्य गुपतड़ी नामक स्थान की ऐतिहासिक पाताल भुवनेश्‍वर गुफा। यहां तेतीस करोड़ देवी-देवताओं की मूर्तिया प्रतिष्ठित हैं। गुफा तहखाने की तरह भूमि के अन्दर है। इस गुफा में उतरने के लिए कोई पौढ़ियां नहीं है, आपको पच्चीस फुट सीधा उतरने के लिए घुप्प अंधेरा मिलेगा, कुछ डर सा लगेगा। बरसों से लोग उबड़-खाबड़ पत्थरों पर पैर टिका उल्टा या सीधा उतर लकड़ी जलाकर गुफा के दर्च्चन करते थे। धुंए के कारण शरीर में कालिख भी लग जाया करती थी अब कुछ वर्षों पहले भारतीय थल सेना के सौजन्य से जैनरेटर की रोशनी में जन्‍जीर की मदद से उतर कर आप आराम से गुफा को बिजली की रोशनी में देख सकते हैं। केवल जैनरेटर में तेल के खर्चे के लिए आपको पुजारी को 25-30 रु. तक की राशि देनी होगी। डरते संभलते गुफ़ा में उतरते ही आप अपने को पाते हैं 33 करोड़ देवी-देवताओं की प्रतीकात्मक च्चिलाओं, प्रतिमाओं व बहते हुए पानी के मध्य और आपका हृदय गदगद् हो उठता है और आप सारी थकान भूल जाते हैं। जैसे ही गुफ़ा की मौन तन्द्रा को भंग कर पुजारी की आवाज गूंजती है कि आप शेष नाग के शरीर की हड्डियों पर खड़े हैं और आपके सिर के उपर शेष नाग का फ़न है तो आपको कुछ समझ नहीं आयेगा परन्तु जैसे ही उस गुफ़ा के चट्टानी पत्थरों पर गहन दृष्टिपात करें तो आपके शरीर में सिरहन सी दौड़ेगी और आप वास्तव में अनुभव करेगें की कुदरत द्वारा तराच्चे पत्थरों में नाग फ़न फैलाये है। स्वर्ग से समागत ऐरावत हाथी का शरीर उन चट्टानों में शायद न दिखे पर जमीन में बिल्कुल झुक कर भूमि से चन्द ईचों की दूरी पर चट्टानों में हाथी के तराशे हुए पैरों को देख कर आपको मानना ही पड़ेगा कि ईश्‍वर (विश्‍वकर्मा) के अलावा कोई भी मूर्तिकार इन पैरों को नहीं घड़ सकता है। (स्कन्द पुराण के मानस खण्ड 103 अध्याय के 155 वें श्लोक में इसका वर्णन है। श्लोक 157 में वर्णित परिजात व कल्पतरू वृक्षों के बारे में वर्तमान में भी पुजारी चट्टानों की ओर इंगित करके उनके स्थान को दिखाता है। अब आप शेष नाग के शरीर पर (हड्डियों) पर चल कर पहुंचते हैं उस जगह जहां शिव ने गणेश का सिर काट कर रख दिया था। भगवान शंकर की लीला स्थली होने के कारण उनकी विशाल जटांए इन पत्थरों पर नजर आती हैं। शिव जी की तपस्या के कमण्डल, खाल सब नजर आते हैं। कालभैरव की जीभ साक्षात दिखती है जहां से अगर आगे जाकर पूंछ से निकल जायें तो कहा जाता है कि मोक्ष प्राप्त हो जाता है। गुफ़ाओं के अन्दर बढ़ते हुए गुफ़ा की छत से गाय की एक थन की आकृति नजर आती है। ये कामधेनु गाय का स्तन है जिससे वृषभेश के ऊपर सतत दुग्ध धारा बहती है। कलियुग में अब दूध के बदले इससे पानी टपक रहा है (मानस खण्ड 103 अध्याय के श्लोक 275-276 में भी ये वर्णन है।) कुछ और आगे जाकर नजर आती है हंस की टेड़ी गर्दन वाली मूर्ति। ब्रह्मा के इस हंस को शिव ने घायल कर दिया था क्योंकि उसने वहां रखा अमृत कुंड जुठा कर दिया था। ब्रह्मा, विष्णु व महेश की मूर्तियां साथ-साथ स्थापित हैं। पर्यटक आश्‍र्चय चकित होता है जब छत के उपर एक ही छेद से क्रमवार पहले ब्रह्मा फिर विष्णु फिर महेश की इन मूर्तियों पर पानी टपकता रहता है, और फिर यही क्रम दोबारा से शुरू हो जाता है। चारों युगों के प्रतीक पिंड यहां पर स्थित हैं, जबकि कलियुग का पिंड लम्बाई में अधिक है और उसके ठीक ऊपर गुफ़ा से लटका एक पिंड नीचे की ओर लटक रहा है और इनके मध्य की दूरी पुजारी के कथानुसार 7 करोड़ वर्षों में 1 ईच बढ़ती है और पुजारी का कथन सत्य मानें तो दोनों पिंडो के मिल जाने पर कलियुग समाप्त हो जायेगा। 19वीं सदी में शंकराचार्य द्वारा स्थापित शिवलिंग भी यहां देखा जा सकता है। ये सब पाताल भुवनेश्‍वर की महानता है। गुफा में काल भैरव की जीभ अगर उपरोक्त वर्णन शायद किसी तिलस्मी कहानी का मनघड़न्त हिस्सा लगे तो उठाएं भारत का प्राचीन स्कन्द पुराण ग्रन्थ और टटोलिये मानस खण्ड के 103वें अध्याय के 273 से 288 तक के श्लोकों को, आपकी जिज्ञासा अपने आप शान्त हो जायेगी। ग्रन्थ में गुफ़ा का वर्णन पढ़ कर उपरोक्त प्रतिकात्मक मूर्तियां मानो साक्षात जागृत हो जाएंगी और आप अपने 33 करोड़ देवी-देवताओं के दर्शन कर रहे होंगे। शृण्यवन्तु मनयः सर्वे पापहरं नणाभ्‌ स्मराणत्‌ स्पर्च्चनादेव पूजनात्‌ किं ब्रवीम्यहम्‌ सरयू रामयोर्मध्ये पातालभुवनेश्‍वरः -स्कन्द पुराण मानसखंड 103/10-11 (अर्थात व्यास जी ने कहा मैं ऐसे स्थान का वर्णन करता हूं जिसका पूजन करने के सम्बन्ध में तो कहना ही क्या, जिसका स्मरण और स्पर्च्च मात्र करने से ही सब पाप नष्ट हो जाते हैं वह सरयू, रामगंगा के मध्य पाताल भुवनेश्‍वर है)। 103वें अध्याय के श्लोक 21 से 27 के अनुसार ये भूतल का सबसे पावन क्षेत्र है। पाताल भुवनेश्‍वर वहा जागरूक है और उनका पूजन करने से अश्‍वमेध यज्ञ से हजार गुणा फल प्राप्त होता है अतः उससे बढ़कर कोई दूसरा स्थान नहीं है। चार धाम करने का लक्ष्य यहीं प्राप्त हो जाता है। (श्‍लोक 30-34) के अनुसार पाताल भुवनेश्वर के समीप जाने वाला व्यक्ति एक सौ कुलों का उद्धार कर शिव सायुज्य प्राप्त करता है। पाताल भुवनेश्‍वर जाने के कई रास्ते हैं। आप अल्मोड़ा से पहले गंगोलीहाट शेराघाट, या बागेश्‍वर, या दन्या होते जा सकते हैं। टनकपुर, पिथौरागड़ से भी गंगोलीहाट जा सकते हैं। दिल्ली से बस द्वारा 350 कि.मी. यात्रा कर आप अल्मोड़ा पहुंच कर विश्राम कर सकते है और वहां से अगले दिन आगे की यात्रा जारी रख सकते हैं। रेलवे द्वारा यात्रा करनी हो तो काठगोदाम अन्तिम रेलवे स्टेशन है वहां से आपको बस या प्राइवेट वाहन बागेश्‍वर, अल्मोड़ा के लिए मिलते रहते हैं।

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Lalit Mishra Jul 20, 2019

मित्रो प्रस्तुत प्रस्तुति में हम आपको बतायेगें,कि संसार मे धन्यवाद ओर निंदा के योग्य कौन है????? पहले हम आपको बतायेगें,धन्यवाद के योग्य कौन है !!!!!! सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत। श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत॥ भावार्थ:-हे उमा! सुनो वह कुल धन्य है, संसारभर के लिए पूज्य है और परम पवित्र है, जिसमें श्री रघुवीर परायण (अनन्य रामभक्त) विनम्र पुरुष उत्पन्न हों॥ * सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता॥ धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जा कर मन राता॥ भावार्थ:-जिसका मन श्री रामजी के चरणों में अनुरक्त है, वही सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला) है, वही गुणी है, वही ज्ञानी है। वही पृथ्वी का भूषण, पण्डित और दानी है। वही धर्मपरायण है और वही कुल का रक्षक है॥ *नीति निपुन सोइ परम सयाना। श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना॥ सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा। जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा॥ भावार्थ:-जो छल छो़ड़कर श्री रघुवीर का भजन करता है, वही नीति में निपुण है, वही परम्‌ बुद्धिमान है। उसी ने वेदों के सिद्धांत को भली-भाँति जाना है। वही कवि, वही विद्वान्‌ तथा वही रणधीर है॥ * धन्य देस सो जहँ सुरसरी। धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी॥ धन्य सो भूपु नीति जो करई। धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई॥ भावार्थ:-वह देश धन्य है, जहाँ श्री गंगाजी हैं, वह स्त्री धन्य है जो पातिव्रत धर्म का पालन करती है। वह राजा धन्य है जो न्याय करता है और वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्म से नहीं डिगता है॥ * सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी॥ धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा॥ भावार्थ:-वह धन धन्य है, जिसकी पहली गति होती है (जो दान देने में व्यय होता है) वही बुद्धि धन्य और परिपक्व है जो पुण्य में लगी हुई है। वही घड़ी धन्य है जब सत्संग हो और वही जन्म धन्य है जिसमें ब्राह्मण की अखण्ड भक्ति हो॥ (धन की तीन गतियाँ होती हैं- दान, भोग और नाश। दान उत्तम है, भोग मध्यम है और नाश नीच गति है। जो पुरुष न देता है, न भोगता है, उसके धन की तीसरी गति होती है।) * आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन। निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन॥ भावार्थ:-यद्यपि मैं सब प्रकार से हीन (नीच) हूँ, तो भी आज मैं धन्य हूँ, अत्यंत धन्य हूँ, जो श्री रामजी ने मुझे अपना 'निज जन' जानकर संत समागम दिया (आपसे मेरी भेंट कराई)॥ अब पढ़ें,निंदा के योग्य कौन है !!!!!!!! * सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धरमु बिषय लयलीना॥ सोचिअ नृपति जो नीति न जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना॥ भावार्थ:-सोच उस ब्राह्मण का करना चाहिए, जो वेद नहीं जानता और जो अपना धर्म छोड़कर विषय भोग में ही लीन रहता है। उस राजा का सोच करना चाहिए, जो नीति नहीं जानता और जिसको प्रजा प्राणों के समान प्यारी नहीं है॥ * सोचिअ बयसु कृपन धनवानू। जो न अतिथि सिव भगति सुजानू॥ सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी॥ भावार्थ:-उस वैश्य का सोच करना चाहिए, जो धनवान होकर भी कंजूस है और जो अतिथि सत्कार तथा शिवजी की भक्ति करने में कुशल नहीं है। उस शूद्र का सोच करना चाहिए, जो ब्राह्मणों का अपमान करने वाला, बहुत बोलने वाला, मान-बड़ाई चाहने वाला और ज्ञान का घमंड रखने वाला है॥ * सोचिअ पुनि पति बंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी॥ सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई। जो नहिं गुर आयसु अनुसरई॥ भावार्थ:-पुनः उस स्त्री का सोच करना चाहिए जो पति को छलने वाली, कुटिल, कलहप्रिय और स्वेच्छा चारिणी है। उस ब्रह्मचारी का सोच करना चाहिए, जो अपने ब्रह्मचर्य व्रत को छोड़ देता है और गुरु की आज्ञा के अनुसार नहीं चलता॥ * सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग। सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग॥ भावार्थ:-उस गृहस्थ का सोच करना चाहिए, जो मोहवश कर्म मार्ग का त्याग कर देता है, उस संन्यासी का सोच करना चाहिए, जो दुनिया के प्रपंच में फँसा हुआ और ज्ञान-वैराग्य से हीन है॥ * बैखानस सोइ सोचै जोगू। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू॥ सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी। जननि जनक गुर बंधु बिरोधी॥ भावार्थ:-वानप्रस्थ वही सोच करने योग्य है, जिसको तपस्या छोड़कर भोग अच्छे लगते हैं। सोच उसका करना चाहिए जो चुगलखोर है, बिना ही कारण क्रोध करने वाला है तथा माता, पिता, गुरु एवं भाई-बंधुओं के साथ विरोध रखने वाला है॥ * सब बिधि सोचिअ पर अपकारी। निज तनु पोषक निरदय भारी॥ सोचनीय सबहीं बिधि सोई। जो न छाड़ि छलु हरि जन होई॥ भावार्थ:-सब प्रकार से उसका सोच करना चाहिए, जो दूसरों का अनिष्ट करता है, अपने ही शरीर का पोषण करता है और बड़ा भारी निर्दयी है और वह तो सभी प्रकार से सोच करने योग्य है, जो छल छोड़कर हरि का भक्त नहीं होता॥

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Lalit Mishra Jul 20, 2019

रामचरितमानस का एक अद्भुत प्रसंग:- राम काज लगि, तब अवतारा " गोस्वामी तुलसीदास जी लिखित रामचरितमानस एक अनुपम ग्रंथ है जिसकी एक एक चौपाई मंत्र के समान प्रभाव रखती है। इसमें एक से बढ़ कर एक आध्यात्मिक रहस्य छिपे हुए हैं जो जगत जननी माँ आदिशक्ति, प्रभु श्रीराम एवं सद्गुरु की कृपा, आशीर्वाद से ही, साधक के अंतर्मन में उद्घाटित होते हैं। भक्त शिरोमणि पवनपुत्र हनुमान जी की प्रार्थना में कहा गया है - * अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्‌। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥ भावार्थ:-अतुल बल के धाम, सोने के पर्वत (सुमेरु) के समान कान्तियुक्त शरीर वाले, दैत्य रूपी वन (को ध्वंस करने) के लिए अग्नि रूप, ज्ञानियों में अग्रगण्य, संपूर्ण गुणों के निधान, वानरों के स्वामी, श्री रघुनाथजी के प्रिय भक्त पवनपुत्र श्री हनुमान्‌जी को मैं प्रणाम करता हूँ॥ जब बाली ने अपने भाई सुग्रीव को मारकर अपने राज्य से निकाल दिया था तो वे छिपकर ऋष्यमूक पर्वत पर रहने लगे थे, हनुमान जी भी मित्र सुग्रीव के साथ वहीं रहने लगे। यदि हनुमान जी इतने ही अतुलितबलधामं ( महाबली) थे तो उन्हें बाली को युद्ध में हरा कर सुग्रीव को राज्य दिलाना चाहिए था। पर ऐसा इसलिए नहीं कर सके क्योंकि तब तक उनका (परमात्म चेतना ) प्रभु श्रीराम से कोई जुड़ाव नहीं था। वह अपना जीवन एक सामान्य वानर की तरह ही व्यतीत कर रहे थे। जब भगवान राम-लक्ष्मण माता सीता की खोज में वन वन भटक रहे थे तो वहाँ हनुमान जी का परिचय प्रभु श्रीराम-लक्ष्मण से होता है। प्रभु श्रीराम उन्हें गुरुमंत्र इस रूप में देते हैं -- समदर्शी मोंहि कह सब कोउ सेवक प्रिय अनन्य गति सोउ अर्थात मुझे सभी लोग समदर्शी कहते हैं, फिर भी मुझे अनन्य भाव से भजने वाला सेवक अत्यंत प्रिय है। फिर अनन्यभाव की व्याख्या करते हुए प्रभु श्रीराम कहते हैं ---- सो अनन्य जाकी असि मति न टरई हनुमंत, मैं सेवक सचराचर रूपस्वामि भगवंत ।। अर्थात अनन्य भक्त- सेवक वह है जिसमें यह अटूट विश्वास हो, कि वह इस सृष्टि के कण कण में समाए परमात्मचेतना का सेवक है। जिसे सियाराममय सब जग जानी, करहुँ प्रणाम जोरि जुग पाणी । ही प्रतीत होता है। आध्यात्मिक रहस्य:- शिष्य-साधक को, जब सद्गुरु से मंत्र दीक्षा प्राप्त होती है तो उसे हनुमान जी की ही तरह, ईश्वरीय चेतना से जुड़ने का, उसके अंतःकरण में दिव्यशक्ति प्रवाह के अवतरण का एक साधनामार्ग प्राप्त होता है। यह प्रारम्भ है, अध्यात्म साधना का प्रथम चरण, पहला कदम है। हनुमान जी के जीवन में वामन से विराट होने का, दिव्यचेतना प्रवाह के अवतरण का, आत्मबोध, आत्मज्ञान का वह दूसरा चरण कब आया ?? जब हनुमान जी, ऋक्ष वानरों के दल के साथ, माता सीता का पता लगाने के लिए, ढूँढते ढूँढते समुद्र तट पर पहुँच गए और उन सभी के सामने मार्ग अवरोधक, विशाल समुद्र आ गया। जटायु के भाई संपाति ने जब बताया --- मैं देखउँ तुम नाहिं, गीधहिं दृष्टि अपार। मुझे दिखाई दे रहा है , तुम्हें नहीं क्योंकि गिद्ध की दूरदृष्टि होती है --कि समुद्र के पार लंका में माता सीता अशोकवाटिका में बैठी हुई हैं। आध्यात्मिक रहस्य--- जब तक शिष्य- साधक को, संपाती की तरह दूरदृष्टि- दिव्यदृष्टि प्राप्त सद्गुरु का मार्गदर्शन नहीं मिलता, और शिष्य- साधक चाहे कितना ही बली क्यों न हो ? जब तक उसे सद्गुरु के वचनों पर, मार्गदर्शन पर, तर्क- वितर्क से परे,अटूट श्रद्धा- विश्वास न हो। तब तक शिष्य साधक के वामन से विराट बनने की संभावना नगण्य ही होती है। समुद्र तट पर बैठे ऋक्ष वानरों का झुंड, सद्गुरु के शिष्यों के समूह के समान है, सद्गुरु का मार्गदर्शन सभी को प्राप्त हो रहा है, सभी यह विश्वास कर रहे हैं कि संपाति रूपी सद्गुरु सत्य कह रहे हैं कि समुद्र पार माता सीता अशोकवाटिका में विराजमान हैं। पर स्वयं पर विश्वास नहीं है!!! कि हम इस विशाल समुद्र को पार भी कर सकते हैं या नहीं ??? देश, धर्म, संस्कृति, अपने अस्तित्व पर संकट के बादल छाए हुए हैं, सद्गुरु की दृष्टि आसन्न संकट के विषय मे सचेत कर रही है पर ?????? शिष्य- साधकों का समूह ऋक्ष-वानरों की तरह इस उहापोह में स्वयं को असहाय महसूस कर रहा है कि बात तो सत्य है, पर ??? इस विराट समुद्र को ? पार कैसे करें ? श्री सत्य सनातन धर्म पर छाए संकट को दूर हम भला कैसे कर सकते हैं ? शिष्य साधक के जीवन मे पहला चरण (1) गुरुदीक्षा- गुरुमंत्र की प्राप्ति। (2)दूसरा चरण , सद्गुरु के वचनों, मार्गदर्शन पर अटूट श्रद्धा निष्ठा ।(3) तीसरा चरण, स्वयं पर विश्वास- आत्मविश्वास कि हाँ मैं सद्गुरु के बताए मार्ग पर चलूँगा, मैं कर सकता हूँ, मैं करूँगा। मैं ईश्वरपुत्र हूँ, मेरा जन्म ही इसी कार्य के लिए हुआ है। जब सभी ऋक्ष- वानर इस गंभीर समस्या के समाधान में स्वयं को असहाय समझ कर चुप चाप बैठे थे। जाम्बवन्त जी बोल उठे, " मैं तो अब बूढ़ा हो गया हूँ, अन्यथा युवावस्था में जब भगवान वामन ने विराट अवतार दिखाया था तो मैंने उनकी प्रदक्षिणा कर ली थी।" पर अब ??? अंगद बोल उठे, "मैं एक ओर से तो समुद्र फलाँग कर जा सकता हूँ, पर दूसरी ओर से वापस लौटने में संदेह है।" अर्थात आत्मविश्वास 50% था। तभी, जाम्बवन्त जी की नजर हनुमान जी पर पड़ी, बोल पड़े,:--- का चुप साध रहे बलवाना ?? राम काज लगि तव अवतारा, सुनतहिं भयऊ पर्वताकारा, अट्टहास करि गर्जा, कपि बढ़ि लागि अकास । अर्थात जैसे ही, जाम्बवन्त जी ने यह कहा कि, अरे हनुमान तुम चुप क्यों बैठे हो ? तुम्हारा तो जन्म ही, प्रभु श्रीराम के कार्य के लिए हुआ है । यह सुनते ही हनुमान जीने भयंकर अट्टहास करते हुए गर्जना की, उनका शरीर क्षण मात्र में विशालकाय पर्वत के समान मानो आकाश को छूने लगा। आध्यात्मिक रहस्य :--- हनुमान जी के लिए वह क्षण आत्मबोध का था, आत्मज्ञान का था, दिव्यशक्ति प्रवाह के अवतरण का था, वामन से विराट होने का था, जब जाम्बवन्त ने उन्हें झकझोरते हुए कहा, " राम काज लगि तव अवतारा " शिष्य--साधक की अंतश्चेतना को जब सद्गुरु की वाणी बारंबार सचेत करती है, राम काज लगि तव अवतारा। राम काज लगि तव अवतारा। जिस क्षण शिष्य साधक को हनुमान जी की तरह यह आत्मबोध हो जाये ? वह वामन से विराट हो जाता है, दिव्यचेतना प्रवाह के अवतरण से बड़े बड़े संकल्प लेने लगता है, लक्ष्यप्राप्त करने के लिए तन, मन, धन न्योछावर करने लगता है। क्योंकि वह जानता है , कि देनहार कोई और है, भेजत है दिन रैन, मैं तो निमित्त मात्र हूँ। यह कार्य तो परमात्मा का है, लक्ष्यप्राप्त करने के लिए आवश्यक ज्ञान, विद्या, बुद्धि, शक्ति,साधन, संसाधन, सब वही देंगे। आत्मबोध से आत्मविश्वास 100% हो गया, मैं कर सकता हूँ, मैं करूँगा। दिव्यचेतना के असीम शक्तिप्रवाह का अवतरण हनुमान जी पर जब उस क्षण हुआ तो ?? सुग्रीव के साथ ऋष्यमूक पर्वत पर छिप कर रहने वाले,वानरों के समूह में चुप चाप बैठे रहने वाले हनुमान गरजने लगे -- " मैं लंका को गूलर के फल की भाँति समुद्र में डुबा दूँगा, रावण को कुल खानदान समेत नष्ट कर दूँगा, सीता जी को अभी वहाँ से ले आऊँगा। " शक्तिप्रवाह सम्हाले नहीं सम्हल रहा है, हनुमान उछल रहे हैं, गर्जना कर रहे हैं। जो कार्य पहले असंभव माने बैठे थे अब लग रहा है ये तो कुछ भी नहीं है। मैं तो इसे खेल खेल में चुटकियों में कर सकता हूँ क्योंकि, "राम काज लगि मम अवतारा " जो हो गया था। जाम्बवन्त फिर सम्हालते हैं, रोकते हैं, " नहीं नहीं ! हनुमान ऐसा कुछ नहीं करना है, केवल तुम माता सीता का पता लगा कर, प्रभु श्रीराम का संदेश देकर चले आओ । फिर भी हनुमान जी, कंट्रोल नहीं रख पाये, अशोक वाटिका उजाड़ दिया, राक्षसों को, रावण के पुत्र अक्षयकुमार को मार दिया, लंका नगरी में आग लगा कर ही माने। आध्यात्मिक रहस्य:-- साधक- शिष्य में साधनामार्ग पर चलते हुए जब आत्मबोध होता है, " राम काज लगि मम अवतारा " तब उसके हृदय में दिव्यशक्तिप्रवाह अवतरित होता है। वह शक्ति अनियंत्रित न हो जाये अन्यथा लक्ष्यप्राप्त न करके भटक कर विध्वंस में न लग जाये, इसलिए शिष्य साधक को तब भी, सद्गुरु के नियंत्रण, निर्देशन, मार्गदर्शन में ही कार्य करते रहना चाहिए, जब तक उस महान लक्ष्य, राम काज की प्राप्ति न हो जाये। हनुमान जब लंकानगरी से वापस लौटे तो ---- ये बात उन्हें भली भाँति समझ में आ गयी थी कि जो कुछ भी हुआ उस में मेरी शक्ति काम नहीं कर रही थी, बल्कि दिव्यशक्ति प्रवाह मुझसे ये असंभव कार्य करवा रहा था। इसीलिये जब प्रभु श्रीराम ने हनुमान जी की प्रशंसा करते हुए, उन्हें गले लगा लिया था तो हनुमान जी ने बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया था --- शाखामृग की बड़ी प्रभुताई, शाखा ते शाखा पर जाई, अर्थात पेड़ की डालियों पर उछलने वाले वानर की क्षमता तो बस इतनी सी होती है कि वह एक डाली से दूसरी डाली पर छलाँग मारता रहता है। नाघि सिंधु, हाटकपुर जारा, निशिचर बध सब विपिन उजारा, सो सब तव प्रताप रघुराई। अर्थात विशाल समुद्र को उछल कर पार कर लेना, सोने की लंकानगरी को जला देना, राक्षस सब को मारना, अशोक वाटिका को उजाड़ देना, प्रभु ! ये सब असंभव कार्य तो सब आप के ही दिव्यशक्ति प्रवाह के कारण सम्पन्न हुए हैं। इसमें मेरा कुछ भी श्रेय नहीं है। जो सच्चे शिष्य हैं- साधक हैं, उन्हें हनुमान जी के इस वामन से विराट बनने के आध्यात्मिक रहस्य को मनन, चिंतन कर स्वयं को भी भक्त शिरोमणि हनुमान की तरह स्वयं को राम काज लगी मम अवतारा की भावना के साथ यह दृढ़ संकल्प लेना चाहिए --- राम काज किन्हें, बिना, मोंहि कहाँ विश्राम।

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Lalit Mishra Jul 19, 2019

मन को साधे सब सधे भगवान कहते हैं मन बड़ा ही चंचल, प्रमथन स्वभाव वाला, दृढ और बलवान है। इसलिए इसे रोकना वायु को रोकने जैसा है। मन को साध लेना ही साधना है। जिसका मन वश में नहीं है वही तो बेबस है। मन ना तो कभी तृप्त होता है और ना ही एक क्षण के लिए शांत बैठता है। यह अभाव और दुःख की और बार- बार ध्यान आकर्षित कराता रहता है। अपमान ना होने पर अकारण ही यह अपमान होने का अहसास कराता है। मन ही मान-अपमान का बोध कराता है। अशांति कहीं और से नहीं आती, भीतर से आती है, इसका जन्मदाता मन है। जिसने मन को साध लिया वही तो मुनि है। निरन्तर हरिनाम जप के अभ्यास से इस मन को नियंत्रित किया जा सकता है। जो भीतर शांत है उसके लिए बाहर भी सर्वत्र शांति है।

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Lalit Mishra Jul 16, 2019

इक्यावन शक्तिपीठों में एक अनन्त ब्रह्माण्ड अधीश्वरी का धाम : श्री विन्ध्याचल धाम!!!!! देवी भक्तों का विश्व प्रसिद्ध धाम है उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में विन्ध्य पहाड़ियों पर स्थित आदि शक्ति श्री दुर्गा जी का मन्दिर, जिसे दुनिया विन्ध्याचल मंदिर के नाम से पुकारती है ! यह आदि शक्ति माता विंध्यवासिनी का धाम अनादी काल से ही साधकों के भी लिए प्रिय सिद्धपीठ रहा है। विंध्याचल मंदिर पौराणिक नगरी काशी से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित है। देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है विंध्याचल। सबसे खास बात यह है कि यहां तीन किलोमीटर के दायरे में तीन प्रमुख देवियां विराजमान हैं। ऐसा माना जाता है कि तीनों देवियों के दर्शन किए बिना विंध्याचल की यात्रा अधूरी मानी जाती है। तीनों के केन्द्र में हैं मां विंध्यवासिनी। यहां निकट ही कालीखोह पहाड़ी पर महाकाली तथा अष्टभुजा पहाड़ी पर अष्टभुजी देवी विराजमान हैं। माता के दरबार में तंत्र-मंत्र के साधक भी आकर साधना में लीन होकर माता रानी की कृपा पाते हैं। नवरात्र में प्रतिदिन विश्व के कोने-कोने से भक्तों का तांता जगत जननी के दरबार में लगता है। त्रिकोण यंत्र पर स्थित विंध्याचल क्षेत्र का अस्तित्व सृष्टि से पूर्व का है तथा प्रलय के बाद भी समाप्त नहीं होता, क्योंकि यहां महालक्ष्मी, महाकाली व महासरस्वती स्वरूपा आद्यशक्ति मां विंध्यवासिनी स्वयं विराजमान हैं। यहां सबसे पहले गंगा स्नान किया जाता है और फिर ‘जय माता दी का उद्घोष करते हुए मां विंध्यवासिनी का दर्शन किया जाता है। इस पुण्य स्थल का वर्णन पुराणों में तपोभूमि के रूप में किया गया है। यहां सिंह पर आरूढ़ देवी का विग्रह ढाई हाथ लंबा है। इस बारे में अनेक मान्यताएं हैं। कहा जाता है कि देवी भागवत के दसवें स्कंध में सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने सबसे पहले श्री मनु तथा श्री शतरूपा को प्रकट किया। श्री मनु ने देवी की मूर्ति बनाकर सौ वर्षों तक कठोर तप किया, जिससे प्रसन्न हो भगवती ने उन्हें निष्कंटक राज्य, वंश-वृद्धि, परमपद का आशीर्वाद दिया। वर देकर महादेवी विंध्याचल पर्वत पर चलीं गईं, तभी से ही मां विंध्यवासिनी के रूप में आदि शक्ति की पूजा वहां होती आ रही है। शास्त्रों में मां विंध्यवासिनी के ऐतिहासिक महात्म्य का अलग-अलग वर्णन मिलता है। शिव पुराण में मां विंध्यवासिनी को माता सती का रूप माना गया है तो श्रीमद्भागवत में नंदजा देवी कहा गया है। मां के अन्य नाम कृष्णानुजा, वनदुर्गा भी शास्त्रों में वर्णित हैं। विंध्यवासिनी देवी का वर्णन कुछ इस तरह आया है – नंद गोप गृहे जाता यशोदा गर्भ संभव: तत्सवै नास्यामि विंध्याचलवासिनी – अर्थात जब कंस ने माँ यशोदा की संतान जिसे वह माँ देवकी की आखिरी संतान समझ रहा था, को मारने के लिए उसे हवा में उछाला तो वही देवी योग माया ही थी जो इस स्थान पर बाद में स्थित हो गर्इं। शास्त्र बताते हैं कि महान ऋषि कात्यायन ने मां जगदम्बा को प्रसन्न किया था। इस वजह से मां का नाम कात्यायनी भी है। नील तंत्र में इस बात का उल्लेख है कि जहां विंध्याचल पर्वत को पतित पावनी गंगा स्पर्श करती हैं वहीं मां विंध्यवासिनी का वास है। नीलतंत्र में यह भी उल्लेख है कि मां गंगा पूरे भारतवर्ष में कहीं भी पहाड़ों को छूकर नहीं गुजरतीं, बस विंध्याचल ही एक ऐसा स्थान है जहां विंध्य पर्वत श्रृंखला को छूते हुए गंगा जी का प्रवाह है। इस महाशक्तिपीठ में वैदिक तथा वाम मार्ग विधि से भी पूजन होता है। शास्त्रों के अनुसार, अन्य शक्तिपीठों में देवी के अलग अलग अंगों की प्रतीक रूप में पूजा होती है। विंध्य महात्म्य में इस बात का उल्लेख है कि मां विंध्यवासिनी पूर्णपीठ है। दो शक्ति पीठ स्थल देश से बाहर हैं। एक है नेपाल का गोहेश्वरी पीठ तथा दूसरा है पाकिस्तान का हिंगलाज पीठ। अनेक विद्वान इस पीठ को सृष्टि के उदयकाल से अवतरित बताते हैं तो कुछ द्वापर काल में इसके अवतरित होने का प्रमाण देते हैं। वैसे इस पीठ में मां के दर्शन तो साल के बारहों महीने अनवरत होते हैं, लेकिन यहां नवरात्र का विशेष महत्व है। यहां शारदीय तथा बासंतिक नवरात्र में लगातार चौबीस घंटे मां के दर्शन होते हैं। नवरात्र के दिनों में मां के विशेष श्रृंगार के लिए मंदिर के कपाट दिन में चार बार बंद किए जाते हैं। सामान्य दिनों में मंदिर के कपाट रात 12 बजे से भोर 4 बजे तक बंद रहते हैं। नवरात्र में महानिशा पूजन का भी अपना महत्व है। यहां अष्टमी तिथि पर वाममार्गी तथा दक्षिण मार्गी तांत्रिकों का जमावड़ा रहता है। ऐसा कहा जाता है कि मां के हर श्रृंगार के बाद उनके अलग रूप के दर्शन होते हैं। मां का सबसे सुन्दर श्रृंगार रात्रि के दर्शनों में होता है। यह भी कहा जाता है कि नवरात्र के दिनों में मां मन्दिर की पताका पर वास करती हैं ताकि किसी वजह से मंदिर के गर्भ गृह स्थित मूर्ती तक न पहुंच पाने वाले भक्तों को भी मां के सूक्ष्म रूप के दर्शन हो जाएं। नवरात्र के दिनों में इतनी भीड़ होती है कि अधिसंख्य लोग मां के पताका के दर्शन करके ही खुद को धन्य मानते हैं। हालांकि मां की चौखट तक जाए बिना कोई नहीं लौटता, लेकिन ऐसी मान्यता है कि पताका के भी दर्शन हो गए तो यात्रा पूरी हो जाती है। कहते हैं कि सच्चे दिल से यहां की गई मां की पूजा कभी बेकार नहीं जाती। हर रोज यहां हजारों लोग मत्था टेकते हैं और देवी मां का पूजन करते हैं। विंध्य पर्वत श्रृंखला के नीचे मां विंध्यवासिनी के दर्शन होंते हैं तो अष्टभुजी मंदिर के निकट सीताकुंड, तारादेवी, भैरवकुंड के दर्शन किए जा सकते हैं। त्रेतायुग में श्रीराम ने यहीं पर देवी पूजा कर रामेश्वर महादेव की स्थापना की, जबकि द्वापर में श्री वसुदेव के कुल पुरोहित श्री गर्ग ऋषि ने कंस वध एवं श्रीकृष्णावतार हेतु विंध्याचल में लक्षचंडी का अनुष्ठान किया था। मार्कण्डेय पुराण में वर्णित दुर्गासप्तशती (देवी माहात्म्य) के ग्यारहवें अध्याय के 41-42 श्लोकों में मां भगवती कहती हैं ‘वैवस्वत मन्वंतर के 28वें युग में शुंभ-निशुंभ नामक महादैत्य उत्पन्न होंगे, तब मैं नंदगोप के घर उनकी पत्नी यशोदा के गर्भ में आकर विंध्याचल जाऊंगी और महादैत्यों का संहार करूंगी। श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में श्रीकृष्ण जन्माख्यान में वर्णित है कि श्री देवकी के आठवें गर्भ से आविर्भूत श्रीकृष्ण को वसुदेवजी ने कंस के भय से रातों रात यमुना नदी पार कर श्री नंद के घर पहुंचाया तथा वहां से श्री यशोदा नंदिनी के रूप में जन्मी देवी योग माया को मथुरा ले आए। आठवीं संतान के जन्म की सूचना मिलते ही कंस कारागार पहुंचा। उसने जैसे ही उन्हें पत्थर पर पटकना चाहा। वह उसके हाथों से छूट देवी आकाश में पहुंची और अपने दिव्य स्वरूप को दर्शाते हुए कंस वध की भविष्य वाणी कर विंध्याचल लौट गई। माता विंध्यवासिनी विंध्य पर्वत पर मधु और कैटभ नामक असुरों का नाश करने वाली भगवती यंत्र की अधिष्ठात्री हैं। यहां संकल्प मात्र से उपासकों को सिद्धि प्राप्त हो जाती है, यही कारण है कि इन्हें माँ सिद्धिदात्री भी कहा जाता हैं। देवी के ध्यान में स्वर्णकमल पर विराजती, त्रिनेत्रा, कांतिमयी, चारों हाथों में शंख, चक्र, वर और अभय मुद्रा धात्री, पूर्णचंद्र की सोलह कलाओं से परिपूर्ण, गले में वैजयंती माला, बाहों में बाजूबंद और कानों में मकराकृति कुंडल धात्री, इंद्रादि देवताओं द्वारा पूजित चंद्रमुखी परांबा विंध्यवासिनी का स्मरण होना चाहिए, जिनके सिंहासन के बगल में ही उनका वाहन स्वरूप महासिंह है। त्रिकोण यंत्र के पश्चिम कोण पर उत्तर दिशा की तरफ मुख किए हुए अष्टभुजी देवी विराजमान हैं। अपनी अष्टभुजाओं से सब कामनाओं को पूरा करती हुई वह संपूर्ण दिशाओं में स्थित भक्तों की आठ भुजाओं से रक्षा करती हैं। कहा जाता है कि वहां अष्टदल कमल आच्छादित है, जिसके ऊपर सोलह, फिर चौबीस दल हैं, बीच में एक बिंदु है, जिसके अंदर ब्रह्मरूप में महादेवी अष्टभुजी निवास करती हैं। यहां से मात्र तीन किलोमीटर दूर ‘काली खोह नामक स्थान पर महाकाली स्वरूपा चामुंडा देवी का मंदिर है, जहां देवी का विग्रह बहुत छोटा लेकिन मुख विशाल है। इनके पास भैरवजी का स्थान है। ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष की षष्ठी तिथि में विंध्यवासिनी के दर्शन और पूजन का अतिशय माहात्म्य माना गया है। इस कलियुग में आदमी के जीवन का कोई भरोसा नहीं होता है इसलिए जल्द से जल्द मौका निकाल कर माँ विंध्यवासिनी के दर्शन का महा सौभाग्य जरूर अर्जित करना चाहिए !

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Lalit Mishra Jul 16, 2019

मानवीय चेतना की अवस्थाएं वेद अनुसार जन्म और मृत्यु के बीच और फिर मृत्यु से जन्म के बीच तीन अवस्थाएं ऐसी हैं जो अनवरत और निरंतर चलती रहती हैं। वह तीन अवस्थाएं हैं : जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति। उक्त तीन अवस्थाओं से बाहर निकलने की विधि का नाम ही है हिन्दू धर्म। यह क्रम इस प्रकार चलता है- जागा हुआ व्यक्ति जब पलंग पर सोता है तो पहले स्वप्निक अवस्था में चला जाता है फिर जब नींद गहरी होती है तो वह सुषुप्ति अवस्था में होता है। इसी के उल्टे क्रम में वह सवेरा होने पर पुन: जागृत हो जाता है। व्यक्ति एक ही समय में उक्त तीनों अवस्था में भी रहता है। कुछ लोग जागते हुए भी स्वप्न देख लेते हैं अर्थात वे गहरी कल्पना में चले जाते हैं। जो व्यक्ति उक्त तीनों अवस्था से बाहर निकलकर खुद का अस्तित्व कायम कर लेता है वही मोक्ष के, मुक्ति के और ईश्वर के सच्चे मार्ग पर है। उक्त तीन अवस्था से क्रमश: बाहर निकला जाता है। इसके लिए निरंतर ध्यान करते हुए साक्षी भाव में रहना पड़ता है तब हासिल होती है : तुरीय अवस्था, तुरीयातीत अवस्था, भगवत चेतना और ‍ब्राह्मी चेतना। 1 जागृत अवस्था अभी यह आलेख पढ़ रहे हो तो जागृत अवस्था में ही पढ़ रहे हो? ठीक-ठीक वर्तमान में रहना ही चेतना की जागृत अवस्था है लेकिन अधिकतर लोग ठीक-ठीक वर्तमान में भी नहीं रहते। जागते हुए कल्पना और विचार में खोए रहना ही तो स्वप्न की अवस्था है। जब हम भविष्य की कोई योजना बना रहे होते हैं, तो वर्तमान में नहीं रहकर कल्पना-लोक में चले जाते हैं। कल्पना का यह लोक यथार्थ नहीं एक प्रकार का स्वप्न-लोक होता है। जब हम अतीत की किसी याद में खो जाते हैं, तो हम स्मृति-लोक में चले जाते हैं। यह भी एक-दूसरे प्रकार का स्वप्न-लोक ही है। अधिकतर लोग स्वप्‍न लोक में जीकर ही मर जाते हैं, वे वर्तमान में अपने जीवन का सिर्फ 10 प्रतिशत ही जी पाते हैं, तो ठीक-ठीक वर्तमान में रहना ही चेतना की जागृत अवस्था है। 2 स्वप्न अवस्था जागृति और निद्रा के बीच की अवस्था को स्वप्न अवस्था कहते हैं। निद्रा में डूब जाना अर्थात सुषुप्ति अवस्था कहलाती है। स्वप्न में व्यक्ति थोड़ा जागा और थोड़ा सोया रहता है। इसमें अस्पष्ट अनुभवों और भावों का घालमेल रहता है इसलिए व्यक्ति कब कैसे स्वप्न देख ले कोई भरोसा नहीं। यह ऐसा है कि भीड़भरे इलाके से सारी ट्रेफिक लाइटें और पुलिस को हटाकर स्ट्रीट लाइटें बंद कर देना। ऐसे में व्यक्ति को झाड़ का ‍हिलना भी भूत के होने को दर्शाएगा या रस्सी का हिलना सांप के पीछे लगने जैसा होगा। हमारे स्वप्न दिनभर के हमारे जीवन, विचार, भाव और सुख-दुख पर आधारित होते हैं। यह किसी भी तरह का संसार रच सकते हैं। 3 सुषुप्ति अवस्था गहरी नींद को सु‍षुप्ति कहते हैं। इस अवस्था में पांच ज्ञानेंद्रियां और पांच कर्मेंद्रियां सहित चेतना (हम स्वयं) विश्राम करते हैं। पांच ज्ञानेंद्रियां- चक्षु, श्रोत्र, रसना, घ्राण और त्वचा। पांच कर्मेंन्द्रियां- वाक्, हस्त, पैर, उपस्थ और पायु। सुषुप्ति की अवस्था चेतना की निष्क्रिय अवस्था है। यह अवस्था सुख-दुःख के अनुभवों से मुक्त होती है। इस अवस्था में किसी प्रकार के कष्ट या किसी प्रकार की पीड़ा का अनुभव नहीं होता। इस अवस्था में न तो क्रिया होती है, न क्रिया की संभावना। मृत्यु काल में अधिकतर लोग इससे और गहरी अवस्था में चले जाते हैं। 4. तुरीय अवस्था चेतना की चौथी अवस्था को तुरीय चेतना कहते हैं। यह अवस्था व्यक्ति के प्रयासों से प्राप्त होती है। चेतना की इस अवस्था का न तो कोई गुण है, न ही कोई रूप। यह निर्गुण है, निराकार है। इसमें न जागृति है, न स्वप्न और न सुषुप्ति। यह निर्विचार और अतीत व भविष्य की कल्पना से परे पूर्ण जागृति है। यह उस साफ और शांत जल की तरह है जिसका तल दिखाई देता है। तुरीय का अर्थ होता है चौथी। इसके बारे में कुछ कहने की सुविधा के लिए इसे संख्या से संबोधित करते हैं। यह पारदर्शी कांच या सिनेमा के सफेद पर्दे की तरह है जिसके ऊपर कुछ भी प्रोजेक्ट नहीं हो रहा। जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति आदि चेतनाएं तुरीय के पर्दे पर ही घटित होती हैं और जैसी घटित होती हैं, तुरीय चेतना उन्हें हू-ब-हू हमारे अनुभव को प्रक्षेपित कर देती है। यह आधार-चेतना है। यहीं से शुरू होती है आध्यात्मिक यात्रा, क्योंकि तुरीय के इस पार संसार के दुःख तो उस पार मोक्ष का आनंद होता है। बस, छलांग लगाने की जरूरत है। 5. तुरीयातीत अवस्था तुरीय अवस्था के पार पहला कदम तुरीयातीत अनुभव का। यह अवस्था तुरीय का अनुभव स्थाई हो जाने के बाद आती है। चेतना की इसी अवस्था को प्राप्त व्यक्ति को योगी या योगस्थ कहा जाता है। इस अवस्था में अधिष्ठित व्यक्ति निरंतर कर्म करते हुए भी थकता नहीं। इस अवस्था में काम और आराम एक ही बिंदु पर मिल जाते हैं। इस अवस्था को प्राप्त कर लिया, तो हो गए जीवन रहते जीवन-मुक्त। इस अवस्था में व्यक्ति को स्थूल शरीर या इंद्रियों की आवश्यकता नहीं रहती। वह इनके बगैर भी सबकुछ कर सकता है। चेतना की तुरीयातीत अवस्था को ही सहज-समाधि भी कहते हैं। 6. भगवत चेतना तुरीयातीत की अवस्था में रहते-रहते भगवत चेतना की अवस्था बिना किसी साधना के प्राप्त हो जाती है। इसके बाद का विकास सहज, स्वाभाविक और निस्प्रयास हो जाता है। इस अवस्था में व्यक्ति से कुछ भी छुपा नहीं रहता और वह संपूर्ण जगत को भगवान की सत्ता मानने लगता है। यह एक महान सि‍द्ध योगी की अवस्था है। 7. ब्राह्मी चेतना भगवत चेतना के बाद व्यक्ति में ब्राह्मी चेतना का उदय होता है अर्थात कमल का पूर्ण रूप से खिल जाना। भक्त और भगवान का भेद मिट जाना। अहम् ब्रह्मास्मि और तत्वमसि अर्थात मैं ही ब्रह्म हूं और यह संपूर्ण जगत ही मुझे ब्रह्म नजर आता है। इस अवस्था को ही योग में समाधि की अवस्था कहा गया है। जीते-जी मोक्ष।

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