✿.。.:* ☆:**:.*श्वास श्वास गोविंद*★✿◉●•◦ एक बार देवी सत्यभामा ने देवी रुक्मणि से पूछा कि दीदी क्या आपको मालुम है कि श्री कृष्ण जी बार बार द्रोपदी से मिलने क्यो जाते है। कोई अपनी बहन के घर बार बार मिलने थोड़ी ना जाता है, मुझे तो लगता है कुछ गड़बड़ है, ऐसा क्या है ? जो बार बार द्रोपदी के घर जाते है । तो देवी रुक्मणि ने कहा : बेकार की बातें मत करो ये बहन भाई का पवित्र सम्बन्ध है जाओ जाकर अपना काम करो। ठाकुर जी सब समझ ग्ए । और कहीं जाने लगे तो देवी सत्यभामा ने पूछा कि प्रभु आप कहां जा रहे हो ठाकुर जी ने कहा कि मैं द्रोपदी के घर जा रहा हूं । अब तो सत्यभामा जी और बेचैन हो गई और तुरन्त देवी रुक्मणि से बोली, 'देखो दीदी फिर वही द्रोपदी के घर जा रहे हैं ‘। कृष्ण जी ने कहा कि क्या तुम भी हमारे साथ चलोगी तो सत्यभामा जी फौरन तैयार हो गई और देवी रुक्मणि से बोली कि दीदी आप भी मेरे साथ चलो और द्रोपदी को ऐसा मज़ा चखा के आएंगे कि वो जीवन भर याद रखेगी। देवी रुक्मणि भी तैयार हो गई। जब दोनों देवियां द्रोपदी के घर पहुंची तो देखा कि द्रोपदी अपने केश संवार रही थी जब द्रोपदी केश संवार रही थी तो भगवान श्री कृष्ण ने पूछा : द्रोपदी क्या कर रही हो तो द्रोपदी बोली : भैया केश संवार के अभी आई तो भगवान बोले तुम काहे को केश संवार रही हो, तुम्हारी तो दो दो भाभी आई है ये तुम्हारे केश संवारेगी फिर कृष्ण जी ने देवी सत्यभामा से कहा कि तुम जाओ और द्रोपदी के सिर में तेल लगाओ और देवी रूक्मिणी तुम जाकर द्रोपदी की चोटी करो। सत्याभाम जी ने रुक्मणि जी से कहा बड़ा अच्छा मौका मिला है ऐसा तेल लगाऊंगी कि इसकी खोपड़ी के एक - एक बाल तोड़ के रख दूंगी। और जैसे ही सत्यभामा जी ने द्रोपदी के सिर में तेल लगाना शुरु किया और एक बाल को तोड़ा तो बाल तोड़ते ही आवाज आई : “हे कृष्ण” फिर दूसरा बाल तोड़ा फिर आवाज आई : “हे कृष्ण” फिर तीसरा बाल तोड़ा तो फिर आवाज आई : “हे कृष्ण ”सत्यभामा जी को समझ नहीं आया और देवी रुक्मणि से पूछा, “दीदी आखिर ऐसी क्या बात है द्रोपदी के मस्तक से जो भी बाल तोड़ती हूं तो कृष्ण का नाम क्यों निकल कर आता है,”रुक्मणि जी बोली ,” मैं तो नहीं जानती “, पीछे से भगवान बोले : ”देवी सत्यभामा तुम देवी रुक्मणि से पूछ रही थी कि मैं दौड़ – दौड़ कर इस द्रोपदी के घर क्यो जाता हूं“, क्योंकि पूरे भूमण्डल पर, पूरी पृथ्वी पर कोई सन्त, कोई साधु, कोई संन्यासी, कोई तपस्वी, कोई साधक, कोई उपासक ऐसा नहीं हुआ जिसने एक दिन में साढ़े तीन करोड़ बार मेरा नाम लिया हो और द्रोपदी केवल ऐसी है जो एक दिन में साढ़े तीन करोड़ बार मेरा नाम लेती है। प्रति दिन स्नान करती है इसलिए उसके हर रोम में कृष्ण नजर आता है और इसलिए मैं रोज इसके पास आता हूं ।” इसे कहते हैं ‘स्नान‘ जो देवी द्रोपदी प्रतिदिन किया करती थी । हम जो हर रोज साबुन, शैम्पू और तेल लगा कर अपने तन को स्वच्छ कर लिया, इसको केवल‘ नहाना ‘कहा गया है । जब नारायण से पूछा गया : स्नान का क्या मतलब है ? तब नारायण ने बताया : हमारे शरीर में साढ़े तीन करोड़ रोम छिद्र हैं । जब मनुष्य साढ़े तीन करोड़ बार भगवान का नाम ले लेता है तब जीवन में एक बार उसका स्नान हो पाता है “। “इसको कहते हैं स्नान” श्री कृष्ण का नाम तब तक जपते रहिए जब तक दिन में साढ़े तीन करोड़ बार भगवान का नाम ना जप लें,एक बार स्नान न कर लें इसीलिए कहा गया है, 💖´ *•.¸♥¸.•**कुमार रौनक कश्यप**•.¸♥¸.•*´💖

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. वैशाखमास-माहात्म्य पोस्ट - 13 (अन्तिम) वैशाख मास की अन्तिम तीन तिथियों की महत्ता तथा ग्रन्थ का उपसंहार - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - श्रुतदेवजी कहते हैं- राजेन्द्र ! वैशाख के शुक्ल पक्ष में जो अन्तिम तीन त्रयोदशीसे लेकर पूर्णिमा तक की तिथियाँ हैं, वे बड़ी पवित्र और शुभकारक हैं। उनका नाम 'पुष्करिणी' है, वे सब पापों का क्षय करने वाली हैं। जो सम्पूर्ण वैशाख मास में स्नान करने में असमर्थ हो, वह यदि इन तीन तिथियों में भी स्नान करे तो वैशाख मास का पूरा फल पा लेता है। पूर्व काल में वैशाख मास की एकादशी तिथि को शुभ अमृत प्रकट हुआ। द्वादशी को भगवान् विष्णु ने उसकी रक्षा की। त्रयोदशी को उन श्रीहरि ने देवताओं को सुधा-पान कराया। चतुर्दशी को देव विरोधी दैत्यों का संहार किया और पूर्णिमा के दिन समस्त देवताओं को उनका साम्राज्य प्राप्त हो गया। इसलिये देवताओं ने सन्तुष्ट होकर इन तीन तिथियों को वर दिया-' वैशाख मास की ये तीन शुभ तिथियाँ मनुष्यों के पापों का नाश करने वाली तथा उन्हें पुत्र-पौत्रादि फल देने वाली हों। जो मनुष्य इस सम्पूर्ण मास में स्नान न कर सका हो, वह इन तिथियों में स्नान कर लेने पर पूर्ण फल को ही पाता है। वैशाख मास में लौकिक कामनाओं का नियमन करने पर मनुष्य निश्चय ही भगवान् विष्णु का सायुज्य प्राप्त कर लेता है। महीने भर नियम निभाने में असमर्थ मानव यदि उक्त तीन दिन भी कामनाओं का संयम कर सके तो उतने से ही पूर्ण फल को पाकर भगवान् विष्णु के धाम में आनन्द का अनुभव करता है।' इस प्रकार वर देकर देवता अपने धाम को चले गये। अत: पुष्करिणी नाम से प्रसिद्ध अन्तिम तीन तिथियाँ पुण्यदायिनी, समस्त पापराशि का नाश करने वाली तथा पुत्र - पौत्र को बढ़ाने वाली हैं। जो वैशाख मास में अन्तिम तीन दिन गीता का पाठ करता है, उसे प्रतिदिन अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। जो उक्त तीनों दिन विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करता है, उसके पुण्यफल का वर्णन करने में इस भूलोक तथा स्वर्गलोक में कौन समर्थ है ? पूर्णिमा को सहस्रनामों के द्वारा भगवान् मधुसूदन को दूध से नहला कर मनुष्य पापहीन वैकुण्ठधाम में जाता है। वैशाख मास में प्रतिदिन भागवत के आधे या चौथाई श्लोक का पाठ करने वाला मनुष्य ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है। जो वैशाख के अन्तिम तीन दिनों में भागवतशास्त्र का श्रवण करता है, वह जल से कमल के पत्ते की भाँति कभी पापों से लिप्त नहीं होता। उक्त तीनों दिनों के सेवन से कितने ही मनुष्यों ने देवत्व प्राप्त कर लिया, कितने ही सिद्ध हो गये और कितनों ने ब्रह्मत्व पा लिया। ब्रह्मज्ञान से मुक्ति होती है। अथवा प्रयाग में मृत्यु होने से या वैशाख मास में नियम पूर्वक प्रात:काल जल में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिये वैशाख के अन्तिम तीन दिनों में स्नान, दान और भगवत् पूजन आदि अवश्य करना चाहिये। वैशाख मास के उत्तम माहात्म्य का पूरा-पूरा वर्णन रोग-शोक से रहित जगदीश्वर भगवान् नारायण के सिवा दूसरा कौन कर सकता है। तुम भी वैशाख मास में दान आदि उत्तम कर्म का अनुप्ठान करो। इससे निश्चय ही तुम्हें भोग और मोक्ष की प्राप्ति होगी। इस प्रकार मिथिलापति जनक को उपदेश देकर श्रुतदेवजी ने उनकी अनुमति ले वहाँ से जाने का विचार किया। तब राजर्षि जनक ने अपने अभ्युदय के लिये उत्तम उत्सव कराया और श्रुतदेवजी को पालकी पर बिठाकर विदा किया। वस्त्र, आभूषण, गौ, भूमि, तिल और सुवर्ण आदि से उनकी पूजा और वन्दना करके राजा ने उनकी परिक्रमा की। तत्पश्चात् उनसे विदा हो महातेजस्वी एवं परम यशस्वी श्रुतदेवजी सन्तुष्ट हो प्रसन्नता पूर्वक वहाँ से अपने स्थान को गये। राजा ने वैशाख धर्म का पालन करके मोक्ष प्राप्त किया। नारदजी कहते हैं- अम्बरीष! यह उत्तम उपाख्यान मैंने तुम्हें सुनाया है, जो कि सब पापों का नाशक तथा सम्पृर्ण सम्पत्तियों को देने वाला है। इससे मनुष्य भुक्ति, मुक्ति, ज्ञान एवं मोक्ष पाता है। नारदजी का यह वचन सुनकर महायशस्वी राजा अम्बरीष मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने बाह्य जगत् के व्यापारों से निवृत्त होकर मुनि को साष्टांग प्रणाम किया और अपने सम्पूर्ण वैभवों से उनकी पूजा की। तत्पश्चात् उनसे विदा लेकर देवर्षि नारदजी दूसरे लोक में चले गये; क्योंकि दक्ष प्रजापति के शाप से वे एक स्थान पर नहीं ठहर सकते। राजर्षि अम्बरीष भी नारदजी के बताये हुए सब धर्मो का अनुष्ठान करके निर्गुण परब्रह्म परमात्मा में विलीन हो गये जो इस पापनाशक एवं पुण्यवर्द्धक उपाख्यान को सुनता अथवा पढ़ता है, वह परम गति को प्राप्त होता है। जिनके घर में यह लिखी हुई पुस्तक रहती है उनके हाथ में मुक्ति आ जाती है। फिर जो सदा इसके श्रवण में मन लगाते हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है। ----------:::×:::---------- वैशाखमास-माहात्म्य सम्पूर्ण ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" "कुमार रौनक कश्यप " ********************************************

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🌞जीवन में हर क्षेत्र की एक सीमा होती है और सीमा का अतिक्रमण जीवन नाश का कारण बन जाता है। अति से अमृत भी विष बन जाता है और मात्रा में सेवन करने पर विष भी अमृत बन जाता है। इसलिए हमारे मनीषियों ने सूत्र दिया है की- अति सर्वत्र वर्जयेत्,,,। भोजन स्वास्थ्य के लिए अतिआवश्यक है मगर वही भोजन यदि मात्रा से अधिक लिया जाए तो वह हमारी अस्वस्थता का कारण बन जाता है।🙏 🌞दूध को अमृत माना गया है मगर अति सेवन से वही अमृत तुल्य दूध शरीर के लिए विष भी बन जाता है। सम्यकत जीवन का ऋंगार है इसलिए जीवन के सौंदर्य वर्धन के लिए सम्यकता अनिवार्य हो जाती है। क्रोध भी यदि सीमा में किया जाए तो वह भी हितकर बन जाता है और शांति यदि सीमा से अधिक हो तो वह भी अहितकर बन जाती है। और तो और शास्त्रों ने तो यहां तक कहा है कि जीवन में अति मूढ़ता तो होनी ही नहीं चाहिए मगर अति ज्ञान और चातुर्य भी नहीं होना चाहिए।🙏 🌞क्योंकि जहां ज्ञान की अति होगी वहां वो रावण के समान अहंकार रूपी विष को अवश्य जन्म देगा। महाभारत के घोर विनाश के दो प्रमुख कारण थे और वह ये कि एक देवी द्रोपदी का आवश्यकता से अधिक बोलना और एक भीष्मपितामह का आवश्यकता से अधिक मौन धारण कर लेना।🙏 🌞एक ने अनावश्यक शब्द बाण चलाकर तो एक ने अनावश्यक मौन रहकर अपनी- अपनी सीमा का अतिक्रमण किया था। अति की भली ना बरसना, अति की भली ना धूप। अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।। जीवन में जब -जब सीमा का अतिक्रमण होगा तब- तब तक एक नया तनाव और एक नई अशांति का भी जन्म होगा ।सम्यक ज्ञान, सम्यक वाणी, सम्यक मौन, सम्यक क्रोध, सम्यक शांति, सम्यक हास्य और सम्यक दृष्टि। वही जीवन के संपूर्ण आनंद का सूत्र है ।अति से बचना ही जीवन में पूरी गति से बचना भी है..!!💐 *🙏🏻🙏🏼🙏🏿जय जय श्री राधे*🙏🙏🏾🙏🏽 💖´ *•.¸♥¸.•**जय जय श्री राधे**•.¸♥¸.•*´💖 💖´ *•.¸♥¸.•**कुमार रौनक कश्यप**•.¸♥¸.•*´💖

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. ॥हरि ॐ तत्सत्॥ श्रीमद्भागवत-कथा श्रीमद्भागवत-महापुराण पोस्ट - 206 स्कन्ध - 09 अध्याय - 23 इस अध्याय में:- अनु, द्रह्यु, तुर्वसु और यदु के वंश का वर्णन श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! ययातिनन्दन अनु के तीन पुत्र हुए- सभानर, चक्षु और परोक्ष। सभानर के कालनर, कालनर का सृंजय, सृंजय का जनमेजय, जनमेजय का महाशील, महाशील का पुत्र हुआ महामना। महामना के दो पुत्र हुए- उशीनर एवं तितिक्षु। उशीनर के चार पुत्र थे- शिबि, वन, शमी और दक्ष। शिबि के चार पुत्र हुए- बृषादर्भ, सुवीर, मद्र और कैकय। उशीनर के भाई तितिक्षु के रुशद्रथ, रुशद्रथ के हेम, हेम के सुतपा और सुतपा के बलि नामक पुत्र हुआ। राजा बलि की पत्नी के गर्भ से दीर्घतमा मुनि ने छः पुत्र उत्पन्न किये- अंग, वंग, कलिंग, सुह्म, पुण्ड्र और अन्ध्र। इन लोगों ने अपने-अपने नाम से पूर्व दिशा में छः देश बसाये। अंग का पुत्र हुआ खनपान, खनपान का दिविरथ, दिविरथ का धर्मरथ और धर्मरथ का चित्ररथ। यह चित्ररथ ही रोमपाद के नाम से प्रसिद्ध था। इसके मित्र थे अयोध्यापति महाराज दशरथ। रोमपाद को कोई सन्तान न थी। इसलिये दशरथ ने उन्हें अपनी शान्ता नाम की कन्या गोद दे दी। शान्ता का विवाह ऋष्यश्रृंग मुनि से हुआ। ऋष्यश्रृंग विभाण्डक ऋषि के द्वारा हरिणी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। एक बार राजा रोमपाद के राज्य में बहुत दिनों तक वर्षा नहीं हुई। तब गणिकाएँ अपने नृत्य, संगीत, वाद्य, हाव-भाव आलिंगन और विविध उपहारों से मोहित करके ऋष्यश्रृंग को वहाँ ले आयीं। उनके आते ही वर्षा हो गयी। उन्होंने ही इन्द्र देवता का यज्ञ कराया, तब सन्तानहीन राजा रोमपाद को भी पुत्र हुआ और पुत्रहीन दशरथ ने भी उन्हीं के प्रयत्न से चार पुत्र प्राप्त किये। रोमपाद का पुत्र हुआ चतुरंग और चतुरंग का पृथुलाक्ष। पृथुलाक्ष के बृहद्रथ, बृहत्कर्मा और बृहद्भानु-तीन पुत्र हुए। बृहद्रथ का पुत्र हुआ बृहन्मना और बृहन्मना का जयद्रथ। जयद्रथ की पत्नी का नाम था सम्भूति। उसके गर्भ से विजय का जन्म हुआ। विजय का धृति, धृति का धृतव्रत, धृतव्रत का सत्कर्मा, सत्कर्मा का पुत्र था अधिरथ। अधिरथ को कोई सन्तान न थी। किसी दिन वह गंगा तट पर क्रीड़ा कर रहा था कि देखा एक पिटारी में नन्हा-सा शिशु बहा चला जा रहा है। वह बालक कर्ण था, जिसे कुन्ती ने कन्यावस्था में उत्पन्न होने के कारण उस प्रकार बहा दिया था। अधिरथ ने उसी को अपना पुत्र बना लिया। परीक्षित! राजा कर्ण के पुत्र का नाम था वृषसेन। ययाति के पुत्र द्रह्यु से बभ्रु का जन्म हुआ। बभ्रु का सेतु, सेतु का आरब्ध, आरब्ध का गान्धार, गान्धार का धर्म, धर्म का धृत, धृत का दुर्मना और दुर्मना का पुत्र प्रचेता हुआ। प्रचेता के सौ पुत्र हुए, ये उत्तर दिशा में म्लेच्छों के राजा हुए। ययाति के पुत्र तुर्वसु का वह्नि, वह्नि का भर्ग, भर्ग का भानुमान्, भानुमान् का त्रिभानु, त्रिभानु का उदारबुद्धि करन्धम और करन्धम का पुत्र हुआ मरुत। मरुत सन्तानहीन था। इसलिये उसने पूरुवंशी दुष्यन्त को अपना पुत्र बनाकर रखा था। परन्तु दुष्यन्त राज्य की कामना से अपने ही वंश में लौट गये। परीक्षित! अब मैं राजा ययाति के बड़े पुत्र यदु के वंश का वर्णन करता हूँ। परीक्षित! महाराज यदु का वंश परम पवित्र और मनुष्यों के समस्त पापों को नष्ट करने वाला है। जो मनुष्य इसका श्रवण करेगा, वह समस्त पापों से मुक्त हो जायेगा। इस वंश में स्वयं भगवान् परब्रह्म श्रीकृष्ण ने मनुष्य के-से रूप में अवतार लिया था। यदु के चार पुत्र थे- सहस्रजित, क्रोष्टा, नल और रिपु। सहस्रजित से शतजित का जन्म हुआ। शतजित के तीन पुत्र थे- महाहय, वेणुहय और हैहय। हैहय का धर्म, धर्म का नेत्र, नेत्र का कुन्ति, कुन्ति का सोहंजि, सोहंजि का महिष्मान और महिष्मान का पुत्र भद्रसेन हुआ। भद्रसेन के दो पुत्र थे- दुर्मद और धनक। धनक के चार पुत्र हुए- कृतवीर्य, कृताग्नि, कृतवर्मा और कृतौजा। कृतवीर्य का पुत्र अर्जुन था। वह सातों द्वीप का एकछत्र सम्राट् था। उसने भगवान् के अंशावतार श्रीदत्तात्रेय जी से योग विद्या और अणिमा-लघिमा आदि बड़ी-बड़ी सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। इसमें सन्देह नहीं कि संसार का कोई भी सम्राट् यज्ञ, दान, तपस्या, योग शस्त्रज्ञान, पराक्रम और विजय आदि गुणों में कृतवीर्य अर्जुन की बराबरी नहीं कर सकेगा। सहस्रबाहु अर्जुन पचासी हजार वर्ष तक छहों इन्द्रियों से अक्षय विषयों का भोग करता रहा। इस बीच में न तो उसके शरीर का बल ही क्षीण हुआ और न तो कभी उसने यही स्मरण किया कि मेरे धन का नाश हो जायेगा। उसके धन के नाश की तो बात ही क्या है, उसका ऐसा प्रभाव था कि उसके स्मरण से दूसरों का खोया हुआ धन भी मिल जाता था। उसके हजार पुत्रों में से केवल पाँच ही जीवित रहे। शेष सब परशुराम जी की क्रोधाग्नि में भस्म हो गये। बचे हुए पुत्रों के नाम थे- जयध्वज, शूरसेन, वृषभ, मधु और ऊर्जित। जयध्वज के पुत्र का नाम था तालजंघ। तालजंघ के सौ पुत्र हुए। वे ‘तालजंघ’ नामक क्षत्रिय कहलाये। महर्षि और्व की शक्ति से राजा सगर ने उनका संहार कर डाला। उन सौ पुत्रों में सबसे बड़ा था वीतिहोत्र। वीतिहोत्र का पुत्र मधु हुआ। मधु के सौ पुत्र थे। उनमें सबसे बड़ा था वृष्णि। परीक्षित! इन्हीं मधु, वृष्णि और यदु के कारण यह वंश माधव, वार्ष्णेय और यादव के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यदुनन्दन क्रोष्टु के पुत्र का नाम था वृजिनवान। वृजिनवान का पुत्र श्वाहि, श्वाहि का रुशेकु, रुशेकु का चित्ररथ और चित्ररथ के पुत्र का नाम था शशबिन्दु। वह परम योगी, महान् भोगैश्वर्य-सम्पन्न और अत्यन्त पराक्रमी था। वह चौदह रत्नों (हाथी, घोड़ा, रथ, स्त्री, बाण, खजाना, माला, वस्त्र, वृक्ष, शक्ति, पाश, मणि, छत्र और विमान) का स्वामी, चक्रवर्ती और युद्ध में अजेय था। परम यशस्वी शशबिन्दु की दस हजार पत्नियाँ थीं। उनमें से एक-एक के लाख-लाख सन्तान हुई थीं। इस प्रकार उसके सौ करोड़-एक अरब सन्तानें उत्पन्न हुईं। उनमें पृथुश्रवा आदि छः पुत्र प्रधान थे। पृथुश्रवा के पुत्र का नाम था धर्म। धर्म का पुत्र उशना हुआ। उसने सौ अश्वमेध यज्ञ किये थे। उशना का पुत्र हुआ रुचक। रुचक के पाँच पुत्र हुए, उनके नाम सुनो। पुरुजित्, रुक्म, रुक्मेषु, पृथु और ज्यामघ। ज्यामघ की पत्नी का नाम था शैब्या। ज्यामघ के बहुत दिनों तक कोई सन्तान न हुई, परन्तु उसने अपनी पत्नी के भय से दूसरा विवाह नहीं किया। एक बार वह अपने शत्रु के घर से भोज्या नाम की कन्या हर लाया। जब शैब्या ने पति के रथ पर उस कन्या को देखा, तब वह चिढ़कर अपने पति से बोली- ‘कपटी! मेरे बैठने की जगह पर आज किसे बैठाकर लिये आ रहे हो?’ ज्यामघ ने कहा- ‘यह तो तुम्हारी पुत्रवधू है।’ शैब्या ने मुसकराकर अपने पति से कहा- ‘मैं तो जन्म से ही बाँझ हूँ और मेरी कोई सौत भी नहीं है। फिर यह मेरी पुत्रवधू कैसे हो सकती है?’ ज्यामघ ने कहा- ‘रानी! तुमको जो पुत्र होगा, उसकी ये पत्नी बनेगी’। राजा ज्यामघ के इस वचन का विश्वेदेव और पितरों ने अनुमोदन किया। फिर क्या था, समय पर शैब्या को गर्भ रहा और उसने बड़ा ही सुन्दर बालक उत्पन्न किया। उसका नाम हुआ विदर्भ। उसी ने शैब्या की साध्वी पुत्रवधू भोज्या से विवाह किया। ~~~०~~~ श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" "कुमार रौनक कश्यप " *************************************************

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