Lalit Mishra Jun 1, 2019

एक अद्भुत कहानी एक बार भगवान शिव और पार्वती विचरण करते करते किसी जगह से गुजरे। वहाँ एक जीवन्मुक्त महापुरुष बाँट सेंक रहा था, बाँट समझते है? बाँट.. गूंथा हुआ आटा ..रोटी मुर्दे की आग में।पार्वती ने कहा -"लो!ये तुम्हारे भक्त , संतों के ये हाल !कौन करेगा भक्ति तुम्हारी?" बोले-"ये मेरा भक्त नही है,ये तो मेरा स्वरूप है !इसने तो मेरी शरण ले ली है! बोली-"आपकी शरण ले ली है"?" "हाँ!जहाँ मैं रहता हूँ वहीं आ गया है ये!" शिवजी कहाँ रहते है? कैलाश में...गलत बात है! विष्णु कहाँ रहते है?वैकुंठ में..गलत बात है!वैकुंठ में तो विष्णु का श्रीविग्रह रहता है ,शिवलोक में तो शिवजी का श्रीविग्रह रहता है।वास्तव में शिवजी तो स्व में रहते है,कल्याण स्वरूप आत्मा में रहते है ,विष्णु अपने वासुदेव स्वभाव में रहते है,ऐसे ही ये मेरी शरण रहता है ,मुझमें रहता है! पार्वती ने कहा -"फिर इसको कुछ दो तो सही!" बोले"मुझमें रहता है,मेरा स्वरूप है,इसको क्या चाहिए?" लेकिन पार्वती ने हठ ली कुछ दो ! बोले "अच्छा! देख पार्वती! " शिवजी गए नजदीक..वो जो बाँट सेंक रहा था, शिवजी ने भिक्षा पात्र फैलाया भिक्षाम देहि! तो बाँट के जो पीस थे, लड्डू जो थे दो चार उसमेंसे दो उठाके दे दिए। मुड़के नही देखा, ऐसे ही पीछेसे दे दिए । पार्वती को इशारा करा कि देखो है कोई फिकर? है कोई परवाह? "अच्छा, तुमने हमको भिक्षा दिया है तुमको बदले में इस धरती का राज्य देंगे!" उस फकीर ने भिक्षा में जो दिए हुए लड्डू थे आटे के उठाए और वापस रख दिए! बोले "एक तो हम भिक्षा देते है न तो बदले में तुम हमें झंझट दे रहे हो? फिर राज्य सम्भालूँ ,वो सम्भलूँ,सिक्योरिटी वाला चाहिए, फ़लाना चाहिए, टाँग खींचेगा, कोई पैर खींचेगा, दुनिया भर का टेंशन है बाहर से लगता है बड़ी पोस्ट है लेकिन बड़ी मुसीबत में पडूँगा! मुझे नही चाहिए ,एक्सक्यूज़ मी! मुझे रिटर्न कर दो।" पार्वती देखती रह गई!शिव और पार्वती गए । समय पाकर पार्वती अकेली वहाँ आई । उस समय वो महात्मा गोदड़ी सी रहे थे । बोली "जो माँगो दे दूँगी" "माताजी!अगर कुछ करना चाहती हो तो गोदड़ी सी दो!" बोली "नई फर्स्ट क्लास गोदड़ीयाँ भेज देती हूँ" बोले "नही नही! ये सीना है तो सी दो नही तो जाओ तुम" पार्वती ने कहा ये कैसा आदमी है बैल जैसा "जाओ मैं तुम्हें श्राप देती हूँ बैल बन जाओ!" समय पाकर वो बैल हो गया। पार्वती आई पूछा "क्या हाल है? " बोले "पहले तो जरा वो सेंकने पड़ते थे थेंठे ,अब तो जहाँ मुँह मार लिया खा लिया! अच्छा हो गया!" जो अपनी शरण है उसको फिकर क्या है? पहले का जो बॉडी था उस बॉडी में तो एकी बेकी करनी होती तो जरासा समाज का ख्याल लिहाज रखना पड़ता था,अभी तो चलते चलते डबल भी कर लो सिंगल भी कर लो नो प्रॉब्लम! बैल बन गए..अरे!कोई असर नही होती! जाओ ऊँट बन जाओ! ऊँट बन गए। माताजी आई । "क्यों अब कैसा है?" बोले "बैल थे तो झुक झुक के खाना पड़ता था ,कहीं मिलता था कहीं नही! अब तो जहाँ भी बारिश हो चाहे न हो हमारे लिए खुराक तो तैयार रहता है। माताजी! तू कर कर के क्या कर सकती है? श्राप दे देकर इस मायावी शरीर पर तेरे श्राप लगेंगे , मुझ चैतन्य पर तेरे श्राप की ताकत नही !" माताजी ने देखा कि जो शिवजी कह रहे हैं वास्तव में तुम वही हो। जो माँगना है माँग लो !मैं तुम पर प्रसन्न हूँ! बोले "फिर? मेरे को भिखमंगा मानती है? माँगना हो माँग लो,माँगना हो माँग लो..बार बार कहती हो! माया से जिनका ज्ञान हरण हो गया है , अपने अंदर को नही जानते कंगाल हो गए हो भीतर से वो बाहर का माँगते रहते है । जिनको अपने भीतर का आत्मसुख का खजाना लग गया पता चल गया, जो अपनी आत्मा की महिमा को जानते है वो क्या माँगेंगे शिवजी से या पार्वती से? माँग लो,माँग लो..तेरे को माँगना है तो माँग लो माताजी !" माताजी ने कहा कि "महाराज! सचमुच आप अगर प्रसन्न है तो मैं माँगती हूँ आप मेरे घर अवतार ले! आप मेरे यहाँ आईए! " बोले "अच्छा माताजी! एवमस्तु!" वही महापुरुष कार्तिक स्वामी के रूप में आद्य शक्ति जगदम्बा माँ पार्वती के पास आए! वोही कार्तिक स्वामी।

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Lalit Mishra May 30, 2019

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Lalit Mishra May 30, 2019

श्रीमद्भागवत में कई स्थानों पर भगवान् नर-नारायण का उल्लेख है। देवी भागवत के चतुर्थ स्कन्द में तो नर-नारायण की बड़ी लम्बी कथा है। नर और नारायण भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए केदारखंड में उस स्थान पर तपस्या करने लगे जहां पर आज ब्रदीनाथ धाम है। इनकी तपस्या से इंद्र परेशान होने लगे। इंद्र को लगने लगा कि नर और नारायण इंद्रलोक पर अधिकार न कर लें। इसलिए इंद्र ने अप्सराओं को नर और नारायण के पास तपस्या भंग करने के लिए भेजा। उन्होंने जाकर भगवान नर-नारायण को अपनी नाना प्रकार की कलाओं के द्वारा तपस्या भंग करने का प्रयास किया, किंतु उनके ऊपर कामदेव तथा उसके सहयोगियों का कोई प्रभाव न पड़ा। कामदेव, वसंत तथा अप्सराएं शाप के भय से थर-थर कांपने लगे। उनकी यह दशा देखकर भगवान नर और नारायण ने कहा, 'तुम लोग मत डरो। हम प्रेम और प्रसन्नता से तुम लोगों का स्वागत करते हैं।' भगवान नर और नारायण की अभय देने वाली वाणी को सुनकर काम अपने सहयोगियों के साथ अत्यन्त लज्जित हुआ। उसने उनकी स्तुति करते हुए कहा- प्रभो! आप निर्विकार परम तत्व हैं। बड़े बड़े आत्मज्ञानी पुरुष आपके चरण. कमलों की सेवा के प्रभाव से कामविजयी हो जाते हैं। हमारे ऊपर आप अपनी कृपादृष्टि सदैव बनाए रखें। हमारी आपसे यही प्रार्थना है। आप देवाधिदे विष्णु हैं। कामदेव की स्तुति सुनकर भगवान नर नारायण प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी योगमाया के द्वारा एक अद्भुत लीला दिखाई। सभी लोगों ने देखा कि 16000 सुंदर-सुंदर नारियां नर और नारायण की सेवा कर रही हैं। फिर नारायण ने इंद्र की अप्सराओं से भी सुंदर अप्सरा को अपनी जंघा से उत्पन्न कर दिया। उर्व से उत्पन्न होने के कारण इस अप्सरा का नाम उर्वशी रखा। नारायण ने इस अप्सरा को इंद्र को भेंट कर दिया। उन 16000 कन्याओं ने नारायण से विवाह की इच्छा जाहिर की,तब नारायण ने उन्हें कहा कि द्वापर में मेरा कृष्ण अवतार होगा।तब तक प्रतीक्षा करने को कहा उनकी आज्ञा मानकर कामदेव ने अप्सराओं में सर्वश्रेष्ठ अप्सरा उर्वशी को लेकर स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया। उसने देवसभा में जाकर भगवान नर और नारायण की अतुलित महिमा के बारे में सबसे कहा, जिसे सुनकर देवराज इंद्र को काफी पश्चाताप हुआ। केदार और बदरीवन में नर-नारायण नाम ने घोर तपस्या की थी। इसलिए यह स्थान मूलत: इन दो ऋषियों का स्थान है। दोनों ने केदारनाथ में शिवलिंग और बदरीकाश्रम में विष्णु के विग्रहरूप की स्थापना की थी।

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Lalit Mishra May 25, 2019

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Lalit Mishra May 25, 2019

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Lalit Mishra May 25, 2019

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Lalit Mishra May 24, 2019

किन अवस्थाओं से गुजर कर हम ईश्वर को प्राप्त कर सकते हैं 1. जागृत अवस्था अभी यह आलेख पढ़ रहे हो तो जागृत अवस्था में ही पढ़ रहे हो? ठीक-ठीक वर्तमान में रहना ही चेतना की जागृत अवस्था है लेकिन अधिकतर लोग ठीक-ठीक वर्तमान में भी नहीं रहते। जागते हुए कल्पना और विचार में खोए रहना ही तो स्वप्न की अवस्था है। जब हम भविष्य की कोई योजना बना रहे होते हैं, तो वर्तमान में नहीं रहकर कल्पना-लोक में चले जाते हैं। कल्पना का यह लोक यथार्थ नहीं एक प्रकार का स्वप्न-लोक होता है। जब हम अतीत की किसी याद में खो जाते हैं, तो हम स्मृति-लोक में चले जाते हैं। यह भी एक-दूसरे प्रकार का स्वप्न-लोक ही है। अधिकतर लोग स्वप्‍न लोक में जीकर ही मर जाते हैं, वे वर्तमान में अपने जीवन का सिर्फ 10 प्रतिशत ही जी पाते हैं, तो ठीक-ठीक वर्तमान में रहना ही चेतना की जागृत अवस्था है। 2. स्वप्न अवस्था जागृति और निद्रा के बीच की अवस्था को स्वप्न अवस्था कहते हैं। निद्रा में डूब जाना अर्थात सुषुप्ति अवस्था कहलाती है। स्वप्न में व्यक्ति थोड़ा जागा और थोड़ा सोया रहता है। इसमें अस्पष्ट अनुभवों और भावों का घालमेल रहता है इसलिए व्यक्ति कब कैसे स्वप्न देख ले कोई भरोसा नहीं। यह ऐसा है कि भीड़भरे इलाके से सारी ट्रेफिक लाइटें और पुलिस को हटाकर स्ट्रीट लाइटें बंद कर देना। ऐसे में व्यक्ति को झाड़ का ‍हिलना भी भूत के होने को दर्शाएगा या रस्सी का हिलना सांप के पीछे लगने जैसा होगा। हमारे स्वप्न दिनभर के हमारे जीवन, विचार, भाव और सुख-दुख पर आधारित होते हैं। यह किसी भी तरह का संसार रच सकते हैं। 3. सुषुप्ति अवस्था गहरी नींद को सु‍षुप्ति कहते हैं। इस अवस्था में पांच ज्ञानेंद्रियां और पांच कर्मेंद्रियां सहित चेतना (हम स्वयं) विश्राम करते हैं। पांच ज्ञानेंद्रियां- चक्षु, श्रोत्र, रसना, घ्राण और त्वचा। पांच कर्मेंन्द्रियां- वाक्, हस्त, पैर, उपस्थ और पायु। सुषुप्ति की अवस्था चेतना की निष्क्रिय अवस्था है। यह अवस्था सुख-दुःख के अनुभवों से मुक्त होती है। इस अवस्था में किसी प्रकार के कष्ट या किसी प्रकार की पीड़ा का अनुभव नहीं होता। इस अवस्था में न तो क्रिया होती है, न क्रिया की संभावना। मृत्यु काल में अधिकतर लोग इससे और गहरी अवस्था में चले जाते हैं। 4. तुरीय अवस्था चेतना की चौथी अवस्था को तुरीय चेतना कहते हैं। यह अवस्था व्यक्ति के प्रयासों से प्राप्त होती है। चेतना की इस अवस्था का न तो कोई गुण है, न ही कोई रूप। यह निर्गुण है, निराकार है। इसमें न जागृति है, न स्वप्न और न सुषुप्ति। यह निर्विचार और अतीत व भविष्य की कल्पना से परे पूर्ण जागृति है। यह उस साफ और शांत जल की तरह है जिसका तल दिखाई देता है। तुरीय का अर्थ होता है चौथी। इसके बारे में कुछ कहने की सुविधा के लिए इसे संख्या से संबोधित करते हैं। यह पारदर्शी कांच या सिनेमा के सफेद पर्दे की तरह है जिसके ऊपर कुछ भी प्रोजेक्ट नहीं हो रहा। जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति आदि चेतनाएं तुरीय के पर्दे पर ही घटित होती हैं और जैसी घटित होती हैं, तुरीय चेतना उन्हें हू-ब-हू हमारे अनुभव को प्रक्षेपित कर देती है। यह आधार-चेतना है। यहीं से शुरू होती है आध्यात्मिक यात्रा, क्योंकि तुरीय के इस पार संसार के दुःख तो उस पार मोक्ष का आनंद होता है। बस, छलांग लगाने की जरूरत है। 5. तुरीयातीत अवस्था तुरीय अवस्था के पार पहला कदम तुरीयातीत अनुभव का। यह अवस्था तुरीय का अनुभव स्थाई हो जाने के बाद आती है। चेतना की इसी अवस्था को प्राप्त व्यक्ति को योगी या योगस्थ कहा जाता है। इस अवस्था में अधिष्ठित व्यक्ति निरंतर कर्म करते हुए भी थकता नहीं। इस अवस्था में काम और आराम एक ही बिंदु पर मिल जाते हैं। इस अवस्था को प्राप्त कर लिया, तो हो गए जीवन रहते जीवन-मुक्त। इस अवस्था में व्यक्ति को स्थूल शरीर या इंद्रियों की आवश्यकता नहीं रहती। वह इनके बगैर भी सबकुछ कर सकता है। चेतना की तुरीयातीत अवस्था को ही सहज-समाधि भी कहते हैं। 6. भगवत चेतना तुरीयातीत की अवस्था में रहते-रहते भगवत चेतना की अवस्था बिना किसी साधना के प्राप्त हो जाती है। इसके बाद का विकास सहज, स्वाभाविक और निस्प्रयास हो जाता है। इस अवस्था में व्यक्ति से कुछ भी छुपा नहीं रहता और वह संपूर्ण जगत को भगवान की सत्ता मानने लगता है। यह एक महान सि‍द्ध योगी की अवस्था है। 7. ब्राह्मी चेतना भगवत चेतना के बाद व्यक्ति में ब्राह्मी चेतना का उदय होता है अर्थात कमल का पूर्ण रूप से खिल जाना। भक्त और भगवान का भेद मिट जाना। अहम् ब्रह्मास्मि और तत्वमसि अर्थात मैं ही ब्रह्म हूं और यह संपूर्ण जगत ही मुझे ब्रह्म नजर आता है। इस अवस्था को ही योग में समाधि की अवस्था कहा गया है। जीते-जी मोक्ष।

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Lalit Mishra May 12, 2019

ध्यान करने से होने वाले फ़ायदे ध्यान खुद पर नियंत्रण रखने की एक पद्धति है जो हमारी जिंदगी को आसान एंव खुशमय बनाता है ध्यान करने से हमारा मन शांत होता हैं और शक्तिशाली बनता हैं। ध्यान में हम परमात्मा से प्राप्त होने वाली सर्व शक्तियों और सर्व गुणों को अनुभव करते हैं।अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करते। ध्यान खुद के अंदर विश्वास जाग्रत करता हैं।और हमारा आत्मबल बढ़ाता हैं।जो एक क्वालिटी और स्वस्थ लाइफ जीने के लिए बहुत जरूरी हैं। ध्यान के द्वारा हम स्वयं को मानसिक रूप से शक्तिशाली बना सकते हैं।हमारी सोई हुई शक्तिया पुनः जाग्रत होती हैं। ध्यान के द्वारा हम स्वयं को हर परिस्थिति में सकारात्मक और अचल-अडोल रख सकते हैं। ध्यान हमारे जीवन को सुख शांति प्रेम और ख़ुशी से सम्पन्न बनाता हैं।हमे हीन भावनाओ से मुक्त करता हैं। ध्यान करने से हम पर बाहरी नकारात्मक वायुमण्डल का भी कोई प्रभाव नही पड़ता। बच्चे और बूढ़े सभी ध्यान कर सकते हैं इससे हमारी एकाग्रता और कार्य क्षमता भी अधिक तेज होती हैं।

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