Lalit Mishra Jan 19, 2019

एक समय अयोध्या के पहुंचे हुए संत श्री रामायण कथा सुना रहे थे। रोज एक घंटा प्रवचन करते कितने ही लोग आते और आनंद विभोर होकर जाते। साधु महाराज का नियम था रोज कथा शुरू करने से पहले “आइए हनुमंत जी बिराजिए”कहकर हनुमानजी का आहवान करते थे, फिर एक घण्टा प्रवचन करते थे। एक वकील साहब हर रोज कथा सुनने आते। वकील साहब के भक्तिभाव पर एक दिन तर्कशीलता हावी हो गई उन्हें लगा कि महाराज रोज “आइए हनुमंत बिराजिए” कहते है तो क्या हनुमानजी सचमुच आते होंगे ! अत: वकील ने महात्माजी से एक दिन पूछ ही डाला- महाराजजी आप रामायण की कथा बहुत अच्छी कहते है। हमें बड़ा रस आता है। परंतु आप जो गद्दी प्रतिदिन हनुमानजी को देते है उसपर क्या हनुमानजी सचमुच बिराजते है ? साधु महाराज ने कहा… हाँ यह मेरा व्यक्तिगत विश्वास है कि रामकथा हो रही हो तो हनुमानजी अवश्य पधारते है। वकील ने कहा… महाराज ऐसे बात नहीं बनगी। हनुमानजी यहां आते है इसका कोई सबूत दीजिए। वकील ने कहा… आप लोगों को प्रवचन सूना रहे है सो तो अच्छा है लेकिन अपने पास हनुमानजी को उपस्थिति बताकर आप अनुचित तरीके से लोगों को प्रभावित कर रहे है आपको साबित करके दिखाना चाहिए कि हनुमानजी आपकी कथा सुनने आते है । महाराजजी ने बहुत समझाया कि भैया आस्था को किसी सबूत की कसौटी पर नहीं कसना चाहिए। यह तो भक्त और भगवान के बीच का प्रेमरस है। व्यक्तिगत श्रद्घा का विषय है। आप कहो तो मैं प्रवचन बंद कर दूँ या आप कथा में आना छोड़ दो । लेकिन वकील नहीं माना, कहता ही रहा कि आप कई दिनो से दावा करते आ रहे है। यह बात और स्थानों पर भी कहते होगे इसलिए महाराज आपको तो साबित करना होगा कि हनुमानजी कथा सुनने आते है ! इस तरह दोनों के बीच वाद-विवाद होता रहा। मौखिक संघर्ष बढ़ता चला गया। हारकर साधु ने कहा… हनुमानजी है या नहीं उसका सबूतकल दिलाऊंगा। कल कथा शुरू हो तब प्रयोग करूंगा। जिस गद्दी पर मैं हनुमानजी को विराजित होने को कहता हूं। आप उस गद्दी को अपने घर ले जाना। कल अपने साथ उस गद्दी को लेकर आना। फिर मैं कल गद्दी यहाँ रखूंगा। मैं कथा से पहले हनुमानजी को बुलाऊंगा। फिर आप गद्दी ऊँची करना, यदि आपने गद्दी ऊँची कर ली तो समझना कि हनुमान जी नहीं है । वकील इस कसौटी के लिए तैयार हो गया। महाराज ने कहा… हम दोनों में से जो पराजित होगा। वह क्या करेगा, इसका निर्णय भी कर लें ? यह तो सत्य की परीक्षा है. वकील ने कहा- मैं गद्दी ऊँची न कर सका तो वकालत छोड़कर आपसे दीक्षा लूंगा। आप पराजित हो गए तो क्या करोगे? साधु ने कहा… मैं कथावाचन छोड़कर आपके ऑफिस का चपरासी बन जाऊंगा। अगले दिन कथा पंडाल में भारी भीड़ हुई। जो लोग कथा सुनने रोज नही आते थे वे भी भक्ति, प्रेम और विश्वास की परीक्षा देखने आए। काफी भीड़ हो गई। पंडाल भर गया, श्रद्घा और विश्वास का प्रश्न जो था। साधु महाराज औरवकील साहब कथा पंडाल में आये । वकील ने अपने हाथों से गद्दी रखी । महात्माजी ने सजल नेत्रों से मंगलाचरण किया और फिर बोले… आइए हनुमानजी पधारिए । ऐसा बोलते ही साधुजी की आंखे सजल हो उठी। मन ही मन साधु बोले… प्रभु! आज मेरा प्रश्न नहीं बल्कि रघुकुल रीति की पंरपरा का सवाल है। मैं तो एक साधारण जन हूं। मेरी भक्ति और आस्था की लाज रखना। फिर वकील साहब को निमंत्रण दिया… आइए गद्दी ऊँची कीजिए। लोगों की आँखे जम गई। वकील साहब खड़ेे हुये। उन्होंने गद्दी लेने के लिए हाथ बढ़ाया पर गद्दी को स्पर्श भी न कर सके ! जो भी कारण हो उन्होंने तीन बार हाथ बढ़ाया किन्तु तीनों बार असफल रहे। महात्माजी देख रहे थे गद्दी को पकड़ना तो दूर वो गद्दी को छू भी न सके। तीनों बार वकील साहब पसीने से तर-बतर हो गए। वह वकील साधु के चरणों में गिर पड़े और बोले… महाराजा उठाने का मुझे मालूम नहीं पर मेरा हाथ गद्दी तक भी पहुंच नहीं सकता, अत: मैं अपनी हार स्वीकार करता हूं। कहते है कि श्रद्घा और भक्ति के साथ की गई आराधना में बहुत शक्ति होती है मानों तो देव नहीं तो पत्थर। प्रभु की मूर्ति तो पाषाण की ही होती है लेकिन भक्त के भाव से उसमें प्राण प्रतिष्ठा होती है और प्रभु बिराजते है। तुलसीदासजी कहते है- साधु चरित सुभ चरित कषासू निरस बिसद गुनमय फल जासू साधु का स्वभाव कपास जैसा होना चाहिए जो दूसरों के अवगुण को ढककर ज्ञान को अलखजगाए। जो ऐसा भाव प्राप्त कर ले वही साधु है। श्रद्घा और विश्वास मन को शक्ति देते है संसार में बहुत कुछ ऐसा है जो हमारी तर्कशक्ति से, बुद्धि को सीमा से परेे है जो उस संसार को पहुंच जाते है वे परमात्मा स्वरूप हो जाते हैं । बोलो -सियावर रामचन्द्र की जय,पवन सुत हनुमान की जय

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Lalit Mishra Jan 19, 2019

शिव की बारात शिवगणों में सभी के रूप-रंग, आकार-प्रकार, चेष्टाएँ, वेश-भूषा, हाव-भाव आदि सभी कुछ अत्यंत विचित्र थे। किसी के मुख ही नहीं था और किसी के बहुत से मुख थे। कोई बिना हाथ-पैर के ही था तो कोई बहुत से हाथ-पैरों वाला था। किसी के बहुत सी आँखें थीं और किसी के पास एक भी आँख नहीं थी। किसी का मुख गधे की तरह, किसी का सियार की तरह, किसी का कुत्ते की तरह था। उन सबने अपने अंगों में ताजा खून लगा रखा था। कोई अत्यंत पवित्र और कोई अत्यंत वीभत्स तथा अपवित्र गणवेश धारण किए हुए था। उनके आभूषण बड़े ही डरावने थे उन्होंने हाथ में नर-कपाल ले रखा था। वे सबके सब अपनी तरंग में मस्त होकर नाचते-गाते और मौज उड़ाते हुए महादेव शंकरजी के चारों ओर एकत्रित हो गए। चंडीदेवी बड़ी प्रसन्नता के साथ उत्सव मनाती हुई भगवान्‌ रुद्रदेव की बहन बनकर वहाँ आ पहुँचीं। उन्होंने सर्पों के आभूषण पहन रखे थे। वे प्रेत पर बैठकर अपने मस्तक पर सोने का कलश धारण किए हुए थीं। धीरे-धीरे वहाँ सारे देवता भी एकत्र हो गए। उस देवमंडली के बीच में भगवान श्री विष्णु गरुड़ पर विराजमान थे। पितामह ब्रह्माजी भी उनके पास में मूर्तिमान्‌ वेदों, शास्त्रों, पुराणों, आगमों, सनकाद महासिद्धों, प्रजापतियों, पुत्रों तथा कई परिजनों के साथ उपस्थित थे। देवराज इंद्र भी कई आभूषण पहन अपने ऐरावत गज पर बैठ वहाँ पहुँचे थे। सभी प्रमुख ऋषि भी वहाँ आ गए थे। तुम्बुरु, नारद, हाहा और हूहू आदि श्रेष्ठ गंधर्व तथा किन्नर भी शिवजी की बारात की शोभा बढ़ाने के लिए वहाँ पहुँच गए थे। इनके साथ ही सभी जगन्माताएँ, देवकन्याएँ, देवियाँ तथा पवित्र देवांगनाएँ भी वहाँ आ गई थीं। इन सभी के वहाँ मिलने के बाद भगवान शंकरजी अपने स्फुटिक जैसे उज्ज्वल, सुंदर वृषभ पर सवार हुए। दूल्हे के वेश में शिवजी की शोभा निराली ही छटक रही थी। इस दिव्य और विचित्र बारात के प्रस्थान के समय डमरुओं की डम-डम, शंखों के गंभीर नाद, ऋषियों-महर्षियों के मंत्रोच्चार, यक्षों, किन्नरों, गन्धर्वों के सरस गायन और देवांगनाओं के मनमोहक नृत्य और मंगल गीतों की गूँज से तीनों लोक परिव्याप्त हो उठे। उधर हिमालय ने विवाह के लिए बड़ी धूम-धाम से तैयारियाँ कीं और शुभ लग्न में शिवजी की बारात हिमालय के द्वार पर आ लगी। पहले तो शिवजी का विकट रूप तथा उनकी भूत-प्रेतों की सेना को देखकर मैना बहुत डर गईं और उन्हें अपनी कन्या का पाणिग्रहण कराने में आनाकानी करने लगीं। पीछे से जब उन्होंने शंकरजी का करोड़ों कामदेवों को लजाने वाला सोलह वर्ष की अवस्था का परम लावण्यमय रूप देखा तो वे देह-गेह की सुधि भूल गईं और शंकर पर अपनी कन्या के साथ ही साथ अपनी आत्मा को भी न्योछावर कर दिया। हर-गौरी का विवाह आनंदपूर्वक संपन्न हुआ। हिमाचल ने कन्यादान दिया। विष्णु भगवान तथा अन्यान्य देव और देव-रमणियों ने नाना प्रकार के उपहार भेंट किए। ब्रह्माजी ने वेदोक्त रीति से विवाह करवाया। सब लोग अमित उछाह से भरे अपने-अपने स्थानों को लौट गए। हर हर महादेव

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Lalit Mishra Jan 2, 2019

गायत्री मन्त्र का भावार्थ और चिन्तन ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्। ॐ-ब्रह्म भूः-प्राण स्वरूप, भुवः-दुःखनाशक स्वः-सुखस्वरूप तत-उस सवितुः-तेजस्वी, प्रकाशवान वरेण्यं-श्रेष्ठ भर्गः-पाप नाशक देवस्य-दिव्य को, देने वाले को। धीमहि-धारण करें, धियो-बुद्धि योः-जो नः-हमारी प्रचोदयात्-प्रेरित करे। गायत्री मन्त्र के इस अर्थ पर मनन एवं चिन्तन करने से अन्तःकरण में उन तत्वों की वृद्धि होती है जो मनुष्य को देवत्व की ओर ले जाते हैं। वह भाव बड़े ही शान्तिदायक उत्साहप्रद सतोगुणी, उन्नायक एवं आत्मबल बढ़ाने वाले हैं। इन भावों का नित्य प्रति कुछ समय मनन करना चाहिए। मनन के लिये कुछ संकल्प नीचे दिये जाते हैं। इन शब्दों को नेत्र बन्द करके मन ही मन दुहराना चाहिए और कल्पना शक्ति की सहायता से इनका मानस चित्र मनः लोक में भली प्रकार अंकित करना चाहिए- 1-भूःलोक, भुवःलोक, स्वःलोक, तीनों लोकों में-ॐ परमात्मा-समाया हुआ है। यह जितना भी विश्व ब्रह्माण्ड है, परमात्मा की साकार प्रतिमा है। कण कण में भगवान समाये हुए हैं। इस सर्वव्यापक परमात्मा को सर्वत्र देखते हुए मुझे कुविचारों और कुकर्मों से सदा दूर रहना चाहिए, एवं संसार की सुख शान्ति तथा शोभा बढ़ाने में सहयोग देकर प्रभु की सच्ची पूजा करनी चाहिए। 2-तत-वह परमात्मा, सवितुः-तेजस्वी, वरेण्य-श्रेष्ठ, भर्गो-पाप रहित और देवस्य-दिव्य है। उसकी मैं अन्तःकरण में धारणा करता हूँ। इन गुणों वाले भगवान मेरे अन्तःकरण में प्रतिष्ठित होकर मुझे भी तेजस्वी, श्रेष्ठ, पापरहित एवं दिव्य बनाते हैं। मैं प्रतिक्षण इन गुणों से युक्त होता जाता हूँ। इन गुणों की मात्रा मेरे मस्तिष्क तथा शरीर के कण कण में बढ़ती जाती है। मैं इन गुणों से ओत प्रोत होता जाता हूँ। 3-‘यो-वह परमात्मा, नः हमारी, धियो-बुद्धि को, प्रचोदयात्-सन्मार्ग में प्रेरित करें। हम सबकी हमारे स्वजन परिजनों की, बुद्धि सन्मार्गगामी हो। संसार की सबसे बड़ी विभूति, सुखों की आदि माता, सद्बुद्धि को पाकर हम इस जीवन में ही स्वर्गीय आनन्द का उपभोग करें। मानव जन्म को सफल बनावे।’ उपरोक्त तीन चिन्तन-संकल्प पर धीरे-धीरे मनन करना चाहिए। एक एक शब्द पर कुछ क्षण रुकना चाहिए और उस शब्द का कल्पना-चित्र मन में बनाना चाहिए। जब यह शब्द पढ़े जा रहे हों कि परमात्मा भूः भुवः स्व तीनों लोकों में व्याप्त है। तब ऐसी कल्पना करनी चाहिए जैसे हम पाताल, पृथ्वी, स्वर्ग को भली प्रकार देख रहे हैं और उसमें, गर्मी, प्रकाश, बिजली शक्ति या प्राण की तरह परमात्मा सर्वत्र समाया हुआ है। यह विराट ब्रह्माण्ड ईश्वर की एक जीवित जागृत साकार प्रतिमा है। गीता में अर्जुन को जिस प्रकार भगवान ने अपना विराट् रूप दिखाया है वैसे ही विराट् पुरुष के दर्शन अपने कल्पना लोक में मानस चक्षुओं से करने चाहिए। खूब जी भरकर इस विराट् ब्रह्म के, विश्व पुरुष के, दर्शन करने चाहिए। और अनुभव करना चाहिए कि मैं इस विश्व पुरुष के पेट में बैठा हूँ। मेरे चारों ओर परमात्मा ही परमात्मा है। ऐसी महाशक्ति की उपस्थिति में कुविचारों और कुसंस्कारों और कुकर्मों को मैं किस प्रकार अंगीकार कर सकता हूँ? इस विश्व पुरुष का कण कण मेरे लिए पूजनीय है। उसकी सेवा, सुरक्षा, एवं शोभा बढ़ाने में प्रवृत्त रहना ही मेरे लिये श्रेयस्कर है। संकल्प के दूसरे भाग का चिन्तन करते हुए अपने हृदय को भगवान का सिंहासन अनुभव करना चाहिए और उस परम तेजस्वी, सर्वश्रेष्ठ, निर्विकार, दिव्य गुणों वाले परमात्मा को विराजमान देखना चाहिए। भगवान की झाँकी तीन रूप में की जा सकती है। (1) विराट पुरुष के रूप में (2) राम कृष्ण, विष्णु, गायत्री सरस्वती आदि के रूप में (3) दीपक की ज्योति के रूप में। यह अपनी भावना इच्छा और रुचि के ऊपर है। परमात्मा को पुरुष रूप में या गायत्री के मातृ रूप में अपनी रुचि के अनुसार ध्यान किया जा सकता है। परमात्मा स्त्री भी है और पुरुष भी। गायत्री साधकों की माता गायत्री के रूप में ब्रह्म का ध्यान करना अधिक रुचता है। सुन्दर छवि का ध्यान करते हुए उसमें सूर्य के समान तेजस्विता, सर्वोपरि श्रेष्ठता परम पवित्र, निर्मलता और दिव्य सतोगुण की झाँकी करनी चाहिए। इस प्रकार गुण और रूप वाली ब्रह्म शक्ति को अपने हृदय में स्थायी रूप से बस जाने की, अपने रोम रोम में रम जाने की भावना करनी चाहिए। संकल्प के तीसरे भाग का चिन्तन करते हुए ऐसा अनुभव करना चाहिए कि वह गायत्री- ब्रह्म शक्ति हमारे हृदय में निवास करने वाली भावना तथा मस्तिष्क में रहने वाली बुद्धि को पकड़ कर सात्विकता के, धर्म के, कर्तव्य के, सेवा के, सत्पथ पर घसीटे लिये जा रही है। बुद्धि और भावना को इसी दिशा में चलने का अभ्यास तथा प्रेम उत्पन्न कर रही है। तथा वे दोनों बड़े आनन्द, उत्साह तथा संतोष का अनुभव करते हुए माता गायत्री के साथ साथ चल रही हैं। गायत्री में दी हुई यह तीन भावनाएं क्रमशः ज्ञान योग, भक्ति योग और कर्मयोग का प्रतीक हैं। इन्हीं तीनों भावनाओं का विस्तार होकर योग के ज्ञान, भक्ति और कर्म यह तीन आधार बने हैं। गायत्री का अर्थ चिन्तन बीज रूप से अपनी अन्तरात्मा को तीनों योगों की त्रिवेणी में स्नान कराने के समान है। इस प्रकार चिन्तन करने से गायत्री मंत्र का अर्थ भली प्रकार हृदयंगम हो जाता है और उसकी प्रत्येक भावना मन पर अपनी छाप जमा लेती है। जिससे यह परिणाम कुछ ही दिनों में दिखाई देने लगता है कि मन कुविचारों और कुकर्मों की ओर से हट गया है और मनुष्योचित सद्विचारों एवं सत्कर्मों में उत्साह पूर्वक रस लेने लगा है। यह प्रवृत्ति आरम्भ में चाहे कितनी ही मन्द क्यों न हो पर यह निश्चित है कि यदि वह बनी रहे, बुझने न पावे तो निश्चय ही आत्मा दिन दिन समुन्नत होती जाती है।

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Lalit Mishra Jan 2, 2019

मन का कचरा 🏵 एक बार एक स्वामी जी भिक्षा माँगते हुए एक घर के सामने खड़े हुए और उन्होंने आवाज लगायी, . भिक्षा दे दे माते !! . घर से महिला बाहर आयी। उसने उनकी झोली मे भिक्षा डाली और कहा, . “महात्माजी, कोई उपदेश दीजिए!” . स्वामीजी बोले, “आज नहीं, कल दूँगा।” . दूसरे दिन स्वामीजी ने पुन: उस घर के सामने आवाज दी – भीक्षा दे दे माते!! . उस घर की स्त्री ने उस दिन खीर बनायीं थी, जिसमे बादाम-पिस्ते भी डाले थे, . वह खीर का कटोरा लेकर बाहर आयी। . स्वामी जी ने अपना कमंडल आगे कर दिया। . वह स्त्री जब खीर डालने लगी, तो उसने देखा कि कमंडल में गोबर और कूड़ा भरा पड़ा है। उसके हाथ ठिठक गए। . वह बोली, “महाराज ! यह कमंडल तो गन्दा है।” . स्वामीजी बोले, “हाँ, गन्दा तो है, किन्तु खीर इसमें डाल दो।” . स्त्री बोली, “नहीं महाराज, तब तो खीर ख़राब हो जायेगी। दीजिये यह कमंडल, में इसे शुद्ध कर लाती हूँ।” . स्वामीजी बोले, मतलब जब यह कमंडल साफ़ हो जायेगा, तभी खीर डालोगी न ?” . स्त्री ने कहा : “जी महाराज !” . स्वामीजी बोले, “मेरा भी यही उपदेश है। . मन में जब तक चिन्ताओ का कूड़ा-कचरा और बुरे संस्करो का गोबर भरा है, तब तक उपदेशामृत का कोई लाभ न होगा। . यदि उपदेशामृत पान करना है, तो प्रथम अपने मन को शुद्ध करना चाहिए, . कुसंस्कारो का त्याग करना चाहिए, तभी सच्चे सुख और आनन्द की प्राप्ति होगी।

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